सूत्र, मूत्र और गोदी की गपशप

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पटना।  बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने जब ‘सूत्र को मूत्र’ कहकर चुनाव आयोग और टीवी न्यूज चैनलों पर तंज कसा, तो हंगामा मचना ही था। उनके इस बयान ने न सिर्फ सियासी गलियारों में हलचल मचाई, बल्कि पत्रकारों की दुनिया में भी तूफान खड़ा कर दिया। वरिष्ठ टीवी पत्रकार संजय सिन्हा ने इस मौके को लपकते हुए भड़ास फॉर मीडिया पर एक ऐसा लेख ठोका कि पढ़ने वाला हंसते-हंसते लोटपोट हो जाए। मैं संजय सिन्हा को निजी तौर पर नहीं जानता, लेकिन उनका ये लेख पढ़कर लगा कि किसी ने तो हिम्मत दिखाई और मीडिया की नब्ज को उलट-पुलट कर देख लिया। तो आइए, इस कहानी को मेरे अंदाज में, थोड़ा चुटीला, थोड़ा चटपटा, और बिल्कुल देसी ढंग से सुनाते हैं।

तेजस्वी यादव ने जब ‘सूत्र को मूत्र’ कहा, तो मानो उन्होंने पत्रकारों की पूरी जमात को एक ही तीर से निशाना बना लिया। उनका कहना था कि चुनाव आयोग ‘सूत्रों’ के हवाले से खबरें प्लांट करवाता है, ताकि सियासी खेल खेल सके। ये वही ‘सूत्र’ हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस्लामाबाद, लाहौर और कराची पर कब्जा कर लिया था—कम से कम खबरों में तो! तेजस्वी ने इन सूत्रों को ‘मूत्र’ यानी अपशिष्ट पदार्थ करार दिया, जो दुर्गंध फैलाता है। अब भाई, ये बात तो माननी पड़ेगी कि तेजस्वी का ये तंज बड़ा रसीला था, लेकिन इसने पत्रकारों की टोली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया।

संजय सिन्हा ने इस मौके को भुनाया और अपनी लेखनी से नेताओं और पत्रकारों के उस अनोखे रिश्ते को उधेड़ दिया, जो कभी गोदी में बैठकर अठखेलियां करता है, तो कभी पालने में झूलता है। उन्होंने लिखा कि कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं, जो नेताओं की गोद में बैठकर लड्डू खाते हैं। और सिर्फ तेजस्वी या लालू यादव ही नहीं, कई और नेता भी हैं, जो पत्रकारों को पालने में झुलाने के लिए मशहूर रहे हैं। लालू प्रसाद अलग हैं, क्योंकि वे पालने में झुलाने में नहीं, सीधा पत्रकारों को पालने में ही यकिन करते थे।

 नाम लेने की बात आई, तो संजय सिन्हा ने बिना हिचक कुछ नेताओं के नाम गिनाए, जिनके साथ पत्रकारों की खास ‘जुगलबंदी’ रही है। अब मजेदार बात ये है कि जो पत्रकार यूपीए की पिछली केंद्र सरकार में पालने में झूल रहे थे, वही आज “गोदी मीडिया” का राग अलापते फिर रहे हैं।

और मौजूदा सरकार? वो तो कुछ पत्रकारों को डिज्नी लैंड की सैर करा रही है, और ये पत्रकार बड़े गर्व से अपनी कहानियां सोशल मीडिया पर बांचते हैं। लेकिन संजय सिन्हा का कहना है कि 80-90% पत्रकार तो इस गोदी-पालने की दौड़ से कोसों दूर हैं। ये बेचारे बस अपना असाइनमेंट पूरा करने में जुटे रहते हैं। उनके सवालों को अगर कोई नेता सत्ता का सवाल समझकर नाक-भौं सिकोड़ ले, तो ये उनकी नासमझी है।

