Congress Must Confront Its Blunders: A Stern Call to Reform Before Bihar 2025

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Patna – As the Bihar Assembly Elections 2025 approach, the Congress party, under Rahul Gandhi’s leadership, stands at a perilous crossroads. Its reckless attacks on the Election Commission and alignment with the Rashtriya Janata Dal’s (RJD) inflammatory tactics threaten to dismantle its credibility and undermine India’s democratic framework.

Undermining Democracy with Baseless Claims
Rahul Gandhi’s recent assault on the Election Commission, branding its commissioners as “agents of the BJP,” is a shameful low. Wielding the Constitution as a prop, he accused the Commission of conspiring to enable “vote theft” in Bihar’s Special Intensive Revision (SIR) of voter lists. His 16-day “Voter Rights Yatra” across 23 districts, billed as a defense of democracy, is a thinly veiled attempt to mask Congress’s frustration from repeated defeats. The Chief Election Commissioner, Gyanesh Kumar, on August 17, 2025, dismissed these allegations as baseless, affirming that the SIR aims to purify voter lists and that all parties had opportunities to review them. Gandhi’s refusal to submit an affidavit with evidence, hiding behind a vague “oath to the Constitution,” exposes his unwillingness to engage in good faith.

Derogatory Rhetoric and Lost Credibility
The opposition’s language has plummeted to new depths. An RJD spokesperson’s use of terms like “luckiness,” “shit,” and “impudence” against the Election Commission during a TV debate was rightly rebuked by the host as “unnecessary.” Such crassness, coupled with Congress’s silence, reflects a culture of disrespect that erodes public trust. The repeated cry of “vote theft” is a desperate tactic, echoing failed slogans like “Chowkidar Chor” and “EVM tampering.” Congress’s history of booth capturing during the ballot era makes its current accusations hypocritical. Bihar Minister Neeraj Singh Bablu rightly noted that these parties are defaming constitutional bodies to deflect their failures, while Union Minister Prataprao Jadhav attributed Gandhi’s attacks to fear of defeat.

The Role of External Agitators
Suspicion surrounds certain YouTubers and NGOs amplifying the “vote theft” narrative. With foreign funding restricted under the Foreign Contribution (Regulation) Act, these groups appear to be aligning with Gandhi’s campaign, possibly eyeing the 2029 Lok Sabha elections as a decisive battle. At 55, Gandhi faces a narrowing window—59 in 2029, 64 in 2034—to secure power. Analysts suggest a strategy to divide Hindu voters and consolidate Muslim-Christian support, using electoral controversies to sow chaos. Congress must disavow these divisive tactics and focus on constructive governance.

Media’s Role in Spreading Misinformation
The media’s complicity in this saga cannot be ignored. Many anchors, ignorant of the distinction between the Criminal Penal Code and election laws, amplify the opposition’s narrative through uninformed debates. This misinformation misleads the public and weakens democratic discourse. Congress, claiming to champion constitutional values, must demand accountability from these platforms instead of exploiting their ignorance.

A History of Electoral Malpractice
Congress and RJD’s accusations ring hollow given their past. The “fodder theft” and “booth loot” scandals of their era in Bihar remain fresh in public memory. The Election Commission’s transparent, technology-driven processes have rendered such malpractices obsolete, yet the opposition cannot accept defeat gracefully. The Commission’s call for formal complaints has been met with street protests, not evidence, revealing a strategy rooted in chaos, not democracy.

A Call for Urgent Reform
Congress stands at a precipice. Its leadership must retract its baseless allegations, discipline allies like RJD, and engage with the Election Commission through legal channels. The party’s failure to heed its ground-level workers, who collaborate with the Commission on voter list revisions, exposes a disconnect that must be bridged. Rahul Gandhi’s refusal to present evidence undermines his claim to protect the Constitution he so publicly venerates.

The voters of Bihar, aware of Congress and RJD’s tainted history, are unlikely to be swayed by this rhetoric. The Election Commission’s impartiality is sacrosanct, and attempts to tarnish it threaten the democratic fabric. Congress must act decisively: purge divisive elements, abandon inflammatory slogans, and offer a vision that respects India’s institutions. Failure to do so will cement its irrelevance in Bihar 2025 and beyond.

The Verdict Lies with the Electorate
The people of Bihar hold the power to reject this politics of desperation. They must remain vigilant against misleading narratives and uphold the sanctity of their vote. Congress has one last chance to reform—acknowledge its mistakes, restore dignity to its discourse, and realign with democratic principles. The clock is ticking, and the electorate will deliver its judgment. The time for reckoning is now.

