टैरिफ युद्ध अमेरिका पर ही भारी पड़ सकता है

AFP-Donald-Trump-Tariffs-2025-02-3a8da0b50b70a2a9181dfb44489a201a-16x9.jpg.webp

भोपाल । अमेरिका में श्री डानल्ड ट्रम्प के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के साथ ही दुनिया के लगभग समस्त देशों के साथ ट्रम्प प्रशासन द्वारा टैरिफ युद्ध की घोषणा कर दी गई है। अमेरिका में विभिन्न देशों से होने वाले आयात पर भारी भरकम टैरिफ लगाकर एवं टैरिफ की दरों में बार बार परिवर्तन कर तथा इन टैरिफ की दरों को लागू करने की तिथि में परिवर्तन कर ट्रम्प प्रशासन टैरिफ युद्ध को किस दिशा में ले जाना चाह रहा है, इस सम्बंध में अब स्पष्टता का पूर्णत: अभाव दिखाई देने लगा है। अब तो विभिन्न देशों को ऐसा आभास होने लगा है कि अमेरिकी प्रशासन विभिन्न देशों पर टैरिफ की दरों के माध्यम से अपना दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है ताकि ये देश अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अमेरिकी शर्तों पर शीघ्रता के साथ सम्पन्न करें।

श्री ट्रम्प द्वारा कई बार यह घोषणा की गई है कि भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता शीघ्र ही सम्पन्न किया जा रहा है। अमेरिका एवं भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से भारतीय प्रतिनिधि मंडल अमेरिका में गया था तथा निर्धारित समय सीमा से अधिक समय तक वहां रहा एवं ऐसा कहा जा रहा है कि द्विपक्षीय समझौते के अंतिम रूप को अमेरिकी राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जा चुका है परंतु अभी तक अमेरिका द्वारा अमेरिका एवं भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते की घोषणा नहीं की जा रही है। हालांकि, इस बीच अमेरिका द्वारा कई देशों के विरुद्ध टैरिफ की दरों को बढ़ा दिया गया है। विशेष रूप से जापान एवं दक्षिणी कोरिया से अमेरिका को आयात होने वाली वस्तुओं पर 1 अगस्त 2025 से 25 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाया जाएगा। इसी प्रकार, 12 अन्य देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर भी टैरिफ की बढ़ी हुई नई दरें लागू किये जाने का प्रस्ताव किया गया है। इस सम्बंध में अमेरिकी राष्ट्रपति ने इन 14 देशों के राष्ट्राध्यक्षों को पत्र भी लिखा है। इस सूची में भारत का नाम शामिल नहीं है।

पूर्व में अमेरिका द्वारा चीन से आयात होने वाले उत्पादों पर भारी भरकम टैरिफ की घोषणा की गई थी। चीन ने भी अमेरिका से होने वाली आयातित वस्तुओं पर लगभग उसी दर पर टैरिफ लागू करने की घोषणा कर दी थी। साथ ही, चीन ने विभिन्न देशों को दुर्लभ खनिज पदार्थों (रेयर अर्थ मिनरल) के निर्यात पर रोक लगा दी थी। अमेरिका में चीन के इस निर्णय का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था। जिसके दबाव में अमेरिका ने चीन के साथ व्यापार समझौता करते हुए चीन से आयात होने वाली विभिन्न वस्तुओं पर टैरिफ की दरों को तुरंत कम कर दिया। अमेरिका द्वारा इसी प्रकार का एक द्विपक्षीय व्यापार समझौता ब्रिटेन के साथ भी सम्पन्न किया जा चुका है। पूर्व में, ट्रम्प प्रशासन ने 90 दिवस की अवधि में 90 देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करने की बात कही थी तथा 90 दिवस की समयावधि 9 जुलाई को समाप्त होने के पश्चात भी केवल दो देशों ब्रिटेन एवं चीन के साथ ही द्विपक्षीय व्यापार समझौता सम्पन्न हो सका है। भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया जा चुका है परंतु इसकी अभी तक घोषणा नहीं की गई है। द्विपक्षीय समझौते के लिए शेष देशों पर दबाव बनाने की दृष्टि से ही इन देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर टैरिफ की दरों को एक बार पुनः बढ़ाये जाने का प्रस्ताव है और इन बढ़ी हुई दरों को 1 अगस्त 2025 से लागू करने की योजना बनाई गई है।

