सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लक्ष्मी बाई केलकर का जन्म

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राष्ट्रसेविका समिति की संस्थापक भी

भारतीय स्वाधीनता संघर्ष की सफलता में उस भावना की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसने समाज में स्वत्व का वोध कराया । यदि हम केवल आधुनिक संघर्ष का ही स्मरण करें तो हम पायेंगे कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा केशव हेडगेवार तक ऐसे असंख्य हुतात्माएं हुईं हैं जिन्होंने दोहरा संघर्ष किया । एक तो भारत की स्वाधीनता संघर्ष केलिये सेनानी तैयार किये और दूसरा समाज में स्वत्व और सांस्कृतिक जागरण का अभियान चलाया। लक्ष्मीबाई केलकर ऐसी ही एक महाविभूति थीं जिनका पूरा जीवन भारत राष्ट्र, समाज और सांस्कृतिक जागरण के लिये समर्पित रहा।

लक्ष्मी बाई केलकर का जन्म 6 जुलाई 1905 को नागपुर में हुआ था । उनके पिता दातेजी लोकमान्य तिलक जी के अनुयायी थे। इस नाते परिवार में राष्ट्र और सांस्कृतिक जागरण का वातावरण था, लक्ष्मीबाई इसी के बीच बड़ी हुईं । उनके बचपन का नाम कमल दाते था लेकिन विवाह के बाद वे लक्ष्मी बाई केलकर बनीं और वर्धा आ गईं । उनका विवाह चौदह वर्ष की आयु में विदर्भ के सुप्रसिद्ध अधिवक्ता पुरुषोत्तम राव केलकर से हुआ था । पुरुषोत्तम जी विदुर थे यह उनका दूसरा विवाह था । दोनों की आयु में अंतर भी था, लक्ष्मी बाई की आयु भले अभी कम थी पर वे मानसिक और बौद्धिक रूप से परिपक्व हो रहीं थीं । विवाह के बाद उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी और पति के साथ समाजसेवा के कार्यो में भी सहभागी बनीं । यह वह काल-खंड था जब स्वाधीनता के लिये अहिसंक आँदोलन पूरे देश में प्रभावी हो रहा था । यह संयोग ही था कि लक्ष्मी बाई के मायके का दाते परिवार और ससुराल का केलकर परिवार दोनों इन गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर भाग ले रहे थे । पूरा विदर्भ मानों इन अभियानों का हिस्सा था यही कारण था कि 1923 के झंडा सत्याग्रह का सर्वाधिक प्रभाव पुणे से लेकर विदर्भ तक रहा था । यह इस आँदोलन की व्यापकता का ही प्रभाव था कि आगे चलकर गाँधी जी ने नागपुर के समीप वर्धा को अपना एक प्रमुख केन्द्र बनाया। अधिवक्ता पुरुषोत्तम राव केलकर अपनी पत्नि लक्ष्मी बाई के साथ इन सभी गतिविधियों में हिस्सा लेते । गाँधीजी और तत्कालीन आंदोलनों का कितना प्रभाव इस परिवार पर था इसका अनुमान इसी बात से ही लगाया जा सकता है कि लक्ष्मी बाई ने अपने घर में एक चरखा केन्द्र स्थापित कर लिया था। वे सामाजिक जागरण के लिये तीन काम करतीं थीं। एक तो महिलाओं में चरखे के माध्यम से स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की प्रेरणा देतीं, दूसरा भारतीय वाड्मय के उदाहरणों से सामाजिक समरसता का वातावरण बनातीं थीं और तीसरा राम चरित्र मानस के प्रवचन से साँस्कृतिक एवं सामाजिक मूल्यों की स्थापना के संस्कार दे रहीं थीं। इसके लिये उन्होंने अपने घर में महिला कार्यकर्ताओं की टोली बनाई थी। जिसमें विशेषकर अनुसूचित समाज के बंधुओ को सहयोगी के रूप जोड़ा था। वे मानतीं थीं कि राष्ट्र की स्वायत्तता ही सर्वोपरि है। यदि राष्ट्र पराधीन है तो समाज कैसे स्वाधीन बनेगा। वे अक्सर गाँधीजी के वर्धा आश्रम भी जातीं थीं। एक बार गाँधीजी ने एक सभा में दान की आव्हान किया तो लक्ष्मीबाई केलकर ने उसी क्षण अपने गले से सोने की चैन उतारकर गाँधी जी को समर्पित कर दी थी ।
उनका वैवाहिक जीवन अधिक न चल सका। 1932 मे पति का देहान्त हो गया। तब वे मात्र 27 वर्ष की ही थीं। अब उनके पास दोहरा दायित्व आ गया था। परिवार और समाज दोनों का। उनकी एक विधवा नंद भी उनके रहतीं थीं । लक्ष्मीबाई ने अपने बच्चों के साथ उन्हें भी सहेजा । लक्ष्मीबाई ने अपनी आवश्यकताएं सीमित कीं पर न बच्चों का शिक्षण रोका और न अपनी सामाजिक गतिविधियाँ कम कीं। उन्होंने अपने घर का कुछ हिस्सा किराये पर उठाया इससे भी कुछ लाभ हुआ । अपनी सामाजिक सक्रियता के चलते वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा केशव हेडगेवार के संपर्क में आयीं। उन्होंने नमक सत्याग्रह में भी भाग हिस्सा लिया किंतु डा हेडगेवार की सलाह पर जेल नहीं गईं और बाहर रहकर सामाजिक जागरण एवं स्वतंत्रता आँदोलन के लिये टोली तैयार करने का काम यथावत रखा। यह काम वे पहले भी कर रहीं थीं जो अब और तेज कर दिया। उनके द्वारा तैयार टोलियों ने विदर्भ में चलने वाले हर आँदोलन में लिया । महिलाएं कीर्तन करते हुये प्रभात फेरी निकालतीं चरखा और खादी का संदेश देतीं थीं । उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ संस्थापक डा हेडगेवार की सलाह पर वर्धा में 1936 में स्त्रियों के लिए “राष्ट्र सेविका समिति” नामक संगठन की नींव रखी । इसके लिये भारत भर की यात्रा की और संगठन के कार्य को विस्तार दिया ।

