बिहार का ऐतिहासिक मोड़: जंगलराज से सुशासन तक, क्या टूट रही हैं जाति-धर्म की दीवारें?

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पटना । बिहार ने एक बार फिर अपने राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है। 14 नवंबर, 2025 को घोषित विधानसभा चुनाव के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि राज्य की जनता अब विकास, सुरक्षा और स्थिरता के मुद्दों को सबसे ऊपर रखती है। 243 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए की प्रभावशाली जीत ने न सिर्फ नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचाया, बल्कि पूरे देश के सामने ‘सुशासन के बिहार मॉडल’ को फिर से रेखांकित किया है।

इस जीत की असली कहानी महिलाओं और युवाओं के बदले हुए मतदान व्यवहार में छिपी है। इस बार महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया, और उनका यह शांत पर दृढ़ हस्तक्षेप चुनाव का सबसे बड़ा ‘टर्निंग प्वाइंट’ साबित हुआ।

दरभंगा की सामाजिक कार्यकर्ता विद्या चौधरी इस बदलाव की पुष्टि करती हैं, “2020 की तुलना में महिला मतदान में जबरदस्त उछाल देखने को मिला। गाँव से लेकर कस्बे तक, महिलाओं ने सुरक्षा, शांति और घरेलू स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एनडीए को भारी समर्थन दिया। शराबबंदी की नीति, जिस पर अक्सर सवाल उठते रहे, महिलाओं के बीच अभूतपूर्व लोकप्रिय हुई। परिवारों में हिंसा में कमी, आर्थिक बचत और सामाजिक सुरक्षा की भावना ने उन्हें एक संगठित राजनीतिक ताकत में बदल दिया।”

वहीं, युवा मतदाताओं ने भी इस चुनाव में जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर फैसला किया। पहली और दूसरी बार वोट डालने वाले युवाओं ने बेहतर शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के अवसरों को प्राथमिकता दी। नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय छवि, डिजिटल अभियानों की व्यापक पहुँच और रोजगारोन्मुखी वादों ने इस वर्ग को विशेष रूप से आकर्षित किया। इस बारे में राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “यह बदलाव साफ संकेत देता है कि बिहार का युवा अब जाति नहीं, बल्कि अवसर को तरजीह दे रहा है। बिहार में यह परिवर्तन रातों-रात नहीं आया। 2005 से पहले का बिहार ‘जंगलराज’ और पिछड़ेपन की छवि से जूझ रहा था, जहाँ अपहरण, भ्रष्टाचार और अपराध आम बात थे। उस समय राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) महज ₹75,608 करोड़ था और आधी से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही थी। महिला साक्षरता दर निराशाजनक थी।”
लेकिन पिछले दो दशकों में बिहार ने जिस गति से खुद को बदला है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। आज राज्य का जीएसडीपी ₹11 लाख करोड़ के करीब पहुँच चुका है, गरीबी दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, महिला साक्षरता दोगुनी हो चुकी है और ग्रामीण इलाकों में बिजली व सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं ने जीवन-स्तर को नया आयाम दिया है। यह सब कानून-व्यवस्था में सुधार, शिक्षा व स्वास्थ्य पर केंद्रित नीतियों और केंद्र-राज्य की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का नतीजा है।

बिहार के शिक्षाविद टी.पी. श्रीवास्तब इस जीत के पीछे एक और कारक बताते हैं, “लालू-राबड़ी के दौर की स्मृतियाँ आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। ग्रामीण इलाकों के लोग, खासकर महिलाएँ और युवा, उस समय की असुरक्षा और अराजकता को भूला नहीं हैं। इस बार उन्होंने एक ऐसी सरकार को चुना, जो स्थिरता और सुरक्षा की गारंटी देती है। इसी वजह से तेजस्वी यादव के रोजगार संबंधी वादे और जाति आधारित राजनीति युवाओं को उतना प्रभावित नहीं कर पाई। प्रशांत किशोर के राजनीतिक प्रयोगों ने कुछ क्षेत्रों में सराहना तो पाई, लेकिन पूरे राज्य पर असर नहीं दिखा।”

