अमर बलिदानी सोहनलाल पाठक

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गिरीश सक्सेना

भारत की स्वतन्त्रता के लिए देश ही नहीं विदेशों में भी प्रयत्न करते हुए अनेक वीरों ने बलिदान दिये हैं। सोहनलाल पाठक इन्हीं में से एक थे। उनका जन्म पंजाब के अमृतसर जिले के पट्टी गाँव में सात जनवरी, 1883 को श्री चंदाराम के घर में हुआ था। पढ़ने में तेज होने के कारण उन्हें कक्षा पाँच से मिडिल तक छात्रवृत्ति मिली थी। मिडिल उत्तीर्ण कर उन्होंने नहर विभाग में नौकरी कर ली। फिर और पढ़ने की इच्छा हुई, तो नौकरी छोड़ दी। नार्मल परीक्षा उत्तीर्ण कर वे लाहौर के डी.ए.वी. हाईस्कूल में पढ़ाने लगे।

एक बार विद्यालय में जमालुद्दीन खलीफा नामक निरीक्षक आया। उसने बच्चों से कोई गीत सुनवाने को कहा। देश और धर्म के प्रेमी पाठक जी ने एक छात्र से वीर हकीकत के बलिदान वाला गीत सुनवा दिया। इससे वह बहुत नाराज हुआ। इन्हीं दिनों पाठक जी का सम्पर्क स्वतन्त्रता सेनानी लाला हरदयाल से हुआ। वे उनसे प्रायः मिलने लगे। इस पर विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उनसे कहा कि यदि वे हरदयाल जी से सम्पर्क रखेंगे, तो उन्हें निकाल दिया जाएगा। यह वातावरण देखकर उन्होंने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।

जब लाला लाजपतराय जी को यह पता लगा, तो उन्होंने सोहनलाल पाठक को ब्रह्मचारी आश्रम में नियुक्ति दे दी। पाठक जी के एक मित्र सरदार ज्ञानसिंह बैंकाक में थे। उन्होंने किराया भेजकर पाठक जी को भी वहीं बुला लिया। दोनों मिलकर वहाँ भारत की स्वतन्त्रता की अलख जगाने लगे; पर वहाँ की सरकार अंग्रेजों को नाराज नहीं करना चाहती थी, अतः पाठक जी अमरीका जाकर गदर पार्टी में काम करने लगे। इससे पूर्व वे हांगकांग गये तथा वहाँ एक विद्यालय में काम किया। विद्यालय में पढ़ाते हुए भी वे छात्रों के बीच प्रायः देश की स्वतन्त्रता की बातें करते रहते थे।

हांगकांग से वे मनीला चले गये और वहाँ बन्दूक चलाना सीखा। अमरीका में वे लाला हरदयाल और भाई परमानन्द के साथ काम करते थे। एक बार दल के निर्णय के अनुसार उन्हें बर्मा होकर भारत लौटने को कहा गया। बैंकाक आकर उन्होंने सरदार बुढ्डा सिंह और बाबू अमरसिंह के साथ सैनिक छावनियों में सम्पर्क किया। वे भारतीय सैनिकों से कहते थे कि जान ही देनी है, तो अपने देश के लिए दो। जिन्होंने हमें गुलाम बनाया है, जो हमारे देश के नागरिकों पर अत्याचार कर रहे हैं, उनके लिए प्राण क्यों देते हो ? इससे छावनियों का वातावरण बदलने लगा।

पाठक जी ने स्याम में पक्कों नामक स्थान पर एक सम्मेलन बुलाया। वहां से एक कार्यकर्ता को उन्होंने चीन के चिपिनटन नामक स्थान पर भेजा, जहाँ जर्मन अधिकारी 200 भारतीय सैनिकों को बर्मा पर आक्रमण के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे। पाठक जी वस्तुतः किसी गुप्त एवं लम्बी योजना पर काम कर रहे थे; पर एक मुखबिर ने उन्हें पकड़वा दिया। उस समय उनके पास तीन रिवाल्वर तथा 250 कारतूस थे। उन्हें मांडले जेल भेज दिया गया। स्वाभिमानी पाठक जी जेल में बड़े से बड़े अधिकारी के आने पर भी खड़े नहीं होते थे।