1945 में राष्ट्र सेविका समिति का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ ।

यह वह समय था जब देश के विभाजन वादी शक्तियां प्रबल हो रहीं थीं । अंग्रेजी सरकार का उन्हें संरक्षण था इस नाते उनकी हिंसक गतिविधियाँ बढ़ गईं थीं । विशेषकर बंगाल पंजाब और सिंध में हिन्दु समाज की महिलाओं में एक भय का वातावरण बनने लगा था । लक्ष्मी बाई केलकर ने अपने संगठन के माध्यम में महिलाओं में संगठित रहने और आत्म विश्वास जगाने का अभियान चलाया देश की स्वतन्त्रता एवं विभाजन से समय वे सिंध में थीं । उन्होंने हिन्दू परिवारों को भारतीय सीमा में सुरक्षित पहुँचने के प्रबन्ध किये ।

उन्होंने महिलाओं में जाग्रति के लिये बाल मन्दिर, भजन मण्डली, योगाभ्यास केन्द्र, बालिका छात्रावास आदि अनेक प्रकल्प प्रारम्भ किये । वे राम चरित्र मानस पर बहुत सुन्दर प्रवचन देतीं थीं । जिनमें संतान के निर्माण, परिवार के निर्माण, समाज के निर्माण और सामाजिक एकत्व का संदेश होता था । वे आजीवन राष्ट्र और समाज की सेवा में लगीं रहीं । वे शरीर से भले 27 नवम्बर 1978 को नश्वर शरीर छोड़कर संसार से विदा हुईं पर उनकी आभा आज भी समाज में प्रतिबिंबित हो रही है ।

उनके द्वारा गठित राष्ट्र सेविका समिति राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति जागरण का प्रतीक बन गयी । जो समाज में संस्कार और पारिवारिक विमर्श का वातावरण बना रही है ।
उनका संकल्प आज बृहद और वैश्विक रूप ले रहा है । उनका संकल्प और विचार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं ।

यह भारत के इतिहास में स्त्रीशक्ति जागरण और सशक्तिकरण की बड़ी घटना थी । लक्ष्मी बाई केलकर ने महिलाओं को अनुशासित सेविका बनाने के लिए प्रशिक्षण अभियान आरंभ कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांत, विचार एवं उद्देश्य के आधार पर नारी शाखा आरंभ की थी । वर्तमान में भारतवर्ष में राष्ट्र सेविका समिति की लगभग पाँच हजार से अधिक शाखाएं संचालित हो रहीं हैं ।

समिति का कार्य अपने ध्येय-सूत्र के साथ अल्प समय में ही प्रभावशाली उपलब्धियां अर्जित करने लगा । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भाँति राष्ट्र सेविका समिति के भी प्रतिवर्ष मई-जून में सामान्यतः पंद्रह दिनों के प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के प्रशिक्षण शिविर आयोकित किए जाते हैं। इन शिविरों में बौद्धिक, शारीरिक और आत्म-रक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह शिविर नागपुर तथा अन्य स्थानों पर आयोजित किये जाते हैं ।

जिस प्रकार संघ का अपना गणवेश है, उसी प्रकार समिति का भी अपना एक गणवेश है। जैसे संघ में प्रचारक होते हैं, वैसे ही समिति में भी प्रचारिकाएं होती हैं। वर्तमान में अड़तालीस प्रचारिकाएं भारतवर्ष के विभिन्न भागों में सेवा प्रदान कर रही हैं।

समिति में एक प्रावधान लघु अवधि की पूर्णकालिक कार्यकर्ता का भी है, जिन्हें विस्तारिका कहा जाता है। यह दो वर्ष की समयावधि के लिए होता है. जिसमे स्वयंसेविका अपना पूरा समय समिति के कार्य के लिए समर्पित करती हैं।

लक्ष्मी बाई केलकर ने अपने व्याख्यान में कई अवसर पर कहा है कि महिला, परिवार और राष्ट्र के लिए प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करती है । जब तक शक्ति को जागृत नहीं किया जाता तब तक परिवार समाज और राष्ट्र जाग्रत नहीं होगा ।उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग और आव्हान आज भी अनुकरणीय हैं । अब समिति द्वारा बहुमुखी कार्य भी किए जा रहे हैं । समिति के अनेक सेवा प्रकल्प प्रारंभ किये हैं, जिनमें छात्रावास, चिकित्सालय, उद्योग, भजन मंडल आदि

