अधिकारी-कर्मचारी कथा

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शंकर कुमार झा

जंगल में शेर ने एक फैक्ट्री डाली… उसमें एकमात्र काम करने वाली चींटियाँ थी जो समय से आती जाती थीं और फैक्ट्री का सारा काम करती थी।
शेर का व्यसाय बहुत ही व्यवस्थित ढंग से चल रहा था।

एक दिन शेर ने सोचा कि ये चींटियां इतना सुंदर काम कर रही है, अगर इसको किसी विशेषज्ञ के निगरानी में रख दूँ तो और बेहतर काम कर सकती है।
ये ख्याल मन में आते ही शेर ने एक मधुमक्खी को मैनेजर नियुक्त कर दिया।

मधुमक्खी को कार्य का बहुत अनुभव था और वह रिपोर्ट्स लिखने में भी बहुत होशियार थी।

मधुमक्खी ने शेर से कहा कि सबसे पहले हमें चींटियों का काम करने का समय सारणी बनाना होगा। फिर उसके काम का सारा रिकार्ड अच्छी तरह रखने के लिए मुझे एक अलग से सेक्रेटरी चाहिए होगा।

शेर ने खरगोश को सेक्रेटरी के रूप में नियुक्त कर दिया।

शेर को मधुमक्खी का कार्य पसंद आया। उसने कहा कि चींटियों के अब तक पूरे हुए सारे कार्यों की रिपोर्ट दो और जो प्रगति हुई है उसको एक सुंदर ग्राफ बनाकर निर्देशित करो।

मधुमक्खी ने कहा ठीक है, मगर मुझे इसके लिए कंप्यूटर, लेज़र प्रिंटर और प्रोजेक्टर चाहिए होगा। इस सबके लिए शेर ने एक कंप्यूटर डिपार्टमेंट बना दिया और बिल्ली को वहां का सर्वेसर्वा नियुक्त कर दिया।

अब चींटी अपना काम करने के बजाय सिर्फ कागज़ी रिपोर्ट बनाने में ध्यान देने लगी, जिससे उसका काम पिछड़ता गया और अंततः प्रोडक्शन कम हो गया।
शेर ने सोचा कि कंपनी में एक तकनीकी विशेषज्ञ रखा जाय जो मधुमक्खी की सलाहों पर अपनी राय दे सके। ऐसा सोंचकर उसने बंदर को तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त कर दिया।

अब चींटी को जो भी काम दिया जाता वह उसको पूरी सामर्थ्य से करने की कोशिश करती लेकिन अगर काम कभी पूरा नहीं होता तो वह विवश होकर उसको अपूर्ण छोड़कर घर चली जाती।

शेर को लगातार नुकसान होने लगा तो वह बहुत बेचैन हो उठा। कोई उपाय न देख मजबूरी में उसने उल्लू को नुकसान का कारण पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया।

तीन महीने बाद उल्लू ने शेर को अपनी विस्तृत व बेहद गोपनीय रिपोर्ट सौंप दी; जिसमें उसने बताया कि फैक्ट्री में काम करने वालों की संख्या ज्यादा है औऱ कंपनी के घाटे को कम करने के लिए कर्मचारियों को सस्पेंड, नोटिस, बर्खास्त करना होगा…

शिक्षा:-

अब आप गंभीरता से सोचिए; किसको सस्पेंड, नोटिस, बर्खास्त किया जाएगा..??

चींटियों को… क्योंकि वास्तव में वही एक मात्र वर्कर थी। “यही व्यवस्था सरकार करती है, सरकारी विभागों में इतने ज्यादा अधिकारी है और वह सब केवल कर्मचारी से काम की रिपोर्ट मांगते हैं। आज कर्मचारी का ज्यादा समय साहब लोगों को रिपोर्ट भेजने में बर्बाद होता है, उसके पास वास्तविक काम का समय ही नहीं बचता।

हिंदी उपन्यास की नई आवाज़: एएमयू सेमिनार में असहमति, सृजन पर चर्चा

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के हिंदी विभाग ने दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया, जिसका विषय था —“समकालीन हिंदी उपन्यास: समय, समाज और संस्कृति में असहमति की आवाज़”।

फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स लाउंज में हुए इस आयोजन में देशभर के प्रसिद्ध विद्वान और लेखक शामिल हुए। चर्चा का केंद्र यह रहा कि आज का हिंदी उपन्यास कैसे समाज की आत्मा को टटोलते हुए एक जागरूक प्रतिरोध की आवाज़ बन गया है।