वैश्विक स्तर पर अमेरिका द्वारा छेड़े गए इस टैरिफ युद्ध से निपटने के लिए भारत एक विशेष रणनीति के अंतर्गत कार्य करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत ने वैश्विक मंच पर न तो अमेरिका के टैरिफ की दरों में वृद्धि सम्बंधी निर्णयों की आलोचना की है और न ही भारत में अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी है। बल्कि, भारत ने तो अमेरिका से आयात होने वाली कुछ विशेष वस्तुओं पर टैरिफ को कम कर दिया है। दरअसल, भारत इस समय विकास के उस चक्र में पहुंच गया है जहां पर भारत को अपना पूरा ध्यान आर्थिक क्षेत्र को आगे बढ़ाने पर केंद्रित करने की आवश्यकता है। भारत को यदि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल करना है तो आगे आने वाले लगभग 20 वर्षों तक लगातार लगभग 8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर को बनाए रखना अति आवश्यक है। इसलिए भारत एक विशेष रणनीति के अंतर्गत अपने आर्थिक विकास पर अपना ध्यान केंद्रित करता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत के रूस के साथ भी अच्छे सम्बंध हैं तो अमेरिका से भी अपने सम्बन्धों को सामान्य बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील है। भारत के इजराईल के साथ भी अच्छे सम्बंध हैं तो ईरान के साथ भी भारत के व्यापारिक सम्बंध हैं। रूस एवं यूक्रेन युद्ध के बीच भी भारत ने दोनों देशों के साथ अपना संतुलित व्यवहार बनाए रखा है। इसी कड़ी में, चीन के साथ भी आवश्यकता अनुसार बातचीत का दौर जारी रखा जा रहा है, बावजूद इसके कि कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन अप्रत्यक्ष रूप से भारत के विरुद्ध कार्य करता हुआ दिखाई देता है।

अभी हाल ही में चीन ने भारत को दुर्लभ खनिज पदार्थों (रेयर अर्थ मिनरल) की आपूर्ति पूर्णत: रोक दी है। साथ ही, मानसून का मौसम भारत में प्रारम्भ हो चुका है एवं भारत में कृषि क्षेत्र में गतिविधियां अपने चरम स्तर पर पहुंच गई हैं, ऐसे अत्यंत महत्वपूर्ण समय पर चीन द्वारा भारत को उर्वरकों की आपूर्ति पर परेशनियां खड़ी की जा रही हैं। चीन द्वारा समय समय पर भारत के लिए खड़ी की जा रही विभिन्न समस्याओं के हल हेतु भारत ने विश्व के पूर्वी देशों एवं विश्व के दक्षिणी भाग में स्थित देशों की ओर रूख किया है। अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने घाना, नामीबिया, अर्जेंटीना, ब्राजील, त्रिनिदाद एवं टोबैगो जैसे देशों की यात्रा इस उद्देश्य से सम्पन्न की है ताकि दुर्लभ खनिज पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इन देशों में दुर्लभ खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

