अनिल जोशी की कविताओं प्रति यह वैश्विक लगाव उनके कविता के सशक्त होने का प्रमाण है – अभय कुमार

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अनिल जोशी के प्रसिद्ध कविता संग्रह ‘ नींद कहाँ है ‘ के दूसरे संस्करण के लोकार्पण के अवसर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के उपमहानिदेशक श्री अभय कुमार ने कहा कि कवि का वास्तविक परिचय उसकी किताब होती है । उन्होंने कहा कि ब्रिटेन , फीजी , रूमानिया जैसे देशों व देश विदेश में लोकप्रिय होना , पाठ्यक्रमों का भाग होना , हज़ारों श्रोताओं , पाठकों द्वारा पसंद किया जाना उनकी कविता की जीवंतता और दीर्घकालिकता का प्रमाण है । उन्होंने कहा कि कवि ने ब्रिटेन के जीवन का सूक्ष्म पर्यवेक्षण किया । इस अवसर पर बोलते हुए ब्रिटेन की सुप्रसिद्ध कथाकार दिव्या माथुर ने कहा कि वे उनकी कविता की ब्रिटेन में लोकप्रियता की साक्षी रही हैं । उन्होंने कहा कि कविता में लघुता उसकी शक्ति है । अनिल जोशी की कविता की शक्ति का प्रमाण देते हुए उनकी दो रचनाओं व उनके अंशों को उद्धृत किया –
मैं हूँ और मेरा सुख है
मैं हूँ और मेरा दुख है
मैं हूँ और मैं ही मैं हूँ
और
घर घर यही कहानी है ,
अम्मा पानी पानी है ।
पिछवाड़े की खाट है वो ,
वो खंडहर की रानी है ।

अनिल जोशी ने लोकार्पण के अवसर पर अपनी कविताओं , भटका हुआ भविष्य ‘ नींद कहाँ हैं ‘ बाल मजदूर , क्या तुमने उसको देखा है के अंश पढ़े और प्रसिद्ध कविता ‘सीता को सोने का मृग चाहिए ‘ कविता का पाठ किया । पुस्तक मेले में एक लघु कवि सम्मेलन हो गया ।

प्रसिद्ध ललित निबंध लेखक श्री नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि श्री अनिल जोशी की कविताओं से मेरा परिचय पिछले बीस बाईस वर्षों से है।श्री जोशी जीवनानुभव के कवि हैं।उनकी कविता वह दर्पण है जिसमें अपने समय के यथार्थ की इबारतें उल्टी नहीं सीधी दिखाई देती हैं।इन कविताओं की प्रासंगिकता इसी तथ्य से सिद्ध है कि इन कविताओं का दूसरा संस्करण निकला है।

इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ कवि और दोहाकार नरेश शांडिल्य ने उनके साथ के लेखन के अनुभवों को साझा करते हुए उनकी कविताओं के संबंध में कहा कि अनिल जी की ये कविताएँ उनके ब्रिटेन प्रवास के दौरान लिखी गई कविताएँ हैं। उनके पहले कविता संग्रह ‘मोर्चे पर’ की ताक़तवर विचार-कविताओं से इतर एक नए अनुभव की कविताएँ हैं। इन कविताओं की लोकप्रियता अनन्य है, जिसे मैंने ख़ुद अपनी आँखों के सामने घटित होते देखा है। अनिल जोशी सही मायने में एक असाधारण कवि हैं।