सवाल पूछना तो पत्रकार का धर्म है। अगर कोई नेता इन सवालों से चिढ़ जाता है, तो वो अपनी कमजोरी उजागर कर रहा है। संजय सिन्हा की मानें, तो ऐसे सवाल नेताओं के लिए सुनहरा मौका हैं। क्यों? क्योंकि जनता, जो विपक्ष के नरेटिव पर यकीन करती है, वो इन्हीं सवालों के जवाब सुनना चाहती है। अगर आप सवाल सुनकर भड़क गए, असंसदीय भाषा में ‘मूत्र’ जैसे शब्द उछालने लगे, तो जनता को लगता है, “अरे, इनकी दुखती रग तो यही है!” और अगर सवाल पसंद नहीं, तो थोड़ा व्यंग्य, थोड़ा हास्य, थोड़ी चतुराई से जवाब दो भाई! मूत्र-सूत्र की बहस में क्यों पड़ना?

नेता, चाहे सत्ता में हों या सत्ता से बाहर, उनका अहंकार तो बनता है। सत्ता में बैठे लोग सोचते हैं, “हम हैं तो सब कुछ है,” और जो बाहर हैं, वो कहते हैं, “हम फिर आएंगे और दिखा देंगे!” लेकिन पत्रकार? बेचारा पत्रकार तो सबसे निरीह प्राणी है। वो न तो सत्ता का हिस्सा है, न ही विपक्ष का, बस खबरों की दुनिया में भटकता रहता है। ऐसे में पत्रकारों को चाहिए कि वो उन लोगों का पर्दाफाश करें, जो ‘गोदी मीडिया’ का तमगा दूसरों को बांटते हैं। नाम लेकर, सबूत के साथ, उनकी कहानियां दुनिया के सामने लानी चाहिए। आखिर, सास भी कभी बहू थी, और गोदी में बैठने वाले भी कभी सवाल पूछने वाले निरीह पत्रकार ही थे और जो गोदी मीडिया का तमगा आज बांट रहे हैं, वे पिछली यूपीए की केन्द्र सरकार में अपने अपने नेताजी के गोद में बैठ कर मलाई खा रहे थे। माफ कीजिएगा कुछ पत्रकार नेताजी के खर्चे पर मटन, भात खा रहे थे और रेड लेबल पी रहे थे। उनकी कहानियों की पूरी श्रृंखल हो सकती है। कई की तो रिकॉर्डिंग सामने आ गई थी नीरा राडिया टेप में।

अब बात 80-90% पत्रकारों की। ये वो लोग हैं, जो न तो किसी की गोद में बैठते हैं, न ही किसी के पालने में झूलते हैं। ये बस अपनी ड्यूटी निभाते हैं-सवाल पूछते हैं, खबरें बनाते हैं, और सच को सामने लाने की कोशिश करते हैं। लेकिन नेताओं को लगता है कि हर सवाल उनके खिलाफ साजिश है। अरे भाई, अगर सवाल कड़वा है, तो जवाब में चाशनी डाल दो!

असंसदीय भाषा का सहारा लेकर आप सिर्फ अपनी कमजोरी दिखाते हैं। और हां, तेजस्वी के ‘मूत्र’ वाले बयान पर अगर हंगामा हो रहा है, तो इसमें पत्रकारों का क्या दोष? वो तो बस खबर दिखा रहे हैं।

संजय सिन्हा ने अपने लेख में एक जरूरी बात कही-पत्रकारों को चाहिए कि वो इस गोदी-पालने की गपशप को उजागर करें। जिन्होंने कभी गोद में बैठकर लड्डू खाए, वो आज दूसरों को गोदी मीडिया बता रहे हैं। ऐसे में सच को सामने लाना जरूरी है। और जो 80-90% पत्रकार इस दौड़ से बाहर हैं, उन्हें तो बस अपना काम ईमानदारी से करना है। बाकी, जो गोदी में हैं, वो आपस में निपट लें। जनता तो बस सच जानना चाहती है, और सच वही है, जो न तो गोद में बैठता है, न ही पालने में झूलता है। तो तेजस्वी जी, अगली बार सवाल आए, तो ‘मूत्र’ की जगह थोड़ा ‘अमृत’ बरसाइए। जनता को जवाब चाहिए, न कि तंज। 