राष्ट्र सेविका समिति का कार्य केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व के कई देशों में फैला हुआ है। ब्रिटेन, अमरीका, मलयेशिया, डर्बन, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका में भी समिति की स्वयंसेविकाएं सक्रिय हैं ।

लक्ष्मी बाई केलकर का व्यक्तित्व और कृतित्व भारत में प्रत्येक परिवार और विशेष कर नारी शक्ति की क्षमता मेधा और प्रज्ञा शक्ति का एक अनुकरणीय उदाहरण है । जो सदैव स्मरणीय और वंदनीय है

प्रेमजाल, पैसे और छल से चल रही मजहबी मशीनरी का भंडाफोड़: अवैध धर्मांतरण पर चला योगी का चाबुक

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-प्रणय विक्रम सिंह

यह कोई सामान्य गिरफ़्तारी नहीं थी। यह उस अदृश्य मानसिक युद्ध के पर्दे उठने का क्षण था, जिसमें आस्था को अस्त्र बनाकर अस्मिता पर आघात किया जा रहा था। प्रेम, पंथ और पैसा, इन 3P के सहारे चल रहा यह अवैध धर्मांतरण का ‘मजहबी मिशन’ विशुद्ध रूप से एक वैचारिक व सामरिक अतिक्रमण था, जिसमें हिंदू समाज की जड़ों को हिलाने की कुचेष्टा की जा रही थी।

*बलरामपुर से ब्रेनवॉश तक: छांगुर बाबा का छलावरण*

बलरामपुर की गलियों में वर्षों से एक अघोषित युद्ध चल रहा था। धर्मांतरण का छद्म युद्ध, जिसमें निशाना थी बेटियां। साधन था प्रलोभन और छल। उद्देश्य था भारत की आत्मा को विखंडित करना।

यूपी एटीएस व एसटीएफ द्वारा सहयोगी नीतू उर्फ नसरीन सहित बलरामपुर के मधपुर से गिरफ्तार 50 हजार का इनामी मास्टरमाइंड जमालुद्दीन उर्फ ‘छांगुर बाबा’ खुद को ‘पीर बाबा’ और ‘हज़रत जलालुद्दीन’ जैसे नामों से प्रचारित करता था। उसका नेटवर्क केवल एक व्यक्ति या स्थान नहीं, बल्कि एक विस्तृत मानसिक और मजहबी अभियान था। उसके मज़हबी चोले के पीछे एक वैश्विक एजेंडा छिपा था। भारत के भीतर से ही उसकी संस्कृति, उसकी बेटियों और उसकी चेतना को तोड़ने का प्रयास।

*मोह, मजहब और मनी: विदेशी फंडिंग से फैला फरेब का जाल*

छांगुर गिरोह के सदस्यों की 40 से अधिक बार इस्लामिक देशों की यात्राएं, 40 से ज्यादा बैंक खाते, ₹100 करोड़ की संदिग्ध फंडिंग, विदेशी संपर्क और मानसिक ब्रेनवॉश के लिए छपी किताबें, ये केवल तथ्य नहीं, फतवा रूपी फरेब के सबूत हैं। इन्हीं अवैध पैसों से बंगले, शोरूम और लग्जरी गाड़ियां खरीदी गईं। यह गिरोह धर्मांतरण को एक संगठित आर्थिक अपराध के रूप में संचालित कर रहा था। विदेशों से आई यह राशि धार्मिक उद्देश्य की आड़ में देश के भीतर सामाजिक अस्थिरता फैलाने में प्रयुक्त हो रही थी।

छांगुर गिरोह ने ‘प्रेमजाल’ को ब्रह्मास्त्र बनाया और हिंदू युवतियों को टारगेट कर धर्मांतरण का तंत्र खड़ा किया। ‘शिजर-ए-तैय्यबा’ जैसी पुस्तकों से मनोवैज्ञानिक जिहाद चलाया गया, जहां कथित सूफी भावनाओं की ओट में आस्थाओं को खंडित किया गया। यह किताब ब्रेनवॉश का मैनुअल थी, जो हिंदू युवतियों की मानसिक संरचना को ध्वस्त करने का षड्यंत्र था।

वह युवतियां जो कभी तुलसी के पौधे में जल चढ़ाती थीं, वे अब मानसिक रूप से दरगाह की जंजीरों में बंध चुकी थीं। यह धर्मांतरण नहीं, आत्मांतरण था, जिसमें चेतना को धीरे-धीरे छीन लिया गया।

*जाति के आधार पर ईमान की कीमत: धर्मांतरण की ‘रेट लिस्ट’*

धर्मांतरण के इस गिरोह ने पीड़िताओं की जाति के आधार पर ‘दरें’ तय कर रखी थीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और सिख लड़कियों के लिए ₹15-16 लाख, पिछड़ी जातियों के लिए ₹10-12 लाख, और अन्य वर्गों के लिए ₹8-10 लाख की राशि निर्धारित थी। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह धर्मांतरण न तो आस्था था, न आवश्यकता बल्कि यह एक बाज़ार था, जहां ईमान को बोली पर चढ़ाया जाता था। यह ‘रेट कार्ड’ ही साबित करता है कि इस षड्यंत्र का उद्देश्य किसी ईश्वरीय आस्था का विस्तार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का आर्थिक अपहरण था। लखनऊ निवासी गुंजा गुप्ता जैसे मामले इसकी भयावहता को सामने लाते हैं। यह ‘रेट कार्ड’ उस कलंक का प्रमाण है, जहां स्त्री का विश्वास बाजार में नीलाम हो रहा था।

