एक लेखक: पूरे भारत के 36 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश और सभी 7 महाद्वीपों की यात्रा पूरी करने वाले पहले भारतीय बने

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दिल्ली। प्रख्यात लेखक, देशभक्ति एवं यात्रा विषयक अपनी रचनाओं के लिए प्रसिद्ध डॉ. ऋषि राज ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने भारत के सभी 36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा विश्व के सभी सात महाद्वीपों की यात्रा पूरी कर ली है।

17 नवंबर 2025 को डॉ. ऋषि राज ने अपने इस महायात्रा के अंतिम पड़ाव अंटार्कटिका पर कदम रखा। वहाँ उन्होंने भारतीय तिरंगा लहराकर एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना और राष्ट्रीय गौरव का संदेश दिया।

यह उपलब्धि उन्हें वह गौरव प्रदान करती है कि वे ऐसे पहले भारतीय बन गए हैं, जिन्होंने भारत की संपूर्ण विविधता सभी 36 राज्य और केंद्रशासित प्रदेश का भ्रमण करने के साथ-साथ विश्व के सभी सात महाद्वीपों की यात्रा भी सफलतापूर्वक पूरी की है।

उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान “धरती माता की रक्षा के संकल्प” का संदेश देते हुए एक बैनर भी प्रदर्शित किया, जिससे पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता झलकती है।

इसके साथ ही, सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में, उन्होंने आयरन मैन की तस्वीर वाला विशेष बैनर प्रदर्शित कर राष्ट्र के इस महान एकीकर्ता को श्रद्धांजलि अर्पित की। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन में अपर महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत ऋषि राज ने ये अनूठी उपलब्धि हासिल की है।

डॉ. ऋषि राज की यात्राओं का आरंभ वर्ष 1994 में हुआ, जब उन्होंने भारतीय रेल में अपनी सेवा प्रारंभ की। पहले उन्होंने भारत के अधिकांश राज्यों का भ्रमण किया। वर्ष 2008 में सभी ज्योतिर्लिंगों और चार धामों की यात्रा पूरी की। इसके बाद 2012 में जब उन्होंने कैलाश मानसरोवर यात्रा की, तभी से उनकी वैश्विक यात्रा का नया अध्याय शुरू हुआ। पिछले 31 वर्षों की यह सतत यात्रा उन्हें आज इस ऐतिहासिक मुकाम तक ले आई है।

अंटार्कटिका से डॉ. ऋषि राज का संदेश:

“हिमालय से लेकर अंटार्कटिका तक, मैंने भारत की आत्मा को अपने साथ लेकर यात्रा की है। यह सफर सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि एकता, देशभक्ति और पृथ्वी के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। जहाँ भी जाता हूँ, भारत मेरे साथ चलता है।”

अपने पेशेवर दायित्वों के अलावा, डॉ. ऋषि राज एक बहुमुखी लेखक हैं, जिन्होंने इतिहास एवं देशभक्ति पर आधारित बच्चों की कहानियों सहित 28 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। इसके साथ ही, उनके चैनल Exploring India with Rishi के माध्यम से वे 600 से अधिक लघु फिल्मों में भारत की सांस्कृतिक एवं देशभक्ति की धरोहर को प्रदर्शित कर चुके हैं।

डॉ. ऋषि राज अब इस उपलब्धि को राष्ट्र के युवाओं में देशभक्ति, सतत यात्रा एवं जलवायु जागरूकता को बढ़ावा देने हेतु समर्पित करने की योजना रखते हैं। वे इस उपलब्धि के लिए प्रमुख रिकॉर्ड बुक्स में आवेदन की तैयारी भी कर रहे हैं।

ताजमहल की छाँव में ग़ालिब की तन्हाई: आगरा ने अपने शायर-ए-आज़म को क्यों भुला दिया?

