नेपाल का टिकटॉक विद्रोह: अमेरिका की साजिश से राहुल की लंकावी छुट्टी तक – सबक सिखाने की होड़

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तृप्ति शुक्ला

काठमांडू : नेपाल की सरकार ने अमेरिकी सोशल मीडिया ऐप्स को बैन कर दिया लेकिन चाइनीज ऐप्स को बैन नहीं किया क्योंकि चाइनीज ऐप्स ने कथित तौर पर उनकी सरकार की गाइडलाइंस मान लीं लेकिन अमेरिकी ऐप्स ने नहीं मानीं।

और इससे खफा Gen Z ने चाइनीज ऐप्स (खासतौर से टिकटॉक) के माध्यम से कम्यूनिकेट करके, अमेरिकी ऐप्स वापस लाने के लिए इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया।

कहा ये जा रहा है कि चाइनीज टिकटॉक पर प्रो अमेरिकी ये आंदोलन अमेरिका ने ही खड़ा करवाया है, क्योंकि अरब स्प्रिंग से लेकर बांग्लादेश तक अमेरिका की इसमें मास्टरी रही है।
कहा ये भी जा रहा है कि अमेरिका SCO के बहाने हुए हालिया फोटो-ऑप की खुन्नस में चीन को सबक सिखाना चाहता था, इसीलिए वो ये कर रहा है।

और कहा ये भी जा रहा है कि नेपाल के इस संभावित तख्तापलट से शायद भारत को बैठे-बिठाए कुछ फायदा हो जाए क्योंकि नेपाल के वर्तमान पीएम ओली साब कट्टर कम्युनिस्ट और नक्सली ठहरे जो भारत को उत्ता पसंद नहीं करते।

लेकिन बात अगर सबक सिखाने की ही है तो सबक तो अमेरिका भारत को भी सिखाना चाह ही रहा होगा तो वो ये क्यों ही चाहेगा कि भारत का फायदा हो जाए, वो भी बैठे-बिठाए!


लेकिन फिर भारत में तो अमेरिकी ऐप्स भी बैन नहीं हैं तो भारत को सबक सिखाने के लिए वो कुछ और ही सोच रहा होगा।

उधर राहुल गांधी भी भारत को, माफ कीजिएगा, मेरा मतलब है मोदी को बीते एक दशक से सबक सिखाना चाह रहे हैं और इधर सुनने में आया है कि सबक सिखाने की योजना बनाते-बनाते वो अचानक ही छुट्टी मनाने मलेशिया चले गए जहाँ के लंकावी द्वीपसमूह पर दुनिया भर के गुप्तचर इकट्ठा हो रहे हैं। पता नहीं राहुल इस बार किस देश के गुप्तचर की हैसियत से वहाँ छुट्टी मनाने गए हैं।

भारत को राहुल गांधी से सीखना चाहिए, वो आदमी अकेले दम पर अमेरिका और चाइना, दोनों से एक साथ संबंध स्थापित किए हुए है। जब जिसको जरूरत पड़ती है और जब जिसकी जरूरत पड़ती है, उस हिसाब से समीकरण सेट होते रहते हैं।

न सिर्फ अमेरिका और चाइना, राहुल गांधी के पाकिस्तान और बांग्लादेश तक से मधुर संबंध हैं। पाकिस्तान से तो इतने मधुर संबंध हैं कि हालिया ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने उन्हें अपना अघोषित प्रवक्ता नियुक्त किया हुआ था।

और मधुर संबंध हों भी क्यों न! बंदा मोहब्बत की जीती-जागती चलती-फिरती दुकान है। मोदी की तरह कोई मौत का सौदागर थोड़े न है।

अब बस देखना ये है कि वो हाइड्रोजन बम का फॉर्मूला लेकर लंकावी गए हैं या फिर वहाँ से फॉर्मूला लेने गए हैं।

भारत में उपराष्ट्रपति चुनाव 2025: राजनीतिक दलों की रणनीति और इंडिया गठबंधन की साजिशों का खुलासा

