हास्य ही हमारा सुरक्षा कवच है!

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शिमला । भारत में लोकतंत्र की मजबूती, और स्थायित्व की प्रमुख वजह हमारा हंसमुख स्वभाव है। हम न कानून को सीरियसली लेते हैं, न ही अपने देवताओं को, नेताओं को तो सर्कस का जोकर मानते हैं। बाबाओं, गुरुओं, प्रवचन कर्ताओं ने हमारी जिंदगी को हास्यात्मक कवच से सुदृढ़ कर दिया है जिसकी वजह से इमरजेंसी की तानाशाही फेल हो गई, कोविड महामारी कन्फ्यूज्ड हो गई , ट्रंप के टैरिफ दिशा भ्रमित हो गए। न सरकार को पता है, न आंदोलन जीवियों को कैसे अपना भारत उपलब्धियों की बुलंदी छू रहा है। सबसे बड़ा मजाक बिहार चुनाव परिणाम आपके सामने हैं। जीतने वाले खिलाड़ी भी de code नहीं कर पा रहे हैं प्रशांत किशोर ने ये कौन सा एल्गोरिथम लिखा!

भारत में हंसी कोई साधारण चीज़ नहीं—यह राष्ट्रीय स्तर का स्टेबिलाइज़र है, ट्रिपल-डोज़ का वैक्सीन है जो किफायती तनाव-नाशक है, और लोकतंत्र का असली ‘Z+ सुरक्षा कवच’ है। 1.4 अरब लोगों वाला देश, जिसमें लोग गोलगप्पे की तीखेपन पर भी भीषण युद्ध छेड़ सकते हैं, वहाँ हर चुनाव, घोटाला और घमासान के बाद देश शांत कैसे रहता है?

सिंपल: क्योंकि यहां लोग नेता को लाठी से नहीं, LOL से मारते हैं। कभी पीलू मोदी, कभी राज नारायण, लालू यादव या राहुल भैया।
हम दुनिया का पहला देश हैं जिसने खोजा कि “Kill them with humour”। ये वास्तव में हथियारबंद टकराव से ज़्यादा असरदार है। यहाँ नेता का मज़ाक उड़ाओ, और पब्लिक का गुस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।नेता मीम में बदल जाए, तो जनता पत्थर से नहीं, गुलगुली से लोट पोट हो जाती है।
जिस दिन राहुल गांधी पहली बार “पप्पू” हुए, कांग्रेस ने समझ लिया कि ट्रेन जलाने से अच्छा है टेम्पलेट जलाओ। और जनता को भी पता चल गया: “इतनी आसानी से गुस्सा निकल जाए? ये तो थेरेपी से भी सस्ता है!”

मोदी जी के 10-लाख वाले सूट ने अर्थव्यवस्था को भले न बढ़ाया हो,लेकिन मीम इंडस्ट्री का Sensex आसमान छू गया। उनके समर्थकों ने दंगे नहीं किए, बल्कि उन्हें भारतीय Met Gala का “Best Dressed Leader” अवार्ड दे दिया। दूर-दूर तक Photoshop फैक्ट्रियाँ चलने लगीं, देश में GDP से ज़्यादा GIF बनने लगे।

उधर मफलर धारी केजरीवाल की खांसी अब दिल्ली का बैकग्राउंड म्यूज़िक है। लोग कहते हैं: “सर, आपका खांसना भी जनता से कनेक्शन बढ़ाता है, WiFi से तेज़।”

यह है असली सर्जिकल नहीं सेटआयरिकल स्ट्राइक, गुस्से पर! हमारे कार्टूनिस्ट, मीम-मास्टर्स और स्टैंड-अप आर्टिस्ट असल में लोकतंत्र के ICU डॉक्टर हैं। गुस्सा बढ़े तो तुरंत पंचलाइन की IV drip लगा देते हैं। दिमाग गरम हो तो ठंडा कम्प्रेस मीम लगा देते हैं।

और अगर जनता उबल रही हो, तो एक तगड़ा व्यंग्य का इंजेक्शन सीधे नस में। UN के शांति सैनिकों को बुलाने की ज़रूरत नहीं, एक सही समय पर डाला गया वॉट्सऐप फॉरवर्ड दंगे रोक सकता है।

