कल की जीत विराट के लिए सिर्फ़ एक जीत नहीं थी

Screenshot-2025-06-04-at-2.27.04 PM.png

अनुराग़ पुनेठा

एक कहानी सुनाता हूँ…
जो बचपन में सुनी थी।

हंगरी का एक निशानेबाज़ था—कारोली ताकाक्स।
असाधारण निशाना, अटूट जज़्बा। उसकी कहानी में वो ताक़त थी कि वो मुर्दों में भी जान फूंक दे।

ताकाक्स का सपना था ओलंपिक पदक जीतना
वो सालों से तैय्यारी कर रहा था

1936 का ओलंपिक आया लेकिन उसे मना कर दिया गया—क्योंकि
वो सेना में अफ़सर नहीं था।

1940 ओंलपिक के लिये उसने पूरी ताक़त लगा दी।
तभी एक हादसा हुआ—एक ग्रेनेड फट गया… और उसकी दाहिनी कलाई उड़ गई।

अब सोचो… एक शूटिंग चैंपियन जिसकी निशानबाज़ी जिस हाथ पर टिकी हो… और वही हाथ चला जाए?
पर ताकाक्स ने हार नहीं मानी।

लोग जब सोच रहे थे कि अब उसका करियर खत्म हो गया है…
वो चुपचाप, गुपचुप… अपने बाएं हाथ से प्रैक्टिस करने लगा।
घंटों, महीनों, सालों… एक शब्द नहीं बोला, लेकिन दिन-रात जुटा रहा।

1939 में वो हंगरी का नेशनल चैंपियन बना।
मगर फिर, नियति ने एक और वार किया—1940 और 1944 के ओलंपिक सैकेंड वर्ल्ड वॉर की वजह से रद्द हो गए।
ताकाक्स फिर टूटा लेकिन हार नहीं मानी।

1948, उम्र—38 साल।

इस उम्र में आमतौर पर खिलाडी रिटायर हो जाते है।
लंदन ओलंपिक आया…
ताकाक्स बिलकुल साधारण सी शक्ल में।

लोगों को पता था कौन है,
लेकिन उसकी कटी हुई कलाई देखकर सबने उसे कमज़ोर समझ लिया।

सामने था अर्जेंटीना का चैंपियन कार्लोस एनरिक डियाज़ वैलिंते—सबकी उम्मीदें उसी पर टिकी थीं।

वैलिंते ने ताकाक्स से थोड़ा तंज कसते हुए पूछा—

“तुम यहाँ क्यों आए हो?”

ताकाक्स ने मुस्कुरा कर कहा—
“सीखने आया हूँ।”

…और फिर जो हुआ वो इतिहास बन गया।

ताकाक्स ने सिर्फ़ गोल्ड नहीं जीता, 580 अंकों के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर झंडा गाड दिया।

वैलिंते से पूरे 10 अंक आगे।

*कल रात मुझे ताकाक्स विराट कोहली में दिखा*

हाँ… वो विराट कोहली, जिसने ज़िंदगी भर जिस IPL की ट्रॉफी की जो तलाश की थी—वो कल पूरी हुई।
ये उसका सबसे बड़ा चेज़ था।

वो चेज़ जो आँकड़ों से नहीं, आँसुओं से जीता गया।

न 2012 का एशिया कप वाला 183 इतना भारी था,
न मलिंगा पर टूटी 133 रनों की सीबी सीरीज़ की पारी,
न हारिस रऊफ पर मारे गए दो ऐतिहासिक छक्कों वाली 82 रन की पारी।

क्योंकि इसमें न कोई बैट का स्वैग था,
न कवर ड्राइव की सुंदरता…

बस भीगी आँखें थीं… और ज़मीन थी…

जिस पर सिर टिकाकर विराट कोहली रो पड़ा।

जब किसी इंसान की मेहनत, उसका समर्पण, और उसकी श्रद्धा—इतनी स्पष्ट हो जाए…
तो फिर आलोचना, तंज, ट्रोलिंग—सब धुल जाते हैं।

मैं कभी विराट का प्रशंसक नहीं रहा।
उसकी ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामकता, गालियाँ देना, मैदान पर गुस्सा…

ये सब मेरी पीढ़ी के मिज़ाज के खिलाफ थे।
हमने सुनील गावस्कर देखा था, कपिल देव की शालीन आक्रामकता सुनी थी।

सचिन देखा था—बिना कुछ कहे जवाब देता बल्ले से।
गांगुली की बालकनी में टी-शर्ट भी गरिमा लिए हुए लगती थी।

