20 जुलाई 1965 सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का निधन : स्‍वतंत्रता के बाद भी वर्षों संघर्ष

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भोपाल। भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे प्रसंग हैं जिन्हे पढ़कर आँखे झुकती हैं । जिन लोंगो ने हमें स्वतंत्र बनाने के लिये अपना जीवन न्योछावर किया, अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं सहीं उनके साथ स्वतंत्रता के बाद भी कैसा व्यवहार हुआ । इनमें से एक हैं सुप्रसिद्ध क्रान्ति कारी बटुकेश्वर दत्त । जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भी आजीविका के लिये भीषण संघर्ष करना पड़ा । परिवार चलाने के लिये कभी गाइड बने तो कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट बने । हद तो तब हुई जब पटना कलेक्टर ने उनसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाण पत्र माँगा ।

सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर 1910 को बंगाल के वर्धमान जिले में हुआ । बचपन से उनमें राष्ट्र और संस्कृति के लिये प्रेम था यह भाव उनको पारिवारिक विरासत में मिला । उन के कई नाम थे । बटुकेश्वर दत्त के अतिरिक्त मोहन और बट्टू उनके बचपन का नाम थे । पिता बिहारी दत्त समाज सेवा से जुड़े थे और माता कामिनी देवी अपनी परंपराओं से जुड़ीं घरेलू महिला थीं । जब बटुकेश्वर बहुत छोटे थे तब परिवार कानपुर आ गया था । इसीलिए इनका बचपन कानपुर में बीता । वे जब हाई स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे तभी इनका संपर्क क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़े सुरेंद्रनाथ पांडे और विजय कुमार सिन्हा से हुआ । और वे क्राँतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये । एक तो परिवार की पृष्ठभूमि भारतीय समाज और परंपराओ से जुड़ी थी दूसरे बचपन की एक घटना ने उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध कर दिया था ।
यह घटना कानपुर के मॉल रोड की थी । इस रोड पर अंग्रेज सिपाही ने एक मासूम बच्चे को इसलिए बुरी तरह पीटा कि वह उस सड़क पर चला गया था जहां भारतीयों को चलने की मनाही थी । इस घटना ने बटुकेश्वर दत्त को बुरी तरह झकझोर दिया और जब क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़ने का अवसर आया तो उत्साह से सक्रिय हो गये ।

भगत सिंह से संपर्क और मित्रता

उन दिनों कानपुर क्रान्ति का एक प्रमुख केन्द्र था और समाचार पत्र “प्रताप” इन क्राँतिकारियों का संपर्क केन्द्र था । समय के साथ बटुकेश्वर दत्त का संपर्क प्रताप के संपादक सुरेशचंद्र भट्टाचार्य से बना और उनके माध्यम से वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े और यहीं उनकी मित्रता सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी भगत सिंह से हुई । और 1924 में चंद्रशेखर आजाद से मिले । काकोरी कांड के बाद हुई गिरफ्तारियों के चलते क्राँतिकारी कानपुर से यहाँ वहाँ गये । बटुकेश्वर दत्त पहले बिहार गए और फिर कलकत्ता गये । 1927 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएशन रखा गया । एसोसिएशन ने बटुकेश्वर दत्त को बम बनाने का प्रशिक्षण दिया । और बटुकेश्वर दत्त बहुत उत्कर्ष्ट बन बनाना सीख गये । उस दौर के क्राँतिकारी आँदोलन में अधिकांश बम या तो बटुकेश्वर दत्त के बनाये होते थे अथवा उनके द्वारा प्रशिक्षित युवाओं द्वारा । 1929 में हुये असेम्बली बम कांड में वे सरदार भगतसिंह के साथ बंदी बनाये गये । भगतसिंह को फाँसी की सजा हुई और बटुकेश्वर को उम्रकैद । उम्रकैद की सजा केलिये उन्हें पहले कालापानी भेजा गया । फिर हजारीबाग, दिल्ली और बांकीपुर जेल । जेल में उन्हें क्रूरतम प्रताड़ना मिली जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा । इस कारण 1938 में रिहा कर दिये गये । इस शर्त पर कि वो किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेंगे । बटुकेश्वर दत्त ने यह लिखकर तो दिया पर जेल से रिहा होकर गांधीजी के अहिसंक आँदोलन से जुड़ गये और 1942 बंदी बनाये गये । आँदोलन समाप्त होने के बाद सभी आँदोलन कारी रिहा हुये पर बटुकेश्वर दत्त को रिहाई नहीं मिली वे 1945 में रिहा हुये । स्वतंत्रता के बाद उन्होंने विवाह किया और पटना आ गये । यहाँ उन्होंने आजीविका के लिये कठोर संघर्ष किया । कभी गाइड बने और कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट। यही नहीं कलेक्टर ने उनसे स्वाधीनता संग्राम सेनानी होने का प्रमाणपत्र भी माँगा । 1958 में पहली बार उन्हें सम्मान मिला और वे विधान परिषद के सदस्य मनोनीत किये पर जल्दी ही बीमारी ने उन्हे जकड़ लिया । इलाज के लिये बिहार से दिल्ली लाया गया । पर बीमारी ने पीछा न छोड़ा और 20 जुलाई 1965 को उन्होंने अपने जीवन की सांस ली । शत शत नमन्