यद्यपि उन्होंने किसी को मारा नहीं था; पर शासन विरोधी साहित्य छापने तथा विद्रोह भड़काने के आरोप में उन पर मुकदमा चला। उनके साथ पकड़े गये मुस्तफा हुसैन, अमरसिंह, अली अहमद सादिक तथा रामरक्खा को कालेपानी की सजा दी गयी; पर पाठक जी को सबसे खतरनाक समझकर 10 फरवरी, 1916 को मातृभूमि से दूर बर्मा की मांडले जेल में फाँसी दे दी गयी।

मिल्कीपुर विजय से भाजपा को राहत व सपा की राह कठिन

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जून 2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद सबसे अधिक चर्चा फैजाबाद संसदीय क्षेत्र में भाजपा की पराजय की हुई, जहाँ श्री रामजन्मभूमि पर दिव्य, भव्य राम मंदिर का हिन्दू समाज का 500 वर्ष पुराना सपना पूरा होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। फैजाबाद जीत से विपक्ष का आत्मविश्वास इतना बढ़ गया कि इसके बाद हुई अपनी गुजरात रैली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने, भाजपा के राजनीति से विश्राम ले चुके वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जी के राम मंदिर आंदोलन को ही हरा देने का दंभ भरा। लोकसभा में सपा सांसद अवधेश प्रसाद की तो मानो प्रदर्शनी लगा दी गई बड़बोले नेताओं ने उनको अयोध्या का रजा तक कह दिया।

फैजाबाद संसदीय सीट की हार और अवधेश प्रसाद को अयोध्या का राजा कहे जाने से सनातन समाज में दुःख, निराशा और क्षोभ था। मिल्कीपुर को सनातनी हिन्दुओं ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था क्योंकि सनातनधर्मी प्रभु राम को ही अयोध्या का एकमात्र राजा मानते हैं । यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि जब से सपा मुखिया और कांग्रेस ने अवधेश प्रसाद को अयोध्या का राजा कहना आरम्भ किया तभी से इनकी राजनीति गड़बड़ाने लगी।अब तक प्रदेश में 11 विधानसभा उपचुनाव हो चुके हैं जिसमें भाजपा को आठ सीटों पर सफलता मिली है और प्रदेश में सपा ओैर कांग्रेस गठबंधन भी बिखर रहा है।

राजनैतिक दल के रूप में भाजपा ने मिल्कीपुर चुनाव जीतने के लिए बेहद आक्रामक रणनीति तैयार की और स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार मिल्कीपुर का दौरा किया। जब योगी जी मिल्कीपुर जाते थे तब सपा सांसद का बयान आता था कि योगी जी जितनी बार मिल्कीपुर आयेंगे भाजपा का वोट प्रतिशत उतना ही घटेगा और सपा का उतना ही वोट प्रतिशत बढ़ता जायेगा जबकि परिणाम उसके विपरीत आये हैं । मिल्कीपुर की जनता के बता दिया है कि अयोध्या के एकमात्र राजा प्रभु राम ही है।

मिल्कीपुर की जनता ने विपक्ष के नकारात्मक विचारों के एजेंडे को नकारते हुए विकास और सुशासन का साथ दिया। मिल्कीपर की जनता को अच्छी तरह से समझ में आ गया कि स्थानीय विकास के लिए सत्तारूढ़ भाजपा का विधायक ही आवश्यक है । मिल्कीपुर की जनता ने सपा के परिवारवाद और जातिवाद को नकार दिया है। परिणाम से यह भी साफ हो गया है कि योगी का बटेंगे तो कटेंगे का नारा जातिवाद के विरुद्व हिंदुत्व की राजनीति को ताकत दे रहा है। इस विजय से भाजपा के लिए एकजुट हिंदुत्व की राजनीति के पथ पर आगे बढ़ना आसान हो गया है।

मिल्कीपुर सीट पर भाजपा को तीसरी बार जीत मिली है ।इससे पहले 1991 और 2017 में जीत मिली और अब 2025 में चंद्रभानु पासवान ने सपा के गढ़ में भगवा परचम लहराने में सफलता हासिल की है।मिल्कीपुर सीट का गठन 1967 में हुआ था और 1969 में तत्कालीन जनसंघ हरिनाथ तिवारी विधायक चुने गये थे।इसके बाद 1974 से 1989 तक यह विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का अभेद्य किला बन गया।1991 में राम लहर में मथुरा प्रसाद तिवारी ने भाजपा से जीत दर्ज की फिर 2012 तक यहां पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 2017 में मोदी लहर में भाजपा के बाबा गोरखनाथ विजयी रहे। यह अलग बात है कि इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के अवधेश प्रसाद ने बाबा को पराजित किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अवधेश प्रसाद को अपना उम्मीदवाबर बनाया था और वह जीत गये। तभी से भाजपा पर लगातार दबाव बनता जा रहा था कि किसी न सिकी प्रकार से यह सीट हर हाल में जीतकर दिखानी है और योगी जी की टीम ने यह काम कर दिखाया है।