बिहार में ‘वोट चोरी’ के आरोप और राजद-कांग्रेस की अराजक रणनीति

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पटना: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सियासी माहौल गरमाया हुआ है। विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (राजद), चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाकर एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इन दलों के नेताओं और प्रवक्ताओं की ओर से संवैधानिक संस्था के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही भाषा और रवैये ने न केवल लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुंचाई है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या ये दल अपनी बार-बार की हार से बौखलाकर अराजकता फैलाने की साजिश रच रहे हैं?

‘वोट चोरी’ का शोर और भाषा की मर्यादा का हनन
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद नेता तेजस्वी यादव ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी ने इसे ‘वोट चोरी’ की साजिश करार देते हुए कहा कि आयोग भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मिलकर बिहार में चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने अपनी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की, जो 16 दिनों तक बिहार के 23 जिलों में चलेगी। इस यात्रा को उन्होंने ‘लोकतंत्र और संविधान की रक्षा’ की लड़ाई बताया, लेकिन उनकी भाषा और उनके समर्थकों के बयानों ने संवैधानिक संस्था की मर्यादा को तार-तार कर दिया।

हाल ही में एक टीवी डिबेट शो में राजद की एक युवा प्रवक्ता ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘लुच्चपना’, ‘कमीनगी’, और ‘ढीठाई’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। इन शब्दों को शो के होस्ट संदीप चौधरी ने भी ‘गैर-जरूरी’ करार दिया। राजद प्रवक्ता की इस भाषा ने न केवल उनकी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया, बल्कि यह भी सवाल उठाया कि क्या राजद अपने प्रवक्ताओं को चुनते समय भाषाई मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखता? इस प्रवक्ता की ओर से बार-बार ‘वोट चोर’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल और वरिष्ठ नेताओं के प्रति असम्मानजनक रवैया राजद की संस्कृति को उजागर करता है।

चुनाव आयोग का जवाब और विपक्ष की बौखलाहट
चुनाव आयोग ने इन आरोपों का कड़ा जवाब दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 17 अगस्त 2025 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ‘वोट चोरी’ के आरोप निराधार हैं और आयोग सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार करता है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में गलतियों को ठीक करने का मौका सभी दलों को दिया गया था, लेकिन विपक्ष ने समय रहते इसकी जांच नहीं की। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, न कि किसी की वोटिंग ताकत को कम करना।

चुनाव आयोग ने राहुल गांधी से उनके आरोपों को औपचारिक रूप से हलफनामे के साथ पेश करने को कहा, लेकिन राहुल ने इसे खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने पहले ही संविधान की शपथ ली है। इस रवैये को आयोग ने ‘गंदे शब्दों’ के जरिए झूठी कहानी गढ़ने की कोशिश करार दिया।विपक्ष की यह रणनीति उनकी बार-बार की हार से उपजी हताशा को दर्शाती है। चौकीदार चोर’ से लेकर ‘ईवीएम गड़बड़ी’ तक के उनके पुराने शगूफों को जनता ने ठुकरा दिया था। अब ‘वोट चोरी’ का नया नारा उनकी बौखलाहट का सबूत है। बिहार के मंत्री नीरज सिंह बबलू ने कांग्रेस और राजद पर भ्रम फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि ये दल अपनी हार को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम कर रहे हैं।

बूथ लूट से वोट चोरी तक: विपक्ष का इतिहास
यह विडंबना ही है कि जिन दलों ने मतपत्र के दौर में बूथ लूटने की कुख्याति हासिल की थी, वे आज ‘वोट चोरी’ का आरोप लगा रहे हैं। राजद और कांग्रेस का इतिहास बिहार में बूथ कैप्चरिंग और चुनावी अनियमितताओं से भरा पड़ा है। अब जब चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत हो चुकी है, तब ये दल अपनी हार को पचा नहीं पा रहे। केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि राहुल गांधी को बिहार चुनाव में हार का डर सता रहा है, इसलिए वे आयोग पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।

अराजकता की साजिश और एनजीओ का खेल
बिहार में ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को हवा देने में कुछ यूट्यूबर्स और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका भी संदिग्ध है। विदेशी फंडिंग पर प्रतिबंध और विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के तहत सख्ती ने कई एनजीओ को बौखला दिया है। ये संगठन, जो पहले विदेशी फंड के जरिए अपनी गतिविधियां चलाते थे, अब मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ये समूह 2029 के लोकसभा चुनाव को ‘अंतिम लड़ाई’ मानकर 2025 से ही राहुल गांधी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