ऑनलाइन भुगतान के मामले में भारत के यूपीआई ने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ा

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हाल ही के समय में भारत, विभिन्न क्षेत्रों में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नित नए रिकार्ड बना रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो अब भारत पूरे विश्व का नेतृत्व करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत ने बैंकिंग व्यवहारों के मामले में तो जैसे क्रांति ही ला दी है। अभी हाल ही में आर्थिक क्षेत्र में बैंकिंग व्यवहारों के मामले में भारत के यूनफाईड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) ने अमेरिका के 67 वर्ष पुराने वीजा एवं मास्टर कार्ड के पेमेंट सिस्टम को प्रतिदिन होने वाले आर्थिक व्यवहारों की संख्या के मामले में वैश्विक स्तर पर पीछे छोड़ दिया है। वैश्विक स्तर पर अब भारत विश्व का सबसे बड़ा रियल टाइम पेमेंट नेटवर्क बन गया है।

भारत में वर्ष 2016 के पहिले ऑनलाइन पेमेंट का मतलब होता था केवल वीजा और मास्टर कार्ड। वीजा और मास्टर कार्ड को चलाने वाली अमेरिका की ये दोनों कंपनिया पूरी दुनिया में ऑनलाइन पेमेंट का एकाधिकार रखती थीं। वीजा की शुरुआत, अमेरिका में वर्ष 1958 में हुई थी और धीमे धीमे यह कंपनी 200 से अधिक देशों में फैल गई और ऑनलाइन भुगतान के मामले में पूरे विश्व पर अपना एकाधिकार जमा लिया। वैश्विक स्तर पर इस कम्पनी को चुनौती देने के उद्देश्य से भारत ने वर्ष 2016 में अपना पेमेंट सिस्टम, यूपीआई के रूप में, विकसित किया और वर्ष 2025 आते आते भारत का यूपीआई सिस्टम आज पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ गया है। यूपीआई पेमेंट सिस्टम के माध्यम से ओनलाइन बैकिंग व्यवहार चुटकी बजाते ही हो जाते है। आज सब्जी वाले, चाय वाले, सहायता प्राप्त करने वाले नागरिक एवं छोटी छोटी राशि के आर्थिक व्यवहार करने वाले नागरिकों के लिए यूपीआई सिस्टम ने ऑनलाइन बैंकिंग व्यवहार करने को बहुत आसान बना दिया है। आज भारत के यूपीआई सिस्टम के माध्यम से प्रतिदिन 65 करोड़ से अधिक व्यवहार (1800 करोड़ से अधिक व्यवहार प्रति माह) हो रहे हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वीजा कार्ड से माध्यम से प्रतिदिन 63.9 करोड़ व्यवहार हो रहे हैं। इस प्रकार, भारत के यूपीआई ने दैनिक व्यवहारों के मामले में 67 वर्ष पुराने अमेरिका के वीजा को पीछे छोड़ दिया है। भारत में केंद्र सरकार की यह सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक है। भारत अब इस मामले में पूरी दुनिया का लीडर बन गया है। भारत ने यह उपलब्धि केवल 9 वर्षों में ही प्राप्त की है। विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह नई तकनीकी का चमत्कार है एवं यह सिस्टम अत्यधिक प्रभावशाली है। भारत का यूपीआई सिस्टम भारत को वैश्विक बैंकिंग नक्शे पर एक बहुत बड़ी शक्ति बना सकता है।