अगर देश का तापमान सच में कम करना है, तो AC से नही, ह्यूमर से होगा। स्कूलों में “Advanced Sarcasm 101”, कॉलेजों में “लोकतांत्रिक Mimicry Lab”, और सरकारी बजट में “National Meme Mission” जरूरी है।

सरकार को अपने सटायरिकल कलाकारों को रणनीतिक संपत्ति की तरह बचाना चाहिए, जैसे एटॉमिक वैज्ञानिक होते हैं, वैसे ही ये “बम के बिना बम” वाले कलाकार होते हैं।

और हाँ, “hurt sentiments” वाला कानून थोड़ा आराम दे, वरना देश का सबसे उपयोगी उद्योग: हँसी-व्यंग्य, बार-बार बंद हो जाएगा।
भारत का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक करिश्मा : हम दुनिया को ये साबित कर चुके हैं कि यहाँ आप एक नेता को दिन में सौ बार roast कर सकते हैं, और दूसरे दिन भी देश सलामत उठता है। क्योंकि हमारा नियम सरल है,

जोक मारो, रोस्ट करो, फ्राई मत करो।

मेम बनाओ, मोर्चा नहीं।

The Humour Times, व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट और मीम आर्टिस्ट, न सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं, वे लोकतंत्र का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखते हैं। टकराहट होने वाली हो, तो ये हंसी का हैंडब्रेक खींच देते हैं। और इसलिए लिख लो, छाप लो, फ्रेम कर लो, पंचलाइन तलवार से तेज़ होती है,व्यंग्य लाठी से भारी होता है,और ह्यूमर बम से ज्यादा धमाकेदार।

पवित्र ब्रजभूमि की मौन कशिश: पर्यावरण विनाश से मिटती ‘कृष्ण लीला’ की धरती

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बृज खंडेलवाल

मथुरा । ब्रजभूमि — श्रीकृष्ण की वह पावन धरती जो मथुरा के आस-पास लगभग 150 किलोमीटर तक फैली है — केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक गहरी रूहानी और पौराणिक विरासत है। यह वही इलाका है जहाँ वृंदावन, गोवर्धन और गोकुल की गलियाँ आज भी “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” की पुकार से गूंजती हैं। लेकिन अफसोस! आज यही धरती एक अस्तित्व संकट से जूझ रही है — बेहिसाब विकास परियोजनाओं, अवैध निर्माणों और पर्यावरणीय विनाश की वजह से। भीड़ तो हजार गुणा बढ़ी है पर भक्ति भावना की जगह व्यावसायिक लाभ के लिए टूरिज्म हावी हो रहा है।

धर्म और आस्था के नाम पर चल रही ये “तरक्की” दरअसल ब्रज की आत्मा को खोखला कर रही है — जहाँ कभी हरे-भरे वन थे, वहाँ अब कंक्रीट के जंगल खड़े हैं; जहाँ कभी पवित्र कुंड और नदियाँ बहती थीं, वहाँ अब गंदगी और प्लास्टिक का सैलाब है। श्रद्धालु जब इस पावन भूमि पर कूड़े और भीख माँगते बच्चों के बीच थकान से गुजरते हैं, तो सवाल उठता है — क्या ब्रजभूमि अब सिर्फ एक “पिकनिक स्पॉट” बनकर रह जाएगी?

ब्रज के पर्यावरण संकट की जड़ में उसकी प्राकृतिक पहचान का विनाश है। गोवर्धन पर्वत, जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से ग्वालों की रक्षा के लिए उठाया था, अब चारों ओर से कालोनियों और ऊँची इमारतों से घिर गया है। जहाँ कभी हरियाली और गायों के झुंड दिखते थे, वहाँ अब सीमेंट और धूल है। पवित्र कुंड, मेड़ और झाड़ियाँ मिट रही हैं, जिससे भूमि क्षरण, जैव विविधता का ह्रास और जलसंकट बढ़ रहा है।

यमुना, जिसमें कृष्ण ने कालिया नाग का विनाश किया था, अब जहरीले कचरे और नालों की गंदगी से बेहाल है। यह न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि इस पवित्र नदी की रूहानी पाकीज़गी को भी दागदार कर रहा है। मथुरा के पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं — “कृष्ण की लीला करुणा और समानता की प्रतीक थी, लेकिन आज का ब्रज लोभ और असंवेदनशीलता का शिकार है।”