राहुल गांधी, जो अब 55 वर्ष के हैं, 2029 में 59 वर्ष के होंगे। यदि तब भी उन्हें सत्ता नहीं मिली, तो 2034 में वे 64 वर्ष के होंगे। विपक्ष को लगता है कि मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मजबूत नेटवर्क को बहुमत से हराना असंभव है। इसलिए, वे हिंदू समाज को बांटने और मुस्लिम-ईसाई वोटों को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। साथ ही, ‘वोट चोरी’ जैसे शब्दों के जरिए वे चुनावी प्रक्रिया को ही विवादित बनाकर अराजकता का माहौल बना रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का चरित्र ही समाज में उसका विश्वास है – मुनिश्री 108 प्रमाण सागर जी

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लोकेन्द्र सिंह

भोपाल: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भोपाल विभाग द्वारा विद्यासागर कॉलेज, अवधपुरी में आयोजित कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम में जैन मुनिश्री 108 श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने स्वयंसेवकों एवं उनके परिवारों को संबोधित करते हुए कहा कि शुद्ध जीवन ही शक्तिशाली समाज और अखंड राष्ट्र की नींव है। मुनिश्री ने संघ की कार्यपद्धति की प्रशंसा करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हमेशा चरित्र, अनुशासन और समाज जीवन में नैतिकता पर बल दिया है। शताब्दी वर्ष में संघ द्वारा चलाए जा रहे कुटुंब प्रबोधन अभियान का उद्देश्य हर घर में विश्वास, पारदर्शिता और मूल्य आधारित जीवन का पुनर्निर्माण करना है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में सामाजिक जीवन के पुनर्निर्माण पर बल देते हुए मुनि श्री ने कहा कि शुद्ध जीवन ही पंच परिवर्तन का आधार है। साथ ही स्पष्ट किया कि संघ द्वारा चलाया जा रहा पंच परिवर्तन अभियान व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र जीवन में नैतिकता, अनुशासन और करुणा जैसे मूल्यों को स्थापित करने का मार्ग है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का चरित्र ही उसके विश्वास का आधार है।

परिवार और समाज में शुद्धता के महत्व पर मुनिश्री ने कहा कि “समाज की नींव व्यक्ति है और व्यक्ति की नींव जीवन है। यदि जीवन शुद्ध है तो व्यक्ति सशक्त होगा। यदि व्यक्ति सशक्त होगा तो समाज सशक्त होगा। अतः शुद्ध जीवन ही शक्तिशाली समाज का आधार है।”

उन्होंने चेताया कि आज परिवार टूट रहे हैं क्योंकि रिश्तों में विश्वास और पारदर्शिता घट रही है। आज परिवार टूट रहे हैं, क्योंकि लोग एक-दूसरे को विश्वास की दृष्टि से नहीं देखते। आपसी संदेह बढ़ने से पति-पत्नी के संबंध भी महज़ औपचारिक होते जा रहे हैं, क्योंकि रिश्तों में पारदर्शिता और शुद्धता का अभाव है।

मुनि श्री ने अपने आशीर्वचन में कहा कि सच्चाई और नैतिकता जीवन की रीढ़ हैं, करुणा और सहयोग हमारे जीवन का रक्त हैं। अनुशासन और संयम हमारी साँसें हैं। धर्म तथा मूल्य हमारी आत्मा हैं। आत्मबोध को आवश्यक बताते हुए कहा कि जीवन को शुद्ध बनाने के लिए आत्मबोध अत्यंत आवश्यक है। आत्मबोध के अभाव में जो कुछ भी होगा, वह मात्र सतही ही होगा।

मन, चरित्र और शक्ति के संबंध पर बताते हुए बोले कि अगर हमने मन को साध लिया तो यह मोक्ष का द्वार है, अगर हम मन के बस में हो गए तो यह नरक का द्वार है। उन्होंने मन की पवित्रता का उदाहरण देते हुए कहा कि मन गंगा जल की तरह पवित्र है, किंतु इसमें तरह-तरह की गंदगियाँ घुलती जा रही हैं, जिससे यह समाज दूषित हो गया है। समाज में दूषित मन और दूषित जल की कोई उपयोगिता नहीं होती।

