जातीय उन्माद का चश्मा हटाकर भी देखिए

2-1-14.jpeg

रंगनाथ सिंह

बनारस। कुछ घनघोर जातिवादी लोगों को लग रहा है कि भारत के कॉलेजों में यूजीसी द्वारा कास्ट विजलांटे ग्रुप तैयार करने से उनकी जाति का झण्डा लहराने लगेगा! कुछ लोग ऐसा भी सोच रहे हैं कि ऐसे आरोप केवल सवर्णों पर लगेंगे! क्योंकि मोदी सरकार ने डिफाल्ट रूप से मान लिया है कि जनरल वर्ग (जीसी) जातियों के संग भेदभाव नहीं हो सकता वो अजर-अमर हैं भले ही सरकारी जेएनयू से लेकर प्राइवेट असोका यूनिवर्सिटी तक में ब्राह्मण-बनिया को जूते मारने और देश से निकालने वाले छात्र पढ़ते हों। मोदी जी को उनकी चिन्ता भला क्यों हो! वो वोटबैंक थोड़े ही हैं।

एनसीआरबी के डेटा के अनुसार एससी-एसटी एक्ट के मामलों में ओबीसी कही जाने वाली जातियाँ ज्यादा आरोपी हैं। यह प्रतिशत उनकी आबादी से ज्यादा है। बहुत से मोटी बुद्धि लोगों को इतनी सी बात नहीं समझ आ रही है कि जब किसी परिसर में छात्रों के बीच मनमुटाव में कास्ट एंगल को कानूनी तरजीह दी जाने लगेगी तो केवल सवर्ण छात्रों पर आरोप नहीं लगेगा बल्कि एससी ओबीसी पर भी ऐसा आरोप लगाएगा।

नए प्रावधान को जहाँ तक मैंने पढ़ा है ओबीसी भी अब एससी-एसटी पर ऐसा आरोप लगा सकता है! क्योंकि प्रावधान में यह नहीं कहा गया है कि एससी और एसटी पर ऐसा आरोप नहीं लगाया जा सकता। सरकार की नजर में केवल जीसी जातियों को जातिगत भेदभाव को मोदी जी का फरमान समझकर स्वीकार करना होगा। इस प्रावधान में यह भी स्पष्ट नहीं है कि “ब्राह्मण की बेटी” के लिए उन्मादी समूहों से इन बेटियों को बचाने के लिए क्या उपचार है। आईएएस अफसर तक ब्राह्मण की बेटी को ‘वार बाउंटी’ की तरह ट्रीट करते नजर आ चुके हैं।
चूँकि मोदी सरकार ने झूठे आरोप लगाने पर शिकायत-कर्ता पर कार्रवाई करने का विकल्प हटा दिया है तो फिर बेखौफ इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। छात्र ही नहीं टीचरों की आपसी राजनीति में भी इसके दुरुपयोग की जमीन तैयार हो चुकी है।

मुझे लगता है कि जिस तरह कांग्रेसी सरकारों ने यूनिवर्सिटों-कॉलेजों को मुसलमान घोषित किया उसी तरह आगे जाकर मोदी सरकार उन्हें एससी-एसटी और ओबीसी ने घोषित कर सकती है! कुछ लोगों को यह दूर की कौड़ी लगेगी मगर 2005 में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 60-70 प्रतिशत मुस्लिम टीचर और छात्र वाली जामिया मिल्लिया इस्लामिया को 2011 में मुसलमान घोषत कर दिया जाएगा!