*डर की दरगाह: जब धर्मांतरण में सहमति नहीं, सिर्फ साज़िश थी*

गिरोह का कार्य केवल प्रेमजाल में फंसाना नहीं था, बल्कि उसमें असहमति पर उत्पीड़न का उपकरण भी शामिल था।

यदि कोई लड़की धर्मांतरण से इनकार करती, तो उसे डराया जाता, बदनाम किया जाता, उसके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज कराने का भय दिखाया जाता। यह ‘लव जिहाद’ नहीं, लव-जाल-जिहाद था, जिसमें सुरक्षा और समृद्धि के सपनों के माध्यम से लड़की को मानसिक कैदी बनाया जाता था। यह कार्य न केवल समाज, बल्कि संविधान के विरुद्ध अपराध था। यह एक मानसिक और सामाजिक बलात्कार था।

*STF की सटीक सर्जरी: जब वर्दी बनी धर्म की प्रहरी*

इस समस्त प्रकरण में सबसे सराहनीय भूमिका उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने निभाई है। STF ने न केवल गुप्त सूचनाओं को बारीकी से संकलित किया, बल्कि छांगुर बाबा जैसे खतरनाक व्यक्ति को पकड़ने के लिए जो तकनीकी दक्षता, मनोवैज्ञानिक परिपक्वता और सामरिक रणनीति अपनाई, वह देश भर की पुलिस इकाइयों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। इस केस में STF ने फंडिंग, पासपोर्ट रिकॉर्ड, संदिग्ध सोशल नेटवर्क और मोबाइल डाटा के माध्यम से अपराध के उस चेहरे को बेनकाब किया, जो ‘पीर’ की पोशाक में ‘पैसों के पैगंबर’ बने घूम रहा था। एसटीएफ ने दिखा दिया कि उत्तर प्रदेश अब धर्मांतरण के दलालों का नहीं, धर्म की गरिमा के रक्षकों का प्रदेश है। यह केवल गिरफ्तारी नहीं, अंतःकरण की सुरक्षा थी। यह दिखाता है कि यूपी पुलिस अब अपराध पर नहीं, अस्मिता पर अतिक्रमण को रोकने में सक्षम है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि उत्तर प्रदेश में ‘लव जिहाद’, अवैध धर्मांतरण और विदेशी फंडेड षड्यंत्रों के लिए कोई स्थान नहीं है। इधर, UP STF और ATS की इस संयुक्त कार्रवाई ने स्पष्ट कर दिया है कि अब उत्तर प्रदेश की धरती पर न प्रेम के नाम पर प्रपंच चलेगा, न पंथ के नाम पर षड्यंत्र पनपेगा। यह केवल गिरफ़्तारी नहीं, एक चेतावनी है कि अब कानून केवल किताब नहीं, धर्म और न्याय का कटिबंध है।

छांगुर बाबा की गिरफ्तारी कोई अंत नहीं, यह शुरुआत है उस प्रक्रिया की, जहां सांस्कृतिक सुरक्षा, महिला अस्मिता और राष्ट्र की चेतना को एक सूत्र में बांधने का प्रयास हो रहा है। उत्तर प्रदेश यह संदेश दे चुका है कि अब ‘आस्था’ के नाम पर ‘अधर्म’ नहीं पनपेगा।

यह लड़ाई केवल एक गिरोह के विरुद्ध नहीं थी। यह संघर्ष था उस मानसिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध, जो भारत को तोड़ना चाहता है, भीतर से, बगैर गोली के। पर योगी सरकार और उत्तर प्रदेश की एसटीएफ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब न मजहबी मशीनरी चलेगी, न मजहबी मक्कारी।

कांवड़ यात्रा : आस्था, त्याग और सामाजिक समरसता का दिव्य संगम

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कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों की एक महत्वपूर्ण वार्षिक तीर्थयात्रा है, जो श्रावण मास (आमतौर पर जुलाई-अगस्त) में आयोजित होती है। लाखों श्रद्धालु, जिन्हें कांवड़िया या शिव भक्त कहा जाता है, इस दौरान पवित्र गंगा नदी से जल भरकर लाते हैं और उसे अपने स्थानीय या किसी प्रसिद्ध शिव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यह यात्रा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि भारतीय संस्कृति, समाज और विरासत का भी एक अभिन्न अंग है, जो श्रद्धा, त्याग, तपस्या और सामाजिक भावना का एक अनूठा परिचायक है। दुर्भाग्यवश, कुछ लोग इस पवित्र यात्रा को समाज में जातिगत भेदभाव और वैमनस्य फैलाने के लिए नकारात्मक रूप से प्रचारित करने का प्रयास करते हैं। सच्चाई इसके विपरीत है, कांवड़ यात्रा वास्तव में सामाजिक एकता, सद्भाव और समावेश का एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह एक ऐसा दिव्य अवसर है जब श्रद्धालु सांसारिक बंधनों को त्यागकर, त्याग और तपस्या के मार्ग पर चलते हुए आध्यात्मिक शांति और परमात्मा के साथ अपने संबंध को महसूस करते हैं। आइए, इस पवित्र यात्रा को हृदय से स्वीकार करें, अपनी आस्था को जागृत करें और भगवान शिव के चरणों में पूर्ण समर्पण के भाव से आगे बढ़ें। यही सच्ची भक्ति है और यही इस यात्रा का परम उद्देश्य है, जो हमारे जीवन को धन्य और सार्थक बना सकता है।