चरित्र निर्माण पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन शुद्ध होगा तो व्यक्ति का चरित्र मजबूत होगा। चरित्र मजबूत होगा तो विश्वास जन्मेगा। विश्वास से एकता जागेगी और जब एकता होगी तो शक्ति प्रकट होगी।

मुनिश्री ने कहा कि भारत ने हमेशा “वसुधैव कुटुम्बकम” का संदेश दिया है। लेकिन आज परिवार विखंडित हो रहे हैं और पश्चिमी जीवनशैली बढ़ रही है। इस स्थिति से समाज और राष्ट्र दोनों कमजोर होते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि हर भारतीय को अपनी संस्कृति, भाषा और भोजन पद्धति के संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए।

अंत में मुनि श्री ने कहा कि परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति से ही होती है। यदि हम अपने जीवन में आत्मबोध, सच्चाई, नैतिकता, करुणा और अनुशासन को अपनाएंगे तो परिवार मजबूत होंगे, समाज सशक्त होगा और राष्ट्र अखंड बनेगा। स्वागत उद्बोधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत सह संघचालक श्री राजेश सेठी जी ने दिया और मुनि श्री का स्वागत विभाग संघचालक श्री सोमकांत उमालकर जी ने किया। कार्यक्रम का समापन प्रार्थना के साथ हुआ।

102 साल के लेखक को अंजुरी भर प्रणाम !

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दयानंद पांडेय

गोरखपुर : लगभग सभी विधाओं में निरंतर लिखते रहने वाले रामदरश मिश्र आज 102 वें वर्ष में प्रवेश कर गए। यह सौ साल जीने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिल पाता है। ख़ास कर एक हिंदी लेखक को। दिलचस्प यह है कि इस उम्र में भी न सिर्फ़ देह और मन से पूरी तरह स्वस्थ हैं बल्कि रचनाशील भी हैं। रामदरश मिश्र की इस वर्ष भी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं। उन की याददाश्त के भी क्या कहने। नया-पुराना सब कुछ उन्हें याद है। जस का तस। अभी जब उन से फ़ोन पर बात हुई और उन्हें बधाई दी तो वह गदगद हो गए। वह किसी शिशु की तरह चहक उठे। भाव-विभोर हो गए। उन की आत्मीयता में मैं भीग गया। कहने लगे आप की याद हमेशा आती रहती है। चर्चा होती रहती है। कथा-लखनऊ के बारे में भी बहुत चर्चा करते रहते थे। एक प्रकाशक से विवाद के कारण भी वह चर्चा करते थे। बाद में उस प्रकाशक ने उन्हें भी आख़िर ठगा और उन के साथ बदसलूकी भी की।

जब कथा-गोरखपुर की तैयारी कर रहा था तब उन्हों ने अपनी कहानी तो न सिर्फ़ एक बार के कहे पर ही भेज दी बल्कि गोरखपुर के कई पुराने कथाकारों का नाम और कहानी का विवरण भी लिख कर वाट्सअप पर भेजा। वह कोरोना की पीड़ा के दिन थे। पर वह सक्रिय थे। चार वर्ष पहले दिसंबर , 2018 में वह लखनऊ आए थे। उन के चर्चित उपन्यास जल टूटता हुआ पर आधारित भोजपुरी में बन रही फिल्म कुंजू बिरजू का मुहूर्त था। उस कार्यक्रम में रामदरश जी ने बड़े मान और स्नेह से मुझे न सिर्फ़ बुलाया बल्कि उस का मुहूर्त भी मुझ से करवाया। रामदरश जी को जब उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का शीर्ष सम्मान भारत भारती मिला तो मुझे भी लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर प्रेमचंद सम्मान मिला था। वह बहुत प्रसन्न थे। मंच पर खड़े-खड़े ही कहने लगे अपने माटी के दू-दू जने के एक साथ सम्मान मिलल बा। यह उन का बड़प्पन था। संयोग ही है कि रामदरश मिश्र के बड़े भाई रामनवल मिश्र के साथ भी मुझे कविता पाठ का अवसर बार-बार मिला है , गोरखपुर में।