भारत विभाजन से पहले विभिन्न समुदायों ने अपने समाज में शिक्षा का विकास करने के लिए कॉलेज यूनिवर्सिटी बनाए क्योंकि तब देश में ब्रिटिश सरकार थी। मगर भारत के संविधान निर्माताओं ने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत की सेकुलर सरकार यूनिवर्सिटियों को मुसलमान घोषित करेगी। उसी तरह आज लोगों को अजीब लगेगा मगर आगे जाकर कोई जातिवाद-विरोधी सरकार यूनिवर्सिटियों को दलित या पिछड़ा या अगड़ा घोषित करने लगे तो मुझे हैरत नहीं होगी।

अलविदा मार्क टुली…

2-18.jpeg

संदीप के अग्रवाल

दिल्ली। एक दौर था, जब खबरों के लिए देश की जनता अखबारों के अलावा सिर्फ टीवी के समाचार बुलेटिन और आकाशवाणी की खबरों पर निर्भर रहा करती थी. दोनों पर सरकार का नियंत्रण था तो यह माना जाता था कि इन पर आने वाली खबरों पर भी सरकार का नियंत्रण रहता है. ऐसे में दो ही नाम लोगों की जुबां पर रहते थे एक तो बीबीसी और दूसरे मार्क ट्रुली… जिनके बारे में माना जाता था कि यहाँ खबर सबसे पहले आती है और सबसे भरोसेमंद होती है.

मार्क ट्रुली संभवत: देश के पहले ऐसे कॉरेसपॉन्डेंट थे, जिन्हें एक स्टार का दर्जा हासिल था. नवभारत टाइम्स के तत्कालीन फीचर प्रभारी विनोद भारद्वाज जी से, मेरा सपना के लिए मार्क का इंटरव्यू करने की इजाजत लेकर मैंने मार्क को फोन किया. उन्होंने अगले दिन का वक्त दे दिया.

अगले दिन जब मैं खोजते—खोजते मार्क के निजामुद्दीन ईस्ट स्थित बंगले पर पहुँचा तो वहाँ नेम प्लेट पर हिंदी में मार्क टल्ली लिखा देखकर शॉक लगा. आज तक उनका नाम मार्क ट्रुली ही सुनते—पढ़ते आए थे. लेकिन उनका घर था तो नाम गलत होने की संभावना न के बराबर थी. वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि उनका पूरा नाम सर विलियम मार्क टल्ली है.

बहरहाल, अंदर पहुँचा तो मार्क से मुलाकात हुई. करीब तीन दशकों तक भारत में बीबीसी के पयार्य रहे मार्क टल्ली सेवानिवृत्त हो चुके थे और एक फ्रीलांस ब्रॉडकास्टर के तौर पर मीडिया से जुड़े थे.
एक स्टार पत्रकार होने के नाते उनमें काफी एटिट्यूड होगा, सोचा तो यही था लेकिन आशंका के विपरीत उनका व्यवहार बेहद सौम्य, मिलनसारिता से भरपूर था और चेहरा काफी हँसमुख व शर्मीला.

उन्होंने कहा कि आप तो बहुत यंग हैं. मैंने कहा कि आप फिक्र न करें, मैं उम्र में कम हूँ, लेकिन आपको निराशा नहीं होगी. तो उन्होंने झेंपते हुए कहा कि वे शिकायत नहीं तारीफ कर रहे थे.
इंटरव्यू शुरू हुआ. बहुत सारे सवाल—जवाब हुए. वे ब्रिटिश होते हुए भी किसी भी आम भारतीय जितनी ही भारतीयता से भरपूर थे.

उस समय इंडिया वर्सेज भारत का जुमला पैदा नहीं हुआ था, इसलिए जब उन्होंने कहा कि उनक ख्वाहिश हिंदुस्तान को फिर से भारत के रूप में देखने की है तो मैं चकित हुआ कि दोनों में फर्क क्या है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत से उनका आशय ऐसे देश से है, जो पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण न करते हुए अपनी संस्कृति पर गर्व करे और इतना प्रगति करे कि उसे किसी भी चीज के लिए दूसरों की ओर न देखना पड़े, बल्कि दूसरे उसकी ओर देखें.

उनकी बहुत सारी बातों ने मुझे चकित किया, जैसे कि जवानी के दिनों में एक तरफ तो हर समय सेक्स और शराब के बारे में सोचते रहते थे और दूसरी तरफ एक पादरी बनने का सपना भी देखते थे. जो उनके शौकों की वजह से साकार नहीं हो पाया.

