जेन जेड (Gen Z) सोशल मीडिया और रचनात्मकता

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दिल्ली। जेन जेड, या जनरेशन Z, वह पीढ़ी है जो 1997 से 2012 के बीच जन्मी है। यह दुनिया की सबसे बड़ी पीढ़ी है, जिसमें वैश्विक स्तर पर लगभग 2 अरब लोग शामिल हैं। भारत में जेन जेड की संख्या करीब 37.7 करोड़ है, जो देश की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा है। यह पीढ़ी पूरी तरह डिजिटल नेटिव है—इन्होंने बचपन से ही स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ बड़ा हुआ है। जेन जेड की विशेषताएं हैं: प्रौद्योगिकी पर निर्भरता, सामाजिक न्याय के प्रति जागरूकता, पर्यावरण चिंता, और रचनात्मक अभिव्यक्ति की मजबूत इच्छा। सोशल मीडिया इनके लिए सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान निर्माण, शिक्षा, समाचार स्रोत और रचनात्मकता का प्रमुख प्लेटफॉर्म है।

हालांकि, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग रचनात्मकता पर दोहरा प्रभाव डालता है—एक ओर यह प्रेरणा और टूल प्रदान करता है, दूसरी ओर स्क्रॉलिंग की आदत से मूल विचारों की कमी और तुलना की भावना बढ़ सकती है।

सोशल मीडिया पर समय व्यतीत: औसत आंकड़े

जेन जेड सोशल मीडिया पर सबसे अधिक समय बिताने वाली पीढ़ी है। वैश्विक स्तर पर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जेन जेड औसतन 3 से 4.5 घंटे प्रतिदिन सोशल मीडिया पर बिताते हैं। कुछ रिपोर्ट्स में यह 3+ घंटे से अधिक है, जहां 50% से ज्यादा जेन जेड यूजर्स 3 घंटे या उससे अधिक समय व्यतीत करते हैं। अमेरिका में जेन जेड युवतियां औसतन 2 घंटे 59 मिनट बिताती हैं, जबकि कुल मिलाकर 81% रोजाना उपयोग करते हैं।

भारत में स्थिति और गंभीर है। औसत भारतीय 2 घंटे 30 मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है, लेकिन जेन जेड (13-24 वर्ष) 3 घंटे या अधिक समय व्यतीत करता है—यह वैश्विक औसत से लगभग 50% अधिक है। भारत में 491 मिलियन सोशल मीडिया यूजर्स हैं (2025 की शुरुआत में), और जेन जेड इसमें 40% हिस्सेदारी रखता है। यह समय न केवल स्क्रॉलिंग में, बल्कि कंटेंट क्रिएशन, लाइव स्ट्रीमिंग और इंटरैक्शन में भी जाता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का वर्गीकरण और उपयोग

सोशल मीडिया को मुख्य रूप से निम्न वर्गों में बांटा जा सकता है:

शॉर्ट-फॉर्म वीडियो प्लेटफॉर्म्स — TikTok, Instagram Reels, YouTube Shorts: तेज, आकर्षक और रचनात्मकता के लिए आदर्श।
लॉन्ग-फॉर्म वीडियो/एजुकेशनल — YouTube: गहन कंटेंट, ट्यूटोरियल्स।
इमेज/लाइफस्टाइल शेयरिंग — Instagram: विजुअल स्टोरीटेलिंग।
माइक्रोब्लॉगिंग/रियल-टाइम डिस्कशन — X (पूर्व Twitter): विचार-विमर्श, न्यूज।
ट्रेडिशनल/कनेक्शन — Facebook: ग्रुप्स, परिवार से जुड़ाव।
अन्य — WhatsApp (मैसेजिंग), Snapchat (प्राइवेट), Telegram।

जेन जेड के प्रमुख प्लेटफॉर्म्स:

YouTube — 84-92% जेन जेड उपयोग करते हैं, औसत 76 मिनट प्रतिदिन। लॉन्ग-फॉर्म और एजुकेशनल कंटेंट के लिए पसंदीदा।
Instagram — 71-89% उपयोग, 45-60 मिनट प्रतिदिन। रील्स और स्टोरीज से रचनात्मक अभिव्यक्ति।
TikTok — 73-83% दैनिक उपयोगकर्ता, 89 मिनट प्रतिदिन। प्रोडक्ट डिस्कवरी (77%) और न्यूज (63%) के लिए टॉप।
X (Twitter) — कम उपयोग (22-44%), रियल-टाइम अपडेट्स के लिए।
Facebook — 56-68%, लेकिन कम सक्रिय; मुख्यतः ग्रुप्स और परिवार के लिए।

