10 मिनट की डिलीवरी: क्विक कॉमर्स की चमक में डूबती किराने की दुकानें

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बृज खंडेलवाल

जयपुर : दरवाज़े पर दस्तक अब पड़ोसी की नहीं, ऐप की होती है। सब्ज़ी, दूध, दाल‑चावल से लेकर दवा और कपड़े तक, सब कुछ उँगली के एक क्लिक पर हाज़िर है। न बाज़ार जाने की झंझट, न पसीना, न मोलभाव की आवाज़ें। न दुकानदार की पहचान, न उधारी का भरोसा, न यह गुज़ारिश कि “भैया आज थोड़ा कम कर दो, धनिया‑मिर्च तो डाल दो।”

सहूलियत की इस चकाचौंध में समाज धीरे‑धीरे सुस्त पड़ता जा रहा है। लोग चलना भूल रहे हैं, आंटियां चारदीवारी में कैद होकर मोटापे और तन्हाई की शिकार हो रही हैं। मुहल्ले की दुकानें, जहाँ रिश्‍ते बिकते नहीं थे, बनते थे, दम तोड़ रही हैं। शॉपिंग अब तजुर्बा नहीं रही, बस एक डिलीवरी स्लॉट बन कर रह गई है। होम डिलीवरी सर्विस ने सिर्फ़ बाज़ार का नक्शा नहीं बदला, उसने बनियावाद की रूह, सौदेबाज़ी की तहज़ीब और इंसानी रिश्तों की गर्माहट पर सीधा वार किया है। सहूलियत की कीमत हम समाज से चुका रहे हैं।

सुबह‑सुबह, जब आगरा की गलियों में दूध, अगरबत्ती और बीती रात की धूल की मिली‑जुली खुशबू तैर रही होती है, हीरा लाल अपनी छोटी‑सी जनरल स्टोर की जंग लगी शटर उठाकर एक खामोश कॉलोनी में बैठ जाता है, उन क़दमों का इंतज़ार करते हुए जो अब आते ही नहीं। कभी यही सुबहें सलाम‑दुआ, गप्प‑शप्प, काउंटर पर सिक्कों की खनक और टॉफी को लेकर बच्चों की नोकझोंक से भरपूर होती थीं। आज बस डिलीवरी बाइकों की हल्की घरघराहट है, जो उसकी दुकान के सामने से बिना रुके निकल जाती हैं; राइडर की निगाहें मोबाइल पर होती हैं, दुकान की शीशे पर नहीं।
हीरा लाल देखता है कि कार्टन उसके पड़ोसियों के दरवाज़ों पर उतर रहे हैं, जबकि उसकी दुकान की शेल्फ़ों पर रखा माल जस का तस पड़ा है, रजिस्टर उसकी सब्र की तरह पतला होता जा रहा है।

गली के उस पार समोसे और नमकीन के लिए मशहूर नाश्ते वाला अपने ठेले से टेक लगाकर खामोशी से हामी भरता है। वह ठंडी साँस लेकर कहता है, “लोग अब भूख से ज़्यादा ऐप पर भरोसा करते हैं।” अब भूख की सुनवाई खुशबू से नहीं, एल्गोरिद्म से होती है। कॉलोनी के लोग अब भी खाते हैं, खरीदते हैं, खर्चा करते हैं, मगर अब उन लोगों से नहीं लेते जिनको वे जानते हैं।

हीरा लाल के लिए ये सिर्फ़ मुक़ाबला नहीं, अपना वजूद मिटने का एहसास है। बाज़ार कहीं और शिफ्ट नहीं हुआ, स्क्रीन के अंदर ग़ायब हो गया है, जिसने दुकानदारों को पुराना अवशेष बना दिया और मुहल्लों को बस डिलीवरी पॉइंट में बदल डाला।

