सोशल मीडिया का धर्मयुद्ध: एलन मस्क के विरुद्ध महामंच

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अनुराग पुनेठा

जब भी इतिहास नई करवट लेता है, वह अक्सर शोर से नहीं, एक असहज ख़ामोशी से शुरू होता है। ठीक वैसे ही जैसे आज की दुनिया में सबसे बड़ा युद्ध—न हथियारों से, न सरहदों पर—बल्कि विचारों और विज्ञापन बजटों के ज़रिए लड़ा जा रहा है। यह वो युद्ध है जहाँ नायक और खलनायक की पहचान करना उतना आसान नहीं जितना पहले कभी था। इस युद्ध के केंद्र में है एलन मस्क—टेस्ला, स्पेसएक्स और अब X के मालिक—और उसके सामने खड़ी हैं 18 वैश्विक कंपनियाँ, जिनके पास लगभग 900 अरब डॉलर का संयुक्त वार्षिक विज्ञापन बजट है। Nestlé, Lego, Shell, Unilever, Pepsi, Colgate, Procter & Gamble—यह कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि वो ताकतें हैं जो तय करती हैं कि एक आम इंसान इंटरनेट पर क्या देखेगा और क्या नहीं।

2022 में इन कंपनियों ने GARM नामक संगठन के ज़रिए X से सामूहिक रूप से विज्ञापन हटा लिए। कारण बताया गया: “ब्रांड सेफ्टी।” लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच सिर्फ सुरक्षा का मामला था, या एक सोची-समझी रणनीति जिससे एक मंच को अपने हिसाब से मोड़ा जाए? उन्होंने X से कहा—कुछ शब्द हटाओ, कुछ विचारों को सीमित करो, कुछ चेहरों को मंच से बाहर करो। जब मस्क ने मंच को स्वतंत्र रखने की ज़िद की, तो पैसे का बहिष्कार शुरू हो गया। यह आज के दौर की ‘अभिव्यक्ति की कीमत’ है—और चुप्पी का मूल्य उससे भी ज़्यादा।

एलन मस्क ने चुप नहीं बैठने का फैसला किया। उसने मुकदमा ठोका—सिर्फ बदले की भावना से नहीं, बल्कि एक वैचारिक सवाल के साथ: क्या कॉरपोरेट जगत को यह अधिकार है कि वह इंटरनेट पर विचारों की सीमा तय करे? क्या एक समूह, अपने धनबल के ज़रिए, तय कर सकता है कि किसकी बात सुनी जाएगी और किसे खामोश किया जाएगा? और जब अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में यह सामने आया कि ये कंपनियाँ एकजुट होकर X की नीतियों को प्रभावित कर रही थीं, तो यह मुकदमा सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं रह गया, यह बन गया स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण की लड़ाई।

इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहाँ कोई नायक पूरी तरह से मासूम नहीं है, और कोई खलनायक पूरी तरह से दानवी नहीं। मस्क की अराजकता, उसका अहंकार, कभी-कभी सीमाओं से खेलने की उसकी आदत, उसे संदेह के घेरे में लाती है। लेकिन फिर भी, क्या कोई दूसरा इतना बड़ा जोखिम उठाने को तैयार होता? यह लड़ाई उसके लिए सिर्फ पैसे की नहीं, मंच की आत्मा की है। वह पूछ रहा है: क्या किसी विचार को उसकी असहजता के कारण दबा देना सही है? क्या अभिव्यक्ति का मंच एक कॉरपोरेट हैंडबुक से चलना चाहिए?

इस पूरे संघर्ष को कोई एक नाम देना मुश्किल है। कुछ इसे कॉरपोरेट सेंसरशिप कहेंगे, कुछ इसे डिजिटल युग की नई युद्ध नीति। लेकिन इसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी—यह मामला अदालत में भले ही कुछ हफ़्तों या महीनों में सुलझ जाए, पर इसका असर आने वाले दशकों तक महसूस किया जाएगा। क्योंकि यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं, बल्कि वह सवाल है जो हर व्यक्ति को छूता है जो इंटरनेट पर बोलता, सोचता और जीता है।

क्या हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ विज्ञापनदाता तय करें कि कौन बोले? क्या हम उस लोकतंत्र में यक़ीन रखते हैं जहाँ विचार स्वतंत्र हों, लेकिन अगर वो विचार किसी ब्रांड की “छवि” के खिलाफ हों, तो उन्हें दबा दिया जाए? या फिर हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ असहमति, असुविधा और ईमानदारी—सभी को मंच मिले?