विराट का अंदाज़ चुभता था।

गंभीर से झड़पें, गांगुली से मनमुटाव,
गावस्कर की बातें… टेस्ट क्रिकेट को अचानक अलविदा कह देना…

उसका प्लेयर होना कभी विवाद में नहीं रहा,
लेकिन उसका व्यक्तित्व एक द्वंद रहा।

पर कल…

विराट की आँखों ने सब बदल दिया।

कल का मैच सिर्फ़ एक जीत नहीं थी—वो विराट की पूरी जीवन-यात्रा की मुहर थी।
18 साल के सपने के आँसू।
हर IPL सीज़न में टूटती उम्मीदों के आँसू।

जब आख़िरी चार गेंदें बची थीं,
और विरोधी बल्लेबाज़ जीतने की आखिरी कोशिश में बड़े शॉट मार रहे थे…
एक-दो बार गेंद विराट के सिर के ऊपर से निकल गई…
उसकी आँखें भर आईं।

वो एक साधारण पल था—लेकिन उसमें एक असाधारण संघर्ष छुपा था।

RCB की ‘जिन्क्स’ की छवि के नीचे दबे उस इंसान ने
इतिहास को फाड़ डाला।

इस जीत में कोई स्टाइल नहीं था,
न कोई उछलना-कूदना…

बस एक इंसान था—जो सालों की मेहनत से नियति को हरा आया था।

उसका रोना—कोई हार का रोना नहीं था…
वो मंज़िल के मिल जाने के बाद आत्मा का रोना था।
वो प्रमाणपत्र था—जिसे खेल ने खुद विराट को दिया—

*अब तू जीत गया है।*

खास लोगों के आगे न्याय व्यवस्था इतनी बेबस क्यों

unnamed-4.png

दिल्ली । राजनीति शास्त्र की किताबें कहती हैं कि लोकतंत्र की बुनियाद “कानून के सामने बराबरी” (रूल ऑफ लॉ) के सिद्धांत पर टिकी हुई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 भी यही कहता है, लेकिन हक़ीक़त में यह सिद्धांत उन्हीं के पैरों तले कुचला जा रहा है, जो इंसाफ़ और हुकूमत के “रखवाले” होने का ढोंग करते हैं—जज, राज्यपाल, नेता, नौकरशाह। ये लोग कानून को अपने हिसाब से अपने पक्ष में घुमा लेते हैं क्योंकि इनको विशेषाधिकार प्राप्त हैं। जानकार बताते हैं कि विशेष दर्जा प्राप्त इन महान विभूतियों की एक लंबी लिस्ट भारत के हर हाइवे के टोल बूथ पर लगी होती है।

हाल ही में एक हाई कोर्ट जज के घर पर लगी आग ने समूचे देश का ध्यान आकर्षित किया। धुआँधार नोटों का ढेर मिला, जो शायद कुछ लोगों की नजर में रिश्वत का रिश्वत का जखीरा रहा हो। अगर किसी आम नागरिक के पास पहले तो मिलता नहीं, पर ऐसा कुछ जमा मिलता, तो पुलिस उसके घर की तलाशी लेती और उसे गिरफ्तार करती। मगर यह “न्याय का महान गुणी” आदर्श व्यक्ति, अभी निश्चिंत आराम से घूमता रहा दिख रहा है, अपने ओहदे की ढाल से सुरक्षित।

इसी तरह का एक और उदाहरण हमें 2018 में मिला, जब एक पूर्व राज्यपाल पर करोड़ों का घोटाला साबित हुआ, लेकिन अदालत ने केस को सालों तक लटकाए रखा। हालांकि गरीब बिना साधनों के लोग इस बीच, चोरी के इल्ज़ाम में जेलों में न्याय का इंतजार करते हुए बूढ़े हो जाते हैं।
बहुत पहले लिख गए महा कवि, ” समरथ को नहीं दोष गुसाईं।”

कहीं न कहीं, यह भारतीय न्याय व्यवस्था की सड़ी-गली सच्चाई है, जहां अमीर और प्रभावशाली लोग कानून से छूट पाए हुए हैं। 2022 में महाराष्ट्र के एक नेता को रिश्वत लेते पकड़ा गया था, लेकिन उसकी कानूनी जमानत और तारीख़ पर तारीख़ों की वजह से उसकी सज़ा पर कोई असर नहीं पड़ा। दूसरी ओर, वही नेता अगर एक आम आदमी होता तो उसे सज़ा पहले ही मिल चुकी होती।

