दिल्ली में दुर्गा पूजा विसर्जन की समस्या का समाधान

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नई दिल्ली: दिल्ली के बंगाली समाज ने दुर्गा पूजा विसर्जन से संबंधित समस्याओं को लेकर माननीय कैबिनेट मंत्री (PWD, विधायी मामले और जल) साहिब सिंह वर्मा से मुलाकात की। भारतीय जनता पार्टी (बंगाली प्रकोष्ठ, दिल्ली प्रदेश) के सहसंयोजक अरुण मुखर्जी के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल ने मंत्री जी को विसर्जन के दौरान आने वाली परेशानियों से अवगत कराया।

बंगाली समाज ने बताया कि विसर्जन की प्रक्रिया में लंबे समय से व्यवधान उत्पन्न हो रहे हैं, जो 27 साल पुरानी मांग का हिस्सा है। इस पर त्वरित कार्रवाई करते हुए मंत्री श्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने आश्वासन दिया कि आईटीओ के पास स्थित घाट पर माता दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन सुनिश्चित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार इस दिशा में सभी आवश्यक कदम उठाएगी।

इस मुलाकात में बंगाली समाज ने इस पहल के लिए मंत्री जी का हार्दिक आभार व्यक्त किया। अरुण मुखर्जी ने कहा, “यह बंगाली समाज के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। हम माननीय मंत्री प्रवेश वर्मा के प्रति आभारी हैं, जिनके प्रयासों से यह मांग पूरी हुई।” इस आश्वासन से दिल्ली के बंगाली समुदाय में उत्साह का माहौल है।

बीजेपी की नई रणनीति: पश्चिम बंगाल में सांस्कृतिक संवेदनशीलता और सुशासन का मिश्रण

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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के लिए अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया है, जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने अपने पॉडकास्ट में उल्लेख किया। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुर्गापुर रैली में ममता बनर्जी पर सीधा हमला करने के बजाय बंगाल की सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं को प्राथमिकता दी। ‘जय श्री राम’ के नारे की जगह ‘जय मां काली’ और ‘जय मां दुर्गा’ के उद्घोष ने बीजेपी की नई रणनीति को रेखांकित किया, जो बंगाली अस्मिता के साथ जुड़ने का प्रयास है।

*बंगाल की सांस्कृतिक पहचान, कुशासन और नीतियों पर ध्यान*

यह बदलाव बीजेपी की उस समझ को दर्शाता है कि बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का स्थानीय संदर्भ में उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने अतीत में बीजेपी पर ‘बाहरी’ होने और उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद थोपने का आरोप लगाया था। इस बार, ममता का नाम न लेकर और बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को उभारकर, बीजेपी ने टीएमसी के कुशासन और नीतियों पर ध्यान केंद्रित किया। यह रणनीति व्यक्तिगत हमलों से हटकर सुशासन और विकास के वादों पर आधारित है।

*बंगालियों के गौरव को किया संबोधित*

मोदी ने बंगाली भाषा में भाषण शुरू कर और स्थानीय मनीषियों का उल्लेख कर बंगालियों के गौरव को संबोधित किया। यह कदम बीजेपी को बंगाल की जनता के करीब लाने का प्रयास है, विशेषकर ग्रामीण और हिंदू मतदाताओं को, जो मां काली और दुर्गा की पूजा में गहरी आस्था रखते हैं। यह रणनीति टीएमसी के ‘बंगाली अस्मिता’ के दावे को चुनौती देती है और बीजेपी को स्थानीय स्तर पर स्वीकार्य बनाने की कोशिश करती है।

20 जुलाई 1965 सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का निधन : स्‍वतंत्रता के बाद भी वर्षों संघर्ष

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भोपाल। भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे प्रसंग हैं जिन्हे पढ़कर आँखे झुकती हैं । जिन लोंगो ने हमें स्वतंत्र बनाने के लिये अपना जीवन न्योछावर किया, अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं सहीं उनके साथ स्वतंत्रता के बाद भी कैसा व्यवहार हुआ । इनमें से एक हैं सुप्रसिद्ध क्रान्ति कारी बटुकेश्वर दत्त । जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भी आजीविका के लिये भीषण संघर्ष करना पड़ा । परिवार चलाने के लिये कभी गाइड बने तो कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट बने । हद तो तब हुई जब पटना कलेक्टर ने उनसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाण पत्र माँगा ।

सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर 1910 को बंगाल के वर्धमान जिले में हुआ । बचपन से उनमें राष्ट्र और संस्कृति के लिये प्रेम था यह भाव उनको पारिवारिक विरासत में मिला । उन के कई नाम थे । बटुकेश्वर दत्त के अतिरिक्त मोहन और बट्टू उनके बचपन का नाम थे । पिता बिहारी दत्त समाज सेवा से जुड़े थे और माता कामिनी देवी अपनी परंपराओं से जुड़ीं घरेलू महिला थीं । जब बटुकेश्वर बहुत छोटे थे तब परिवार कानपुर आ गया था । इसीलिए इनका बचपन कानपुर में बीता । वे जब हाई स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे तभी इनका संपर्क क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़े सुरेंद्रनाथ पांडे और विजय कुमार सिन्हा से हुआ । और वे क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये । एक तो परिवार की पृष्ठभूमि भारतीय समाज और परंपराओ से जुड़ी थी दूसरे बचपन की एक घटना ने उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध कर दिया था ।
यह घटना कानपुर के मॉल रोड की थी । इस रोड पर अंग्रेज सिपाही ने एक मासूम बच्चे को इसलिए बुरी तरह पीटा कि वह उस सड़क पर चला गया था जहां भारतीयों को चलने की मनाही थी । इस घटना ने बटुकेश्वर दत्त को बुरी तरह झकझोर दिया और जब क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़ने का अवसर आया तो उत्साह से सक्रिय हो गये ।

भगत सिंह से संपर्क और मित्रता

उन दिनों कानपुर क्रान्ति का एक प्रमुख केन्द्र था और समाचार पत्र “प्रताप” इन क्राँतिकारियों का संपर्क केन्द्र था । समय के साथ बटुकेश्वर दत्त का संपर्क प्रताप के संपादक सुरेशचंद्र भट्टाचार्य से बना और उनके माध्यम से वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और यहीं उनकी मित्रता सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी भगत सिंह से हुई । और 1924 में चंद्रशेखर आजाद से मिले । काकोरी कांड के बाद हुई गिरफ्तारियों के चलते क्राँतिकारी कानपुर से यहाँ वहाँ गये । बटुकेश्वर दत्त पहले बिहार गए और फिर कलकत्ता गये । 1927 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन रखा गया । एसोसिएशन ने बटुकेश्वर दत्त को बम बनाने का प्रशिक्षण दिया । और बटुकेश्वर दत्त बहुत उत्कर्ष्ट बन बनाना सीख गये । उस दौर के क्राँतिकारी आँदोलन में अधिकांश बम या तो बटुकेश्वर दत्त के बनाये होते थे अथवा उनके द्वारा प्रशिक्षित युवाओं द्वारा । 1929 में हुये असेम्बली बम कांड में वे सरदार भगतसिंह के साथ बंदी बनाये गये । भगतसिंह को फाँसी की सजा हुई और बटुकेश्वर को उम्रकैद । उम्रकैद की सजा केलिये उन्हें पहले कालापानी भेजा गया । फिर हजारीबाग, दिल्ली और बांकीपुर जेल । जेल में उन्हें क्रूरतम प्रताड़ना मिली जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा । इस कारण 1938 में रिहा कर दिये गये । इस शर्त पर कि वो किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेंगे । बटुकेश्वर दत्त ने यह लिखकर तो दिया पर जेल से रिहा होकर गांधीजी के अहिसंक आँदोलन से जुड़ गये और 1942 बंदी बनाये गये । आँदोलन समाप्त होने के बाद सभी आँदोलन कारी रिहा हुये पर बटुकेश्वर दत्त को रिहाई नहीं मिली वे 1945 में रिहा हुये । स्वतंत्रता के बाद उन्होंने विवाह किया और पटना आ गये । यहाँ उन्होंने आजीविका के लिये कठोर संघर्ष किया । कभी गाइड बने और कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट। यही नहीं कलेक्टर ने उनसे स्वाधीनता संग्राम सेनानी होने का प्रमाणपत्र भी माँगा । 1958 में पहली बार उन्हें सम्मान मिला और वे विधान परिषद के सदस्य मनोनीत किये पर जल्दी ही बीमारी ने उन्हे जकड़ लिया । इलाज के लिये बिहार से दिल्ली लाया गया । पर बीमारी ने पीछा न छोड़ा और 20 जुलाई 1965 को उन्होंने अपने जीवन की सांस ली । शत शत नमन्