भारत में YouTube, Instagram और लोकल प्लेटफॉर्म्स (जैसे Moj, ShareChat) प्रमुख हैं, जहां 83% जेन जेड खुद को क्रिएटर मानते हैं।

महानगर, टियर-2 और टियर-3 शहरों में उपयोग के अंतर

भारत में जेन जेड के सोशल मीडिया उपयोग में स्पष्ट ग्रामीण-शहरी विभाजन है। महानगरों (मेट्रो/टियर-1) में जेन जेड Instagram, TikTok और Netflix जैसी ग्लोबल प्लेटफॉर्म्स पर अधिक सक्रिय हैं, जहां इन्फ्लुएंसर्स और क्रिएटर पेजेस से प्रेरणा लेते हैं। यहां 72% क्रिएटर पेजेस को सर्च के रूप में उपयोग करते हैं, और फैशन/लाइफस्टाइल पर फोकस है।

टियर-2 और टियर-3 शहरों (जैसे इंदौर, जयपुर, पटना) में उपयोग अलग है। यहां 83% जेन जेड क्रिएटर हैं, लेकिन अधिकांश छोटे शहरों से। वे YouTube Shorts, ShareChat, Moj जैसी लोकल-लैंग्वेज प्लेटफॉर्म्स पर फोकस करते हैं—क्षेत्रीय भाषाओं में कंटेंट बनाते हैं। परिवार और दोस्तों की सिफारिशें खरीदारी में प्रमुख (67%) हैं, जबकि मेट्रो में इन्फ्लुएंसर्स। छोटे शहरों में प्रिंट और टीवी भी सूचना स्रोत हैं (71% सोशल मीडिया से न्यूज), लेकिन डिजिटल क्रिएशन तेजी से बढ़ रहा है। टियर-2+ में 60-70% शॉर्ट-फॉर्म वीडियो यूजर्स हैं, और महिलाएं क्रिएशन में आगे हैं।

यह अंतर दर्शाता है कि डिजिटल पहुंच बढ़ने से भूगोल सिकुड़ रहा है, लेकिन सांस्कृतिक जड़ें बनी हुई हैं।

रचनात्मकता पर प्रभाव: सकारात्मक और नकारात्मक

सोशल मीडिया जेन जेड की रचनात्मकता का प्रमुख उत्प्रेरक है। प्लेटफॉर्म्स जैसे TikTok, Instagram Reels और YouTube टूल्स प्रदान करते हैं—एडिटिंग, फिल्टर्स, ट्रेंड्स—जिससे कोई भी क्रिएट कर सकता है। भारत में 83% जेन जेड खुद को क्रिएटर मानते हैं, खासकर छोटे शहरों से, जहां लोकल स्टोरीज ग्लोबल पहुंच पाती हैं। यह ओपन-माइंडेडनेस बढ़ाता है, नए आइडियाज को अपनाने में मदद करता है, और सामाजिक/पर्यावरणीय मुद्दों पर क्रिएटिव अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करता है।

लेकिन नकारात्मक पक्ष भी है। अत्यधिक उपयोग से स्क्रॉलिंग एडिक्शन, कम्पैरिजन और मेंटल हेल्थ इश्यूज बढ़ते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया कि सोशल मीडिया से सेल्फ-इमेज प्रभावित होती है, और मूल रचनात्मकता कम हो सकती है क्योंकि ट्रेंड्स फॉलो करने की आदत पड़ती है। जेन जेड में 55% ने डिटॉक्स लिया है, और 63% ब्रेक की योजना बनाते हैं।

विमर्श के लिए खुला क्षेत्र

जेन जेड सोशल मीडिया को रचनात्मकता का विस्तार मानते हैं, लेकिन संतुलन जरूरी है। क्या सोशल मीडिया रचनात्मकता को बढ़ावा दे रहा है या स्टैंडर्डाइज कर रहा है? क्या छोटे शहरों का क्रिएटिव उभार भारत की नई पहचान बनेगा? क्या प्लेटफॉर्म्स रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार हैं?