तेज़ी से बढ़ते निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन ने हालात को और बदतर कर दिया है। ब्रज सर्किट — जो उत्तर प्रदेश की सबसे लोकप्रिय धार्मिक यात्रा मानी जाती है — असली विकास के बजाय अवैध कब्ज़ों और अंधाधुंध निर्माण का गढ़ बन गई है। वृंदावन और गोवर्धन में महंगे फ्लैट, आलीशान आश्रम, और फिल्मी हस्तियों के रिज़ॉर्ट बन रहे हैं। गोवर्धन की 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा मार्ग को सीमेंट से पाटा जा रहा है और जगह-जगह दुकानों से घेर दिया गया है। वृंदावन में तो अब मथुरा से ज़्यादा ऊँची इमारतें हैं, जहाँ हरियाली का नामोनिशान मिट रहा है।

स्थानीय ब्रजवासी कहते हैं, “अब यह भूमि हमारे हाथ से निकल रही है। परिक्रमा मार्गों को भी अब निजी होटलों और आलीशान भवनों में बदल दिया गया है।”

यह सब ब्रज की आत्मा के खिलाफ है — जो सादगी, भक्ति और प्रकृति की पवित्रता पर आधारित है। प्रस्तावित गगनचुंबी मंदिर को लेकर भी स्थानीय पर्यावरणविदों ने विरोध जताया है कि इससे जल और बिजली संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और ब्रज की ‘देहाती-रूहानी’ छवि नष्ट होगी। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) में न दृष्टि है, न योजना। आधुनिकता की अंधी दौड़ में पुरानी वास्तुकला और सांस्कृतिक माहौल सब गड्डमड्ड हो गया है। ब्रज संस्कृति की आत्मा लापता है।

ट्रैफिक जाम, गंदे नाले, अतिक्रमण, टूटी हवेलियाँ और उजड़े घाट — सब इस विनाश की गवाही दे रहे हैं। मनोरंजन पार्कों, लग्ज़री रिज़ॉर्ट्स और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स ने आध्यात्मिकता की जगह उथले मनोरंजन को दे दी है। यह पर्यटकनुमा विकास ब्रज की पवित्रता और पुरातात्विक धरोहर दोनों को मिटा देगा।
विदेशी अनुयायियों की बढ़ती भीड़ भी इस पवित्र भूमि पर उपभोक्तावाद का दबाव बढ़ा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य और धरोहर संरक्षणवादी डॉ. मुकुल पंड्या का कहना है कि अब वक़्त है कि “मुनाफे के लालच” के बजाय “संतुलित और सतत विकास” को अपनाया जाए। हेरिटेज ग्रुप के गोपाल सिंह कहते हैं, “ब्रज की पाकीज़गी को बचाना ही असली भक्ति है, न कि इसे मनोरंजन का बाज़ार बनाना।”

अब वक्त है एक समन्वित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का — जिसमें वृक्षारोपण, यमुना की सफाई, ठोस कचरा प्रबंधन, और स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो। शाश्वत पर्यटन, पर्यावरण शिक्षा, सांस्कृतिक जागरूकता और निगरानी के ठोस कदम उठाने होंगे।

अंततः, ब्रजभूमि का विनाश सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि उसकी आत्मा पर वार है। श्रीकृष्ण की वह भूमि जहाँ प्रकृति और प्रेम एक थे, अब लालच और लापरवाही की भेंट चढ़ रही है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह धरती ‘भक्ति की भूमि’ से ‘व्यापार की भूमि’ बन जाएगी।
ब्रज को बचाना केवल पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की अमर कथा की अस्मिता को बचाना है — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पवित्र भूमि की सच्ची खुशबू महसूस कर सकें

