युद्धकाल में राष्ट्रहित के विमर्श निर्माण में पत्रकारों की भूमिका अति- महत्वपूर्ण

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नोएडा/गाजियाबाद: भारत पाकिस्तान के चार दिन के युद्ध के उपरांत अंतर्राष्ट्रीय मंच में राष्ट्रीय स्तरीय विमर्श निर्माण में पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। नारद जयंती और हिंदी पत्रकारिता के उपलक्ष में आयोजित कार्यक्रम में “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए मुख्य अतिथि अखिलेश शर्मा जी इस संगोष्ठी के आयोजन एवं विषय की प्रसंशा की। उनके मुताबिक पत्रकार होने के नाते युद्ध काल या ऐसे किसी भी महत्वपूर्ण समय में पत्रकारों जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है ऐसे समय में नागरिकों के लिए सूचना के अभाव को भरना बहुत जरूरी है। क्या युद्ध काल में अपने दायित्व का पालन कर रहे हैं या नहीं? ये देखना बहुत जरूरी है। साथ ही उन्होंने इस बात भी जोर दिया कि ऐसे में ऐसी कोई भी सूचना आपकी तरफ से नहीं प्रस्तुत की जानी चाहिए जिससे दुश्मन को सहायता मिले। बतौर पत्रकार हमें अपनी सीमा, मर्यादा, जिम्मेदारी और दायित्व नहीं भूलना चाहिए।

आद्य संवाददाता देवर्षि नारद जयंती एवं हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर “प्रेरणा शोध संस्थान न्यास” द्वारा “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर नोएडा स्थित एएसपीएम स्कॉटिश स्कूल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

इस संगोष्ठी में मीडिया जगत की कई प्रतिष्ठित हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रुप में एनडीटीवी के मैनेजिंग एडिटर श्रीमान अखिलेश शर्मा जी रहे। जबकि कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि के रूप में टीवी9 की एसोसिएट एडिटर सुश्री प्रमिला दीक्षित एवं वरिष्ठ पत्रकार, टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क के सीनियर एंकर श्रीमान दिनेश गौतम की उपस्थिति रही।

श्रद्धेय गुरु गोलवलकर जी कथन से अपने उद्बोधन की आरंभ करने वाली विशिष्ट अतिथि प्रमिला दीक्षित जी ने युद्ध काल में नागरिक बोध एवं पत्रकारों के बोध पर चर्चा करते हुए बताया कि युद्ध काल में पत्रकार भी एक हथियार के रूप में प्रयुक्त होते हैं। प्रमिला दीक्षित जी कहा कि युद्ध काल में नैरेटिव निर्माण की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है इसलिए “भारत से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए भारतीय स्रोतों पर ही भरोसा करें, न कि पाकिस्तानी प्रचार तंत्र पर।”

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एवं टाइम्स नाउ नवभारत के सीनियर एंकर दिनेश गौतम जी ने “युद्धकाल में पत्रकारिता” विषय पर बोलते हुए कहा हम ये मान लेते हैं कि युद्ध लड़ना केवल सेना का काम है। लेकिन युद्ध कई स्तर में लड़ा जाता है। पहलगाम के आतंकी घटना से आतंकियों ने केवल देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को नहीं बल्कि समस्त देश को एक चुनौती दी थी जिसका जबाव हमारी सरकार ने पाकिस्तान को बखूबी दिया। उन्होंने कहा कि पहलगाम की घटना एक आतंकवादी घटना नहीं एक धर्म युद्ध था जहां आम लोगों को धर्म पूछ कर मारा। दिनेश जी के मुताबिक जब देश युद्धरत होता है तो आम आदमी भी उस युद्ध में कहीं न कहीं शामिल होते हैं इसलिए एक पत्रकार के तौर पर हमने जो किया वो देश को आगे रखने के लिए किया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्रीमान कृपाशंकर, प्रचार प्रमुख (उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहे, जिन्होंने युद्धकालीन परिस्थितियों में पत्रकारों की भूमिका पर विचार साझा किए। कृपा जी ने कहा कि उदंत मार्तंड की शुरुआत देवर्षि नारद जयंती के अवसर पर किया इससे यह प्रमाणित होता है कि हिंदी पत्रकारिता में नारद जी की क्या भूमिका है लेकिन हम धीरे-धीरे नारद जी को भूलते चले गए। कृपाशंकर जी ने संघ के समाजिक योगदान एवं पंच परिवर्तन की चर्चा करते हुए समाजिक बदलाव में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

कार्यक्रम का शुभारंभ हरिश्चंद्र के ओजस्वी गीत के उपरांत अतिथिगण द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के बाद, संसद टीवी के संपादक श्याम किशोर सहाय ने कार्यक्रम की प्रस्तावना में देवर्षि नारद पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पुराणों में नारदजी की विद्वत्ता और विवेकशीलता का वर्णन मिलता है, और यह कि ‘नैरेटिव सेटिंग’ का खेल समझना आवश्यक है। सहाय ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध का समय संवेदनशील होता है, और युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि जनमानस में भी लड़ा जाता है; ऐसे में पत्रकार जनमत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सलाह दी कि युद्धकाल में पत्रकारिता बड़ी सूझबूझ से करनी चाहिए।

मंच संचालन आशीष और धन्यवाद ज्ञापन हरीश द्वारा किया गया, जिसके उपरांत छात्रा वंचिता सेठी के वंदेमातरम गायन से कार्यक्रम का समापन हुआ। वंशिका सेठी के साथ-साथ सभागार में उपस्थित सभी गणमान्य बंधु-भगिनियों द्वारा सामूहिक रूप से वंदेमातरम गाया गया। इस अवसर पर अतिथियों ने श्रोताओं के जिज्ञासा भरे प्रश्नों के समाधान भी दिए।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मेरठ प्रान्त सह-प्रचार प्रमुख डाॅ अनिल सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, छात्र, शोधार्थी व बुद्धिजीवी वर्ग उपस्थित थे।

धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ का लक्ष्य

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वर्ष 1925 में प्रारंभ हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा इस वर्ष विजयादशमी पर अपनी शताब्दी का मील का पत्थर प्राप्त करेगी। आज संघ सबसे अनूठा, व्यापक और राष्ट्रव्यापी संगठन बन गया है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के बाद संघ का जो संकल्प और आह्वान सामने आया, उसमें इस यात्रा के मूल्यांकन, आत्ममंथन और संघ के मूल विचार के प्रति पुनः समर्पण का आह्वान किया गया है। संघ की कार्यप्रणाली कैसी है और इसके आयाम क्या हैं? वे कौन से मोड़ थे, वे कौन सी घटनाएं थीं, जिनसे गुजरकर संघ आज इस रूप में हमारे सामने खड़ा है। संघ के विरोधी क्या सोचते हैं और संघ अपने विरोधियों के बारे में क्या सोचता है? संघ आज क्या है और संघ कल क्या होगा? इन सभी सवालों और आगे की राह जानने के लिए, ऑर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर, पांचजन्य संपादक हितेश शंकर, मराठी साप्ताहिक विवेक की संपादक अश्विनी मयेकर और मलयालम दैनिक जन्मभूमि के सह संपादक एम. बालाकृष्णन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत से विस्तृत बातचीत की। (यह बातचीत 21-23 मार्च, 2025 को आरएसएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की पृष्ठभूमि में और ऑपरेशन सिंदूर से पहले की गई थी)। संपादित अंश —

प्र – आप संघ के एक स्वयंसेवक एवं सरसंघचालक के नाते संघ की 100 वर्ष की यात्रा को कैसे देखते हैं?

डॉ. हेडगेवार जी ने संघ का कार्य बहुत सोच समझकर शुरू किया । देश के सामने जो कठिनाईयाँ दिखती हैं, उनका क्या उपाय करना चाहिए यह प्रयोगों के आधार पर निश्चित किया गया और वह उपाय अचूक रहा । संघ की कार्य पद्धति से काम हो सकता है और मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार कर संघ आगे बढ़ सकता है, यह अनुभव से सिद्ध होने को 1950 तक का समय लग गया । उसके बाद संघ का देशव्यापी विस्तार और उसके स्वयंसेवकों का समाज में अभिसरण शुरू हुआ । आगे चार दशक तक संघ के स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के अन्यान्य क्षेत्रों में उत्तम रीति से कार्य करते हुए अपने कर्तृत्व, अपनत्व तथा शील के आधार पर समाज का विश्वास अर्जित किया तथा 1990 के पश्चात इस विचार एवं गुण संपदा के आधार पर देश को चलाया जा सकता है, यह सिद्ध कर दिखाया। अब इसके आगे हमारे लिए करणीय कार्य यह है कि इसी गुणवत्ता का तथा विचार का अवलंबन कर पूरा समाज सब भेद भूलकर प्रामाणिकता व नि:स्वार्थ बुद्धि से देश के लिए स्वयं कार्य करने लगे, और देश को बड़ा बनाए।

प्र – 100 वर्ष की इस यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव क्या थे?

संघ के पास कुछ नहीं था। विचार की मान्यता नहीं थी, प्रचार का साधन नहीं था, समाज में उपेक्षा और विरोध ही था। कार्यकर्ता भी नहीं थे। संगणक में इस जानकारी को डालते तो, वह भविष्यवाणी करता कि यह जन्मते ही मर जाने वाला है। लेकिन देश विभाजन के समय हिंदुओं की रक्षा की चुनौती व संघ पर प्रतिबन्ध की कठिन विपत्तियों में से संघ सफल होकर निकला और 1950 तक यह सिद्ध हो गया कि संघ का काम चलेगा, बढ़ेगा। इस पद्धति से हिन्दू समाज को संगठित किया जा सकता है। आगे संघ का पहले से भी अधिक विस्तार हो गया। इस संघ शक्ति का महत्त्व 1975 के आपातकाल में संघ की जो भूमिका रही, उसके कारण समाज के ध्यान में आया। आगे एकात्मता रथ यात्रा, कश्मीर के सम्बन्ध में समाज में जनजागरण तथा श्री राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन व विवेकानंद सार्धशति जैसे अभियानों के माध्यमों से तथा सेवा कार्यों के प्रचंड विस्तार से संघ विचार तथा संघ के प्रति विश्वसनीयता का भाव समाज में अच्छी मात्रा में विस्तारित हुआ।

प्र – 1948 और 1975 में संघ पर जो संकट आए, संगठन ने उससे क्या सीखा?

यह दोनों प्रतिबन्ध लगने के पीछे राजनीति थी। प्रतिबन्ध लगाने वाले भी जानते थे कि संघ से नुकसान कुछ नहीं, अपितु संघ से लाभ ही है। इतने बड़े समाज में स्वाभाविक ही चलने वाली विचारों की प्रतिस्पर्धा में अपना राजनैतिक वर्चस्व बनाए रखने का प्रयास करने वाले सत्तारूढ़ लोगों ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया। पहले प्रतिबन्ध में सभी बातें संघ के विपरीत थीं। संघ को समाप्त हो जाना था। परन्तु सब विपरीतता के बावजूद संघ उस प्रतिबन्ध में से बाहर आया और आगे 15-20 वर्षों में पूर्ववत होकर पूर्व से भी आगे बढ़ गया। संघ के स्वयंसेवक जो केवल शाखाएं चलाते थे, समाज के क्रियाकलापों में बड़ी भूमिका नहीं रखते थे, वे समाज के अन्यान्य क्रियाकलापों में सहभागी होकर वहां अपनी भूमिका सुनिश्चित करने लगे। 1948 के प्रतिबन्ध से संघ को यह लाभ हुआ कि हमने अपने सामर्थ्य को जाना और समाज में और व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाने की ओर स्वयंसेवक योजना बनाकर अग्रसर हुए। संघ के विचार में पहले से तय था कि संघ कार्य केवल एक घंटे की शाखा तक मर्यादित नहीं है, बल्कि शेष 23 घंटे के अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सार्वजनिक तथा आजीविका के क्रियाकलापों में संघ के संस्कारों की अभिव्यक्ति भी करनी है। आगे चलकर 1975 के प्रतिबन्ध में समाज ने संघ के इस बढ़े हुए दायरे की शक्ति का अनुभव किया। जब अच्छे-अच्छे लोग निराश होकर बैठ गए थे, तब सामान्य स्वयंसेवक भी यह संकट जाएगा और इसमें से हम सब सही सलामत बाहर आएंगे, ऐसा विश्वासपूर्वक सोचता था। 1975 के आपातकाल के समय अपने प्रतिबन्ध को मुद्दा न बनाते हुए संघ ने प्रजातंत्र की रक्षा के लिए काम किया, संघ के ऊपर टीका टिप्पणी करने वालों का भी साथ दिया। उस समय समाज में, विशेष कर समाज के विचारशील लोगों में एक विश्वासपात्र वैचारिक ध्रुव के नाते संघ का स्थान बना। आपातकाल के पश्चात संघ कई गुना अधिक बलशाली होकर बाहर आया।

प्र – भौगोलिक और संख्यात्मक दृष्टि से संघ बढ़ता गया है। इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण कार्य व स्वयंसेवकों का गुणवत्ता प्रशिक्षण करने में संघ सफल रहा है। इसके क्या कारण है?

