संघ साधना के तपोनिष्ठ ऋषिवर : श्री गुरुजी

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~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

आक्रमणों और वर्षों की परतन्त्रता के कारण कमजोर और दैन्य हो चुके हिन्दू समाज को संगठित करने के ध्येय से डॉ.हेडगेवार ने २७ सितम्बर सन् १९२५ विजयादशमी के दिन शक्ति की पूर्णता को मानकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन किया। जो हिन्दू समाज को सशक्त और सामर्थ्यवान बनाने तथा राष्ट्रीयता के प्रखर स्वर के साथ राष्ट्र के सर्वांगीण विकास और हिन्दुत्व के लिए प्रतिबद्ध है। समयानुसार संघ ने राष्ट्र की आवश्यकता अनुरूप राष्ट्रसेवा के यज्ञ में लाखों स्वयंसेवकों के माध्यम से आहुति दी है। उसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर जिन्हें आदर श्रद्धावश श्रीगुरूजी के रुप में जाना जाता है। उन्होंने अपने जीवन को – हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए समर्पित कर दिया। उनके कृतित्व और विचारमंथन से जो अमृत निकला वह राष्ट्र के सांस्कृतिक उन्मेष के तेज-पुञ्ज के रुप भारतवर्ष की उन्नति के रुप में आलोकित हो रहा है।

१९ फरवरी १९०६ को महाराष्ट्र के रामटेक में जन्में माधवराव सदाशिवराव ‘मधु’ जो आगे चलकर संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने। राष्ट्र और समाज ने उन्हें श्रीगुरूजी के तौर पर जाना-पहचाना। सन् १९१९ में उन्होंने ‘हाई स्कूल और १९२२ में मैट्रिक की परीक्षा चाँदा (चन्द्रपुर,महाराष्ट्र) के ‘जुबली हाई स्कूल’ से उत्तीर्ण की। सन् १९२४ में उन्होंने नागपुर के ईसाई मिशनरी द्वारा संचालित ‘हिस्लाप कॉलेज’ से विज्ञान विषय में इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सन् १९२६ में बी.एससी. और सन् १९२८ में एम.एससी. में शिक्षा पूर्ण की।

तत्पश्चात १६ अगस्त सन् १९३१ को अस्थायी सेवा के रुप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में निदर्शक के रुप में प्राणिशास्त्र विषय में अध्यापन कार्य कराने लगे। उनकी विलक्षण प्रतिभा, ऊर्जस्वित प्रखर विचार,निष्ठा और समर्पण मुझे यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि आखिर! बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापक रहते हुए वो विद्यार्थियों में इतने लोकप्रिय कैसे हो गए? कुछ न कुछ तो अवश्य ही रहा होगा। वे भी उन अध्यापकों में से ही एक रहे होंगें जो अपने वेतन को निजी हित से आगे सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन श्री गुरुजी ने अपना मानदेय – आर्थिक तौर कमजोर विद्यार्थियों की शुल्क और पाठ्य-सामग्रियों को उपलब्ध करवाने में लगाया।

यदि विचार करें तो समाज को शक्ति-सम्पन्न बनाने के लिए गति देने के लिए आगे आने की प्रेरणा कहाँ से आई? निश्चित ही यह हमारी संस्कृति और मूल्यों की परम्परा से ही स्फुरित हुई होगी। प्राणिशास्त्र के अध्यापन के अलावा उन्होंने राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र,आँग्ल भाषा, दर्शन शास्त्र में भी निरन्तर अपनी मेधा के माध्यम से सबको चकित किया। वे विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए हर क्षण तत्पर रहते थे। विद्यार्थियों से अपार स्नेह,सहजता-सरलता ने ही तो उन्हें माधवराव से ‘गुरुजी’ बना दिया और फिर वे सदा श्री गुरुजी के नाम से ही जाने गए।

वे हिन्दू समाज के लिए निष्ठ थे। आध्यात्मिकता के विचार स्त्रोत ने उन्हें संन्यास के पथ की ओर मोड़ा और स्वामी अखण्डानन्द जी से दीक्षित हुए। किन्तु जीवन के क्रम में कुछ और ही लिखा था इसलिए सन् १९३८ में संघ संस्थापक डॉ.हेडगेवार के पास वे पुनः लौटे और उनके सतत् सम्पर्क में रहे आए।

उनका ज्ञान और बहुविशेषज्ञता अचरज में डालती है। उस पर भी दृढ़ संकल्प शक्ति और स्वयं को आहुति की भाँति समर्पित करने का अद्वितीय साहस और आदर्शोन्मुख व्यक्तित्व -कृतित्व। उनका यथार्थ की अनुभूति के साथ मूल्य परम्पराओं का वाहक बनकर हिन्दू समाज को सशक्त करने के लिए योगी सदृश बनकर जीवन को माँ भारती की सेवा का पर्याय बना पाना असंभव सा लगने वाला कार्य ही प्रतीत होता है।

किन्तु उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में वह कर दिखाया जिसे डॉ.हेडगेवार ने अपनी पारखी दृष्टि से पहचाना था। डॉ हेडगेवार ने अपने जीवन के अन्तिम समय में चिठ्ठी में यह कहते हुए कि-

“इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो,मैं तुमसे कहना चाहता हूँ कि अब से संगठन चलाने की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी”

श्री गुरुजी से यह वचन ले लिया था।

श्री गुरुजी ने सन् १९४० में मात्र ३४ वर्ष की आयु में संघ के सरसंघचालक का दायित्व ग्रहण किया । फिर वे नश्वर देह को त्यागने के समय अर्थात् सन् १९७३ तक संघ-जीवन के महान व्रत को पूर्ण करने में लगे रहे।