सच्चिदा बाबू नहीं रहे

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अवधेश कुमार

पटना। अभी-अभी श्री सच्चिदानंद सिन्हा या सच्चिदा बाबू के निधन की सूचना मिली। पटना से पत्रकार मुकेश बालयोगी जी ने बताया कि कुछ ही देर पहले सच्चिदा बाबू का निधन हो गया है। यद्यपि सच्चीदा बाबू ने लंबा जीवन जिया। बावजूद उनकी मृत्यु देश के लिए अपूरणीय क्षति है। संपूर्ण क्षमता और योग्यता होते हुए भी उन्होंने समाज के अंतिम पायदान के आदमी के रूप में अपनी जिंदगी को ढाला। पिछले लगभग साढ़े तीन दशक से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का मुसहरी गांव उनका ठिकाना था। गांव में रहते हुए बिना टेलीविजन के वे देश और दुनिया की घटनाओं को लेकर हमेशा अद्यतन रहते थे। कुछ वर्ष पहले तक समाचार पत्रों में उनके विचारोत्तेजक आलेख आते रहते थे। वे विचारधारा से समाजवादी थे और यही उनके जीवन में दिखता था। सच कहा जाए तो वह एक क्रांतिकारी थे। अपने जीवन को न्यूनतम खर्च तक सीमित करके जीना सक्रिय जीवन में किसी क्रांति से कम नहीं है।

उनकी पुस्तकें – पुस्तिकाएं आज भी बदलाव के लिए रचनात्मक एवं संघर्षात्मक अभियानों में लगे लोगों के लिए वैचारिकी ही नहीं व्यावहारिक प्रेरणा भी हैं। यह समय का दुर्भाग्य है कि आज राजनीति ही नहीं समाज और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय लोगों द्वारा जितना उनका उपयोग किया जा सकता था नहीं किया गया। यह हमारे समय में दृष्टि भ्रम का ही परिणाम है। मुझे अनेक बार उनसे मिलने ,बात करने, कार्यक्रमों में साथ रहने और साथ जाने- आने का भी अनुभव रहा। मुझे याद है एक समय देश के दूरस्थ या राजधानी दिल्ली द से जाने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों की चाहत सच्चिदा बाबू से मिलने की होती थी।‌ उनके कार्यक्रमों में मुसहरी जाना भी शामिल होता था। पहले मुसहरी गांव के लोगों को भी समझ में नहीं आया कि यह कौन आदमी है। धीरे-धीरे जब उनके पास लोग पहुंचने लगे, उन्हें कार्यक्रमों में ले जाया जाने लगा, नए पत्रकारों को भी उनके बारे में जानकारी हुई तथा समय-समय पर उनकी टिप्पणियां ली जाने लगीं तब मुसहरी और आसपास के गांव को उनके कद का आभास हुआ। हालांकि इससे उनके जीवन में कोई अंतर आया हो ऐसा नहीं है। जब तक उनका शरीर साथ देता रहा वह साइकिल की ही सवारी करते रहे।

कई बार किसी को कुछ टिप्पणी देनी होती तो वह साइकिल से ही पहुंच कर दे आते। मैंने उनसे एक बार पूछा था कि आपका भोजन कैसे होता है तो उन्होंने उत्तर दिया कि मैं चूड़ा दही रखता हूं। बिहार में चूड़ा दही सुबह का मुख्य जलपान होता था। कई लोग जो अकेले होते थे दिन में और रात में भी उसका उपयोग करते थे। दुर्भाग्य से इधर लंबे समय से उनसे मिलना नहीं हुआ। मिलना होता तो समझ पाता कि वर्तमान भारत , बिहार और दुनिया के बारे में उनकी सोच क्या है और वो कैसा भविष्य देखते हैं। आने वाली पीढ़ी को तो छोड़िए वर्तमान समय में भी ज्यादातर लोगों को यह कल्पना नहीं होगी कि संपूर्ण सुख के जीवन की क्षमता रखते हुए भी कोई ऐसा व्यक्ति हमारे आसपास था जिसने ऐच्छिक गरीबी को अपनाया और उसी में शत-प्रतिशत संतुष्ट रहते हुए अपनी अंतिम सांसें ली।