मैंने जब उनसे पूछा कि क्या उनके सपनों में भी सेक्स होता है तो उन्होंने कुछ कहने के लिए मुंह खोला फिर एकाएक संभल कर बोले कि मैं इस बारे में कुछ नहीं बताऊंगा, तुम पत्रकार लोग बहुत बदमाश होते हो.
खैर, उनके साथ एक बेहतरीन और बेहद संजीदा इंटरव्यू करने के बाद मुझे वह खुशी हासिल हुई जो बहुत कम लोगों के साथ हुई है. इंटरव्यू लिखकर जब मैं नवभारत टाइम्स ले गया तो वहाँ भी उनका सरनेम देखकर सबको बहुत हैरानी हुई कि कहीं मैंने गलती से ट्रुली को टल्ली तो नहीं लिख दिया. लेकिन, जब मैंने उनकी नेमप्लेट का हवाला दिया तो फिर उन्होंने भी इसे टल्ली ही छापा. शायद यह पहली बार था, जब किसी अखबार ने हिंदी में उनका नाम सही छापा था.

इंटरव्यू छपा, काफी सराहा गया. मार्क को बताने के लिए फोन किया तो उनकी पार्टनर ने फोन उठाया. उन्होंने कहा कि मार्क तो आउट आॅफ टाउन हैं, लेकिन जब उन्हें इंटरव्यू के बारे में बताया तो वह बोलीं कि मार्क रात को वापस आ जाएंगे. उन्होंने कहा कि उन्हें पता चल गया था और उन्होंने पेपर मंगा कर रख लिया था.

मार्क से दूसरी मुलाकात कुछ दिनों बाद हुई. इस बार मेरे साथ मेरे सहपाठी और अभिन्न मित्र अखिलेश शर्मा, जो अभी एनडीटीवी में पॉलिटिकल एडिटर हैं, भी थे. हम दोनों रेडियो के लिए यंग—तरंग नाम की एक मैगजीन प्लान कर रहे थे. हम इसे विविध भारती को देना चाहते थे, लेकिन वहाँ पहले से युवमंच चल रहा था. इसलिए हमने सोचा कि मार्क से मिलकर देखते हैं, जो तब तक टाइम्स के एफएम चैनल से जुड़ चुके थे. हमें लगा कि शायद वे वहाँ इसे फिट करवा दें. मार्क का समय लेकर हम एक बार फिर उनके घर जा धमके. पहले की तरह इस बार भी वे बहुत प्यार और सहयोग भाव से पेश आए. मैगजीन की चर्चा चली, हमने उन्हें कॉन्सेप्ट नोट दिखाया तो उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा कि आपके सारे आइडिया अलग—अलग तो अच्छे हैं, लेकिन एक साथ बहुत हौचपौच हो रहा है. टाइम्स एफएम पर इसकी शुरुआत की गुंजाइश से उन्होंने इंकार कर दिया और बताया कि उनके सारे आॅपरेशन बहुत मनीमाइंडेड होते हैं, इसलिए हमें आकाशवाणी पर ही कोशिश करनी चाहिए.

उनसे विदा लेकर हम मायूसी के साथ बाहर आ गए और यंग तरंग का आगे बढ़ाने का आइडिया वहीं ड्रॉप कर दिया.

आज पद्मश्री व पद्मभूषण मार्क हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन सच्ची और निर्भीक पत्रकारिता की जो मशाल वो आजीवन थामे रहे, वह कभी न बुझने पाए, ये हम सब की साझा जिम्मेदारी है। खासकर ऐसे दौर में, जब मीडिया की विश्वसनीयता शून्य से भी नीचे है, हम मार्क के होने का महत्व, और न होने का नुकसान समझ सकते हैं.