शायद इस लड़ाई का नतीजा ये बताएगा कि डिजिटल युग में लोकतंत्र का मूल्य क्या है। क्योंकि यहाँ बात केवल एलन मस्क या 18 कंपनियों की नहीं है—यह हमारी उस मौलिक स्वतंत्रता की है जिसे हम अक्सर अपनी स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए हल्के में ले लेते हैं। यह वही क्षण है जहाँ ‘कैंसल कल्चर’ और ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप’ का अंतर धुंधला हो जाता है। और यही वह धुंध है जिससे आगे की दिशा तय होगी।

बात सिंदूर के नाम पर पैदा किए जा रहे विवाद की

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कोई पिता या बड़ा भाई बनकर अपनी बेटी या छोटी बहन के लिए सिंदूर भेज रहा है तो इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है?

भारतीय संस्कृति में, खासकर हिंदू विवाह परंपराओं में, सिंदूर को अक्सर ससुराल की तरफ से दुल्हन को भेजा जाता है। यह आमतौर पर विवाह के समय या उसके बाद की रस्मों में होता है, जैसे कि विदाई के बाद या गृह प्रवेश के दौरान। सिंदूर को सुहागिन स्त्री के लिए पति की लंबी उम्र और वैवाहिक जीवन की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।

कुछ समुदायों में, ससुराल पक्ष की ओर से सिंदूर, चूड़ियाँ, कपड़े और अन्य सुहाग की सामग्री दुल्हन को दी जाती है, जिसे “सिंदूर दान” या “सुहाग सामग्री” के रूप में जाना जाता है। यह प्रथा क्षेत्र और समुदाय के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती है।

जबसे बीजेपी ने घर घर सिंदूर पहुंचाने के अभियान का संकल्प लिया है, इससे सबसे अधिक समस्या उन्हें हो रही है, जो नए नए कन्वर्टेड हुए है या जिन्होंने क्रिश्चियन मां या क्रिश्चियन पत्नी से सिंदूर का महत्व समझा है।

वैसे यह देश एक दूसरे की परंपराओं को सम्मान देकर महान बना है लेकिन जिन्हें अपनी पहचान को लेकर ही डाउट हो अथवा बच्चे का नाम रखते हुए पिता का सरनेम लगाना है या क्रिश्चियन ससुर का सरनेम लगाना है तक की समझ ना हो, वे सिंदूर का महत्व क्या समझेंगे और क्या समझा पाएंगे?

28 मई 1883 : दोहरा आजीवन कारावास, सर्वाधिक प्रताड़ना ..

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भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य वोध जागरण केलिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही । स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा । वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला । यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण था कि उन्हें समाज ने “स्वातंत्र्यवीर” जैसे गौरवमयी उपाख्य से सम्मानित किया ।

उन्होंने अंडमान की काला-पानी जेल में कठोरतम यातनाएँ सहीं। उनकी कोठरी 7 X 11 आकार की थी । मौसम गर्मी का हो या सर्दी का उन्हें जमीन पर ही सोना होता था । इसी कोठरी कोने में शौच और पेशाब करना होती । और इसी में भोजन करना होता था । हाथ में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियाँ लगी होती थीं। उसी स्थिति में जो और जैसा मिले, वही भोजन करना होता था । उन्हें प्रतिदिन बैल की भाँति कोल्हू में जोता जाता था । यदि तेल निकालने की मात्रा कम हो तो पिटाई होती थी । भोजन नहीं दिया जाता था । उसी जेल में उनके भाई भी थे पर दोनों भाई एक दूसरे से मिलना तो दूर देख भी नहीं सकते थे । पूरी जेल में सावरकर जी एकमात्र ऐसे कैदी थे, जिनके गले में अंग्रेजों ने एक पट्टी लटका रखी थी । इस पर “D” लिखा था । “D” अर्थात डेंजरस। यातनाएँ देने का यह चक्र चला लगभग ग्यारह वर्ष चला ।