‘तेजस्वी’ को पीछे कर राजद में नए चेहरों को सामने लाना होगा

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पटना। तेजस्वी यादव, बिहार की राजनीति में एक ऐसा नाम है, जो चर्चा और विवाद का केंद्र बना रहता है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी ने अपनी छवि एक युवा, ऊर्जावान नेता के रूप में बनाने की कोशिश की है। लेकिन उनके क्रिकेट और शिक्षा में असफलता, और परिवारवाद के आरोप उनके पीछे छाया की तरह लगे रहते हैं। सवाल उठता है कि क्या तेजस्वी बिहार के विकास का चक्का पंचर कर देंगे, या फिर वे वास्तव में बिहार को नई दिशा दे सकते हैं?

तेजस्वी का दावा है कि उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित डीपीएस, आरके पुरम में पढ़ाई छोड़ दी क्योंकि वे क्रिकेट में व्यस्त थे। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह दावा उनकी शैक्षणिक असफलता को छिपाने का बहाना मात्र है। बिहार के एक प्रभावशाली यादव परिवार से होने के बावजूद, जहां उनके माता-पिता लालू प्रसाद और राबड़ी देवी दोनों मुख्यमंत्री रहे, तेजस्वी का क्रिकेट करियर भी कोई खास कमाल नहीं दिखा सका। उनकी आलोचना इस बात को लेकर भी होती है कि उन्हें बिहार की राजनीति थाली में सजाकर मिली, बिना किसी बड़े संघर्ष के। लालू प्रसाद ने अपने बेटे को ही उत्तराधिकारी चुना, जबकि आरजेडी में कई अन्य प्रतिभाशाली युवा नेता मौजूद हैं। यह परिवारवाद का स्पष्ट उदाहरण माना जाता है, जिससे पार्टी की “पिछड़ों की राजनीति” वाली छवि धूमिल होती है।

बिहार की जनता को डर है कि तेजस्वी की अनुभवहीनता और नेतृत्व में कमी राज्य के विकास को नुकसान पहुंचा सकती है। बिहार, जो पहले ही आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है, को एक ऐसे नेता की जरूरत है जो विकास, शिक्षा, और रोजगार के क्षेत्र में ठोस कदम उठाए। लेकिन तेजस्वी के अब तक के प्रदर्शन को देखकर कई लोग संशय में हैं। उनकी रैलियों में जोश और युवा अपील तो दिखती है, लेकिन नीतिगत गहराई और दीर्घकालिक दृष्टिकोण का अभाव उनकी कमजोरी माना जाता है।

दूसरी ओर, आरजेडी के पास कई अन्य युवा नेता हैं, जो शायद अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। पार्टी को चाहिए कि वह परिवारवाद से ऊपर उठकर इन नेताओं को मौका दे। तेजस्वी को पीछे कर नए चेहरों को सामने लाने से न केवल पार्टी की छवि सुधरेगी, बल्कि बिहार के विकास को भी नई गति मिल सकती है। अंततः, यह बिहार की जनता का हक है कि उन्हें ऐसा नेतृत्व मिले, जो उनके सपनों को साकार करे, न कि विकास का चक्का पंचर कर दे।

युवा कलाकारों की नई पौध तैयार करने में जुटी हैं-रश्मि खन्ना

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भरतनाट्यम एक ऐसी कला है जो शिल्पकला, काव्य कला और नाट्य के अतिरिक्त अन्य कलाओं को भी अंगीकृत किए हुए है। यह एक पूर्ण कला है, जो हमारे जीवन का अविभाज्य अंग है। जब किसी इंसान में भावनात्मक उद्वेग जागृत होता है तो वह स्वतः ही उसके अंग-प्रत्यंगों से अभिव्यक्त होने लगता है। भाषा और गीत के जन्म से पहले मनुष्य को विभिन्न पशु-पक्षियों की ध्वनियां, उनका उछलना-कूदना, अपनी भावना के अनुरूप अच्छा लगता था। आनंदातिरेक में मनुष्य के कूदने और अव्यवस्थित तालियां बजाने से ही नृत्य और ताल के विधिवत् जन्म की नींव पड़ी। ऐसा महान कलाकार उदयशंकर मानते थे।