डॉक्टर हेडगेवार ने जिस संकल्पना के साथ हिन्दू समाज को सामाजिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक औय एवं शारीरिक तौर पर शक्ति-सामर्थ्यवान बनाने का जो संकल्प लिया था। उसे योजनाबद्ध ढँग से सूत्रबद्ध करने में वे अथक अविराम लगे रहे। उन्होंने वैचारिक और बौध्दिक विकास के साथ कुशल संगठनात्मक क्षमता और ओजस्विता को मूर्तरूप दिया। उनके अन्दर राष्ट्रीयता और संस्कृति का प्रचण्ड ज्वालामुखी प्रतिक्षण राष्ट्रोत्थान के लिए धधकता रहता था। जो
समर्पण, सशक्तिकरण और गर्वोक्ति के साथ हिन्दू और हिन्दुत्व के लिए निष्ठा का सञ्चार कर रहा था। श्री गुरुजी का मानस अपनी परम्पराओं, संस्कृति, धर्म-ग्रन्थों, पूर्वजों और भारतवर्ष के गौरवशाली महान इतिहास के प्रति चैतन्य था। वे धर्मनिष्ठ और अपनी संस्कृति के प्रति गहरे अनुराग से भरे थे। उन्होंने डॉ हेडगेवार की भांति ही देशवासियों को स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने के लिए जनचेतना का संचार किया। स्वातंत्र्य यज्ञ के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले स्वयंसेवकों को तैयार किया।

यह वह कालखंड था जब संघकार्य अपने आप में अत्यंत कठिन था। भोजन-पानी से लेकर आवास तक की व्यवस्था का कोई भरोसा नहीं रहता था।संघ के प्रचारकों के पास एक झोला,एक जोड़ी वस्त्र , सतत् सम्पर्क के लिए यात्रा,शाखा कार्य की चुनौतियाँ थी। किन्तु
स्वयंसेवकों के लिए भूख-प्यास चिन्ता का विषय नहीं थी बल्कि उनके चिन्तन के केन्द्र में राष्ट्र था। गुरूजी इस मर्म को जानते थे लेकिन जब सम्मुख राष्ट्र हो तब निज दु:ख स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। इस महत् भाव को उन्होंने जीवन के दृष्टांत के रूप में संघ की सृष्टि के माध्यम से साकार किया।

हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प लेकर गुरुजी , सरसंघचालक बनने के साथ ही राष्ट्र पथ के अथक अविराम गतिशील साधक बन गए। उन्होंने समूचे देश की लगभग ६५ बार से अधिक यात्राएँ की होंगी। उनकी संघयात्रा निरन्तर चुनौतियों और संघर्षमय रही। सात वर्षों के अन्दर ही देश विभाजन की त्रासदी समक्ष खड़ी थी। विभाजन के दंगों में हिन्दुओं का नरसंहार और इस्लामिक क्रूरता के घ्रणित कृत्यों से समूचे राष्ट्र की अन्तरात्मा काँप गई थी। अब ऐसे समय में हिन्दुओं को संगठित और शक्ति-सम्पन्न बनाने ,पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं को सुरक्षित आश्रय स्थल और उनके भरणपोषण की चिन्ता के साथ राष्ट्र के रुप में भव्य भारतवर्ष का दायित्वबोध उनके समक्ष साक्षात्कार के रुप में प्रत्यक्ष खड़ा था। इन विषम परिस्थितियों में उन्होंने राष्ट्रीय एकता और दंगों से बचाव, पुनर्वास में संपूर्ण शक्ति के साथ स्वयंसेवकों की मालिका तैयार की‌। राष्ट्र और समाज के मध्य विभाजन की त्रासदी से आए संकट को हरने के लिए स्वयंसेवकों ने दिन-रात इस यज्ञ में स्वयं को अर्पित कर दिया।

इसी प्रकार सन् १९४७ में काश्मीर के विलय में सरदार पटेल के अलावा श्री गुरुजी का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। १८ अगस्त १९४७ को श्री गुरुजी ने महाराजा हरिसिंह से मिलकर विलय के लिए वार्ता की थी। राष्ट्रीय हित पर निर्णय लेने के लिए चिंतन-मंथन किया था।
अन्ततोगत्वा सभी के संयुक्त प्रयास से महाराजा हरिसिंह ने विलय पत्र में हस्ताक्षर किया और काश्मीर भारत का हिस्सा बना।

श्री गुरुजी के सरसंघचालक दायित्व के दौरान
उनका संपूर्ण पथ चुनौतियों से भरा हुआ था।
इधर देश को स्वाधीन हुए एक वर्ष ही नहीं बीता था कि महात्मा गाँधी की हत्या के बाद राजनीतिक दबाव – सन्देह , दुराग्रह विवशता और मिथ्यारोपों के कारणवश सन् १९४८ में संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। लेकिन गुरुजी क्षण भर के लिए भी विचलित नहीं हुए। क्योंकि उनकी राष्ट्रीय चेतना,सांस्कृतिक प्रवाह,राष्ट्रभक्ति, हिन्दू समाज के प्रति असीम आत्मीयता-अनुराग और संघ के व्रत को लेकर हिन्दू राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरोत्थान के प्रति दृढ़ आस्था थी। सत्य का शंखनाद करते हुए श्री गुरुजी ने
उस समय कहा था कि —

“सन्देह के बादल शीघ्र ही छँट जाएँगे और हम बिना किसी दाग के वापस आएँगे।”

उनका यह भविष्यवाणी सत्य हुई और छ:महीने बाद संघ पर लगा प्रतिबन्ध हटा दिया गया। यह जीत संघ की नहीं अपितु हिन्दू समाज की जीत थी। क्योंकि संघ में जो भी है सबकुछ प्रत्यक्ष था और वह हिन्दू समाज का है। उसे चाहे किसी परीक्षण से गुजार दिया जाए संघ सदैव सत्य की कसौटी पर खरा उतरा है। संघ की प्रारंभ से ही यही धारणा रही है कि – संघ अर्थात् समाज। इससे हटकर और कुछ नहीं। संघ के स्वरूप में
जो कुछ भी दिखता है वह सबकुछ राष्ट्र और समाज का है। जोकि भारत की महान सांस्कृतिक विरासत से प्राप्त हुआ है।

