कपिल शर्मा शो और नेटफ्लिक्स पर हिंदी कंटेंट का गिरता स्तर

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मुम्बई। कपिल शर्मा शो, जो कभी भारतीय टेलीविजन का सबसे लोकप्रिय कॉमेडी शो था, आज नेटफ्लिक्स पर अपनी चमक खोता नजर आ रहा है। हाल ही में क्रिकेटर गौतम गंभीर के साथ वाला एपिसोड इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस एपिसोड में न तो हास्य था, न ही चुटीले संवाद। दर्शकों को लगा कि प्रोडक्शन टीम केवल बड़े चेहरों के भरोसे शो चला रही है, यह सोचकर कि नामी हस्तियां बुलाने से दर्शक कुछ भी देख लेंगे। लेकिन यह रणनीति अब उलटी पड़ रही है। नेटफ्लिक्स के साथ जुड़ने से शो को भले ही आर्थिक मजबूती मिली हो, लेकिन कंटेंट की गुणवत्ता में भारी कमी आई है।

कपिल शर्मा शो की यह समस्या केवल इस शो तक सीमित नहीं है; यह नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध हिंदी कंटेंट की व्यापक गिरावट का हिस्सा है। एक समय था जब हिंदी सिनेमा और टीवी शो अपनी कहानियों, संवादों और किरदारों के दम पर दर्शकों का दिल जीतते थे। लेकिन आज नेटफ्लिक्स पर अधिकांश हिंदी कंटेंट औसत दर्जे का है। चाहे वह वेब सीरीज हो या स्टैंड-अप कॉमेडी, ज्यादातर शो में गहराई, मौलिकता और रचनात्मकता की कमी साफ दिखती है। नेटफ्लिक्स पर हिंदी कंटेंट में अक्सर दोहराव, कमजोर स्क्रिप्ट और जबरदस्ती का हास्य देखने को मिलता है, जो दर्शकों को निराश करता है।

इसका परिणाम यह हुआ है कि नेटफ्लिक्स के हिंदी दर्शक अब धीरे-धीरे अंग्रेजी कंटेंट की ओर रुख कर रहे हैं। अंग्रेजी शो और फिल्में, चाहे वह “Stranger Things” हो या “The Crown”, अपनी मजबूत कहानी, बेहतरीन प्रोडक्शन और गहन किरदारों के लिए सराही जाती हैं।

इसके विपरीत, हिंदी कंटेंट में ज्यादातर सतही कहानियां और घिसे-पिटे फॉर्मूले देखने को मिलते हैं। डेटा भी इस बदलाव की पुष्टि करता है—नेटफ्लिक्स के भारतीय सब्सक्राइबर्स में हिंदी कंटेंट की खपत में कमी आई है, जबकि अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट की मांग बढ़ रही है।

कपिल शर्मा शो और हिंदी कंटेंट को फिर से प्रासंगिक बनाने के लिए प्रोडक्शन टीम को मौलिकता और गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। दर्शक बड़े चेहरों से ज्यादा अच्छी कहानियों और हास्य की तलाश में हैं।

यदि नेटफ्लिक्स हिंदी कंटेंट के स्तर को नहीं सुधारेगा, तो भारतीय दर्शकों का भरोसा और भी कम होगा, और वे अन्य प्लेटफॉर्म्स या भाषाओं की ओर पूरी तरह मुड़ जाएंगे।

सड़क से जुड़ी विसंगतियां

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राकेश दुबे

दिल्ली । हाल के वर्षों में भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों व एक्सप्रेस-वे आदि का आशातीत विस्तार हुआ है। सड़कों के नेटवर्क सुधार से उपभोक्ताओं के समय व धन की बचत हुई है तो उद्योग-व्यापार को भी गति मिली है, लेकिन इससे जुड़ी तमाम विसंगतियां भी सामने आई हैं। सड़कों के त्रुटिपूर्ण डिजाइन व निर्माण में चूक को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। पिछले हफ्ते मध्यप्रदेश में लगातार 40 घंटे लगे जाम से जहां हजारों लोगों को घंटों परेशान होना पड़ा, वहीं जाम में फंसकर तीन लोगों की मौत हुई है।