🟧 *प्रारंभ और पौराणिक संदर्भ :*

कांवड़ यात्रा की शुरुआत कब हुई, इसके बारे में कई पौराणिक मान्यताएं हैं:

• *श्रवण कुमार :* रामायण में उल्लेख मिलता है कि त्रेतायुग में श्रवण कुमार ने पहली बार कांवड़ यात्रा की थी, ताकि वे अपने नेत्रहीन माता-पिता को हरिद्वार में गंगा स्नान करा सकें।

• *भगवान परशुराम :* एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान परशुराम पहले कांवड़िया थे, जिन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया था।

• *दशानन रावण :* शिव पुराणों और अन्य पौराणिक कथाओं के अनुसार, लंकापति रावण को भी पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब समुद्र मंथन से निकले विष को पीकर व्याकुल हो गए थे, तब रावण ने हिमालय से गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था जिससे उन्हें शांति मिली थी। कुछ लोक कथाओं और मंदिर परंपराओं में भी रावण द्वारा गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करने का उल्लेख मिलता है।

• *समुद्र मंथन :* कांवड़ यात्रा का संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है, जिसके अनुसार देवताओं ने भगवान शिव को विष के प्रभाव से बचाने के लिए गंगाजल अर्पित किया था।

इन कथाओं से प्रेरणा लेकर, भक्त सदियों से कांवड़ यात्रा करते आ रहे हैं।

🟧 *कांवड़ यात्रा का कारण और महत्व :*

कांवड़ यात्रा का मूल उद्देश्य भगवान शिव के प्रति अपनी गहरी भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करना है। गंगाजल को शिवलिंग पर अर्पित करना एक पवित्र कार्य माना जाता है, जिससे भक्तों को पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह यात्रा आत्म-शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और मनोकामना पूर्ति का भी एक माध्यम है। हरिद्वार के अलावा, कई श्रद्धालु सुल्तानगंज (बिहार) से भी जल भरकर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बैद्यनाथ धाम (देवघर, झारखण्ड) की यात्रा करते हैं। इस मार्ग पर श्रद्धालु सुईया पहाड़ पर नंगे पांव यात्रा करते हुए अपनी श्रद्धा और तपस्या का परिचय देते हैं।

🟧 *कांवड़ के प्रकार और उनका महत्व :*

कांवड़ यात्रा में विभिन्न प्रकार की कांवड़ों का उपयोग किया जाता है, जिनका अपना विशेष महत्व है:

• *सामान्य कांवड़ :* भक्त पैदल चलते हैं और आवश्यकतानुसार विश्राम करते हुए गंगाजल ले जाते हैं।

• *डाक कांवड़ :* भक्त बिना रुके, लगातार दौड़ते हुए गंगाजल को अपने गंतव्य तक पहुंचाते हैं, जो कठिन तपस्या का प्रतीक है।

• *खड़ी कांवड़ :* भक्त चलते समय कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते; विश्राम के दौरान साथी इसे कंधों पर रखते हैं।

• *बैठी कांवड़ :* भक्त कुछ समय बैठकर आराम कर सकते हैं, लेकिन कांवड़ पास ही रखते हैं।

• *दंडी कांवड़ :* भक्त दंडवत प्रणाम करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, यह सबसे कठिन प्रकार की यात्रा है।

🟧 *धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और विरासत पहलू :*

• *धार्मिक महत्व :* कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसे करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है।

• *सांस्कृतिक महत्व :* केसरिया वस्त्र पहने और ‘बोल बम’ के नारे लगाते लाखों भक्तों का दृश्य भारतीय संस्कृति की विविधता और धार्मिक उत्साह को दर्शाता है।

• *सामाजिक महत्व :* कांवड़ यात्रा सामाजिक एकता और समरसता का प्रतीक है, जहाँ विभिन्न जाति, पंथ और वर्ग के लोग बिना भेदभाव के ‘शिव भक्त’ के रूप में एक साथ यात्रा करते हैं। स्वयंसेवी संगठन और स्थानीय लोग यात्रियों की सेवा करते हैं, जिससे सामाजिक सहयोग और सद्भाव बढ़ता है। विभिन्न समुदायों द्वारा यात्रियों के लिए शिविर लगाना इसकी समावेशी प्रकृति का प्रमाण है।

• *विरासत 🙁 यह यात्रा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, हमारी प्राचीन धार्मिक परंपराओं को जीवित रखती है और युवा पीढ़ी को उनके सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ती है।