भारत में क्विक कॉमर्स, यानी 10–30 मिनट में किराना और रोज़मर्रा का सामान घर पहुँचा देने वाले प्लेटफॉर्म्स, ने शहरों की ख़रीदारी की आदत पूरी तरह बदल डाली है। व्यस्त ज़िंदगी के बीच बेमिसाल सहूलियत देने वाले Blinkit, Zepto, Swiggy Instamart जैसे प्लेटफॉर्म, और Flipkart व Amazon की नई एंट्रीज़, इस तेज़ उछाल के बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं। यह सेक्टर 2025 में तकरीबन 5.4 अरब डॉलर के क़रीब पहुँच चुका है और अन्दाज़ा है कि 2030 तक यह बढ़कर 35 अरब डॉलर तक जा सकता है।

आज यह बड़े खिलाड़ियों के बीच 95% से ज़्यादा मार्केट पर क़ब्ज़ा जमाए बैठा है , Blinkit के पास लगभग 46% हिस्सा, Zepto के पास 29% और Instamart के पास 25% के आसपास। 2025 के त्योहारी सीज़न में इन प्लेटफॉर्म्स पर ऑर्डर की तादाद 120% तक बढ़ गई, जिसकी वजह से ई‑कॉमर्स की कुल बिक्री के आँकड़े पहले ही हफ़्ते में 60,000 करोड़ रुपये से ऊपर चले गए। Blinkit, Zepto और Instamart अब इस तेज़ रफ़्तार, सख़्त मुक़ाबले वाले बाज़ार के लगभग तमाम हिस्से पर हावी हैं।

लेकिन इस तेज़ तरक़्क़ी और ग्राहक की ख़ुशी की कहानी के पीछे भारत की रिटेल रीढ़, मुहल्ले की किराना दुकानों का गहरा और दर्दनाक बिखराव छुपा है। तक़रीबन 1.3 से 1.5 करोड़ तक फैली ये पारिवारिक दुकानें भारत की ग़ैर‑औपचारिक अर्थव्यवस्था की जान हैं। ये लाखों लोगों को रोज़गार देती हैं और जीडीपी में करीब 45–50% तक की हिस्सेदारी मानी जाती है। ये सिर्फ़ दुकानें नहीं, भरोसे पर टिकी छोटी‑छोटी दुनिया हैं , लचीली उधारी, पीढ़ियों से बने रिश्ते और मोहल्ले की एक तरह की पंचायत। सिर्फ़ 2024 में ही 2 लाख से ज़्यादा किराना दुकानें बंद हो गईं, और सबसे ज़्यादा चोट शहरों और मेट्रो में पड़ी।

2024 के आख़िर में JP Morgan की एक स्टडी के मुताबिक़, मुंबई में 60% ऑफ़लाइन ग्रॉसरी स्टोर्स ने माना कि उनकी बिक्री सीधा‑सीधा क्यू‑कॉमर्स की “डार्क स्टोर्स” बढ़ने की वजह से गिरी है , ये वही छोटे‑छोटे गोदाम हैं जो रिहायशी इलाक़ों में जगह‑जगह खुल रहे हैं। शहरी किराना दुकानों की आमदनी और क़दमों की रौनक 2025 की फ़ाइनेंशियल ईयर में 12–30% तक घटी। सर्वे बताते हैं कि क्यू‑कॉमर्स यूज़ करने वाले 46% ग्राहकों ने किराना से ख़रीदारी कम कर दी और कम से कम एक चौथाई खर्च अब ऑनलाइन शिफ्ट कर दिया है।