मिल्कीपुर चुनाव से पूर्व प्रयागराज महाकुम्भ -2025 में योगी कैबिनेट ने एक साथ गंगा में पवित्र डुबकी लगाकर मीडिया जगत और जनमानस में इस बात का संदेह पूरी तरह से दूर कर दिया कि योगी कैबिनेट व भाजपा में आपस में कोई मतभेद व मनभेद है। मिल्कीपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा भदरसा दुष्कर्म कांड के बहाने सपा पर हमलावर रही। चुनावों के बीच ही वहां पर एक बालिका के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या का एक मामला सामने आया उसके बाद विपक्षी दलों ने भाजपा को घेरने का असफल प्रयास किया। इस घटना को लेकर सभी दलों के नेताओं ने सोशल मीडिया पोस्ट करके राजनीतिक तापमान को गरमाने का असफल प्रयास किया था किंतु आरोपियों के पकड़े जाते ही यह मामला अपने आप गायब हो गया। इस प्रकरण में अवधेश प्रसाद के आंसू भी निकले और खूब निकले यहां तक की मीडिया में बार- बार दिखाया भी गया, मतदान के दिन अवधेश प्रसाद ने एक वीडियो बनवाकर चलवाया जिसमें वह हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे, किन्तु ऐसी कोई भी ट्रिक इस चुनाव में नहीं चली। मिल्कीपुर की जनता ने इस बार लोकसभा की गलती को ठीक करने का मन बना लिया था ।

मिल्कीपुर में अबकी बार संघ ने भी काम संभाला और मजबूत किलेबंदी के साथ हर बूथ पर संघ के पदाधिकारी मोर्चा पर डटे रहे। इसका असर मतदान के दिन दिखा भी। संघ ने मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में पर्याप्त श्रम किया। मिल्कीपुर जीत से भाजपा का विश्वास बढ़ा है, योगी जी की प्रतिष्ठा बढ़ी है और उनके नारे की लोकप्रियता भी बढ़ रही है। महाकुंभ- 2025 के समापन के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री येगी आदित्यनाथ जी का एक नया अवतार देखने को मिल सकता है। हिंदुत्व की राजनीति में काशी, मथुरा के साथ संभल का अध्याय भी जुड़ चुका है।

हथकड़ियां-बेड़ियां युक्त मास डिपोर्टिंग अमानवीय है

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आचार्य श्रीहरि

डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सैनिक विमान में हथकड़ियां और बेडियां पहना कर अवैध घुसपैठियों को भारत डिपोर्ट कर दिया। इससे पूर्व कई अन्य देशों के घुसपैठियों के साथ भी अमेरिका ने इसी तरह की कार्रवाइयां की हैं। ये कारवाईयां घोर अमानवीय है। पर मानवाधिकार का हनन है कि नहीं इस पर एकतरफा नहीं बल्कि संपूर्ण मंथन की जरूरत है। क्योंकि भारत मे हथकड़ियों और बेडियों युक्त डिपोर्टिंग नीति का घोर विरोध हुआ है, संसद बाधित हुई है और विपक्षी राजनीतिक पार्टियां गुस्से में हैं, वे इसके लिए नरेन्द्र मोदी की आलोचना कर रहे हैं और नरेन्द्र मोदी विश्व शक्ति के कथित गर्व की खिल्ली भी उडा रहे हैं। क्या हमें भारतीयों को अवैध घुसपैठिये बनने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए? हमें भारतीयो को अवैध घुसपैठिये बनने के लिए कतई प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। मुस्लिम देश, चीन और उत्तर कोरिया जैसे हिंसक देश तो अवैध घुसपैठिये को जेलों में प्रताड़ना का शिकार बना कर मार भी देते हैं। दुनिया में सिर्फ भारत ही एक मात्र देश है जो अवैध घुसपैठियो को सभी प्रकार की मानवीय और नागरिक सुविधाएं देकर आत्मघात करता है।