गुणवत्ता और संख्या में आप केवल गुणवत्ता बढ़ाएंगे और संख्या नहीं बढ़ाएंगे अथवा केवल संख्या बढ़ाएंगे और गुणवत्ता नहीं बढ़ाएंगे तो गुणवत्ता का बढ़ना या संख्या का टिकना यह संभव नहीं। इसी बात को समझकर संघ ने पहले से इस पर ध्यान रखा है कि संघ को सम्पूर्ण समाज को संगठित करना है, लेकिन संगठित करना इसका एक अर्थ है। एक व्यक्ति को कैसे तैयार करना है, इन सब व्यक्तियों का गठबंधन या संगठन कैसा होना चाहिए, ‘हम’ भावना कैसी होनी चाहिए, इसके लिए पहले से कुछ मानक तय किये हैं। उन मानकों को तोड़े बिना संख्या बढ़ानी है और मानकों पर समझौता नहीं करना है, इसका अर्थ लोगों को संगठन के बाहर रखना नहीं। एक उदाहरण है, एक बड़े संगठन के प्रारम्भ के दिनों का। उस संगठन में मूल समाजवादी विचारधारा के एक व्यक्ति कार्यकर्ता बने। उनको लगातार सिगरेट पीने की आदत थी। पहली बार वो अभ्यास वर्ग में आए। सिगरेट तो छोड़िये, वहां सुपारी खाने वाला भी कोई नहीं था। वे दिन भर तड़पते रहे। रात को बिस्तर पर लेटे तो नींद नहीं आ रही थी। इतने में संगठन मंत्री आये और कहा कि नींद नहीं आ रही है तो बाहर चलो। थोड़ा टहल आते हैं। बाहर ले जाकर उन्होंने उस नए व्यक्ति को यह भी कहा कि उधर चौक पर सिगरेट मिलेगी। मन भरकर पी लो और वापस आ जाओ। वर्ग के अन्दर सिगरेट नहीं मिलेगी। वे नए कार्यकर्ता टिक गए, बहुत अच्छे कार्यकर्ता बने और सिगरेट भी छूट गयी। उस संगठन को उन्होंने उस प्रदेश में बहुत ऊँचाई तक पहुंचाया। व्यक्ति जैसा है, वैसा स्वीकार करना है। यह लचीलापन हम रखते हैं। परन्तु हमें जैसा चाहिए, वैसा उसको बनाने वाली आत्मीयता की कला भी हम रखते हैं। यह हिम्मत और ताकत हम रखते हैं। इस कारण संख्या बढ़ाने के साथ ही गुणवत्ता कायम रही। हमें संगठन में गुणवत्ता चाहिए, लेकिन हमें पूरे समाज को ही गुणवत्तापूर्ण बनाना है, इसका भान हम रखते हैं।

प्र – संघ आज भी डॉक्टर हेडगेवार जी एवं श्री गुरुजी के मूल विचारों के अनुरूप चल रहा है। परिस्थिति की आवश्यकता के अनुरूप इस में कैसे रूपांतरण किया है?

डॉक्टर साहब, श्री गुरूजी या बाळासाहब के विचार सनातन परम्परा या संस्कृति से अलग नहीं हैं। प्रगाढ़ चिंतन व कार्यकर्ताओं के प्रत्यक्ष प्रयोगों के अनुभव से संघ की पद्धति पक्की हुई और चल रही है। पहले से ही उसमें पोथी निष्ठा, व्यक्ति निष्ठा व अंधानुकरण की कोई जगह नहीं है। हम तत्वप्रधान हैं। महापुरुषों के गुणों का, उनकी बताई दिशा का अनुसरण करना है, परन्तु हर देश-काल-परिस्थिति में अपना मार्ग स्वयं बनाकर चलना है। इसलिए नित्यानित्य विवेक होना चाहिए। संघ में नित्य क्या है? एक बार बाळासाहब ने कहा था कि ‘हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है’, इस बात को छोड़कर बाकी सब कुछ संघ में बदल सकता है। सम्पूर्ण हिन्दू समाज इस देश के प्रति उत्तरदायी समाज है। इस देश का स्वभाव व संस्कृति हिन्दुओं की संस्कृति है। इसलिए यह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को पक्का रखकर सब करना है। इसलिए स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा में “अपना पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू समाज का संरक्षण करते हुए हिन्दू राष्ट्र के सर्वांगीण उन्नति” की बात कही गयी है। हिन्दू की अपनी व्याख्या भी व्यापक है। उसकी चौखट में अपनी दिशा कायम रखते हुए देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन करते हुए चलने का पर्याप्त अवसर है। प्रतिज्ञा में “मैं संघ का घटक हूँ”, यह भी कहा जाता है। घटक यानी संघ को गढ़ने वाला, संघ का लघुरूप और संघ का अभिन्न अंग, इसलिए अलग-अलग मत होने पर भी चर्चा में उनकी अभिव्यक्ति का पूर्ण स्वातंत्र्य है। एक बार सहमति बनकर निर्णय होने पर सब लोग अपना-अपना मत उस निर्णय में विलीन कर एक दिशा में चलते हैं। जो निर्णय होता है उसको मानना है। इसलिए सबको कार्य करने की स्वतंत्रता भी है और सबकी दिशा भी एक है। नित्य को हम कायम रखते हैं और अनित्य को देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलकर चलते है।

प्र – संघ को जो बाहर से देखते हैं, जिन्होंने अनुभव नहीं किया है, उन्हें संगठन का ढांचा समझ में आता है, लेकिन इतनी लंबी यात्रा में विचार-विमर्श और आत्मचिंतन की प्रक्रिया कैसी रहती है!