ये विस्थापन कैसे हो रहा है, तस्वीर काफ़ी साफ़ है। क्यू‑कॉमर्स के ये बड़े खिलाड़ी, जो वेंचर कैपिटल के गहरे जेबों से चलते हैं, इतने आक्रामक डिस्काउंट और ‘दाम तोड़’ ऑफ़र देते हैं कि छोटी दुकानें उस रेट पर माल बेच ही नहीं सकतीं। डार्क स्टोर्स का घना जाल डिलीवरी को तेज़ तो बनाता है, लेकिन इससे एक बंद‑सी, कंट्रोल की हुई सप्लाई चेन बनती है, जिसमें पारम्परिक डिस्ट्रीब्यूटर और होलसेलर हाशिए पर चले जाते हैं।
इंसानी क़ीमत और भी भारी है। कई पुश्‍तों से दुकान चलाने वाले अब घटते मुनाफ़े के दबाव में मजबूर होकर गिग इकॉनमी के कामों की तरफ़ धकेले जा रहे हैं , कई बार उन्हें उसी कंपनी के लिए डिलीवरी करनी पड़ती है, जो उनकी अपनी दुकान की कमर तोड़ रही है। इनके साथ‑साथ लोकल सप्लायर, पैकेजिंग वाले और दूसरे छोटे धंधे भी चुपचाप चोट खा रहे हैं। Kearney जैसी कंसल्टिंग फ़र्मों के विश्लेषण बताते हैं कि अब ताक़त बिखरे हुए, मोहल्ला‑स्तर के छोटे कारोबारियों के हाथ से निकलकर चंद बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के पास सिमट रही है।

सांस्कृतिक नुक़सान भी कम नहीं है। किराना दुकान केवल सामान बेचने की जगह नहीं थी , यह गप‑शप, मोहल्ले की ख़बर, और मुसीबत में बिना ज़मानत के उधार देने वाली एक छोटी सामाजिक संस्था थी। उसकी जगह अब ऐप का ठंडा इंटरफ़ेस, एल्गोरिद्म की मेहरबानी और दरवाज़े पर दो मिनट की खामोश डिलीवरी ने ले ली है। यह नया मॉडल तात्कालिक, बेवजह ख़रीद बढ़ाता है, प्लास्टिक और पैकेजिंग का पहाड़ खड़ा करता है और उस स्थानीय, निजी लेन‑देन को मिटाता जाता है, जिसने सदियों से भारतीय मुहल्लों की रूह को पहचान दी थी । क्यू‑कॉमर्स कोई गुज़रता हुआ फैशन नहीं, शहरी रिटेल का बुनियादी ढाँचा बदलने वाली ताक़त है। ख़तरा ये है कि रफ़्तार और पैमाने की इस अंधी दौड़ में कहीं भारत अपने ही मोहल्लों की वह ज़िंदा, इंसानी पैमाने की अर्थव्यवस्था न खो दे, जो उसकी बस्ती को मज़बूती और चरित्र देती है।

भारत के नकली बाबा आस्था उद्योग को कैश मशीन बना रहे हैं!!!

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दिल्ली । शाम ढलते ही टेंट भीतर से भट्टी की तरह चमक उठता है। अगरबत्तियों का गाढ़ा धुआँ हवा में तैर रहा है, ढोल-नगाड़ों की थाप दिल की धड़कनों से होड़ ले रही है। बीचोंबीच ऊँचे सिंहासन पर बैठा है एक शख़्स, गेरूआ, रेशमी कपड़े, आँखें बंद, हथेलियाँ आसमान की ओर। आधा संत, आधा सेल्समैन।

एक-एक कर टूटे, हारे, थके लोग उसके सामने से गुज़रते हैं। वह उम्मीद में लिपटे जुमले फेंकता है, ताबीज़, भभूत और चमचमाते “चमत्कारी” सामान लहराता है, और इन्हें ‘आशीर्वाद’ कहकर थमाता है। “कैंसर भाग जाएगा। कर्ज़ खत्म हो जाएगा। भगवान ने तुम्हें चुन लिया है।”

भीड़ सिसकती है, आँखें नम होती हैं, और उसी रफ्तार से जेबें भी हल्की होती जाती हैं। कहीं मंत्र और कहीं मनी-काउंटर के बीच, आस्था का खनन हो रहा है। जब लाइटें बुझती हैं और “चमत्कार” का पर्दा गिरता है, ऐसे ठग बाबाओं की तिजोरियाँ भर चुकी होती हैं, और भक्त की जेब खाली।

भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य में यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक सड़न है, नकली बाबाओं का तेज़ी से फैलता चलन। ये वे शोषक हैं जो मजबूर लोगों की बेबसी पर पलते हैं और श्रद्धा को गंदी कमाई का ज़रिया बना देते हैं। ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा और सरकारी नाकामी से जूझ रहे समाज में ये खुद को ईश्वर का दूत बताकर उतरते हैं।

क़र्ज़ में डूबा किसान, इलाज के लिए भटकती माँ, परिवार से ठुकराई विधवा, या महानगर की झुग्गी में फँसा बेरोज़गार नौजवान , यही इनके सबसे आसान शिकार होते हैं। इनकी टूटन को हथियार बनाकर उसे अंधभक्ति में बदला जाता है। नेताओं का वरद हस्त, मीडिया का सहयोग, लोगों की मजबूरियाँ, राज्य और समाज की नाकामी, इन ठगों के लिए उर्वर ज़मीन तैयार करती है।

ऐसे कई स्वयंभू गुरु इस विकृति की मिसाल बन चुके हैं, जिनकी चमकदार सल्तनतें झूठ, डर और धोखे पर खड़ी रहीं। मगर ये सिर्फ़ चेहरे हैं। असली बीमारी है “गुरुगिरी” का यह उन्माद, जो एक खतरनाक सामाजिक लत की तरह पूरे देश में फैल चुका है।
आख़िर यह नकली रूहानियत इतना बड़ा कारोबार कैसे बन गई? इसकी जड़ में हैं भारत की गहरी असमानताएँ। तेज़ शहरीकरण, ग्लोबलाइज़ेशन और टूटती पारंपरिक संरचनाओं ने लोगों को भीतर से खाली कर दिया है। गाँव उजड़ रहे हैं, मोहल्ले बिखर रहे हैं, संयुक्त परिवार इतिहास बनते जा रहे हैं। सरकारी अस्पतालों की बदहाली, अनिश्चित नौकरियाँ और गिग इकॉनमी का असुरक्षित भविष्य, सब मिलकर इंसान को बेबस बना देते हैं।
यहीं से बाबाओं की एंट्री होती है। जहाँ विज्ञान और सरकार जवाब दे देते हैं, वहाँ ये “झटपट समाधान” बेचते हैं , कैंसर के लिए भभूत, शादी के लिए मंत्र, नौकरी और दौलत के लिए अनुष्ठान। यह आध्यात्म नहीं, बल्कि मजबूरी की मार्केटिंग है, पुरानी रहस्यमयी बातों को आसान, फ़ील-गुड नशे की तरह परोसना।

सोशल मीडिया ने इस फरेब को पंख लगा दिए हैं। आज के नकली बाबा टेक-सैवी शोमैन हैं , यूट्यूब लाइव “चमत्कार”, इंस्टाग्राम पर रील्स, ऑनलाइन दर्शन, दान के ऐप, ब्रांडेड माला-कड़ा और टी-शर्ट। आश्रम अब कॉरपोरेट ऑफिस बन चुके हैं और श्रद्धा एक सब्सक्रिप्शन मॉडल।

राजनीतिक संरक्षण इस आग में घी का काम करता है। कई बाबा नेताओं के लिए वोट-बैंक बन जाते हैं और बदले में मिलती है जांच से छूट। स्कैंडल सालों तक लटकते रहते हैं, इंसाफ़ रेंगता रहता है।