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नई दिल्ली – भारत के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर हलचल मची हुई है। मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से अचानक इस्तीफे के बाद कल, 9 सितंबर को होने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव ने सभी दलों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने पर मजबूर कर दिया है। यह चुनाव न केवल राजनीतिक गठबंधनों की मजबूती की परीक्षा है, बल्कि विपक्षी इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) की कथित साजिशों को भी उजागर करने का मौका दे रहा है। चुनाव आयोग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, यह चुनाव अप्रत्याशित रूप से जल्दी हो रहा है, और इसमें संसद सदस्यों (लोकसभा और राज्यसभा) के वोट निर्णायक होंगे। एनडीए (NDA) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि इंडिया ब्लॉक ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. सुधर्शन रेड्डी को मैदान में उतारा है। लेकिन इस चुनाव के पीछे की कहानी सिर्फ उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है; सोशल मीडिया पर वायरल हो रही खबरें इंडिया गठबंधन की गुप्त योजनाओं की ओर इशारा कर रही हैं, जो चुनाव जीतने के लिए हर संभव हथकंडा अपनाने को तैयार दिखती हैं।

चुनाव की पृष्ठभूमि में देखें तो जगदीप धनखड़ का इस्तीफा 21 जुलाई 2025 को आया, जो राजनीतिक हलकों में आश्चर्य का विषय बना। विकिपीडिया और अन्य स्रोतों के अनुसार, यह इस्तीफा स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से जुड़ा है, लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह मोदी सरकार की आंतरिक कलह का नतीजा हो सकता है। चुनाव आयोग ने 7 अगस्त को सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें चुनाव की तारीख 9 सितंबर तय की गई। एनडीए की ओर से राधाकृष्णन का नामांकन एक रणनीतिक कदम है, क्योंकि वे दक्षिण भारत से जुड़े हैं और भाजपा की दक्षिणी विस्तार योजना का हिस्सा माने जा रहे हैं। न्यूज ऑन एयर और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनडीए को लोकसभा और राज्यसभा में कुल 438 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है, जो बहुमत के लिए पर्याप्त है। वहीं, इंडिया ब्लॉक के पास 321 सदस्यों का समर्थन है, लेकिन बीजद (BJD) के सात सांसदों ने मतदान से दूर रहने का फैसला किया है, जो एनडीए के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। बीजद नेता सस्मित पात्रा ने कहा कि उनकी पार्टी दोनों गठबंधनों से समान दूरी बनाए रखेगी।

अब बात इंडिया गठबंधन की रणनीति की। गठबंधन ने सुधर्शन रेड्डी को चुनकर न्यायिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार पर दांव लगाया है, जो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रतीक माना जा रहा है। लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर वायरल हो रही पोस्ट्स से पता चलता है कि गठबंधन की असली योजना चुनाव जीतने के लिए साजिशों पर आधारित है। उदाहरण के लिए, एक पोस्ट में दावा किया गया है कि इंडिया गठबंधन फर्जी न्यूज फैक्ट्री चला रहा है, जिसमें फेक सर्वे और फेक अखबारों के जरिए जनता को गुमराह किया जा रहा है। विजय पटेल नामक यूजर ने एक थ्रेड में लिखा कि अप्रैल 2024 में गठबंधन के आधिकारिक हैंडल्स ने फेक सर्वे फैलाए, जिससे उन्हें लोकसभा चुनाव में फायदा हुआ। यह साजिश उपराष्ट्रपति चुनाव में भी दोहराई जा रही है, जहां ईवीएम (EVM) मैनिपुलेशन और वोटर लिस्ट में हेरफेर के आरोप लगाए जा रहे हैं।

इंडिया गठबंधन की साजिशों को एक्सपोज करने के लिए सोशल मीडिया एक प्रमुख स्रोत साबित हो रहा है। कई यूजर्स ने दावा किया है कि गठबंधन ईवीएम को ब्लेम करके देश में अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहा है। एमआर सिन्हा नामक यूजर ने जून 2024 में पोस्ट किया कि चुनाव नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन ईवीएम पर आरोप लगाकर सिविल वॉर जैसी स्थिति पैदा करने की योजना बना रहा है, और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के जरिए मोदी सरकार को बदनाम करेगा। उनका उद्देश्य सरकार बनाना नहीं, बल्कि भारत को अस्थिर करना है। इसी तरह, एक अन्य पोस्ट में हरदीप सिंह किंगरा ने आरोप लगाया कि भाजपा और आम आदमी पार्टी (AAP) मिलकर वोटर लिस्ट मैनिपुलेट कर रही हैं, लेकिन यह इंडिया गठबंधन की बड़ी साजिश का हिस्सा है। मिसाभ नामक यूजर ने सितंबर 2025 में पोस्ट किया कि चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत से एपिक (EPIC) स्कैम चल रहा है, जिसमें वोट चोरी हो रही है, और यह ममता बनर्जी द्वारा पकड़ा गया।