“वर्तमान को समझने के लिए अतीत को जानना ज़रूरी है”

सेमिनार के संयोजक प्रो. शंभूनाथ तिवारी ने कहा कि हर रचना अपने समय की गवाही देती है। अगर हम समकालीनता को समझना चाहते हैं, तो इतिहास और स्मृति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

प्रो. तसनीम सुहैल, विभागाध्यक्ष और सेमिनार निदेशक, ने स्वागत भाषण में कहा कि आज का हिंदी उपन्यास सामाजिक यथार्थ और उत्तर-आधुनिक विस्थापन के बीच पुल बन रहा है—जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा और सामूहिक असहमति एक साथ चलती हैं।

पूर्व कुलपति प्रो. मोहम्मद गुलरेज़ ने अपने संबोधन में कहा कि “समकालीन उपन्यास विद्रोह नहीं, बल्कि चेतना का जागरण है।” उन्होंने हिंदी में प्रवासी लेखन और मैजिकल रियलिज़्म की कमी पर अफसोस जताया और कहा कि रचनाकारों को नए प्रयोगों से डरना नहीं चाहिए।

“कथा-रस पाने से पहले बुद्धि-रस पाना ज़रूरी है”

मुख्य वक्ता प्रो. रोहिणी अग्रवाल (महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक) ने कहा कि समय, समाज और संस्कृति शक्ति-संरचनाएँ हैं। इन्हें समझे बिना समकालीनता को नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कहा — “कथा-रस तक पहुँचने के लिए पहले बुद्धि-रस तक पहुँचना ज़रूरी है।” उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक दर्शन, आस्था और सत्ता की राजनीति के जटिल रिश्तों पर भी विस्तार से बात की।

प्रो. श्रद्धा सिंह (बीएचयू) ने अपने विशेष वक्तव्य में बताया कि हिंदी में उपन्यास लेखन और स्त्री लेखन लगभग साथ-साथ विकसित हुए। उन्होंने मन्नू भंडारी की आपका बंटी, मृदुला गर्ग की चित्तकोबरा, कृष्णा सोबती की ज़िंदगीनामा और गीतांजलि श्री की ए लड़की जैसी रचनाओं का ज़िक्र किया और कहा कि आज की महिला लेखिकाएँ पर्यावरण, राजनीति और अस्तित्व जैसे गंभीर मुद्दों को गहराई से छू रही हैं।

समापन सत्र में प्रो. टी. एन. सतीशन (डीन, फ़ैकल्टी ऑफ आर्ट्स) ने कहा कि साहित्य मनोरंजन नहीं, समाज की सच्चाई उजागर करने का माध्यम है। “समकालीन उपन्यास सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक है, जिसने इंसान के नैतिक विवेक को फिर से जगाया है।”

नई हिंदी कथा: असहमति से आत्म-साक्षात्कार तक

वर्तमान हिंदी साहित्य की दिशा पर कई साहित्य प्रेमियों ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, आज का हिंदी उपन्यास प्रेमचंद के यथार्थवाद से आगे निकल कर कई आवाज़ों में बोलता है। उदय प्रकाश, निर्मल वर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, विनोद कुमार शुक्ल, अलका सरावगी, अनामिका, गीतांजलि श्री और यशपाल शर्मा जैसे लेखकों ने हिंदी कथा में भाषा और विचार दोनों स्तरों पर नई ताजगी दी है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ मांडवी के मुताबिक, “गीतांजलि श्री का रेत समाधि (Tomb of Sand) हिंदी कथा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला मील का पत्थर साबित हुआ। वहीं विनोद कुमार शुक्ल के दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसी कृतियों में यथार्थ और स्वप्न का अद्भुत मेल है।ये रचनाएँ समाज में फैलते असहिष्णु माहौल, जाति और लिंग की असमानता, और तेज़ी से बदलते शहरी जीवन की बेचैनी को बड़ी बारीकी से पकड़ती हैं। आज के उपन्यास में व्यक्तिगत अनुभव ही राजनीतिक सत्य बन गया है।”

गायब होती हंसी, खोता हुआ व्यंग्य

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “फिर भी अकादमियों के गलियारों में हाल के दिनों में एक साझा चिंता उभरी है। हिंदी साहित्य से हंसी और व्यंग्य जैसे गायब हो गए हैं। कभी हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, और के. पी. सक्सेना ने जिस तीखे व्यंग्य से समाज को आईना दिखाया था, आज वैसी रचनात्मक चपलता कम दिखती है।”