लेकिन यहाँ एक फर्क साफ़ करना ज़रूरी है। भारत की परंपरा में असली आध्यात्मिक नेतृत्व भी है , शंकराचार्य, प्राचीन मठों और अखाड़ों के प्रमुख, कुंभ और वाराणसी जैसी परंपराओं के संरक्षक। ये लोग तमाशा नहीं करते, चमत्कार नहीं बेचते। इनकी सत्ता वंश, तपस्या और शास्त्र से आती है, सेल्फ-प्रमोशन से नहीं। शिक्षा, सेवा और समाज इनके केंद्र में रहता है।

इसके उलट नकली बाबा अक्सर रातों-रात पैदा होते हैं , कल तक बिज़नेसमैन, कलाकार या चालबाज़, और आज “अवतार”। ये व्यक्ति-पूजा का कल्ट खड़ा करते हैं, सवाल पूछने पर पाबंदी लगाते हैं, परिवारों से तोड़ते हैं और पैसा निचोड़ते हैं।

यह आध्यात्म नहीं, बल्कि कई बार पोंज़ी स्कीम जैसा धंधा बन जाता है, जो अक्सर भगदड़, हिंसा और तबाही पर खत्म होता है।
अब वक्त है जागने का। आस्था और अंधविश्वास के फर्क को समझने का। इन शोषक नकली बाबाओं को बेनकाब करने का, कमज़ोरों को शिक्षा, विज्ञान और न्याय से मज़बूत करने का।

औरत कब सुरक्षित होगी दरिंदों से?

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कोलकाता । उस रात सब कुछ आम था। सड़क पर हल्की रौशनी, पास की चाय की दुकान से उठती अदरक की महक, और घर लौटती एक लड़की, जिसकी बस एक ही ख्वाहिश थी , कोई उसे उसके हाल पर छोड़ दे। पीछे से क़दमों की आहट आई। कुछ सेकेंड। एक चीख। फिर सन्नाटा। चेहरे पर तेज़ाब जैसा कुछ फेंका गया, इतनी तेज़ी से कि ज़िंदगी फौरन दो हिस्सों में बँट गई, हमले से पहले और हमले के बाद।

यह कोई कहानी नहीं, आज के भारत की हक़ीकत है।
भारत में औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा का साया अब क़िलों, राजदरबारों और युद्धभूमियों से उतरकर स्कूलों, अस्पतालों, गलियों और घरों तक फैल गया है। फर्क बस इतना है कि पहले ज़ुल्म सत्ता और तलवार के दम पर होता था, आज यह “ठुकराए हुए इश्क़”, “आहत मर्दानगी” और सस्ते तेज़ाब के भरोसे अंजाम दिया जा रहा है।

हमारे विकसित होते समाज की जटिल बुनावट में हाल के यौन अपराध और एसिड हमले, क्रूरता के एक ऐसे नक्शे में बदल गए हैं जो अभिजात वर्ग के विशेषाधिकार से खिसककर रोज़मर्रा की दहशत बन चुका है। 2024 के कोलकाता आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की रेप–मर्डर जैसी घटनाओं में, जहाँ एक सिविक वॉलंटियर ने कार्यस्थल के भरोसे का बेरहमी से दुरुपयोग कर एक डॉक्टर के साथ बर्बरता की, या बदलापुर के स्कूल में छोटी बच्चियों पर सफ़ाई कर्मचारी द्वारा हमला , आगरा में एक रिसर्च स्कॉलर की लेब में हत्या, अवसरवादी क्रूरता का एक नया पैटर्न देखने में आ रहा है।