जाहिर है कि सिस्टम में कुछ “मानव रूप में देवता” जैसे जज, अफ़सर और नेता हो गए हैं, जिन्हें कानून की पकड़ से बचने का अधिकार मिल गया है। जब भ्रष्ट जजों को महज़ एक हल्की फटकार मिलती है, तो वहीं गरीब की झोपड़ी गिरा दी जाती है। कानून ग़रीब के लिए शेर बन जाता है, लेकिन ताकतवर और अमीरों के लिए वह सिर्फ एक बिल्ली बनकर रह जाता है।

कई उदाहरण इस असमानता को और पुख्ता करते हैं। 2019 में एक प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता के खिलाफ ड्रग्स के मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जबकि छोटे स्तर के आरोपियों को जेल भेज दिया गया। वहीं, 2020 में दिल्ली के एक विधायक पर हत्या का आरोप था, मगर उसे भी कानून से बख़्शा गया। वहीं, एक गरीब व्यक्ति के खिलाफ मामूली अपराध पर कार्रवाई तेज़ी से होती है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री हों या विपक्ष के चहेते युवा नेता, फिल्म स्टार हों या बड़े घराने के वारिस, उनकी तरफदारी करने महा वकीलों की पूरी फौज उतर आती है और कई बार लगता है दबाव बनाकर कानून को अपने पक्ष में घुमा लेती है, चाहे आधी रात हो रही हो। कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का खौफ ऐसा है कि हर कोई टिप्पणी करने से बचता है, दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल और महंगी बना दी गई है कि पीड़ित आम आदमी सोच भी नहीं सकता है, न्याय के लिए बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने की।

इस सड़ी-गली व्यवस्था का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह लोकतंत्र को कमजोर करती है। कुछ देशों में यह लोकतंत्र नहीं, बल्कि “लूटतंत्र” बन जाता है, जिसमें गरीब और वंचित वर्ग को कोई स्थान नहीं मिलता।

अगर हमें अपने लोकतंत्र को बचाना है, तो इन “विशेषाधिकारों” की जंजीरें तोड़नी होंगी। समतामूलक समाज में अनुच्छेद 14 को केवल काग़जी हुक्म नहीं, बल्कि ज़िंदा हक़ीक़त बनाना होगा। यह तभी संभव है, जब हम कानून को सभी के लिए समान और बिना भेदभाव के बनाए रखें। तब ही यह संविधान का असली संदेश, “कानून के सामने सब समान हैं”, सही मायनों में अमल में आ सकेगा। वेदना ये है कि दशकों से लंबित पुलिस और अदालती रिफॉर्म्स, आज तक इंप्लीमेंट नहीं हो सके हैं। सरकारों की प्राथमिकताओं की लिस्ट में ये मुद्दे अदृश्य ही रहते हैं।

राष्ट्र का आकार तय करता है उनका भविष्य

unnamed-3.png

दिल्ली । जब भारत चारों ओर से असहज और शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से घिरा है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या छोटे, संसाधनहीन राष्ट्रों का कोई भविष्य बचा है? या वे हमेशा के लिए वैश्विक “बास्केट केस” बनकर रह जाएंगे—ऐसे देश जो गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और बाहरी सहायता पर निर्भरता के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं, और कट्टरवाद के टापू बने हुए हैं।

तेजी से बदलती तकनीक और वैश्वीकृत बाजारों के इस युग में, सीमित श्रमबल, पूंजी की कमी और बेहद छोटे घरेलू बाजार वाले ये देश वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं। वे या तो प्रवासी धन पर निर्भर हैं, या फिर क्षेत्रीय झगड़ों में उलझे रहते हैं।

छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी संप्रभुता को पीछे छोड़, समेकन की ओर कदम बढ़ाना ही दीर्घकालीन हल है।

यदि ये छोटे देश बड़े आर्थिक ब्लॉकों में विलीन हो जाएं, संसाधनों को साझा करें, व्यापारिक बाधाएं हटाएं, और साझा अवसंरचना विकसित करें—तो वे निवेश आकर्षित कर सकते हैं, नवाचार को बढ़ावा दे सकते हैं, और वैश्विक मंच पर अपनी सामूहिक आवाज बुलंद कर सकते हैं।
इतिहास गवाह है: अलगाव ने विनाश लाया है, जबकि एकजुटता ने समृद्धि का मार्ग खोला है।

आज का समय मांग करता है कि छोटे राष्ट्र पुरानी राष्ट्रवादी सोच से बाहर निकलें और रणनीतिक एकता के जरिए अपनी जगह बनाएं—नहीं तो वे धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते जाएंगे।