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लखनऊ: शहर आगरा, जहाँ संगमरमर मोहब्बत की दास्तान सुनाता है, चाँदनी में ताज मुस्कुराता है और यमुना सदियों के राज़ फुसफुसाती है, उसी शहर में उर्दू अदब का बादशाह मिर्ज़ा ग़ालिब आज एक बुझती हुई शमा बन चुके हैं। जैसे किसी आह का धुआँ हवा में गुम हो गया हो।
27 दिसंबर 1797, आगरा की इसी मिट्टी में जन्मे ग़ालिब, जिनकी ग़ज़लों ने इश्क़, दर्द और फ़िक्र को नए मायने दिए। दिल्ली दरबारों की रौनक रहे यह शायर आज अपनी जन्मभूमि में गुमनामी की धूल ओढ़े हैं। उनकी सालगिरह बस एक रस्मी मुशायरा बनकर रह गई है, किसी होटल के बंद हॉल में, जहाँ अल्फ़ाज़ तो गूँजते हैं, मगर रूह ग़ायब रहती है।

आगरा की गलियाँ आज भी पूछती हैं: उस काला महल में, जहाँ ग़ालिब ने पहली साँस ली, कोई यादगार क्यों नहीं? न कोई पट्टिका, न स्मारक, न कोई ऐसी निशानी जो बताए कि यहाँ उर्दू का सूरज उगा था। दशकों से आगरा विश्वविद्यालय में “ग़ालिब चेयर”, ऑडिटोरियम और रिसर्च लाइब्रेरी की माँग फाइलों में धूल फाँक रही है, अधूरी ख़्वाहिशों की तरह।
आगरा कभी उर्दू अदब की त्रिमूर्ति का केंद्र था: मीर तकी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब और नज़ीर अकबराबादी का शहर। लेकिन आज पत्थर के महल तो जगमगा रहे हैं, मगर संस्कृति, ज़बान और साहित्य—जो असली विरासत हैं, हाशिए पर जा चुके हैं। विरासत सिर्फ़ इमारत नहीं होती, याददाश्त भी होती है, और यही याददाश्त अब मुरझा रही है।

सैलानी, ख़ासकर वेस्ट एशिया से आने वाले, आज भी ग़ालिब की हवेली पूछते हैं। एक स्थानीय होटल संचालक का दर्द साफ़ झलकता है, “टूरिज़्म विभाग से कितनी बार कहा, कुछ ढंग का स्मारक बनाइए, पर जवाब में बस सन्नाटा।”
ग़ालिब उर्दू के लिए वही हैं जो अंग्रेज़ी के लिए शेक्सपियर। बचपन में आगरा छोड़ा, दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में उनकी शायरी परवाज़ भरती रही। 1869 में दिल्ली में उनका इंतक़ाल हुआ, मगर उनका असर अब तक ज़िंदा है, उनकी पंक्तियाँ हर ऐसे दिल में गूँजती हैं जो मोहब्बत और मायूसी से गुज़रा हो।
स्थानीय लोग बार-बार एक ही बात कहते हैं: “जिस हवेली में ग़ालिब पैदा हुए, सरकार उसे ख़रीद ले और यादगार बना दे।” दरअसल, यह किसी एक मकान का मामला नहीं, पूरे शहर की आत्मा का सवाल है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अगर ग़ालिब स्मारक, उर्दू लाइब्रेरी और वार्षिक साहित्य सम्मेलन शुरू करें, तो आगरा का सांस्कृतिक परिदृश्य फिर से जीवंत हो सकता है।
आगरा को मोहब्बत, भक्ति और कला का शहर कहा जाता है। यह ब्रज और उर्दू, दोनों परंपराओं का संगम रहा है। मगर आज उर्दू शायरी ठिठक-सी गई है, नए शायर पहचान के मोहताज हैं, और ग़ालिब की आवाज़ धीरे-धीरे इतिहास की परतों में दबी जा रही है।