यही रुझान एसिड हमलों में भी साफ़ दिखता है, जो अधिकतर ठुकराए गए प्रेमियों, पतियों या परिचितों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं , तीव्र बदले की उस मानसिकता को दिखाते हुए, जिसमें औरत के “ना” को माफ़ नहीं किया जाता। 2023 में देश में 207 एसिड हमले दर्ज हुए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 57 मामले थे। उत्तर प्रदेश, गुजरात और कई दूसरे राज्यों में भी ये घटनाएँ अब असामान्य ख़बर नहीं रहीं। घरेलू विवादों में पति द्वारा जबरन तेज़ाब पिलाने से लेकर आशिक़ों द्वारा चेहरा बिगाड़ देने तक, हिंसा की ये कहानियाँ हमारे समय की क्रूर डायरियाँ हैं। आज प्रेम प्रस्ताव ठुकराना किसी लड़की के लिए “सज़ा” बन जाता है। औरतों को न कहने का अधिकार नहीं है। कहीं पति ने झगड़े में तेज़ाब पिला दिया, कहीं आशिक़ ने “सुंदरता मिटाने” की कसम खा ली। यह सिर्फ़ अपराध नहीं, इंसानी गिरावट की इंतिहा है।

इतिहास के पन्ने पलटें, तो तस्वीरें बदलती हैं, माजरा नहीं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में औरतें युद्ध की “लूट” मानी जाती थीं। दुश्मन को नीचा दिखाने के लिए उनकी इज़्ज़त कुचली जाती थी। सत्ता के खिलाफ विद्रोह हो या सामंती संघर्ष , निशाना अक्सर स्त्रियाँ ही बनती रहीं। राजाओं और सामंतों के लिए यह ताक़त दिखाने का सुविधाजनक तरीक़ा था।

औपनिवेशिक क़ानूनों ने भी “क्राइम ऑफ़ पैशन” का जुमला गढ़कर कई हत्याओं के लिए नरम सज़ाओं का रास्ता खोला, मानो औरत की जान से ज़्यादा मर्द का ग़ुस्सा अहम हो।
लेकिन आज?

आज न कोई राजा है, न कोई युद्ध मैदान। आज ज़ुल्म करने वाला “आम आदमी” है , पड़ोसी, सहकर्मी, प्रेमी, पति। यह हिंसा का एक खौफ़नाक लोकतंत्रीकरण है। तेज़ाब अब हथियार है, क्योंकि वह सस्ता है, आसानी से मिल जाता है और उम्र भर का दाग दे जाता है , शरीर पर भी, ज़िंदगी पर भी।

पहले औरत पर हमला दुश्मन कबीले को हराने के लिए होता था। आज हमला इसलिए होता है, क्योंकि औरत ने “ना” कहने की हिम्मत की।

यह बदलाव क्यों आया?

एक वजह है झूठी मर्दानगी, जो बराबरी को अपमान समझती है। आर्थिक और सामाजिक बदलावों ने औरतों को आत्मनिर्भर बनाया है; वे अपने फ़ैसले खुद ले रही हैं, शहरों से गाँवों तक फ़ासले घट रहे हैं। लेकिन पितृसत्ता का ज़ेहन अभी भी वहीं अटका है। नतीजा यह कि इंकार को बेइज़्ज़ती मान लिया जाता है और बदले का हक़ समझ लिया जाता है।

दूसरी वजह है क़ानून का ढीला अमल। तेज़ाब बिक्री पर रोक के बावजूद यह आराम से मिल जाता है। जिलों के केमिस्ट और केमिकल दुकानदार बिना पूछताछ बोतल थमा देते हैं। मुक़दमे सालों तक रेंगते हैं। पीड़िता को इंसाफ़ से पहले ताने और सवाल मिलते हैं, अपराधी को सज़ा से पहले जमानत और हौसला।
डिजिटल दौर ने ज़ुल्म को और चालाक बना दिया है। तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ना हो या डीपफेक से इज़्ज़त, मक़सद एक ही है , औरत को सार्वजनिक तौर पर तोड़ देना। यह हिंसा की नई नस्ल है, जहाँ निशाना सिर्फ़ शरीर नहीं, पहचान भी है। तस्वीर, आवाज़, सोशल मीडिया प्रोफाइल , सब युद्धभूमि हैं।