दक्षिण भारत की साहित्य प्रेमी मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “आज का लेखन गंभीर तो है, पर कहीं न कहीं मुस्कान और हल्के व्यंग्य की मानवीय गर्मी खो गई है। इस दौर में “Humour Times” (हिंदी_इंग्लिश) जैसी पत्रिकाएँ इस विरासत को जीवित रखे हुए हैं। यह पत्रिका आज भी राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर चुटीले, बौद्धिक व्यंग्य के माध्यम से लोकतांत्रिक सोच को ज़िंदा रखती है। इसकी भूमिका साहित्यिक दुनिया के लिए भी प्रेरक है।”
“साहित्य आईना भी है, आत्मा भी”

सच में, एएमयू का यह सेमिनार केवल अकादमिक विमर्श नहीं था, बल्कि हिंदी साहित्य की आत्मा की पड़ताल भी थी। आज का हिंदी उपन्यास असहमति की आवाज़ तो बन गया है, लेकिन उसे अनुवाद, वैश्विक पहचान और हंसी की खोई विरासत जैसी चुनौतियों से भी जूझना होगा। साहित्य का मकसद सिर्फ़ यथार्थ दर्ज करना नहीं, बल्कि उसके बीच मुस्कुराने की हिम्मत भी देना है। जैसे किसी कवि ने कहा था “जो हँस सकता है, वही सच बोल सकता है।”

भाई बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व सामा चकेवा

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मधुबनी। सामा चकेवा को लेकर मिथिला एवं बिहार समेत मिथिला के लोग जहाँ है मनाते है इस पर्व के पीछे भगवान श्री कृष्ण उनकी पुत्री सामा और पुत्र चकेवा की कहानी है शैलेन्द्र कुमार मिश्रा अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद एवं RWA सेक्टर 82 नोएडा ने बताया कि इसकी शुरुआत छठ के पारण के दिन से हो जाती है। सभी अपने अपने घर में इस दिन से सामा चकेवा बनाना शुरु कर देती हैं। जो भी इस दिन बना नहीं पाती हैं वो देवउठान एकादशी के दिन बनाती हैं। जिसमें सामा, चकेवा, वृंदावन, चुगला, सतभैया, पेटी, पेटार आदि मिट्टी से बनाया जाता है। उस दिन से नियमित रात्रि के समय आंगन में बैठ कर खूब खेलती हैं, नियमित गीत गाती हैं। जिसमें भगवती गीत, ब्राम्हण गीत और अंत में बेटी विदाई का समदाउन गाती हैं।

यह सिलसिला कार्तिक पूर्णिमा के दिन तक चलता है। उसके बाद कार्तिक पूर्णिमा की रात में सामा का विसर्जन किया जाता है। जिसमें महिला के संग संग घर के पुरुष वर्ग भी शामिल रहते हैं।ऐसा मान्यता है कि सामा भगवान श्री कृष्ण की पुत्री थी जो कि प्रत्येक दिन वृंदावन के जंगल में खेलने जाया करती थी। एक दिन चुगला नाम का एक व्यक्ति श्री कृष्ण को झूठा बोल दिए कि आपकी बेटी कोई साधु से मिलने जाती है। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बेटी यानी सामा को श्राप दे देते हैं पक्षी बनने का। अब वो सामा रूपी पक्षी वृंदावन के जंगल में ही रहती थी।एक दिन सामा के भाई चकेवा को पता चला जो मेरी बहन को चुगला ने चुगल्पन कर के श्राप दिलवा दिया तो वो भी उसी दिन तपस्या में बैठ गया और भगवान को प्रसन्न किया। फिर भगवान ने वर मांगने को कहा तो वे अपनी बहन को वापस मांग लिया। इसलिए इस पर्व को भाई बहन के प्रेम और स्नेह के रूप में मनाया जाता है। हरेक बहन अपने भाई की दीर्घायु की कामना करती हैं।सामा चकेवा का पर्व गांव में होता ही है। हमलोग शहर में भी मनाते हैं।
आप सभी को भाई बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व सामा चकेवा की हार्दिक बधाई