हथकड़ियों और बेड़िया युक्त डिपोर्टिंग के शिकार भारतीय कौन लोग हैं? क्या ये निर्दोष थे? क्या ये घुसपैठिये नहीं थे? निश्चित तौर पर ये घुसपैठिये थे और अवैध घुसपैठिये अपराधी ही होते हैं। कानूनी तौर पर अमेरिका इन्हें कठिन सजा देने का अधिकार रखता है। अवैध घुसपैठिये किस तरह अमेरिका में पहुंचे थे उस पर ध्यान रखना चाहिए। ये एजेंट के माध्यम से अमेरिका पहुंचे थे। एजेंट को करोड़ो रूपये दिये थे, कई देशों की जगली सरहदें पार कर अमेरिका में पहुंचे थे जहां पर अमेरिकी पुलिस के हत्थे चढ गये थे। कोई शरण की गारंटी नही, कोई रोजगार की गारंटी नहीं, पास में कोई ढंग की शैक्षणिक और विशेषज्ञता की डिग्री नहीं फिर भी अमेरिका की चमकीली समृद्धि को लूटने चले गये। मूर्खता में भारतीय कभी अमेरिका तो कभी रूस और कभी इस्राइल जाकर युद्ध के शिकार भी होते हैं और आरोप भारत सरकार झेलती है, परेशानी भारत सरकार झेलती है।

अभी तो ये सिर्फ झलकी भर है। बहुत बडा मानवाधिकार संकट खडा हुआ है। लगभग दो करोड़ की आबादी को अमेरिका डिपोर्ट करने वाला है। ये दो करोड की आबादी बेमौत मरने के लिए विवश होगी, क्योंकि ये दो करोड आबादी अमेरिका में अपना सबुकछ छोड़कर अपने पूर्व देश को लौटेगी जहां पर उन्हें भूख और बेकारी सहित अन्य समस्याओं से जूझना पडेगा। मास डिपोर्ट की नीति लागू होते ही राष्ट्रवादियों की बाहें खिल गयी है और वे बले-बले कर रहे हैं जबकि गैर राष्ट्रवादियों की गर्दन झूक गयी है, उनकी जबान पर गुस्सा है और डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ अनाप-शनाप बोल रहे हैं, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि अमेरिकी जनता की भी खिंचाई कर रहे हैं, आलोचना का शिकार बना रहे हैं, इस पक्ष का कहना है कि अमेरिका की जनता ने विध्वंसक-संहारक डोनाल्ड ट्रम्प को राष्ट्रपति चुनकर दुनिया के लिए नयी समस्याएं उत्पन्न की है।

डोनाल्ड ट्रम्प का अभियान अवैध शरणार्थी मुक्त अमरिका बनाने का है। अमेरिका को अवैध शरणार्थी मुक्त बनाने की अभियान के खिलाफ मानवाधिकार संगठनों के साथ ही साथ अमेरिका की डेमोक्रेट पार्टी भी है, डेमोक्रेट पार्टी मानवाधिकार के नाम पर अवैध शरणार्थियों का समर्थन करती है और उन पर उदारता का भाव भी रखती है। लेकिन राष्ट्रपति चुनावों में डेमोकेट पार्टी की करारी हार के बाद अवैघ शरणार्थियों का समर्थन अमरिका के अंदर में बहुत ही सीमित हो गया है। ऐेसे भी डोनाल्ड ट्रम्प अपने लक्ष्य और अभियान के प्रति बहुत ही जिद्दी और जुनूनी होते हैं, उन्हें कोई भी आलोचना से न तो डर होता है न ही उनके अभियान में रूकावटें आती हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प अवैध शरणार्थियों के प्रति इतने गुस्से में क्यों हैं और अवैध शरणार्थियों को निकालने के लिए सभी हदें क्यों पार करना चाहते हैं? क्या सही में अवैध शरणार्थी अमेरिका की आर्थिक अर्थव्यवस्था के लिए संकट हैं, क्या अवैध शरणार्थी सही में अमेिरका के हितों के लिए नकरात्मक हैं, क्या सही में अवैध शरणार्थी अमेरिका की आतंरिक सुरक्षा ही नहीं बल्कि वाह्य सुरक्षा के लिए भी खतरे की घंटी है? क्या सही में अवैध शरणाथी अपराध, बलात्कार और अन्य अस्वीकार कार्यो मे लिप्त है? सबसे बडी बात यह है कि अवैध शरणार्थी कितने है और उनकी राष्ट्रीयताएं क्या-क्या है? अमेरिका की वर्तमान आबादी लगभग 35 करोड है। आबादी के हिसाब से दुनिया का तीसरा बडा देश है अमेरिका। आबादी के हिसाब से भारत दुनिया का सबसे बडा देश है जबकि चीन का स्थान दूसरा है। 35 करोड की कुल आबादी में एक करोड से ज्यादा अवैध शरणार्थी हैं। कहने का अर्थ यह है कि अमरिका का हर 35 वां आदमी अवैघ शरणार्थी हैं। जिनके पास अमरिका में आने और बसने का कोई वैध काबजात नहीं हैं, वे अमेंरिका के अंदर कैसे प्रवेश किये, इसका भी कोई लेखा’जोखा नहीं हैं। लैटिन अमेरिकी सीमा से अवैध शरणार्थी अमरिका में प्रवेश करते हैं और अमेरिका के लिए काल बन जाते हैं।

