Socialist Hooliganism: A Reflection on Recent

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Noida: EventsThe recent incident involving Samajwadi Party (SP) workers physically assaulting Maulana Sajid Rashidi in a Noida TV studio has sparked a heated debate about political conduct, cultural sensitivity, and the boundaries of acceptable protest. This episode, where Rashidi was slapped over derogatory remarks against SP MP Dimple Yadav, exemplifies what some critics label as “socialist hooliganism.” While Rashidi’s comments were undeniably inappropriate and misogynistic, the violent response by SP workers raises serious questions about the party’s approach to dissent and the broader issue of political violence in India.

Maulana Sajid Rashidi’s remarks, made during a televised debate, targeted Dimple Yadav’s attire during a visit to a mosque, calling it disrespectful to Islamic traditions. His language, including references to her “naked back,” was widely condemned as offensive and misogynistic, prompting an FIR under multiple sections of the Bharatiya Nyaya Sanhita for outraging modesty and inciting communal disharmony. The backlash was justified, as such remarks not only demeaned a woman parliamentarian but also risked inflaming religious tensions. However, the SP’s response—physical violence in a public setting—crossed a line from protest to hooliganism, reflecting a troubling trend in political culture.
The assault, captured on video and widely circulated, showed SP workers slapping Rashidi during a studio break, an act that undermines democratic discourse and the rule of law. Critics argue this mirrors the tactics of other regional parties like the Rashtriya Janata Dal (RJD), known for strong-arm politics. The SP’s defense of such actions, exemplified by leader Rajkumar Bhati’s alleged threat to beat Rashidi wherever he is seen, further fuels perceptions of a party culture that tolerates or even endorses thuggery. This behavior contradicts the socialist ideals of equality and justice, often championed by SP leaders citing Dr. B.R. Ambedkar and the Constitution.

Dimple Yadav’s mosque visit, where she did not cover her head, has been debated as a breach of Islamic etiquette. While cultural sensitivity is crucial when entering religious spaces, using this as a pretext for misogynistic attacks is indefensible. Equally, the SP’s resort to violence rather than legal or verbal rebuttal reveals a deeper issue: a reliance on muscle power over dialogue. This incident is not isolated but part of a pattern where political workers, across parties, prioritize intimidation over democratic engagement.

In conclusion, while Rashidi’s remarks were condemnable, the SP’s violent response exemplifies a dangerous form of political hooliganism. It erodes public trust in democratic institutions and highlights the need for parties to uphold civility and legal recourse over mob tactics. True socialism should champion dialogue and respect, not fists and threats, to preserve India’s pluralistic fabric.

ट्रम्प प्रशासन भारतीय दर्शन को अपनाकर वैश्विक समस्याओं का हल निकाल सकते हैं

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दिल्ली । वैश्विक स्तर पर आज की आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत का प्राचीन आर्थिक दर्शन संभवत: आशा की किरण के रूप में दिखाई पड़ता है। अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश, अपने अहंकार के मद में, जब अपने पड़ौसी देशों एवं हितचिंतक देशों के साथ ही अन्य अविकसित एवं विकासशील देशों को भी नहीं बक्श रहा है एवं इन देशों से अमेरिका को होने विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर टैरिफ का डंडा चला रहा है, तब भारतीय आर्थिक दर्शन की “वसुधैव कुटुंबकम”, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं “सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामया:” जैसी नीतियों की याद सहज रूप से ही आ जाती है। भारतीय आर्थिक दर्शन के अनुसार, अर्थ का अर्जन करना बुरी बात नहीं है परंतु इसका धर्म के अनुसार उपयोग नहीं करना बुरी बात है। ट्रम्प प्रशासन की वर्तमान नीतियों से स्पष्ट झलकता है कि अथाह मात्रा में इकट्ठे किए गए धन का उपयोग विश्व के अन्य देशों को डराने धमकाने के लिए किया जा रहा है। अमेरिका आज कई देशों पर दबाव बनाता हुआ दिख रहा है कि यदि किसी देश ने उसकी शर्तों के अनुरूप अमेरिका के साथ द्विपक्षीय आर्थिक समझौता नहीं किया तो उस देश से होने वाले वस्तुओं के अमेरिका में आयात पर भारी मात्रा में टैरिफ लगाया जाएगा।