इतनी यातनाएँ देने का कारण यह था कि पूना से लेकर लंदन तक उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का कोई उपक्रम न किया हो । स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में आयोजित शोक सभा का विरोध किया था और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि दासता का उत्सव मत मनाओ..! उन्होंने 7 अक्टूबर 1905 को पूना में स्वदेशी अपनाओ आंदोलन छेड़ा और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी ।

यह सावरकर जी द्वारा स्वाभिमान और स्वतव जागरण केलिए किये जाने वाले कार्यों का ही प्रभाव था कि तिलक जी ने अपने समाचार पत्र “केसरी” में सावरकर जी को छत्रपति शिवाजी महाराज के समान बताकर प्रशंसा की थी । सावरकर जी द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कारण उन्हे फर्म्युसन कॉलेज पुणे से निकाल दिया गया था । इसके विरोध में छात्रों ने हड़ताल की । इस समूची घटना पर तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर जी के पक्ष में सम्पादकीय लिखा । वे पहले ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटेन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ लेने से इंकार कर दिया था । इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं मिला । यह घटना 1909 की है । वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिनकी पुस्तक “1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर प्रकाशन के पहले ही प्रतिबंध लगा । वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे । लेकिन तट पर बंदी बना लिये गये । सावरकर जी पहले ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला । वे भारत के पहले क्राँतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजी काल में दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले, “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया” । अपने काला पानी कारावास के दौरान उन्होंने कंकर और कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखीं ।

वे अंग्रेजी सत्ता काल में लगभग 30 वर्षों तक विभिन्न जेलों में रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1948 में गाँधी जी की हत्या के आक्षेप में पुनः गिरफ्तार हुये और न्यायालय द्वारा आरोप झूठे पाए जाने के बाद उन्हें ससम्मान रिहा किया गया ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

ऐसे महान स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र प्राँत के नासिक जिला अंतर्गत ग्राम भागुर में हुआ था। पिता दामोदर पंत सावरकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित ओजस्वी वक्ता थे और माता राधाबाई आध्यात्मिक विचारों और जीवन शैली की प्रबल पक्षधर थीं। इनके दो भाई गणेश दामोदर सावरकर उनसे बड़े थे और नारायण दामोदर सावरकर छोटे । एक बहन नैनाबाई थीं। जब विनायक केवल नौ वर्ष के थे तब महामारी में माता का देहान्त हो गया। और जब सोलह वर्ष के हुये तो पिता भी स्वर्ग सिधार गये । तब बड़े भाई गणेश सावरकर ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में किशोरवय विनायक की संकल्प शक्ति और दृढ़ हुई । 1901 में नासिक के शिवाजी हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। बचपन से बहुत कुशाग्र बुद्धि और अति संवेदनशील स्वभाव के थे । पढ़ाई-लिखाई के साथ कविता कहानी और सामायिक विषयों पर आलेख लिखा करते थे । अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने स्थानीय युवकों को साथ लेकर मित्र मेलों का आयोजन किया। इसी वर्ष1901 में विवाह हुआ । पत्नि यमुना बाई के पिता रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर आर्थिक रूप से समृद्ध थे । इसलिये उन्होने अपने दामाद की उच्च शिक्षा का भार उठाया। अपने इन धर्म पिता की सहायता से उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कालेज से बी॰ए॰ किया। समय के साथ दो संतान उत्पन्न हुई पुत्र का नाम विश्वास सावरकर और पुत्री का नाम प्रभात सावरकर रखा ।

1904 में उन्होंने अभिनव भारत नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन युवकों अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिकार करता था । अपने छात्र जीवन में भी वे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण दिया करते थे। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी उनसे बहुत प्रभावित हुये और उन्हीं के अनुमोदन पर सावरकर जी को श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली। और 1906 में आगे की पढ़ाई के लिये लंदन गये ।