2025 का बिहार चुनाव इस बात का प्रमाण है कि जाति-धर्म आधारित राजनीति का प्रभाव घट रहा है। महिलाओं का स्वतंत्र मतदान, युवाओं की विकास-केंद्रित आकांक्षाएँ और शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बदलती प्राथमिकताएँ दर्शाती हैं कि राज्य की राजनीति एक नई दिशा में आगे बढ़ रही है। मुस्लिम मतदाताओं का एक वर्ग भी इस बार ध्रुवीकरण से हटकर कल्याणकारी योजनाओं और रोजगार के मुद्दों से प्रभावित हुआ।

अब सबसे बड़ी चुनौती एनडीए सरकार के सामने है कि वह मतदाताओ के इस भरोसे को ठोस परिणामों में बदल सके। रोजगार सृजन, औद्योगिकीकरण, कृषि आधारित उद्योगों का विस्तार और शिक्षा-स्वास्थ्य का आधुनिकीकरण—ये वे क्षेत्र हैं जहाँ अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यदि राज्य इस दिशा में निरंतर प्रगति करता है, तो निस्संदेह यह देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो सकता है।

इस चुनाव ने एक बात स्पष्ट कर दी है—बिहार का मतदाता बदल चुका है। नारी शक्ति और युवा ऊर्जा ने यह संदेश दे दिया है कि विकास, सुरक्षा और सम्मान अब किसी भी पारंपरिक समीकरण से बड़े हैं। जाति-धर्म की दीवारें भले ही पूरी तरह न ढही हों, लेकिन उनमें गहरी दरारें जरूर पड़ गई हैं। 2025 का यह जनादेश घोषित करता है कि बिहार अपना भविष्य बदलने को तैयार है—और यह भविष्य विकास की राह से ही गुजरेगा।

बिहार: प्रशांत किशोर की त्रासदी और पुराने अखाड़ेबाजों की फ़तह

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बृज खंडेलवाल

पटना । अगर शेक्सपियर आज ज़िंदा होते, तो अपना अगला ‘ट्रैजिक हीरो’ किसी शाही दरबार में नहीं, बल्कि नंगे पैर बिहार की धूल उड़ाता हुआ मिलता। प्रशांत किशोर—वही शख़्स जिसे कभी मोदी की 2014 की सुनामी और नीतीश कुमार के सियासी पुनर्जागरण का mastermind कहा गया—2025 के चुनाव मैदान में ऐसे उतरे, मानो तक़दीर ने उनके लिए कोई तख़्त पहले से रिज़र्व कर रखा हो।

तीन बरस तक वे पूरे बिहार में एक फ़कीर-से खाक छानते रहे—5,000 किलोमीटर की पदयात्राएँ, आधी रात को ‘सुशासन’ पर बयानबाज़ी, “बिहार की बदहाली ख़त्म करने” के मसीहाई दावे, और हर कदम पर ऐसा आभास कि वे अपने ही क़िस्मतनामे का महानायक बनने निकले हों।

लेकिन जैसे ही वोटों की गिनती पूरी हुई, कहानी कॉमेडी सर्कस में बदल गई। जिसने सोचा था कि वह बिहार की सियासत के देवताओं को मात दे देगा, उसे पता चला कि देवताओं को भी ज़बरदस्त ह्यूमर (हास्य रस) पसंद होता है। जन सुराज सिर्फ़ हारा नहीं—वह तो धूल चाट गया। शून्य सीटें। ज़मानत जब्त। कार्यकर्ता मायूस। और PK—जिसे कभी oracle समझा जाता था—अब चाय की दुकानों में हंसी का पात्र और सोशल मीडिया पर मीम-मटेरियल।
यह बिल्कुल ग्रीक त्रासदी वाली ‘ह्यूब्रिस’ थी—एक सलाहकार जिसने तालियों को मोहब्बत, और analytics को emotions समझ लिया। जिसने दूसरों के लिए फ़तह लिखी, वह अपने ही अरमानों के मलबे में लड़खड़ा गया—और बिहार ने उसके लिखे हुए नाटक की अंतिम पंक्ति उसी के ख़िलाफ़ लिख दी।
इस बीच असली सियासी मुकाबले में कोई ड्रामा नहीं था।

NDA—BJP और नीतीश कुमार की JDU—ने शानदार फ़तह दर्ज की।

14 नवंबर को काउंटिंग के बाद BJP 89 सीटों पर और JDU 85 सीटों पर क़ाबिज़ रही—आवश्यक 122 से कहीं ऊपर, एक मज़बूत सुपरमेज़ॉरिटी।
तेजस्वी यादव की महागठबंधन की नैया मुश्किल से ही तैर पाई। RJD को 25, कांग्रेस को सिर्फ़ 6 सीटें मिलीं। लेफ्ट लगभग ग़ायब रहा।