इसी प्रकार सन् १९५० में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने श्रीगुरुजी से राजनीतिक दल के गठन की स्वीकृति और सहयोग माँगा‌। उस समय श्री गुरुजी ने स्पष्ट कर दिया था कि ― संघ प्रत्यक्ष राजनीति से सदैव दूर रहेगा और हिन्दू राष्ट्र भाव नए दल को स्वीकार्य होगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा गुरूजी की शर्तों को स्वीकार करने पर जनसंघ का गठन हुआ। वे राष्ट्रीय और राजनीतिक घटनाक्रमों पर भलीभाँति नजर रखते थे। किन्तु दलगत राजनीति की धारा से उन्होंने संघ को सदैव दूर रखा। क्योंकि उनके विचार बिन्दु में डॉ हेडगेवार जी का वही स्वप्न था कि – हम हर हिन्दू को संगठित और समर्थ बनाएँगे । जो राष्ट्र के विभिन्न आयामों में अपने-अपने कार्यों के माध्यम से राष्ट्र की सेवा कर सकें।

श्रीगुरुजी को कोई भी संकट-विपदा या चुनौती डिगा नहीं सकी। उनके समक्ष जो चुनौतियाँ आईं उनका उन्होंने डटकर सामना किया और हेडगेवारजी के संकल्प रुपी बीज को वटवृक्ष बनाने लिए संगठन विस्तार से लेकर वे बौद्धिक प्रबोधन में सदैव रत रहे आए। प्रवास के रूप में पारस्परिक मिलन और वार्ता के पथ पर बढ़ते हुए वे ‘हिन्दू-हिन्दुत्व-राष्ट्रीयता’ को लेकर सुस्पष्ट रहे। उन्होंने एक ऐसी पीढ़ी के निर्माण को लक्ष्य बनाया जो ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ राष्ट्रीयता और संस्कृति से परिपूर्ण और जिसकी रग-रग में प्रखर राष्ट्रभक्ति का रक्त प्रवाहित हो। उन्होंने गर्वोक्ति के साथ हिन्दुत्व के भाव और सामाजिक चेतना के ऊर्जस्वित स्वर से राष्ट्रीयता के मूलमन्त्र को झंकृत किया। उन्होंने अनुशासित और राष्ट्रप्रेमी समाज को — अपने पुरखों के अभूतपूर्व तेज , त्याग -बलिदान और राष्ट्र की संस्कृति के उच्च मानबिन्दुओं से सीख लेकर माँ भारती को परम् वैभव सम्पन्न बनाने के लिए आह्वान किया।

श्री गुरुजी राष्ट्र की प्रत्येक गतिविधि पर गहराई के साथ पारखी दृष्टि रखते थे। दूरदृष्टा के साथ ही वे राष्ट्र की आन्तरिक और विदेश नीति के सम्बन्ध में पूर्णरूप स्पष्ट थे।चीन की सन्देहास्पद गतिविधियों और नीतियों को लेकर उन्होंने कई बार अपने वक्तयों के माध्यम से तत्कालीन सरकार को आगाह किया था । लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार ने उनकी उपेक्षा की। चीन से जिस विश्वास घात की आशंका थी। वह सन् १९६२ के भारत-चीन युद्ध के रुप में परिणत हो गई। इस युद्ध में अक्षय चीन के रुप में देश को लगभग ३८ हजार वर्ग किलोमीटर भू-भाग गवांना पड़ गया।

भारत-चीन युद्ध के समय श्रीगुरुजी ने संघ के स्वयंसेवकों को सेना के जवानों को राशन पहुँचाने और सैनिक मार्ग की सुरक्षा के लिए तैनात किया था। संघ के इस अतुलनीय कार्य से प्रधानमंत्री नेहरू अत्यंत प्रभावित हुए थे । उन्होंने २६ जनवरी सन् १९६३ को गणतंत्र दिवस की परेड में संघ को आमन्त्रित किया था। इस परेड में संघ के स्वयंसेवकों ने गणवेश के साथ परेड में भाग लिया था।

वे गुरुजी ही थे जिनके समक्ष दोनों घटनाक्रम घटे – एक वह जब सन् १९५८ में संघ पर प्रतिबन्ध लगा। दूसरा वह घटनाक्रम जब सन् १९६३ में गणतन्त्र दिवस की परेड पर सम्मिलित होने का नेहरू सरकार ने आमन्त्रण दिया। श्रीगुरुजी ने अपनी कुशल संगठनात्मक क्षमता के आधार पर यह सिद्ध कर दिया था कि – संघ के लिए सदैव राष्ट्र प्रथम था और राष्ट्रीयता का दूसरा पर्याय हिन्दू और हिन्दुत्व है।

लालबहादुर शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे भी गुरुजी का सतत् सम्पर्क रहा । सन् १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय पं. लालबहादुर शास्त्री ने उनके साथ परामर्श-वार्ता की थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि जनसंघ के गठन होने के बावजूद भी उन्होंने दलगत राजनीति से हटकर निर्णय लिए। राष्ट्रोन्नति के लिए संघ और स्वयंसेवकों की जब-जब आवश्यकता हुई । उन्होंने तब-तब पूर्ण निष्ठा के साथ राष्ट्र की गति-प्रगति, संकट में सरकार के सहयोग के लिए तत्परता के साथ नैसर्गिक दायित्वों का निर्वहन किया। समाज के मध्य नई लकीर खींची ।

श्रीगुरुजी अपनी वैचारिक मेधा,कुशल संगठनात्मक क्षमता,विराट हिन्दू समाज के प्रति समर्पण,राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति के प्रति अनुराग से भरे हुए थे। उन्होंने दीन-हीन -पतित मनुष्य के उद्धार और सामाजिक सशक्तिकरण तथा राष्ट्रीयता के भाव को संघ साधना के माध्यम से साकार किया। समूचे राष्ट्र को हिन्दुत्व मूल्यों-परम्पराओं को शाखा कार्य के द्वारा―
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्। प्रार्थना को चरितार्थ का नवीन दिशा दी।