तुली और टुली

आशीष कुमार ‘अंशु’

नाम है राजीव तुली, और शुरुआती दिनों में लोग अक्सर उन्हें राजीव टुली लिख देते थे। यह गलती जानकारी की कमी से नहीं थी, बल्कि मार्क टुली का नाम इतना प्रसिद्ध और मजबूत था कि ‘तुली’ सुनते ही सबका ध्यान उसी ओर चला जाता था, और कई बार नाम की वर्तनी भी उसी प्रभाव में बदल जाती थी।
धीरे-धीरे यह भ्रम दूर हुआ, लेकिन यह छोटी-सी बात बताती है कि मार्क टुली का व्यक्तित्व और पत्रकारिता की कितनी गहरी छाप थी।

आज प्रभावशाली पत्रकारों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। उनमें से एक नाम जो लंबे समय तक भारत की आवाज़ बना रहा-मार्क टुली-अब हमारे बीच नहीं रहे। 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। वे बीबीसी के भारत ब्यूरो चीफ रहे, भारत की जटिलताओं को दुनिया तक संवेदनशीलता और गहराई से पहुंचाने वाले पत्रकार थे, और लाखों भारतीयों के लिए ‘भारत की आवाज़’ कहलाए।
उनका जाना एक युग का अंत है-जब पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं, बल्कि समझ और संतुलन की प्रतीक होती थी। शायद यही सच्ची विरासत है-जब कोई नाम इतना बड़ा हो जाए कि दूसरे नाम भी उसकी छाया में आने लगें।

भारत में एक नए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण हुआ है

images-8.jpeg

हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है और पश्चिमी सभ्यता के आधार पर केवल अधिकार के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे ताकि उसके राज्य में नागरिक सुख शांति से प्रसन्नता पूर्वक निवास कर सकें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति एवं समाज के बीच एक संतुलित सम्बंध स्थापित करने पर जोर देता है। एकात्म मानववाद का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं अंत्योदय अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है। विशेष रूप से भारत में आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत का आश्य यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का लक्ष्य प्रत्येक राजनीतिक दल का होना चाहिए। परंतु, आज की पश्चिमी सभ्यता, जो पूंजीवाद पर आधारित नीतियों पर चलती हुई दिखाई देती है, के अनुसरण में मानव केवल अपने हितों का ध्यान रखता हुआ दिखाई देता हैं एवं अपना केवल भौतिक (आर्थिक) विकास करने हेतु प्रयासरत रहता है और उसमें अपने परिवार एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है। अतः विश्व के समस्त देशों द्वारा अपने नागरिकों एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन को आंकने के उद्देश्य से भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है। नई दिल्ली में दिनांक 20 जनवरी 2026 को उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक (Responsible Nations Index) का लोकार्पण किया गया। यह पहल देशों का मूल्यांकन केवल शक्ति अथवा समृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों, पर्यावरण एवं वैश्विक समुदाय के प्रति उनके उत्तरदायित्व के निर्वहन के आधार पर करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। 21वीं सदी के लिए यह विमर्श समयोचित और आवश्यक है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक को पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में राष्ट्र को समर्पित किया। वैश्विक स्तर पर इस प्रकार का सूचकांक पहली बार बनाया गया है और इसे बनाने में भारत के ही विभिन्न संस्थानों ने अपना योगदान दिया है। इस सूचकांक के माध्यम से यह आंकने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के हित में अपने अधिकारों का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है (आंतरिक उत्तरदायित्व का निर्वहन), वैश्विक समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (बाह्य उत्तरदायित्व का निर्वहन) एवं पर्यावरण को बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (पर्यावरण उत्तरदायित्व का निर्वहन)। उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक 7 आयाम, 15 दृष्टिकोण एवं 58 संकेतकों को शामिल करते हुए निर्मित किया गया है। विश्व के 154 देशों का इस सूचकांक के आधार पर मूल्यांकन किया गया है। सिंगापुर को इस सूचकांक की रैकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद स्विजरलैंड द्वितीय स्थान पर, डेनमार्क तृतीय स्थान पर, साइप्रस चौथे स्थान पर रहे हैं। भारत को 16वां स्थान प्राप्त हुआ है। विश्व के शक्तिशाली देशों का स्थान उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक की सूची में बहुत निचले स्तर पर पाया गया है। अमेरिका 66वें स्थान पर रहा है, जो लिबिया से भी एक पायदान नीचे है। जापान 38वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान 90वें स्थान पर, चीन 68वें स्थान पर एवं अफगानिस्तान 145वें स्थान पर रहा है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण मुख्य रूप से भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इस सूचकांक के निर्माण में 3 वर्षों तक लगातार कार्य किया गया है एवं उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में विश्व बुद्धिजीवी प्रतिष्ठान का भी सहयोग लिया गया है। उक्त सूचकांक के निर्माण के लिए कुल 154 देशों से विभिन्न मापदंडों पर आधारित वर्ष 2023 तक के सम्बंधित आंकडें इक्ट्ठे किये गए है एवं इन आंकड़ों एवं जानकारी का विश्लेषण करने के उपरांत इस सूचकांक का निर्माण किया गया है। यह आंकड़े एवं जानकारी विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से लिए गए है।