भारत में यूपीआई की सफलता की नींव दरअसल केंद्र सरकार द्वारा चलाई गई कई आर्थिक योजनाओं के माध्यम से पड़ी है। समस्त नागरिकों के आधार कार्ड बनाने के पश्चात जब आधार कार्ड को नागरिकों के बैंक खातों से जोड़ा गया और केंद्र सरकार द्वारा देश के गरीब वर्ग की सहायता के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत सहायता राशि को सीधे ही नागरिकों के बैंक खातों में जमा किया जाने लगा तब एक सुदृद्ध पेमेंट सिस्टम की आवश्यकता महसूस हुई और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई का जन्म वर्ष 2016 में हुआ। यूपीआई को आधार कार्ड एवं प्रधानमंत्री जनधन योजना के अंतर्गत बैंकों में खोले गए खातों से जोड़ दिया गया। नागरिकों के मोबाइल क्रमांक और आधार कार्ड को बैंक खातों से जोड़कर यूपीआई सिस्टम के माध्यम से आर्थिक एवं लेन-देन व्यवहारों को आसान बना दिया गया। भारत में आज लगभग 80 प्रतिशत युवा एवं बुजुर्ग जनसंख्या का विभिन्न बैकों के खाता खोला जा चुका है। यूपीआई के माध्यम से केवल कुछ ही मिनटों में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में राशि का अंतरण किया जा सकता है। ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के रूप में यूपीआई के आने के बाद तो अब भारत के नागरिक एटीएम कार्ड, डेबिट कार्ड एवं क्रेडिट कार्ड को भी भूलने लगे हैं।

भारत से बाहर अन्य देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक भी अपनी बचत को यूपीआई के माध्यम से अपने परिवार के सदस्यों के बैंक खातों में ऑनलाइन राशि का अंतरण चंद मिनटों में कर सकते हैं। पूर्व में, बैंकिंग चेनल के माध्यम से एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में राशि का अंतरण करने में 2 से 3 दिन का समय लग जाता था तथा विदेशी बैकों द्वारा इस प्रकार के अंतरण राशि पर खर्च भी वसूला जाता है। अब यूपीआई के माध्यम से कुछ ही मिनटों में राशि एक देश के बैंक खाते से दूसरे देश के बैंक खाते में अंतरित हो जाती है। इससे भारतीय रुपए का अंतरराष्ट्रीयकरण भी हो रहा है। विश्व के अन्य देशों में पढ़ाई के लिए गए छात्रों को अपने खर्च चलाने एवं विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों में फीस की राशि यूपीआई सिस्टम से जमा कराने में बहुत आसानी होगी। जिस भी देश में भारतीय मूल में नागरिकों की संख्या अधिक है उन देशों में भारत के यूपीआई सिस्टम को लागू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। आज 13,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि इन देशों में निवास कर रहे भारतीय मूल के नागरिकों द्वारा प्रतिवर्ष भारत में भेजी जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर भारत के यूपीआई सिस्टम की स्वीकार्यता बढ़ने से अमेरिकी डॉलर पर भारत की निर्भरता भी कम होगी, इससे भारतीय रुपए की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ेगी और डीडोलराईजेशन की प्रक्रिया तेज होगी।

भारत ने यूपीआई के प्रतिदिन होने वाले व्यवहारों की संख्या के मामले में आज अमेरिका, चीन एवं पूरे यूरोप को पीछे छोड़ दिया है। वर्तमान में भारत के यूपीआई सिस्टम का विश्व के 7 देशों यथा यूनाइटेड अरब अमीरात, फ्रान्स, ओमान, मारीशस, श्रीलंका, भूटान एवं नेपाल में उपयोग हो रहा है। इन देशों में रहने वाले भारतीय मूल के नागरिक यूपीआई के माध्यम से सीधे ही भारत के साथ आर्थिक व्यवहार कर रहे हैं। दक्षिणपूर्वीय देशों यथा मलेशिया, थाइलैंड, फिलिपींस, वियतमान, सिंगापुर, कम्बोडिया, दक्षिण कोरिया, जापान, ताईवान एवं हांगकांग आदि भी भारत के यूपीआई सिस्टम के उपयोग को बढ़ावा देने के प्रयास कर रहे हैं। यूनाइटेड किंगडम, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीयन देशों ने भी भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू करने की इच्छा जताई है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की साइप्रस एवं नामीबिया यात्रा के दौरान इन दोनों देशों ने भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में शुरू करने के लिए भारत से निवेदन किया है। पूरे विश्व में अब कई देशों का विश्वास भारत के यूपीआई सिस्टम पर बढ़ रहा है और यदि ये देश भारत के यूपीआई सिस्टम को अपने देश में लागू कर देते हैं तो इससे भारत में विदेशी निवेश की राशि में भी तेज गति से वृद्धि होने की सम्भावना बढ़ जाएगी।

दूध का दूध और ….

