मराठा साम्राज्य को विस्तार देने वाले सुप्रसिद्ध सेनानायक

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पिछले डेढ़ हजार वर्षों में पूरे संसार का स्वरूप बदल गया है । 132 देश एक राह पर, 57 देश दूसरी राह पर और अन्य देश भी अपनी अलग-अलग राहों पर हैं। इन सभी देशों उनकी मौलिक संस्कृति के कोई चिन्ह शेष नहीं किंतु हजार आक्रमणों के बाद यदि भारत में उसका स्वरूप है जो उसके पीछे बाजीराव पेशवा जैसी महान विभूतियों का बलिदान है । जिससे आज भारत का स्वत्व प्रतिष्ठित हो रहा है । ऐसे महान यौद्धा का आज 28 अप्रैल को निर्वाण दिवस है । उनका पूरा जीवन युद्ध में बीता । वे अपने सैन्य अभियान के अंतर्गत मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में थे । यहीं स्वास्थ्य बिगड़ा और उनका निधन हो गया । तब उनकी आयु मात्र उन्नीस वर्ष के थे, बीसवाँ वर्ष आरंभ किया ही था । कि उनके पिता पेशवा बालाजी राव का निधन हो गया और मराठा साम्राज्य के अधिपति छत्रपति शाहूजी महाराज ने पेशवाई का दायित्व इन्हें सौप दिया । उन्होंने 1720 में पेशवाई संभाली और बीस वर्ष का पूरा कार्यकाल केवल युद्ध में बीता । उन्होंने अपने जीवन में कुल 43 युद्ध कियै । और सभी में विजयी रहे । यदि उनके मार्ग में हुईं छोटी बड़ी झड़पों के युद्धों को भी जोड़ा जाये तो यह संख्या 54 तक होती है । उन्होंने प्रत्येक युद्ध जीता । वे किसी युद्ध में नहीं हारे ।

श्रीमंत बाजीराव पेशवा का जन्म 18 अगस्त 1700 में हुआ था । उनके पिता बालाजी भी पेशवा थे । माता राधा बाई भी कुशल ग्रहणी और युद्ध कला में निपुण थीं। इस प्रकार वीरता और कौशल के संस्कार उन्हे जन्म से मिले थे । बाजीराव बचपन से गंभीर धैर्यवान और साहसी थे । उन्होंने बाल वय में ही घुड़सवारी, तीरन्दाजी, तलवार भाला, बनेठी, लाठी आदि चलाना सीख ली थी । वे मात्र बारह वर्ष की आयु से ही अपने पिता के साथ युद्ध में जाने लगे थे । सैनिकों का कौशल देखना और घायलों की सेवा करना उनके स्वभाव में था । वे पिता के साथ दरवार भी जाते थे । इससे दरबार की गरिमा और राजनीति में निपुण हो गये थे । अभी उन्होंने अपनी आयु के उन्नीस वर्ष ही पूरे किये और बीसवां वर्ष आरंभ ही हुआ था कि पिता का निधन हो गया । शाहूजी महाराज ने किशोर वय से बाजीराव की प्रतिभा देखी थी अतएव उन्होंने बाजीराव को इसी आयु में पेशवा कि दायित्व सौंप दिया । उन्होंने एक प्रकार से अल्प आयु में इतना महत्वपूर्ण दायित्व संभाला था । किन्तु अपनी असाधारण क्षमता और योग्यता से हिन्दु पदपादशाही की साख पूरे भारत में प्रतिष्ठित की । अपनी दूरदर्शिता, अद्भुत रण कौशल, सटीक निर्णय और अदम्य साहस से मराठा साम्राज्य का भारत भर मे विस्तार किया । वे श्रीमंत शिवाजी महाराज की भांति ही कुशल रणनीतिकार और यौद्धा थे । वे घोड़े पर बैठे-बैठे और चलती हुई सेना के बीच भी रणनीति बना लेते थे । घोड़ा भले थके पर वे नहीं थकते थे । घोड़ा यदि थकता था तो वे घोड़ा बदल लेते थे । भागते हुये घोड़े पर बैठे उनके भाले की फेंक इतनी तीब्र होती थी कि शत्रु अपने घोड़े सहित घायल होकर धरती पर गिर पड़ता था ।