निश्चय ही यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, जिसको लेकर शासन-प्रशासन के साथ ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई को गंभीरता से लेना चाहिए। उन तमाम आशंकाओं को टालना चाहिए जो भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति के कारक बन सकते हैं। बहरहाल, मध्यप्रदेश की घटना को लेकर एनएचएआई की आलोचना की जा रही है। इस घटना के बारे में एनएचएआई के एक अधिकारी की संवेदनहीन टिप्पणी को लेकर भी सवाल उठे हैं। यहां तक कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी एनएचएआई के रुख को कठोर और संवेदनहीन बताया है, जो जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करने वाला है। दरअसल, एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने एनएचएआई को दोषपूर्ण और देर से सड़क निर्माण के लिये फटकार लगायी है, जिसके कारण आगरा-मुबई राष्ट्रीय राजमार्ग के इंदौर-देवास खंड में जाम लग गया था। बताते हैं कि एनएचएआई के कानूनी सलाहकार ने इस बाबत संवेदनहीन टिप्पणी की कि लोग बिना किसी काम के घर से इतनी जल्दी क्यों निकलते हैं? इस टिप्पणी ने लोगों में आक्रोश पैदा कर दिया।

निश्चित रूप से इस दुर्घटना और हजारों लोगों के घंटों जाम में फंसे रहने के मामले में जहां एनएचएआई की तरफ से माफी मांगने की जरूरत थी, वहीं उसने दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिये दोष लोगों पर लगाते हुए असंवेदनशील बयान दे डाला। जिसके खिलाफ तल्ख प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। यही प्रतिक्रिया अदालत की टिप्पणी में भी झलकती है।

इसमें दो राय नहीं कि अकसर बड़ी सड़कों और राजमार्ग परियोजनाओं के निर्माण के दौरान अंतहीन असुविधा भारतीय यात्रियों के लिए रोजमर्रा के अनुभव हैं। अधिकांश साइटों पर निर्माण से जुड़ी, यात्रियों के अनुकूल सर्वोत्तम परंपराओं को अपनाना और यातायात में व्यवधान को कम से कम करना सुनिश्चित नहीं किया जाता है। निस्संदेह, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय संभाल रहे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की सक्रियता व प्रतिबद्धता की अकसर सराहना होती रहती है। वे सड़कों की गुणवत्ता और सुरक्षा मापदंडों को बढ़ाने को लेकर लगातार अभियान चलाते भी रहते हैं। हालांकि, वे भी मानते रहे हैं कि अभी सुधार की काफी गुंजाइश है। यूँ

तो भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण निरंतर यातायात को सुगम मानकों के अनुरूप बनाने के लिये प्रयासरत रहता भी है। निश्चित रूप से स्थलों की स्थिति और भूमि अधिग्रहण के तमाम विवाद भी हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण काम राजमार्गों की व्यावहारिक दिक्कतों को दूर किया जाना होना चाहिए। दरअसल, योजनाओं का धरातल पर क्रियान्वयन बड़े पैमाने पर निर्माण फर्मों और ठेकेदारों के माध्यम से किया जाता है। जिसमें व्यापक अनुभव, क्षमता और नैतिकता जैसे कारक मिलकर भूमिका निभाते हैं। निस्संदेह, काम की गुणवत्ता समस्याओं के समाधान में मददगार साबित हो सकती है। जरूरी है कि इस काम में बाह्य हस्तक्षेप राजनीतिक व अन्य स्तर पर न हो। जैसा कि हिमाचल प्रदेश में एक मंत्री पर एनएचएआई के दो अधिकारियों के साथ मारपीट का मामला प्रकाश में आया है। जिसमें मंत्री के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की गई है। जिसको लेकर कई आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। निस्संदेह, हाल के वर्षों में भारत में सड़कों का नेटवर्क काफी सुधरा है। लेकिन एनएचएआई को अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार करना चाहिए। जिससे भविष्य में लंबे जाम लगने और दुर्घटनाओं को टाला जा सके। निस्संदेह, देश के शहरों में आए दिन जाम लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

शासन-प्रशासन को इसके तार्किक समाधान की दिशा में वैज्ञानिक तरीके से गंभीरता के साथ प्रयास करने चाहिए। जाम की सूचना मिलने पर उसे खुलवाने की तत्काल पहल होनी चाहिए। यात्रियों के लिये तुरंत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए ताकि भविष्य में जाम में फंसकर किसी की जान न जाए।

PM has been given Namibia’s Highest Award: Order of the Most Ancient Welwitschia Mirabilis

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Delhi : The Order of the Most Ancient Welwitschia Mirabilis is the highest civilian award of Namibia.

The award was established in 1995, shortly after Namibia gained independence in 1990, to recognise distinguished service and leadership.

Named after the Welwitschia Mirabilis, a unique and ancient desert plant endemic to Namibia, the order symbolises resilience, longevity and the enduring spirit of the Namibian people.

This makes it the 27th award for PM Modi and 4th award in this ongoing tour.