भारत में 140 करोड़ नागरिकों का विशाल बाजार उपलब्ध है, जिसे अमेरिका एवं चीन सहित विश्व का कोई भी देश नजर अन्दाज नहीं कर सकता है। यदि अमेरिका एवं चीन भारत के साथ अपने सम्बन्धों को किसी भी कारण से बिगाड़ने का प्रयास करते हैं तो लम्बी अवधि में इसका नुक्सान इन्हीं देशों को अधिक होने जा रहा है है क्योंकि ऐसी स्थिति में वे भारत के विशाल बाजार से वंचित हो जाने वाले हैं। भारत तो वैसे भी पिछले लम्बे समय से आत्मनिर्भर होने का लगातार प्रयास कर रहा है एवं कई क्षेत्रों में भारत आज आत्मनिर्भर बन भी गया है। अतः भारत की निर्भरता अन्य देशों पर अब कम ही होती जा रही है। भारत आज फार्मा, ऑटो, कृषि, इंजीनीयरिंग, टेक्नॉलोजी, स्पेस तकनीकी, सूचना प्रौद्योगिकी, आदि क्षेत्रों में बहुत आगे निकल चुका है। आज भारत विकास के उस पड़ाव पर पहुंच चुका है, जिसकी अनदेखी विश्व का कोई भी देश नहीं कर सकता है। भारत को हाल ही में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में कच्चे तेल के अपार भंडार होने का भी पता लगा है। एक अनुमान के अनुसार, यह भंडार इतने विशाल हैं कि आगामी 70 वर्षों तक भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति होती रहेगी। इसी प्रकार, भारत में कर्नाटक स्थित कोलार स्वर्ण खदानों में भी एक बार पुनः खुदाई का कार्य प्रारम्भ किया जा रहा है। आरम्भिक अनुमान के अनुसार, प्रतिवर्ष लगभग 750 किलोग्राम स्वर्ण की आपूर्ति भारत को इन खदानों से हो सकती है।

पूरे विश्व में आज केवल भारत ही युवा देश की श्रेणी में गिना जा रहा है क्योंकि भारत की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयुवर्ग में हैं तथा लगभग 40 प्रतिशत आबादी 15 से 35 वर्ष के आयुवर्ग में शामिल हैं। अतः एक तरह से भारत आज विश्व के लिए श्रम का आपूर्ति केंद्र बन गया है। लम्बे समय से रूस एवं यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के बाद जब इन देशों में आधारभूत सुविधाओं को पुनर्विकसित करने का कार्य प्रारम्भ होगा तो इन्हें भारतीय श्रमिकों एवं इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ने जा रही है, एक अनुमान के अनुसार अकेले रूस द्वारा में लगभग 10 लाख भारतीयों की मांग की जा सकती है। इसी प्रकार, इजराईल एवं हम्मास तथा ईरान के बीच युद्ध की समाप्ति के पश्चात इन देशों में भी बुनियादी ढांचे को पुनः मजबूत करने का कार्य जब प्रारम्भ होगा तो इन देशों को भी भारतीय नागरिकों की आवश्यकता पड़ेगी। इजराईल, जापान सिंगापुर एवं ताईवान आदि देशों द्वारा तो पूर्व में भी भारतीय इंजिनीयरों की मांग की जाती रही है। अमेरिका, ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपीय देशों में तो डॉक्टर एवं इंजीनियरों की भारी मांग पूर्व से ही बनी हुई है। अतः आज भारत पूरे विश्व में डॉक्टर, इंजीनियर तथा श्रमिक उपलब्ध कराने के मामले बहुत आगे है। अतः भारत की इस ताकत की अनदेखी आज कोई भी देश नहीं कर सकता है।

जातिवादी राजनीति का प्यादा: आशुतोष और सारिका विवाद में राजद की रणनीति और चुप्पी

2-12.jpeg

पटना। बिहार की राजनीति में जातिवाद का जहर हमेशा से चर्चा का केंद्र रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की प्रवक्ता सारिका पासवान और राजद द्वारा तैयार किए गए भूमिहार नेता आशुतोष के बीच सोशल मीडिया पर हुई तीखी बहस ने इस मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ला दिया।

आशुतोष को राजद के प्यादे के रूप में देखा जा रहा है, जिसे तेजस्वी यादव अपनी रणनीति के तहत इस्तेमाल कर रहे हैं। बिहार की जनता इसे अच्छी तरह समझती है कि यह विवाद 2025 के चुनावों में बहुजन वोटों को एकजुट करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

दूसरी तरफ सारिका के मामले में उनके निजी जीवन की बात भी लोगों के सामने आई है। जहाँ उनके पति के साथ विवाद चल रहा है। बात-बात में जाति तलाशने वाली सारिका के निजी जीवन को इस विवाद में घसीटना चाहिए या नहीं, यह एक प्रश्न हो सकता है? लेकिन फिर प्रश्न यह भी है कि सारिका ने अपने जीवन में इन मूल्यों की कभी परवाह की है?