श्रीमंत बाजीराव ने जब पेशवा दायित्व संभाला तब दक्षिण भारत में तीन प्रकार की चुनौतियाँ थीं । मुगलों के साथ-साथ अंग्रेजों व पुर्तगालियों के अत्याचारों का भी बोलबाला था । भारतीय जनों और भारतीय गरिमा के प्रतीक देवस्थान तोड़े जा रहे थे । भय और लालच से पंथ परिवर्तन की तो मानो स्पर्धा चल रही थी । महिला और बच्चों के शोषण की नयी नयी घटनायें घट रहीं थीं । ऐसे विपरीत वातावरण में श्रीमन्तबाजीराव ने पहले दक्षिण भारत में भारतीय जनों को ढाढ़स दिया फिर उत्तर की ओर रुख किया । उनकी विजय वाहनी ने ऐसा वातावरण बनाया जिससे पूरे भारत में भारतीय भूमि पुत्रों का आत्मविश्वास जागा । बाद के वर्षो में यदि ग्वालियर, इंदौर बड़ौदा आदि में मराठा राज्य स्थापित हुये और दिल्ली की मुगलसल्तनत को सीमित किया जा सकता तो इसकी नींव श्रीमन्तबाजीराव पेशवा ने रखी थी । उन में शिवाजी महाराज जैसी ही वीरता व पराक्रम और चरित्र था।

उनके प्रमुख अभियानों में मुबारिज़ खाँ को पराजित कर मालवा और कर्नाटक में प्रभुत्त्व स्थापित किया । पालखेड़ के युद्ध में निजाम को पराजित कर उससे राजस्व और सरदेशमुखी वसूली । फिर मालवा और बुन्देलखण्ड में मुगल सेना नायकों पर विजय प्राप्त की । फिर मुहम्मद खाँ बंगश को परास्त किया । दभोई में त्रिम्बकराव के आन्तरिक विरोध का दमन किया । सीदी, आंग्रिया तथा पुर्तगालियों एवं अंग्रेजो को भी बुरी तरह पराजित किया । 1737 में उन्होंने दिल्ली अभियान किया । उनका मुकाबला करने एक लाख की फौज लेकर वह सआदत अली खान सामने आया । मुगलों ने पीछे से निजाम हैदराबाद को बुलाया । उनकी रणनीति थी कि सामने से सआदत खान एक लाख की सेना से और पीछे से निजाम हमला बोले । पर बाजीराव पेशवा उनकी चाल समझ गये । उन्होने सआदत को युद्ध में उलझाया और चकमा देकर दिल्ली पहुँच गए जबकि चिमाजी अप्पा ने अपनी दस हजार की फौज से निजाम को मालवा में रोक लिया । बाजीराव अभी दिल्ली में लाल किले के सामने पहुँचे ही थे मुगलों में दहशत फैल गई। मुगल बादशाह मोहम्मद शाह जो छुप गया और खजाना बाजीराव पेशवा के सुपुर्द कर दिया । पेशवा के दिल्ली जाने की खबर सआदत खान को लगी वह दिल्ली की ओर लौटने लगा ।

बाजीराव रास्ता बदलकर पुणे की ओर लौट पड़े। तब बादशाह मोहम्मद शाह ने साआदत अली खान को संदेश भेजा कि वह निजाम हैदराबाद के साथ मिलकर बाजीराव को रास्ते में ही घेर ले । इन दोनों ने नबाब भोपाल की मदद लेकर भोपाल के पास सिरोंज से दोराहे के बीच मोर्चाबंदी कर ली । बाजीराव इसी मार्ग से लौट रहे थे । इन तीनों सेनाओं से मराठा सेना का आमना सामना हुआ । सेना कम होने के बाद बाजीराव जीते । युद्ध का खर्चा बसूल किया । यह संधि दोराहे संधि के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है । इसमें मराठों को पूरे मालवा में राजस्व बसूलने का अधिकार मिला । इससे मराठों का प्रभाव सम्पूर्ण भारत में स्थापित हो गया ।