आगरा में आज ग़ालिब के नाम पर बस एक छोटा-सा पार्क है, वह भी कैंटोनमेंट इलाके में, नाम भर की श्रद्धांजलि। साहित्य और समाज के बीच बढ़ती दूरी बताती है कि हम धीरे-धीरे बंजर ज़मीन बनते जा रहे हैं।
ग़ालिब ने कभी लिखा था कि दुनिया दिल टूटने की जगह है, मगर हर टूटा दिल एक नई शायरी रचता है। शायद अब आगरा को वही शायरी दोबारा लिखनी होगी, अपने शायर की याद में।
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कौन है जो ग़ालिब को नहीं जानता:
“दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है”
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले”
“ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता”
“हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है”
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ये शहर ताजमहल की छाँव में जीता है, पर अब उसे उस शायर को भी याद करना चाहिए, जिसने मोहब्बत को लफ़्ज़ और लफ़्ज़ों को रूह दी। ऐ आगरा, उठो, इस बुझती चिंगारी को फिर हवा दो। ग़ालिब को याद करना सिर्फ़ अतीत नहीं, आत्मा को पुकारना है। वरना वह आख़िरी शेर भी ख़ामोशी में गुम हो जाएगा।

विकसित भारत में शिक्षा का योगदान विषय पर राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला का भव्य शुभारंभ

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सूरत | शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला का भव्य शुभारंभ आज वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय, सूरत में हुआ। कार्यशाला का विषय “विकसित भारत में शिक्षा का योगदान” है। इस राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से 600 से अधिक शिक्षाविद, शिक्षण संस्थानों के प्रमुख, शोधकर्ता आदि सहभागिता कर रहे हैं।

यह कार्यशाला सरदार वल्लभभाई राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (SVNIT), सूरत एवं वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है।

कार्यशाला के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि सवानी समूह के अध्यक्ष श्री वल्लभभाई सवानी रहे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक उन्नति से नहीं, बल्कि सशक्त, संस्कारवान और मूल्यनिष्ठ शिक्षा व्यवस्था से ही साकार होगा। शिक्षा ही वह माध्यम है जो राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करती है।

सारस्वत अतिथि के रूप में प्रो. अनुपम शुक्ला, निदेशक – SVNIT, सूरत, प्रो. किशोर चावड़ा, कुलपति – वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय ने शिक्षा के समसामयिक परिदृश्य, राष्ट्रीय शिक्षा नीति तथा उच्च शिक्षा की भूमिका पर प्रकाश डाला।

न्यास के राष्ट्रीय संयोजक श्री ए. विनोद ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि न्यास की शुरुआत शिक्षा बचाओ आंदोलन से हुई थी। आज यह एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन चुका है। हमारा उद्देश्य शिक्षा को भारतीय मूल्यों से जोड़ते हुए राष्ट्र निर्माण का सशक्त माध्यम बनाना है। उन्होंने कहा कि न्यास शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास और राष्ट्रभावना को सुदृढ़ करने के लिए सतत कार्य कर रहा है।

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं भारतीय विश्वविद्यालय संघ की महासचिव प्रो. पंकज मित्तल ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा 2007 में न्यास की स्थापना के बाद से हमारे कार्यकर्ता पूरे देश में शिक्षा सुधार के लिए जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु न्यास निरंतर सक्रिय है।

उन्होंने जानकारी दी कि केंद्र सरकार द्वारा ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान अधिनियम’ संसद में प्रस्तुत किया गया है, जिसके अंतर्गत—

● विकसित भारत अधिनियम परिषद
● विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद
● विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद
के गठन का प्रावधान है। उन्होंने सभी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे इस अधिनियम का गंभीर अध्ययन करें, उसके प्रावधानों को समझें और अपने सुझाव केंद्र सरकार को भेजें, ताकि भारत की शिक्षा व्यवस्था को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित किया जा सके।

कार्यशाला के द्वितीय सत्र में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों द्वारा संगठनात्मक एवं कार्यक्रमात्मक गतिविधियों की विस्तृत प्रस्तुति दी गई। इसमें न्यास के संगठनात्मक एवं कार्यक्रमात्मक गतिविधियों पर न्यास के क्षेत्र संयोजकों द्वारा प्रस्तुति दी गई। इस सत्र को संबोधित करते हुए न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ अतुल कोठारी ने कहा कि न्यास द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की दिशा में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। हम देश के सैकड़ों शिक्षण संस्थाओं के साथ मिलकर इसके क्रियान्वयन पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष न्यास द्वारा एक राष्ट्र एक नाम : भारत अभियान की शुरुआत की थी और देशभर से 10 लाख हस्ताक्षर करवाने का संकल्प लिया था और मुझे बताते हुए गौरव की अनुभूति हो रही है कि हम लगभग इस लक्ष्य को पूर्ण कर चुके हैं। इस वर्ष की हमारी विशेष उपलब्धि रही के हमने श्रीनगर के विद्यालयों का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया, न्यास देश के हर प्रांत में अपने 11 विषय, 3 आयाम, 3 कार्यविभाग के माध्यम से पहुँच रहा है।

