ज़हर पी लिया, पर पार्टी बचा ली

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उपेन्द्र कुशवाहा

शपथ लेने वालों में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के कोटे से दीपक प्रकाश मंत्री बने हैं। वो अभी किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, यानी वो न तो विधानसभा और न हीं विधान परिषद के सदस्य हैं। 37 वर्षीय दीपक प्रकाश ने एमआईटी, मणिपाल से कंप्यूटर साइंस में बीटेक (2011) पूरा किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद दीपक ने साल 2011 से 2013 तक साफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्य किया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा आरएलएम के प्रमुख हैं और दीपक प्रकाश उनके बेटे हैं। उपेंद्र कुशवाहा वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं, वहीं उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में सासाराम से जीतकर विधायक बनीं हैं। यानी की पिता सांसद-मां विधायक के बाद अब बेटे दीपक प्रकाश अब नीतीश सरकार में मंत्री बन गए हैं। इस बात की सोशल मीडिया से लेकर पटना के राजनीतिक गलियारों में खूब आलोचना हो रही है।

इस आलोचना पर अपनी सफाई उपेन्द्र कुशवाहा ने सोशल मीडिया पर दी है। जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

पटना। कल से मैं देख रहा हूं, हमारी पार्टी के निर्णय को लेकर पक्ष और विपक्ष में आ रही प्रतिक्रियाएं….उत्साहवर्धक भी, आलोचनात्मक भी..! आलोचनाएं स्वस्थ भी हैं, कुछ दूषित और पूर्वाग्रह से ग्रसित भी। 

स्वस्थ आलोचनाओं का मैं हृदय से सम्मान करता हूं। ऐसी आलोचनाएं हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, संभालती हैं। क्योंकि ऐसे आलोचकों का मकसद पवित्र होता है। दूषित आलोचनाएं सिर्फ आलोचकों की नियत का चित्रण करती हैं। दोनों प्रकार के आलोचकों से कुछ कहना चाहता हूं। 

पहले स्वस्थ आलोचकों से:- आपने मेरे उपर परिवारवाद का आरोप लगाया है। मेरा पक्ष है कि अगर आपने हमारे निर्णय को परिवारवाद की श्रेणी में रखा है, तो जरा समझिए मेरी विवशता को। पार्टी के अस्तित्व व भविष्य को बचाने व बनाए रखने के लिए मेरा यह कदम जरुरी ही नहीं अपरिहार्य था। मैं तमाम कारणों का सार्वजनिक विश्लेषण नहीं कर सकता, लेकिन आप सभी जानते हैं कि पूर्व में पार्टी के विलय जैसा भी अलोकप्रिय और एक तरह से लगभग आत्मघाती निर्णय लेना पड़ा था। जिसकी तीखी आलोचना बिहार भर में हुई। उस वक्त भी बड़े संघर्ष के बाद आप सभी के आशीर्वाद से पार्टी ने सांसद, विधायक सब बनाए। लोग जीते और निकल लिए। झोली खाली की खाली रही। शुन्य पर पहूंच गए। पुनः ऐसी स्थिति न आए, सोचना ज़रूरी था। 

सवाल उठाइए, लेकिन जानिए। आज के हमारे निर्णय की जितनी आलोचना हो, लेकिन इसके बिना फिलहाल कोई दूसरा विकल्प फिर से शुन्य तक पहुंचा सकता था। भविष्य में जनता का आशीर्वाद कितना मिलेगा, मालूम नहीं। परन्तु खुद के स्टेप से शुन्य तक पहुंचने का विकल्प खोलना उचित नहीं था। इतिहास की घटनाओं से यही मैंने सबक ली है। समुद्र मंथन से अमृत और ज़हर दोनों निकलता है। कुछ लोगों को तो ज़हर पीना ही पड़ता है। वर्तमान के निर्णय से परिवारवाद का आरोप मेरे उपर लगेगा। यह जानते/समझते हुए भी निर्णय लेना पड़ा, जो मेरे लिए ज़हर पीने के बराबर था। फिर भी मैंने ऐसा निर्णय लिया। पार्टी को बनाए/बचाए रखने की जिद्द को मैंने प्राथमिकता दी। अपनी लोकप्रियता को कई बार जोखिम में डाले बिना कड़ा/बड़ा निर्णय लेना संभव नहीं होता। सो मैंने लिया। 