1739 में उन्होनें नासिरजंग को हराया । अमेरिकी इतिहासकार बर्नार्ड माण्टोगोमेरी ने बाजीराव पेशवा भारत के इतिहास का सबसे महानतम सेनापति बताया है और पालखेड़ युद्ध में जिस तरीके से उन्होंने निजाम को पराजित किया वह केवल बाजीराव ही कर सकते थे । श्रीमंत बाजीराव और उनके भाई चिमाजी अप्पा ने बेसिन के लोगों को पुर्तगालियों के अत्याचार से भी बचाया । उन्होंने सेना में ऐसे युवा सरदारों की टोली तैयार की जिन्होंने आगे चलकर भारत की धरती पर नया इतिहास बनाया । इनमें मल्हारराव होलकर, राणोजीराव शिन्दे शामिल थे जिन्होंने आगे चलकर इंदौर और ग्वालियर में हिन्दवी साम्राज्य की शाखा स्थापित की । अपने इसी विजय अभियान के अंतर्गत वे महाराष्ट्र वापस लौट रहे थे कि मार्ग में उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और वे मध्यप्रदेश के खरगोन में कुछ विश्राम को रुके और वहीं 28 अप्रैल 1740 में उन्होने दुनियाँ से बिदा ले ली । नर्मदा किनारे वहीं उनका अंतिम संस्कार किया गया । उस स्थान पर समाधि बनी है । वहाँ आज भी प्रतिदिन सैंकड़ो लोग अपने प्रिय पेशवा को श्रृद्धाँजलि अर्पित करने जाते हैं । बाजीराव जी भगवान शिव के उपासक थे । बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने वहाँ शिव लिंग की स्थापना की । जो आज भी है । उन्होंने दो विवाह किये थे । पहली पत्नी काशीबाई और दूसरी पत्नि देवी मस्तानी थीं । उनके बाद उनके पुत्र बालाजी बाजीराव ने आगे चलकर पेशवा का दायित्व संभाला । और अपने पिता के अधूरे काम को इसे बढ़ाया।

What would I have done if I were in Pahalgam that day?

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Shefali Vaidya

Pune: The Islamic terrorist attack targeting Hindus in Pahalgam has left me extremely disturbed for the past few days. Last night I had a dream. I was standing in the lush green meadows of Pahalgam, and a cold gun barrel was pointed at my face. Beyond the barrel were cruel, frozen, cold eyes filled with extreme hatred.

I woke up at 2 am drenched in sweat. My heart was still racing and a single question lingered in my mind — what would I have done if something like this had happened to me? Would I have removed my bindi to save my life? Would I have renounced my faith and recited the kalma?

No one has taught us to face death with courage. We are ordinary people, not soldiers. The fear of death is a strong natural instinct.

Would I have behaved like that in Pahalgam that day, or would I have faced death with courage knowing death was inevitable? Or would I have been paralyzed, unable to decide what to do?

Honestly, I don’t know the answer to this question. I hope that if such a situation were to arise, I would be worthy of my freedom fighter father’s legacy, who took up arms for the country at the age of 21.

When we are safely asleep in our warm beds it is easy to talk about bravery. But the truth is none of us know how we would react in that moment.

Courage is a muscle we are unaware of until we are faced with a crisis. I cannot say for sure what I would have done if I were in Pahalgam that day.

But one thing I can say for sure is we Hindus have been living under the illusion such things will never happen to us. We think we will never have to choose between our faith and our lives.

We know millions of Hindus in India have had to make this choice at some point. We have read history, but we conveniently forget it because the truth is bitter.