🟧 *वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ :*

कांवड़ यात्रा में लंबी दूरी तक पैदल चलना शारीरिक व्यायाम है, जो मांसपेशियों को मजबूत करता है और हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। यह मानसिक शांति और सकारात्मकता भी प्रदान करता है।

🟧 *श्रद्धालु द्वारा किया जाने वाला त्याग, तपस्या, अनुष्ठान और सावधानी :*

कांवड़ यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु आरामदायक जीवन छोड़कर कठोर नियमों का पालन करते हैं। वे पैदल यात्रा करते हैं, मौसम की चुनौतियों का सामना करते हैं और जमीन पर सोते हैं। चमड़े की वस्तुओं का उपयोग वर्जित होता है। गंगाजल भरने से पहले और बाद में स्नान, पवित्र मंत्रों का जाप और भगवान शिव की पूजा महत्वपूर्ण अनुष्ठान हैं। यात्रा के दौरान स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान रखना, पर्याप्त पानी पीना और सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना आवश्यक है।

🟧 *नशा, मांसाहार, कटु बचन से बचना 🙁

यात्रा में पूर्ण पवित्रता बनाए रखने के लिए नशा, मांसाहार और कटु वचनों का प्रयोग वर्जित है। भक्तों को सात्विक भोजन करना और विचारों को शुद्ध रखना होता है।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *श्रद्धालुओं के अनुभव :*

कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों के अनुभव गहरे और भावनात्मक होते हैं, जो उनके जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, भगवान शिव के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करते हैं।

🟧 *नशा, गैर-शाकाहारी / तामसी भोजन, कटु बचन से बचना :*

यात्रा में पूर्ण पवित्रता बनाए रखने के लिए नशा, गैर-शाकाहारी भोजन और कटु वचनों का प्रयोग वर्जित है। भक्तों को सात्विक भोजन करना और विचारों को शुद्ध रखना होता है।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *बोल बम का महत्व :*

‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति दर्शाते हैं, यात्रियों को ऊर्जा और प्रेरणा देते हैं और माहौल को आध्यात्मिक बनाते हैं।

🟧 *श्रद्धालुओं के अनुभव :*

कांवड़ यात्रा करने वाले भक्तों के अनुभव गहरे और भावनात्मक होते हैं, जो उनके जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं और आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, भगवान शिव के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करते हैं।

🟧 *रसद और व्यवस्था :*

सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए शिविर, सुरक्षा, परिवहन और चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करती हैं, जहाँ सभी का स्वागत किया जाता है।

🟧 *महिलाओं और बच्चों की भागीदारी :*

हाल के वर्षों में महिलाओं और बच्चों की भागीदारी बढ़ी है, जिनके लिए सुरक्षा और आराम की विशेष व्यवस्थाएँ की जाती हैं।

🟧 *आधुनिकता और कांवड़ यात्रा :*

आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ा है, लेकिन यात्रा का मूल भाव और श्रद्धालुओं की आस्था आज भी अटूट है।

🟧 *पर्यावरण संरक्षण :*

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं और आयोजकों द्वारा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। अब पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को अपनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जैसे कि कचरे का उचित निपटान और प्लास्टिक का कम उपयोग। कई स्वयंसेवी संगठन सक्रिय रूप से यात्रियों को पर्यावरण संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षित कर रहे हैं और स्वच्छता बनाए रखने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं, जिससे इस पवित्र यात्रा का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सके।

🟧 *श्रद्धा और आस्था का दिव्य पथ :*

कांवड़ यात्रा मूल रूप से एक धार्मिक तीर्थयात्रा है जो श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और भगवान शिव के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस यात्रा का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति और पवित्रता प्राप्त करना है। सभी यात्रियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इस यात्रा को धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा के साथ करें, न कि इसे मात्र मनोरंजन या पर्यटन का साधन समझें। यात्रा के दौरान मर्यादा बनाए रखना, धार्मिक नियमों का पालन करना और भगवान शिव के प्रति पूर्ण भक्ति भाव रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह त्याग, तपस्या और विश्वास का मार्ग है, जिसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और ईश्वर के साथ अपने संबंध को मजबूत करना है।

🟧 *सामाजिक संदेश :*

कांवड़ यात्रा एकता और सद्भाव का महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश देती है, यह दिखाती है कि जब लोग आस्था के बंधन में बंधते हैं, तो वे सभी प्रकार के भेदभाव से ऊपर उठकर लोगों को एक साथ आ सकते हैं, सांप्रदायिक एकता और सामाजिक समरसता का प्रदर्शन करती है। यह यात्रा विभिन्न राज्यों के श्रद्धालुओं को एक साथ लाकर राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करती है। स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और स्वयंसेवकों का नेटवर्क अक्सर आपदा प्रबंधन में मदद करता है। यह युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा देती है और श्रद्धालुओं में सहनशीलता व अनुशासन जैसे गुणों का विकास करती है।

🟧 *निष्कर्ष :*

कांवड़ यात्रा एक अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव है जो लाखों भक्तों को भगवान शिव के करीब लाता है। यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों का जीवंत प्रतिनिधित्व है। आस्था, त्याग और समरसता के इस संगम में भाग लेकर श्रद्धालु आध्यात्मिक लाभ के साथ-साथ मजबूत सामाजिक बंधन का भी अनुभव करते हैं। नकारात्मक प्रचार के बावजूद, यह यात्रा सामाजिक एकता और सद्भाव का शक्तिशाली प्रतीक बनी हुई है और हमारी धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगी।