नृत्य सीखना और सिखाना दोनों आनंद की अनुभूति से गुजरना है। ऐसा भरतनाट्यम नृत्यांगना और गुरु रश्मि खन्ना मानती हैं। वह गुरु कल्याणी शेखर की शिष्या हैं, जिनके गुरु के एन दंडयुद्धपाणी पिल्लै रहे। गुरु रश्मि ने भरतनाट्यम के अलावा, लोकनृत्य, कथक और छऊ भी सीखा है। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य कला परिषद और दूरदर्शन की मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। रश्मि ने कर्नाटक संगीत की शिक्षा विजय लक्ष्मी कृष्णन और विद्वान जी इलंगोवन के सानिध्य में ग्रहण की है। नटुवंगम की बारीकियों को हेमंत लक्ष्मण से सीख रही हैं।

गुरु रश्मि मानती हैं कि कला की दुनिया में सीखना निरंतर चलता रहता है। वह कहती हैं कि मैं अपनी गुरु कल्याणी शेखर से बहुत प्रभावित रही। जब तक वह जीवित रहीं, मैं अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद हर वृहस्पतिवार उनके सान्निध्य में रह कर व्यतीत करती थी। मुझे उन्होंने बहुत ज्ञान दिया है। उसको संभाल कर पाऊं। वही मेरे लिए बहुत है। इनदिनों मैं गुरु गोविंदराजन पर शोधकार्य कर रही हूं। उन्होंने राजधानी दिल्ली में रहकर भरतनाट्यम नृत्य और कर्नाटक संगीत के क्षेत्र में अपूर्व योगदान दिया है। उन्होंने जी इलंगोवन, मैरी इलंगोवन और जी रघुरामन जैसे बहुत से कलाकारों को तैयार किया। अपने शोध के माध्यम से मैं उनको आज की पीढ़ी के सामने लाना चाहती हैं।

बहरहाल, राजधानी दिल्ली में उन्होंने अपने नृत्य संस्थान का नामकरण गुरु कल्याणी शेखर के नाम पर कल्याणी कला मंदिर रखा है। यह संस्थान पिछले पच्चीस सालों में लगभग दौ सौ प्रस्तुतियों का आयोजन कर चुका है। कल्याणी कला मंदिर में लगभग दो सौ छात्राएं भरतनाट्यम सीख रही हैं। अब तक गुरु रश्मि खन्न ने बीस छात्राओं को अरंगेत्रम के जरिए मंच प्रवेश की अनुमति प्रदान की है। इन प्रस्तुतियों में गुरु के एन दंडयुद्धपाणी पिल्लै, गुरु कल्याणी शेखर और गुरु रश्मि खन्न की नृत्य रचनाओं को पेश किया गया है। नृत्य समारोह में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरूल, तुलसीदास, संत कबीरदास, महाराजा स्वाति तिरूनाल आदि की रचनाओं पर आधारित प्रस्तुतियां दर्शकों को मोह लेती हैं।

गुरु रश्मि खन्ना ने एकल साधना के जरिए अपनी शिष्याओं को अरंगेत्रम के लिए तैयार किया है।