प्रसिद्ध लेखिका अलका सिन्हा ने अपने वक्तव्य में कहा कि सुप्रसिद्ध कवि अनिल जोशी कई विधाओं में लेखन करते हैं किंतु व्यंग्य की उपस्थिति स्थायी भाव की तरह उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। इस संग्रह की कविताएं भारत और ब्रिटेन के बीच भाषा, संस्कृति और जीवन मूल्यों की टकराहट से उपजती हैं और इनके भीतर छुपा व्यंग्य कहीं चुभन पैदा करता है तो कहीं मर्माहत भी करता है। जीवन के प्रति आसक्ति जगाता है तो कहीं निर्विकार भाव से आत्मावलोकन भी करता है। विवेकानंद के दर्शन की पड़ताल करने के साथ-साथ सोने के हिरन के माध्यम से सांसारिक भौतिकता पर प्रश्न चिह्न भी अंकित करता है। उन्होंने कहा कि ‘ धरती और बादल ‘ कविता प्रेम कविता नहीं है , अपितु यह वर्तमान समय में नारी – पुरूष संबंधों के जटिल स्वरूप को रेखांकित करती है ।
जीवन मूल्यों की पक्षधरता करती ये कविताएँ पाठकों का वैचारिक परिमार्जन करती हैं।

लेखक व व्यंग्यकार डॉ राजेश कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि अनिल जोशी ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताएँ सहज रूप से प्रवाहित होती हैं. वे ऐसे शब्द-शिल्पी हैं, जिन्हें गहन को आकार देने की क्षमता प्राप्त है। उनकी कविताएँ सूक्ष्म भावनाओं, जटिल विचारों और सार्वभौमिक विषयों के तंतुओं से बुनी टेपेस्ट्री हैं, जिनमें से प्रत्येक को सबसे जटिल विषयों में भी जीवन फूंकने के लिए सावधानीपूर्वक चुना गया है। उनके भावों में सहज लय है, आंतरिक लय जो दिल की धड़कन की तरह धड़कती है, स्थिर और सच्ची। उनके शब्द अलंकृत नहीं हैं, अनावश्यक अलंकरण के भार से मुक्त हैं, फिर भी वे संयमित लालित्य के साथ दमकते हैं, उनके भीतर सच्ची काव्यात्मक कलात्मकता का सार है। कल्पना की सीमाओं पर विचार करने वाले मस्तिष्क और बिना किसी सीमा को जानने वाली रचनात्मकता के साथ, जोशी काव्यात्मक चमत्कारों को जन्म देते हैं, जो अंतिम पंक्ति पढ़े जाने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते हैं। प्रत्येक कविता दुनिया को आश्चर्य के लेंस के माध्यम से देखने और उस दृष्टि को ऐसी भाषा में प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता का प्रमाण है, जो आत्मा के साथ गहराई से जुड़ती है। उनकी कविताएँ सिर्फ़ पढ़ी नहीं जातीं; उन्हें महसूस किया जाता है, अपने साथ ले जाया जाता है। उनमें दिल के सबसे शांत कोनों को झकझोरने, सुप्त भावनाओं को जगाने और पाठकों को भावुक और रूपांतरित करने की शक्ति होती है। अनिल जोशी के हाथों में कविता शब्दों से कहीं बढ़कर हो जाती है – यह एक अनुभव, एक यात्रा, एक रहस्योद्घाटन बन जाती है।

रूमानिया व अरेमेनिया में शिक्षिका रह चुकी डॉ अनिता वर्मा ने कहा कि अनिल जी की कविताओं की भाषा सहज, सरल व पाठकों से आत्मसात् करती हैं। विदेश में अपने शिक्षण के दौरान भारतीय दूतावास में मुझे उनकी पुस्तक मिली तो हमने उनकी कविताओं पर कक्षाओं में चर्चा की। माँ के हाथ का खाना का पाठ भी हुआ और सबको बहुत पसंद भी आई। कविताओं का कैनवास बहुत विस्तृत है और सरल होते हुए भी बहुत बड़े विषय उठाती हैं। पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। जीवन के यथार्थ का खुरदरापन और स्नेह, आदर , सम्मान सभी रंग इन कविताओं में समाहित हैं।
प्रसिद्ध विद्वान डॉ जवाहर कर्नावट ने उनकी कविताओं के जनता तक पहुँचने की शक्ति की बात की व विशेष रूप से उनकी कविता ‘ भटका हुआ भविष्य ‘ का उल्लेख किया ।