उसकी एक पद्धति बनायी है, जिसमें उद्देश्य और आशय निश्चित है। लेकिन उनको देने की पद्धति अलग-अलग हो सकती है। ढांचा तो बदल सकता है, लेकिन ढांचे के अन्दर क्या है वह पक्का है। परिस्थिति के साथ-साथ मनस्थिति का भी महत्त्व है। इसलिए हमारे प्रशिक्षणों में देश की स्थिति, चुनौतियाँ आदि बहुत सारा विचार रहता है। जिसके साथ-साथ ही उनके सन्दर्भ में स्वयंसेवक को कैसे होना चाहिए, संगठन किन गुणों के आधार पर बनाता है, स्वयं में उन गुणों का विकास करने के लिए हम क्या करते हैं, आदि बातों का भी विचार होता है। प्रार्थना में हमारे सामूहिक संकल्प का और प्रतिज्ञा में प्रत्येक स्वयंसेवक का व्यक्तिगत संकल्प नित्य प्रतिदिन स्मरण किया जाता है। स्वयंसेवक का अर्थ ही स्वयं से प्रारम्भ करने वाला, यह है। संघ का घटक शब्द का अर्थ है ‘जैसा मैं हूँ, वैसा संघ है और जैसा संघ है, वैसा मैं हूँ’। जैसे समुद्र की हर बूंद समुद्र जैसी है और सब बूंदों से मिलकर ही समुद्र बनता है। यह ‘एक’ और ‘पूर्ण’ का सबंध संघ में प्रारम्भ से ही चल रहा है। स्वयंसेवक का आत्मचिंतन सतत चलता है। सफलता का श्रेय पूरे संघ का होता है। असफलता की स्थिति में ‘मैं कहाँ कम पड़ा’ इसको हर स्वयंसेवक सोचता है। यही प्रशिक्षण स्वयंसेवकों का होता है।

प्र – समाज बदला, जीवनशैली बदली, क्या आज की परिस्थिति में संघ की दैनिक शाखा का मॉडल उतना ही प्रभावी है या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी है?

शाखा के कार्यक्रमों के विकल्प हो सकते हैं, और उसको हम स्वीकार करते हैं। लेकिन शाखा जो तत्व है – इकट्ठा आना, सद्गुणों की सामूहिक उपासना करना और प्रतिदिन मन में इस संकल्प को जाग्रत करना कि हम मातृभूमि के लिए काम कर रहे हैं, परमवैभव के लिए काम कर रहे हैं। यह जो आधार है, मिलना-जुलना, एक-दूसरे का सहयोग, यह मूल है। इसका विकल्प नहीं है। सामान्य आदमी सामान्य है। वह असामान्य तब होता है, जब वह जुड़ा रहता है। और फिर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य कार्य कर डालता है, असामान्य त्याग भी करता है। लेकिन, उसके लिए एक वातावरण होना चाहिए और फिर उस वातावरण से जुड़ना। उदाहरण और आत्मीयता, यह परिवर्तन के कारक हैं और कोई नहीं। दुनिया में कहीं भी जाओ, कभी भी परिवर्तन होता है तो कोई एक मॉडल रहता है, जिसमें पहले अपने आपको परिवर्तन करना पड़ता है, उसको देखकर लोगों में परिवर्तन होता है। यह दूर रहकर नहीं चलता, वह आप्त होना पड़ता है, पास होना पड़ता है। महापुरुष बहुत हैं, उन्हें जानते भी है । उनके प्रति हमारी श्रद्धा है, सम्मान है। लेकिन मैं जिसकी संगति में हूं, वह जैसा चलता है, मैं वैसा चलता हूं। करता मैं वही हूं, जिसकी संगति मुझे है। मेरा अपना मित्र, लेकिन मेरे से थोड़ा अच्छा है, उसी का अनुसरण करता हूं। यह परिवर्तन की सिद्ध पद्धति है। इसमें कहीं बदल नहीं हुआ है, तब तक तो शाखा का दूसरा मॉडल नहीं है। कार्यक्रम और बाकी सब बदल सकता है। शाखा का समय बदलता है, वेश बदलता है। शाखा में तरह-तरह के कार्यक्रम करने की अनुमति पहले से है, लेकिन शाखा का विकल्प नहीं है। शाखा कभी अप्रासंगिक नहीं होती। आज हमारे शाखा मॉडल के बारे में प्रगत देशों के लोग आकर अध्ययन कर रहे हैं, उसके बारे में पूछ रहे हैं। हर दस साल पर हम चिंतन करते हैं कि क्या दूसरा कोई विकल्प है? ऐसे चिंतनों में मैं आज तक 6-7 बार उपस्थित रहा हूं, लेकिन जो हमको करना है, उसको करने वाला कोई विकल्प अभी तक नहीं मिला है।

प्र – संघ वनवासी क्षेत्रों में कैसे बढ़ रहा है?

वनवासी क्षेत्रों में पहला काम है कि जनजातीय बंधुओं को सशक्त करना। उनकी सेवा करना । बाद में यह भी जुड़ गया कि उनके हितों की रक्षा के लिए प्रयास करना । हम चाहते हैं कि जनजातीय समाज में से ही उनका ऐसा नेतृत्व खड़ा हो जो अपने जनजातीय समाज की चिंता करे और सम्पूर्ण राष्ट्र जीवन का वह एक अंग है, यह समझकर उनको आगे बढ़ाए। इन क्षेत्रों में काम करने वाले स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ रही है । जनजाति क्या है, उनकी जड़ें कहाँ हैं, जनजातीय समाज से निकले महापुरुष, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले जनजातीय समाज के नायक, इन सब बातों के बारे में उनको शिक्षित करते हुए धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वर में बोलने वाले, योगदान करने वाले कार्यकर्ता व नेतृत्व वहां खड़ा हो, इसका प्रयास चल रहा है। पूर्वोत्तर के साथ ही अन्य जनजातीय क्षेत्रों में संघ की शाखाएं बढ़ रही हैं।

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प्र – भारत के पड़ोसी देशों में हिन्दुओं का उत्पीड़न हो रहा है, उनके विरुद्ध हिंसा हो रही है । विश्व में मानवाधिकार की चिंता करने वाले क्या हिन्दुओं की वैसी चिंता कर रहे हैं? संघ की प्रतिनिधि सभा में भी यह विषय उठा है । आपका इस पर क्या मत है?

हिन्दू की चिंता तब होगी, जब हिन्दू इतना सशक्त बनेगा – क्योंकि हिन्दू समाज और भारत देश जुड़े हैं, हिन्दू समाज का बहुत अच्छा स्वरूप भारत को भी बहुत अच्छा देश बनाएगा – जो अपने आप को भारत में हिन्दू नहीं कहते उनको भी साथ लेकर चल सकेगा क्योंकि वे भी हिन्दू ही थे। भारत का हिन्दू समाज सामर्थ्यवान होगा तो विश्व भर के हिन्दुओं को अपने आप सामर्थ्य लाभ होगा । यह काम चल रहा है, परन्तु पूरा नहीं हुआ है । धीरे-धीरे वह स्थिति आ रही है । बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार पर आक्रोश का प्रकटीकरण इस बार जितना हुआ है, वैसा पहले नहीं होता था। यही नहीं, वहां के हिन्दुओं ने यह भी कहा है कि वे भागेंगे नहीं, बल्कि वहीं रहकर अपने अधिकार प्राप्त करेंगे । अब हिन्दू समाज का आतंरिक सामर्थ्य बढ़ रहा है । एक तरह से संगठन बढ़ रहा है, उसका परिणाम अपने आप आएगा । तब तक इसके लिए लड़ना पड़ेगा । दुनिया में जहां-जहां भी हिन्दू हैं, उनके लिए हिन्दू संगठन के नाते अपनी मर्यादा में रहकर जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे, उसी के लिए संघ है । स्वयंसेवक की प्रतिज्ञा ही ‘धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण कर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति’ करना है।

प्र – वैश्विक व्यवस्था में सैन्य शक्ति, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक ताकत का अपना एक महत्व है। संघ इसके बारे में क्या सोचता है?