बिहारी समाज को जाति के आधार पर बाँटने वाले बयानों में इस बात की परवाह की है कि इससे समाज पर क्या असर पड़ेगा? इस पारिवारिक कलह में दावा किया गया कि सारिका को उनके पति ने घर से निकाल दिया।

यह सवाल उठता है कि यदि सारिका के पति भूमिहार होते, तो क्या अब तक यह मामला राजद के नेताओं द्वारा राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना दिया गया होता? अभी चूँकि जाति वाली राजनीति में यह मामला फिट नहीं बैठ रहा, तो इसे पारिवारिक विवाद का हवाला देकर दबाने की कोशिश हो रही है। राजद को स्पष्ट करना चाहिए कि अपनी महिला नेता के घरेलू हिंसा की कथित पीड़िता होने पर उनका क्या स्टैंड है? पार्टी ने इस पूरे मामले पर चुप्पी क्यों साध रखी है?

यह विवाद समाज में जातीय ध्रुवीकरण और राजनीतिक रणनीतियों की गहरी जड़ों को उजागर करता है। क्या हमारी राजनीति और समाज वास्तव में प्रगतिशील दिशा में बढ़ रहे हैं, या फिर हम अभी भी जाति की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब राजद और बिहारी समाज दोनों को देना होगा।

हृदय से स्क्रीन तक की यात्रा

images-4.jpeg

राहुल चौधरी नील

संवेदना एक ऐसी भावना है जो हृदय की गहराइयों से उपजती है। यह किसी शब्द, प्रदर्शन या सार्वजनिक घोषणा की मोहताज नहीं। जब कोई अपना या अनजान दुख के साये में आता है, तब संवेदना मौन में, एक सच्चे स्पर्श में, या गहरी नजरों में व्यक्त होती है। यह चुप्पी शब्दों से अधिक कहती है। लेकिन आज, जब संवेदना सोशल मीडिया की चकाचौंध में सिमटने लगी है, उसका गहरापन खो रहा है।

ट्वीट, पोस्ट और स्टेटस के दौर में दुख एक प्रदर्शन बन गया है, खासकर भारतीय राजनीति में, जहां संवेदना अक्सर सच्ची भावना कम, छवि चमकाने का जरिया ज्यादा नजर आती है।

राजनीति में संवेदना कई बार औपचारिकता बनकर रह जाती है। नेताओं की पोस्ट, उनके शब्दों की सजावट, और टाइमिंग की जल्दबाजी—यह सब किसी गहरी पीड़ा का प्रतीक कम, बल्कि एक बनावटी छवि का हिस्सा ज्यादा लगता है। यह एक दौड़ है—कौन पहले शोक जताएगा, किसके शब्द सबसे मार्मिक होंगे। इसमें संवेदना की आत्मा गायब है; बाकी है तो बस दिखावा। आज दुख प्रकट करना एक सार्वजनिक जिम्मेदारी बन गया है। यदि इसमें देरी हो या शब्द कम पड़ जाएं, तो मानो अपराध हो गया।

यह विडंबना है कि इतनी अंतरंग भावना भी अब अपेक्षाओं के दबाव में कैद है। भारतीय परंपरा में दुख की साझेदारी मौन और आत्मीयता में होती थी। साथ बैठना, कंधे से कंधा मिलाना, उस दुख को जीना-यही संवेदना थी। न कैमरे थे, न शोर, फिर भी वह भावना पूरी तरह महसूस होती थी। लेकिन अब, जब सब कुछ स्क्रीन पर सिमट गया है, संवेदना भी उसी की वस्तु बन गई। हम एक-दूसरे के दुख के हिस्सेदार कम, दर्शक ज्यादा बन गए हैं।