सावरकर जी ने लन्दन के ग्रेज इन्न लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया और लंदन स्थित इण्डिया हाउस में रहने लगे । उन दिनों इण्डिया हाउस राजनितिक गतिविधियों का केन्द्र था जिसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी चला रहे थे। सावरकर जी ने ‘फ़्री इण्डिया सोसायटी’ का गठन किया । इसके द्वारा वे भारतीय छात्रों के बीच स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का अभियान चलाने में जुट गये । लंदन में ही उनकी भेंट लाला हरदयाल से हुई वे उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख लिखा था। इसके लिये 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । परन्तु 8 जुलाई 1910 को एम॰एस॰ मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते हुए सीवर होल के रास्ते ये भाग निकले । तैरकर फ्रांस के तट पर पहुँचे किन्तु बंदी बना लिये गये । 24 दिसम्बर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास घोषित हुआ । ब्रिटिश शासन काल में दो-दो आजन्म कारावास की सजा सहने वाले सावरकर जी विश्व में अकेले क्रांतिकारी हैं । उन्हे काला पानी भेजा गया वहाँ वे लगभग ग्यारह वर्ष रहे ।

1920 में वल्लभ भाई पटेल और बाल गंगाधर तिलक के कहने पर ब्रिटिश कानून ना तोड़ने और विद्रोह ना करने की शर्त पर उनकी रिहाई हो गई। सावरकर जी जानते थे कि जेल जीवन से अच्छा समाज में समाज जागरण किया जाये ।

सावरकर जी काँग्रेस से जुड़े थे लेकिन मालाबार में हिंसा और असहयोग आँदोलन में खिलाफत आँदोलन को जोड़ देने के निर्णय से उनके मतभेद हुये और वे काँग्रेस छोड़कर हिन्दु महासभा से जुड़ गये । हिन्दु महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने ।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब सावरकर जी ने दो ध्वज फहराये । एक भारतीय राष्ट्र ध्वज तिरंगा और दूसरा भारतीय संस्कृति का प्रतीक भगवा ध्वज । उन्होंने स्वतंत्र होने की प्रसन्नता व्यक्त की पर देश विभाजन पर दुःख व्यक्त किया । गाँधी जी हत्या के षड्यंत्र का आक्षेप उन पर भी लगा और 5 फरवरी 1948 गिरफ्तार किया गया। पर अदालत में आरोप सिद्ध न हुआ और वे सम्मान रिहा हुये । 19 अक्टूबर 1949 को उनके अनुज नारायणराव का देहान्त हुआ । 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाक़त अली ख़ान के दिल्ली आगमन पर पुनः उन्हें बेलगाम जेल में रोका गया। मई 1952 में पुणे की एक विशाल सभा में अभिनव भारत संगठन को भंग किया गया। 10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समारोह में वे मुख्य वक्ता रहे। 8 अक्टूबर 1949 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। 8 नवम्बर 1963 को उनकी पत्नी यमुनाबाई का निधन हुआ । सितम्बर, 1965 से उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा, जिसके बाद इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। एक फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को बम्बई में प्रातः 10 बजे पार्थिव शरीर त्यागकर परमधाम को प्रस्थान किया ।

सावरकर जी ने भारत की आज की सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी समस्याओं को बहुत पहले ही भाँप लिया था । 1962 में चीन द्वारा आक्रमण करने के लगभग दस वर्ष पहले ही उन्होंने देश को सतर्क कर दिया था कि चीन भारत पर आक्रमण करने वाला है। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद गोवा की मुक्ति की आवाज सबसे पहले सावरकर जी ने ही उठायी थी।

27 मई 1919 : सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी रामरक्खा का बलिदान

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चंडीगढ़ । सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी रामरख्खा ऐसे बलिदानी थे जिन्होंने पहले अंग्रेजों से भारत की मुक्ति केलिये सशस्त्र संघर्ष किया और जब बंदी बनाकर अंडमान-निकोबार जेल भेजा गया तो वहाँ स्वत्व रक्षा केलिये अनशन किया और बलिदान हुये ।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कितने बलिदानी ऐसे हैं जिनका इतिहास के पन्नों में नाम तो मिलता है पर पूरा विवरण नहीं मिलता ही नहीं। ऐसे ही बलिदानी क्राँतिकारी रामरख्खा हैं । जिनका स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास में केवल इतना उल्लेख है कि वे “लाहौर षड्यंत्र केस” में आरोपी थे । उन्हे आजन्म कारावास की सजा केलिये अंडमान की कालापानी जेल भेजा गया । अंडमान-निकोबार की जेल में भी उनका रिकार्ड है । वहाँ अनशन और बीमारी से मौत दर्ज है । लेकिन जेल के भीतर उनके संघर्ष का विवरण सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी शचीन्द्रनाथ सन्याल की आत्मकथा में मिलता है ।