पिछले दिनों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित अरंगेत्रम समारोह में उनकी दो युवा शिष्याएं आद्या और श्रेशा ने नृत्य प्रस्तुत किया। उनकी युगल प्रस्तुति में प्रथम पुष्पांजलि थी। यह राग गंभीर नाटई और आदि ताल में निबद्ध थी। इसके अगले अंश में गणेश तांडव थी। मराठी अंभग रचना ‘तांडव नृत्य करि गजानन‘ राग हंसध्वनि और आदि ताल में निबद्ध थी। वरणम में वात्सल्य भाव का विवेचन था। इसमें परिवार के महत्व को पेश किया गया। रचना ‘नंदनंदन आरा रो इंदुड‘ राग आभोगी और आदि ताल में निबद्ध थी। संत दयानंद सरस्वती की रचना ‘भो शंभो स्वयंभो‘ पर आधारित अगली पेशकश थी। यह राग रेवती और आदि ताल में निबद्ध थी। गायक जी इलंगोवन रचित और संगीतबद्ध रचना पर आद्या और श्रेशी ने नृत्य में पिरोया। ‘राम मेरे राम, श्याम मेरे श्याम‘ को इलंगोवन ने राग पीलू का आधार लेकर गाया। अंतिम प्रस्तुति तिल्लाना थी। यह राग हिंदोलम में थी।

अरंगेत्रम समारोह में प्रस्तुत नृत्य रचनाओं की परिकल्पना गुरु कल्याणी शेखर और गुरु रश्मि खन्ना ने की थी। शिष्याएं आद्या और श्रेशा ने संुदर नृत्य पेश किया। उनका अंग संचालन, पैर संचालन, भाव भंगिमा उम्र और अनुभव के अनुकूल था। समय के साथ धीरे धीरे वह दोनों और परिपक्व होंगी।

कृति सेनन और कबीर बहिया की प्रेम कहानी

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मुम्बई। बॉलीवुड की चमक-दमक और ग्लैमर से भरी दुनिया में, जहां हर कदम पर कैमरे की नजरें होती हैं, कृति सेनन और कबीर बहिया की प्रेम कहानी ने हाल के दिनों में खूब सुर्खियां बटोरी हैं। कृति सेनन, एक जानी-मानी बॉलीवुड अभिनेत्री, जिन्होंने अपनी खूबसूरती, अभिनय और प्रोफेशनलिज्म से लाखों दिल जीते हैं, और कबीर बहिया, एक युवा, सफल और लंदन बेस्ड भारतीय बिजनेसमैन, की जोड़ी ने सोशल मीडिया और मीडिया में तहलका मचा रखा है। दोनों के रिश्ते की शुरुआत, उनकी मुलाकातें, और खासकर लंदन की सैर और लॉर्ड्स स्टेडियम की घटना ने इस प्रेम कहानी को एक नया आयाम दिया है। आइए, इस रोमांटिक कहानी को विस्तार से समझते हैं, जिसमें लॉर्ड्स स्टेडियम और लंदन यात्रा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

प्रेम कहानी की शुरुआत

कृति सेनन और कबीर बहिया की प्रेम कहानी की शुरुआत को लेकर कई अटकलें हैं, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि इस जोड़ी को कृति की छोटी बहन, नूपुर सेनन ने मिलवाया था। नूपुर, जो खुद एक अभिनेत्री हैं, और कबीर की दोस्ती ने इस रिश्ते की नींव रखी। दोनों को पहली बार 2024 की शुरुआत में दुबई में एक साथ देखा गया, जहां वे एक पार्टी में शामिल थे। इसके बाद, कृति और कबीर को कई मौकों पर एक साथ स्पॉट किया गया, जैसे लंदन की होली पार्टी, नया साल का सेलिब्रेशन, और ग्रीस में कृति के 34वें जन्मदिन का उत्सव। इन मौकों ने उनके रिश्ते की अफवाहों को और हवा दी।कृति सेनन, जो हमेशा अपनी निजी जिंदगी को लेकर बेहद निजी रही हैं, ने शुरू में इन अफवाहों को नजरअंदाज किया और खुद को “सिंगल” बताया। वहीं, कबीर, जो सोशल मीडिया पर अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर कम सक्रिय रहते हैं, ने भी अपने रिश्ते पर कोई टिप्पणी नहीं की। लेकिन जैसे-जैसे उनकी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे, यह साफ हो गया कि दोनों के बीच कुछ खास है।