बिहार चुनाव परिणाम के अन्तर्निहित सन्देश

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मृत्युंजय दीक्षित

दिल्ली । राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा बिहार विधानसभा 2025 चुनाव में यद्यपि राजग की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी तथापि महागठबंधन की इतनी शर्मनाक हार की आशंका किसी को नहीं थी, संभवतः राजग और महागठबंधन के नेताओं को भी नहीं। इन परिणामों ने सभी को चौंकाया है। राजग की अप्रत्याशित जीत, भाजपा नीत मोदी सरकार तथा बिहार में नीतीश सरकार पर जनता के भरोसे की जीत है। बीस वर्ष बाद भी लालू के शासनकाल का जंगलराज जनता भूल नहीं पाई है । बिहार की जनता ने जातिवाद, परिवारवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। गरीब, महिला, किसान और युवा मतदाता का नया समीकरण स्पष्ट दिखाई दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार लाल किले की प्राचीर से परिवारवाद और जातिवाद की राजनीति को समाप्त करने का आह्वान किया था, बिहार की धरती उस राह पर चल पड़ी है।

बिहार विधानसभा चुनावों में महागठबंधन के झूठ पर आधारित नैरेटिव पूरी तरह से ध्वस्त हुए हैं; फिर वह वोट चोरी का मुद्दा हो या तेजस्वी यादव द्वारा हर परिवार को सरकारी नौकरी देने का वादा। बिहार की धरती में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने गर्दा उड़ा दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार की चुनाव रैली में गमछा लहरा कर बिहारी सम्मान की भावना का उद्घोष किया था जिसके बदले बिहारियों ने गर्दा उड़ा दिया। बिहार की जनता ने जो ऐतिहासिक जनादेश दिया है वह डबल इंजन की ओर से किए विकास के लिए समर्थन तो दिखा ही रहा है साथ ही यह भी बता रहा है कि अब बिहार में जंगलराज की वापसी कभी नहीं होगी।

बिहार में राजग गठबंधन की सत्ता में वापसी का सबसे प्रमुख कारण नए “एमवाई“ जिसे महिला और युवा कहा गया का पूरी तरह से मोदी जी और नीतीश का साथ देना है। बिहार के चुनावो में महिलाओं ने राजनीति की नई पटकथा लिखी है। उन्होंने जातीयता से ऊपर उठकर, अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए मतदान किया। बिहार की कुछ लड़कियों ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा भी था कि अब हम लोग देर रात तक अपने कार्यालय आदि से बिना किसी भय या चिंता के वापस आ जाते हैं। जिन महिलाओं ने जंगलराज देखा है उन्हें उस लालटेन युग की याद ही कंपा देती है। बिहार की लड़कियों को पता है कि राजद की सरकार आ जाती तो उनके साथ छेड़छाड़ तथा अभद्रता की घटनाएं बढ़ जातीं। नीतीश जी के कारण ही आज बिहार की बेटियां अपने आपको सुरक्षित मान रही हैं। बिहार की महिलाओं के सशक्तीकरण व उन्हें आत्मनिर्भर तथा शिक्षित बनाने के लिए नीतीश राज में अनेकानेक योजनाएं धरातल पर उतरीं, महिलाओं को उनका सीधा लाभ मिला।

जब महिला मतदाताओं को लगा कि नीतीश सरकार संकट में है तब वह उनके लिए चट्टान की तरह खड़ी हो गई। इसका सबसे बड़ा करण यह भी था कि महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव अपनी जनसभाओं में बार बार बिहार में शराबबंदी को खोलने और ताड़ी की खेती फिर से प्रारंभ करवाने की बात कह रहे थे। बिहार महिलाओं ने नीतीश जी को रिटर्न गिफ्ट ही दिया क्योंकि विधानसभा चुनावों से पूर्व ही मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के अंतर्गत 1.20 करोड़ महिलाओं को मिली 10 हजार रुपए की सहायता और जीविका दीदी व सहायिकाओ के मानदेय में वृद्धि के बाद पुरुषों कि तुलना में नौ प्रतिशत अधिक मतदान कर सत्तारूढ़ एनडीए के खिलाफ चल ही कुछ हल्की लहर को पूरी तरह से समाप्त कर दिया। इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिव्यांगजनों, वृद्वावस्था पेंशन आदि में भी पर्याप्त वृद्धि कर एक बहुत बड़े वोटबैंक को साधने का काम किया। नीतीश कुमार ने अपने विगत 15 वर्ष के कार्यकाल में महिलाओं के हित में बहुत काम किया है जिसकी स्मृति भी महिला मानस में बनी रही।

