पहचानिए…

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अजी हाँ

A Team और B Team एक ही खेल, दो चेहरे

जब भी इस देश पर हमला होता है तो एक A-Team होती है और एक B-Team..

A-Team हथियार उठाती है, और B-Team नैरेटिव..

A-Team बम लगाती है जैसे पुलवामा में लगाया था, जैसे उरी में लगाया था, जैसे पहलगाम में किया गया, और अब दिल्ली में..इनका काम है खून बहाना, डर फैलाना, और देश के भीतर नफ़रत का बीज बो देना..

फिर आती है B-Team कलम और कैमरा लेकर..
जो कहती है कहीं ये इनसाइड जॉब तो नहीं?
जो कहती है ये इलेक्शन जीतने की साज़िश ती नहीं..

A-Team पाकिस्तान की लैब में बनती है
B-Team भारत के अंदर से ट्रेंड करती है
A-Team बारूद से हमला करती है
B-Team ट्वीट से

पुलवामा में हमारे जवान शहीद हुए तो A-Team ने धमाका किया, B-Team ने कहा, चुनाव से पहले सरकार को फायदा मिलेगा।

जब भारत ने बालाकोट में जवाब दिया तो वही B-Team बोली कितने मरे, सबूत कहाँ हैं?

यानी जिनके लिए आतंकी सिर्फ “मिसगाइडेड यूथ” हैं,
उनके लिए भारत की सेना “ओवररिएक्टिंग गवर्नमेंट एजेंसी” है।

सेम स्क्रिप्ट, सेम सिंक, सेम टूलकिट हर बार..

पहलगाम में भी यही खेल हुआ, और अब दिल्ली धमाकों में वही पैटर्न दोहराया जा रहा है..

A-Team ने हमला किया, B-Team ने भारत की ही नीयत पर सवाल उठाया..और दोनों का निशाना एक ही है भारत का बहुसंख्यक समाज, भारत का मनोबल, और भारत का नेतृत्व।

A-Team की गोलियाँ शरीर पर लगती हैं,
B-Team के झूठ दिमाग पर।
एक देश को घायल करती है, दूसरी उसके विश्वास को
एक C टीम भी होती है जो इन्हें ऐम्प्लीफ़ाई करती है..

कांग्रेस और उनके जैसे सोच वाले लोगों को समझना चाहिए ये “Pakistan vs perception” का गेम है।
और इसमें B-Team हर बार पाकिस्तान को क्लीन चिट देकर उसके लिए ही बैटिंग करती नज़र आती है..

कौन बारूद से हमला करता है, और कौन बयान से।
कौन दुश्मन के साथ खड़ा है, और कौन देश के साथ..ये देश अच्छे से जानता है..

जिहाद वॉच: आतंक की नई चुनौतियाँ और सतर्क भारत का उदय

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गोविन्दा मिश्रा

दिल्ली । भारत ने आतंकवाद की विभीषिकाएँ झेली हैं — संसद पर हमला, मुंबई की 26/11 की रात, पुलवामा का दर्द और असंख्य छोटे-बड़े धमाके जिन्होंने देश की आत्मा को झकझोरा। लेकिन आज का भारत इन चुनौतियों के सामने सिर झुकाने वाला नहीं, बल्कि जवाब देने वाला राष्ट्र बन चुका है। हाल की घटनाएँ, जैसे फरीदाबाद में 2,900 किलोग्राम विस्फोटक की बरामदगी या गुजरात की “राइसिन साजिश”, इस सच्चाई की पुष्टि करती हैं कि आतंक के तरीके बदल गए हैं — और भारत का रुख भी।

आतंक की नई परतें: जब सफ़ेद कोट बना हथियार

फरीदाबाद से बरामद विस्फोटक किसी साधारण अपराध का हिस्सा नहीं थे। यह साजिश देश के प्रतीक — लाल क़िले — पर हमला करने की मंशा से जुड़ी थी। पहले के आतंकवादी चेहरे पहचानने योग्य होते थे — फटा बैग, पुरानी बाइक, या सीमापार से आई बंदूक। लेकिन इस बार आतंक ने नया रूप धारण किया: सफ़ेद कोट, प्रयोगशालाएँ और तकनीकी उपकरण।
आतंकवाद अब सिर्फ बंदूक या बम नहीं, बल्कि विचारधारा और विज्ञान का विकृत संगम बन चुका है। “व्हाइट कॉलर जिहाद” — यानी शिक्षित आतंकवाद — एक वास्तविकता है। यह वह चेहरा है जहाँ डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक कट्टरपंथ की विचारधारा से प्रभावित होकर विनाश के औजार बना रहे हैं।