तकनीक के समान अवसर देने के वादे के बावजूद, छोटे और कमजोर देशों के लिए हालात और भी चुनौतीपूर्ण हो गए हैं। पर्याप्त भूमि, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन और पूंजी के अभाव में आत्मनिर्भर विकास की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।

पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव, नेपाल और सब-सहारा अफ्रीका के अनेक राष्ट्र इस संकट के जीवंत उदाहरण हैं।

पाकिस्तान, जिसकी आबादी 250 मिलियन के करीब है, गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा है, लेकिन उसके पास ना तो पूंजी है, ना ही औद्योगिक आधार जिससे वह मुद्रास्फीति या जलवायु संकट से लड़ सके।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था परिधान निर्यात पर टिकी है, जो अब ऑटोमेशन और वैश्विक बदलावों के कारण खतरे में है।

श्रीलंका पहले ही ऋण चूक और राजनीतिक अस्थिरता से टूट चुका है, और उसके मुख्य क्षेत्र—पर्यटन व कृषि—वैश्विक झटकों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं।

मालदीव, जिसकी भूमि सीमित है और जो भारी आयात पर निर्भर करता है, समुद्र के बढ़ते स्तर और वैश्विक अलगाव के दोहरे खतरे से जूझ रहा है।

छोटे राष्ट्रों के पास न तो तेल, न खनिज, न वन, और न ही जल जैसी प्राकृतिक पूंजी है, जो उन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था या कूटनीति में लाभ दे सके।
चाड और माली जैसे देश आज भी वर्षा-आधारित कृषि पर निर्भर हैं, जो जलवायु परिवर्तन के चलते अस्थिर होती जा रही है।
मलावी और लेसोथो जैसे देशों में उपजाऊ भूमि की भारी कमी है, जिससे कुपोषण और बड़े पैमाने पर पलायन जैसी समस्याएं जन्म ले रही हैं।

इन देशों में पूंजी निवेश और कुशल मानव संसाधन के अभाव के कारण, शिक्षित और कुशल लोग बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन कर रहे हैं।
अफ्रीकी यूनियन के अनुसार, हर साल 70,000 से अधिक प्रशिक्षित पेशेवर अफ्रीका से बाहर चले जाते हैं।
पाकिस्तान में स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसंरचना पर सरकारी निवेश बेहद कम है।
बांग्लादेश की मज़दूर शक्ति विशाल होने के बावजूद, आवश्यक कौशल की कमी के कारण यह वैश्विक मूल्य श्रृंखला में पिछड़ा हुआ है।

छोटे देशों के लिए जलवायु संकट कोई भविष्य की आशंका नहीं—बल्कि वर्तमान का विनाशकारी यथार्थ है।
मालदीव आने वाले दशकों में डूब सकता है।
बांग्लादेश हर साल बाढ़ और चक्रवात की मार से लाखों विस्थापितों को झेलता है।
साहेल क्षेत्र में पानी की कमी और रेगिस्तानीकरण से हिंसक संघर्ष शुरू हो चुके हैं।

इन परिस्थितियों से निपटने के लिए जितनी पूंजी की जरूरत है, वह इन देशों के पास नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त वादे अधूरे रह गए हैं, और ये राष्ट्र अपनी लड़ाई अकेले लड़ने को मजबूर हैं।

भारत, चीन, और अमेरिका जैसे विशाल बाजार वाले देशों के पास झटकों को सहने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और वैश्विक नियमों को आकार देने की क्षमता है। छोटे देशों के पास यह सामर्थ्य नहीं है।
वे अक्सर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में ‘मूल्य-निर्धारक’ नहीं, बल्कि ‘मूल्य-स्वीकारक’ बनकर रह जाते हैं।
ऑटोमेशन, AI और डिजिटल बदलावों के चलते बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों के श्रम-आधारित निर्यात क्षेत्रों पर संकट गहरा गया है।

IMF और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान कुछ राहत देने की कोशिश करते हैं, पर ये उपाय स्थायी समाधान नहीं हैं।
श्रीलंका में 2022 की जनता आंदोलन और पाकिस्तान का कर्ज़ संकट इस बात के प्रमाण हैं कि बाहरी ऋण और सख्त शर्तें सामाजिक अस्थिरता बढ़ा देती हैं।
असल बात यह है: जब देश छोटा हो, संसाधन सीमित हों और अर्थव्यवस्था जटिल न हो—तो कर्ज़ की मदद भी सीमित हो जाती है।

भले ही “आकार ही सब कुछ” न हो, लेकिन बिना आकार के सब कुछ कठिन हो जाता है।

आज के प्रतिस्पर्धी और असमान विश्व में, बड़े देशों को रणनीतिक गहराई, आर्थिक विविधता और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव प्राप्त है।