ये साजिशें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फैली हुई लगती हैं। स्टार बॉय तरुण नामक यूजर ने अक्टूबर 2024 में दावा किया कि इंडिया गठबंधन की चुनावी रणनीति अमेरिकी विश्वविद्यालयों में तैयार की गई, और डीप स्टेट से जुड़ी एनजीओ ने 2021-2023 में फंडिंग की। फ्लाइट लेफ्टिनेंट अनूप वर्मा (रिटायर्ड) ने दिसंबर 2024 में पोस्ट किया कि वर्ल्ड फार्मा, आर्म्स और ऑयल लॉबी, पाकिस्तान की आईएसआई, चीन, यूएस डीप स्टेट और खालिस्तान लॉबी सब मिलकर मोदी को हटाने की कोशिश कर रहे हैं, और इंडिया गठबंधन इसका माध्यम है। उनका उद्देश्य हिंदू वोटों को बांटना है, जो चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है। रवींद्र कपूर नामक यूजर ने अगस्त 2025 में पोस्ट किया कि राहुल गांधी की बिहार में वोटर अधिकार यात्रा ईवीएम मैनिपुलेशन को एक्सपोज करने का बहाना है, और इंडिया गठबंधन सुधर्शन रेड्डी को भारी बहुमत से जिताने की योजना बना रहा है। टाइम्स नाउ की पोस्ट के अनुसार, इंडिया ब्लॉक ने 8 सितंबर को मॉक पोल आयोजित किया ताकि उनके सांसद वोटिंग की ट्रेनिंग ले सकें, और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने उनका समर्थन किया।

इन साजिशों में फर्जी आईडी और वोटर मैनिपुलेशन का भी जिक्र है। सक्थिवेल नामक यूजर ने सितंबर 2025 में दावा किया कि भाजपा 2014 से लाखों फेक वोटर आईडी बना रही है, और ईवीएम में वोट भाजपा को ट्रांसफर हो जाते हैं। प्रोफेसर विक्टर विजय ने पोस्ट किया कि मोदी सरकार ने कानून बदलकर अमित शाह को नामित किया, और सीजेआई को हटाकर ईसीआई को अपराध से मुक्त कर दिया, जो लोकतंत्र की हाईजैकिंग है। जेडीयू नेता केसी त्यागी ने जनवरी 2024 में कहा कि कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन की लीडरशिप चुराने की साजिश रची, और मल्लिकार्जुन खड़गे को पीएम फेस बनाने का प्रस्ताव ममता बनर्जी से करवाया।

एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स से साफ है कि संख्याओं के लिहाज से एनडीए आगे है, लेकिन इंडिया गठबंधन की साजिशें चुनाव को प्रभावित कर सकती हैं। रवींद्र कपूर ने सितंबर 2025 में पोस्ट किया कि 9 सितंबर स्क्रिप्ट बदल सकता है, क्योंकि कोई पार्टी व्हिप नहीं है, और सांसद अपनी अंतरात्मा से वोट देंगे। चिक्कू नामक यूजर ने जून 2024 में कहा कि गठबंधन नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू पर फोकस कर रहा है, लेकिन नितिन गडकरी पर भी नजर रखें।

कुल मिलाकर, यह चुनाव भारत के लोकतंत्र की परीक्षा है। इंडिया गठबंधन की साजिशें – फेक न्यूज, ईवीएम मैनिपुलेशन, वोटर लिस्ट हेरफेर और अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग – सोशल मीडिया पर खुलकर चर्चा में हैं। भाजपा महासचिव दुष्यंत कुमार गौतम ने कहा कि एनडीए पूर्ण बहुमत से जीतेगा। लेकिन अगर ये साजिशें कामयाब हुईं, तो देश की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। चुनाव के नतीजे कल आएंगे, लेकिन सोशल मीडिया की ये खबरें पहले ही अलार्म बजा रही हैं।