✍️अखिलेश

हिम संवाद 2025 और अरुणाचल यात्रा

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सर्जना शर्मा

मैं —डू यू हैव कांब
महिला दुकानदार हिंदी में – आपको कंघी चाहिए हां है मेरे पास है बीस रुपए की है।

ईटानगर में मेरे अंग्रेजी में पूछे गए सवाल का जवाब मुझे स्थानीय महिला इतनी खांटी हिंदी में देगी मुझे उम्मीद नहीं थी । पूर्वोत्तर भारत के सुदूर प्रांत अरुणाचल के लोगों ने सचमुच मुझे हैरान किया यहां हर व्यक्ति शुद्ध हिंदी बोलता है।किसी को फोन करो तो फोन में मधुर हिंदी फिल्मी गीत सुनायी देते हैं। बहुत खुशी हुई दिल को ये जानकार कि जिस राज्य में 26 जनजातियां रहतीं हैं उनको एकता की डोर में पिरोती है हिंदी। मैं चार दिन ईटानगर में रही किसी के दिल में हिंदी के प्रति नफरत नहीं देखी। दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, केरल में विशेष रूप से हिंदीबोलना अपराध है वहां के लोगों की नजर में। सबसे बुरा हाल तमिलनाडु का है।

जैसे ही आप चेन्नई एयरपोर्ट पर उतरते हैं सबसे पहली मुलाकात होती है टैक्सी वाले से भूल से यदि आपने हिंदी में कुछ पूछ लिया तो वो हाथ नचा नचा कर गुस्से से बोलेगा – हिंदी नहीं हिंदी नहीं । कोई दुकानदार बस चालक आपसे हिंदी में बात नहीं करेगा। और तो छोड़िए हिंदी को लेकर इतनी ज्यादा राजनीति है कि डीएमके के एक राज्यसभा सांसद आपके हिंदी में पूछे गए सवाल का उत्तर हमेशा अंग्रेजी में देते हैं आप यदि कह दो हिंदी में बाइट दे दो वो कहते हैं – no हिंदी ,ओनली इंग्लिश। जबकि उनको बहुत अच्छी हिंदी आती है सांसदों की पार्टियों में वे हिंदी फिल्मों के गाने बहुत तरन्नुम में गाते हैं। केरल का भी यही हाल है कर्नाटक में इतना बुरा हाल नहीं था अब वहां भी हिंदी पर राजनीति हो रही है। अब तो महाराष्ट्र जो कि हिंदी सिनेमा की कमाई खाता है वहां भी ठाकरे बंधुओं ने हिंदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मुझे समझ नहीं आता हिंदी ही क्यों किसी भी भारतीय भाषा का विरोध क्यों होना चाहिए। भारत विविधताओं से भरा देश है हम कितने सौभाग्यसाली हैं ऐसे देश में पैदा हुए हैं । जहां इतनी सारी भाषाएं हैं बोलियां हैं । मेरा बस चले तो में हर भाषा सीख लूं । अभी हिंदी पंजाबी , हरियाणवी ,हिमाचली ,मारवाडी भाषा बोल लेती हूं । बांग्ला गुजराती मराठी बोल नहीं सकती लेकिन समझ लेती हूं । आप को शायद यकीन न हो मेरे पास भारत के अनेक प्रांतों की भाषाओं केvभजन हैं जिनकों में बहुत चाव से सुनती हूं । असम के बिहू गीत और भजन , बंगाल के बाउलगीत , बांग्ला में चैतन्य महाप्रभु के भजन , भगवान कृष्ण के भजन , सबसे सुंदर हैमायापुर इस्कॉन की तुलसी आरती – तुलसी कृष्ण प्रेयसी नमो नम पता नहीं कितनी बारमैं सुनती हूं मन भीग भीग जाता है आप भी कभी सुनिए । गुजरात की प्रीति गज्जर के भजनआंखों में आंसू ला देते हैं। रसभीना राय रणछोड़ वसो म्हारा रूदया मां (रस भीनाराय रणछोड मेरे हृदय में बसो) जब दिल करता है ये भजन सुनती हूं । गुजरात के हेमंतचौहान को भगवान ने दृष्टि नहीं दी लेकिन इतना खनकदार और मधुर स्वर दिया है कि आपबस सुनते ही रहोगे सुनते ही रहोगे । म्हारा घट में बिराजता श्री नाथ जी बृंदा जीमहाप्रभु जी , पावागढ़ की काली मां के भजन सुनिए उनके – पांखिडा रे उडी जाओ पावा गढ़ रे । भगवान कृष्ण के भजन गुजरातका कोई गायक न गाए सा कैसा हो सकता है – जय रणछोड़ जय रणछोड़ माखन चोर , प्रथम वेला स्मरिए रे स्वामी तैने सूंडावाल ( गणपति) आप मेरी बात माने तो सुनिए इनके भजन आपको गुजराती भाषा से प्यार हो जाएगा । मैं पंजाबी लोगों के बीचपली बढी हूं इसलिए पंजाबी बोलने समझने पंजाबी गीत गाने सुनने में बहुत मजा आता है। सुरेंद्र कौर प्रकाश कौर के लोक गीत सुन सुन कर बड़े हुए जो आज भी हर शादी ब्याहमें गाए जाते हैं। काला श्याह काला मेरा काला ई सरदार गौरयां नूं दफा करो मैं आपतिल्ले दी तार काला श्याह काला, लट्ठे दी चादर उत्ते सलेटी रंग माहिया आओ सामनेकोलो दी रूस के लंघ माहिया।