यह सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान विश्व के कई देश विकास की राह पर तेज गति से आगे बढ़े हैं और आज यह सम्पन्न देशों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। इन देशों के नागरिकों को भौतिक सुख की प्राप्ति तो हुई है परंतु उनके जीवन में मानसिक सुख का पूर्णत: अभाव है। अतः इनके जीवन में संतोष का अभाव है और यह लोग कुंठा की भावना में बहते हुए कुछ इस प्रकार के निर्णय ले रहे हैं जिससे समाज के अन्य लोगों का अहित हो रहा है। पश्चिमी देशों में पूंजीवादी नीतियों के चलते कुछ लोग केवल अपने आर्थिक विकास की ओर पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए हैं, समाज के अन्य नागरिकों की स्थिति कैसी है, इस बात पर उनका ध्यान बिलकुल नहीं है। अपने को अधिक धनवान बनाने की प्रक्रिया में वे अपने ही समाज के नागरिकों का अहित करने से भी नहीं चूकते हैं। आज अमेरिका की स्थिति भी लगभग यही है। आज वह पूरे विश्व की चौधराहट प्राप्त करने के प्रयास में कुछ इस प्रकार की नीतियों का अनुपालन करता हुआ दिखाई दे रहा है जो अन्य देशों का नुक्सान कर सकती हैं। परंतु, अन्य देशों को होने वाले नुक्सान के प्रति अमेरिका आज पूर्णत: अनजान सा बना हुआ है। पूरे विश्व की आर्थिक स्थिति डावांडोल होती हुई दिखाई दे रही है। यह सब तब हो रहा है जब विश्व की बहुत बड़ी संख्या में नागरिक भूख, गरीबी एवं बेकारी से त्रस्त है। समाज का एक वर्ग अमीर से और अधिक अमीर हो रहा है तो समाज का दूसरा वर्ग गरीब से और अधिक गरीब हो रहा है। आय की असमानता की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। कुल मिलाकर अमेरिका सहित विश्व के कई विकसित देशों के नागरिक आज अपनी आर्थिक तरक्की से संतुष्ट नहीं है एवं भौतिक सुख होने के बावजूद मानसिक बीमारियों से ग्रस्त नजर आ रहे हैं।

हिंदू सनातन संस्कृति के अनुसार मनुष्य का इस धरा पर जन्म, परेशनियां झेलने के लिए नहीं हुआ है। बल्कि, इस मानव जीवन को समस्याओं रहित बनाकर, शांतिपूर्ण तरीके से जीने के लिए हुआ है। आज विभिन्न देशों के नागरिक खाने पीने की वस्तुओं, अच्छे वस्त्रों, बड़े एवं सुविधाजनक निवास स्थान, मनोविनोद के साधनों में वृद्धि, वासना की वृद्धि एवं वासना की संतुष्टि के लिए विभिन्न साधनों में वृद्धि, सुख के लिए उपभोग में वृद्धि जैसे कार्यों पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित किए हुए है। जैसे इस धरा पर जीवन जीने का लक्ष्य यही है। इच्छाओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। एक इच्छा की पूर्ति होती है तो दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। यह पूंजीवाद में निहित पश्चिमी विचार है। इस धारणा को और अधिक स्पष्ट करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय श्री गुरुजी (श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर) कहते हैं कि “पश्चिम के सुख की अवधारणा पूर्णतया प्रकृति जन्य इच्छाओं की संतुष्टि पर केंद्रित है, अतः उनके जीवन स्तर को उठाने का अर्थ भी केवल भौतिक आनंद की वस्तुओं को अधिकाधिक जुटाना है। इससे व्यक्ति अन्य विचारों एवं एषणाओं को छोड़कर केवल इसी में पूर्णतया संलग्न हो जाता है। भौतिक सुख साधनों की प्राप्ति की इच्छा धन संग्रह को जन्म देती है। अधिकाधिक धन प्राप्ति हेतु शक्ति आवश्यक हो जाती है; किंतु भौतिक सुख की अतृप्त क्षुधा व्यक्ति को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं तक ही नहीं रुकने देती। सबल राष्ट्र, राज्य शक्ति के आधार पर दूसरों के दमन व शोषण का भी प्रयास करते हैं। इसमें से संघर्ष व विनाश का जन्म होता है। एक बार यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई कि समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। सभी नैतिक बंधन विच्छिन हो जाते हैं। सामान्य मानवीय संवेदनायें सूख जाती हैं। मनुष्य और पशु में अंतर स्थापित करने वाले मूल्य एवं गुण समाप्त हो जाते हैं।” हालांकि उक्त विचार आज से लगभग 65/70 वर्ष पूर्व व्यक्त किए गए थे परंतु यह आज अमेरिका की स्थिति पर सटीक बैठते हैं। “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” के नारे के साथ सत्ता में आने वाले श्री डानल्ड ट्रम्प आज पूरे विश्व में अराजकता की सत्ता स्थापित करने में लगे हुए हैं। केवल और केवल अमेरिका के आर्थिक हितों को प्राथमिकता देना है, इससे अन्य राष्ट्रों (अविकसित एवं विकासशील देशों सहित) का कितना भी नुक्सान हों परंतु अमेरिकी उद्योगपतियों एवं व्यवसायीयों के हित सुरक्षित रहने चाहिए, उनकी आर्थिक तरक्की होते रहना चाहिए।