डॉ कोठारी ने कहा कि इस राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला में देशभर के प्रत्येक प्रांत से कार्यकर्ता सहभागिता करने सूरत आए हैं। इस कार्यशाला की आयोजन समिति ने यथासंभव प्रयास कर सभी व्यवस्थाओं को सुचारू बनाने का प्रयास किया है। हमें अनुशासन का पालन करते हुए व्यवस्थानुरूप ही व्यवहार करना है। कोई भी कार्यकर्ता जल व भोजन को व्यर्थ नहीं छोड़े इसकी विशेष चिंता करे, क्यूंकि हमारे यहाँ शिक्षक को आचार्य कहा गया है और जो आचरण से सिखाए वही आचार्य होता है।

तृतीय सत्र में न्यास से संबद्ध देशभर के शिक्षण संस्थानों द्वारा किए जा रहे शैक्षिक प्रयोगों, नवाचारों की प्रस्तुतियाँ म्यास के प्रतिमान केंद्रों द्वारा दी गईं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि किस प्रकार न्यास राष्ट्रव्यापी स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षण संस्थानों के साथ मिलकर परिवर्तन ला रहा है।

गुरु गोविन्द सिंह के साहबजादों को दी गई क्रूर यातनाओं और बलिदान का स्मृति दिवस

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दिल्ली । दिसम्बर माह की 21 से लेकर 27 के बीच गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों को दी गई क्रूरतम यातनाओं और बलिदान की तिथियाँ हैं। ऐसा उदाहरण विश्व के किसी इतिहास में नहीं मिलता। इनमें 26 दिसम्बर के दिन दो अवोध बालकों ने स्वत्व और राष्ट्र संस्कृति की रक्षा के बलिदान दिया। प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने इस दिन को “वीर बाल दिवस” के रूप में मनाने का आव्हान किया है।

सनातन संस्कृति, राष्ट्र और परंपराओं की रक्षा केलिये भारत में असंख्य बलिदान हुये हैं। इनमें कुछ परिवारों की तो पीढ़ियों का बलिदान हुआ। इसमें गुरु गोविन्दसिंह की वंश परंपरा भी है। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों और माता को दी गई क्रूरतम यातनाओं और उनके बलिदान का विवरण आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। इस बलिदान का स्मरण सामाजिक स्तर पर पूरा देश 21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर के बीच करता है। फिर भी 26 दिसम्बर वह तिथि है जब दो अबोध बालकों को क्रूरतम यातनाएँ दी गई थीं। वर्ष 2023 में भारत सरकार ने शासकीय स्तर पर आयोजन की घोषणा की। और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने का आव्हान भी किया।

सिक्ख परंपरा में गुरु गुरु गोबिंद सिंह दसवें गुरू थे। उनके पुत्रों के बलिदान ईस्वी सन् 1705 में हुये। इनमें दो सबसे छोटे पुत्रों साहिबजादा जोरावर सिंह व साहिबजादा फतेह सिंह का बलिदान 26 दिसम्बर को बहुत छोटी सी आयु में हुआ था। यह सिख पंथ के गरिमामयी गौरव परंपरा और राष्ट्र संस्कृति की रक्षा के लिए दी गई प्राणों क आहूति थी । उनके दो पुत्रों ने युद्ध भूमि में वीरता और अनोखे साहस का परिचय दिया वहीं दो छोटे साहिबजादों ने जिन्दा दीवार में दफ़न होना पसंद किया पर धर्मांतरण न किया। उनके सबसे बड़े पुत्र की आयु सत्रह वर्ष और सबसे छोटे पुत्र की आयु मात्र पाँच वर्ष थी । इनके साथ इनकी दादी माता गूजरी का बलिदान भी क्रूरतम यातनाओं के साथ हुआ ।