क्राँतिकारी रामरख्खा ने अंडमान की काला पानी जेल में अपने स्वत्व रक्षा के लिये अनशन किया । यह अनशन तीन महीने चला और उनके प्राणों का बलिदान हुआ । उनके इस अनशन का विवरण क्राँतिकारी सचीन्द्र सान्याल की आत्मकथा में मिलता है ।
क्राँतिकारी राम रख्खा का जन्म

23 फरवरी 1884 को पंजाब प्राँत के होशियारपुर में हुआ था ।पिता जवाहर राम कर्मकांडी ब्राह्मण थे । बचपन में यज्ञोपवीत हुआ और आगे पढ़ने के लिये काशी भेज दिये गये । पढ़ाई के दौरान काशी में इनका संपर्क क्राँतिकारियों से हुआ और वे पढ़ाई छोड़कर भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के अभियान में गये । उन्होंने क्राँतिकारियों के साथ मेरठ, अमृतसर, बर्मा, मलाया और सिंगापुर की यात्राएँ की और अंग्रेजी सेना के भीतर काम कर रहे भारतीय सैनिकों के बीच 1857 की भाँति क्राँति का वातावरण बनाने का प्यास किया । इस काम में उन्हे एक जमादार सोहनलाल पाठक का सहयोग मिला । सोहनलाल बनारस के रहने वाले थे । पढ़ाई के दौरान दोनोँ की भेंट काशी में हुई थी । लेकिन समय के साथ दोनों के मार्ग अलग अलग हो गये थे । सोहन लाल सेना में भरती हो गये और रामरख्खा क्राँति की दिशा में आगे बढ़े। लेकिन पुनः भेंट हुई दोनों मिलकर राष्ट्र चेतना जागरण अभियान में लग गये । सेना में जाग्रति अभियान में इन्हें तीन अन्य तीन साथियों का सहयोग मिला । ये साथी मुजतबा हुसैन, अमर सिंह और अली अहमद थे ।

राम रख्खा कुशाग्र बुद्धि औ,अच्छे वक्ता थे । उन्हें बम बनाने और क्राँतिकारियों की कमरा बैठकों में संबोधन का काम मिला । उन्होंने यह काम भारत के विभिन्न नगरों के साथ वर्मा, बैंकाक और जर्मनी में भी किया । उनके कार्यों की सूचना अंग्रेज सरकार को लगी। पुलिस पीछे लगी तो वे सिंगापुर चले गये । उनका मानना ​​​​था कि भारत में क्राँति के लिये जर्मनी से पूरी सहायता मिलेगी । 1857 की भाँति 1915 में बकरीद के दिन पूरे देश में एक साथ क्राँति की योजना बनी । विद्रोह का कारण बनने के लिए रंगून में एक प्रस्ताव लिया गया था पहले मांडले षडयंत्र केस के संबंध में एकत्रित सूचना के आधार पर पुलिस ने चार क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया और 28 मार्च 1917 को मुकदमा शुरू हुआ । इन पर युद्ध छेड़ने, साजिश रचने, सेना को निष्ठा से भ्रमित करने के आरोप लगाए गए । इसके साथ विदेश में षड्यंत्र करने का आरोप लगा । 6 जुलाई 1917 को फैसला आया । राम रख्खा सहित चारों क्राँतिकारियों को पहले प्राण दंड मिला । अपील हुई तो सजा आजीवन कारावास में बदलकर अंडमान-निकोबार जेल भेज दिया गया ।