ये सवाल वैचारिक समूहों के लिए विचारणीय हैं। सोशल मीडिया न केवल समय की मशीन है, बल्कि रचनात्मकता का आइना भी—जिसे समझना आज की पीढ़ी को सशक्त बनाएगा।

क्यों हर धर्मग्रंथ भविष्य से डराता है?

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दिल्ली : हाल ही में एक ज्ञानी बाबाजी से टकराहट हुई। वो बोले “कलियुग आ चुका है, अमेरिका (पश्चिम) से शुरू हुआ है, फिर मध्य एशिया, अंत में भारतीय क्षेत्र पर सौ साल में छा जाएगा। तब तक आगे बढ़ना है। नीचे गिरने से पूर्व तरक्की की बुलंदियां छूनी होती हैं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पश्चिमी समाज को गर्त में पहुंचाने के लिए ही अवतरित हुए हैं।” उनकी बातें सुनकर कुछ लोगों का सोया हास्य रस जाग्रत हुआ!!
बहरहाल, बॉलीवुड फिल्म के एक गाने की ये पंक्ति श्री “राम कह गए सिया से” … आज कोई भविष्यवाणी नहीं, बल्कि रोज़ का अनुभव बन चुकी है। अक्सर मन में सवाल उठता है, क्या सचमुच इंसान और इंसानियत का सफ़र अंधेरे गड्ढे की तरफ़ ही तय है? क्यों दुनिया के लगभग सभी धर्मग्रंथ—रामचरितमानस से लेकर बाइबिल, क़ुरआन, बौद्ध, जैन और सिख परंपराएँ, भविष्य को लेकर इतने सख़्त, इतने बेचैन, इतने निराश दिखाई देते हैं?
क्या ये ग्रंथ “अंत” की घोषणा करते हैं या हमें थकाऊ पतन से रूबरू कराते हैं। जब सभ्यताएँ बूढ़ी होती हैं, तो पहले उनकी आत्मा थकती है। इमारतें तब भी ऊँची होती हैं। तकनीक तब भी तेज़ होती है। बाज़ार तब भी चमकता है। लेकिन भीतर का इंसान धीरे-धीरे खोखला होने लगता है।
हज़ारों साल पहले अलग-अलग सभ्यताओं ने, अलग-अलग भाषाओं में, एक ही बात कही, अगर तरक़्क़ी नैतिकता से आगे निकल गई, तो सवाल ये नहीं कि क्या बचेगा, सवाल ये है कि कैसे बचेगा?
तुलसी का कलियुग:
गोस्वामी तुलसीदास का कलियुग कोई अचानक आई आपदा नहीं है। यह मूल्यों का उलटफेर है। यह वह दौर है जहाँ चोरी को चालाकी कहा जाता है। अहंकार को आत्मविश्वास। झूठ को “स्मार्टनेस”। और चोट पहुँचाने वाले को “सफल इंसान”।
तुलसी लिखते हैं, धर्म के रखवाले ही धर्म से सौदेबाज़ी करने लगते हैं। संतों के घर सज जाते हैं, लेकिन दिल सूने रह जाते हैं। गुरु बाज़ार में बिकने लगते हैं। परंपरा दिखावा बन जाती है। माँ-बाप, गुरु, बुज़ुर्ग, सब बोझ लगने लगते हैं। रिश्तों में अपनापन घटता है, हिसाब-किताब बढ़ जाता है।
यह पतन नहीं, यह सामान्यीकरण है। और यही सबसे ख़तरनाक होता है।
भागवत पुराण: धीमी सड़न की कहानी
भागवत पुराण कलियुग को किसी एक हादसे की तरह नहीं देखता। वह उसे एक धीमी सड़न कहता है। सच थोड़ा-थोड़ा कम होता जाता है। दया घटती जाती है। याददाश्त कमजोर पड़ती है। ज़िंदगी लंबी लगती है, लेकिन गहराई खो देती है। दौलत इंसान की पहचान बन जाती है। चरित्र पीछे छूट जाता है। नेता ऊँचे पदों पर होते हैं, लेकिन नैतिकता नीचे गिर जाती है। धर्म चलता रहता है, पर आत्मा शामिल नहीं होती।
भागवत की सबसे बड़ी चेतावनी यही है, कलियुग शोर से नहीं जीतता। वह तब जीतता है जब ग़लत चीज़ें “नॉर्मल” बन जाती हैं।
फिर भी, भागवत अंत की बात नहीं करता। वह एक मोड़ की बात करता है, कल्कि का आगमन। विनाश के लिए नहीं, शुद्धि के लिए।
बाइबिल: पूरी दुनिया की बेचैनी
बाइबिल का “आख़िरी वक़्त” किसी एक देश की कहानी नहीं है। यह पूरी दुनिया की सामूहिक बेचैनी है। जंगें।बीमारियाँ। भूख। डर। झूठे पैग़ंबर। झूठे वादे। और सच बोलने वालों की बढ़ती तन्हाई।
यहाँ भी वही पैटर्न है, ताक़त बढ़ती है, विवेक घटता है।
बाइबिल कहती है, अंधेरा इसलिए नहीं आता कि सब खत्म हो जाए, बल्कि इसलिए आता है ताकि सब साफ़ हो सके। तबाही बदले के लिए नहीं, शुद्धि के लिए।
इस्लाम, बुद्ध, जैन और सिख परंपरा: अलग ज़बान, वही चेतावनी। नालायक लोग हुक्म चलाएँगे। इल्म बहुत होगा, लेकिन समझ कम।
महात्मा बुद्ध कहते हैं, एक ऐसा समय आएगा जब उपदेश बहुत होंगे, पर करुणा ग़ायब हो जाएगी। ध्यान होगा, पर जागरूकता नहीं। फिर मैत्रेय आएगा, एक नई शुरुआत के लिए।
जैन दर्शन समय को एक ढलान मानता है। अहिंसा कठिन होती जाएगी। मुक्ति दुर्लभ होगी, लेकिन असंभव नहीं।
नॉर्स, यूनानी, पारसी, सब यही कहते हैं, सभ्यताएँ हथियारों से नहीं, चरित्र के क्षरण से गिरती हैं।
तो क्या हम उसी दौर में हैं? सवाल यह नहीं है कि “क्या अंत निकट है?”
सवाल यह है, क्या हम पहचान पा रहे हैं कि हम कहाँ खड़े हैं? आज दौलत इंसान की क़ीमत बन गई है। छवि, सच से ज़्यादा अहम हो गई है। धर्म एक ब्रांड बन चुका है। और इंसान, थका हुआ उपभोक्ता।
हर युग में मोक्ष, मुक्ति, निजात, इंसान के भीतर से ही शुरू होती है। और शायद यही बात हज़ारों साल पुराने ये ग्रंथ आज भी हमसे कहना चाहते हैं