9 जुलाई 1301 रणथंबोर में जौहर : स्वतव रक्षा केलिये तीन दिन तक हुआ आत्म बलिदान

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भारत पर हुये मध्यकाल के आक्रमण साधारण नहीं थे । हमलावरों का उद्देश्य धन संपत्ति के साथ स्त्री और बच्चों का हरण भी रहा । जिन्हे वे भारी अत्याचार के साथ गुलामों के बाजार में बेचते थे । इससे बचने के लिये भारत की हजारों वीरांगनाओं ने अपने बच्चों के साथ जल और अग्नि में कूदकर अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा की । ऐसा ही एक जौहर रणथंबोर में 9 जुलाई 1301 से आरंभ हुआ जो तीन दिन चला । इस जौहर में राणा हमीर देव की रानी रंगा देवी ने अपनी पुत्री पद्मा के साथ जौहर किया था । उनके साथ बारह हजार अन्य स्त्री बच्चों ने जल और अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया ।

रानी रंगादेवी चित्तौड़ की राजकुमारी थीं और रणथंबोर के इतिहास प्रसिद्ध राजा हमीरदेव को ब्याहीं थीं । रणथंबोर का यह राज परिवार पृथ्वीराज चौहान का वंशज माना जाता है । मोहम्मद गौरी के हमले से दिल्ली के पतन के बाद उनके एक पुत्र ने रणथंबोर में राज स्थापित कर लिया था । इसी वंश में आगे चलकर 7 जुलाई 1272 को हमीरदेव चौहान का जन्म हुआ था । उनके पिता राजा जेत्रसिंह चौहान ने भी दिल्ली सल्तन के अनेक आक्रमण झेले थे । लेकिन रणथंबोर किले की रचना ऐसी थी कि हमलावर सफल न हो पाये । लगातार हमलों से राजपूताने की महिलाएं भी आत्म रक्षा के लिये शस्त्र संचालन सीखती थीं। हमीरदेव की की माता हीरा देवी भी युद्ध कला में प्रवीण थीं। परिवार की पृष्ठभूमि ही कुछ ऐसी थी कि हमीर देव ने कभी स्वाभिमान से समझौता नहीं किया । उन्होंने अपने जीवन में कुल 17 युद्ध लड़े थे और 16 युद्ध जीते । जिस अंतिम युद्ध में उनकी पराजय हुई उसी में उनका बलिदान हुआ । उन्होने 16 दिसंबर 1282 को रणथंबोर की सत्ता संभाली थी । पर उनका पूरा कार्यकाल युद्ध में बीता । दिल्ली के शासक जलालुद्दीन ने 1290 से 1296 के बीच रणथंबोर पर तीन बड़े हमले किये पर सफलता नहीं मिली । अलाउद्दीन उसका भतीजा था जो 1296 में चाचा की हत्या करके गद्दी पर बैठा । गद्दी संभालते ही अलाउद्दीन ने राजस्थान और गुजरात पर अनेक धावे बोले । पर रणथंबोर अजेय किला था । वह अपने चाचा के साथ रणथंबोर में पराजय का स्वाद चख चुका था इसलिए उसने यह किला छोड़ रखा था तभी 1299 में एक घटना घटी । अलाउद्दीन की सेना गुजरात से लौट रही थी । उसके दो मंगोल सरदार मोहम्मद खान और केबरु खान रास्ते में रुक गये और रणथंबोर में राजा हमीर देव के पास पहुँचे। दोनों ने अलाउद्दीन के विरुद्ध शरण माँगी । हमीर देव ने विश्वास करके दोनों को न केवल शरण दी अपितु जगाना की जागीर भी दे दी थी । इस घटना के लगभग दो वर्ष बाद अलाउद्दीन ने रणथंबोर पर धावा बोला । यह कहा जाता है कि अलाउद्दीन इन दोनों को शरण देने से नाराज था । इसलिए धावा बोला पर कुछ इतिहास कारों का मानना है कि यह अलाउद्दीन खिलजी की रणनीति थी । इन दोनों ने न केवल किले के कयी भेद दिये अपितु हमीर देव की सेना में भेद पैदा करदी इससे हमीर देव के दो अति विश्वस्त सेनापति रणमत और रतिपाल अलाउद्दीन से मिल गये ।