सुप्रसिद्ध विजेता हेमू भार्गव का बलिदान : विश्वासघाती ने मारा था तीर……

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भारतीय इतिहास की घटनाओं में एक विवरण हर कालखंड में मिलता है । वह यह है कि भारत कभी भी विदेशी आक्रांताओं के शक्ति बल से पराजित नहीं हुआ । भारत की पराजय सदैव अपने ही लोगों के विश्वासघात के कारण हुई । सिकन्दर के आक्रमण से लेकर मराठों के हिन्दवी साम्राज्य के पतन और 1857 की क्राँति की असफलता तक एक ही कहानी है । कोई भी युद्ध ऐसा नहीं जिसमें भारत के ही किसी अपने ने किसी अपने के साथ विश्वास घात करके पीठ में वार न किया हो । अधिकांश युद्ध विवरण में इन विश्वासघातियों का नाम भी मिल जाता है पर कुछ युद्ध ऐसे भी हैं जिनमें पता ही न चलता कि किसने विश्वासघात किया था । वह अंत तक गुप्त रहा और समय के इतिहास में खो गया। मध्यकालीन युद्धों के इतिहास में एक यौद्धा ऐसा भी हुआ जिसने मुगलों और पठानों दोनों को पराजित करके दिल्ली से बाहर कर दिया और अपना शासन स्थापित कर लिया था । उसके शौर्य और शक्ति से पराजित होकर शेरशाह सूरी के वंशजों को दिल्ली से भागना पड़ा था और मुगल शासक हुमायूँ ने गुमनामी में भटकते हुये अपने प्राण त्याग दिये थे ।

इतिहास में यह महान यौद्धा हेमचंद्र भार्गव था । जो हेमचंद्र विक्रमादित्य के नाम से सुप्रसिद्ध है । यह एक ऐसा सितारा था जिसे भारत का नेपोलियन कहा जा सकता है । इसने जितने युद्ध किये सबमें जीत हासिल की । इतिहास में इनका उल्लेख बहुत कम है और कहीं कहीं तो अपशब्द का भी प्रयोग हुआ । यह अपशब्द मुगल और सल्तनत समर्थक इतिहासकारों ने डाले । सुप्रसिद्ध विजेता हेमू के उनकी बारे में राय अलग हो सकती है । पर भारतीय जन मानस के मन में इनकी छवि एक उज्जवल नक्षत्र की है । किंतु 5 नवम्बर 1556 इतिहास का एक दिन आया जब पानीपत के दूसरे युद्ध में विश्वासघात के तीर से वे न केवल हेमचंद्र विक्रमादित्य के प्राणों का बलिदान हुआ अपितु भारत के माथे पर पुनः एक लंबी पराजय की लकीर खींच दी । जिससे मुगल पुनः दिल्ली की गद्दी पर आसीन हो गये ।

सुप्रसिद्ध विजेता हेमचंद्र विक्रमादित्य का जन्म रिवाड़ी के एक साधारण भार्गव ब्राह्मण परिवार में हुआ उनकी जन्मतिथि 1501 मानी जाती है । उनके वंशजों की कुछ शाखायें आज भी देश के विभिन्न भागों में हैं । उनके घरों में अपने इस बलिदानी वीर के चित्र भी हैं और वे पूजा करते हैं । पर कुछ इतिहासकार उन्हें भार्गव गोत्रीय क्षत्रिय जाट मानते हैं। सत्य जो भी हो पर हेमचंद्र विक्रमादित्य अपने कौशल और योग्यता से आगे बढ़े । पहले वे दक्षिण भारत में आदिलशाही के प्रधान सेनापति और प्रधानमंत्री बने । उन्होंने जितनी लड़ाइयाँ लड़ी सब जीते । उन्होंने यह युद्ध आदिलशाही के लिये जीते थे । पर उनके मन में भारतीय संस्कृति की रक्षा का संकल्प दृढ़ होता रहा । वे भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये ततपर रहे । उन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाई ।