सबसे डरावनी बात ये है कि अब कोई जगह सचमुच सुरक्षित नहीं दिखती। स्कूल, घर, सड़क, अस्पताल , हर जगह खतरे की हल्की-सी, लेकिन लगातार गूँज मौजूद है। उम्र भी मायने नहीं रखती। बच्ची हो या बुज़ुर्ग, विवाहित हो या अकेली , हिंसा का यह साया सबको अपनी ज़द में ले रहा है।

यह हालात एक कड़वा सच बयान करते हैं: हमने बराबरी की भाषा तो सीख ली, लेकिन इंसानियत का सबक अब भी अधूरा है। अब समाधान सिर्फ़ मोमबत्ती जुलूसों या सोशल मीडिया के तात्कालिक ग़ुस्से से नहीं आएगा।

ज़रूरत है : बचपन से सहमति और सम्मान की तालीम की। तेज़ाब पर सख़्त, पारदर्शी और वाक़ई लागू नियंत्रण की। तेज़, संवेदनशील और भरोसा बहाल करने वाले न्याय की। और सबसे ज़रूरी, सोच की बुनियादी तब्दीली की।

वरना यह साया और गहरा होगा।

और हर उस औरत को, जो “ना” कहने की हिम्मत जुटाती है, यह डर सताता रहेगा कि कहीं उसकी ज़िंदगी भी दो हिस्सों में न बँट जाए , हमले से पहले और हमले के बाद।

गहरा रही है भारत में जिहादी सोच : इसका ताजा उदाहरण है हुमायूं कबीर का बयान

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे के सामने आज जो चुनौती खड़ी है, वह राजनीतिक होने के साथ ही वैचारिक और सामाजिक भी है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर का ताजा बयान इसी चुनौती की एक तीखी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। मुर्शिदाबाद में बनने वाली तथाकथित बाबरी मस्जिद को लेकर उनका यह कहना, “यह कोई अयोध्या नहीं है, जो बाबरी को कोई हाथ लगा दे”, वस्‍तुत: सिर्फ जुबान की फिसलन नहीं है। यह एक सोची समझी मानसिकता, एक उकसावे और टकराव की राजनीति का संकेत है जोकि बीते वर्षों में जिहाद के नाम पर पनप रही इस्लामिक कट्टर सोच, उम्‍मा और पॉलिटिकल इस्‍लाम से गहराई से जुड़ी हुई है।

अयोध्या विवाद भारत के संवैधानिक इतिहास का एक लंबा और पीड़ादायक अध्याय रहा है, जिसमें हिन्‍दुओं के अस्‍तित्‍व और स्‍वाभिमान को लगातार 500 वर्षों तक बार-बार चुनौती दी जाती रही, जिसे कि उच्‍चतम न्यायालय के फैसले ने कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से समाप्त किया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण को लेकर देश ने एक कठिन लेकिन जरूरी मोड़ पार किया। ऐसे समय में अयोध्या का संदर्भ उठाकर बाबरी नाम को दोबारा सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाना यह दिखाता है कि कुछ लोग उस फैसले को स्वीकार नहीं कर पाए हैं और वे भारतीय समाज को फिर से उसी खाई की ओर धकेलना चाहते हैं, जिससे निकलने में दशकों लगे हैं।

हुमायूं कबीर द्वारा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की विस्तृत योजना बताना, उसकी फंडिंग, ईंटों की व्यवस्था और साप्ताहिक नमाज की तैयारियों का सार्वजनिक ऐलान करना, ये सभी कृत्‍य महज धार्मिक गतिविधि का विवरण नहीं हो सकते हैं । साफ तौर पर इस कर्मकाण्‍ड से राजनीतिक संदेश दिया जा रहा है। यह संदेश उन लोगों के लिए है जो बाबरी ढांचे के विध्वंस को आज भी बदले की भावना से देखते हैं, बाबर जैसे जिहादी, क्रूर आक्रमकारी, हिन्‍दू द्रोही को अपना आदर्श मानते हैं। दरअसल ऐसे लोग मस्जिद का नाम बाबरी रखकर उस सामूहिक आक्रोश को बढ़ाना चाहते हैं, जो भारत में मुसलमानों द्वारा हिन्‍दुओं पर हिंसा करने का कारण बन सकता है!