अवैध शरणार्थियों के कितने अधिकार होते हैं। शरणार्थियों के अधिकार होते हैं। पर अवैध शरणार्थियेां के अधिकार नहीं होते हैं, उनके पास सिर्फ दया होती है, करूणा और सहानुभूति होती है। जिस देश में अवैध शरणार्थी बने हैं, बलपूर्वक घुसपैठ किया है उस देश की इच्छा होगी तो फिर वह देश ऐसे समूह को शरणार्थी की सुविधा उपलब्ध करा सकता है, अपने नागरिक अधिकार उसे दे सकता है। सभ्य और मानवता पंसद देश ऐसा करते भी हैं। खासकर यूरोपीय देश ऐसे शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोलते रहे हैं। अमेरिका भी अपने यहां ऐसे शरणार्थियों को शरण देने का काम किया है। लेकिन अमेरिका का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। अमेरिका के उपर भी आबादी का दबाव बढ रहा है। आबादी के अनुपात में अेमेरिका दुनिया का तीसरा बडा देश है। फिर एक करोड से अधिक अवैध शरणाथियों को संभालना कितना कठिन कार्य है, यह भी उल्लेखनीय है। एक करोड से अधिक अवैध शरणार्थियों की भीड अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बूरी तरह से प्रभावित कर रही है। अमेरिकी नागरिकों के लिए सुविधाएं बहुत सीमित होती जा रही हैं।

सबसे उल्लेखनीय है भस्मासुर बन जाना। अवैध प्रवासी अमरिका के लिए भस्मासुर बन गये हैं। ये अपराध की दुनिया में सक्रिय रहते हैं। सडकों को लूट और हत्या का घर बना देना इनका कार्य होता है, आवासीय क्षेत्रों को अपराध और गद्रगी का ढेर बना डाला। बलात्कार और छेडछाड जैसी घटनाएं तो आम बात हो गयी है। अभी-अभी एक हजार से अधिक जिन अवैध शरणार्थियों को पकडा गया है वे दुर्दांत अपराधी रहे हैं और उनके कारनामे बहुत ही लामहर्षक हैं। सबसे बडी बात यह है कि डॉक्टर, इजीनियर और वैज्ञानिक सहित सूचना तकनीक के क्षेत्र में अवैध घुसपैइिये बहुत ही कम है। फिर अवैध घुसपैठिये है कौन और उनकी श्रेणियां क्या-क्या है? अधिकतर घुसपैठिये अनपढ हैं, मजदूर है, अप्रशिक्षित है और तस्कर भी होते हैं। ऐसी श्रेणियों के अवैध घुसपैठियों को रोजगार मिलना आसान नहीं होता है, अमेरिका में प्रशिक्षित मजदूरों को रोजगार मिलता है, काम मिलता है, अप्रशिक्षित लोग मशीन को हैंडिल तक नहीं कर पाते हैं। फिर अवैध शरणार्थियों की आजीविका कैसे चलेगी, उन्हें रहने के लिए आवास और पेट भरने के लिए पैसे कहां से अर्जित होगे? फिर इन्ही कारणों से अवैध धुसपैठिये अपराध की दुनिया में कुख्यात हो जाते हैं और अमेरिका की आतंरिक शांति के दुश्मन बन जाते हैं।