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए हिंद बुक सेंटर के श्री अनिल वर्मा ने सभी अतिथियों का आभार किया ।इस अवसर पर उनके पिता श्री अमरनाथ जी के साहित्यिक जगत में योगदान का स्मरण किया ।

कार्यक्रम का सरस – सफल संचालन श्रीमती सुनीता पाहूजा ने किया और संग्रह के महत्वपूर्ण तत्वों का बीच बीच में उल्लेख किया ।
इस अवसर पर प्रसिद्ध लेखक राजेन्द्र दानी , श्री इन्द्रजीत , अमेरीका , श्री रितेश ब्रिटेन , श्री अतुल प्रभाकर , श्री मनोज मोक्षेन्द्र आदि विद्वान उपस्थित थे । कार्यक्रम की सुंदर और प्रासांगिक फोटो सरोज शर्मा जी के सौजन्य से उपलब्ध हुई ।
डॉ मनीष ने कार्यक्रम का संयोजन किया । डॉ अर्पणा ने सहयोग दिया ।

ताज महोत्सव: स्थानीय मेला या वैश्विक पर्यटन के लिए एक खोया अवसर?

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आगरा : आगरा की कला, संस्कृति और विरासत का उत्सव, हर साल दस दिवसीय ताज महोत्सव, शहर के कार्यक्रम कैलेंडर में एक स्थायी स्थान बन गया है। हालाँकि, इसकी लंबी अवधि और धूमधाम के बावजूद, विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में महोत्सव की प्रभावशीलता और स्थानीय पर्यटन उद्योग पर इसका समग्र प्रभाव बहस का विषय बना हुआ है।

जहाँ ये महोत्सव स्थानीय भीड़ को आकर्षित करता है, वहीं अंतर्राष्ट्रीय आगंतुकों के लिए इसका आकर्षण कम होता दिखाई देता है, जिससे इसकी रणनीतिक दिशा और विकास की संभावना के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं।

क्या ताज महोत्सव वास्तव में आगरा के वैभव का प्रदर्शन है, या यह शहर के वैश्विक आकर्षण का लाभ उठाने में विफल होकर एक स्थानीय तमाशा बन गया है?

1992 में अपनी स्थापना के बाद से, ताज महोत्सव का उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना और क्षेत्र की कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करना रहा है। इस महोत्सव में लोक संगीत और नृत्य प्रदर्शन, शिल्प प्रदर्शनी, पाक कला और सांस्कृतिक जुलूस सहित कई तरह की गतिविधियाँ शामिल हैं।
आयोजक हर साल नए आकर्षणों का वादा करते हैं, ताकि नवीनता की भावना बनी रहे। हालांकि, महोत्सव की मुख्य पेशकश अक्सर अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की चाहत वाले अनूठे और मनोरंजक अनुभवों से कमतर रह जाती है। पिछली साल नगर आयुक्त आगरा ने एक कामयाब पहल यमुना आरती महोत्सव के माध्यम से की जो इस वर्ष भी नए रूप और आकार में शहरवासियों को आकर्षित करेगी।

ताज महोत्सव की एक महत्वपूर्ण आलोचना यह है कि इसमें विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया जाता है। महोत्सव में घरेलू दर्शकों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे वैश्विक दर्शकों के सामने आगरा की समृद्ध विरासत को दिखाने की संभावना को नजरअंदाज कर दिया जाता है। होटल वाले कहते हैं कि यह कार्यक्रम बहुत स्थानीय हो गया है, जो एक परिष्कृत सांस्कृतिक प्रदर्शनी के बजाय “विस्तारित गांव हाट” जैसा दिखता है।
महोत्सव के कार्यक्रमों में अक्सर बॉलीवुड गायक और सामान्य प्रदर्शन शामिल होते हैं, जो स्थानीय दर्शकों के बीच लोकप्रिय होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय यात्रियों द्वारा चाहे जाने वाले अनूठे सांस्कृतिक अनुभवों को दर्शाने में विफल रहते हैं। भारत और क्षेत्र की विविध परंपराओं में तल्लीन होने के बजाय, महोत्सव अक्सर मनोरंजन का एक समरूप संस्करण प्रस्तुत करता है, जिसमें वह गहराई और प्रामाणिकता नहीं होती जो विदेशी पर्यटकों को पसंद आए। बहुत से लोगों को महोत्सव की प्रस्तुतियां बहुत अधिक व्यावसायिक लगती हैं।