आज पूरे विश्व में विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर से आंका जाता है, यह मॉडल पूंजीवाद पर आधारित है एवं इस मॉडल के अनुसार देश में कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में हुए उत्पादन को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन किया जाता है। इस मॉडल में कई प्रकार की कमियां पाई जा रही है। किसी भी देश में पनप रही आर्थिक असमानता, गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे नागरिकों की आर्थिक प्रगति, मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी एवं वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर उक्त मॉडल के अंतर्गत विचार ही नहीं किया जाता है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में अब यह मांग की जा रही है कि आर्थिक प्रगति को आंकने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि सम्बंधी मॉडल के स्थान पर एक नए मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए।

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, किसी भी राष्ट्र में आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जाएगी जब पंक्ति में अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को भी समाज हित में बनाई जा रही आर्थिक नीतियों का लाभ पहुंचे। वर्तमान में, सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार आर्थिक प्रगति आंकने के मॉडल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है इसीलिए कई देशों में गरीब और अधिक गरीब हो रहे है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहे है। नए विकसित किए गए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक में यह आंकने का प्रयास किया गया है कि शासन प्रणाली किस प्रकार से नैतिक धारणाओं को ध्यान में रखकर अपनी आर्थिक नीतियों का निर्माण कर रही है, राष्ट्र में समावेशी विकास हो रहा है अथवा नहीं एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में सरकार द्वारा किस प्रकार की नीतियां बनाई जा रही हैं। साथ ही, धर्म आधारित सदाचार सम्बंधी भारतीय सभ्यता एवं वैश्विक सुख शांति स्थापित करने के सम्बंध में किस प्रकार देश की नीतियां निर्धारित की जा रही हैं, इस विषय को भी उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में स्थान दिया गया है।

पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक प्रगति तो तेज गति से करती दिखाई देती हैं और कई पश्चिमी देश आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल भी हो गए हैं। परंतु, इन देशों में मानवतावादी दृष्टिकोण का पूर्णत: अभाव है। पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में केवल “मैं” के भाव को स्थान प्राप्त है। “मैं” किस प्रकार आर्थिक प्रगति करुं, इस “मैं” के भाव में परिवार एवं समाज कहीं पीछे छूट जाता है। इससे पश्चिमी देशों में सामाजिक तानाबाना पूर्णत: छिन्न भिन्न हो रहा है। युवा वर्ग अपने माना पिता की देखभाल करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़कर केवल अपना आर्थिक विकास करने में संलग्न हैं। इसी प्रकार की कई सामाजिक कुरीतियों ने पश्चिमी देशों में अपने पैर पसार लिए हैं। पश्चिमी सभ्यता के ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति में “मैं” के स्थान पर “हम” के भाव को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। भारतीय सनातन संस्कृति पर आधारित संस्कारों को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को आंकने का प्रयास उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के माध्यम से किया गया है।