यह सवाल परेशान करता है—क्या हम वास्तव में दुखी होते हैं, या बस दुखी दिखने की कोशिश करते हैं? अगर किसी के निधन पर हमारा पहला कदम कीबोर्ड या कैमरे की ओर जाता है, तो हमें सोचना होगा—क्या हमारी संवेदना जीवित है, या वह भी औपचारिक नकाब बन चुकी है? संवेदना कोई पोस्ट या घोषणा नहीं, बल्कि एक आत्मीय उपस्थिति है। वह चुपके से दुख में साथ देती है, बिना शब्दों के। बाकी सब शोर है। हमें फिर से सीखना होगा कि सच्ची संवेदना वही है जो हृदय से हृदय तक पहुंचे, न कि स्क्रीन से स्क्रीन तक।

आदित्य ओम: सिनेमा के जरिए समाज को आईना दिखाने वाला सितारा

2-1-1.png

अनिल पांडेय

यदि कोई सफल अभिनेता, निर्देशक, पटकथा लेखक और गीतकार साधारण वेश में ट्रेन में सफर करता, टैक्सी में जाता या सड़कों पर आम लोगों के बीच घूमता दिखे, तो शायद ही कोई यकीन करे कि यह कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि एक असाधारण व्यक्तित्व है। आदित्य ओम ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा, खासकर तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री में अपनी प्रतिभा और प्रयोगधर्मिता से एक खास मुकाम हासिल किया है। 40 से अधिक फिल्मों में मुख्य भूमिका निभाने वाले आदित्य की कई फिल्में सुपरहिट रही हैं। नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम पर उनकी दर्जनों फिल्में और वेब सीरीज उपलब्ध हैं, और उन्होंने ‘बिग बॉस तेलुगु’ में भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। लेकिन उनकी खासियत केवल सिनेमा तक सीमित नहीं है; वह एक समाजसेवी, विचारक और सच्चे अर्थों में जनसरोकारों से जुड़े इंसान हैं।

कई साल पहले की बात है, जब आदित्य ओम प्राथमिक शिक्षा के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे थे। एक मित्र के कहने पर मैं उनसे मिलने गया। लंबी बातचीत के दौरान मुझे अंदाज़ा नहीं था कि सामने वाला शख्स कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि तेलुगु सिनेमा का एक सशक्त हस्ताक्षर है। घर लौटकर जब मैंने गूगल पर उनके बारे में पढ़ा, तब जाकर उनकी असल पहचान का पता चला। यह मुलाकात मेरे लिए एक प्रेरणा थी। आदित्य ओम उन गिने-चुने लोगों में से हैं, जो सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी जमीन से जुड़े रहते हैं।

आदित्य की फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं; वे समाज के संवेदनशील मुद्दों को बेबाकी से उजागर करती हैं। उनकी फिल्मों का झुकाव हमेशा न्याय और समानता की ओर रहा है। वह ‘पॉलिटिकल करेक्टनेस’ के जाल में फंसने के बजाय समाज की असलियत को सामने लाने में विश्वास रखते हैं। उनकी नई फिल्म #संततुकाराम, जो 18 जुलाई 2025 को हिंदी में रिलीज हो रही है, उनके सिनेमाई सफर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह 17वीं सदी के मराठी संत तुकाराम पर बनी पहली हिंदी बायोपिक है। फिल्म समीक्षकों ने इसकी खूब प्रशंसा की है, हालांकि कुछ लोग केवल इसलिए इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह मराठी के बजाय हिंदी में बनी है। लेकिन आदित्य ओम हमेशा से रूढ़ियों को तोड़ने वाले रहे हैं। इस फिल्म में प्रोड्यूसर चेन्नई से, लीड एक्टर महाराष्ट्र से और निर्देशक आदित्य ओम खुद तेलुगु सिनेमा से हैं। यह सांस्कृतिक संगम उनकी प्रयोगधर्मिता का प्रतीक है।