मोदी युग में खुफिया चौकसी और जवाबदेही

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की संरचना पहले से कहीं अधिक सशक्त और स्वतंत्र हुई है। राजनीतिक हस्तक्षेप कम हुआ है, और निर्णय प्रक्रिया तेज़। यही कारण है कि कई बड़ी साजिशें उनके परिपक्व होने से पहले ही ढह गईं।
फरीदाबाद, मुरशीदाबाद और गुजरात की घटनाएँ इस नई रणनीति का प्रमाण हैं। पहले जहाँ प्रतिक्रियाएँ औपचारिक होती थीं, अब रोकथाम प्राथमिकता बन गई है। यह परिवर्तन केवल नीतिगत नहीं, बल्कि वैचारिक भी है — “पहले प्रहार करो, फिर पछताओ नहीं।”

कांग्रेस काल और असुरक्षा का दशक

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 2004 से 2014 के बीच भारत में आतंकवाद की घटनाएँ चरम पर थीं। दिल्ली, मुंबई, वाराणसी, पुणे, जयपुर — कोई शहर सुरक्षित नहीं रहा। लेकिन अधिक चिंता का विषय था, तब की सरकार की प्रतिक्रिया।
बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद जो राजनीतिक बयान आए, उन्होंने सुरक्षा बलों के मनोबल को चोट पहुँचाई। जब किसी नेता की करुणा आतंकियों के प्रति अधिक दिखे और शहीद पुलिसकर्मी के प्रति कम, तो संदेश खतरनाक होता है।
इसी दौर में “हिंदू आतंकवाद” जैसी संज्ञा सामने आई — जिसने न केवल असली जिहादी नेटवर्क को छिपाया, बल्कि देशभक्तों की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

तुष्टीकरण बनाम राष्ट्रहित: दो राजनीतिक दृष्टिकोण

कांग्रेस का दृष्टिकोण अक्सर तुष्टीकरण की नीति पर आधारित रहा — जिससे सीमापार और घरेलू आतंकी नेटवर्क को अप्रत्यक्ष सहूलियत मिली। वहीं भाजपा का दृष्टिकोण राष्ट्रहित के केंद्र में खड़ा रहा।
मुरशीदाबाद में बांग्लादेश सीमा के पास बरामद 150 बमों की घटना याद दिलाती है कि निष्क्रियता और वोट-बैंक की राजनीति आतंक को पनपने देती है। भाजपा की नीति स्पष्ट रही — सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक नेटवर्क पर कठोर नियंत्रण।

डिजिटल युग में आतंक का नया चेहरा

आज आतंकवादी संगठन बंद कमरों से नहीं, बल्कि एन्क्रिप्टेड चैट्स, डार्क वेब और डिजिटल वॉलेट्स के माध्यम से साजिश रच रहे हैं। यह “साइबर जिहाद” है — जो बिना बम के भी उतना ही घातक हो सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए केवल संवेदनशीलता नहीं, बल्कि तकनीकी दक्षता चाहिए। यही वजह है कि वर्तमान सरकार ने डिजिटल इंटेलिजेंस नेटवर्क और साइबर सुरक्षा में बड़े निवेश किए हैं। ड्रोन निगरानी, डेटा एनालिटिक्स और एआई-सक्षम निगरानी प्रणाली अब भारत की आंतरिक सुरक्षा का हिस्सा हैं।

राष्ट्रवाद और सुरक्षा का पुनर्परिभाषित अर्थ

भारत में अब “राष्ट्रवाद” कोई राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि एक नागरिक जिम्मेदारी बन चुका है। मोदी युग का राष्ट्रवाद पुलिस, सेना या एजेंसियों तक सीमित नहीं — यह जनसहभागिता का रूप ले रहा है।
सुरक्षा अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि विचारों की रक्षा भी है। इस दृष्टिकोण ने आतंक के विरुद्ध राष्ट्रीय एकता को नई मजबूती दी है।

कठोर शासन बनाम कमजोर राजनीति

जहाँ पहले अफसर निर्णय लेने से डरते थे, अब वे राष्ट्रीय समर्थन के साथ काम कर रहे हैं। शासन की इस स्थिरता ने एजेंसियों को निडर बनाया है। यही अंतर है कमजोर राजनीति और मज़बूत शासन में।
कांग्रेस ने कायरता को धर्मनिरपेक्षता कहा, भाजपा ने साहस को देशभक्ति। परिणाम यह है कि आज भारत पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करता है।