श्री गुरुजी ने राष्ट्र और समाज को एकसूत्रता में पिरोने के लिए मन्त्र दिया था —

हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू पतितो भवेत्।

मम दीक्षा हिन्दू: रक्षा,मम मंत्र: समानता।।

अर्थात् — सभी हिंदू सहोदर भाई हैं कोई भी हिन्दू पतीत नहीं हो सकता, मेरी दीक्षा ही हिन्दू रक्षा है, और मेरा मंत्र समानता का मंत्र है।
इन समस्त भाव-विचारों को लेकर संघ के स्वयंसेवक कार्य करते हैं। संघ ने युगानुकूल ढँग से अपनी कार्य पद्धति को विस्तारित एवं आधुनिक किया है। लेकिन जो ध्येय डॉ. हेडगेवार जी और श्री गुरुजी ने दिया था — उन्हीं भारतीय संस्कृति के मूल्यादर्शों के अनुरूप संघ कार्य सतत् बढ़ता जा रहा है। डॉ हेडगेवार और श्री गुरुजी प्रणीत पथ का अनुसरण करते हुए —
संघ की तपोस्थली से विविध क्षेत्रों में नेतृत्व करने वाले नेतृत्वकर्ता स्वयंसेवक तैयार हो रहे हैं
जो राष्ट्र देवो भव और राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ समाज के विविध क्षेत्रों में गतिशील हैं।

श्री गुरुजी के विचार और दर्शन के मूल में हिन्दू समाज , राष्ट्र का गौरवशाली इतिहास , परंपराएं, हिन्दू संस्कृति की सनातन चेतना है। जो राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला को जलाकर अखण्ड भारतवर्ष के स्वप्न को साकार करने का व्रत है। भले ही ५जून १९७३ को उनकी ज्योति अनन्त में विलीन हो गई लेकिन उनका दर्शन और कृतित्व सदैव प्रेरणा बनकर उपस्थित है। उन्होंने अपने जीवन के ३३ वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के रुप में समाज के मध्य तपस्वी साधक का दृश्य चित्र उकेरा है। विचार और दर्शन को संस्कारों में परिवर्तित कर व्यक्ति से समाज निर्माण- राष्ट्र निर्माण की चेतना विकसित की। यह उसी की परिणति है कि डॉ. हेडगेवार ने जिस संघ का बीजारोपण किया था। वह वटवृक्ष के रुप में अपनी विभिन्न शाखाओं के द्वारा राष्ट्रोत्थान के पथ पर अनवरत गतिमान है। श्रीगुरूजी उनका उज्ज्वल चरित्र, दिशा बोध और संघकार्यों की प्रेरणा ,विचार और दर्शन सतत् राष्ट्र और समाज का पथ प्रशस्त करते रहेंगे। उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की दिव्य दृष्टि और वैचारिकी की प्रखर दीप्ति से सतत् नव चैतन्यता का निर्माण होता रहेगा।

संस्कार भारती ने की ‘भरतमुनि सम्मान – 2024’’ पाने वाले कलाकारों की घोषणा

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बृजेश भट्ट

नई दिल्ली, 19 फरवरी 2025: कला एवं साहित्य की अखिल भारतीय संस्था संस्कार भारती द्वारा वर्ष 2024 के लिए भरतमुनि सम्मान 2024 मंचीय कला एवं साहित्य (भारतीय भाषाएं) मे कलासाधकों को देने की घोषणा की। मंचीय कला में लखनऊ की कत्थक नृत्यांगना डॉ कुमकुम धर एवं साहित्य में भवानी पटना ओड़िशा के संस्कृत साहित्यकर डॉ हरेकृष्ण मेहेर को उनकी कला साधना और अपने कार्यक्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए संस्कार भारती द्वारा सम्मानित किया जाएगा।

इन दोनों नामों की घोषणा करते हुए संस्कार भारती के अखिल भारतीय महामंत्री श्री अश्विन दलवी ने कहा कि “संस्कार भारती द्वारा दिया जानेवाला यह ‘भरतमुनि सम्मान’ भारत में पंचम वेद के नाम से विख्यात नाट्य शास्त्र के रचियता महर्षि भरत मुनि को समर्पित है और ऐसे विशिष्ट कलाकारों को सम्मानित करते हुए हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी, संस्कार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ मैसूर मंजुनाथ, केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के करकमलों द्वारा यह सम्मान 22 फरवरी ,2025 को नई दिल्ली नगर पालिका कन्वेन्शन सेंटर, दिल्ली में आयोज्य ‘भरत मुनि सम्मान 2024 ‘ कार्यक्रम में दिया जाएगा। जिसमें सम्मान के रूप में एक स्मृति चिह्न, सम्मान पत्र एवं रुपए 1,51,000 की राशि भेंट की जाएगी। उसी समय संस्कार भारती द्वारा निर्मित दोनो ही कलाकारों के जीवन और उनके कार्यों पर आधारित लघु फिल्म भी दिखाई जाएगी।”

उल्लेखनीय है कला जगत के इस प्रतिष्ठित सम्मान का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भगवत के द्वारा विगत वर्ष बंगलौर में कला साधक संगम में किया गया। जिसका ‘प्रथम सम्मान’ दृश्यकला में मुंबई के चित्रकार श्री विजय दशरथ आचरेकर एवं लोककला में सिंधुदुर्ग के श्री गणपत सखाराम मसगे को उनकी कला साधना और अपने कार्यक्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया था। वार्षिक आयोजित होने वाले इस सम्मान में प्रतिवर्ष दो विधाओं में दिए जाने वाले इस सम्मान का संस्थागत, कला विश्वविधालयों एवं व्यक्तिगत संपर्को के आधार पर आवेदन के माध्यम से कला साधको का निर्णायक मंडल द्वारा चयन किया जाता है।

अद्भुत संगठक, विलक्षण व्यक्तित्व और साधना की विभूति

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कुधारणाओं के निवारण और सही मार्गदर्शन के लिये प्रकृति समय-समय पर दिव्य विभूतियाँ को संसार में अवतरित करती है जो विषमताओं और विपरीत परिस्थियों में व्यथित मानवता को एक निश्चित दिशा का संकेत करते हैं। ऐसी ही दिव्य विभूति थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर जी । जो “परमपूज्य गुरुजी” के संबोधन से जाने जाते हैं।