गुरदास मान का छल्ला, जुगनी, ट्प्पे। शब्द कीर्तन भी मैं बहुत सुनती हूं – जपुजी साहिब, चौपाई साहिब, दुख भंजन साहिब और अन्य बहुत से शब्द इतनी सुंदर मधुर गुरबाणी जब भी दिल बहुत उदास हो विचलित हो शब्द सुनिए दिल में अमृत रस की बौछार होगी । भाईमनजिंदर सिंह जी अमृतसर वाले , भाई हरजिंदर सिंह जी श्रीनगर वाले, भाई मेहताब सिंहजलंधर वाले भाई रविंदर सिंह हजूरी रागी श्री दरबार साहिब अमृतसर वाले कभी इनके औरअन्य सिख रागियों का शब्द कीर्तन सुनिए भाषा की दीवारें अपने आप गिर जाएगी । हरियाणा की रागिनियां ,राजस्थान के भक्ति गीत और लोकगीत मांगणिया गायक जब गाते हैं तो सुनने वाले सब कुछ भूलजाते हैं और उनके पैर थिरक उठते हैं । होलिया में उडे रे गुलाल तो हर किसी की जुबान परहै . म्हारो पल्लो लटको जरा सा टेढ़ों हो जा बालमा । बस दिल को एक बार बड़ा किजिए भारतकी हर भाषा से प्यार हो जाएगा आपको। भगवानजगन्नाथ के भजन उड़िया में सुनिए पंडित सूर्य नारायण रथ के भजन और जगन्न नाथ अष्टक सुनिए। भोजपुरी गीत तो बॉलीवुड में भी हिटरहे हैं हम सब यदा कदा गुनगुनाते हैं । महाराष्ट्र में पंडित भीमसेन जोशी, किशोरीअमोनकर जैसे बड़े शास्त्रीय गायक हैं तो सुरेश वाडेकर जैसे सुगम संगीत गायकों केअभंग सुनिए अजीत कडकडे अहिल्या फड़के को सुनिए। आप भी विट्ठला विट्ठला की माला जपने लगेंगे । दक्षिण भारतीय गायक कर्नाटक संगीतशैली में गाते हैं जबकि देश के बाकी हिस्से में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायन शैलीहै । सुब्बालक्ष्मी के स्वर में विष्णु सहस्त्रनाम नहीं सुना तो क्या सुना , भजगोविंदम् और सुप्रभताम नहीं सुना तो संगीत प्रेम अधूरा है। मलयाली गायक येसुदास ने अय्यप्पा के लिए जो भजन गाए हैं उनका कोई तोड़नहीं है यकीन मानिए जब आप उनका — हरिवासनं विश्वमोहनम् , हरिदधीश्वरमर्जुनमणडनम्प्रणत सारणम् शरणम् अय्यपा स्वामी शरणम् अय्यप्पा ।

सूची बहुत लंबी है जी न्यूज में जबपांच साल तक धर्म संस्कृति पर मंथन कार्यक्रम बनाया तो भारत के हर प्रांत केत्यौहार व्रत उपवास तीर्थ स्थान दिखाते थे सबके भजन भी मंगवाते थे । जब हर प्रांतके गायकों को सुना तो लगा कि भाषा की दीवार इतनी बड़ी नहीं है जरा सा प्रयास जरा साप्यार जरा सा अपनापन मन में लाना होगा भारत की सब भाषाएं अपनी लगेगी । हम हिंदीभाषियों की मां हिंदी है तो बाकी सभी भाषाएं हमारी मौसियां हैं यानी मां जैसी हैं। भाषा की राजनीति कर रहे नेताओं की बात न सुने अपने एक भारत श्रेष्ठ भारत के दिलकी धड़कन सुनें । भारत को एक जन्म में समझ पाना कठिन हैं सौ जन्म लेनें होंगेभारत में भारत को समझने के लिए । मैं सौ क्या हजार जन्म भी अपने विविधताओं से भरे भारत में लेना चाहूंगी । इस लेख में बहुत कुछ लिखना रह गयाहै इतना कुछ लिखने को हैं लेकिन अब के लिए बस इतना ही । अरुणाचल यात्रा से प्रेरितहो कर उनका हिंदी प्रेम देख कर लगा कि यदि ये लोग हिंदी को इतना प्यार कर सकते हैंतो देश के बाकी गैर हिंदी भाषी क्यों नहीं कर सकते ।

महानगर से लेकर नगर और शहर तक अर्बन डेवलपमेंट विभाग की यह जिम्मेवारी होनी चाहिए कि किस शहर में कितनी नई गाड़ियां बेची जा सकती हैं और कितनी गाड़ियां अब सड़क पर चलने की स्थिति में नहीं है। उन्हें हटाया जा सकता है। इसका हिसाब किताब रखे।

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