मिस्ट्री मैन कबीर बहिया

कबीर बहिया, जिनका जन्म नवंबर 1999 में हुआ, एक 25 वर्षीय लंदन बेस्ड बिजनेसमैन हैं। वह एक अमीर भारतीय एनआरआई परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता, कुलजिंदर बहिया, यूके की मशहूर ट्रैवल एजेंसी साउथहॉल ट्रैवल के संस्थापक हैं, जिनकी नेट वर्थ 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार 427 मिलियन पाउंड (लगभग 3500 करोड़ रुपये) थी। कबीर स्वयं वर्ल्डवाइड एविएशन एंड टूरिज्म लिमिटेड के संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उन्होंने अपनी पढ़ाई इंग्लैंड के प्रतिष्ठित मिलफील्ड बोर्डिंग स्कूल से पूरी की और रीजेंट यूनिवर्सिटी, लंदन से बिजनेस, मैनेजमेंट और मार्केटिंग में डिग्री हासिल की।कबीर का क्रिकेट के प्रति प्रेम भी उनकी सोशल मीडिया प्रोफाइल से साफ झलकता है। वह स्कूल के दिनों में क्रिकेट खेला करते थे और भारतीय क्रिकेटरों, जैसे महेंद्र सिंह धोनी, हार्दिक पांड्या, ऋषभ पंत, और रोहित शर्मा के साथ उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखी जा सकती हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कबीर धोनी की पत्नी साक्षी के रिश्तेदार हैं, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

लंदन की सैर

कृति और कबीर की प्रेम कहानी में लंदन का एक खास स्थान है। 2024 में, कृति को लंदन की सड़कों पर एक “मिस्ट्री मैन” के साथ हाथ में हाथ डाले देखा गया, जिसे बाद में कबीर बहिया के रूप में पहचाना गया। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और प्रशंसकों ने इस जोड़ी की तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक यूजर ने लिखा, “कबीर बहिया काफी आकर्षक हैं, शाबाश कृति!” इस तस्वीर ने दोनों के रिश्ते की अटकलों को और मजबूत किया।लंदन में उनकी मुलाकातें और साथ बिताए पल प्रशंसकों के लिए रोमांच का विषय बन गए। 2024 में कृति के जन्मदिन के दौरान, दोनों को ग्रीस के मायकोनोस में एक साथ वेकेशन मनाते देखा गया। तस्वीरों में दोनों एक जैसा श्रग पहने हुए नजर आए, और कृति का एक वीडियो, जिसमें वह सिगरेट पीते हुए दिखीं, ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। हालांकि, कृति ने इस वीडियो पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन यह उनके प्रशंसकों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।

लॉर्ड्स स्टेडियम

कृति और कबीर की प्रेम कहानी का सबसे चर्चित क्षण 2025 में लॉर्ड्स स्टेडियम में आया, जब दोनों को भारत और इंग्लैंड के बीच तीसरे टेस्ट मैच के पांचवें दिन एक साथ देखा गया। यह पहली बार था जब कबीर ने कृति के साथ अपनी एक सेल्फी सार्वजनिक रूप से इंस्टाग्राम स्टोरी पर साझा की। इस तस्वीर में दोनों बेहद खुश और रिलैक्स नजर आ रहे थे, और पीछे लॉर्ड्स का ऐतिहासिक क्रिकेट ग्राउंड साफ दिखाई दे रहा था। कृति ने बेज रंग की स्लीवलेस जैकेट और कबीर ने सफेद टी-शर्ट के साथ बेज जिपर जैकेट पहनी थी। इस तस्वीर ने प्रशंसकों को उत्साहित कर दिया, और कई लोगों ने इसे उनके रिश्ते की “आधिकारिक पुष्टि” के रूप में देखा।लॉर्ड्स स्टेडियम की यह घटना इसलिए भी खास थी क्योंकि यह पहली बार था जब कबीर ने कृति के साथ अपनी तस्वीर को इतने खुले तौर पर साझा किया। इससे पहले, दोनों को कई बार एक साथ देखा गया था, लेकिन कबीर की यह स्टोरी एक तरह से उनके रिश्ते को स्वीकार करने का संकेत माना गया। सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ प्रशंसकों ने लिखा, “कृति और कबीर की जोड़ी परफेक्ट है!” जबकि कुछ ने उनकी उम्र के अंतर (कृति 34 और कबीर 25) पर टिप्पणी की।लॉर्ड्स में बिताए इन पलों ने न केवल उनके रिश्ते को सुर्खियों में ला दिया, बल्कि यह भी दिखाया कि दोनों अपने रिश्ते को अब छुपाने के मूड में नहीं हैं। कबीर ने स्टेडियम से कई तस्वीरें और वीडियो साझा किए, जिसमें उनकी क्रिकेट के प्रति दीवानगी और कृति के साथ उनकी केमिस्ट्री साफ झलक रही थी।