वह समय भारत में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन का अंतिम समय था । उसने सिख पंथ को जड़ से समाप्त करने का संकल्प कर लिया था। मुगल फौज पंजाब में फौज सिखों की तलाश में लगी थी। सिखों को को ढूंढ ढूंढ कर यातनाएँ दी जाने लगी। मतान्तरण का दबाब बना जो न मानें उनका बलिदान। उन दिनों सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह आनंदपुर किले में थे । मुगलों की फौज ने इस किले का घेरा डाला हुआ था। यह घेरा करीब छै माह तक पड़ा रहा। एक समय ऐसा आया जब किले का राशन पानी सब खत्म हो गया था। गुरू गोविन्द सिंह के सामने दो ही रास्ते थे एक अंतिम युद्ध लड़कर बलिदान हो जांय दूसरा सुरक्षित निकलकर युद्ध जारी रखा जाय। गुरु गोविन्द सिंह ने दूसरा मार्ग चुना। वे आनंदपुर से निकलकर चमकौर की ओर पहुँचे। यहां एक पुराना किला था वहां के निवासी सिख गुरु के प्रति श्रद्धा रखते थे। गुरु गोविन्द सिंह ने अपने परिवार और विश्वस्त सैनिकों के साथ यहीं आये। वे 21 दिसम्बर 1705 की रात थी जब वे चमकौर पहुँचे । गुरु गोविन्द सिंह जी आनंदपुर से निकलने की खबर मुगल सेना को लग गयी थी। मुगल फौज की एक टुकड़ी भी इस काफिले के पीछे चलने लगी। मुगलों की फौज का नेतृत्व सरहिन्द के नबाब बजीर खां के हाथ में था। जब गुरु गोविन्दसिंह चमकौर पहुँचे तो मुगल फौज ने चमकौर किले पर घेरा डाल लिया। चमकौर किले की यह इमारत पुरानी थी। वह इस स्थिति में नहीं थी कि लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। कुछ दीवारें तो केवल मिट्टी की थीं। इतिहास की पुस्तकों में मुगल फौज की संख्या तीन लाख अंकित है।

जबकि किले के भीतर सिखों की संख्या मात्र दो हजार थी जिसमें सामान्य नागरिक और स्त्री बच्चे अधिक थे, सैनिक कम थे। सैनिकों की संख्या तो मात्र कुछ सैकड़ा ही थी। लेकिन सिख सेनानियों ने संख्या बल कम होने की चिंता नहीं की। सभी सिख सैनिकों ने साहस से मुकाबला किया। यहीं से यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि “सवा लाख से एक लड़ांऊ”। यहाँ दो निर्णय हुये जत्थों के साथ युद्ध किया जाय और गुरुजी यनि गुरु गोविन्द सिंह को सुरक्षित निकाला जाय । जत्था तैयार करके युद्ध लड़ने की रणनीति बनी । और प्रत्येक जत्थें में केवल दस ही सैनिक होंगे। पहले जत्थे का नेतृत्व साहबजादे अजीत सिंह को सौंपा गया। अन्य सैनिकों ने साहबजादे को रोका पर अजीतसिंह न माने। गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बेटे को स्वयं हथियार दिये । साहबजादे निकले और शत्रु सेना पर टूट पड़े। वे बहुत अच्छे तीरंदाज थे । उनके पास तीर कमान और तलवार दोनों थी। दूसरी ओर मुगल सैनिकों के पास बंदूकें भी थीं। सभी सिख सैनिक जानते थे कि युद्ध का परिणाम क्या होगा पर भी उन्होंने युद्ध किया और अपने अंतिम तीर तक युद्ध किया। तलवार से भी तब तक युद्ध किया जब तक तलवार टूट न गयी। कोई इस वीरता की कल्पना कर सकता है कि केवल दस सैनिकों को लेकर एक नायक ने युद्ध लड़ा हो फिर भी यह युद्ध दिन के तीसरे पहर तक चला। यह 23 दिसम्बर का दिन था जब साहबजादे अजीत सिंह का बलिदान हुआ। अगले दिन का युद्ध दूसरे साहबजादे फतेह सिंह के नेतृत्व में सिख जत्थे ने लड़ा। तब फतेह सिंह की आयु मात्र पन्द्रह साल थी। वे भी वीरता पूर्वक बलिदान हुये। तब पंच प्यारों ने गुरू जी से सुरक्षित निकल जाने का आग्रह किया । उनका आग्रह मानकर गुरु गोविन्द सिंह अपने परिवार और कुछ सैनिकों के साथ किले के गुप्त मार्ग से निकलना स्वीकार कर लिया। यह संख्या कुल इक्यावन थी। कहीं कहीं यह संख्या साठ भी लिखी है। बाकी लोगों ने किले में ही रहकर मुकाबला करने का निर्णय लिया ताकि मुगल सैनिकों को यह संदेह न हो कि गुरुजी निकल गये । चमकौर के पास सरसा नदी बहती थी।