संत तुकाराम धर्म, संस्कृति और आस्था को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करती है। फिल्म का संगीत अभंग परंपरा से प्रेरित है, जो शास्त्रीय और लोक संगीत का अनूठा मिश्रण है। खास बात यह है कि इसके गीत भी आदित्य ने खुद लिखे हैं। यह फिल्म हमें भक्तिकाल के उस दौर में ले जाती है, जब संत तुकाराम ने दलितों और निम्नवर्गीय समुदायों को यह समझाया कि वे भी ईश्वर के उतने ही प्रिय हैं, जितना कोई और। यह फिल्म न केवल तुकाराम के जीवन को दर्शाती है, बल्कि उनके द्वारा दलितों और वंचितों के लिए खोले गए आत्मसम्मान और भक्ति के मार्ग को भी रेखांकित करती है। इसका संगीत दर्शकों को आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर भक्तिभाव से भर देता है। यह फिल्म 18 जुलाई से पीवीआर सिनेमाघरों में देखी जा सकती है।

आदित्य ओम की फिल्में हमेशा से सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही हैं। उनकी फिल्म मास्साहब में प्राथमिक शिक्षा के महत्व को प्रभावशाली तरीके से दर्शाया गया है। इस फिल्म ने उन्हें एक सशक्त निर्देशक के रूप में स्थापित किया और इसे कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले। इसी तरह शूद्र और बंदूक जैसी फिल्में उनकी बहुआयामी प्रतिभा का सबूत हैं। मैला में उन्होंने बुंदेलखंड में मैला ढोने की कुप्रथा को उजागर किया, जो समाज के उस अंधेरे पहलू को सामने लाती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। दहनम एक ब्राह्मण पुजारी और डोम के बीच के संघर्ष को दर्शाती है, जो अंत में सामाजिक सौहार्द की ओर बढ़ता है। इस फिल्म में आदित्य ने पुजारी की यादगार भूमिका निभाई, जहां वह मंदिर की गद्दी एक डोम के पुत्र को सौंपते हैं। बंदी में उन्होंने एक हरे-भरे जंगल को कॉर्पोरेट के कब्जे से बचाने की जनजातियों की मार्मिक कहानी को बखूबी पेश किया।

आदित्य ओम का योगदान केवल सिनेमा तक सीमित नहीं है। उन्होंने तेलंगाना के कई गांवों को गोद लेकर उनकी तस्वीर बदली है। शिक्षा, वृक्षारोपण, डिजिटल जागरूकता और कोविड काल में लोगों की मदद जैसे कार्य उनके सामाजिक जुड़ाव को दर्शाते हैं। वह उन मुद्दों को अपनी फिल्मों में उठाते हैं, जिन्हें लोग घाटे का सौदा मानकर छोड़ देते हैं। संत तुकाराम भी ऐसा ही एक प्रयास है, जो हिंदी दर्शकों के लिए मराठी संत की कहानी को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।

आदित्य ओम का व्यक्तित्व और उनका सिनेमा दोनों ही प्रेरणादायक हैं। वह न केवल एक अभिनेता, निर्देशक, लेखक और गीतकार हैं, बल्कि एक समाजसेवी भी हैं, जो अपने काम से समाज में बदलाव लाने की कोशिश करते हैं। उनकी फिल्में हमें सोचने पर मजबूर करती हैं, सवाल उठाती हैं और एक बेहतर समाज की कल्पना को साकार करने की दिशा में प्रेरित करती हैं। संत तुकाराम देखना न केवल एक सिनेमाई अनुभव होगा, बल्कि यह हमें उस दौर में ले जाएगा, जब भक्ति और समानता के विचारों ने समाज को एक नई दिशा दी। आदित्य ओम जैसे सितारे सही मायनों में समाज के लिए एक प्रेरणा हैं, जो सिनेमा के जरिए न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि समाज को एक नया नजरिया भी देते हैं।

scroll to top