 पूर्वाग्रह से ग्रसित आलोचकों के लिए बस इतना ही:- 

 “सवाल ज़हर का नहीं था, वो तो मैं पी गया । 
तकलीफ़ उन्हें तो बस इस बात से है कि मैं फिर से जी गया ।।” 

अरे भाई, रही बात दीपक प्रकाश की तो जरा समझिए – विद्यालय की कक्षा में फेल विद्यार्थी नहीं है। मेहनत से पढ़ाई करके कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की डिग्री ली है, पूर्वजों से संस्कार पाया है उसने। इंतजार कीजिए, थोड़ा वक्त दीजिए उसे। अपने को साबित करने का। करके दिखाएगा। अवश्य दिखाएगा। आपकी उम्मीदों और भरोसा पर खरा उतरेगा। 

वैसे भी किसी भी व्यक्ति की पात्रता का मूल्यांकन उसकी जाति या उसके परिवार से नहीं, उसकी काबिलियत और योग्यता से होना चाहिए। आप सबों का आभार

भारत को जाने, भारत को माने, भारत के बने और फिर भारत को बनाएं” – डॉ. मनमोहन वैद्य

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भोपाल। सुरुचि प्रकाशन की ओर से रवींद्र भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक डॉ. मनमोहन वैद्य की पुस्तक ‘हम और यह विश्व’ का विमोचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की मूल अवधारणा, आत्मगौरव, सांस्कृतिक चेतना और अध्ययनशील परंपरा पर व्यापक चर्चा हुई। इस अवसर पर श्री आनंदम धाम आश्रम, वृंदावन के पीठाधीश्वर श्री ऋतेश्वर जी महाराज, पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़, जागरण के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी, सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष श्री राजीव तुली और लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने अपने विचार प्रकट किए।

पुस्तक के लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारतीयता, अध्ययन और विमर्श की आवश्यकता पर अपना उद्बोधन दिया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत को बनाने से पहले आवश्यक है कि हम पहले भारत को माने, उसके बाद भारत को जाने, फिर भारत के बने और उसके बाद भारत को बनाएं। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत उस अनुभव से की जिसने उन्हें लेखन की ओर प्रेरित किया। संघ के तृतीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग में जब श्री प्रणब मुखर्जी को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया था, तब कुछ लोगों ने बिना कारण विरोध किया। इस एक घटना ने मनमोहन जी को लिखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 में केवल 1 से 6 जून के बीच 378 लोगों ने उनसे मिलने का अनुरोध किया था, जो यह दर्शाता है कि संघ को लेकर समाज में संवाद की गहरी उत्सुकता है।
उन्होंने बताया कि संघ पर बेवजह किया गया विरोध कई बार संघ की स्वीकार्यता को और बढ़ा देता है। जॉइन आरएसएस वेबसाइट का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सिर्फ उस वर्ष अक्टूबर माह में ही 48,890 लोगों ने स्वयंसेवक के रूप में जुड़ने का अनुरोध किया। यह भारत के सामाजिक परिवर्तन और संगठन के प्रति बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।

भारत की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हमें उन कथनों को समझना होगा जो हमारी सोच को प्रभावित करते हैं। उन्होंने लोकप्रिय गीत “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” की पंक्ति “हम बुलबुले हैं इसके” पर बताया कि ऐसे भाव हमें अपनी मूल चेतना से दूर करते हैं। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि भारत में सांस्कृतिक विविधता है। अपितु यह कहना अधिक सही है कि भारत की संस्कृति एक ही है जो विविध रूपों में प्रकट होती है। भारत में विविधता मूल संस्कृति की शाखाएं हैं, उसका विकल्प नहीं।