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सच्चिदानंद जोशी

सुबह घूमने के लिए निकला तो श्रीमती जी ने एक काम टिपा दिया ” घर में दूध खत्म हो गया है , आते समय मिल्क पार्लर से लेते आना ।”

श्रीमती जी के आदेश का पालन करने मिल्क पार्लर गए और काउंटर पर बैठे सज्जन से कहा ” दो पैकेट दूध देना ”

” कौन सा ?” वहां से प्रश्न आया।

ये प्रश्न मेरे लिए अजीब था।

” कौन सा मतलब ?”

” मतलब ये सर, कि आपको फुल क्रीम चाहिए, या हॉफ क्रीम चाहिए। टोंड चाहिए या डबल टोंड । फैट फ्री चाहिए या हॉफ फैट। “काउंटर से जवाब आया।

” भाई मुझे दूध चाहिए आइसक्रीम नहीं । ” मैने समझाना चाहा।कुछ दिन पहले ही आइसक्रीम का एक विज्ञापन याद आ गया जिसमें इस तरह की किस्मों का जिक्र था।

” सर ये दूध की ही किस्में बता रहा हूं। ”

हार कर श्रीमती जी को फोन लगाना पड़ा और उनसे सही जानकारी लेनी पड़ी ।साथ में अपनी कार्यक्षमता का प्रमाण पत्र भी मिला ” तुमसे तो एक काम ढंग से नहीं होता” , तब जाकर वो दूध जिससे चाय बन सके लेकर मैं घर की ओर लौटा।

रास्ते में सोचने लगा कि अपन क्या इतने पुराने हो गए है कि पता ही न हो कि दूध कितने प्रकार का होता है। बचपन में तो हमें दूध का एक ही प्रकार मालूम था और वह था ” धन्सू का दूध।” धन्सू हमारी कॉलोनी का दूध वाला था। वहीं हमारी पूरी कॉलोनी को दूध देता था। शुरू शुरू में वो साइकिल पर आता , कुछ दिनों बाद वो जावा मोटरसाइकिल पर आने लगा। बचपन में हमे लगता कि ये जावा मोटरसाइकिल दूध वालों के लिए ही बनाई गई है। फुट रेस्ट से टिका कर दो बड़े केन और पीछे की सीट से टिका कर दो छोटे और दो बड़े केन।

धन्सू की एक खासियत थी कि जब चाहो जितना चाहो उससे दूध ले लो। कभी मना नहीं करता था। बर्तन में पहले आधा आधा लीटर नाप कर दो लीटर और उसके ऊपर थोड़ा और ” लटकन” के रूप में डालना ये दिनचर्या रहती। साथ में एक एल्युमिनियम की बड़ी केन और होती जिसमें छाछ होता । छाछ आपको जितना चाहिए उतना मिलता था बिना किसी मूल्य के ।प्राप्त जानकारी के अनुसार हमारे यहां भैंस का दूध आता था जो बड़ी केन में आता था। बड़ी कैन के साथ एक छोटी कैन भी रहती थी । पूछने पर घंन्सू ने बताया कि इसमें गाय का दूध है जो पड़ोस वाले खरे जी के लिए है। इस गाय के दूध का रहस्य भी एक दिन खुला। धन्सू ने रामचरण जी से पानी मांगा। रामचरण एक ग्लास पानी ले आए पीने के लिए। ग्लास देखकर धन्सू बोला ” जा में का होत, लोटा भर के ले आओ। ” रामचरण जी गुस्से में बड़ा जग भर कर पानी ले आए। फिर धन्सू ने बड़े केन में से आधा लीटर दूध छोटे कैन में डाला और उसके साथ पूरा जग पानी छोटे केन में उंडेल दिया। हो गया गाय का दूध तैयार। फिर खिसिया कर बोला ” आज भूल गए घर ले लाबे की सो इतई बना रहे”।