जीवन के आठ वर्ष जेल में बिताये : हर जेल यात्रा में एक ग्रंथ तैयार

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विविधता से भरा है । क्राँतिकारी और अहिसंक आँदोलन के साथ अन्य धाराओं में एक ऐसी धारा भी रही जिसने प्रत्यक्ष आँदोलनों में सहभागिता के साथ ऐसी साहित्य रचना भी की जिसने जन सामान्य को झकझौरा और एक पूरी पीढ़ी को आँदोलन के लिये आगे आई । रामवृक्ष बेनीपुरी ऐसी ही प्रतिभा थे जिन्होंने सतत साहित्य रचना की और असहयोग आंदोलन से लेकर भारत छोड़ो आँदोलन तक हर संघर्ष में हिस्सा लिया और जेल गये ।

ऐसे ओजस्वी साहित्यकार और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म 23 दिसम्बर 1899 को बिहार प्राँत के मुज़फ़्फ़रपुर जिला अंतर्गत ग्राम बेनीपुरी में हुआ था । पिता फूलवंत सिंह जी एक साधारण किसान और माता तुलसी देवी साधारण गृहिणी थीं । इनके माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। पालन पोषण मौसी ने किया था। मौसी का परिवार शिक्षा से जुड़ा था उन्होंने शिक्षा पर ध्यान दिया और आरंभिक शिक्षा केलिये बेनीपुर के स्थानीय विद्यालय में ही भर्ती कर दिया । आरंभिक शिक्षा के मैट्रिक करने ननिहाल पहुँचे । यह वह समय था जब देश में स्वाधीनता आँदोलन के मानो बादल घुमढ़ रहे थे । युवा रामवृक्ष भी दूर न रह सके और 1920 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में प्रारंभ हुए असहयोग आंदोलन से जुड़ गये । गिरफ्तार हुये जेल भेजे गये और जेल से लौटकर मुजफ्फर महाविद्यालय से आगे पढ़ाई की और हिंदी साहित्य से ‘विशारद ‘ की परीक्षा उत्तीर्ण की।

साहित्य और पत्रकारिता से उनकी रुचि बचपन से थी । वे किशोर वय से ही लेखन करते थे पर उनका लेखन ओजस्वी और समाज की कुरीतियों के निवारण संबंधी होता था इसलिए स्थानीय समाचार पत्रों में स्थान नहीं मिल पाता था । उन्होंने 1929 से पत्रकारिता आरंभ की ‘युवक’ नामक समाचारपत्र से जुड़ गये । वे इसके न केवल संपादक थे अपितु प्रकाशन में भी सहभागी थे । उन्होंने अपने नाम रामवृक्ष के आगे अपने गाँव का नाम बेनीपुरी जोड़ा और वे इसी नाम से प्रसिद्ध हुये । बेनीपुरी जी ने इस समाचार पत्र “युवक” के माध्यम से युवाओं में ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों की ओर ध्यान खींचा तथ राष्ट्रवाद जगाने का अभियान छेड़ा। इसी बीच उनका संपर्क सुप्रसिद्ध समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से बना 1931 में ‘समाजवादी दल’ की स्‍थापना हुई । इसके संस्थापकों में जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा के साथ रामवृक्ष बेनीपुरी भी थे । उन्होंने समाज में कुरीतियों के विरुद्ध भी अनेक आँदोलन छेड़े। अपने लेखन और आदोलनों के चलते अनेक बार बंदी बनाये गये । विभिन्न आँदोलनों में उन्होंने अपने जीवन के कुल आठ वर्ष जेल में बिताये । लेकिन उन्होने अपनी जेल अवधि का उपयोग लिखने में किया । वे जब भी जेल से बाहर आते उनके हाथ में कोई नया ग्रंथ होता जो आगे चलकर साहित्य की अमर कृतियाँ बनीं।

उनकी गिरफ्तारी और रिहाई की एक घटना बहुत चर्चित रही । यह घटना 1942 के अंग्रेजो भारत छोड़ो आँदोलन की है । वे इस आँदोलन में जयप्रकाश नारायण जी के साथ गिरफ्तार हुये और हजारीबाग जेल में रखे गये । पर एक पूरे जत्थे ने भागने की योजना बनाई । रामवृक्ष जी इस योजना के सहभागी बने उनकी साहित्य प्रतिभा से जेल कर्मचारी प्रभावित थे ही । इसी का लाभ उठाकर जयप्रकाश नारायण जी, रामवृक्ष जी सहित पूरा जत्था जेल से भाग निकला । इस घटना की गूँज पूरे बिहार में हुई ।