भारतीय आर्थिक चिंतन पश्चिम के आर्थिक चिंतन के ठीक विपरीत है। हिंदू सनातन संस्कृति के अनुसार, अर्थ एवं भोग को धर्म के अनुसार ही कार्यशील रखना चाहिए। इस संदर्भ में संयम को प्राथमिकता दी गई है। कोई भी कार्य, सीमा के अंदर किया जाय तो उचित होता है। सीमा के बाहर जाकर किया गया कार्य, समाज में अस्थिरता प्रतिपादित कर सकता है। अत्यधिक भोग, भारतीय संस्कृति में निषेध है। अर्थ के अधिक मात्रा में अर्जन पर हालांकि किसी प्रकार का निषेध नहीं है परंतु अर्थ के उपभोग पर जरूर कुछ सीमाएं निर्धारित हैं। अर्थ का उपयोग स्वयं की सुख प्राप्ति के लिए उपभोग करने के उपरांत परिवार, समाज, धर्म की रक्षा, संस्कृति के विस्तार, भविष्य की सुरक्षा के लिए बचत, आदि के लिए करना आवश्यक माना गया है। पश्चिमी सभ्यता के अनुसार तो अर्थ का उपभोग केवल एवं केवल स्वयं के लिए किया जाता है एवं येन केन प्रकारेण व्यक्ति द्वारा इसकी वृद्धि हेतु प्रयास किए जाते हैं। सुख को तो अपने अंदर महसूस किया जा सकता है। बाहरी भौतिक आवरण पहनकर सुख की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसी संदर्भ में श्री गुरुजी कहते हैं कि “सब बातों का विचार हमारे पूर्वजों ने भी किया था। समय पर वर्षा होना चाहिए, पृथ्वी पर धन धान्य की समृद्धि रहना चाहिए, समाज को ऐच्छिक सुख समृद्धि की प्राप्ति होना चाहिए, कोई भी दुखी न रहे – ऐसी प्रार्थना उन्होंने की है, परंतु उस समय भी उनको अनुभव हुआ कि मनुष्य केवल वासनाओं का पुतला नहीं है। वासनाओं की तुष्टि कुछ समय के लिए आनंद देती हैं, किंतु हमेशा के लिए वह आनंद नहीं दे सकती। मनुष्य तो ऐसा सुख चाहता है, जो कभी क्षीण न हो, उसमें कभी बाधा न आ सके, व्यत्यय न आ सके, यानी वह अबाधित, नित्य सुरक्षित और चिरकालिक सुख की कामना करता है”।