इसके अलावा, कई अंतरराष्ट्रीय आगंतुक पैकेज टूर के या कंडक्टेड टूर के सदस्य होते हैं, जो स्थानीय कार्यक्रमों के साथ स्वतंत्र अन्वेषण और जुड़ाव के लिए सीमित समय देते हैं। होटल व्यवसायियों और पर्यटन उद्योग के नेताओं ने महोत्सव की दोहराव वाली प्रकृति और मुगल काल की भव्यता और समृद्धि को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत करने में इसकी विफलता पर निराशा व्यक्त की है। महोत्सव में एक स्पष्ट और आकर्षक कथा का अभाव है जो अंतर्राष्ट्रीय आगंतुकों को आकर्षित कर सके और आगरा और आसपास के ब्रज भूमि क्षेत्र की अनूठी सांस्कृतिक समृद्धि को प्रदर्शित कर सके।

हालांकि इस आयोजन को विकेंद्रीकृत करने और इसमें अधिकाधिक प्रतिभागियों को शामिल करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन ये प्रयास अक्सर फोकस और अपील के मूलभूत मुद्दों को संबोधित करने में विफल हो जाते हैं।

सवाल यह है कि ताज महोत्सव का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या यह मुख्य रूप से एक स्थानीय उत्सव है, या क्या यह वैश्विक पर्यटन परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनने की आकांक्षा रखता है? आयोजकों को सामान्य मनोरंजन से आगे बढ़कर आगरा और आसपास के क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करने वाले अनूठे, इमर्सिव अनुभव बनाने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं की गहरी समझ के साथ-साथ स्थानीय पर्यटन व्यवसायों और सांस्कृतिक संगठनों के साथ सहयोग करने के लिए अधिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

ताज महोत्सव में आगरा को एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में बढ़ावा देने की क्षमता को साकार करने के लिए, इसे अपनी मौजूदा कमियों को दूर करना होगा और अधिक रणनीतिक और वैश्विक रूप से केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाना होगा। तभी यह महोत्सव वास्तव में आगरा की आत्मा का जश्न मना सकता है।

बिहार के राजनीतिक संदर्भ में केजरीवाल

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सोशल मीडिया की बदौलत सरकारें तथ्यों को छिपा नहीं सकतीं, चाहे मीडिया पर उनका कितना ही प्रभाव क्यों न हो! 90 के दशक में एक समय था जब बिहार के लोग मंथन कर रहे थे और अटकलें लगा रहे थे कि जंगलराज से कैसे छुटकारा पाया जाए। वैसे ही दिल्ली की जनता पिछले कुछ सालों से इस बात पर गहन बहस कर रही है कि केजरीवाल से कैसे छुटकारा पाया जाए। और अब यह बहस बिहार में फैल गई है कि बिहार एक और केजरीवाल बर्दाश्त नहीं कर सकता…

केजरीवाल मुफ़्त की चीज़ें देने और झूठे वादे करने में गुमनाम हैं।  हमारे वास्तविक जीवन की अधिकांश चीजें जो बहुत अच्छी लगती हैं वे भ्रामक हैं। दुर्भाग्य से लोगों की याददाश्त कमजोर होती है और वे बार-बार एक ही गलती करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया की शक्ति और प्रभाव उनके बचाव में आया है और यह लगातार धारणा, कथा और विश्लेषण में अंतर्निहित तथ्यों का विस्तार कर रहा है। तथ्य निकालना लोगों पर निर्भर है।