रिश्ते की अफवाहें और शादी की अटकलें

कृति और कबीर के रिश्ते को लेकर चर्चाएं तब और तेज हो गईं जब 2025 की शुरुआत में कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने दावा किया कि दोनों इस साल शादी की योजना बना रहे हैं। फरवरी 2025 में, दोनों को मुंबई एयरपोर्ट पर एक साथ देखा गया, जहां वे कथित तौर पर कबीर के माता-पिता से मिलने दिल्ली जा रहे थे। इस दौरान कृति ने मास्क और काला चश्मा पहनकर अपनी पहचान छुपाने की कोशिश की, लेकिन उनकी और कबीर की तस्वीरों ने प्रशंसकों का ध्यान खींच लिया।कृति ने एक इंटरव्यू में शादी की अफवाहों को “बेहद परेशान करने वाला” बताते हुए खारिज किया, लेकिन उनकी और कबीर की नजदीकियां इन अटकलों को कम करने में नाकाम रहीं। दोनों को दीवाली पार्टियों, फैमिली गैदरिंग्स, और वेकेशन्स पर एक साथ देखा गया, जिसने उनके रिश्ते को और मजबूत करने का संकेत दिया।

प्रोफेशनल फ्रंट और निजी जिंदगी

कृति सेनन ने बॉलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। उनकी हालिया फिल्में जैसे क्रू, तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया, और दो पत्ती (जिसे उन्होंने प्रोड्यूस भी किया) ने उनकी प्रतिभा को और उजागर किया है। वह जल्द ही आनंद एल राय की फिल्म तेरे इश्क में में धनुष के साथ नजर आएंगी, जो नवंबर 2025 में रिलीज होने वाली है।कृति ने हमेशा अपनी निजी और प्रोफेशनल लाइफ को अलग रखने की कोशिश की है, लेकिन कबीर के साथ उनकी तस्वीरें और सार्वजनिक उपस्थिति ने उनकी निजी जिंदगी को सुर्खियों में ला दिया। फिर भी, वह अपनी प्रोफेशनल प्रतिबद्धताओं को बखूबी निभा रही हैं, और उनकी यह खासियत प्रशंसकों को और आकर्षित करती है।

एक आधुनिक प्रेम कहानीकृति सेनन और कबीर बहिया की प्रेम कहानी एक आधुनिक रोमांस की मिसाल है, जहां दो अलग-अलग दुनिया के लोग एक-दूसरे के करीब आए। लंदन की सड़कों से लेकर लॉर्ड्स स्टेडियम तक, उनकी कहानी ने प्रशंसकों को रोमांचित किया है। हालांकि दोनों ने अपने रिश्ते को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है, लेकिन उनकी तस्वीरें, साथ बिताए पल, और कबीर की इंस्टाग्राम स्टोरी इस बात का प्रमाण हैं कि यह जोड़ी एक-दूसरे के साथ बेहद खुश है। भविष्य में क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन फिलहाल कृति और कबीर की यह प्रेम कहानी बॉलीवुड की सबसे चर्चित कहानियों में से एक है।

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