और उत्तर भारत की ओर अभियान चलाया । वे विभिन्न क्षेत्रों को सल्तनत से मुक्त करते हुये आगरा पहुँचे। आगरा पर अधिकार किया और 1555 में दिल्ली की ओर अभियान छेड़ा। दिल्ली पर उन दिनों शेरशाह सूरी के वंशजों का अधिकार था । शेरशाह ने मुगल बादशाह हुमायूँ को खदेड़ कर दिल्ली पर अधिकार किया था । लेकिन शेरशाह 1545 कालिंजर के युद्ध में राजकुमारी दुर्गावती के हाथों मारा गया । ये वही सुविख्यात दुर्गावती हैं जो बाद में गोंडवाना की रानी बनी और जिनका अकबर के सेनापति आसफ खाँ से भयानक युद्ध हुआ था । पराजित होकर हुमायूँ पहले यहाँ वहां छिपते फिर रहे थे । फिर अपना परिवार लेकर काबुल भाग गये लेकिन उनका दिल्ली में संपर्क बना रहा । हुमायुँ दिल्ली पर पुनः अधिकार करने की योजना बना ही रहे थे कि दुनियाँ छोड़ गये । उनकी इच्छा पूरा करने का काम उनके सेनापति बेहराम खाँ ने किया । बेहराम खान अपनी जमावट कर रहा था कि यह घटनाक्रम घट गया । हेमचंद्र विक्रमादित्य ने दिल्ली पर धावा बोला और अफगानों की सेना को पराजित खदेड़ दिया । और अपना अधिकार कर लिया ।

बेहराम खान ने इस स्थिति का लाभ उठाया और दिल्ली में पराजित सूरी सल्तनत के उत्तराधिकारियों को अपनी ओर मिला लिया । दोनों ने मिलकर दिल्ली पर आक्रमण किया । कुशल यौद्धा हेमू ने उसे भी पराजित किया और खदेड दिया । लेकिन बेहराम खान ने दिल्ली में विश्वासघाती तलाशे और नवम्बर 1556 में पुनः धावा बोल दिया । जिसमें हेमचंद्र विक्रमादित्य पुनः भारी पड़े। मुगल सेना का भारी विनाश हुआ । यह विनाशकारी समाचार सुनकर बेहराम खाँ ने अली कुली खान शैबानी के नेतृत्व में घुड़सवार सेना को साथ आगे भेजा । तब हेमू हाथी पर सवार होकर युद्ध का संचालन कर रहे थे । अकबर और बैहराम खान ने युद्ध के मैदान से आठ मील की दूरी पर अपना कैंप लगाया था । यह मुगलों की रणनीति रहती थी कि शासक और प्रधान सेनापति सदैव युद्ध मैदान से दूर रहकर युद्ध संचालन करते थे जबकि भारतीय नायक आगे रहकर । इस युद्ध में भी ऐसा ही था । मुगल और सूरी की अफगान सेना ने मिलकर तीन ओर से हमला बोला । बायीं अली कुली खान शैबानी ने केंद्र में सिकंदर खान और अब्दुल्ला खान उज़्बक और दाँयी ओर मोहरा हुसैन कुली बेग और शाह कुली महरम के नेतृत्व में युद्ध आरंभ हुआ । हेमू ने हाथी पर सवार होकर युद्ध का संचालन किया । बाँयीं ओर उनकी बहन के बेटे राम्या,और दाहिनी ओर शादी खान कक्कड़ ने किया था। यह 5 नवम्बर 1556 का दिन था । दोपहर तक के भयानक युद्ध मुगल सेना के पैर उखड़ गये ।

तीनों मोर्चे से पीछे हटने लगी । हेमू ने अपने दल के हाथियों और घुड़सवारों सैनिकों से शत्रु सेना कुचलने के आदेश दिया । हेमू जीत के शिखर पर थे । तभी उनकी आँख में आकर एक तीर लगा और वे बेहोश हो गये । इससे उनकी सेना में खलबली मच गई । सैनिक युद्ध क्षेत्र से भागने लगे । मोर्चा टूट गया और युद्ध का पांसा पलट गया । जिस हाथी पर हेमू सवार थे वह पकड़ लिया गया और मुगल शिविर में ले जाया गया। बैरम खान ने हेमू के सिर काटकर दिल्ली में घुमाया । कत्लेआम आरंभ हुआ । लगभग पाँच हजार लोग मार डाले गये । मृतकों के सिरों की एक मीनार बनाई गई। उन दिनों अकबर की आयु लगभग तेरह वर्ष थी अकबर को हुमाँयु के उत्तराधिकारी के रूप में गद्दी पर बैठा तो दिया गया था पर सारे राजकाज का संचालन बेहराम खान के हाथ में था ।

यह अंत तक पता नहीं चला कि हेमू को तीर किसने मारा । इसका कारण यह हो सकता कि जब विजेता सेनाओं ने कत्लेआम किया तब उस विश्वासघाती का भी कत्लेआम हो गया हो । बहरहाल विश्वासघात के तीर ने भारत में भविष्य केलिये दासत्व से भरी एक लंबी रात्रि का आरंभ कर दिया था ।

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