संक्षेप में एक बार पुनः यह बात दोहराई जा सकती है कि उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विविध देशों का आंकलन पारम्परिक शक्ति अथवा सकल घरेलू उत्पाद केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है। यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है – (1) आंतरिक उत्तरदायित्व अर्थात गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आंकलन करता है। (2) पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अर्थात प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है। (3) बाह्य अत्तरदायित्व अर्थात शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है। यह सूचकांक वैश्विक आंकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारम्परिक मानकों से पृथक कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है। यह सूचकांक मूल्य आधारित और मानव केंद्रित ढांचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार सम्बंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है। इस प्रकार भारत ने वैश्विक स्तर पर संभवत: प्रथम सूचकांक जारी किया है। यदि वैश्विक स्तर पर कई देश इस सूचकांक के आधार पर अपने देश के नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के आंकलन पर ध्यान देने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक पूरे विश्व में एक क्रांतिकारी सूचकांक के रूप में स्थापित होगा।

आनंद लें: अंधविश्वास से जुड़ी एक कहानी

andhvishwas-780x470-1.jpg

एक गाँव में एक बुजुर्ग काका बहुत बीमार पड़ गए और उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
कुछ दिन बाद गाँव वालों ने आपस में तय किया कि वे सब मिलकर उन्हें देखने शहर जाएँगे।

फिर सबके सामने एक समस्या आ खड़ी हुई: शहर कैसे जाएँ?
आखिरकार उन्होंने सामूहिक रूप से एक बड़ा टेंपो किराए पर लेने और किराया आपस में बाँट लेने का फैसला किया।
उन्होंने एक टेंपो किराए पर लिया जिसका ड्राइवर एक लालची किस्म का आदमी था; उसमें पंद्रह लोगों के बैठने की जगह थी और किराया प्रति व्यक्ति सौ रुपये तय हुआ। पर आखिर में, तैयार सिर्फ चौदह लोग ही हुए।

ड्राइवर ने उनसे गुहार लगाई, बोला कि टेंपो में पंद्रह सीटें हैं — एक आदमी और जोड़ दो ताकि मेरी एक सीट खाली न रहे। लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी वे एक और व्यक्ति नहीं ढूंढ पाए।

जैसे ही गाड़ी चौदह लोगों को लेकर चलने वाली थी, पहाड़ी पर कोई पागलों की तरह हाथ हिलाता और चिल्लाता उनकी तरफ दौड़ता दिखाई दिया।

सभी यात्री चिल्लाए, “चलो, गाड़ी चला दो! उसे मत लेना — वह जरूर उपद्रव करेगा। वह तुम्हें नुकसान पहुंचाएगा, हमें नुकसान पहुंचाएगा।”

लेकिन ड्राइवर ने जवाब दिया, “यह ‘अपशकुन’ की क्या बात है? मेरे लिए तो यात्री भगवान होता है। अगर हम ऐसा सोचेंगे तो मेरा धंधा नहीं चलेगा। यह सौ रुपये का किराया है; मैं उसे हर कीमत पर लूँगा। अपशकुन जैसी कोई चीज़ नहीं होती। लोग बिना वजह उसकी बदनामी कर रहे होंगे। मेरे ख़याल से तुम सब जानबूझकर उसे लेने से मना कर रहे हो।”

गाँव वालों ने ड्राइवर को समझाने की कोशिश की: “यह गाँव का आवारा है, कोई काम नहीं करता — इसे सौ रुपये कहाँ से मिलेंगे? इसे देखकर तो रोटी भी नसीब नहीं होगी। हम मज़ाक नहीं कर रहे; गाड़ी आगे बढ़ा दो।” वे हाथ जोड़कर गुहारने लगे, “कृपया अभी चले जाइए।” सभी को डर था कि अगर गुड्डू उनके साथ चला गया तो कुछ अनहोनी जरूर होगी।

