Corruption at the Border: A Threat to National Security in Raxaul

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Raxaul (Bihar) : The India-Nepal border, particularly at Raxaul in Bihar, is a critical frontier for national security, serving as a gateway between the two nations. This open and porous border, while fostering trade and cultural exchange, has long been vulnerable to infiltration, smuggling, and other illicit activities. The recent suspension of Rajiv Nandan Sinha, the police station in-charge at Raxaul, has cast a harsh spotlight on the fragility of border security and the deep-rooted issue of corruption within law enforcement. This incident not only raises questions about the credibility of border policing but also underscores the urgent need for systemic reforms to safeguard national interests.

On May 21, 2025, reports emerged that Rajiv Nandan Sinha was suspended following allegations of corruption. According to investigations led by Deputy Inspector General (DIG) Harikishore Rai, Sinha allegedly extorted goods worth lakhs from a local shopkeeper and, when pressed for payment, falsely implicated the shopkeeper in a fabricated case. This blatant abuse of power prompted swift action from DIG Rai, who, after verifying the accusations, ordered Sinha’s suspension. The incident has sent shockwaves through the region, with the Home Ministry of India expressing serious concern over the implications for border security.

Raxaul, located in East Champaran district, is one of the most sensitive points along the 1,751-kilometer India-Nepal border. Its strategic location makes it a hotspot for cross-border smuggling, human trafficking, and potential infiltration by anti-national elements. The open border policy, while promoting bilateral ties, poses significant challenges for law enforcement. The Sashastra Seema Bal (SSB) and local police are tasked with maintaining vigilance, but incidents like Sinha’s misconduct highlight how corruption can undermine these efforts. When those entrusted with protecting the border prioritize personal gain over duty, the nation’s security is compromised.

Sinha’s case is not an isolated one. His prior postings at Mufassil police station and Gaunaha in Bettiah suggest a pattern that warrants deeper scrutiny. Allegations of extortion and misuse of authority raise questions about whether similar misconduct occurred during his earlier tenures. Victims of false cases or unresolved disputes from those periods may still be awaiting justice. The Home Ministry must expand its investigation to include Sinha’s past actions, ensuring accountability and restoring public trust. Such a probe could uncover systemic issues within the police department, where individual officers exploit their authority, tarnishing the institution’s reputation.

The broader implications of this incident are alarming. Corruption at the border is akin to termites eating away at the foundation of national security. Officers like Sinha, who allegedly “sell honor for money,” create vulnerabilities that can be exploited by smugglers, traffickers, or worse, those with malicious intent. The India-Nepal border has historically been a conduit for illegal activities, including the smuggling of drugs, arms, and counterfeit currency. Recent reports indicate heightened security measures following incidents like the Pahalgam terrorist attack, with increased frisking and patrolling at key border points. Yet, if those tasked with enforcing these measures are themselves compromised, the entire security apparatus is at risk.

The suspension of Sinha is a step in the right direction, but it is not enough. The Home Ministry and Bihar Police must implement stricter oversight mechanisms, including regular audits of border police activities and anonymous reporting channels for citizens to flag corruption. Training programs emphasizing ethical conduct and the importance of border security could help instill a sense of duty among officers. Additionally, leveraging technology, such as surveillance systems and digital tracking of cross-border movements, could reduce reliance on human discretion, minimizing opportunities for corruption.

Public trust in law enforcement is fragile, and incidents like this erode it further. The people of Raxaul and beyond deserve a police force that upholds justice, not one that exploits vulnerabilities. The stain of corruption must be addressed through swift, transparent action and systemic reforms to ensure that the nation’s borders remain secure.

उस दिन राजेन्द्र यादव सामने होता तो गला पकड़ लेता

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पंकज कुमार झा

इस सर्वाधिक कुरूप व्यक्ति को देख कर तो अनेक चेहरे याद आ गये, किंतु आज जिस शिद्दत से मैं एक चेहरे को याद कर रहा हूं और उसका मिलान जिससे कर पा रहा हूं, वह है कुरूपतम राजेंद्र यादव का। काश यादव अभी जिन्दा होते।