करीब 62% मतदान में महिलाएँ और सवर्ण मतदाता साफ़ तौर पर NDA की ओर झुके। उनके लिए नीतीश की स्थिरता और मोदी की राष्ट्रीय अपील, विपक्ष की जातीय राजनीति की यादों से कहीं ज़्यादा भरोसेमंद साबित हुई।

यह महज़ चुनावी जीत नहीं थी—यह बिहार का संदेश था: उथल-पुथल के दौर में निरंतरता ही अमन है।
लेकिन इस चुनाव का सबसे बड़ा खौफनाक अध्याय था जन सुराज का ज़बरदस्त पतन। PK ने खुद को बिहार का ‘disruptor’ समझ लिया था—एक टेक्नोक्रैट-से-मसीहा जो साफ़ राजनीति, सार्वभौमिक रोज़गार कोटा, मुफ़्त बिजली और भ्रष्टाचार-मुक्त ब्यूरोक्रेसी का वादा कर रहा था।
उनकी पदयात्राओं में विद्यार्थी, NRI और शहरी आदर्शवादी शामिल हुए।

उनके भाषण ऑनलाइन छा गए।
उनकी ‘सच्चाई बोलने वाले सुधारक’ की इमेज़ ने थके हुए युवाओं को आकर्षित किया।
पर चुनाव वेबिनार नहीं होते।

बिहार की सियासत केस स्टडी नहीं—जंग का मैदान है।

जब बैलट खुले, जन सुराज को मुश्किल से 3% वोट मिले।

98% उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त।

जहाँ PK ने हफ़्तों कैंप किया, वे क्षेत्र उंगलियों से रेत की तरह फिसल गए।
समर्थकों को एहसास हुआ कि उन्होंने एक लौ-सा जुनून बनाया था, मतदाता मशीन नहीं।

एक मायूस स्वयंसेवक बोला:

“हम तीन साल चले, पर भूल गए कि चुनाव एक्सेल शीट से नहीं, जज़्बात से जीतते हैं।”
PK का पतन उन सब टेक्नोक्रैट विद्रोहों जैसा था जो धरातल की हक़ीक़त से टकराकर चकनाचूर हुए—जैसे 2014 में योगेंद्र यादव का हरियाणा प्रयोग। जन सुराज विचारकों की पार्टी बन गया, वोट जुटाने वालों की नहीं।

बिहार के देहात में PK की ईमानदार लगने वाली ‘साफ़-सुथरी राजनीति’ की तक़रीरें उस नेटवर्क से नहीं टकरा सकीं जिसे दशकों की जाति-आधारित निष्ठा, लाभ योजनाएँ और गहरे राजनीतिक रिश्ते सँभालते हैं।

उन्होंने चुनावी राजनीति का सबसे बुनियादी उसूल भूल गए:
मोहब्बत बहुत है, मगर भरोसा नहीं।

PK का नरेटिव भी उनके काम नहीं आया—50 सीटों का ताबड़तोड़ दावा, माहिर नेताओं की खिल्ली उड़ाना, हर दल पर एक-सा हमला—वे कहीं visionary लगे, कहीं झिड़कने वाले मौलवी जैसे।

मतदाता उन्हें दिलचस्प तो मानते रहे, पर अपना नहीं समझ पाए।
महत्त्वाकांक्षा दिखी, जमीनी सच्चाई नहीं।

आख़िर में जनता ने वही चुना—
“जो जाना-पहचाना है, उससे बेहतर वह फ़रिश्ता नहीं जो हमें हर वक़्त समझाता रहे।”
अब 48 की उम्र में PK दोराहे पर खड़े हैं। शायद वे वापस उसी दुनिया में लौट जाएँ जिसे वे सबसे अच्छी तरह समझते हैं—ग्लोबल पॉलिटिकल कंसल्टेंसी। यूरोप से लेकर जेरूसलम तक उनका फ़ोनबुक ऐसे क्लाइंटों से भरा है जो आज भी उन्हें strategist मानते हैं, न कि नाक़ाम उम्मीदवार। घर में, जन सुराज शायद think-tank बनकर रह जाए। योगेंद्र यादव के एक्सपीरियंस से कुछ सीखा होता तो ये हस्र न होता।