लाल क़िले से नई चेतावनी तक

लाल क़िले पर संभावित हमले की योजना केवल भौतिक नहीं, प्रतीकात्मक भी थी। यह भारत की आत्मा पर प्रहार का प्रयास था। लेकिन यह विफल हुआ — क्योंकि अब भारत में ऐसा नेतृत्व है जो किसी के आगे झुकता नहीं और किसी भी षड्यंत्र को पनपने नहीं देता।
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में आतंक की साजिशें “परिपक्व” नहीं हो पातीं, वे ढह जाती हैं। यही है नया भारत — सतर्क, सशक्त और निर्णायक।

सतर्क राष्ट्र, सुरक्षित भविष्य

आतंक का स्वरूप बदल रहा है — अब यह सीमाओं से नहीं, विचारों और तकनीक से आ रहा है। लेकिन भारत भी बदल चुका है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, तकनीकी कौशल और जनसहयोग के समन्वय से राष्ट्र ने एक नई सुरक्षा संरचना गढ़ी है।
यह भारत अब केवल अपने घाव नहीं गिनता, बल्कि हमलावर की दिशा में भी देखता है।
“जो भारत को धमकाएगा, उसे खोजकर समाप्त किया जाएगा” — यह केवल एक नीति नहीं, बल्कि नई राष्ट्रीय चेतना का उद्घोष है।

(लेखक गोविंदा मिश्रा दिल्ली में पठन, पाठन, लेखन में सक्रिय हैं)

1983 में घटे असम के नेली नरसंहार की सच्चाई सार्वजनिक की जाए — PPFA की मांग

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नव ठाकुरिया

गुवाहाटी: देशभक्त नागरिकों के संगठन पैट्रियोटिक पीपल्स फ्रंट असम (PPFA) ने असम सरकार द्वारा विधानसभा में नेली नरसंहार से जुड़ी रिपोर्ट पेश किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि 1983 में घटित इस भयावह घटना की वास्तविक सच्चाई अब देश के सामने आनी चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि असमिया समाज को ‘मुस्लिम-विरोधी’ बताने की किसी भी साजिश को नाकाम किया जाए और तथ्यों के आधार पर वर्षों से गढ़ी जा रही नकारात्मक छवि को मिटाया जाए।

ज्ञात हो कि 18 फरवरी 1983 को राज्य की नेली क्षेत्र में हुआ यह नरसंहार दुनिया के सबसे भीषण जनसंहारों में गिना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें 2,000 से अधिक बांग्लादेश मूल के मुस्लिम बसने वालों की मौत हुई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस त्रासदी को मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की हत्या के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन शायद ही किसी रिपोर्ट में यह उल्लेख हुआ कि इस हिंसा के दौरान हमलावर (स्थानीय जनजातीय और असमिया समुदाय के लोग सहित) भी जवाबी कार्रवाई में मारे गए थे।

PPFA ने अपने बयान में कई बुनियादी प्रश्न उठाए हैं —

“इन हत्याओं में कौन-से हथियार इस्तेमाल किए गए थे? क्या बिना किसी आधुनिक हथियार के स्थानीय लोग इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कुछ घंटों में मार सकते थे? यदि मृतक मुस्लिम समुदाय से थे, तो उन्हें कहाँ दफनाया गया? क्या नेली क्षेत्र में सामूहिक कब्रों के कोई संकेत या प्रमाण मिले हैं?”
संगठन का मानना है कि तेवारी आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता को समझने की दिशा में अहम कदम होगा। इससे न केवल ऐतिहासिक सच्चाई सामने आएगी, बल्कि उन भ्रांतियों और राजनीतिक कथाओं का भी अंत होगा, जिनके जरिए असमिया समाज को दोषी ठहराने की कोशिशें की जाती रही हैं।

PPFA का कहना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने से न सिर्फ पीड़ितों और उनके परिजनों के सवालों के जवाब मिल सकेंगे, बल्कि असम और असमिया समाज के प्रति फैलाई गई गलत धारणाओं का भी तथ्यात्मक और निष्पक्ष रूप से खंडन हो सकेगा।

एकीकृत चिकित्सा: कैंसर उपचार की समग्र दिशा

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डॉ शिवानी कटारा

मनुष्य केवल शरीर नहीं है, बल्कि पंचकोशीय अस्तित्व है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। जब इनमें से किसी एक में असंतुलन होता है, तभी रोग जन्म लेता है। कोविड काल ने यह सच्चाई सामने लाई कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि जीवनशैली, प्रतिरक्षा और मानसिक संतुलन से आता है। जब पूरी दुनिया आधुनिक चिकित्सा की सीमाओं में उलझी थी, तब भारत के घरों में काढ़ा, गिलोय, अश्वगंधा, योग और ध्यान ने लाखों लोगों की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया। उस दौर ने यह एहसास कराया कि आधुनिक चिकित्सा अपने आप में संपूर्ण नहीं है।