उक्त विचार को आगे बढ़ाते हुए श्री गुरुजी कहते हैं कि “अपनी भारतीय प्रणाली में जिसे अर्थशास्त्र कहते हैं, उसमें आज जैसा केवल आर्थिक पहलू मात्र नहीं था। हमारे यहां अर्थशास्त्र का ही दूसरा नाम नीतिशास्त्र था। आज हमें अपने सिद्धांतों के आधार पर मौलिक चिंतन करना चाहिए। हम दुनिया भर के विचार प्रवाहों को परखेंगे तथा अपनी स्वतंत्र मौलिक राष्ट्रीय चिंतनधारा के अनुरूप अपना रास्ता अपनाएंगे। उदाहरण के लिए महात्मा गांधी जी ने अपने जीवन काल में संपत्ति के विकेंद्रीकरण के लिए ट्रस्टीशिप का मार्ग प्रतिपादित किया। उनके इस ट्रस्टीशिप के विचार में माना गया है कि मनुष्य के उत्पादन सामर्थ्य में कोई कमी करने की जरूरत नहीं जीविका के साधनों द्वारा जितना चाहे, उसे उत्पादन करने दो, परंतु संग्रह का वह अधिकारी नहीं है। जीविका के साधनों का प्रयोग करने पर जो संपत्ति एकत्रित होती है, वह समाज की है, अपने उपभोग बढ़ाने के लिए नहीं। वह सम्पत्ति उसने समाज को दे देनी चाहिए।”

इस धरा पर प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुख वासनाओं-इच्छाओं को बढ़ाते जाने में नहीं है, सुख तो वासनाओं-इच्छाओं को कम करते जाने की मानसिकता में से मिलता है। इस दृष्टि से श्री गुरुजी इच्छाओं व आवश्यकताओं को बढ़ाते जाने वाले आर्थिक चिंतन को स्वीकार नहीं करते थे, अपितु “आवश्यकता विहीन” की दिशा में चलने वाले अर्थशास्त्र के समर्थक थे। साथ ही, समाज के समस्त क्रिया कलापों के दौरान यह भी ध्यान रखना होगा कि कुल मिलाकर सम्पूर्ण समाज के सुख में वृद्धि हो जो शोषण से मुक्ति एवं वितरण की समानता की ओर संकेत करती है। वेसे भी सुख की प्राप्ति मनुष्य अकेला नहीं कर सकता, समाज का सहयोग चाहिए। अतः सुख का आधार परस्परानुकूलता हैं, संघर्ष नहीं।

कुल मिलाकर प्राचीन भारतीय आर्थिक दर्शन में ट्रम्प प्रशासन के लिए बहुत बड़ी सीख छुपी हुई है।

भारत एवं यूके के बीच मुक्त व्यापार समझौते से बढ़ेगा विदेशी व्यापार

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दिल्ली । दिनांक 24 जुलाई 2025 को भारत एवं यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं यूके के प्रधानमंत्री श्री कीर स्टारमर की उपस्थिति में सम्पन्न हो गया। यूके के यूरोपीयन यूनियन से अलग होने के बाद यूके का भारत के साथ यह द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता यूके के इतिहास में सबसे बड़ा द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता कहा जा रहा है। इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत एवं यूके के बीच विदेशी व्यापार में अतुलनीय वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। यूके ने हाल ही में अमेरिका के साथ भी एक व्यापार समझौता सम्पन्न किया है परंतु यूके के प्रधानमंत्री भारत के साथ संपन्न किए गए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते को उससे भी बड़ी डील बता रहे हैं। अमेरिका एक ओर जहां विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध की घोषणा कर रहा है एवं अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगा रहा हैं वहीं भारत एवं यूके के बीच द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत टैरिफ की दरों को कम किया जाकर शून्य के स्तर पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अतः यह द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता विश्व के अन्य देशों के लिए एक बहुत बड़ी सीख है।