एनडीए गठबंधन की जीत का एक अन्य कारण यह भी रहा कि उसने अतिपिछडा वर्ग (ईबीसी) और महादलित समुदाय को साधा। भाजपा ने सवर्ण जातियों तथा अपने परंपरागत वोटबैंक को एकजुट रखा, लोक जनशक्ति पार्टी (रामबिलास,) राष्ट्रीय लोक मोर्चा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा ने एनडीए की दलित और पिछड़ी जातियों के बीच पहुंच बढ़ाई। व्यापक गठबंधन बना तथा सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में सीटों का बंटवारा किया गया, बागियों तथा नाराज लोगो को साधा गया । छठपूजा के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, चिराग पासवान के घर गए । चिराग ने मुख्यमंत्री का सम्मान करते हुए उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया। इससे जनता ने गठबंधन की मजबूती देखी जिसका प्रतिफल सामने है।

तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन प्रचार के दौरान भी अपनी जंगलाज वाली छवि पर मोहर लगाता रहा। तेजस्वी यादव स्वयं अपनी हर रैली और पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बीमार और बंधक बताकर उनका अपमान करते रहे। कांग्रेस की रैली में मंच से ही एक मुस्लिम नेता ने प्रधानमंत्री मोदी की मां को गाली देकर उनका अपमान किया और इसके बाद से बिहार के चुनावी परिदृश्य मे तैर रहे महागठबंधन के सभी नैरेटिव एक के बाद एक ध्वस्त होते चले गए। कांग्रेस ने रही सही कसर उस कांग्रेसी नेता को टिकट देकर पूरी कर ली जो गाली कांड का अपराधी था। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा का नकारात्मक प्रभाव छोड़ना स्वाभाविक था।जनता ने एसआईआर के मुद्दे का सिरे से खारिज कर दिया और मतदान मे बढ़ चढकर भाग लिया। राहुल गांधी ने दूसरे चरण में छठ मैया का भी अपमान कर दिया जिसे एनडीए ने लपक लिया।

राजग गठबंधन की ऐतिहासिक विजय में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में स्टार प्रचारकों का कठिन परिश्रम भी रहा। जनसभाओं और रोड शो में भारी भीड़ उमड़ी तो प्रचारकों ने भी अपने सटीक बयानों से उसे अपने पक्ष में मतदान करने को बाध्य कर दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों से तो तूफान ही आ गया। योगी ने बिहार की जनसभाओे में राम मदिर का मुद्दा उठाते हुए कहा कि, “यह वही लोग हैं जिन्होंने कभी राम मंदिर का रास्ता रोका था किंतु अब अयोध्या में राम मंदिर बनकर तैयार हो गया है और बिहार की धरती पर मां जानकी का भव्य मंदिर भी बनने जा रहा है। योगी जी वहां बाबा बुलडोजर के नाम से प्रसिद्ध हैं और जगह- जगह उनका स्वागत भी बुलडोजर के प्रतीकों से हुआ। उन्होंने कई जनसभाओं में बटेंगे तो कटेंगे का नारा भी एक बार लगाया और हिंदू मतदाता में एकता की अलख जगाई। उनके तीन नए बंदरों अप्पू, पप्पू और टप्पू की परिभाषा वाले भाषण ने चुनावी परिदृश्य को एक नया मनोरंजक पुट दे दिया। बिहार विधानसभा चुनावो में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व उसके सहयोगी संगठनों की महती भूमिका रही।

कुल मिलाकर बिहार की जनता ने जो भारी मतदान किया वह जंगलराज, परिवारवाद तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ है। सुशासन, स्त्री सुरक्षा और पलायन रोकने के पक्ष में है। मुस्लिम तुष्टिकरण, जातिवाद तथा परिवारवाद के विरोध में है । विपक्ष ने बिहार के जेन- जी को भड़काने का प्रयास किया लेकिन उसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया। बिहार के चुनाव परिणाम साधारण परिणाम नहीं है इनका परिणाम भारत के भविष्य के निर्माण की दिशा तय करने वाला है।

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