बिहार ने उनके नेतृत्व के दावे को साफ़ ठुकरा दिया है, और अब क्षेत्रीय पार्टियाँ भी उनसे दूरी ही रखेंगी—उनके ‘ज़हरीले टच’ के डर से।
UP या महाराष्ट्र में नई शुरुआत की उम्मीद भी कम है—वहाँ की ज़मीन बाहरी दावेदारों के लिए और भी सख़्त है। PK की पदयात्राओं का जज़्बा उस सख़्त हक़ीक़त को नहीं बदल सकता जो बिहार ने बयान कर दी: असलीयत, algorithm पर भारी पड़ती है।
PK अब एक पहेली हैं—

न राजा बनाने वाले,
न वो सुधारक जिसकी उन्होंने झलक दिखाई थी।
बल्कि एक सबक—कि राजनीति उन लोगों को माफ़ नहीं करती जो ‘दिमाग़’ को ‘दिल’ से ऊपर रख बैठते हैं।
तो यूँ गिरता है पर्दा प्रशांत किशोर के इस बड़े सियासी तजुर्बे पर।
न किसी तूफ़ान के साथ,
न किसी ताजपोशी के साथ—
बस ख़ामोशी के साथ।
एक चेतावनी की तरह।
धुआँ-धार कमरों में चुनावी रणनीतियाँ गढ़ने वाला शख़्स खुले मंच पर तन्हा रह गया।
हीरो की चादर उतरी,
रोशनी बुझी,
और दर्शक आगे बढ़ गए।

मनरेगा: मिट्टी से उगती नई उम्मीद

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बेतिया । जब बिहार जैसे राज्यों में हाल के 2025 विधानसभा चुनावों में रोज़गार, पलायन और गांवों की जिंदगी बड़े मुद्दे बनकर उभरे, तो यह साफ़ दिखा कि मनरेगा जैसी योजनाएँ सिर्फ विकास-रिपोर्ट का हिस्सा नहीं रहीं, बल्कि राजनीतिक बहस की धुरी भी बन गई हैं। राज्य की दो-तिहाई से अधिक घरों पर बाहरी मज़दूरी का निर्भरता होने के बावजूद, पलायन को रोकने वाली नीतियाँ वोटरों की प्राथमिकता बनीं। जो दल गाँव की ज़मीन से कटे दिखते हैं, उन्हें नतीजों में उसकी कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की ठोस बात करने वाली राजनीति को नया सहारा मिलता है।
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सवेरे का वक्त है। हल्की धूप धान के पत्तों पर जमी ओस को चमका रही है। कुछ टूटी- कुछ पक्की सड़क के किनारे लाल मिट्टी की परत उड़ती हुई हर चीज़ पर बैठती जा रही है। पोखर के पास गाँव की औरतों का झुंड जमा है—हाथों में कुदाल, माथे पर पसीना, मगर आँखों में उम्मीद की चमक। यह महाराष्ट्र का सुदूर इलाका है, जहाँ चलती ठंडी हवा के साथ बीते सालों की थकान और संघर्ष भी जैसे उड़ते महसूस होते हैं।

सरस्वती, जो टोली की सबसे उम्रदराज़ औरत है, मुस्कुराकर कहती है, “पहले तो बरसात ही पेट पालती थी, अब अगर मनरेगा का काम न मिले तो भूख लौट आती है।”

उसकी बात सिर्फ इस गाँव की नहीं, उस पूरे ग्रामीण भारत की कहानी है जहाँ पिछले दो दशकों से मनरेगा भूख और बेरोज़गारी के खिलाफ़ सबसे बड़ा सहारा बना हुआ है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना—मनरेगा—ने लाखों घरों की रसोई जलाए रखी है और मज़दूरों को शहर पलायन से बचाया है। कोविड के ठहराव के दिनों में तो यह सचमुच जीवन-रेखा बन गई। पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज इसकी सबसे बड़ी ताक़त गाँव की औरतें हैं—कुल कामगारों में 58.15% से ज़्यादा वही हैं; पहले जो घर की देहरी तक सीमित थीं, अब खेत, तालाब और सड़कों पर अपने हाथों से गाँव की तस्वीर बदल रही हैं। उनकी आवाज़ अब चौपाल तक पहुँचने लगी है।”