द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत सामान्यतः दो देशों के बीच होने वाले विदेशी व्यापार पर टैरिफ की दरों को कम किया जाता है अथवा शून्य के स्तर तक लाया जाता है ताकि इन दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके। इसी सिद्धांत के अंतर्गत भारत को जिन क्षेत्रों में लाभ हो सकता है, इनमें फुटवीयर उद्योग, लेदर उद्योग, टेक्स्टायल उद्योग, इंजीनीयरिंग उद्योग एवं जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग शामिल हैं। इसी प्रकार यूके को जिन क्षेत्रों में लाभ हो सकता है, इनमे विस्की, कार, चोकलेट, बिस्किट, कासमेटिक, आदि उत्पाद निर्मित करने वाले उद्योग शामिल हैं। साथ ही, यूके को उम्मीद है कि भारत एवं यूके के बीच सम्पन्न हुए इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते से 800 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश भारतीय कम्पनियों द्वारा यूके में किया जा सकता है। यह यूके के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यूके में रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे।

वर्तमान में भारत एवं यूके के बीच 56,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार प्रतिवर्ष होता है। उक्त द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत एवं यूके के बीच 34,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष का विदेशी व्यापार बढ़ सकता है। वर्ष 2030 तक भारत एवं यूके के बीच विदेशी व्यापार को 120,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष के स्तर तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके बाद वर्ष 2040 तक दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को 160,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक ले जाया जा सकेगा। भारत से यूके को निर्यात होने वाले लगभग 99 प्रतिशत पदार्थों पर यूके द्वारा टैरिफ की दर को शून्य किया जा रहा है। इसी प्रकार, भारत द्वारा भी यूके से आयात किए जाने वाले 64 प्रतिशत पदार्थों पर टैरिफ की दर को शून्य किया जा रहा है। वर्तमान में भारत में यूके से आयात होने वाले पदार्थों पर औसत टैरिफ दर 15 प्रतिशत है, इसे घटाकर 3 प्रतिशत किया जा रहा है। दोनों देशों द्वारा एक दूसरे से विभिन्न पदार्थों के होने वाले विदेशी व्यापार पर टैरिफ की दरें कम करने से दोनों देशों में एक दूसरे से आयात किया जाने वाले उत्पाद सस्ते हों जाएंगे। उत्पाद सस्ते होने से उनकी बाजार में मांग बढ़ेगी, इन उत्पादों की मांग बढ़ने से उनका उत्पादन बढ़ेगा जो अंततः रोजगार के नए अवसर निर्मित करेगा। अतः इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों को ही लाभ होने जा रहा है।

भारत के जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग से प्रतिवर्ष यूके को होने वाले निर्यात, आगामी दो वर्षों में दुगने होकर 250 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। टेक्स्टायल उद्योग के मामले में भारत के उत्पादों को वियतनाम एवं बांग्लादेश के साथ गला काट प्रतियोगिता का सामना करना पढ़ता है। परंतु, अब भारत के उत्पादों पर टैरिफ की दरें कम अथवा शून्य होने से भारत के उत्पाद यूके में प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। यूके में कुल आयात होने वाले गारमेंट्स में भारत की हिस्सेदारी केवल 6 प्रतिशत है जो अब आगामी वर्षों में दुगनी होकर 12 प्रतिशत होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत के इंजीनीयरिंग उद्योग को इस मुक्त व्यापार समझौते से अत्यधिक लाभ हो सकता है और भारत के इस क्षेत्र से यूके को निर्यात, वर्ष 2030 तक दुगने होकर 750 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंच जाने की सम्भावना है। समुद्रीय खाद्य उत्पाद के क्षेत्र में भी भारत से यूके को निर्यात जो अभी केवल 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हैं, दुगने होकर 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर सकते हैं। अभी यूके में समुद्रीय खाद्य पदार्थों के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी केवल 3 प्रतिशत की है। लेदर उद्योग से होने वाले भारत से आयात पर भी टैरिफ की दर को यूके में शून्य किया जा रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि उक्त वर्णित समस्त क्षेत्र/उद्योग भारत में श्रम आधारित उद्योग हैं। अतः इन क्षेत्रों से निर्यात बढ़ने पर भारत में इन क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होंगे। इन क्षेत्रों से होने वाले उत्पादों पर द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत यूके द्वारा टैरिफ की दर को शून्य करने पश्चात यूके में यह पदार्थ सस्ते होंगे इससे यूके में इन पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ेगी और भारतीय कम्पनियों के यूके को इन पदार्थों के निर्यात बढ़ेंगे। इससे भारतीय कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करनी होगी, जिससे भारत में रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे।