This is our history, our present, and if we open our eyes wide, our future. This truth is a reality for the families of the 26 people who lost their lives in Pahalgam.

Please don’t be under any illusion — our enemies have no interest in secularism. For them, we are just ‘kafirs’, a target, a sacrifice, a ticket to heaven.

I pray to Goddess Durga when that moment comes, I will have the strength to face death with my head held high and eyes open.

पहलगाम का खून: गंगा-जमुनी तहज़ीब की आड़ में भारत की आत्मा पर वार

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22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में जो हुआ, वह सिर्फ आतंकवाद नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा पर एक सोची-समझी चोट थी।
26 निर्दोष सैलानियों को द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF), जो लश्कर-ए-तैयबा का ही एक नक़ली चेहरा है, ने बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। यह हमला उस वक्त किया गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सऊदी अरब दौरे पर थे और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस भारत यात्रा पर आए हुए थे। इस हमले का मक़सद साफ था—कश्मीर में सामान्य हालात बनने नहीं देने देना।

TRF ने इस क़त्ल-ए-आम का बहाना बताया “जनसांख्यिकीय बदलाव”, लेकिन असल में यह भारत की संप्रभुता और बहुलतावादी (pluralist) सोच को नकारने की एक साज़िश थी। ये जिहादी, जो 1947 के बँटवारे की जहनियत अब भी ढो रहे हैं, आज़ादी, जम्हूरियत और इंसाफ़ के नाम पर देश के अंदर कट्टर सोच को बढ़ा रहे हैं।

भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सुलह-कुल की परंपराओं को जहां कभी भाईचारे और सांझी विरासत का प्रतीक माना जाता था, अब वही जिहादी ताक़तें उसका इस्तेमाल अपनी मज़हबी नफ़रत को छुपाने के लिए कर रही हैं। सहिष्णुता का मतलब अब इनके लिए सिर्फ़ बहुसंख्यकों की चुप्पी है, जबकि ये नफरत फैलाते हैं, मज़हबी कट्टरता को हवा देते हैं और मासूमों को मारने की योजनाएं बनाते हैं।

दूसरी ओर, मोदी सरकार ने भी कई बार मज़बूत जनादेश के बावजूद वोट बैंक की राजनीति में फ़ैसले कमज़ोर कर दिए। “सबका साथ, सबका विकास” के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति अपनाई गई।

यह भी अजीब विडंबना है कि आरएसएस और इसके अनेक फ्रंटल मंच जैसे राष्ट्रवादी संगठन अक्सर ऐसे मौकों पर गायब रहते हैं जब हिंदू समाज पर सीधा हमला होता है। कई बार इनके नेता कांग्रेसी भाषा में बोलते दिखते हैं। बड़े बड़े बदलावों की डींग मारने वाले अब खामोश हैं, या कैंडल मार्च के हिस्से हैं। तमाम प्राइवेट जातिगत सेनाएं एक्टिव रहीं, लेकिन अपने कंफर्ट जोन से कोई बाहर नहीं निकलता। सिर्फ गाल बजाओ प्रतियोगिता चल रही है।
भारत की न्यायपालिका भी कई बार उन नीतियों को रोकती दिखी है जो बदलाव ला सकती थीं—चाहे वो आधार हो, सीएए हो, राम मंदिर हो या अनुच्छेद 370। ऐसी ज्यूडिशियल ऐक्टिविज़्म (न्यायिक सक्रियता) ने कट्टरपंथी ताक़तों को कानूनी रास्तों से देश की तरक्की में रोड़े अटकाने का मौका दे दिया।
देश में विकास तो हुआ है—बुलेट ट्रेन, डिजिटल इंडिया, एक्सप्रेसवे—लेकिन फ़िक्री तब्दीली यानी सोच में बदलाव नहीं आया। जिहादी सोच आज भी जिन्दा है, और मीडिया व बुद्धिजीवी वर्ग उसे अलग रंग देने की कोशिश करता है। आतंकवाद को ‘उग्रवाद’, ‘घटना’ जैसे शब्दों से ढकने की परंपरा अब भी जारी है।