बल संपन्न होना ही पड़ेगा । संघ प्रार्थना की पंक्ति ही है –अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम् – हमें कोई जीत ना सके इतना सामर्थ्य होना ही चाहिए । अपना स्वयं का बल ही वास्तविक बल है । सुरक्षा के मामले में हम किसी पर निर्भर न हों, हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर लें, हमें कोई जीत न सके, सारी दुनिया मिलकर भी हमें जीत न सके, इतना सामर्थ्य संपन्न हमको होना ही है। क्योंकि विश्व में कुछ दुष्ट लोग हैं जो स्वभाव से आक्रामक हैं । सज्जन व्यक्ति केवल सज्जनता के कारण सुरक्षित नहीं रहता। सज्जनता के साथ शक्ति चाहिए। केवल अकेली शक्ति दिशाहीन होकर हिंसा का कारण बन सकती है। इसलिए उसके साथ ही सज्जनता चाहिए। इन दोनों की आराधना हमको करनी पड़ेगी। भारतवर्ष अजेय बने। ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम्’ ऐसा सामर्थ्य हो । कोई उपाय नहीं चलेगा, तब दुष्टता को बलपूर्वक नष्ट करना ही पड़ेगा । परन्तु साथ में स्वभाव की सज्जनता है तो रावण को नष्ट कर उस जगह विभीषण को राजा बनाकर वापस आ जाएंगे । यह सारा, सारे विश्व के कारोबार पर हमारी छाया पड़े, इसलिए हम नहीं कर रहे । सभी का जीवन निरामय हो, समर्थ हो, इसलिए कर रहे हैं । हमें शक्ति संपन्न होना ही पड़ेगा क्योंकि दुष्ट लोगों की दुष्टता का अनुभव हम अपनी सभी सीमाओं पर ले रहे हैं।

प्र – भारत की भाषिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए संघ समावेशता को कैसे बढ़ावा दे रहा है?

संघ में आकर देखिये। सब भाषाओं के, पंथ संप्रदायों के लोग बहुत आनंद के साथ मिलकर संघ में काम करते हैं । संघ के गीत केवल हिंदी में नहीं हैं । बल्कि अनेक भाषाओं में हैं । हर भाषा में संघ गीत गाने वाले गीत गायक, गीतों की रचना करने वाले कवि, संगीत रचनाकार हैं । फिर भी सब लोग संघ शिक्षा वर्गों में जो तीन गीत दिए जाते हैं, वह भारत वर्ष में सर्वत्र गाते हैं । सभी लोग अपनी अपनी विशिष्टताओं को कायम रखकर अपने एक राष्ट्रीयत्व का सम्मान तथा सम्पूर्ण समाज की एकता का भान सुरक्षित रखकर चल रहे हैं। यही संघ है । इतनी विविधताओं से भरे समाज को एक सूत्र में पिरोने वाला सूत्र ही हम देते हैं ।

प्र – संघ सामाजिक समरसता की बात करता है और उसके लिए काम भी करता है। मगर कुछ लोग हैं जो समानता की बात करते हैं। आप इन दोनों में भेद कैसे देखते हैं?

समानता आर्थिक है, राजनैतिक है और सामाजिक समानता आनी चाहिए । नहीं तो इनका कोई अर्थ नहीं रहेगा । बंधुभाव ही समरसता है । स्वातंत्र्य और समता दोनों का आधार बंधुता है । समता बिना स्वतंत्रता के संकोच लाती है और टिकाऊ होनी है तो बंधुभाव का आधार चाहिए । यह बंधुभाव ही समरसता है । वह समता की पूर्व शर्त है । जात-पात और छुआ-छूत के विरोध में कानून होने के पश्चात भी विषमता नहीं जाती क्योंकि उसका निवास मन में रहता है । उसे मन से निकालना है । सब अपने हैं, इसलिए हम सब समान हैं, ये मानना है । दिखने में समान नहीं हैं तो भी हम एक-दूसरे के हैं, अपनत्व में बंधे हैं, इसी को समरसता कहते हैं । प्रेमभाव, बंधुभाव को ही समरसता कहते हैं ।

प्र – संघ में महिलाओं की भागीदारी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं। उसके बारे में आप क्या कहेंगे?

संघ के प्रारम्भिक दिनों में, 1933 के आस पास, यह व्यवस्था बनी कि महिलाओं में व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के द्वारा ही होगा । वह व्यवस्था चल रही है । जब राष्ट्र सेविका समिति कहेगी कि संघ भी महिलाओं में यह काम करे, तभी हम उसमें जाएंगे । दूसरी बात ये है कि संघ की शाखा का कार्यक्रम पुरुषों के लिए है । उन कार्यक्रमों को देखने के लिए महिलाएं आ सकती हैं और आती भी हैं । परन्तु संघ का कार्य केवल कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं चलता । हमारी माता-बहनों का हाथ लगता है, तभी संघ चलता है । संघ के स्वयंसेवक के घर में जितनी भी महिलाएं हैं, उतनी महिलाएं संघ में हैं । विभिन्न संगठनों में भी महिलाएं संघ के स्वयंसेवकों के साथ मिलकर काम करती हैं । संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में भी उनका प्रतिनिधित्व और सक्रिय सहभागिता है । इन महिलाओं ने पहली बार भारत के महिला जगत का व्यापक सर्वेक्षण किया, जिसको शासन ने भी स्वीकारा है । उन्हीं के द्वारा पिछले वर्ष सारे देश में बहुत बड़े महिला सम्मलेन हुए, जिनमें लाखों महिलाओं ने भाग लिया । इन सब कार्यों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन व सहयोग रहा । हम यह मानते हैं कि महिलाओं का उद्धार पुरुष नहीं कर सकते । महिलाएं स्वयं अपना उद्धार करेंगी, उसमें सबका उद्धार हो जाएगा । इसलिए हम उन्हीं को प्रमुखता देते हैं और जो वे करना चाहती हैं, उसके लिए उनको सशक्त बनाते हैं।

प्र – संघ के शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का संकल्प आया है। इसे लेकर कोई कार्य योजना बनाई है, इस के आधार पर आगे क्या कर सकते हैं?