रामवृक्ष जी महान् विचारक, चिन्तक, क्राँतिकारी, साहित्यकार और पत्रकार थे । उनकी हर रचना में देश प्रेम और समाज को विसंगतियों से मुक्ति का संदेश होता था । उनके दो प्रमुख उपन्यास “पतितों के देश में”और “आम्रपाली” बहुत मशहूर हुये तो “माटी की मूरतें” कहानी संग्रह तथा चिता के फूल, लाल तारा, कैदी की पत्नी, गेहूँ और गुलाब, जंजीरें और दीवारें

नाटक – सीता का मन, संघमित्रा, अमर ज्योति, तथागत, शकुंतला, रामराज्य, नेत्रदान, गाँवों के देवता, नया समाज, विजेता, बैजू मामा आदि आलेख आज साहित्य की अमर कृतियाँ हैं। इसमें “कैदी की पत्नि” रचना में उन्होने अपनी पत्नि रानी देवी की उस व्यथा का ही वर्णन किया । जब रामवृक्ष जी जेल जाते थे तब पत्नि की आँसू झरते थे । वही पीड़ा उस रचना में थी । उन्होंने उपन्यास, जीवनियाँ, कहानी संग्रह, संस्मरण आदि लगभग 80 साहित्यिक पुस्तकों की रचना की।

स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य रचना के साथ वे सक्रिय राजनीति में भी आये । उन्होने जयप्रकाश नारायण जी कहने पर 1957 में हजारीबाग विधान सभा से चुनाव भी लड़ा और विजयी हुये । निरंतर संघर्ष और साहित्य रचना के साथ 9 सितम्बर 1968 को वे इस संसार से विदा हुये । उनके सम्मान में भारत सरकार ने वर्ष 1999 में ‘डाक टिकट जारी किया और बिहार सरकार ने ‘वार्षिक अखिल भारतीय रामवृक्ष बेनीपुरी पुरस्कार’ आरंभ किया ।

डांगे मर चुका है

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अमर गर्ग कलमदान

आज घर में किसी ने खाना नहीं बनाया क्योंकि जनता के लोकप्रिय नेता डांगे का निधन हो गया था। लोग उन्हें अपना जीवित भगवान मानते थे। पार्टी कार्यालय में उनके पार्थिव शरीर को देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी।

परिवार ने शव के दाह संस्कार के लिए सात मन लकड़ी मंगवाई थी, जिसमें कुछ चंदन की लकड़ी भी थी, लेकिन सोलह सदस्यीय समिति ने आदेश पारित किया कि कॉमरेड डांगे की मृत्यु अस्थायी है, वे कभी भी जीवित हो सकते हैं।

शव को समाधि की मुद्रा में एक बड़े रेफ्रिजरेटर में रख दिया गया। लोगों से कहा गया, “विज्ञान बहुत तरक्की कर रहा है, कॉमरेड डांगे कभी भी हमारे बीच वापिस आ सकते हैं, बस खुशखबरी का इंतज़ार करें।”

ए.जी. कार एक प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी माने जाते थे और विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके थे। उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों की पूरी समझ थी। बचपन अमृतसर में बीता होने के कारण, उनकी बंगाली, पंजाबी और अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ थी।

डांगे ने उन्हें 16 सदस्यीय समिति में अतिरिक्त पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया था और टीवी पर राजनीतिक मुद्दों पर पार्टी की स्थिति का बचाव करने के लिए अक्सर पेश होते थे।

पार्टी के एक वफ़ादार सिपाही ए.जी.कार पार्टी के प्रति जनसमर्थन में भारी गिरावट से चिंतित थे, “एक ज़माने में पार्टी कार्यालय में जनता का मेला लगता था। आज पार्टी कार्यालय में गिने-चुने कार्यकर्ता ही आते हैं। पार्टी कार्यालय के बड़े आँगन में चबूतरे पर लगी लेनिन की मूर्ति हिल रही थी,”

क्योंकि चूहों ने जड़ों में छेद कर दिए थे। पार्टी के सारे दांव उल्टे पड़ने लगे। ए जी कार झूठ के बोझ तले अपनी आत्मा को और कष्ट नहीं देना चाहते थे। 16 सदस्यीय समिति के समक्ष पेश होते हुए उन्होंने कहा, “”अतीत में, हमने भारत को एक राष्ट्र नहीं माना, कभी ‘भारत मां की जय’ या ‘वंदे मातरम’ नहीं कहा, जबकि ये दोनों नारे कम्युनिस्टों के प्राथमिक नारे होने चाहिए थे, हमने हो ची मिन्ह, फिदेल कास्त्रो या माओ के राष्ट्रवाद से कुछ नहीं सीखा।