कैंसर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह रोग केवल शरीर की कोशिकाओं का विकार नहीं, बल्कि आहार, जीवनशैली और मानसिक असंतुलन का परिणाम है। भारत के कैंसर रजिस्ट्रियों के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 15.6 लाख नए कैंसर मामले दर्ज किए गए। पुरुषों में मुख (ओरल कैंसर) अब फेफड़ों के कैंसर से भी आगे निकल गया है, जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। ICMR रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर पाँच में से तीन कैंसर रोगी निदान के बाद जीवन नहीं बचा पाते। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, हर 20 में से एक महिला स्तन कैंसर के उच्च जोखिम में है। तम्बाकू सेवन में कमी के बावजूद ओरल कैंसर के मामले घटे नहीं हैं। इसका मुख्य कारण तम्बाकू के दीर्घकालिक प्रभाव, शराब सेवन, और अस्वस्थ जीवनशैली है। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार, केवल 5 से 10 प्रतिशत कैंसर आनुवंशिक (genetic) होते हैं, जबकि अधिकांश मामलों का संबंध जीवनशैली, आहार, पर्यावरण और मानसिक तनाव से है।

कैंसर की सबसे अधिक घटनाएँ पूर्वोत्तर भारत, विशेष रूप से मिज़ोरम में दर्ज की गईं, जहाँ पुरुषों में 21.1 प्रतिशत और महिलाओं में 18.9 प्रतिशत आजीवन कैंसर जोखिम पाया गया। इसके पीछे मुख्य कारण हैं — उच्च तम्बाकू सेवन, जोखिमपूर्ण आहार आदतें जैसे किण्वित सूअर की चर्बी, धुएँ में पकाया गया मांस, अत्यधिक मसालेदार भोजन और गरम पेय का सेवन, साथ ही कार्सिनोजेनिक संक्रमणों (जैसे HPV, Helicobacter pylori और हेपेटाइटिस वायरस) की अधिकता। भारत में कुल कैंसर मामलों में से लगभग 4 प्रतिशत मामले 0 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों में पाए जाते हैं।

इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि कैंसर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि जीवनशैली, पर्यावरण और मानसिक संतुलन का संकट है। और यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक समग्र दृष्टिकोण का संगम सबसे अधिक आवश्यक हो जाता है।

कैंसर अब सिर्फ़ बीमारी नहीं, बल्कि एक महँगा कारोबार बन गया है। भारत में ऑन्कोलॉजी दवाओं का बाजार तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 15 प्रतिशत है। नई टार्गेटेड और इम्यूनोथेरेपी दवाएँ लाखों रुपये की पड़ती हैं। एक सामान्य परिवार इलाज पर 80–90 हज़ार रुपये खर्च करता है, जिससे कई लोग गरीबी में चले जाते हैं, जबकि दवा कंपनियाँ इस भय से मुनाफ़ा कमाती हैं। लेकिन कुछ कहानियाँ इस सोच को तोड़ती हैं। जैसे अमृतसर की डॉ. नवजोत कौर सिद्धू की। वर्ष 2023 में उनके पति, पूर्व क्रिकेटर और नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने घोषणा की कि उनकी पत्नी अब कैंसर-फ्री हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक उपचार के साथ-साथ सख्त आहार और जीवनशैली बदलाव ने उनकी पत्नी के उपचार में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने लिखा — Treatment + Diet – great combination for cancer cure. उनकी पत्नी ने नींबू पानी, हल्दी, एप्पल साइडर विनेगर, अखरोट, चुकंदर-गाजर-आंवले का रस, नीम की पत्तियाँ और pH-7 वाला जल लिया। उन्होंने शुगर, गेहूँ और डेयरी प्रोडक्ट्स पूरी तरह बंद कर दिए। यह डाइट भारतीय आयुर्वेद और नोबेल पुरस्कार विजेता योशिनोरी ओसुमी की Autophagy पर आधारित खोज से प्रेरित थी — जिसमें शरीर की कोशिकाएँ स्वयं को साफ़ कर पुनर्जीवित करती हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक ज्ञान मिलकर परिणाम दे सकते हैं। आयुर्वेद आज सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि विज्ञान की पूरक शक्ति बन चुका है। आयुर्वेद कहता है कि बीमारी तब होती है जब शरीर के तीन दोष — वात, पित्त और कफ — असंतुलित हो जाते हैं। कैंसर को आयुर्वेद ‘अर्बुद’ के रूप में देखता है, यानी कोशिकाओं (cells) के असामान्य वृद्धि का परिणाम। इसका उपचार केवल दवाओं से नहीं, बल्कि भोजन, मानसिक स्थिति और जीवनचर्या के सुधार से होता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में रसयान चिकित्सा (Rejuvenation therapy) विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immunity) को पुनर्जीवित करती है। भारत का स्वास्थ्य तंत्र आज दो धाराओं पर चलता है — एक ओर आधुनिक चिकित्सा संस्थान जैसे AIIMS, टाटा मेमोरियल और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट हैं; दूसरी ओर आयुर्वेद, योग और होम्योपैथी के 3800 से अधिक अस्पताल और लगभग 37,000 डिस्पेंसरी हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय और ICMR मिलकर अब क्लिनिकल ट्रायल्स कर रहे हैं, ताकि यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जा सके कि पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा का संयोजन किस हद तक प्रभावी है। यह वही दिशा है जिसकी कल्पना WHO ने अपनी ‘Traditional Medicine Strategy’ (2014–2023) में की थी। आयुर्वेदिक और योग आधारित जीवनशैली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह बीमारी को शुरू ही नहीं होने देती।