गोरखपुर में उन का गांव डुमरी हमारे गांव बैदौली से थोड़ी ही दूर पर है। इस नाते भी उन का स्नेह मुझे और ज़्यादा मिलता है। उन की आत्मकथा में , उन की रचनाओं में उन का गांव और जवार सर्वदा उपस्थित मिलता रहता है। कोई चालीस साल से अधिक समय से उन के स्नेह का भागीदार हूं। साहित्य अकादमी उन्हें वर्ष 2015 में मिला। सरस्वती सम्मान इसी वर्ष मिला है। उम्र के इस मोड़ पर यह सम्मान मिलना मुश्किल में डालता है। यह सारे सम्मान रामदरश मिश्र को बहुत पहले मिल जाने चाहिए थे। असल बात यह है कि हिंदी की फ़ासिस्ट और तानाशाह आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं । लेकिन रचना और रचनाकार नहीं मरते हैं। मर जाती है फ़ासिस्ट आलोचना। मर जाते हैं फ़ासिस्ट लेखक। बच जाते हैं रामदरश मिश्र। रचा ही बचा रह जाता है। रामदरश मिश्र ने यह ख़ूब साबित किया है। बार-बार किया है।

उन की पत्नी सरस्वती जी का दो बरस पहले जब स्वर्गवास हुआ तो पता चलने पर फ़ोन किया। कहने लगे , अच्छा हुआ चली गईं। उन का कष्ट अब देखा नहीं जा रहा था। अभी पिछले महीने ही साहित्य अकादमी , दिल्ली में उन से भेंट हुई तो सर्वदा की तरह धधा कर मिले। साहित्य अकादमी ने उन के सौ बरस का होने पर एक संगोष्ठी आयोजित की थी। जिस में वह सपरिवार पधारे थे। बिलकुल चेतन और स्वास्थ्य संपन्न। भाषण भी दिया। ऐसे बोलते रहे , सब से मिले रहे गोया वह सौ बरस के नहीं , अस्सी के आसपास ही हों। ललक युवाओं जैसी। अनेक लेखकों के जन्म-शताब्दी कार्यक्रमों में शरीक़ होने का सौभाग्य मिला है। पर उस दिन एक जीवित लेखक रामदरश मिश्र के जन्म-शताब्दी संगोष्ठी में शिरकत करने का सौभाग्य मिला। रामदरश मिश्र जी हमारे ज़िले गोरखपुर के हैं। उन का गांव और हमारा गांव भी आसपास है। इस लिए भी वह मुझे सर्वदा से स्नेह करते हैं। साहित्य अकादमी , दिल्ली द्वारा आयोजित जनशताब्दी संगोष्ठी में भी वह हमेशा की तरह मुझ से धधा कर मिले। ऐसे लगा , जैसे वह क्या पा गए हैं। मिल तो वह हर किसी से रहे थे पर उन के सबल हाथ मेरे कंधे पर अनायास आ गए। मन मगन हो गया , उन के इस स्नेह से।

उन को सुनना भी बहुत सुखद था। तीन अलग-अलग सत्र में साहित्य अकादमी ने रामदरश मिश्र की कथा , कविता और कथेतर गद्य पर चर्चा आयोजित की थी। पूरा दिन साहित्य अकादमी परिसर रामदरश मिश्र मय रहा। शतायु तो हो ही गए हैं , रामदरश जी , स्वस्थ भी बहुत हैं और प्रसन्न भी ख़ूब। और क्या चाहिए भला ! लगता है कम से कम दस बरस वह और जिएंगे। आज भी जब उन से बात हुई , बधाई दी तो उन की प्रसन्नता का पारावार न था। मुदित थे , मगन थे और पुलकित भी।

सोचिए कि रामदरश मिश्र और नामवर सिंह हमउम्र हैं। न सिर्फ़ हमउम्र बल्कि रामदरश मिश्र और नामवर सहपाठी भी हैं और सहकर्मी भी। दोनों ही आचार्य हजारी प्रसाद के शिष्य हैं। बी एच यू में साथ पढ़े और साथ पढ़ाए भी। एक ही साथ दोनों की नियुक्ति हुई। रामदरश मिश्र कथा और कविता में एक साथ सक्रिय रहे हैं। पर नामवर ने अपनी आलोचना में कभी रामदरश मिश्र का नाम भी नहीं मिला। जब कि अपनी आत्मकथा अपने लोग में रामदरश मिश्र ने बड़ी आत्मीयता से नामवर को याद किया है। नामवर सिंह की आलोचना की अध्यापन की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। बहुत सी नई बातें नामवर की बताई हैं। सर्वदा साफ और सत्य बोलने वाले रामदरश मिश्र को उन की ही एक ग़ज़ल के साथ जन्म-दिन की कोटिश: बधाई !

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।

जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।

न हँस कर न रोकर किसी में उडे़ला,
पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे।

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया,
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे।

ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।

मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।

— डॉ. रामदरश मिश्र

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