उनका जन्म 19 फ़रवरी 1906) को महाराष्ट्र के रामटेक में हुआ था । उनके पिता श्री सदाशिव राव उपाख्य ‘भाऊ जी’ पहले डाकघर में कार्यरत थे फिर 1908 में शिक्षक बने । माता लक्ष्मीबाई उपाख्य ‘ताई’ धार्मिक, आध्यात्म और साँस्कृतिक परंपराओं की वाहक थीं । परिवार ने उनका नाम माधव रखा । पर वे मधु के नाम से ही पुकारे जाते थे। परिवार का वातावरण भारतीय राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ आधुनिक शिक्षा का था । इसलिये बालक मधु की जीवन धारा इन दोनों दिशाओं के समन्वय के साथ संवाहित हुई ।

जो दिव्य और विशिष्ट विभुतियाँ संसार में आतीं हैं उनके जन्म के प्रथम दिन से ही असाधारणता लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। यही असाधारण झलक बालक मधु में भी थी । माता पिता से उनकी यह विलक्षण प्रतिभा छुपी न रह सकी । जब दो वर्ष के थे पिता ने तभी से उनकी शिक्षा प्रारम्भ कर दी थी । पिता स्वयं पढ़ाते और बालक की जिज्ञासाओं का समुचित समाधान करते थे । बालक मधु की स्मरण शक्ति अद्भुत थी । वे एक बार सुनकर या पढ़कर कंठस्थ कर लेते थे । ज्ञान की लालसा और उसका स्वयं विश्लेषण करने का स्वभाव ठीक वैसा ही था जैसे बचपन में स्वामी दयानन्द सरस्वती या स्वामी विवेकानंद का पढ़ने को मिलता है ।

समय के साथ शिक्षा और आयु आगे बढ़ी । 1922 में प्रथम श्रेणी में’हाई स्कूल परीक्षा’ उत्तीर्ण की। सन् 1924 में नागपुर के ईसाई मिशनरी ‘हिस्लाप कॉलेज’ से इण्टरमीडिएट उत्तीर्ण की। इन दोनों परीक्षाओं में उन्होंने केवल प्रथम श्रेणी ही प्राप्त नहीं की अपितु विशेष योग्यता भी अर्जित की जिससे छात्रवृत्ति एवं पारितोषिक भी प्राप्त किया । उनके विषय अंग्रेजी और विज्ञान रहे । छात्र जीवन में वे पढ़ाई के साथ अन्य गतिविधियों में भी भाग लेते थे । बौद्धिक गतिविधियों के साथ उनकी खेलों में भी रुचि थी । कबड्डी, हाकी और टेनिस जैसे खेल उन्हे अति प्रिय थे। इसके अतिरिक्त व्यायाम, कुश्ती मलखम्ब के करतबों में भी वे बहुत कुशल थे।

विश्वविद्यालय जीवन

इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की शिक्षा के लिये माधव 1924 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय आये । उन्होने 1926 में बी.एससी. और 1928 में एम.एससी. की परीक्षायें उत्तीर्ण कीं। महाविद्यालयीन परीक्षा में उनके विषय प्राणी विज्ञान था । ये परीक्षाएँ भी प्रथम श्रेणी के साथ उत्तीर्ण कीं। उनकी खेल वाद विवाद और बौद्धिक गतिविधियाँ महाविद्यालयीन जीवन में भी उत्कृष्ट रहीं। इस प्रकार वे अपने महाविद्यालयीन जीवन में एक सर्वप्रिय छात्र रहे ।

परिवार की पृष्ठभूमि संस्कृत और साँस्कृतिक थी । ये दोनों विधायें उनके जीवन में सदैव साथ चलीं। महविद्यालयीन जीवन में अपने निर्धारित विषयों के साथ उन्होंने इन दोनों विधाओं का भी अन्वेषण निरंतर रखा । “संस्कृत महाकाव्यों, पाश्चात्य दर्शन, श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द की ओजपूर्ण एवं प्रेरक ‘विचार सम्पदा’, भिन्न-भिन्न उपासना-पंथों के प्रमुख ग्रंथों तथा शास्त्रीय विषयों के अनेक ग्रंथों का आस्थापूर्वक पठन पाठन किया । यह परिवार के संस्कार और अध्ययन की रुचि का प्रभाव था कि महाविद्यालयीन जीवन से ही उनके जीवन में आध्यात्मिक ज्योति जागृत हो गई। एम.एससी. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वे प्राणि-शास्त्र विषय में ‘मत्स्य जीवन’ पर शोध कार्य हेतु चेन्नई के मत्स्यालय से जुड़ गये। पर यहाँ एक वर्ष के भीतर ही उनके समक्ष दो समस्याएँ सामने आईं। एक तो पिताश्री सेवानिवृत्त हो गये । इसके परिवार में कुछ आर्थिक समस्या आई दूसरे स्वयं माधल चैन्नई में बीमार हो गये । उनका उपचार दो माह चला । यह एक प्रकार से उनका पुनर्जीवन था । आर्थिक कठिनाई के चलते अपना शोध-कार्य अधूरा छोड़ कर अप्रैल 1929 में नागपुर वापस आ गये ।नागपुर आकर भी ये दोनों समस्याएँ उनके सामने रहीं। एक स्वास्थ्य और दूसरी पारिवार की आर्थिक समस्या । उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा। उनकी आत्मशक्ति और व्यायाम आदि से स्वास्थ्य सामान्यता की ओर बढ़ रहा था । आर्थिक स्थिति सुधारने कै लिये उन्होंने स्थानीय स्तर पर अध्ययन अध्यापन का कार्य आरंभ किया । इसी बीच बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें निदर्शन पद का प्रस्ताव मिला। जिसे उन्होने स्वीकार किया और 16 अगस्त 1931 को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणि-शास्त्र विभाग में निदर्शक का पदभार ग्रहण कर लिया। यहाँ अपने निर्धारित कार्य के साथ वे युवाओं को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सक्षमता पर भी ध्यान देते बातें करते । और यहीं से उन्हें गुरुजी संबोधन या उपाख्य मिला । उनके अध्यापन का विषय यद्यपि प्राणि-शास्त्र था । पर उनकी रुचि और सक्रियता देखकर विश्वविद्यालय ने उन्हें बी.ए.कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और राजनीति शास्त्र भी पढ़ाने का दायित्व भी सौंप दिया।। माधव राव जी का विषय यद्यपि प्राणी विज्ञान था पर वे अपने छात्रों तथा मित्रों को अंग्रेजी, अर्थशास्त्र, गणित तथा दर्शन जैसे अन्य विषय में भी मार्ग दर्शन करते थे । पुस्तकों के लिये वे केवल पुस्तकालय के भरोसे नहीं रहते थे । स्वयं भी पैसे बचाकर पुस्तकें क्रय कर लिया करते थे । बहुत कम समय में उनके पास निजी पुस्तकों का एक बड़ा संग्रह बन गया । स्थिति यह थी कि उनके वेतन का एक बड़ा भाग अपने छात्रों और मित्रों की फीस भरने अथवा उन्हे पुस्तकें देने में ही व्यय हो जाया करता था। बनारस में रहते हुये 1934 में श्रीगुरूजी ने अखंडनानंद जी से विधिवत दीक्षा ली और उनके शिष्य बने । इस प्रकार उनके जीवन की यात्रा में एक नया आयाम जुड़ा।