सन् 2004 से थोड़ा-बहुत लिखने पढ़ने लगा था माओवादी आतंकवाद पर। स्वभाव है अपना कि तटस्थ भाव से चीजों को देख नहीं पाता। जिस भी विषय से जुड़ता हूं, भीतर-बाहर एक जैसा रहता हूं। ऐसा किसी पत्रकार के लिए होना उचित नहीं है। इसलिए मुख्यधारा की पत्रकारिता कभी रास आ भी नहीं सकती थी हमें। मेरा हमेशा एक पक्ष होता है। हम इस मायने में ईमानदार हो ही नहीं सकते।

बहरहाल! यह वो समय था, जब नक्सल समर्थन में लिखना न केवल फैशन था अपितु तब वह आपके पत्रकार होने पर मुहर भी था। छत्तीसगढ़ का इस मामले में हाल तो ऐसा था था कि बकायदा तब के कथित नक्सल प्रवक्ता का लेख आता था, अगले दिन राज्य का डीजीपी लेख लिख कर उसका जवाब देते थे। आश्चर्य लगता था कि यह हो क्या रहा है भला? जिस व्यक्ति के हाथ में ए. के. सैंतालिस होना चाहिये, वह कलम और सिगरेट थामे एन्थेसिस, पैनथीसिस, केंथीसिस किए जा रहा है। बहुत सारी चीजें प्रतीक में भी दिखनी चाहिए, यह सही है कि कप्तान एसएलआर थामे सीमा पर नहीं पहुंच जाता, पर ऐसा दिखना अवश्य चाहिये उसे कि वह युद्धकाल में बुद्धिविलास में रत नहीं है। खैर।

यह किसी का अपमान करने के लिए नहीं है, बस याद आ रहा आज पुराना सब तो लिखते जा रहा हूं, जैसा कि करेक्टनेस को छोड़ कर लिखते रहने का अपना व्यसन है। उस समय भी सरकार अपनी ही थी। निस्संदेह जनकल्याण के अद्भुत और ऐतिहासिक कार्य हो रहे थे तब, फिर भी अपनी ही सरकार में अपने ही लोगों के विरुद्ध भी इस विषय पर अखबारों में लिखने से बाज नहीं आता था। हालांकि उन आलोचनाओं का भी कितना सम्मान होता था, आपकी अभिव्यक्ति कैसे सराही जाती थी, जिनकी आप आलोचना कर देते थे, वे भी कैसे मिलने पर तारीफ ही करते थे, वह अलग से रेखांकित किये जाने योग्य है।

उसके बाद माओवादी आतंक के खिलाफ खूब लिखा। खूब छपा। खूब सक्रियता भी रही। अनेक श्रेष्ठ लेखक बाद में देश को मिले। अनेक कार्यक्रम दिल्ली और बाहर भी किया। विनायक सेन और अग्निवेश जैसों के विरुद्ध तो अनेक कवर स्टोरी की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में की। जंतर मंतर पर जा कर अन्ना आंदोलन में अग्निवेश को नंगा भी किया। किंतु…

एक समय के बाद अखबारों आदि में नक्सल पर लिखना छोड़ दिया था। कई बार ऐसा हुआ कि किसी अखबार या संस्थान से चेक आया पारिश्रमिक का, (उस समय वह छोटा-छोटा चेक भी अपने लिए महत्व का होता था आर्थिक दृष्टि से भी। फिर भी) और इधर फिर कोई नयी घटना हो जाती थी जिसमें दर्जनों जवान या आदिवासी बलिदान हो जाते थे, लगता था जैसे हम उनकी पीड़ा को बेच कर पैसे कमा रहे हों। कुछ अच्छा सुरक्षा बलों को हासिल नहीं हो पाता था, तो बेबस और लाचार महसूस करता था।

फिर शुरू हुआ सलवा जूडूम। उसके साथ क्या साजिशें की गयी। कैसे हमारे टाइगर महेंद्र कर्मा जी की नृशंस हत्या हुई, ये सारी चीजें आंखों से अभी ओझल ही नहीं हो रही है। लम्बी दास्तान है – रानीबोदली, एर्राबोर, चिल्तननार, मदनवाड़ा से लेकर झीरम तक की, लाशें बिछती रही और लोग बुद्धिविलास करते रहे, जेएनयू आदि में जश्न मनता रहा।