इतना करने के बाद 1301 में अलाउद्दीन ने रणथंबोर पर धावा बोला तब हमीर देव एक धार्मिक आयोजन में व्यस्त थे और उन्होंने अपने इन्ही दोनों सेनापतियों को युद्ध में भेजा । लेकिन दोनों के मन में विश्वासघात आ गया था । इनके अलाउद्दीन से मिल जाने से रणथंबोर की सेना कमजोर हुई । तब किले के दरबाजे बंद कर लिये गये । पर किले के भीतर गद्दार थे रसद सामग्री में विष मिला दिया गया । किले के भीतर भोजन की विकराल समस्या उत्पन्न हो गई । इस विष मिलाने के संदर्भ में अलग-अलग इतिहासकारों के मत अलग हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मोहम्मद खान और कुबलू खान की कारस्तानी थी जबकि कुछ रणमत और रतिपाल का विश्वासघात मानते हैं। विवश होकर हमीरदेव ने केशरिया बाना पहन कर साका करने का निर्णय लिया । और किले के भीतर सभी महिलाओ ने रानी रंगा देवी के नेतृत्व जौहर करने का निर्णय हुआ । यह जौहर 9 जुलाई से आरंभ हुआ जो तीन दिन चला । यह जौहर दोनों प्रकार का हुआ अग्नि जौहर भी और जल जौहर भी । तीसरे दिन 11 जुलाई 1301 को रानी रंगादेवी ने अपनी बेटी पद्मला के साथ जल समाधि ली । राजा हमीर देव 11 जुलाई को केशरिया बाना पहनकर निकले और बलिदान हुये । इस जौहर में कुल बारह हजार वीरांगनाओं ने अपने स्वत्व रक्षा के लिये प्राण न्यौछावर कर दिये । यह राजस्थान का पहला बड़ा जौहर माना जाता है ।

इतिहास के विवरण के अनुसार रणमत और रतिपाल अलाउद्दीन खिलजी के हाथों मारे गए जबकि मोहम्मद खान और कुबलू खान का विवरण नहीं मिलता । इसी से यह अनुमान लगाया जाता है की इन दोनों सरदारों को हमीर देव के पास भेजने की रणनीति अलाउद्दीन की ही रही होगी ताकि किले के गुप्त भेद पता लगें और भीतर से विश्वासघाती पैदा किये जा सकें । चूँकि युद्ध के पहले का घटनाक्रम साधारण नहीं है । अलाउद्दीन की धमकियों के बीच युद्ध की तैयारी करने की बजाय एक विशाल पूजन यज्ञ की तैयारी करना आश्चर्य जनक है । किसने युद्ध के घिरते बादलों से ध्यान हटाकर यज्ञ में लगाया ? अब सत्य जो हो पर रंगादेवी के जौहर का वर्णन सभी इतिहासकारों के लेखन में है । जो तीन दिन चला ।

इतिहास के जिन ग्रंथों में इस जौहर का विवरण है उनमें “हम्मीर ऑफ रणथंभोर” लेखक हरविलास सारस्वत, जोधराकृत हम्मीररासो संपादक-श्यामसुंदर दास, जिला गजेटियर सवाई माधोपुर तथा सवाईमाधोपुर दिग्दर्शन संपादक गजानंद डेरोलिया में है । इधर हम्मीर रासो में लिखा है कि जौहर के वक्त रणथम्भौर में रानियों ने शीस फूल, दामिनी, आड़, तांटक, हार, बाजूबंद, जोसन पौंची, पायजेब आदि आभूषण धारण किए थे। हम्मीर विषयक काव्य ग्रंथों में सुल्तान अलाउद्दीन द्वारा हम्मीर की पुत्री देवलदेह, नर्तकियों तथा सेविकाओं की मांग करने पर देवलदेह के उत्सर्ग की गाथा मिलती है, किन्तु इसका ऐतिहासिक संदर्भ नहीं मिलता। इतिहासकार ताऊ शोखावटी ने बताया कि उम्मीरदेव की पत्नी रंगादेवी उनकी सेविकाओं और अन्य रानियों के साथ जौहर किया था। इतिहासकारों के अनुसार यह राजस्थान का पहला जौहर था।

इतिहास के जिन ग्रंथों में इस जौहर का विवरण है उनमें “हम्मीर ऑफ रणथंभौर” लेखक हरविलास सारस्वत, हम्मीररासो संपादक-श्यामसुंदर दास, जिला गजेटियर सवाईमाधोपुर तथा सवाईमाधोपुर दिग्दर्शन संपादक गजानंद डेरोलिया में है । हम्मीर रासो में लिखा है कि जौहर के समय रानियों ने शीस फूल, दामिनी, आड़, तांटक, हार, बाजूबंद, जोसन पौंची, पायजेब आदि सभी आभूषण धारण किए थे। जबकि एक विवरण में लिखा है कि सुल्तान अलाउद्दीन ने हमीरदेव की पुत्री देवलदेह सहित रनिवास की सभी महिलाओं के साथ समर्पण करने की शर्त रखी थी । इसलिए हमीरदेव ने शाका करने का निर्णय लिया और रनिवास ने जौहर करने का ।

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