फ़रवरी 2006 में 200 जिलों में शुरू हुई मनरेगा योजना उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तुरंत प्रभावी हुई और कुछ ही सालों में पूरे देश में फैल गई। हाल के वर्षों में जल संरक्षण और जलवायु-संवेदी कामों पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिससे सूबे ने 2024–25 में 33.65 करोड़ से ज़्यादा मानव-दिवस का काम पैदा कर देश में पहला स्थान हासिल किया। लाखों परिवारों को रोज़गार मिला, और कई ने 100 दिन का लक्ष्य पूरा किया। महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, वर्कसाइट सुपरवाइज़र के रूप में भी, भले ही जाति-आधारित असमानताएँ अभी पूरी तरह धुंधली नहीं हुईं। योजना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करते हुए कुल 3,029 करोड़ मानव-दिवस उत्पन्न किए हैं, जो 2014-15 से 82% की वृद्धि दर्शाता है।

आगरा ज़िले में, जहाँ ताजमहल की चमक के पीछे एक बड़ा देहाती इलाका छिपा है, मनरेगा ने पानी और बुनियादी ढाँचे के कामों के ज़रिए रोज़गार और संसाधन दोनों बढ़ाए हैं। उत्तर प्रदेश के समग्र आँकड़ों के अनुरूप, आगरा में भी करोड़ों मानव-दिवस उत्पन्न हुए, हज़ारों काम पूरे हुए—खेत-तालाब, चेक-डैम, कच्ची-पक्की सड़कें—जिन्होंने मिट्टी कटान घटाया और सिंचाई की नई संभावनाएँ खोलीं। यहाँ भी औरतों की हिस्सेदारी 58% से ऊपर पहुँच चुकी है, जो गाँव के सामाजिक संतुलन में एक साइलेंट मगर गहरा बदलाव है।

फिर भी तस्वीर पूरी तरह चमकदार नहीं है। कागज़ पर हर परिवार को 100 दिन की गारंटी है, ज़मीन पर औसतन 44-45 दिन का काम ही मिल पाता है। कई जगह मज़दूरी में देरी, निरीक्षण की खामियाँ और सोशल ऑडिट की सीमाएँ हैं; देशभर में सिर्फ छह राज्यों में ही 50% से अधिक ग्राम पंचायतों तक ऑडिट पहुँच पाया है। नतीजा यह कि कुछ गाँवों में काम की माँग अधूरी रह जाती है, और नई परियोजनाएँ काग़ज़ी फाइलों में अटक जाती हैं।
फिर भी, इन सबके बीच जो ठोस फायदे हुए हैं, वे किसी खजाने से कम नहीं। देशभर में लाखों काम पूरे हुए हैं—जिनमें बड़ी हिस्सेदारी जल संरक्षण, सिंचाई और भूमि सुधार की है। इससे फसल उत्पादन बढ़ा, ज़मीन की नमी टिकी और कई इलाकों में भूजल ऊपर आया। योजना ने राष्ट्रीय स्तर पर ग्रामीण-शहरी पलायन में 28% तक की कमी लाई है; कई राज्यों में मौसमी पलायन में तेज़ गिरावट दर्ज हुई—कहीं एक-तिहाई तक, तो कहीं आधे से भी ज़्यादा। राजस्थान जैसे राज्यों में गर्मियों में मज़दूरों को 8 अतिरिक्त दिन का काम मिलने से पलायन पर सीधा अंकुश लगा।

मध्य प्रदेश के जग्गू कहते हैं, “मनरेगा न होता तो हम सब शहर चले जाते। अब साल के कुछ महीने यहीं काम मिल जाता है, बच्चों की पढ़ाई भी चलती रहती है।” ऐसी आवाज़ें आंध्र प्रदेश से लेकर मेघालय, राजस्थान से हरियाणा तक सुनाई देती हैं। फिर भी पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में मनरेगा का असर सीमित है, और बेहतर मज़दूरी की तलाश में मज़दूरों का एक हिस्सा अब भी शहरों का रुख करता है।