संघ से संपर्क और प्रवेश

गुरु जी ने अपने नागपुर जीवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ के संस्थापक डा हेडगेवार के के बारे में सुन लिया था । पर संघ को समझने का बीजारोपण बनारस में ही हुआ । बनारस में उनका संपर्क भैय्याजी दाणी से हुआ । भैय्या जी दाणी नागपुर के स्वयंसेवक थे डॉ॰ हेडगेवार ने उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भेजा था । श्री गुरूजी का संपर्क उनसे बना । और गुरुजी संघ के सम्पर्क में आये । संघ की शाखा प्रारंभ हुई और उस शाखा के संघचालक गुरुजी बने। गुरुजी ने बनारस में संघ कार्य का विस्तार किया और 1937 में नागपुर वापस आ गए।
नागपुर लौटकर श्री गुरूजी को डॉ हेडगेवार का सानिध्य मिला । यह 1938 का वर्ष था । यह सानिध्य मानों राष्ट्र और संस्कृति के गौरव की रक्षा के लिये मानों प्रकृति ने नियत किया था । श्री गुरुजी ने डा हेडगेवार ने एक कुशल मार्ग दर्शक देखा तो डा हेडगेवार ने श्री गुरूजी के भीतर एक प्रेरणादायक राष्ट्र समर्पित व्यक्तित्व को देखा। और इस घड़ी के बाद श्री गुरूजी का जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन विस्तार के माध्यम से राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित हो गया । डॉ हेडगेवार के साथ निरन्तर रहते हुवे श्रीगुरूजी ने अपना सारा ध्यान संघ कार्य पर ही केंद्रित कर लिया ।

द्वितीय सरसंघचालक बने

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ के संस्थापक डॉ हेडगेवार के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव और प्रबल आत्मसंयम होने के कारण से 1939 में श्री गुरूजी को संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। 1940 में डॉ हेडगेवार अस्वस्थ हुये । काफी उपचार के बाद भी जब स्वास्थ्य सुधार न हुआ तो डा हेडगेवार ने अपने जीवन का अन्त समय जाना और उन्होंने वहाँ उपस्थित कार्यकर्ताओं के सामने श्रीगुरूजी अर्थात माधव सदाशिव गोलवलकर को संघ कार्य विस्तार का दायित्व सौप दाया । 21 जून 1940 को डाॅ हेडगेवार अनन्त में विलीन हो गए और श्री गुरूजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने । श्री गुरूजी ने देस भर की यात्राएँ की । लाहौर कश्मीर से लेकर सागर तट पर कन्याकुमारी तक यात्राएँ की । संघ कार्य का विस्तार किया और उस समय की राजनैतिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय परिस्थियों का सामना करने केलिये समाज को तैयार किया ।

भारत छोड़ो आँदोलन

इसी तैयारी के बीच 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ों आंदोलन का वातावरण बना । श्रीगुरुजी ने स्वयंसेवकों से इस आन्दोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लेने के निर्देश दिये पर कहा का संघ के बैनर का उपयोग न हो । जहाँ जिस बैनर से आंदोलन चल रहा हो उसी के नेतृत्व में भाग लिया जाये । उनके इस निर्देश के दो कारण थे । एक तो श्रीगुरुजी चाहते थे कि आंदोलन में एक रूपता रहे और दूसरा यह कि वे संघ को पूरी तरह समाज संस्कृति और राष्ट्र सेवा का निमित्त ही बनाना चाहते थे । श्रीगुरुजी की भावना के अनुरुप स्वयं सेवकों ने भारत छोड़ो आँदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बैनर का उपयोग न करके जहाँ जो बैनर सामने था उसी के अंतर्गत योगदान दिया । विदर्भ और महाकौशल के अनेक ऐसे स्थान थे जहाँ इस आंदोलन में गोली चली और स्वयं सेवकों के बलिदान हुये । विदर्भ के चंद्रपुर और महाकौशल के जबलपुर में इस आदोलन के दौरान गोली चालन से बलिदान होने वाले नौजवान संघ के स्वयं सेवक थे । इस आन्दोलन के दौरान मध्यप्रदेश के सीहोर में बंदी बनाए गये भाई उद्धवदास मेहता भोपाल राज्य के संघ चालक थे तो ग्वालियर में बंदी बनाये गये किशोर वय अटल बिहारी बाजपेई भी स्वयंसेवक थे ।