यह 24 और 25 दिसम्बर 1705 की दरम्यानी रात थी । भयानक ठंड और मावट का मौसम। पानी बर्फ की तरह ठंडा था। अभी गुरू गोविन्द सिंह का काफिला नदी पार भी न कर पाया था कि वजीर खान को खबर लग गयी। उसकी सेना नदी पर टूट पड़ी। इस अफरा तफरी मे गुरु गोविन्द सिंह का परिवार बिखर गया। सबसे छोटे दो साहबजादे जोरावर सिंह सात वर्ष और जुझार सिंह पाँच वर्ष दादी माता गुजरी के साथ बिछुड़ गये इनके साथ न कोई सेवक और न कोई सैनिक। अंधेरी रात और भीषण सर्दी के बीच दादी दोनों बच्चों ने नदी पार की। दादी अंधेरे में ही दोनों बच्चों को लेकर जहाँ राह मिली उसी ओर चल दी। कितना चलीं कितनी राह निकली कुछ पता नहीं । सबेरा हुआ। सूरज निकला। एक स्थान पर थकान मिटाने रुकीं, बच्चो को भोजन भी जुटाना था। तभी एक व्यक्ति दिखा। जिसका नाम गंगू था । वह गुरू गोविन्द सिंह का पुराना सेवक था। उसने माता गुजरी को पहचाना और विश्वास दिलाकर अपने घर ले गया। उसके गाँव का नाम खैहैड़ी था । उसने भोजन दिया विश्राम कराया । और घर से निकल लिया। यह 25 दिसम्बर का दिन था। उसने खबर बजीर खान को दी और इनाम में सोने की मुहर प्राप्त की। शाम तक मुगल सैनिक आ धमके। माता गूजरी और दोनों बच्चो को पकड़ ले गये। उन्हे रात भर बिना कपड़ो के बुर्ज की दीवार पर बांधकर रखा गया । अगले दिन वजीर खान के सामने पेश किया गया । वह 26 दिसम्बर 1704 का दिन था। वजीर खान ने माता गुजरी और दोनों बच्चो से इस्लाम कुबूल करने को कहा। बच्चो ने इंकार करदिया। वजीर खान ने आदेश दिया कि यदि बच्चे इस्लाम कुबूल न करें तो इन्हे जिन्दा दीवार में चुन दिया जाय। बच्चों को भूखा रखा गया। रात भर फिर बुर्ज पर पटका। पर दोनों साहबजादे अडिग रहे। उन्हें 26 दिसम्बर को जिन्दा दीवार में चुन देने का आदेश दे दिया। फिर माता गूजरी को प्रताड़ना देने का क्रम आरंभ हुआ 27 दिसम्बर को उनके भी बलिदान हुआ। इस तरह दिसम्बर माह का यह अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों साहबजादों और माता गूजरी के बलिदान की स्मृति के दिन हैं ।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 26 दिसम्बर वीर बाल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। और पिछले वर्ष से 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस के रुप में मनाया जाता है ।

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