ऑनलाइन भुगतान के मामले में भारत के यूपीआई ने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ा

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हाल ही के समय में भारत, विभिन्न क्षेत्रों में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नित नए रिकार्ड बना रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो अब भारत पूरे विश्व का नेतृत्व करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत ने बैंकिंग व्यवहारों के मामले में तो जैसे क्रांति ही ला दी है। अभी हाल ही में आर्थिक क्षेत्र में बैंकिंग व्यवहारों के मामले में भारत के यूनफाईड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने अमेरिका के 67 वर्ष पुराने वीजा एवं मास्टर कार्ड के पेमेंट सिस्टम को प्रतिदिन होने वाले आर्थिक व्यवहारों की संख्या के मामले में वैश्विक स्तर पर पीछे छोड़ दिया है। वैश्विक स्तर पर अब भारत विश्व का सबसे बड़ा रियल टाइम पेमेंट नेटवर्क बन गया है।

भारत में वर्ष 2016 के पहिले ऑनलाइन पेमेंट का मतलब होता था केवल वीजा और मास्टर कार्ड। वीजा और मास्टर कार्ड को चलाने वाली अमेरिका की ये दोनों कंपनिया पूरी दुनिया में ऑनलाइन पेमेंट का एकाधिकार रखती थीं। वीजा की शुरुआत, अमेरिका में वर्ष 1958 में हुई थी और धीमे धीमे यह कंपनी 200 से अधिक देशों में फैल गई और ऑनलाइन भुगतान के मामले में पूरे विश्व पर अपना एकाधिकार जमा लिया। वैश्विक स्तर पर इस कम्पनी को चुनौती देने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 2016 में अपना पेमेंट सिस्टम, यूपीआई के रूप में, विकसित किया और वर्ष 2025 आते आते भारत का यूपीआई सिस्टम आज पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ गया है। यूपीआई पेमेंट सिस्टम के माध्यम से ओनलाइन बैकिंग व्यवहार चुटकी बजाते ही हो जाते है। आज सब्जी वाले, चाय वाले, सहायता प्राप्त करने वाले नागरिक एवं छोटी छोटी राशि के आर्थिक व्यवहार करने वाले नागरिकों के लिए यूपीआई सिस्टम ने ऑनलाइन बैंकिंग व्यवहार करने को बहुत आसान बना दिया है। आज भारत के यूपीआई सिस्टम के माध्यम से प्रतिदिन 65 करोड़ से अधिक व्यवहार (1800 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रति माह) हो रहे हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वीजा कार्ड से माध्यम से प्रतिदिन 63.9 करोड़ व्यवहार हो रहे हैं। इस प्रकार, भारत के यूपीआई ने दैनिक व्यवहारों के मामले में 67 वर्ष पुराने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ दिया है। भारत में केंद्र सरकार की यह सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है। भारत अब इस मामले में पूरी दुनिया का लीडर बन गया है। भारत ने यह उपलब्धि केवल 9 वर्षों में ही प्राप्त की है। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह नई तकनीकी का चमत्कार है एवं यह सिस्टम अत्यधिक प्रभावशाली है। भारत का यूपीआई सिस्टम भारत को वैश्विक बैंकिंग नक्शे पर एक बहुत बड़ी शक्ति बना सकता है।