भारत में यूके से आयात किए जाने वाले पदार्थ, जिन पर भारत द्वारा आयात कर में कमी की जाने वाली हैं, उनमें शामिल हैं – स्कॉच विस्की जिस पर टैरिफ की दरों को 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया जा रहा है। यूके में निर्मित कारों के आयात पर अभी भारत द्वारा 110 प्रतिशत का टैरिफ लगाया जा रहा है, इसे घटाकर आगे आने वाले 5 वर्षों में 10 प्रतिशत कर दिया जाएगा। इसी प्रकार ब्रिटेन में निर्मित चोकलेट, बिस्किट एवं कासमेटिक उत्पादों पर भी आयात करों में कमी होने से यह उत्पाद भारत में सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगे। भारत में कृषकों के हितों का ध्यान रखते हुए डेयरी, तेल एवं फलों आदि जैसे कृषि पदार्थों को इस मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है।

भारत से यूके को अभी 1450 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात प्रतिवर्ष होता है, यह यूके के कुल आयात का केवल 1.8 प्रतिशत है। इस प्रकार, अभी भारत से यूके को निर्यात बहुत कम मात्रा में होता है। वर्तमान में भारत द्वारा सबसे अधिक मात्रा में निर्यात, 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का, पेट्रोलीयम उत्पादों का किया जा रहा है। फार्मा सेक्टर से अभी यूके को केवल 85 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया जा रहा है, जो यूके के कुल आयात का केवल 2.8 प्रतिशत है। इस प्रकार भारत को उक्त विभिन्न क्षेत्रों में यूके के रूप में एक बहुत बड़ा बाजार मिल रहा है। केमिकल, आयरन एवं स्टील, फूटवेयर, रबर, आदि भी ऐसे क्षेत्र/उद्योग हैं जिनसे भारत से यूके को बहुत कम मात्रा में निर्यात किया जाता है। भारत के लिए यह समस्त उद्योग अहम हैं क्योंकि इन क्षेत्रों/उद्योगों में रोजगार के अवसर निर्मित करने की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। यूके के कुल आयात में भारत का मार्केट शेयर बहुत कम है। भारतीय उद्योगों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना होगा और भारत में निर्मित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा ताकि इनके निर्यात को बढ़ाया जा सके।

अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगातार विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध की घोषणा के बीच विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, भारत एवं यूके ने आपस में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते को सम्पन्न कर पूरे विश्व को राह दिखाई है कि किस प्रकार एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखकर विदेश व्यापार किया जा सकता है।

बिहार में बढ़ते अपराध और राजनीतिक समीकरण

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पटना। बिहार में हाल के महीनों में अपराध की घटनाओं, खासकर हत्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी नेता तेजस्वी यादव द्वारा बार-बार यह दावा किया जा रहा है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपराध नियंत्रण में पूरी तरह विफल रही है। इसके साथ ही, कुछ लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि अधिकांश अपराधी ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण से प्रेरित होकर बेखौफ हो रहे हैं, और उन्हें यह संदेश मिल रहा है कि तेजस्वी यादव के सत्ता में आने की संभावना के कारण अपराध करने का ‘लाइसेंस’ मिल गया है। दूसरी ओर, नीतीश कुमार की खराब सेहत और कथित कमजोर नेतृत्व को भी इस अराजकता का कारण बताया जा रहा है। इस जटिल स्थिति में, बिहार की जनता सबसे अधिक प्रभावित हो रही है, जो भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर है।