राजनीति भी एक कारण है। जिस प्रकार से बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिये भारत में अपनी राजनीतिक शक्ति हासिल कर चुके हैं, भाजपा विरोधी राजनीतिक शक्ति के हथकंडे बन गये हैं उसी प्रकार से अमरिका में भी अवैध शरणार्थी डेमोक्रेट पाटी के वोटर बन जाते हैं और हथकंडा बन जाते हैं। भाजपा की तरह अमेरिका में रिपल्किन पार्टी राष्ट्रवादी पार्टी मानी जाती है और उसकी समझ यह है कि अवैध शरणार्थी अमेरिका की राष्ट्रीय अस्मिता की कब्र खोदते हैं और अपनी संहारक व घृणित संस्कृति हम पर लादना चाहते हैं। चूंकि अधिकतर अवैध शरणार्थी मुस्लिम हैं, इसलिए मुस्लिम आतंक की भी समस्या है। मुस्लिम जहां भी होते हैं वहां की मूल संस्कृति का दोहण और संहार करते हैं। मजहबी शासन की माग करना उनका लक्ष्य होता है। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर मुस्लिम आतंकी हमला भी कुचर्चित रहा है और अमेरिकी अस्मिता पर हमला के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि राष्ट्रवादियों और खासकर मुस्लिम अवैध शरणार्थियों के बीच मे तनातनी होती है। डोनाल्ड ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से आने वाले नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था। कहने का अर्थ यह है कि डोनाल्ड ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी मुस्लिम शरणार्थियों को लेकर आगबबूला थे और इस काल में भी मुस्लिम अवैध घुसपैठियों के साथ ही साथ संपूर्ण शरणार्थी प्रश्न पर कठिन नीति अपनायेंगे।

अवैध शरणार्थियो को रोकने के लिए कठिन कार्य भी शुरू हो चुका है। खासकर अपनी सीमा को सुरक्षित बनाने की नीति महत्वपूर्ण हुई है। अमेरिका में अवैध घुसपैठ का सर्वाधिक रास्ता मैक्सिकों की सीमा से बनता है। मैक्सिकों की सीमा पर तार की बांउड्री खडी होनी शुरू हो गयी है, वेनेजुएला की सीमा पर भी सख्ती जारी है। वेनेजुएला में कभी कम्युनिस्ट तानाशाही थी। कम्युनिस्ट तानाशाही ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था का विध्वंस कर दिया। वेनेजुएला दिवालिया हो गया। यहां की आबादी भूख और बेकारी से तबाह हो गयी।वेनेजुएला की एक बडी आबादी अपने पडोसी देशो में घुसपैठ कर गयी। वेनेजुएला के रास्ते अमेरिका में बडे पैमाने पर घुसपैठ होता है। अमरिका ने अपनी मैक्सिकों और वेनेजुएला सहित अन्य सीमाओं पर तार की दीवार खडी करने और पक्की दीवारे भी खडी कर रहा है। हमें भारतीयों को अवैध सुसपैठिये बनने के लिए कतई प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए।

विद्यार्थियों की ‘मुछों वाली माँ’ गिजुभाई बधे के शैक्षणिक चिंतन द्वारा आत्मनिर्भरता के नवाचार प्रयोग

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समीर कौशिक

गिजुभाई बधे (1885-1938) भारतीय शिक्षा के एक महान सुधारक और शैक्षिक विचारक थे। वे बच्चों की शिक्षा और उनके मानसिक विकास को समझने में अग्रणी विद्वान थे । गिजुभाई का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों की प्राकृतिक क्षमताओं का विकास करना है, ताकि वे जीवन में खुश और सफल बन सकें। उनका शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण आज भी शिक्षकों और शिक्षा नीतियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

गिजुभाई का जन्म 1885 में गुजरात राज्य के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम गिजुभाई बधे था। गिजुभाई ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव में प्राप्त की और फिर उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। वहाँ उन्होंने वेस्ले कॉलेज और बाद में सेंट्रल स्कूल ऑफ एजुकेशन से शिक्षा ली। शिक्षा में गिजुभाई की रुचि ने उन्हें भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया।