कभी इस योजना पर फर्जी मस्टर रोल और बड़े घोटालों की छाया थी। झारखंड जैसे राज्यों में सैकड़ों करोड़ के गबन के मामले सामने आए, जिनमें हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने 22 लाख रुपये की संपत्तियाँ जब्त कीं। अब मजदूरी सीधे बैंक खातों में जाने लगी है, काम की तस्वीरें जियो-टैग होकर ऑनलाइन दर्ज होती हैं और सोशल ऑडिट ने गड़बड़ियों को काफ़ी हद तक रोका है। फिर भी दूरदराज़ इलाकों में ठेकेदारों और मशीनों का दबदबा, और स्थानीय राजनीति का हस्तक्षेप आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। कई जोहड़ और तालाब अब भी सिर्फ काग़ज़ों पर बने दिखते हैं।

मनरेगा ने आर्थिक झटकों से जूझते परिवारों के लिए बफर की तरह काम किया है। यह सिर्फ रोज़गार नहीं देता, बल्कि हर फावड़े के साथ आत्म-सम्मान भी लौटाता है। औरतों के हाथ में आई मज़दूरी ने घरों के भीतर फ़ैसलों की दिशा बदलनी शुरू कर दी है—बच्चों की पढ़ाई, दवाओं का खर्च, छोटे-मोटे त्योहार—अब सबमें उनकी हिस्सेदारी साफ़ दिखती है।

अब शाम को जब सरस्वती घर लौटती है, उसकी हथेलियों पर जमी मिट्टी सिर्फ दिनभर की मेहनत का निशान नहीं, बल्कि इस भरोसे की मुहर है कि उसके बच्चों का कल थोड़ा बेहतर होगा। मनरेगा ने गाँवों में जो बीज बोया है, वह अब पत्तियों और पौधों से आगे बढ़कर एक सोच बन चुका है—यह सोच कि मेहनत की अपनी इज़्ज़त होती है, और उस इज़्ज़त की हिफ़ाज़त सरकार से लेकर समाज तक, सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।

वंशवाद की ढलती शाम: बिहार की शिकस्त के बाद कांग्रेस का धुंधला होता भविष्य

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दिल्ली । गांधी परिवार की रणनीति हमेशा यह रही है कि पार्टी का मुखिया कोई ऐसा व्यक्ति हो जो “काबू में” रहे। वर्तमान अध्यक्ष खड़गे इस सोच के लिए बिल्कुल मुफ़ीद साबित हुए। पार्टी के हर स्वतंत्र या प्रभावशाली नेता को धीरे-धीरे किनारे लगाया गया। ममता बनर्जी बाहर हो गईं, शरद पवार को ठंडे बस्ते में भेज दिया गया, जगन रेड्डी दूर चले गए, हेमंत विश्व शर्मा जैसे नेता अपमानित महसूस कर निकल गए। सिंधिया, देवरा, थरूर, पायलट एक लंबी फेहरिस्त है उन लोगों की जिन्होंने या तो हार मान ली या दरकिनार कर दिए गए। सवाल यह नहीं कि गाड़ी का पहिया पंचर है, बल्कि यह है कि गाड़ीवान को मंज़िल का पता ही नहीं। राहुल गांधी आज पीटर पैन की तरह दिखते हैं, जिन्हें बड़ा होना ही मंज़ूर नहीं।
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2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का धुआँ अभी छँटा भी नहीं कि तस्वीर एकदम साफ़ झलकने लगी।कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन का पतन ऐतिहासिक रहा। 243 सीटों में से कांग्रेस केवल एक पर सिमट गई। यह हार सिर्फ़ एक चुनावी नतीजा नहीं, राहुल गांधी के नेतृत्व पर गहरा अविश्वास भी है। ठीक वैसे ही जैसे इस साल हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में देखा गया।
आज कांग्रेस घटकर केवल तीन राज्यों में रह गई है, और इंडिया गठबंधन में भी साथी दल उससे दूरी बना रहे हैं। बिहार का नतीजा अब एक आईना है जिसमें कांग्रेस न दिशा लिए दिखाई देती है, न उद्देश्य।