चारों क्राँतिकारियों को अंडमान लाया गया । अंडमान जेल में कैदी के आने और जाने पर पूरे कपड़े उतारकर तलाशी होती थी । राम रख्खा जी की तलाशी हुई और तलाशी के दौरान यज्ञोपवीत उतारने को कहा गया । उन्होंने सारे वस्त्र तो उतार दिये पर यज्ञोपवीत उतारने से मना कर दिया । जब नहीं माने तो जेलर ने पिटाई की और जनेऊ तोड़कर फेक दिया । क्राँतिकारी राम रख्खा ने अनशन आरंभ कर दिया । उन्हे बल पूर्वक खिलाने की कोशिश हुई। अन्न मुँह में ढूसा गया । क्राँतिकारी राम रख्खा ने सब सहा लेकिन अपना जनेऊ पुनः प्राप्त करने की जिद न छोड़ी। उनका अनशन और संघर्ष तीन महीने चला । जो उनके प्राणों के बलिदान के बाद ही रुका । उनके इस संघर्ष का वर्णन अंडमान जेल में उनके दो समकालीन क्राँतिकारियो ने किया है । एक तो शचीन्द्रनाथ सन्याल की आत्मकथा में जो उन्होंने रिहाई के बाद लिखी। शचीन्द्र सान्याल की आत्म कथा में वर्णन है कि “एक और क्रांतिकारी था, नाम रामरक्खा था, वे पंजाब के रहने वाले थे । उन्होने चीन जापान अदि देशों के प्रवासकाल में क्रांतिकारी दल की सदस्यता ग्रहण की वो रंगून में क्रांति फ़ैलाने के आरोप में गिरफ्तारी हुई। उन्हें आजन्म सजा ए कालापानी का पुरस्कार मिला। रामरक्खा जब अंडमान की जेल में आएं तो उसने देखा कि यहाँ गले से जनेऊ निकाल दिया जाता है। यह बात उसको खटकी। वह देश-विदेश घूम चुके थे। विचार विकसित हो चुके थे। रूढ़ीवाद या अंधश्रद्धा के कारण नही बल्कि विचारपूर्वक ही उन्हें अंग्रेजों का यह अन्याय सहन नही हुआ। उन्होने इस बात का विरोध किया कि किसी के इच्छा के विरुद्ध उसके जनेऊ आदि नही छीने जाएँ |

अतः जब बलपूर्वक उनका जनेऊ उतारकर छिन्न-भिन्न कर दिया तो राम रख्खा बिगड़ उठे और उन्होने कसम खायी कि जब तक नया जनेऊ नहीं मिलेगा तब तक रोटी नही लूंगा, जल भी नही लूंगा, रामरक्खा को अनशन किये जब पंद्रह दिन गुजर गए ; तब उनकी नाक में नली डाल कर कुछ खाद्य द्रव रूप में पहुँचाया जाता रहा।रामरक्खा कमजोर हो गए किन्तु वह डिगे नही, उनकी छाती में भयंकर पीड़ा होने लगी, डॉक्टरों ने परीक्षण कर कहा कि ये तो यक्ष्मा ने ग्रस हो गए है। यह जानकर सभी साथी चिंतित हुए और रामरख्खा को अनशन तोड़ने का आग्रह भी किया, वह इनकार करते रहे। मुझे लगा कि शायद उसने मृत्यु के द्वार पर ही आसन जमा लिया है । रोग बढ़ता गया, दो महीने तक उन्होने भयंकर यातनाएं भोगी और अंततः वह क्रांतिकारी बलिदान की भेंट चढ़ गया । किन्तु यह सनसनीखेज शोक-संवाद भारतीय अख़बारों तक पहुँच गया। बात दबाई नही जा सकी और अंततः सरकार को यह आदेश जारी करना पड़ा कि अंडमान में अब किसी के भी जनेऊ नही उतारे जायेंगे। यही नहीं, सभी धर्मों के अनुयाइयों को अपने धर्म चिन्ह जेल में अपने पास रखने की अनुमति मिल गयी। मेरा मन मुझसे कहने लगा कि शायद मुझे भी इसी रास्ते जाना पड़ेगा। रामरक्खा सरीखे उदार और शूरवीर देशभक्तों को जब मृत्यु के मुख में जाते देखता तो ह्रदय अशांत हो जाता”
वहीं दूसरा वर्णन त्रिलोक्य चक्रवर्ती जी ने लिखा । उन्होंने लिखा है…

‘‘बर्मा के कैदियों में ही पंडित रामरक्खा थे। रामरक्खा उत्तर भारत के ब्राह्मण थे। जब उनका जनेऊ ले लिया गया, तो उन्होंने अनशन कर दिया। तीन महीने अनशन के बाद उनकी मृत्यु हो गई, पर उन्हें जनेऊ वापस नहीं मिला।

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