आचरण के परिवर्तन के लिए आवश्यक बात है मन का भाव। जो काम करने से मन का भाव बदलता है, स्वभाव परिवर्तित हो जाता है, वह काम देना है। और जीवन भी ठीक हो जाता है। इसलिए पंच परिवर्तन की बात है। एक तो समरसता की बात है, अपने समाज में प्रेम उत्पन्न हो। विविध प्रकार का समाज है, विविध अवस्था में है, विविध भौगोलिक क्षेत्रों में है, समस्याएं हैं। एक नियम आपके लिए बना है, मेरे लिए ठीक होगा ही, ऐसा नहीं है। इतना बड़ा देश है। इसमें से अगर रास्ता निकालना है, तो जो भी प्रावधान करने पड़ेंगे, वे प्रावधान मन से होंगे तो सुरक्षित रहेंगे और प्रेम बढ़ेगा। सामाजिक समरसता का व्यवहार करना है। उसमें सामाजिक समरसता का प्रचार अभिप्रेत नहीं है। प्रत्यक्ष समाज के बाहर जितने प्रकार माने जाते हैं, हम तो एक मानते हैं, सब प्रकार के मेरे मित्र होने चाहिए, मेरे कुटुंब के मित्र होने चाहिए। जहां अपना प्रभाव है वहां मंदिर, पानी, श्मशान एक हों, यह प्रारंभ है, इसको बढ़ाते जाना है।
ऐसे ही कुटुंब प्रबोधन है। जो संसार को राहत देने वाली बातें हैं, जिन आवश्यक परंपरागत संस्कारों से आती हैं, हमारी कुल-रीति में हैं और देश की रीति-नीति में भी हैं। उन पर बैठ कर चर्चा करना और उस पर सहमति बनाकर परिवार के आचरण में लाना, यह कुटुंब प्रबोधन है।
पर्यावरण के लिए तो आंदोलन सहित बहुत सारी बातें चलती हैं। लेकिन, आदमी अपने घर में पानी व्यर्थ जाता है, चिंता नहीं करता। पहले करो। पेड़ लगाओ, प्लास्टिक हटाओ, पानी बचाओ। यह करने से समझ विकसित होती है, वह सोचने लगता है।
ऐसे ही स्व के आधार पर करो। अपने स्व के आधार पर व्यवहार करना चाहिए। हमारा सबका जो राष्ट्रीय स्व है, उस के आधार पर चलो। अपने घर के अंदर भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भ्रमण यह अपना होना चाहिए। घर की चौखट के बाहर परिस्थिति के अनुसार करना पड़ता है। घर में तो हम हैं, वो रहेगा तो उसके कारण संस्कार भी बचेंगे। स्व-निर्भर देश को होना है तो हम बने तक अपने देश की वस्तुओं में काम चलाएं। इसकी आदत रखें। इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बंद करो। उसका एक संतुलन है, मेरा चल सकता है उसको चलाऊँगा। देश की आवश्यकता है, कोई जीवनावश्यक काम है और बाहर देश से लाना पड़ेगा तो लाओ, लेकिन अपनी शर्तों पर, किसी के दबाव में नहीं। यह सब बातें बनेंगी, स्व का आचरण।
कानून, संविधान, सामाजिक भद्रता का पालन। ये पांच बातें लेकर स्वयंसेवक उस पथ पर आगे बढ़ेंगे और शताब्दी वर्ष समाप्त होने के बाद इसको शाखाओं के द्वारा समाज में ले जाएंगे। यह आचरण बनेगा तो वातावरण बनेगा, और वातावरण बनने से परिवर्तन आएगा। और बहुत सी बातें आगे की हैं, वो यहां से जाएंगी धीरे-धीरे शुरू होकर। ऐसा सोचा है। देखते हैं क्या होता है।

प्र – आने वाले 25 वर्ष के लिए क्या संकल्प है?

संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना और देश को परमवैभव संपन्न बनाना, उसके आगे एक अनकही बात है कि सम्पूर्ण विश्व को ऐसा बनाना है । डॉ. हेडगेवार के समय से ही यह दृष्टि है । उन्होंने 1920 में प्रस्ताव दिया था कि ‘भारत का सम्पूर्ण स्वातंत्र्य हमारा ध्येय है और स्वतन्त्र भारत दुनिया के देशों को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त करेगा’ ऐसा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को कहना चाहिए ।

प्र – संघ के 100 वर्ष होना और देश की आजादी के 100 वर्ष 2047 में पूरे होंगे । भारत विश्व गुरु कैसे बनेगा!
कुछ लोग तरह-तरह से भेद उत्पन्न करने का प्रयास करेंगे । इन सबको कैसे देखते हैं?

जो हमारी प्रक्रिया है, उसमें इन सब बातों की चिंता की गयी है । आत्मविस्मृति, स्वार्थ और भेद इन तीन बातों से लड़ते-लड़ते हम बढ़ रहे हैं। आज समाज के विश्वासपात्र बने हैं । यही प्रक्रिया आगे चलेगी । अपनत्व के आधार पर समाज के सभी लोग एक मानसिकता में आ जाएंगे । एक और एक मिलकर दो होने के बजाय ग्यारह होगा । भारतवर्ष को संगठित और बल संपन्न बनाने का काम 2047 तक सर्वत्र व्याप्त हो जाएगा और चलते रहेगा । समरस, सामर्थ्य संपन्न भारत के विश्व जीवन में समृद्ध योगदान को देखकर सब लोग उसके उदाहरण का अनुकरण करने के लिए आगे बढ़ेंगे । 1992 में हमारे एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा था कि “इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखकर दुनिया के अन्यान्य देशों के लोग उस देश का अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा करेंगे। जिससे पूरे विश्व के जीवन में परिवर्तन आएगा”। यह प्रक्रिया 2047 के बाद प्रारम्भ होगी और इसे पूरा होने में 100 वर्ष नहीं लगेंगे । अगले 20-30 वर्षों में यह पूरी हो जाएगी।

प्र – शताब्दी वर्ष में जो हिन्दू-हितैषी वर्ग है, संघ का शुभचिंतक वर्ग है, इस राष्ट्र का हित चिंतक वर्ग है । उसके लिए आपका संदेश क्या होगा?