19 सितंबर 1942 के एक प्रस्ताव ने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की जड़ें एक झटके में उखाड़ दीं। यह वही प्रस्ताव था जो भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन करता था। हम इतने मूर्ख हो गए थे कि अपनी ही माँ के विभाजन में भागीदार बन गए।

हम जिन्ना को एक क्रांतिकारी मानने लगे, जिनके हाथों हमारे अपने ही निर्दोष लोग मारे गए। जब हम इतिहास पर नज़र डालते हैं और देखते हैं कि 16 अगस्त 1946 को जिन्ना के प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के आह्वान पर दो शीर्ष कम्युनिस्ट नेताओं जिन्ना के साथ बंगाल में मंच सांझा किया, देख कर मेरी आत्मा रो रही है ।

जिन्ना द्वारा (डायरेक्ट एक्शन डे) प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के आह्वान के कारण बंगाल में दंगे भड़क उठे, जिनमें लगभग 6,000 हिंदू और मुसलमान मारे गए और लगभग 2 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। उसी दिन पाकिस्तान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया था।

अब जबकि चीन के साथ युद्ध का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है, हम अब पूरी पार्टी से देश के राष्ट्रीय पूंजीवाद के नेतृत्व में राष्ट्रवाद के साथ खड़े होने का आग्रह कर रहे हैं, जबकि हमने न केवल अपने कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद पर लामबंद नही किया है, बल्कि राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय पूंजीवाद का हथकंडा समझते रहे।

16 सदस्यीय समिति के सचिव प्रकाश चंद जोशी ने कहा, “कॉमरेड कार, आपने बंद कमरे में अपनी बात कह दी है, लेकिन कृपया इन विचारों को किसी अखबार में प्रकाशित न करना, इसी में आपकी भलाई है, अपना साथ बना रहेगा।”

हुआ भी वही, पार्टी टूट गई, टुकड़े के आगे टुकड़े हो गए। दफ्तर लूट लिए गए। जिसके हाथ जो लगा, वो ले गया। ए.जी कार फिर बोले, “जब हमने अपने कैडर को धरतीपुत्र नहीं बनाया, तो उम्मीद मत रखिए कि वो पार्टी के लिए सुपुत्र साबित होंगे ”

प्रकाश चंद जोशी ने कहा, “कॉमरेड कार जी, बताइए, ‘पार्टी को अब खड़ा करने के लिए कौन सी नीति अपनाई जाए?’ ए.जी. कार ने कहा, ‘सबसे पहले देश की जनता से अतीत में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगिए। पार्टी के कार्यक्रम को राष्ट्रवाद से जोड़िए।’ भारतीय राष्ट्रवाद विशुद्ध रूप से सांस्कृतिक और वैज्ञानिक है। यह पर्यावरण और संपूर्ण मानवता के लिए कल्याणकारी है। आप योग को देख सकते हैं, यह पूरी दुनिया को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ रहा है। आप कुंभ को देख सकते हैं, जहाँ देश की आधी आबादी पहुँचती है जो केवल सूर्य और नदी को प्रणाम करती है, जहाँ निराकार ईश्वर की कोई मान्यता नहीं है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, कम्युनिस्ट पार्टी को अपने कार्यकर्ताओं के बीच दो मुख्य नारे बुलंद करने चाहिए, पहला: “भारत माता की जय” और दूसरा “वंदे मातरम”। यह सुनकर प्रकाश चंद जोशी बोले,”कॉमरेड कार, कम्युनिस्ट पार्टी इन नारों को स्वीकार नहीं कर सकती। अगर पार्टी इन नारों को स्वीकार कर लेती है, तो उसके कार्यक्रम का धर्मनिरपेक्ष ढाँचा नष्ट हो जाएगा। ये नारे सैद्धांतिक रूप से भी सही नहीं हैं।”