पिछले एक दशक में भारत ने इस्लामिक कट्टरपंथ के कई रूप देखे हैं। यह सीमा पार से होने वाला इस्‍लामिक आतंकवाद नहीं रहा है, अनेक बार अब तक सामने आ चुका है कि देश के भीतर वैचारिक स्तर पर भी इसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। सोशल मीडिया के जरिये युवाओं को कट्टर विचारधाराओं से जोड़ने की कोशिशें हुईं। आईएसआईएस और अल कायदा से जुड़े मॉड्यूलों का भंडाफोड़ हुआ। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, सिम‍ि जैसे संगठनों पर कार्रवाई ने यह साफ किया कि कैसे मजहब और सामाजिक सेवा की आड़ में इस्‍लाम के उग्र नेटवर्क खड़े किए जा रहे थे। कश्मीर से लेकर केरल और बंगाल तक, जिहाद की भाषा अलग अलग रूपों में सामने आई है, जिसका कि मूल मकदस एक ही है। गैर मुसलमानों पर हिंसा।

कहना होगा कि इस पूरे परिदृश्य में गजवा-ए-हिंद की सोच एक बेहद खतरनाक वैचारिक हथियार बनकर उभरी है। यह कोई मासूम मजहबी कल्पना नहीं है; एक आक्रामक राजनीतिक और सैन्य कल्पना है, जो भारत को एक लक्ष्य के रूप में देखती है। जांच एजेंसियों की रिपोर्टों और गिरफ्तार आतंकियों के बयानों में बार-बार इस विचार का उल्लेख हुआ है। भले ही भारत के अधिकांश मुसलमान इस सोच को नकारते हों, लेकिन कुछ कट्टर तत्व इसे अपनी पहचान और उद्देश्य बना चुके हैं। यही वजह है कि हर ऐसा बयान, हर ऐसा प्रतीकात्मक कदम जो इस सोच को बल देता है, उसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

हुमायूं कबीर का यह तर्क कि चुनाव में जय श्रीराम बोलना सही है तो अल्लाह हू अकबर कहना भी उतना ही सही है, सतही समानता का उदाहरण है। यह तर्क इस सच्चाई को नजरअंदाज करता है कि नारों का राजनीतिक इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है। ऐसे में पश्चिम बंगाल का संदर्भ यहां विशेष महत्व रखता है। सीमावर्ती जिले, अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और कट्टरपंथी गतिविधियों को लेकर राज्य पहले ही सवालों के घेरे में है। मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल और सीमा से सटे इलाके में, छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद की नींव रखना महज संयोग नहीं माना जा सकता। इसे चुनना यह दिखाता है कि संदेश किसे और क्यों दिया जा रहा है।यही वह बिंदु है जहां जिहादी सोच और अवसरवादी राजनीति एक दूसरे से हाथ मिला लेती हैं।

भारत को आज जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है राजनीतिक जिम्मेदारी और वैचारिक स्पष्टता। मजहबी स्वतंत्रता का अर्थ उकसावे की छूट नहीं हो सकता। आस्था का सम्मान बदले की भावना से नहीं किया जा सकता। हुमायूं कबीर का बयान और उससे जुड़ा पूरा घटनाक्रम आज बता रहा है कि अगर समय रहते जिहादी और कट्टर सोच को वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं दी गई, तो यह कानून व्यवस्था से कहीं अधिक राष्ट्रीय एकता के लिए घातक होगा। वस्‍तुत: जो लोग देश को बार-बार अतीत के अंधेरे में खींचना चाहते हैं, आज जरूरत है उनसे सख्ती से, लोकतांत्रिक तरीके से निपटा जाए । वास्‍तव में यही समय की मांग है।

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