भारत में यूपीआई की सफलता की नींव दरअसल केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई कई आर्थिक योजनाओं के माध्यम से पड़ी है। समस्त नागरिकों के आधार कार्ड बनाने के पश्चात जब आधार कार्ड को नागरिकों के बैंक खातों से जोड़ा गया और केंद्र सरकार द्वारा देश के गरीब वर्ग की सहायता के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत सहायता राशि को सीधे ही नागरिकों के बैंक खातों में जमा किया जाने लगा तब एक सुदृद्ध पेमेंट सिस्टम की आवश्यकता महसूस हुई और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई का जन्म वर्ष 2016 में हुआ। यूपीआई को आधार कार्ड एवं प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत बैंकों में खोले गए खातों से जोड़ दिया गया। नागरिकों के मोबाइल क्रमांक और आधार कार्ड को बैंक खातों से जोड़कर यूपीआई सिस्टम के माध्यम से आर्थिक एवं लेन-देन व्यवहारों को आसान बना दिया गया। भारत में आज लगभग 80 प्रतिशत युवा एवं बुजुर्ग जनसंख्या का विभिन्न बैकों के खाता खोला जा चुका है। यूपीआई के माध्यम से केवल कुछ ही मिनटों में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में राशि का अंतरण किया जा सकता है। ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई के आने के बाद तो अब भारत के नागरिक एटीएम कार्ड, डेबिट कार्ड एवं क्रेडिट कार्ड को भी भूलने लगे हैं।

भारत से बाहर अन्य देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक भी अपनी बचत को यूपीआई के माध्यम से अपने परिवार के सदस्यों के बैंक खातों में ऑनलाइन राशि का अंतरण चंद मिनटों में कर सकते हैं। पूर्व में, बैंकिंग चेनल के माध्यम से एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में राशि का अंतरण करने में 2 से 3 दिन का समय लग जाता था तथा विदेशी बैकों द्वारा इस प्रकार के अंतरण राशि पर खर्च भी वसूला जाता है। अब यूपीआई के माध्यम से कुछ ही मिनटों में राशि एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में अंतरित हो जाती है। इससे भारतीय रुपए का अंतरराष्ट्रीयकरण भी हो रहा है। विश्व के अन्य देशों में पढ़ाई के लिए गए छात्रों को अपने खर्च चलाने एवं विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में फीस की राशि यूपीआई सिस्टम से जमा कराने में बहुत आसानी होगी। जिस भी देश में भारतीय मूल में नागरिकों की संख्या अधिक है उन देशों में भारत के यूपीआई सिस्टम को लागू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। आज 13,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि इन देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा प्रतिवर्ष भारत में भेजी जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के यूपीआई सिस्टम की स्वीकार्यता बढ़ने से अमेरिकी डॉलर पर भारत की निर्भरता भी कम होगी, इससे भारतीय रुपए की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी और डीडोलराईजेशन की प्रक्रिया तेज होगी।

भारत ने यूपीआई के प्रतिदिन होने वाले व्यवहारों की संख्या के मामले में आज अमेरिका, चीन एवं पूरे यूरोप को पीछे छोड़ दिया है। वर्तमान में भारत के यूपीआई सिस्टम का विश्व के 7 देशों यथा यूनाइटेड अरब अमीरात, फ्रान्स, ओमान, मारीशस, श्रीलंका, भूटान एवं नेपाल में उपयोग हो रहा है। इन देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक यूपीआई के माध्यम से सीधे ही भारत के साथ आर्थिक व्यवहार कर रहे हैं। दक्षिणपूर्वीय देशों यथा मलेशिया, थाइलैंड, फिलिपींस, वियतमान, सिंगापुर, कम्बोडिया, दक्षिण कोरिया, जापान, ताईवान एवं हांगकांग आदि भी भारत के यूपीआई सिस्टम के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीयन देशों ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू करने की इच्छा जताई है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस एवं नामीबिया यात्रा के दौरान इन दोनों देशों ने भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में शुरू करने के लिए भारत से निवेदन किया है। पूरे विश्व में अब कई देशों का विश्वास भारत के यूपीआई सिस्टम पर बढ़ रहा है और यदि ये देश भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू कर देते हैं तो इससे भारत में विदेशी निवेश की राशि में भी तेज गति से वृद्धि होने की सम्भावना बढ़ जाएगी।

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