छोटे देशों के पास अब एक ही विकल्प बचता है:

क्षेत्रीय एकता, मानव संसाधन में भारी निवेश, जलवायु वित्त के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन, और पुरानी राष्ट्रवादी सोच से ऊपर उठकर साझेदारी की ओर बढ़ना।

यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वे केवल संघर्ष की कहानियां बनकर रह जाएंगे।

अंबेडकर पुल बना भ्रष्टाचार और गिरती व्यवस्था की पहचान

Screenshot-2025-06-03-at-2.04.45 PM.png

आगरा में यमुना नदी पर बना अंबेडकर पुल कभी एक शानदार स्मारक और शहर की ट्रैफिक समस्याओं का हल माना जाता था। लेकिन आज यह पुल बुरी हालत में खड़ा है — भ्रष्टाचार, लापरवाही और सरकारी नाकामयाबी का सबूत।

लगभग 15 साल पहले बना यह पुल अब ध्वस्त हो चुका है, मरम्मत जारी है।

यह सिर्फ एक सड़क सेतु नहीं, बल्कि हर रोज लोगों को याद दिलाने वाला दर्द है कि हमारे देश में सरकारी योजनाएँ कितनी लापरवाही और भ्रष्टाचार के साथ चलती हैं — शुरुआत धूमधाम से होती है, और अंत मजाक बनकर रह जाता है।

मई 2025 में आई एक साधारण आँधी के बाद पुल की रेलिंगें टूटकर गिर गईं — एक पुल के ऊपर, दूसरी सीधी यमुना नदी में। यह पहली बार नहीं हुआ। 2020 में भी यह पुल कई बार खराब हालत के कारण बंद किया गया था। अब लोग इसे मजाक में “हमेशा मरम्मत वाला पुल” कहने लगे हैं।

सरकारी जवाब? बस बैरिकेड लगा दिए जाते हैं, थोड़ी मरम्मत होती है, और फिर सब चुप। लगता है जैसे नीति बन गई हो — “घाव पर पट्टी लगाओ और भगवान भरोसे छोड़ दो।” लेकिन ये गहरी दरारें न तो सीमेंट से भरेंगी और न ही बहानों से।
इस बुरी हालत के पीछे वही पुरानी कहानी है — खराब निर्माण सामग्री, कोई जवाबदेही नहीं, और ठेकेदारों की कतार जो सरकारी पैसे तो खा जाते हैं, लेकिन जनता को खतरे में डाल देते हैं। जिस शहर में ताजमहल अपनी खूबसूरती और मजबूती से पूरी दुनिया को आकर्षित करता है, वहीं कुछ किलोमीटर दूर अंबेडकर पुल अपनी बदहाली से आगरा को शर्मिंदा करता है।
विडंबना देखिए — समानता और न्याय के प्रतीक के नाम पर बना यह पुल अब असमानता, असुरक्षा और अन्याय का प्रतीक बन गया है।
पुल के निर्माण और देखभाल में भ्रष्टाचार की बातें अब फुसफुसाहट से निकलकर खुलकर सामने आ चुकी हैं। भले ही ठोस सबूत न हों, लेकिन पुल की हालत ही सब कुछ बयाँ कर देती है। यह बूढ़ा नहीं हुआ, उसके पार्ट्स बिखर गए— और उसके साथ गिरा लोगों का भरोसा।

यह सिर्फ पुल नहीं, यह एक धोखा है।

काफी लोगों का मानना है कि इस सेतु के ओरिजिनल डिजाइन में राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थ या दबाव के चलते छेड़ छाड़ की गई। गलत कोण पर पुल को मोड़ा गया। सेतु निगम अधिकारी टेक्निकल फॉल्ट्स की लीपा पोती करते रहे हैं। हर कुछ महीने मरम्मत करनी पड़ती है। एत्माद्दौला जाने वाले टूरिस्ट्स बार बार दिक्कत में फंसते हैं। अब तो गाइड ले जाने से भी कतराने लगे हैं।

जब आम लोग हर दिन रास्ता बदलते हैं, मलबे से बचते हैं और जान जोखिम में डालते हैं, तो साफ है — यह सिर्फ आगरा की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए शर्म की बात है। जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, जब तक ढाँचा जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि लूट के लिए बनेगा, तब तक अंबेडकर पुल ऐसे ही जंग खाता रहेगा — भारत में गिरती व्यवस्था और भ्रष्टाचार का एक जीता-जागता सबूत।

scroll to top