वैसे भी धन्सू लाज शरम मान अपमान से परे एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति था। दूध पतला होने की शिकायत हर पंद्रह दिन में करना हमारा परम कर्तव्य होता था और उसका काल संगत उत्तर देना धन्सू का। कभी भैंसिया चारा ज्यादा खा गई तो कभी भैंसिया पानी ज्यादा पी गई। कभी कभी तो एकदम बेशर्मी से ” लल्ला ने दूध बगरा दव सो तनिक पानी मिलाने पड़ो।” “तनिक” शब्द पर हमें आश्चर्य होता।कहने का मन होता ” तनिक” दूध भी मिला लिया करो। लेकिन धन्सू के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। वह अपनी मुस्कुराहट के साथ सारी बातें सुन लेता।

हमारी कॉलोनी शहर से थोड़ी बाहर की तरफ थी । मेन रोड पर आने के लिए नाके से गुजरना होता था। नाके पर मुसाफिरों की सुविधा के लिए नल लगे थे और मवेशियों के पीने के लिए पानी का हौद बना था। एक दिन पिताजी के साथ जा रहा था तो देखा धन्सू केन नल से लगाए खड़ा है। पिताजी से सामान्य अभिवादन की दृष्टि से कहा ” क्यों धन्सू सब ठीक। ” तो उसने उलट कर उत्तर दिया ” आपके यहां दूध दे आए हैं साहब । ” यानि अब आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि मैं दूध में और कितना पानी मिलाऊं।धन्सू की एक आदत बहुत अच्छी थी कितना भी कुछ बोलो , डांटो फटकारो वह हमेशा मुस्कुराता रहता। लेकिन यह भी सुनिश्चित करता कि कॉलोनी में और कोई दूसरा दूध वाला न आने पाए। एक दिन दूध देने नहीं आया तो अगले दिन मां ने कारण पूछा। बिल्कुल सहज भाव से उसने उत्तर दिया ” काल पेशी हती कोर्ट में। वो तीन साल पीछे मर्डर हो गओ हतो ताई लाने पेशी हती।” अब इसके बाद किसकी हिम्मत थी दूध वाला बदलने की।

छतरपुर से भोपाल आए तो दूधवाला सिस्टम खत्म करके डेयरी सिस्टम पर आ गए। डेयरी में भी बोतल सिस्टम समाप्त होकर पैकेट सिस्टम पर आ गया था। एक नीला पैकेट और एक लाल पैकेट। जब ये पैकेट नए नए आए थे तो ये पैकेट इतने आकर्षक लगते थे कि लोग इन्हें सम्हाल कर इनके नए नए प्रयोग इजाद करते थे। सब्जी लाने की थैली, डायनिंग टेबल का कवर , स्कूटर का कवर , साइकिल सीट का कवर, गैलरी का पर्दा आदि आदि। हमसे तीन घर छोड़ कर रहने वाले मोहन चाचा ने तो सुना है चाची को उन थैलियों से रात में पहनने का गाउन बनाने का आदेश दे दिया था। वैसे भी मोहन चाचा अपनी अद्वितीय प्रयोग धार्मिता के लिए जाने जाते थे। बालों में हेयर डाई लगा कर पूरे मार्केट में घूम कर आने का साहसिक कार्य उन्होंने ही प्रारंभ किया था। उनकी प्रयोग धार्मिता की पराकाष्ठा तो ये थी कि वे ” सिर्फ” खादी भंडार से खरीदा गाउन पहन कर दूध लेने जाते थे। ” सिर्फ” शब्द के रहस्य पर से पर्दा तब उठा जब एक दिन सुबह के समय जोर की हवा चली और मोहन चाचा जो उस समय दूध लेने डेयरी पर खड़े थे , का गाउन पूरा हवा में उड़ने लगा। मोहन चाचा डॉन फिल्म( पुरानी अमिताभ वाली ) की हेलन की तरह नजर आने लगे । हेलन ने तो तब भी कुछ कपड़े पहने थे लेकिन हमारे मोहन चाचा शब्द और कृति से ” सिर्फ” शब्द को सार्थक करते नजर आए।

जैसे जैसे चाय में दूध कम होता गया , दूध कहां से आ रहा है और कैसे आ रहा है इसमें हमारी दिलचस्पी कम होती गई। लेकिन अब तो हद ही हो गई कि दूध की इतनी किस्में हो गई और हमें पता ही नहीं चला।

किस्में कितनी भी हों धन्सू के दूध की बराबरी नहीं कर पाएंगी। क्योंकि धन्सू का दूध सिर्फ दूध नहीं था। भाई हॉस्टल से आता तो उसके लिए अलग दूध बिना कहे ले आता , साथ में जुमला जोड़ देता ” उते पतो नई कैसो दूध मिलत”। मेहमान आते तो बिना कहे दूध बढ़ा देता। हिसाब जो दो , जितना दो ले लेता।