उन्होंने कहा कि वेलफेयर स्टेट की अवधारणा भारत की अपनी अवधारणा नहीं है, बल्कि पश्चिम से आयातित विचार है। भारत की परंपरा समाज-आधारित दायित्व पर आधारित रही है। उन्होंने बताया कि यह पुस्तक चार महत्वपूर्ण खंडों में विभाजित है और प्रत्येक खंड भारत के विमर्शों पर नई दृष्टि प्रदान करता है।

अध्ययन ही भारत की परंपरा का मूल – विष्णु त्रिपाठी

जागरण समूह के समूह संपादक श्री विष्णु त्रिपाठी ने कहा कि यह पुस्तक सिर्फ घर या पुस्तकालय में संग्रह के लिए नहीं लिखी गई है, बल्कि इसके अध्ययन, मनन और भाष्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा किसी एक पुस्तक या एक मत पर आधारित नहीं है। यहाँ ज्ञान की अनेक धाराएँ हैं। हमारी आध्यात्मिकता भी अध्ययन और चिंतन से ही जन्म लेती है। उन्होंने भारत की पहचान पर उठने वाले प्रश्नों पर स्पष्ट कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है या नहीं जैसी बहसें अध्ययन के अभाव से उत्पन्न होती हैं। जब भारत और भारतीयता पर गौरव का भाव स्थापित हो जाता है, तो ऐसे प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाते हैं। उन्होंने गुरुनानक देव जी का उदाहरण देते हुए बताया कि वे रामनाम के परम उपासक थे और बाबर की आलोचना सीधे अपने भजनों में करते हैं। इसी रामनाम के प्रसार के साथ वे बगदाद तक पहुँचे थे। यह उदाहरण भारतीय अध्यात्म की गहराई और व्यापकता दोनों को दिखाता है।

“यह पुस्तक सोए हुए को जगा देगी” – पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

पूर्व उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने कहा कि भोपाल आकर इस पुस्तक पर बोलने का अवसर उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि हम और यह विश्व सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत का दर्पण और भविष्य निर्माण की दिशा दिखाने वाला ग्रंथ है। श्री धनखड़ ने कहा कि यह पुस्तक आठ वर्षों के अनुभवों का संग्रह है, जिसमें श्री प्रणब मुखर्जी पर दो महत्त्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं।
वे अंग्रेजी में वक्तव्य देते हुए बोले कि मैं अंग्रेजी में इसलिए बोल रहा हूँ ताकि जो लोग देश की सकारात्मक छवि को समझना नहीं चाहते, वे भी स्पष्ट और सीधे शब्दों में भारत के वास्तविक स्वरूप से परिचित हों। उन्होंने यह भी कहा कि आज का भारत तेजी से बदल रहा है, हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और विश्व मंच पर एक मजबूत, आत्मविश्वासी और निर्णायक देश के रूप में उभर रहा है।

 

कार्यक्रम की शुरुआत में श्री राजीव तुली ने सुरुचि प्रकाशन की परंपरा और भविष्य की दिशा का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि सुरुचि प्रकाशन समाज जीवन के विविध महत्वपूर्ण विषयों पर लगातार पुस्तकों, शोध कृतियों और विचारपरक सामग्री का प्रकाशन कर रहा है।

उन्होंने बताया कि आने वाले महीनों में वॉकिज़्म, पंच परिवर्तन और अन्य बौद्धिक मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण प्रकाशन सामने आने वाले हैं। राजीव तुली ने कहा कि “हम और यह विश्व” पुस्तक के पाठन के दौरान ऐसा महसूस होता है जैसे पाठक और पुस्तक के बीच सीधा संवाद स्थापित हो रहा हो।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही इस पुस्तक का अंग्रेजी संस्करण पहले प्रकाशित हुआ था, लेकिन वर्तमान संस्करण में कई महत्त्वपूर्ण और विस्तृत जानकारियाँ जोड़ी गई हैं। यह पुस्तक आज के समाज के बड़े विमर्शों को पढ़ने, समझने और उनके भाष्य लिखने के लिए अत्यंत उपयोगी है।

कार्यक्रम में गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और बौद्धिक जगत से जुड़े अनेक प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. साधना बलवटे ने किया। अंकुर पाठक ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उपस्थित सभी अतिथियों, गणमान्यजनों और पुस्तक प्रेमियों का धन्यवाद किया। वंदे मातरम् के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

आमार दीदी , तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद !

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दयानंद पांडेय

हालां कि अटल बिहारी वाजपेयी बताते नहीं थकते थे कि उन्हों ने कभी भी इंदिरा गांधी को दुर्गा नहीं कहा । अटल जी कहते थे कि यह भ्रम पुपुल जयकर ने लिख कर फैलाया है । वह यह भी कहते थे कि उन्हों ने पुपुल जयकर से पूछा कि आख़िर कब और कहां मैं ने इंदिरा जी को दुर्गा कहा तो वह चुप रह गईं । अटल जी ने भले कभी नहीं कहा कि इंदिरा दुर्गा हैं लेकिन जन मानस में यह बात आज भी अंकित है कि अटल जी ने कहा था कि इंदिरा जी दुर्गा हैं । तो शायद इस लिए कि उन्हों ने सचमुच दुर्गा जैसा काम किया था । पाकिस्तान को भारतीय फ़ौज के बूटों तले कुचल कर दुनिया का भूगोल बदल दिया था । बांग्लादेश को जन्म दिया था । यह 1971 का साल था । 16 दिसंबर , 1971 का वह दिन भुला पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है । मैं उस समय 13 बरस का था । स्कूल में था । गोरखपुर के सारे स्कूलों , कालजों ने उस 16 दिसंबर को रैली निकाली थी । उस हाड़ कंपाती ठंड में भी हम झूम कर गा रहे थे , सोलह दिसंबर आया ले के जवानी सोलह साल की ! बाद के दिनों में एक कवि सम्मेलन में पंडित रूप नारायण त्रिपाठी का एक गीत भी सुना जिसे उन्हों ने बांग्लादेश से लौट कर लिखा था , आमार दीदी , तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद ! तब हम इस गीत को भी खूब गाते थे । आज भी जब-तब गुनगुनाते रहते हैं : आमार दीदी , तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद ! जिस इंदिरा के पिता नेहरु ने चीन से , हिंदी-चीनी , भाई-भाई नारे के बीच पीठ में चीन का छुरा सहा था , उसी इंदिरा ने न सिर्फ़ चीन बल्कि पाकिस्तान समेत अमरीका को भी उस की औकात में रखा । इसी लिए वह आयरन लेडी भी कहलाईं । इंदिरा गांधी की विदेश नीति ने भारत का मस्तक सर्वदा ऊपर रखा । कांग्रेस के तमाम चाणक्य लोगों को भी उन्हों ने खूब पानी पिलाया था । चाहे वह कामराज हों या द्वारिका प्रसाद मिश्र या कोई और । उन की हत्या के बाद दिल्ली में जब खौफ़नाक दंगे हुए तब के समय भी मैं दिल्ली में था । उस दंगे और दंगों के कारण की तफ़सील फिर कभी । लेकिन नफ़रत के अलावा इंदिरा गांधी से मुहब्बत की एक इबारत भी थी वह ।

एक इमरजेंसी के तानाशाही के दाग को अगर छोड़ दें तो इंदिरा गांधी ने देश को बहुत कुछ दिया है । बैंकों का राष्ट्रीयकरण , खदानों का राष्ट्रीयकरण , प्रीवीपर्स खत्म करने जैसे कठोर फ़ैसले आसान नहीं थे । हरित क्रांति, आपरेशन फ्लड, पोखरण परमाणु परीक्षण , सिक्किम का भारत मे विलय, कश्मीर से सदरे रियासत और वजीरे आज़म के व्यवस्था की समाप्ति – ये सारे क़दम भी इंदिरा गांधी के खाते मे दर्ज हैं । 1977 में कांग्रेस के घनघोर पतन के बाद भी ढाई साल में ही 1979 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी भी आसान नहीं था । इंदिरा गांधी का राजनीतिक कमाल ही था । उन्हीं दिनों का रघु राय का एक फ़ोटो नहीं भूलता । जिस में एक सफाई कर्मी झाड़ू लगा रहा है , उस के झाड़ू में इंदिरा गांधी की फ़ोटो वाला पोस्टर कूड़ेदान में जाता दीखता है । मतलब इंदिरा गांधी कूड़ा हो चली थीं । खैर ,1977 में दिल्ली के रामलीला मैदान में जब जनता पार्टी मोरारजी देसाई के नेतृत्व में विजय दिवस मना रही थी तो उस में जय प्रकाश नारायण नहीं गए । ठीक उसी समय वह इंदिरा गांधी के घर गए । इंदिरा गांधी को बेटी मान कर । इंदिरा गांधी का हालचाल लेने ।