वक्त का पहिया घूमा, भाजपा फिर सत्ता में आयी। इस बार तैयारी पूरी थी क्योंकि भाजपा को यह साबित करना था कि वह जरूरी क्यों है। पिछले अनुभवों से लाभ लेकर न केवल युद्ध के मोर्चे पर बल्कि बौद्धिक मोर्चे पर भी इस बार तैयारी जोरदार थी। मोदीजी की खुली छूट, अमित शाह जी का संकल्प, जनजाति समाज से ही आने वाले विष्णु देव साय जी की खुली छूट और उत्साही गृह मंत्री विजय शर्मा जी की लगन। ऐसी लगी फिर कि नस्तनाबूत ही हो गया नक्सल संसार।

हां, तो पिछले अनुभव से सबक लेकर इस बार तय किया गया था कि आत्मसमर्पण नीति, पुनर्वास नीति, गिरफ्तारी, एनकाउंटर… आदि पर तो काम किया ही जायेगा, किंतु साथ-साथ आधा मोर्चे को भी जड़ मूल से उखाड़ने की कोशिश होगी। अर्बन नक्सल का भी सफाया होगा। नक्सल समर्थन में उठे ‘हाथ’ को तोड़कर जंगल में फेक दिया जायेगा, इसके समर्थन में उठने वाली आवाज के हलक से जुबान खींच कर उसे कुत्ते को खिला दिया जायेगा, वह कलम जो मेरे बस्तर के विरुद्ध उठेगा उसे तोड़ कर कलमदस्युओं की आंख में घोंप दिया जायेगा, ठंडे दिमाग और गरम खून में साथ शुरू इस नये अभियान को इसी जज्बे से प्रारंभ किया गया था। समर्पण इतना कि आप खुद प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को किसी गरम सी दोपहर में कनाट प्लेस में अपने लोगों के साथ नक्सलियों के पक्ष में चिपकाये पोस्टर को मिटाते हुए देख सकते थे।

युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है लेकिन अब विजय के मुहाने पर अवश्य खड़ा है आज लोकतंत्र और संविधान। जब दुनिया टकटकी लगाये ऑपरेशन सिंदूर देखने में व्यस्त थी, जब सारे समाचार माध्यम लाहौर और पिण्डी का विध्वंस दिखाने में व्यस्त थे, यह एक युद्ध भीतर भी चल रहा था बस्तर के। हजारों जवानों वहां कर्रेगुटा की पहाड़ी पर उतरे और बिच्छुओं का सफाया करना शुरू कर दिया। हमेशा की तरह अंत-अंत में कांगरेड की गद्दारी सामने आनी ही थी, आयी भी तेलंगाना के सीएम के बयान के रूप में और शायद कुछ अन्य रूपों में भी, पर जवान डटे रहे। दिल्ली और रायपुर की नजर इधर बनी रही, काम चलता रहा। बड़ी सफलता आज एक करोड़ से अधिक के ईनामी पोलित ब्यूरो के सदस्य समेत ढाई दर्जन नक्सल शव में रूप में मिली है, करोड़ों के ईनामी का चेहरा बिल्कुल राजेंद्र यादव टाइप लगा मुझे तो।

लौटते हैं रजिंदर की तरफ। इसी बुद्धिविलास के दौर में जिसका जिक्र ऊपर है, एक बार हंस में राजेंद्र की संपादकीय पढ़ कर लगा कि आज अगर उनके सामने होता तो शायद गर्दन पकड़ लेता उनकी। जवानी का गरम खून उबाल ले रहा था, ऊपर से अपने लोगों की लाशें गिनते-गिनते आंखें पथरा गयी थी। उस संपादकीय को लेकर बड़े साहब के पास पहुंचा था। उन्हें बताया कि इस व्यक्ति के कमर में रस्सा डाल कर इसे रायपुर की अदालत में हथकड़ी पहना कर हाजिर कराना चाहिए। छोटा सा एक जुलूस भी इसका रायपुर में निकालेंगे। किसी युवा के लिए ऐसा कह देना आसान था, किंतु ऐसा कदम किसी मुखिया के लिये उठाना आसान नहीं था। काफी देर सोचते हुए साहब ने तब कहा था, मामला गंभीर है, जन सुरक्षा कानून के तहत मामला बनता भी है, पर कितने मोर्चे आखिर एक साथ खोल सकते हैं। वास्तव में वे बिल्कुल सही थे। यह 2014 से पहले की बात थी। तब राष्ट्रीय परिस्थितियां आज जैसी थी नहीं।

आज स्थिति हर तरह से राष्ट्र के पक्ष का है और जिस तरह केंद्र में भी मेहनत हुई, दिल्ली जा कर जिस तरह नक्सल पीड़ितों ने अपना पक्ष रखा, उसके बाद तो जेएनयू वाले मुफ्तखोर कन्हैया की भी हिम्मत नहीं है अब टुकड़े वाली बात करने की। अब तो गंगा ढाबे पर भी हमने नारे गुंजा दिया है – नक्सल तेरी कब्र खुदेगी जेएनयू की धरती पर। बहरहाल!