हिन्दू समाज को अब जागृत होना ही पड़ेगा । अपने सारे भेद और स्वार्थ भूलकर हिन्दुत्व के शाश्वत धर्म मूल्यों के आधार पर अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और आजीविका के जीवन को आकार देकर एक सामर्थ्य संपन्न, नीति संपन्न तथा सब प्रकार से वैभव संपन्न भारत खड़ा करना पड़ेगा क्योंकि विश्व को नई राह की प्रतिक्षा है और उसको देना यह भारत का यानी हिन्दू समाज का ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य है। कृषि क्रांति हो गयी, उद्योग क्रांति हो गयी, विज्ञान और तकनीक की क्रांति हो गयी, अब धर्म क्रान्ति की आवश्यकता है । मैं रिलीजन की बात नहीं कर रहा हूँ। सत्य, शुचिता, करुणा व तपस के आधार पर मानव जीवन की पुनर्रचना हो, इसकी विश्व को आवश्यकता है और भारत उसका पथ प्रदर्शक हो, यह अपरिहार्य है। संघ कार्य के महत्त्व को हम समझें, ‘मैं और मेरा परिवार’ के दायरे से बाहर आकर और अपने जीवन को उदाहरण बनाकर सक्रिय होकर हम सबको साथ में आगे बढ़ना चाहिए, इसकी आवश्यकता है।

‘नियो-मॉर्फियस’ कड़ी ने उजागर किया ISI का भारतीय मीडिया पर छुपा प्रभाव

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11 मई 2025 को Outlook मैगजीन का आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट अचानक गायब हो गया। कोई चेतावनी नहीं, कोई स्पष्टीकरण नहीं। कुछ ही घंटों में वह फिर से चालू हो गया। लिबरल मीडिया ने शोर मचाया — “डिजिटल सेंसरशिप”, “अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला”।
उसी शाम आउटलुक ने बयान जारी किया:

“Outlook ने पिछले तीस वर्षों से निष्पक्ष और संतुलित पत्रकारिता के उच्चतम मानकों को बनाए रखा है और आगे भी बनाए रखेगा।”

लेकिन जनता जहां ब्लॉकिंग और बहाली पर ध्यान केंद्रित कर रही थी, सरकार की नजरें एक और दिशा में थीं — Outlook की संपादक पर, और उस कहानी पर जिसकी शुरुआत कई साल पहले हो चुकी थी।

2014: बाढ़, एक प्रोफाइल, और एक प्रोपेगेंडा
2014 में, Outlook की वर्तमान संपादक चिंकी सिन्हा ने कश्मीर में आई बाढ़ के दौरान ओमर जावेद बज़ाज़ पर एक भावुक लेख लिखा। लेख में उसे एक मानवीय नायक के रूप में चित्रित किया गया। परंतु यही वह समय था जब खुफिया एजेंसियों ने बज़ाज़ को भारतीय सेना के कैप्टन बिक्रमजीत सिंह की हत्या का जश्न मनाने, और ओसामा बिन लादेन की मौत पर कश्मीर में प्रार्थनाओं का आह्वान करने के लिए चिन्हित किया था।

इसी समय, बब्बर खालसा और ISI एजेंट गुलाम नबी फ़ई एक संगठित अभियान चला रहे थे, जिसमें बज़ाज़ को “कश्मीरी संघर्ष” का चेहरा बनाने की कोशिश की जा रही थी।

लेख का समय और पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा प्रयास का तालमेल केवल संयोग नहीं था — यह एक सोची-समझी रणनीति थी।

‘नियो’ और ‘मॉर्फियस’: परदे के पीछे के कोडनेम
सोशल मीडिया टिप्पणियों और पर्यवेक्षकों द्वारा दर्ज संदर्भों में ओमर जावेद बज़ाज़ को ‘नियो’ और चिंकी सिन्हा को ‘मॉर्फियस’ कहा गया — एक ऐसा सांकेतिक नामकरण जो The Matrix फिल्म से प्रेरित है, जहां यथार्थ पर पर्दा डाला जाता है।

ये नाम न केवल उनकी संचार शैली में एक निजी जुड़ाव दर्शाते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि कहानी कहने के पीछे व्यक्तिगत झुकाव हो सकता है। चिंकी सिन्हा ने बज़ाज़ की एक इंस्टाग्राम तस्वीर पर लिखा:
“तुम और कबूतर दोनों खूबसूरत हो।”

यह वाक्य सतही रूप से मासूम लगता है, लेकिन जब इसे बज़ाज़ की आतंक समर्थक गतिविधियों के संदर्भ में देखा जाए, तो इसका अर्थ बदल जाता है।

फ़ई का नेटवर्क और भारतीय मीडिया
गुलाम नबी फ़ई, जिसे अमेरिका में ISI के लिए कार्यरत पाया गया, ने Kashmir American Council के माध्यम से भारतीय पत्रकारों, शिक्षाविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सम्मेलनों में आमंत्रित कर वैश्विक राय बनाने की कोशिश की।

इन सम्मेलनों में भारत से आमंत्रित लोगों में शामिल थे:

कुलदीप नैयर, वरिष्ठ पत्रकार

जस्टिस राजिंदर सच्चर

अंगना चटर्जी, शिक्षाविद

रीटा मांचंदा, मानवाधिकार कार्यकर्ता

इस नेटवर्क का उद्देश्य था — मीडिया के माध्यम से भारत विरोधी विमर्श को स्थापित करना।

आज, इसी पैटर्न को भारतीय समाचार संस्थानों में फिर से देखा जा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर और नैरेटिव की लड़ाई
जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत आतंक के अड्डों पर करारा प्रहार किया, Outlook की संपादक फेसबुक पर यह प्रचार कर रही थीं कि यह ऑपरेशन पितृसत्ता की बू देता है, और लोगों को इसे खारिज करने के लिए प्रेरित कर रही थीं।

उनकी ये पोस्ट्स, शब्दशः, पाकिस्तान के दुष्प्रचार प्लेटफार्मों पर दोहराई गईं — जिससे भारतीय सैन्य कार्रवाई को वैचारिक रूप से कमजोर किया जा सके।

यह केवल राय नहीं थी। यह प्रचार सामग्री बन गई।

भारत सरकार ने Outlook को न तो बैन किया, न ही कोई गिरफ्तारी की। उसने देखा।

और जो देखा गया, वह यह था:

एक संपादक जिसने एक ऐसे व्यक्ति को महिमामंडित किया जिसे आतंकवादी समूह नायक मानते हैं।

प्रतीकों और कोडनेम के माध्यम से बना एक निजी और वैचारिक जुड़ाव।

ऐसी सोशल मीडिया गतिविधियाँ जो राष्ट्रीय सुरक्षा की दिशा में चल रहे विमर्श को कमज़ोर करती हैं और ISI की बातों को बल देती हैं।

जब राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियाँ विदेशी खुफिया एजेंसियों की रणनीति से मेल खाने लगें — तब सवाल उठता है, कहानी कौन सुना रहा है?