जय प्रकाश नारायण को चिंता थी कि इंदिरा का काम काज अब कैसे चलेगा ? इंदिरा ने उन से कहा कि खर्च की चिंता उन्हें नहीं है । पापू की किताबों की रायल्टी इतनी आती है कि खर्च तो चल जाएगा । उन की चिंता है कि ख़ाली समय वह कैसे बिताएंगी । जय प्रकाश नारायण ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा कि , तुम फिर से जनता के बीच जाओ । जनता से मिलो , जुलो । जनता के बीच काम करो । इंदिरा गांधी ने जय प्रकाश नारायण की बात को मान कर जनता के बीच जाना शुरू कर दिया । मुझे याद है कि 1977 कि 1978 का ही बरसात का कोई महीना था । गोरखपुर के एक पिछड़े मुहल्ले इलाहीबाग में पांच-सात लोगों के साथ इंदिरा गांधी को घर-घर घूमते , लोगों का हालचाल लेते देखा था । मुहल्ले के लड़के उन के पीछे-पीछे घूमते फिरे थे । हम भी थे । आज़मगढ़ से रामनरेश यादव तब सांसद थे लेकिन उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री बन जाने के कारण उन की संसदीय सीट ख़ाली होने के कारण हुए उपचुनाव में इंदिरा गांधी की मेहनत ने कमाल दिखाया । कांग्रेस की मोहसिना किदवई उप चुनाव जीत गई थीं ।

लेकिन यह दूसरा दौर उन के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण साबित हुआ । हवाई दुर्घटना में संजय गांधी की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया । पंजाब में खालिस्तान की मांग और आतंकवाद ने उन्हें मुश्किल में डाल दिया । लेकिन फौजी बूटों तले जिस तरह इंदिरा गांधी ने पंजाब के आतंकवाद को ब्लू स्टार आपरेशन कर कुचल कर नेस्तनाबूद कर दिया था , वह आसान नहीं था । वह भले शहीद हो गईं लेकिन पंजाब को आतंक से मुक्त कर गईं । कि आज कश्मीर की तबाही देख कर उन की बहुत याद आती है । कश्मीर को शांत करने के लिए इंदिरा गांधी जैसा कड़ा फ़ैसला लेने वाले की ही ज़रूरत है । कृपया मुझे यह भी कहने दीजिए कि अभी तक के सभी प्रधान मंत्रियों में इंदिरा गांधी सब से शक्तिशाली और समर्थ प्रधान मंत्री साबित हुई हैं । यह मेरा सौभाग्य है कि इंदिरा गांधी से व्यक्तिगत रूप से मिलने और उन की प्रेस कांफ्रेंस कवर करने का अवसर मिला है । उन के साथ जुड़ी बहुत सी स्मृतियां हैं । आज उन के जन्म-दिन पर उन्हें शत-शत नमन !

सदैव याद रहेंगे अवधेश प्रीत जी

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संदीप पांडेय

पटना। अवधेश प्रीत जी सदैव याद रहेंगे। और मैं भी उन्हें हमेशा याद रहा, सिर्फ 2 मुलाकात में।

बात तब की है जब, हिंदुस्तान पटना में आप कार्यरत थे। उन दिनों मैं दसवीं पास कर निकला था। तब मैं प्रेमरस की कविताएं लिखता था और सिर्फ यही सब लिखता था।