काश, काश आज रजिंदर जीवित होते। काश आज उनकी आंखों से काला चश्मा नोंच कर हम उनके सामने किसी हिडमा को बांध कर वैसा ही खड़ा कर पाते जैसा आज किसी मुनीर की छाती पर राफेल टिका कर हमने आनंद लिया है। आपके हर सपने पूरे हों ही, यह आवश्यक नहीं। पर भाजपा सरकार के दौरान हमारे सुरक्षा बलों के शौर्य से जो उपलब्धियां हमने प्राप्त की है, उसके लिए यह कह सकता हूं कि सात जन्म अगर मनुष्य के रूप में ही जन्म लेने का अवसर मिले, तो हर बार भाजपा कार्यकर्ता बन कर ही आना चाहूंगा।

युद्ध न तो भीतर का समाप्त हुआ है अभी, न ही बाहर का। कांग्रेस दोनों जगह आज भी जुटी है दुष्प्रचार करने में। जहां सिंदूर में वह भारत को नीचा दिखाने में कोई कसर छोड़ रहा है, न ही बस्तर में अदाणी के बारे में दुष्प्रचार कर, या फिर तेलंगाना के सीएम से बयान आदि दिलवा कर, वह युद्ध को कमजोर करने में जुटी हुई है, फिर भी एक निर्णायक बढ़त हमें ढाई में से दो मोर्चों पर आज हासिल तो है ही। जो आधा बचा है, वह भी जीत जायेंगे हम, निस्संदेह। भगवा प्रणाम।

बिहार में सीमा सुरक्षा की साख कटघरे में

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भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रक्सौल, बिहार का एक अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है, जो न केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि घुसपैठ, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों के लिए भी चर्चा में रहता है। इस सीमा की खुली प्रकृति इसे अपराधियों और घुसपैठियों के लिए एक आसान रास्ता बनाती है, जिससे भारत सरकार का गृह मंत्रालय हमेशा चिंतित रहता है। ऐसे में, रक्सौल थाना प्रभारी राजीव नंदन सिन्हा का हालिया निलंबन न केवल स्थानीय प्रशासन की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि सीमा सुरक्षा और पुलिस विभाग की साख को भी कटघरे में खड़ा करता है।

राजीव नंदन सिन्हा, जो पहले बेतिया के मुफस्सिल थाना और गौनाहा में तैनात रहे हैं, पर गंभीर आरोप लगे हैं। उनके खिलाफ एक स्थानीय दुकानदार ने शिकायत की थी कि उन्होंने लाखों रुपये का सामान लिया, लेकिन जब भुगतान की मांग की गई, तो उन्होंने दुकानदार को झूठे मुकदमे में फंसा दिया। यह मामला इतना गंभीर था कि यह डीआईजी हरीकिशोर राय तक पहुंचा। डीआईजी की जांच में यह सत्य सामने आया कि थाना प्रभारी ने न केवल अनैतिक कार्य किया, बल्कि अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर एक निर्दोष व्यक्ति को प्रताड़ित किया। परिणामस्वरूप, राजीव नंदन सिन्हा को निलंबित कर दिया गया है। यह घटना न केवल उनके व्यक्तिगत चरित्र पर दाग है, बल्कि पूरे पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है।

रक्सौल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहां घुसपैठ और तस्करी का खतरा हमेशा बना रहता है, पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भारत-नेपाल की खुली सीमा का लाभ उठाकर बांग्लादेशी और अन्य विदेशी नागरिक अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते रहे हैं। हाल के वर्षों में, रक्सौल और आसपास के क्षेत्रों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जहां सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) ने घुसपैठियों को पकड़ा है। ऐसी स्थिति में, यदि थाना प्रभारी जैसे जिम्मेदार अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं, तो यह देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। राजीव नंदन सिन्हा जैसे अधिकारी, जो कथित तौर पर पैसों के लिए अपने ईमान को दांव पर लगाते हैं, न केवल कानून-व्यवस्था को कमजोर करते हैं, बल्कि आम जनता के बीच पुलिस के प्रति अविश्वास को भी बढ़ाते हैं।