भारत को अब यह समझना होगा कि असली ख़तरा सीमा के पार नहीं, बल्कि देश के अंदर ही मौजूद उन गेट्टोज़ या (मिनी पाकिस्तान) से है जहाँ नफरत पनप रही है। भारत को चाहिए कि वह अपनी सियासी हिचकिचाहट को छोड़े और मज़बूती से इस आंतरिक खतरे का मुक़ाबला करे।
सिर्फ कूटनीतिक क़दम—जैसे सिंधु जल संधि को रोकना या वाघा बॉर्डर बंद करना—काफ़ी नहीं होंगे। ज़रूरत है एक वैचारिक इंकलाब की, जहाँ धर्मनिरपेक्षता का मतलब तुष्टीकरण नहीं बल्कि राष्ट्र की एकता और अखंडता हो।

क्या वजह है जो 75 वर्षों बाद भी ये मुल्क बंटा हुआ, बिखरा, दिशाहीन दिखता है। महज विकासवादी प्रोग्राम के संचालन से सोच और प्रतिबद्धता नहीं बदलती। अगर हम वोटों की राजनीति से परे देश हित और आधुनिक ख्यालातों का समागम करें तब ही हम पहलगाम के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे। तभी भारत का भविष्य महफूज़ रह पाएगा।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सीसीएस द्वारा लिए गए निर्णयों का देश भर में समर्थन

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दिल्ली। मोदी के निर्णयों के समर्थन में देश भर के व्यापारी अब नहीं करेंगे पाकिस्तान से कोई व्यापार।

देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय कैबिनेट सुरक्षा समिति (सीसीएस ) द्वारा पाहलगाम आतंकी हमले के संदर्भ में लिए गए कड़े और निर्णायक कदमों का कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट ) ने पुरजोर समर्थन किया है।*कैट के राष्ट्रीय महामंत्री तथा दिल्ली चांदनी चौक से सांसद श्री प्रवीन खंडेलवाल ने आज यह घोषणा करते हुए कहा की अब से भारत के व्यापारी पाकिस्तान से कोई व्यापार नहीं करेंगे अर्थात् हर प्रकार का आयात या निर्यात पाकिस्तान के साथ व्यापारी नहीं करेंगे ।

  कल 25 एवं 26 अप्रैल को भुवनेश्वर में कैट की राष्ट्रीय गवर्निंग काउंसिल की दो दिवसीय बैठक हो रही है जिसमें पाकिस्तान से व्यापार न करने का निर्णय अधिकृत रूप से लिया जाएगा। बैठक में देश के लगभग सभी राज्यों के प्रमुख व्यापारी नेता भाग लेंगे।

 व्यापारियों में इस नृशंस आतंकी हमले को लेकर गहरा आक्रोश और पीड़ा है। देश भर के व्यापारी समुदाय के संगठनों ने पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इस आतंकवाद की कड़े शब्दों में निंदा की है और जगह जगह व्यापारी संस्थाएं आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपने रोष और आक्रोश का प्रदर्शन कर रहे हैं।

 कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी सी भरतिया एवं राष्ट्रीय चेयरमैन श्री ब्रजमोहन अग्रवाल ने संयुक्त रूप से केंद्र सरकार से पाकिस्तान के साथ हर प्रकार के व्यापारिक संबंध तुरंत समाप्त करने की मांग की है। यह समय है जब देश की संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। व्यापारियों का मानना है कि पाकिस्तान को आर्थिक मोर्चे पर भी करारा जवाब दिया जाना चाहिए।

 कैट ने देश के समस्त व्यापारिक संगठनों से भी अपील कि  है कि वे पाकिस्तान से होने वाले किसी भी प्रकार के आयात या निर्यात व्यापार को पूरी तरह बंद करें और देशहित में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों।

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