ए.जी.कार ने कहा, “आप धर्मनिरपेक्ष मंच से नहीं, बल्कि एक संप्रदाय के मंच से बोल रहे हैं। इन नारों का क्या मतलब है, यही ना, हे मातृभूमि तेरी जय हो, हम आपको प्रणाम करते हैं, ये शुद्ध मार्क्सवादी नारे हैं,”इनमें ईश्वर की कोई महिमा नहीं है। इसके विपरीत, इन नारों को नकारने वाले संप्रदायों का तर्क है कि वे किसी पत्थर या मिट्टी की जय नहीं कर सकते, वे तो केवल निराकार ईश्वर की जय करेंगे।

इसका मतलब है कि हम मार्क्सवाद के साथ नहीं, बल्कि पंथिक शक्तियों के आगे सिर झुकाते हैं। याद रखिए, जैसे किसान अपने बेटे को अपनी धरती का पुत्र बनाता है, वैसे ही यह धरती भी अपने पुत्र को वारिस बनाएगी। याद रखिए ‘वंदे मातरम’ का नारा बंगाल की धरती से उठा था, इस नीति पर चलते बंगाल भी ज्यादा दिन हमारे पास नहीं रहेगा, यह उनके पास चला जाएगा जो दिल से ‘वंदे मातरम’ कहेंगे।

कई साल बीत गए, कॉमरेड ए.जी. कार बूढ़े हो गए थे। प्रख्यात लेखक सरचांदपुरी उनसे मिलने आए। कहने लगे “कॉमरेड, हमें कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के पक्ष में एक आंदोलन शुरू करना चाहिए।” भारत में पूंजीवादी सरकार ने कश्मीरियों का दमन किया है, हम इसे स्थाई शांति नहीं कह सकते।’ यह सुनकर ए.जी.कार क्रोधित हो गए, लेकिन यह मानते हुए कि बुद्धि के माध्यम से क्रोध को विचारों में बदलना सबसे अच्छा तरीका है, कहने लगे , पहले ये बताओ, भारत तो पहले ही तीन टुकड़ों में बँट चुका है, पार्टी आज भी इस विभाजन में अपनी निभाई भूमिका का कलंक झेल रही है। अपनी ही पार्टी, जिसे हमने अपने हाथों से बनाया है, अब और कितना डुबोएंगे? त्रिपुरा हार गए, बंगाल हार गए, अब सिर्फ़ केरल बचा है, अब ये भी आपकी कलम को चुभता है। बताइए, आप उस दिन मेरे पास क्यों नहीं आए जब कश्मीरी आतंकवादियों ने एक कश्मीरी पंडित महिला गिरजा टिक्कू को आरे से चीर डाला था। सरचचांदपुरी जी, आप स्वयं पंडित जाति से हैं, जिसने अतीत में ऐसे ग्रंथों की रचना की है, जिसके कारण आज तक इस भूमि पर एक सांझी संस्कृति बची हुई है।

अब आप भी आतंकवादियों के साथ खड़ रहे हो, बड़ी गिनती में कश्मीरियों का पलायन करने के बाद, बचे हुए, खौफ ज़दा को भी आरे से कटने के लिए माहौल बनाना चाहते हो। आत्मनिर्णय का नारा एक ढोंग है, पंडितों के विरुद्ध हिंसा का वातावरण बनाने के लिए। जबकि पंडित तो काश्मीर के मूल निवासी है। तुम्हारा खून सफ़ेद क्यों हो गया है? मेरी आत्मा चीख रही है, किन दुश्मनों के गल पड़ूं, तो नतीजा निकलता है, हम खुद अपनी ही पार्टी के दुश्मन हैं।आप मेरी हालत देख ही रहे हैं, पहले दफ्तर कितना बड़ा हुआ करता था, आज मैं जिस कमरे में बैठा हूं, उसमें बाथरूम तक नहीं है, अब आप ही बताइए, पार्टी को गुमराह करने में लेखकों या कलमकारों की क्या भूमिका है? यह सुनकर सरचांदपुरी कुछ नहीं बोले, और उठ कर चल दिए।

गुस्से को शांत करने के लिए ए.जी कार ने प्रकाश चंद जोशी को फोन मिलाया और कहने लगे, “कॉमरेड, पार्टी की स्थिति समझिए। डांगे मर चुका है। उसे अग्नि भेंट कर दीजिए। शायद नई पीढ़ी पार्टी में जान डाल दे।

संपर्क : अमर गर्ग कलमदान
7 ए/71, 50 फुटी रोड,( धूरी)
मोबाइल: 9814341746
amargargp@gmail.com

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