इस घटना के बाद चंपारण के लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि राजीव नंदन सिन्हा के पिछले कार्यकाल की भी जांच होनी चाहिए। उनके द्वारा निष्पादित पुराने मामलों की पड़ताल आवश्यक है, क्योंकि यह संभव है कि उनकी गलत कार्यशैली के कारण कई पीड़ितों को न्याय न मिला हो। बेतिया मुफ्फसिल थाना और गौनाहा में उनकी तैनाती के दौरान भी उनके कामकाज पर सवाल उठे हैं। यदि इन मामलों की गहन जांच हो, तो यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या उन्होंने पहले भी अपने पद का दुरुपयोग किया था।

यह मामला पुलिस विभाग के लिए एक सबक है। रक्सौल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात अधिकारियों का चयन और उनकी कार्यप्रणाली पर कड़ी निगरानी जरूरी है। डीआईजी हरीकिशोर राय की त्वरित कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए सख्त नियम, नियमित ऑडिट, और पारदर्शी जांच प्रक्रिया को लागू करना होगा। साथ ही, स्थानीय लोगों को भी सशक्त बनाना होगा ताकि वे बिना डर के ऐसी घटनाओं की शिकायत कर सकें।

राजीव नंदन सिन्हा का निलंबन एक चेतावनी है कि भ्रष्टाचार और लापरवाही देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है। रक्सौल जैसे क्षेत्रों में पुलिस और प्रशासन को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना होगा। सरकार को चाहिए कि वह सीमा क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ करे और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। तभी हम एक सुरक्षित और भरोसेमंद व्यवस्था की ओर बढ़ सकेंगे।

पंकज कुमार झा की कविता, अरे सुपीरिया झुकना नहीं था…

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अरे सुपीरिया, झुकना न था
अरे सुपीरिया, झुकना न था
पाकी के आगे बिछना न था
किस-किस के आगे झुकोगी
किस-किस के आगे बिछोगी
चंद रूपल्ली सिक्कों खातिर
अपना मान लुटाना न था
अरे सुपीरिया झुकना न था
इस-उस के आगे बिछना न था।
अरे सुपीरिया झुकना न था
लड़की हो लड़ सकती हो तो
आतंकी-पाकी से लड़ती तुम
नक्सल, भ्रष्टाचारी
चोर-लुटेरे, बटमारों से …
लड़-लड़ आगे बढ़ना भी था
अरे सुपीरिया झुकना न था
इस-उस के आगे बिछना न था
अरे सुपीरिया …..
कुछ तो लाज-लिहाज करो तुम
हिन्दुस्थान पे नाज करो तुम
बेटी हो परवाज करो तुम
भारत की आवाज बनो तुम
कांग्रेस का बंटाधार करो तुम
माटी की कीमत पर बिकना न था
अरे सुपीरिया ….
तुम भारत की बेटी थी
वर्धन की श्रीनेती थी
पिता का करती ऊंचा नाम
कुछ तो करती अच्छा काम
देश को न बदनाम करो तुम
आसमान पे थूकना न था
अरे सुपीरिया…
फादर आज जहां भी होंगे
बिटिया पर शर्मिंदा होंगे
स्वर्ग में करते निंदा होंगे
बेबस-लाचार परिंदा होंगे
हरष वहां विषादित होंगे
पालन पर पछताते होंगे
अपने पर सकुचाते होंगे
रोते और खोखियाते होंगे
पीड़ा का पारावार न होगा
सोचा ऐसा बंटाधार न होगा
परवरिश का मान घटाना न था
अरे सुपीरिया ….
भारत जब इतिहास लिखेगा
तब तेरा उपहास लिखेगा
पाकिस्तानी परिहास लिखेगा
करती भोग-विलास लिखेगा
गद्दार तुम्हें सायास लिखेगा
गाली तेरी दर्ज करेगा
काली करतूतों को तेरी
अपने पन्नों में मर्ज करेगा
मीरों-जयचंदों की टोली में
अपना नाम लिखाना न था
अरे सुपीरिया बिकना न था
राहुल के आगे टिकना न था
अरे सुपीरिया
बिकना न था
अरे सुपीरिया
टिकना न था
अरे सुपीरिया
बिछना न था
अरे सुपीरिया मिटना ही था
अरे सुपीरिया …….

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