एक बार दीदी की तबियत ठीक न होने से पिताजी उन्हें आराम के लिए ताऊजी के घर से लिवा लाए। दीदी का दो साल का बेटा भी था। घर में दूध ज्यादा आने लगा। लेकिन जैसे ही धन्सू ने छोटे बच्चे को घर में देखा रोज एक छोटी से बरनी में अलग से दूध लाने लगा। कहता ” जे हमारे कान्हा जी के लिए। ”

लगभग महीना भर रहकर दीदी वापिस ग्वालियर चली गई। अगले महीने जब मां ने धन्सू को हिसाब के पैसे दिए तो धन्सू बोला ” जे कितने पैसा दे रई अम्मा। ” मां ने हिसाब बताया। उसमें उस छोटी बरनी के भी पैसे जुड़े थे जो वो रोज़ अलग से लाता था। धन्सू एकदम बिफर गया । ” जे कैसो पाप करवा रही अम्मा हमसे। हम कान्हा जी के दूध पैसे कैसे ले सकत। हम एसो पाप नई कर सकत। ” कहते कहते धन्सू की आंखों में आंसू आ गए थे। मां की भी आंखे भीग आई थी। पता नहीं अंततः मां ने धन्सू को कितने पैसे दिए । लेकिन इतना तय था कि लाख मनाने पर भी धन्सू ने अतिरिक्त दूध के पैसे नहीं लिए।

आज टोंड , डबल टोंड, क्रीम , हॉफ क्रीम , फुल क्रीम दूध के कई प्रकार है लेकिन किसी में भी वो स्वाद नहीं है , वो पौष्टिकता नहीं है जो धन्सू के दूध में थी क्योंकि धन्सू का दूध सिर्फ दूध नहीं था । उसमें खाने की मलाई शायद उतनी मोटी न जमती हो लेकिन ममता की मलाई बहुत मोटी थी और उसका आज भी कोई मुकाबला नहीं है।

(साभार)

A Rising Leader in Uttarakhand Pushkar Singh Dhami

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Pushkar Singh Dhami, the Chief Minister of Uttarakhand since 2021, has emerged as a prominent figure within the Bharatiya Janata Party (BJP) and Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS), earning accolades for his governance and ideological commitment. At 45, when he assumed office, he became the youngest Chief Minister in Uttarakhand’s history, bringing dynamism shaped by his early involvement with the RSS’s student wing, Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP), and the BJP’s youth wing, Bharatiya Janata Yuva Morcha. His leadership blends cultural preservation, administrative reform, and development, establishing him as a leader who prioritizes action over publicity.

Dhami’s tenure is distinguished by bold legislative achievements, notably the implementation of the Uniform Civil Code (UCC) in 2024, making Uttarakhand the first state in India to enact this law. This move, praised by Union Home Minister Amit Shah, underscores Dhami’s alignment with the BJP’s ideological goals. BJP youth leader Gaurav Pandey has lauded Dhami, stating, “Dhami ji is the successful Chief Minister of Uttarakhand, and under his leadership, BJP is engaged in building and beautifying Uttarakhand.” This reflects the party’s confidence in his vision. Additionally, Dhami’s government has introduced measures to preserve Uttarakhand’s spiritual heritage, such as restricting non-Hindu participation in the Char Dham Yatra and banning videography within 50 meters of temple premises, reinforcing the state’s identity as “Devbhoomi” (Land of the Gods).

Education reforms under Dhami include integrating the Ramayana and Gita into school curricula to instill cultural values. His administration has also addressed demographic concerns through stringent anti-conversion laws and campaigns against unauthorized religious structures, tackling issues like “land jihad” and “love jihad” without targeting specific communities, as he clarified in a 2025 press conference. These efforts have resonated with his voter base and bolstered his reputation.

Hailing from the Kumaoni Rajput community, the largest caste in Uttarakhand, Dhami remains untainted by allegations of caste favoritism, focusing on inclusive development. His government’s initiatives, including the Char Dham Yatra Authority and infrastructure projects worth ₹188.07 crore in Dehradun, highlight his commitment to a modern yet culturally rooted Uttarakhand. Without relying on self-promotion, Dhami’s results-driven approach has solidified his stature as a principled leader.

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