उन्हें छपवाने के लिए मैं उनके पास गया। उन्होंने मेरी 2 कविताएं पढ़ीं और फिर मेरा जमकर क्लास लिया। वो बोले…कि क्या तुम्हे देश, समाज पर लिखने नहीं आता? इन रचनाओं से समाज को क्या लाभ! भाषा और बिंबों को लेकर भी उन्होंने जमकर फटकार लगाई। फिर मुझे उदास देखकर बोले .. कि मैं तुम्हे हताश नहीं कर रहा .. कल अपनी सबसे अच्छी वाली 4 रचनाएं लेकर फिर से आना।

मेरी लेखनी में दोष निकालने के कारण मैं उनसे नाराज़ होकर हिंदुस्तान ऑफिस से निकला। अगले दिन मैंने 3 कविता अपनी और एक बशीर बद्र साहब की कम लोकप्रिय नज़्म को लेकर, 4 कविताओं के साथ उनके पास पहुंचा। वो लंच कर रहे थे लेकिन मुझे बुलाया और फिर से मेरी क्लास लेने लगे।
उन्होंने सभी कविताओं को पढ़ा और सबमें कमियां निकाल पुनः समझाया। फिर बोले कि चलो, कोई एक रचना तुम छोड़ दो..प्रकाशित हो जाएगी। साथ ही बताया कि देश और समाज के लिए चिंतन करो। प्रेम आदि में समय बर्बाद क्यों कर रहे।

खैर, जिस रचना के लिए मुझे जबर सुनाया वो बशीर बद्र साहब की थी। मैं उठ कर जाने लगा.. और जाते जाते उनसे कहा कि सर आपकी सब बात ठीक है, लेकिन आपको एक बात बताऊं, ये वाली रचना बशीर बद्र की है। अब जब ऐसे बड़े लेखक आपके प्रशंसा के पात्र नहीं, तो मेरी बुराई से मैं अब हतोत्साहित नहीं हूं। धन्यवाद ।।

वो थोड़ा झेंप गए और हंसकर बोले .. पांडेजी आप लेखन के साथ साथ कूटनीतिक दाव भी चलते हैं।।

इस बात को कोई छह–सात वर्ष बीते होंगे। मैं मंडी हाउस, दिल्ली में नाटक करता था। 2009 या 10 की बात होगी। मंडी हाउस के एलटीजी ऑडिटोरियम में महात्मा गांधी पर एक बहुत वृहत नाटक, जो मैने लिखा था उसका मंचन होना था।

ये नाटक अमर्त्य सेन की पुस्तक पर आधारित था। उसका मंचन .. ईश्वर की कृपा से बहुत वृहत स्केल पर हो रहा था। अमेरिका में रह रहे एक एनआरआई लेखक की पुस्तक का मैने ही नाट्य रूपांतरण किया था। उस नाटक में कई अमेरिकी गेस्ट भी उपस्थित थे। उस कार्यक्रम में अवधेश जी अतिथि थे। जब मंच पर उन्होंने मुझे संचालक की भूमिका में देखा और साथ ही मेरा तब का प्रचलित नाम “कनिष्क कश्यप” और रामदेव जी को टक्कर देती मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी देखकर … वो थोड़े भटभटाए हुए थे। कार्यक्रम के पश्चात मिलते हुए बोले। आप संदीप पांडे हैं .. आपने नाम बदल लिया है.. लेकिन मुझे आप याद हैं, बशीर बद्र की रचना से छकाया था आपने और उसके लिए आपका धन्यवाद। उस घटना के बाद मैं पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर .. किसी भी रचना का मूल्यांकन नहीं करता। और हां.. नाटक में मजा आया।

आज न यासीन खान साहब जीवित हैं ( उस नाटक के निर्देशक और मेरे एक्टिंग गुरु) और न ही आप रहे। लेकिन आप जैसे सज्जन व्यक्तियों का आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमेशा प्रेरणा बना रहेगा। देखिए आज पिछले दस वर्षों में शायद ही मैने प्रेम लिखा हो, सिर्फ देश और समाज का ही चिंतन शेष बचा है। ईश्वर आपको श्री चरणों में स्थान दें।
ॐ शांति शांति शांति।।

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