मुस्लिम लीग की सीधी कार्यवाही और भारत विभाजन का दौर

मुस्लिम लीग अपनी स्थापना के दिन से ही मुसलमानों के लिये पृथक राष्ट्र का अभियान चला रही थी । 1930 में मुस्लिम लीग ने बाकायदा पाकिस्तान का नाम और पूरी योजना ही घोषित कर दी थी । अपनी इसी योजना के अंतर्गत मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही करने की घोषणा कर दी । इस दिन मुस्लिम लीग के प्रभावी क्षेत्रों विशेषकर पंजाब और बंगाल में हिन्दुओं की हत्या का मानों ताण्डव मच गया। उस पीडित मानवता की सेवा के लिये संघ के स्वयंसेवक ही सामने आये । इस भीषण हत्याकांड के बाद एक ओर मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना यदि विभाजन के लिये जनमत बना रहे थे तो दूसरी ओर श्री गुरूजी देश भर के अपने प्रत्येक भाषण में भारत विभाजन के विरुद्ध डट कर खड़े होने के लिए जनता का आह्वान कर रहे थे । किन्तु अंग्रेज सरकार का समर्थन मुस्लिम लीग के साथ था और तत्कालीन अन्य वरिष्ठ नेता भी अखण्ड भारत के लिए लड़ने की मनः स्थिति में नहीं थे। अंततः 3 जून 1947 को भारत विभाजन की घोषणा कर दी गई। एकाएक पूरे देश का वातावरण बदल गया । इस कठिन समय में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पंजाब ही नहीं आसपास के सभी क्षेत्र के स्वयंसेवक पाकिस्तान केलिये घोषित भू भाग से हिंदुओं को सुरक्षित भारत भेजने का कार्य में लग गये । संघ का प्रयास था कि जब तक आखिरी हिन्दू सुरक्षित ना आ जाए तब तक डटे रहना है। उन कठिन दिनों में स्वयंसेवकों का अतुलनीय साहस, सेवा, समर्पण, पराक्रम, कार्यकुशलता, त्याग और बलिदान की गाथा भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखने योग्य है। श्री गुरूजी भी भारत के उसी भाग में घूमते रहे जो १५ अगस्त १९४७ को पाकिस्तान बना दिया गया था। जितना संभव हो सकी गुरूजी के मार्गदर्शन में सकी संघ के स्वयंसेवकों ने सेवा और सहायता की ।

कश्मीर के भारत में विलय में योगदान

भारत विभाजन के उस कालखंड में मुस्लिम लीग के प्रभाव वाले क्षेत्र में हिन्दुओं की सुरक्षा की जितनी बड़ी चुनौती थी उतना ही महत्वपूर्ण था उन राज्यों को भारत से जोड़ना जो सीमा पर थे । इसमें कश्मीर सबसे महत्वपूर्ण राज्य था । मोहम्मद अली जिन्ना तरह तरह के प्रलोभन और भय दिखाकर कश्मीर के राजा को अपनी ओर मिलाने का कार्य करने में लगा था । ऐसे में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल ने जम्मू-कश्मीर रियासत के दीवान मेहरचन्द महाजन से भारत के साथ विलीनीकरण करने के लिए कश्मीर-नरेश श्री हरि सिंह जी को तैयार करने के लिए कहा था। और श्री मेहरचन्द महाजन ने मध्यस्थता के लिये श्रीगुरुजी का नाम सुझाया । श्रीगुरुजी के पास संदेश भिजवाया कि वे कश्मीर-नरेश से मिलकर उन्हें विलीनीकरण के लिए तैयार करें। श्रीगुरूजी तैयार हुये । सरदार पटेल और महाजन जी के प्रयास से कश्मीर के राजा हरिसिंह और श्रीगुरुजी की भेंट की तिथि निश्चित हो गई ।
श्रीगुरुजी 17 अक्तूबर 1947 को विमान द्वारा श्रीनगर पहुँचे। भेंट 18 अक्टूबर को प्रातः हुई। भेंट के समय 15-16 वर्षीय युवराज कर्ण सिंह जांघ की हड्डी टूटने से प्लास्टर में बंधे वहीं लेटे हुए थे। श्री मेहरचन्द महाजन भी भेंट के समय उपस्थित थे। कश्मीर-नरेश का कहना था – मेरी रियासत पूरी तरह से पाकिस्तान से घिरी है । सारे रास्ते सियालकोट तथा रावलपिण्डी की ओर से है। रेल सियालकोट की ओर से है। अनेक व्यवहारिक कठिनाइयाँ हैं।
श्रीगुरुजी ने समझाया कि आप हिन्दू राजा हैं। पाकिस्तान में विलय करने से आपको और आपकी हिन्दू प्रजा को भीषण संकटों से संघर्ष करना होगा। यह ठीक है कि अभी हिन्दुस्थान से रेल के रास्ते और हवाई मार्ग का कोई सम्पर्क नहीं है, किन्तु इन सबका प्रबन्ध शीघ्र ही हो जायेगा। आपका और जम्मू-कश्मीर रियासत का भला इसी में है कि आप हिन्दुस्थान के साथ विलीनीकरण कर लें। श्री गुरूजी के समझाने पर अन्ततः कश्मीर नरेश सहमत हो गये । वे 23 अक्टूबर को दिल्ली आये और जम्मू-कश्मीर राज्य का भारतीय गणतंत्र में विलय हो गया ।

चीनी आक्रमण के समय
श्री गुरूजी की भूमिका

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया । वह समय पूरे देश के लिये क्षोभ और शोक का था । भारतीय सेना अपने सीमित साधनों से उस आक्रमण का उत्तर देने में जुट गई। पर समाज का मनोबल बढ़ाना, भारतीय सैनिकों को सहायता पहुँचाना और युद्ध प्रभावित क्षेत्र सें सेवा सहायता का काम बड़ी चुनौती का था । इन चुनौतियों से निबटने का काम संघ ने संभाला और श्रीगुरु जी के मार्गदर्शन में संघ के स्वयंसेवक सेवा सहायता के कार्य में जुट गए। उनके सामयिक सहयोग का महत्व तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू नेषभी स्वीकारा और सन् 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में के संघ के स्वयंसेवकों को भी आमंत्रण भिजवाया। संघ के तीन सौ गणवेषधारी स्वयंसेवकों का घोष की ताल पर कदम मिलाकर चलना उस दिन के कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था।