नेतृत्व द्वारा एस्केपिज्म का खेल
इस राजनीतिक मलबे के बीच होंठों पर वही पुराने बहाने हैं। राहुल गांधी ने नतीजों को “चौंकाने वाला” और “अनफेयर” करार देकर ज़मीनी हक़ीक़त से अपने फासले को ही उजागर किया। मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ मीटिंग में फिर “वोट चोरी” का रोना। वही पुरानी स्क्रिप्ट जो अब असरहीन हो चुकी है।
यह नेतृत्व नहीं, बचने की कोशिश है। राहुल का दृष्टिकोण अब भी वहीं अटका है कि विपक्ष का मतलब हर सरकारी निर्णय का विरोध करना है, चाहे अर्थव्यवस्था का मामला हो, विदेश नीति हो या सुधारों का। जबकि असली विपक्ष वह होता है जो वैकल्पिक दृष्टि दे, तर्कपूर्ण आलोचना करे और अपनी नीति गढ़े।
एक रिएक्शन मशीन बन चुकी पार्टी
राहुल के युग में कांग्रेस एक “रिएक्शन पार्टी” बन गई। न विज़न, न दिशा। हर बयान में ग़ुस्सा है, हर बयान में असुरक्षा। चुनाव आयोग को “क़ैदी”, लोकतंत्र को “घेराबंदी में” बताने वाली भाषा जनता के भरोसे को ही कमजोर करती है। यह वक्त है कि पार्टी अपनी राजनीति में गरिमा लाए। टकराव नहीं, संवाद तलाशे; दीवारें नहीं, पुल बनाए।

नई राजनीति की ज़रूरत
बिहार की शिकस्त एक संकेत है। कांग्रेस को बुनियादी पुनर्गठन की जरूरत है। नेतृत्व, विचार और चेहरों, तीनों में नवाचार जरूरी है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पुरानी सियासत अब असरदार नहीं रही, विशेषकर बिहार जैसे सूबे में जहाँ जातीय समीकरण ही राजनीति की रीढ़ हैं।
आरजेडी पर निर्भरता और यादव, मुस्लिम वोट बैंक की उम्मीद कांग्रेस को बार-बार कमजोर साबित करती रही है। जबकि एनडीए ने हिंदू वोटों के एकत्रीकरण, (कंसोलिडेशन) से अपनी स्थिति मज़बूत की है। कांग्रेस को अब धर्मनिरपेक्षता के अपने पुराने ढाँचे से बाहर निकलकर, एक समावेशी सांस्कृतिक बहुलता का नया नैरेटिव पेश करना होगा ।

कांग्रेस के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा, न प्रतिष्ठा, न जनविश्वास। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी उसकी हिंदी पट्टी की कमज़ोरी से बेचैन हैं। वक्त आ गया है पार्टी नई पीढ़ी को निर्णायक जिम्मेदारी दे, बूढ़ी हो चुकी दरबारी राजनीति को किनारे रखे, और युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा सुधार, डिजिटल समानता, पर केंद्रित नई राजनीति शुरू करे।
राहुल गांधी को अब यह स्वीकार करना होगा कि नेतृत्व सिर्फ उपस्थिति का नाम नहीं होता। 2009 की बुलंदी से अब तक के सफर में कांग्रेस का वोट शेयर बीस प्रतिशत से नीचे गिर चुका है, यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, एक संकेत है कि जनता अब बदलाव चाहती है।
अगर राहुल पीछे हटते हैं, तो पार्टी के पास रीसेट का मौका है, ठीक वैसे जैसे भाजपा ने आडवाणी युग के बाद अपने को नया रूप दिया था। लेकिन अगर नहीं हटते, तो यह डूबती नाव और नीचे जाएगी। यूपी में समाजवादी पार्टी पहले ही गठबंधन पर पुनर्विचार कर रही है, और बिहार की लहर का असर वहाँ भी महसूस होने लगा है।
बिहार का नतीजा सिर्फ एक हार नहीं, एक चेतावनी है। या तो कांग्रेस अब आत्ममंथन कर जाग जाए, या इतिहास की किताब में एक हाशिया बनकर रह जाए। समाप्त।
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पीटर पेन 1902 में लिखे एक उपन्यास का नायक है।
राहुल गांधी की छवि की तुलना अकसर पीटर पैन से की जाती है, वह काल्पनिक लड़का जो बड़ा होने से इंकार करता है। जैसे पीटर पैन कभी-कभी ज़िम्मेदारियों से बचते हुए रोमांच और आदर्शवाद की दुनिया में खोया रहता है, वैसे ही आलोचक कहते हैं कि राहुल गांधी भी राजनीति की कठोर यथार्थवादी दुनिया में पूरी तरह “परिपक्व नेता” की भूमिका अपनाने से हिचकते नज़र आते हैं। पीटर पैन की बाल सुलभ ऊर्जा उसे Neverland का नायक बनाती है।

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