आधुनिक चिकित्सा बीमारी का इलाज करती है, जबकि आयुर्वेद उसके कारण को पहचानकर शरीर के संतुलन को बहाल करता है। आज की जीवनशैली — गलत आहार, तनाव, नींद की कमी और प्रदूषण — हमारे अंदर निरंतर सूजन और विषाक्तता पैदा करती है। आयुर्वेद में इन्हें ‘अम’ कहा गया है। हल्दी, त्रिफला, तुलसी, गिलोय और नीम जैसे तत्व शरीर को इन विषों से मुक्त कर आत्म-चिकित्सा (self-healing) की क्षमता देते हैं। कैंसर उपचार में मानसिक स्वास्थ्य का विषय अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लेकिन यह सबसे अहम हिस्सा है। कीमोथेरपी और रेडिएशन का दर्द, शरीर की कमजोरी, बालों का झड़ना, और लगातार मृत्यु का भय — यह सब रोगी को भीतर से तोड़ देता है। कई बार देखभाल करने वाले परिवारजन भी अवसाद और थकान से गुजरते हैं। योग और ध्यान यहाँ सबसे प्रभावी औषधियाँ साबित होती हैं। नियमित ध्यान और श्वास अभ्यास से तनाव हार्मोन घटता है, नींद सुधरती है और रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। मानसिक शांति शरीर की पुनर्प्राप्ति को गति देती है। एकीकृत चिकित्सा प्रणाली इसी समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है। यह मानती है कि आधुनिक चिकित्सा तीव्र संकट में जीवन बचाती है, पर दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए जीवनशैली, आहार और मानसिक संतुलन की भूमिका अनिवार्य है। इसीलिए दुनिया के बड़े चिकित्सा संस्थान — हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, मेयो क्लिनिक और NCCIH (अमेरिका) — अब एकीकृत चिकित्सा (Integrative Medicine) पर रिसर्च कर रहे हैं। भारत के लिए यह क्षेत्र और भी स्वाभाविक है, क्योंकि यहाँ आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों का गहरा आधार मौजूद है। आज जरूरत इस बात की है कि चिकित्सा व्यवसाय का चेहरा बदला जाए।

स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं आता; वह जीवनशैली से आता है। अगर कैंसर के इलाज में सर्जरी और कीमो के साथ आहार, योग, ध्यान और सकारात्मकता को जोड़ा जाए, तो इलाज सस्ता, सुलभ और अधिक मानवीय हो सकता है। एकीकृत चिकित्सा न तो परंपरा की वापसी है, न आधुनिकता का विरोध। यह दोनों का संतुलन है। यह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, चेतना भी है। और जब उपचार शरीर, मन और आत्मा — तीनों स्तरों पर होता है, तभी वह सच्चा उपचार होता है। आख़िरकार, स्वास्थ्य का लक्ष्य केवल रोग से छुटकारा नहीं होना चाहिए — बल्कि वह होना चाहिए जो आयुर्वेद सदियों से कहता आया है:

:स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं’

अर्थात् — स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का निवारण — यही सच्ची चिकित्सा है।

(लेखिका मुख एवं दंत चिकित्सक हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं)

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