मोदी विरोध के ‘आंदोलनजीवी’ बोल

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कल्पेश पटेल
रायगढ़ : दलित कार्यकर्ता: “बीजेपी कभी किसी दलित को राष्ट्रपति नहीं बनाएगी।”
बीजेपी ने दलित नेता रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया।
— वही दलित कार्यकर्ता: “राष्ट्रपति तो एक बेकार पद है।”
आदिवासी कार्यकर्ता: “बीजेपी कभी किसी आदिवासी को राष्ट्रपति नहीं बनाएगी।”
बीजेपी ने आदिवासी नेता द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया।
— वही आदिवासी कार्यकर्ता: “राष्ट्रपति तो एक बेकार पद है।”
ओबीसी कार्यकर्ता: “बीजेपी को ओबीसी की कोई परवाह नहीं है।”
याद दिलाया गया कि नरेंद्र मोदी स्वयं ओबीसी हैं।
— वही ओबीसी कार्यकर्ता: “मोदी असली ओबीसी नहीं हैं।”
जनरल कैटेगरी के कार्यकर्ता: “बीजेपी कभी जनरल वर्ग के नेता को पार्टी अध्यक्ष नहीं बनाएगी।”
बीजेपी ने कायस्थ समाज के नितिन नवीन को पार्टी अध्यक्ष बनाया।
— वही कार्यकर्ता: “पार्टी अध्यक्ष भी कोई पद होता है? उसकी क्या अहमियत है?”
हिंदुत्व समर्थक: “बीजेपी कभी राम मंदिर नहीं बनाएगी, यह सिर्फ चुनावी नारा है।”
बीजेपी ने राम मंदिर का निर्माण कराया।
— वही हिंदुत्व समर्थक: “इसमें बीजेपी की क्या भूमिका है? मंदिर तो वैसे भी बनना ही था।”
निष्कर्ष:
बीजेपी जो भी करे, चाहे वह इन समूहों की अपनी ही घोषित मांगों को पूरा क्यों न कर दे, ये लोग कभी संतुष्ट नहीं होंगे। क्योंकि उनका उद्देश्य कभी प्रतिनिधित्व, सुधार या समाधान नहीं था—उनका असली उद्देश्य केवल मोदी का विरोध करना और उसके विरुद्ध काम करना रहा है।
और यदि कभी राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो यही सब लोग चुप हो जाएंगे—क्योंकि तब खुले हाथों से लूटने और भारत को “डीप स्टेट” के हवाले करने का समय आ जाएगा।