कश्मीर की जंग सिर्फ सीमा पर नहीं — बल्कि हेडलाइनों के बीच में भी लड़ी जा रही है।

सीरियस मेंटल-फिजिकल अब्यूज सहकर भी हिन्दुत्व से लड़ने वाली वीरांगनाएँ

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रंगनाथ सिंह

कभी-कभी औचक ही ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिन्हें समझने में आपको लम्बा वक्त लग जाता है। कल और आज के बीच ऐसी ही एक घटना घट गयी जिसे मैं चाहकर भी समझ नहीं पा रहा हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि धाराप्रवाह इंग्लिश बोलने-लिखने वाली आत्मनिर्भर महिलाएँ भी उसी ट्रैप में फँस सकती हैं जिनका आसान शिकार अशिक्षित और परनिर्भर महिलाएँ मानी जाती थीं। पिंजड़ातोड़ वाली इस नए पिंजड़े को कैसे देखती हैं, यह देखना बाकी है।  

वायर के लिए लिखने वाले पत्रकार के खिलाफ शिकायत करने वाली पीड़िता ने 40 से ज्यादा व्यक्तियों और संस्थाओं को टैग करके अपनी पीड़ा सार्वजनिक की। जब व्हाटसऐप द्वारा उस ट्वीट को प्रसार हुआ तो पहले चरण में शुद्ध वामपंथियों ने आपस मे एक दूसरे को वह ट्वीट भेजा। उनमें से कुछ अशुद्ध वामपंथियों की आत्मा अधमरी अवस्था में साँस ले रही थी तो उन्होंने कुछ इंडिपेडेंट और कुछ दक्षिणपंथियों को वह लिंक भेजा। जब धीरे-धीरे बात फैलने लगी तब दि वायर का आत्मरक्षात्मक बयान आया कि जाँच करेंगे। जाँच के नतीजों जब आएँगे तब उसकी चर्चा फिर करेंगे।  
पीड़िता के मूल बयान में भी हिन्दुत्व के कट्टर विरोध की गहरी इच्छाशक्ति छलक रही थी। बाद में उसने एक बयान जारी करके हिन्दुत्ववादियों को लानत भेजा ताकि वो उसकी पीड़ा का इस्तेमाल न कर सकें। उसके बाद हिन्दुत्ववादियों ने उसे भला-बुरा कहा और जितने कमेंट मेरी नजर में गुजरे उनका सार यही था कि इसे हिन्दुत्ववादियों से इतनी समस्या है तो इसे इसके हाल पर छोड़ दो!

आप कह सकते हैं कि पीड़िता की दूसरी अपील का असर तत्काल दिख गया मगर उसकी पहली अपील का असर मुझे कहीं नहीं दिखा। जिन 40 से ज्यादा हैंडल को उसने टैग किया था उनमें से किसी ने उसका ट्वीट रीट्वीट तक नहीं किया था।

पीड़िता ने जिन लोगों को टैग किया था उनमें फ्री स्पीच एंकर से लेकर फ्री स्पीच एडिटर तक शामिल थे जो रोज ही प्रधानमंत्री को ललकारते रहते हैं मगर एक पीड़ित लड़की की पीड़ा पर उनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी।  

पीड़िता द्वारा हिन्दुत्व की कड़ी निन्दा के बाद एक यूट्यूबर ने ऐसा रहस्योद्घाटन किया जिसे सुनकर मेरी बुद्धि हिल गयी। वह मोहतरमा जेएनयू से इतिहास में पीएचडी हैं। उन्होंने इंग्लिश में बयान जारी करके बताया कि वह भी 8-10 साल तक ऐसे ही फिजिकली और मेंटली अब्यूसिव रिलेशन में रही थीं मगर उन्होंने आरोपी को कॉल आउट नहीं किया क्योंकि इससे “मुस्लिम मेन” टारगेट होने लगते! अपना उदाहरण देकर उन्होंने पीड़िता को संकेत दिया कि वह बिल्कुल सही दिशा में जा रही है।

जो नारीवादियाँ पीड़िताओं को उनके पिता-भाई-पति इत्यादि के खिलाफ बोलने के प्रेरित करती रही हैं वे महिला उत्पीड़न पर पर्दा डालने वाले इस नए “ऑनर कोड” पर क्या सोचती हैं? यह नया कोड “गाँव में बदनामी” और “परिवार की इज्जत” से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि गाँव और परिवार सीधे तौर पर पीड़िता के लिविंग रियल्टी के हिस्से होते हैं। मगर ये कौन से ख्याली “मुस्लिम मेन” हैं जिनको बचाने के लिए ये पीड़िताएँ लम्बे समय तक पुलिस या समाज से अपने यौन शोषण और अब्यूज को छिपाती रहीं!

जरा सोचिए कि जब हिन्दू महिलाओं की ग्रूमिंग का यह हाल है तो मुस्लिम महिला का क्या हाल होगा! उनपर अपनी कौम की मर्दों की इज्जत बचाने का कितना दबाव होगा! अगर उनके साथ उत्पीड़न होगा तो उन्हें उसके खिलाफ आवाज उठाने में कितनी मुश्किल होगी? दुनिया में करीब 200 करोड़ मुसलमान हैं। उनमें अगर 90 करोड़ मुस्लिम पुरुष हों तो उन सभी को इन महिलाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए जो बलात्कार और यौन शोषण सहकर भी “मुस्लिम मेन की रक्षा” कर रही हैं।

पीड़िता ने अपने पहले बयान में Mee Too और We Too का कई बार प्रयोग किया है। उसे लगता है कि वह ऐसी पीड़िताओं के साथ मिलकर इस “पैट्रियार्की” का मुकाबला करेगी। समाज में हर कोई अपना WE डिसाइड करता है। मगर ज्यादातर ख्याली पुलाव जमीनी हकीकत के सामने दम तोड़ देते हैं। पीड़िता ने जिन 40 से ज्यादा लोगों को टैग किया था उन्हें WE समझकर ही टैग किया था मगर अब उसे पता चल गया होगा कि वे उसे अपने WE में कंसीडर करते हैं या नहीं!

मेरे लिए यह सदमे जैसा है कि उच्च शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाएँ भी किसी सोशल साइको ट्रैप में फँसकर अपने अप्रेशर का दमखम से बचाव कर सकती हैं।

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