अपराध का बढ़ता ग्राफ और आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2015 से 2022 तक हत्या के मामले उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहे हैं। 2025 के पहले छह महीनों में ही 1,379 हत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें व्यक्तिगत रंजिश (37.8%) और संपत्ति विवाद (10.2%) प्रमुख कारण रहे। हाल की घटनाएं, जैसे पटना में एक निजी अस्पताल में कुख्यात अपराधी की हत्या, सीतामढ़ी में व्यवसायी की गोलीबारी, और समस्तीपुर में सरपंच की हत्या, यह दर्शाती हैं कि अपराधी बेखौफ होकर खुले आम वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। तेजस्वी यादव ने दावा किया है कि केवल सात दिनों में 97 हत्याएं हुईं, जो कानून-व्यवस्था की बदहाली को उजागर करता है।

माई समीकरण और अपराध का कथित संबंध

‘माई’ समीकरण, यानी मुस्लिम और यादव मतदाताओं का गठजोड़, लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की ताकत रहा है। कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि इस समीकरण से जुड़े अपराधी बिहार में बढ़ते अपराधों के लिए जिम्मेदार हैं। यह धारणा इसलिए भी बल पकड़ रही है क्योंकि तेजस्वी यादव की ‘माई-बहिन मान योजना’ जैसे वादों ने उनके समर्थन आधार को और मजबूत करने की कोशिश की है। हालांकि, यह आरोप तथ्यपरक कम और राजनीतिक ज्यादा लगता है। अपराध के कारणों में व्यक्तिगत रंजिश और संपत्ति विवाद प्रमुख हैं, न कि किसी विशेष समुदाय का एकमात्र प्रभाव। फिर भी, यह धारणा कि तेजस्वी के संभावित सत्ता में आने से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं, बिहार की जनता में भय और अविश्वास पैदा कर रही है। यह स्थिति 1990 के दशक के ‘जंगलराज’ की यादें ताजा करती है, जब लालू-राबड़ी शासन में अपराध चरम पर था।

नीतीश कुमार की जिम्मेदारी और कमजोर छवि

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपराध नियंत्रण में नाकामी के गंभीर आरोप लग रहे हैं। उनकी खराब सेहत और कथित ‘सुषुप्त अवस्था’ को लेकर विपक्ष और सहयोगी दल, जैसे चिराग पासवान, भी सवाल उठा रहे हैं। नीतीश की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर चर्चाएं उनकी नेतृत्व क्षमता पर संदेह पैदा कर रही हैं। तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है कि सरकार ‘रिमोट कंट्रोल’ से चल रही है और भ्रष्ट अधिकारी व बीजेपी के करीबी नेता बिहार को लूट रहे हैं। नीतीश सरकार का दावा है कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है, लेकिन बार-बार होने वाली आपराधिक घटनाएं इस दावे को कमजोर करती हैं।

जनता की पीड़ा और राजनीतिक ध्रुवीकरण

बिहार की जनता इस बढ़ते अपराध के माहौल में सबसे अधिक प्रभावित है। शिक्षक, डॉक्टर, व्यवसायी, और आम नागरिकों की हत्याएं और गैंगरेप जैसी घटनाएं जनता में भय पैदा कर रही हैं। यह स्थिति न केवल कानून-व्यवस्था का सवाल है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा दे रही है। अपराध की घटनाएं किसी खास समुदाय को निशाना बनाती दिखती हैं, तो यह वोटबैंक की राजनीति को और जटिल बनाती है। तेजस्वी यादव को लगता है कि नीतीश सरकार की कमजोरियां उन्हें सत्ता दिला सकती हैं, लेकिन ‘जंगलराज’ की छवि उनके लिए भी चुनौती बनी हुई है।

बिहार में बढ़ते अपराध और ‘माई’ समीकरण को जोड़ने का प्रयास राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह समस्या की जड़ को नहीं दर्शाता। अपराध के पीछे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण ज्यादा प्रभावी हैं। नीतीश कुमार की सरकार को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर सख्त कदम उठाने होंगे, वहीं तेजस्वी यादव को भी ‘जंगलराज’ की छवि से मुक्त होने के लिए ठोस नीतियां पेश करनी होंगी। बिहार की जनता को इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे एक सुरक्षित और समृद्ध राज्य की आवश्यकता है।

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