अविमुक्तेश्वरानंद के बहाने बंटोगे तो कटोगे का मासूम मंज़र

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दयानंद पांडेय

प्रयागराज : अविमुक्तेश्वरानंद तो अपने मक़सद में फ़ौरी तौर पर क़ामयाब हो गए दिखते हैं l बताइए कि प्रयाग में आज उन की प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार दो पक्ष में बंट कर मार-पीट कर बैठे l पुलिस ने किसी तरह मामला संभाला l सोशल मीडिया पर सवर्ण लोगों में भी मार-काट मची हुई है l ख़ास कर ब्राह्मणों में ही आपस में तलवार तन गई है l बाभन , कुत्ता , हाथी / नहीं जाति के साथी ! का इस से बढ़िया उदाहरण नहीं दिखता l
योगी का सूत्र वाक्य बंटोगे तो कटोगे की ऐसी-तैसी हो गई है l समूचा हिंदू समाज भयंकर रूप से बंट चुका है l ऐसे जैसे सनातन के सल्तनत की चूल हिल गई हो l 2015 में इन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद को काशी में पुलिस से बुरी तरह पिटवाने वाले अखिलेश यादव अब उन की रक्षा में सब से आगे खड़े हैं l कभी राहुल गांधी के हिंदू होने पर सवाल उठाने वाले अविमुक्तेश्वरानंद के साथ कांग्रेस भी समूची ताक़त से खड़ी हो गई है lबल्कि कांग्रेस और सपा में होड़ मची हुई है कि कौन ज़्यादा नज़दीक है अविमुक्तेश्वरानंद के l बस मायावती और ओवैसी की कमी रह गई है l कब वह भी या अन्य शेष लोग भी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ खड़े हो जाएं, कोई नहीं जानता l अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य हैं कि नहीं , यह विवाद पीछे हो गया है l बहुत पीछे l बंटोगे तो कटोगे का मासूम मंज़र मुँह बा कर उपस्थित है l

कांग्रेस और सपा का बढ़िया माहौल बन गया है l नवीन कुमार नबीन और पंकज चौधरी कैसे इस गड्ढे को पाटेंगे, पाट भी पाएंगे कि नहीं , यह देखना दिलचस्प होगा l क्यों कि इस बिंदु पर योगी का बुलडोजर , बुलडोज़ हो गया है l संभल और प्रयाग का फ़र्क़ है यह l तब और जब ब्राह्मणों के बीच का कांग्रेस और सपा का स्लीपर सेल सक्रिय हो चुका हो l यू जी सी क़ानून के तड़के ने बड़ी तीव्रता से इस मुद्दे को ज्वलनशील बना दिया है l स्वाभाविक होने का रंग भर दिया है l चटक रंग l चुटिया वाले बटुकों ने पहले पुलिस वालों का कालर पकड़ा , पुलिस को पीटा, बंद गेट खोल दिया फिर पुलिस ने उन को पीटा l चुटिया पकड़ कर, घसीट कर पीटा l यह ख़बर बन गई l लाल क़िले पर दिल्ली पुलिस की तरह पिटने के बजाय, प्रयाग में योगी पुलिस पीटने पर आमादा हो गई l बात बिगड़ गई l अब ऐसे नाज़ुक प्रसंग पर किसी भी पुलिस को अगर पिटना नहीं आया , पीटने लग गई तो पासा पलट गया है l मंज़र बंटोगे तो कटोगे में तब्दील हो गया है l

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