गिजुभाई ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा देने हेतु नूतन प्रयास किये । उनका मानना था कि शिक्षा केवल पुस्तक ज्ञान तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों की मानसिक और भावनात्मक विकास की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। उन्होंने कई ऐसे महत्वपूर्ण पक्षों पर ध्यान केंद्रित किया, जो उस समय के पारंपरिक शिक्षा ढांचे में नजरअंदाज किए जाते थे।

बच्चों की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को समझने हेतु गिजुभाई का कहना था कि बच्चों के विकास में उनकी स्वाभाविक और मानसिक स्थिति महत्वपूर्ण होती है। इसलिए बच्चों के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार किया जाना चाहिए, जहाँ वे अपनी रुचियों और क्षमताओं को पहचान सकें। बच्चों से अत्यधिक वात्सल्यता एवं ममत्व के चलते उन्हें मुछों वाली माँ के नाम से भी जाना जाता है ।

शिक्षा में रचनात्मकता और आनंद ही उनका उद्देश्य रहा है, गिजुभाई ने शिक्षा को केवल बोझ नहीं, बल्कि एक आनंदमयी अनुभव बनाने पर जोर दिया। उनका मानना था कि बच्चों को खेल, कला, संगीत और रचनात्मक कार्यों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए।

गाँधी जी के साथ शिक्षा के सुधार की दिशा में कार्य किया गिजुभाई का गहरा संबंध महात्मा गांधी से था। उन्होंने गांधीजी के शिक्षा के सिद्धांतों को अपना आधार बनाया, जिसमें ‘नैतिक शिक्षा’, ‘सार्वजनिक कार्यों में भागीदारी’ और ‘स्वदेशी शिक्षा’ की बात की जाती थी।

गिजुभाई द्वारा स्थापित “नवजीवन विद्यालय” की स्थापना उन्होंने ने अहमदाबाद में की । यहाँ पर बच्चों को केवल किताबों से नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक अनुभवों प्रयोगों एवं नवाचारों से शिक्षा दी जाती थी। यह विद्यालय भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक क्रांतिकारी कदम था।

इस हेतु उन्होंने अपने शैक्षिक जीवन अनुभव नवाचारों को पुस्तकें और लेख के रूप में संग्रहित भी किया, जो शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माने जाते हैं जिनमे कुछ की चर्चा तत्व रूप में हम करेंगे ।

अपने लेख एवं पुस्तकों के माध्यम से गिजुभाई ने बच्चों के साथ संवाद करने के विभिन्न तरीकों पर प्रकाश डाला और उन्हें समझने की दिशा में मार्गदर्शन किया। साथ ही मानसिक और नैतिक विकास के विषय मे बात की और उनकी शिक्षा में सुधार के तरीकों और बच्चों के साथ सही व्यवहार पर जोर दिया है उनकी मुख्य कृति ‘दिवास्वप्न’, “प्राथमिक विद्यालय की शिक्षा पद्धतियां” , “धर्मात्माओं नाँ चरित्र चित्रण”, आदि शिक्षण क्षेत्र में उच्चतम स्थान पर ग्रँथ स्वरूप सम्मानित हैं ।

उन्होंने बच्चों की शिक्षा को जीवन के उद्देश्य से जोड़ा, और शिक्षा को केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित रखने की बजाय इसे एक समग्र अनुभव बनाने का प्रयास किया। उनके विचार और कार्य आज भी भारतीय शिक्षा के सुधार में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

गिजुभाई की शिक्षा की परिभाषा ने न केवल भारत में, बल्कि अखिल विश्व में शिक्षा के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। वे हमेशा यह मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला सिखाना है। गिजुभाई बधे का जीवन और उनका शैक्षिक कार्य भारतीय शिक्षा के इतिहास में मील का पत्थर है। उनके दृष्टिकोण ने बच्चों के लिए एक ऐसे शैक्षिक वातावरण की स्थापना की, जो उनकी रचनात्मकता, मानसिकता और भावनाओं का सम्मान करता था। उनकी शिक्षाएँ और विचार आज भी बच्चों के विकास और शिक्षा के सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

“नवजीवन विद्यालय” की स्थापना और गिजुभाई का शैक्षिक दृष्टिकोण भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव का संकेत था। जिसने भारतीय शिक्षा को एक नई दिशा दी और बच्चों को अधिक सृजनात्मकता और समग्र शिक्षा की ओर अग्रसर किया।