जीवन की अंतिम यात्रा

श्री गुरुजी के जीवन का समापन रांची में ही हुआ । वहाँ बिहार प्राँत के कार्यकर्ताओं के एक दो दिवसीय वर्ग का आयोजन था । वह 10-11 मार्च 1973 की तिथि थी । आयोजन में लगभग एक हजार स्वयंसेवक उपस्थित थे। कार्यक्रम में बौद्धिक दर्शन देने के बाद श्रीगुरू जी कोलकाता जाने के लिए रांची रेल्वे स्टेशन पहुंचे । कार से उतरते ही लड़खड़ा गए। और अस्वस्थ हो गये । वे लगभग तीन माह अस्वस्थ रहे । रांची का आयोजन उनके जीवन का अंतिम सार्वजनिक आयोजन था । 5 जून 1973 को वे देह त्याग कर परम ज्योति में विलीन हो गये ।

कृतियाँ एवं विचार

श्रीगुरूजी ने बंच ऑफ थॉट्स तथा वी ऑर ऑवर नेशनहुड डिफाइंड पुस्तकें लिखीं। ‘बंच ऑफ थॉट्स’ का हिन्दी में “विचार नवनीत” नाम से अनुवाद हुआ ।

उनके विचारों पर आधारित संघ द्वारा प्रकाशित “गुरूजी : दृष्टि एवं लक्ष्य” नामक पुस्तक में “हिन्दू – मातृभूमि का पुत्र” नामक एक अध्याय में लिखा है कि ‘भारतीय’ वही है जिनकी दृष्टि व्यापक है और भारतीय धर्मों के मानने वाले सभी मानते हैं कि ईश्वर एक ही है उसे पाने के मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं ।
इस प्रकार श्री माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य परम् पूज्य गुरुजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पौधे को एक विशाल वटवृक्ष का स्वरूप देकर और भारत राष्ट्र में राष्ट्र भाव प्रबल करने के लिये एक सशक्त संगठन और विचार देकर अमृत्तव को प्राप्त हुये । आज वे संसार भर में फैले लाखों करोड़ों स्वयंसेवकों श्रृद्धा और आदर्श जीवन का केन्द्र हैं।

आगरा में बढ़ता प्लास्टिक प्रदूषण: एकल-उपयोग प्लास्टिक के खिलाफ जंग की जरूरत

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आगरा, अपने ऐतिहासिक गौरव और मनमोहक वास्तुकला के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन आज यह शहर एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से जूझ रहा है। पॉलीथीन, PVC, छोटी प्लास्टिक की बोतलें और 100-200 ग्राम के पाउच जैसे एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के अंधाधुंध इस्तेमाल ने शहर की जल निकासी और सीवर प्रणाली को अवरुद्ध कर दिया है। यह समस्या न केवल शहर की सुंदरता को धूमिल कर रही है, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन गई है।

हर साल, लाखों एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद कुछ ही मिनटों के इस्तेमाल के बाद कचरे में तब्दील हो जाते हैं। ये उत्पाद सामाजिक समारोहों, शादियों और धार्मिक आयोजनों में सुविधाजनक लग सकते हैं, लेकिन इनका पर्यावरण पर होने वाला प्रभाव बेहद विनाशकारी है। ये प्लास्टिक उत्पाद न केवल हमारे प्राकृतिक परिदृश्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।

आगरा की सड़कों, पार्कों और नदियों में प्लास्टिक कचरे के ढेर दिखाई देते हैं। यह नज़ारा न केवल शहर की छवि को खराब करता है, बल्कि यह हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का भी अपमान है। प्लास्टिक कचरा कीटों को आकर्षित करता है, जो बीमारियों को फैलाने का कारण बनता है। इसके अलावा, यह वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।

एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद बायोडिग्रेडेबल नहीं होते। ये समय के साथ माइक्रोप्लास्टिक में टूट जाते हैं और हमारी मिट्टी और जल स्रोतों में मिल जाते हैं। इससे न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है, बल्कि यह हमारे खाद्य श्रृंखला में भी प्रवेश कर जाता है। शोध के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक मानव शरीर में प्रवेश करके श्वसन संबंधी समस्याएं और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है।

प्लास्टिक कचरा शहर के बुनियादी ढांचे को भी प्रभावित कर रहा है। नालियों और सीवर लाइनों का अवरुद्ध होना आम बात हो गई है, जिससे मानसून के मौसम में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। नगर निगम को इन नालियों को साफ करने और कचरा प्रबंधन में भारी मात्रा में संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। अगर इस समस्या पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो यह शहर के विकास और स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव डालेगा।

इस समस्या से निपटने के लिए एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है। पॉलीथीन बैग, छोटी पानी की बोतलें और 200 ग्राम से कम वजन वाले पाउच जैसे उत्पादों के बजाय पुन: प्रयोज्य विकल्पों को अपनाने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर, केवल 2 किलोग्राम की पानी की बोतलों को ही अनुमति दी जाए। इससे न केवल प्लास्टिक कचरा कम होगा, बल्कि नागरिकों में स्थिरता की संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा।

इस लड़ाई में सभी हितधारकों की भागीदारी जरूरी है। विक्रेताओं, इवेंट प्लानर्स और धार्मिक संगठनों को पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शैक्षिक अभियानों के माध्यम से लोगों को प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना होगा। साथ ही, सरकार को कड़े नियम लागू करने और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

आगरा के निवासियों का स्वास्थ्य, शहर का बुनियादी ढांचा और इसकी सुंदरता आज हमारे द्वारा किए गए विकल्पों पर निर्भर करती है। एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक के अभिशाप को खत्म करने के लिए हमें सामूहिक रूप से काम करना होगा। आइए, हम सभी मिलकर भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वच्छ, हरियाली भरा और टिकाऊ आगरा बनाने का संकल्प लें।

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