लेकिन ड्राइवर जिद पर अड़ा रहा।

लोगों ने जानबूझकर उसे डराने की कोशिश की, और वह सौ रुपये बिना वजह गँवाना नहीं चाहता था।

“मैं एक नहीं, ऐसे सौ लोग ले जाऊँगा,” वह चिढ़कर बोला। “तुम लोग बिना वजह कहानियाँ बना रहे हो। वह बेचारा यहाँ दौड़ा आ रहा है, और तुम उसे छोड़कर जाना चाहते हो — यह कैसी डाह है? तुम सब अजीब लोग हो। शायद वह बुजुर्ग के बहुत करीब है और उनके अंतिम पलों में उनके साथ रहना चाहता है।”

“हम सब कह रहे हैं छोड़ो, तुम बेवजह उसके हिमायती मत बनो,” किसी ने जवाब दिया। “वह बहुत भयानक, अपशगुन वाला आदमी है।”

“मैं उसे ले जाऊँगा और तुम्हें साबित कर दूँगा कि तुम सब गलत हो। एक ईमानदार आदमी की ऐसी बदनामी करने में तुम्हें शर्म आनी चाहिए। किसी के साथ ऐसा व्यवहार करना ठीक है? तुम सब पढ़े-लिखे लगते हो, फिर भी अनपढ़ों की तरह बोलते हो।”

यह कहकर वह चुप हो गया।

अब दूसरे यात्रियों के पास कोई चारा नहीं था, और वे अपने गाँव के गुड्डू जैसे किसी अनचाहे व्यक्ति के आने का इंतज़ार करने लगे।
उसी समय गुड्डू हाँफता और काँपता हुआ आ पहुँचा। सभी सहमे बैठे थे, साँस रोके, यह सोच रहे थे कि उसकी काली ज़बान से उन पर कैसे घृणित शब्द बरसेंगे। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला और कहा, “अंदर आइए, साहब। आपके गाँव वाले अजीब हैं — मुझे नहीं पता कि वे आप जैसे अच्छे लोगों से क्यों डाह करते हैं। वे आपको लेने यहाँ दौड़े थे पर आपको ले जाना नहीं चाहते।”

“बहुत बहुत धन्यवाद,” गुड्डू ने हाँफते हुए कहा।

“आइए, साहब, बाहर क्यों खड़े हैं? आगे बैठिए।”

“अरे नहीं, नहीं, जरूरत नहीं है।”

वहीं खड़े-खड़े, अभी भी हाँफते हुए, गुड्डू ने चौदह लोगों से कहा, “अरे, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ…”

“गुड्डू, चुप रह! एक शब्द भी बोला तो तेरी जीभ खींच लूँगा!” गाँव के मुखिया ने चेतावनी दी।

“कृपया मेरी बात सुनिए,” गुड्डू ने कहा।

“चुप रहो और अब जब आ ही गए हो तो चुपचाप गाड़ी में बैठ जाओ। शहर पहुँचने तक एक शब्द भी मत बोलना। मैं तुम्हें चेतावनी देता हूँ — नहीं तो हम तुम्हें यहीं उतार देंगे।”

“तुम लोग कैसे हो? उसे बोलने दो। तुम लोग बिना वजह एक ईमानदार आदमी को डरा रहे हो,” ड्राइवर ने बीच में ही कहा।

ड्राइवर के प्रोत्साहन से गुड्डू के चेहरे पर एक शांत मुस्कान आ गई। उसने जोर से पुकारकर कहा, “काका कल रात अस्पताल से घर आ गए हैं। सब गाड़ी से उतर जाओ; बेवजह अस्पताल मत जाओ। तुम्हारा समय और पैसा दोनों बर्बाद होंगे।”

यह सुनकर ड्राइवर ने अविश्वास में स्टीयरिंग व्हील पर सिर पीट लिया। उसने अपनी ज़िंदगी में ऐसा अंधविश्वासी आदमी कभी नहीं देखा था।

scroll to top