गिजुभाई के जीवन की मुख्य शैक्षिक घटना थी उनके द्वारा ‘नवजीवन विद्यालय’ की स्थापना 1920 में अहमदाबाद में की और उस विद्यालय में उन्होंने जो शिक्षा के नये दृष्टिकोण को लागू किया , यह घटना गिजुभाई के शैक्षिक दृष्टिकोण का सबसे बड़ा उदाहरण है और उनकी जीवन यात्रा में एक महत्वपूर्ण साबित हुई।

नवजीवन विद्यालय की स्थापना का उद्देश्य पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से हटकर बच्चों को एक नया और जीवन से जुड़ा हुआ शिक्षा अनुभव देना था। यहाँ पर बच्चों को केवल पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों, कला, खेल, संगीत और रचनात्मकता के माध्यम से शिक्षा दी जाती थी।

इस विद्यालय में गिजुभाई ने बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास को एकीकृत रूप से देखा। उनका मानना था कि शिक्षा केवल जानकारी तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह बच्चों की स्वाभाविक क्षमताओं को भी प्रोत्साहित करनी चाहिए।

शिक्षा के प्रति गिजुभाई के अपने दृष्टिकोण से शिक्षा में बच्चों की स्वतंत्रता और उनकी रुचियों का सम्मान करते हुए, उन्हें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी। “नवजीवन विद्यालय” ने यह सिद्ध किया कि अगर बच्चों को एक अनुकूल और उत्साहवर्धक वातावरण मिलता है, तो वे अपनी क्षमताओं को पूरी तरह से पहचान सकते हैं और अपने ज्ञान को जीवन में लागू कर सकते हैं।

इस विद्यालय में गिजुभाई का योगदान यह था कि उन्होंने बच्चों को एक आत्ममूल्य और आत्मनिर्भरता का अनुभव कराया, जो भारतीय शिक्षा के पारंपरिक दृष्टिकोण से पूरी तरह भिन्न था।

गिजुभाई बालकेंद्रीक शिक्षा के प्रणेता थे। उन्होंने शिक्षा में नवाचारों को लागू करने के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। गिजुभाई वैसे तो नवाचारों के समुन्द्र हैं परन्तु उनके आत्मनिर्भरता के कुछ प्रमुख नवाचार प्रयोग हम सांकेतिक रूप से समझने का प्रयास करेंगे ।
गिजुभाई ने बच्चों को आत्मनिर्भर बनने के लिए स्वतंत्र कार्यों की ओर प्रोत्साहित किया। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने कार्यों और समस्याओं का समाधान स्वयं करने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनके आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि हो।

उन्होंने बच्चों को प्राकृतिक साधनों और संसाधनों का उपयोग करके शिक्षा में नवाचार करने के लिए प्रेरित किया। उदाहरण स्वरूप, उन्होंने विद्यालयों में कागज, लकड़ी, मिट्टी, और अन्य साधारण सामग्री से बच्चों के लिए गतिविधियाँ विकसित की, जो उनके रचनात्मक कौशल को बढ़ावा देती थीं। आत्मनिर्भरता के लिए गिजुभाई ने कला और शिल्प कार्यों को शिक्षा का हिस्सा बनाया, ताकि बच्चें अपने हाथों से कुछ निर्माण कर सकें और आत्मनिर्भरता का अनुभव कर सकें। यह बच्चों को आत्मविश्वास और सृजनात्मकता के साथ-साथ जीवन में उपयोगी कौशल भी सिखाता था। भाषा शिक्षा से नवाचार हेतु गिजुभाई ने बच्चों को अपनी भाषा में संवाद करने का अवसर दिया। उन्होंने बच्चों को अपनी बात को स्पष्ट और आत्मविश्वास से व्यक्त करने की प्रक्रिया सिखाई, जो विद्यार्थियों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाला है । समाज में योगदान एवं सामाजिक सहभागिता समरसता हेतु गिजुभाई का मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व को भी समझाना है। इसलिए, उन्होंने बच्चों को समाज के प्रति जागरूक किया और यह सिखाया कि वे समाज में किस प्रकार योगदान दे सकते हैं।

गिजुभाई के ये कुछ मुख्य नवाचार, शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम थे जो बच्चों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते रहे हैं और आज भी वर्तमान पीढ़ी के शिक्षकों विद्यार्थियों एवं समाज के किसी भी वर्ग हेतु प्रेरणा पुंज हैं ।

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