कल संपन्न हुए दिल्ली विधानसभा के हालिया चुनाव के एग्जिट पोल में यह रुझान साफ तौर पर सामने आया है कि केजरीवाल जल्द ही राजनीतिक कारोबार से बाहर हो जाएंगे। दिल्ली को खोना आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक परिदृश्य खोना है। एक बार जब वे दिल्ली में सत्ता खो देते हैं, तो वे अन्य राज्यों की ओर नहीं देख सकते हैं, और वे अगले पांच वर्षों तक दिल्ली को हासिल करने के लिए संघर्ष करेंगे। बिहार के लिए यह दो मायनों में अच्छी खबर है। एक, बिहार में AAP के बहुत से युवा उम्मीदवार अपनी आकांक्षाओं को सुलझाएंगे और अपनी मानसिकता में सुधार लाएंगे। दूसरा, बिहार के लोग सावधानी से मतदान करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि वे केजरीवाल जैसी पार्टी और व्यक्ति को न चुनें।

दुर्भाग्य से, बिहार की जनता के सामने राज्य सरकार चुनने के लिए राजनीतिक दलों के विकल्प सीमित हैं और मौजूदा राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार पाला बदलते रहते हैं। राजद जंगलराज का पर्याय है, नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू पलटीमार राजनीति का पर्याय है और भाजपा बिना किसी प्रभावी नेता के गुल्लक की व्यवस्था में सवार है। प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जनसुराज अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है और वह अन्य राजनीतिक स्टार्टअप के साथ पाई साझा नहीं करना चाहते हैं।

बहरहाल, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में केजरीवाल प्रभाव कम हो रहा है और उम्मीद है कि नए राजनीतिक स्टार्टअप बिहार के राजनीतिक संदर्भ में इस प्रभाव से सबक लेंगे। केजरीवाल प्रभाव को राजनीति के एकल व्यक्तिवादी दृष्टिकोण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसका सामना यह देश दशकों से कर रहा है। यह एक पुरानी कहावत है, “सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण शक्ति पूर्णतः भ्रष्ट करती है”।  अब समय आ गया है कि बिहार के लोग 8 फरवरी के बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करें और बिहार में राज्य विधानसभा चुनाव 2025 के संदर्भ में अपने राजनीतिक ज्ञान पर विचार करें।

भोपाल लिटरेरी फेस्टिवल यानि सत्ता की भूतपूर्व अवैध सन्तानों का समागम

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एस. आर. वाघमारे

पिछले सात सालों से एक्स आईएएस अफसरों, उनके द्वारा पोषित समाज से कटे कथित वामी लिक्खाडो की एक संस्था सोसाइटी फॉर कल्चरल एंड एनवायरनमेंट, द्वारा भोपाल के भारत भवन में भोपाल लिटरेरी फेस्टिवल (BFL) का आयोजन किया जाता है। शुरुआती साल में इस सोसाइटी ने कुछ अच्छे कार्यक्रम किये किंतु शीघ्र ही अपनी ‘सत्ता मुगल’ वाली औकात पर आ गई। चूंकि इन्हें मालूम था कि ऐसे आयोजनों के लिये पैसा कहाँ से इकठ्ठा किया जाता है इसलिये धनवर्षा में कोई कमी नहीं होती। इनके प्रायोजकों की सूची देखिए तो पता चल जायेगा कि लक्ष्मी कहाँ से आती है। अब इनके अटपटे विषय देखिये- वाइल्ड वीमेन ऑफ इण्डिया (राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सोनिया गांधी की टिप्पणी पुअर वीमेन की याद आती है), भीष्मपितामह ऑन बेड ऑफ़ एरोज़, द लूर ऑफ ओल्ड ट्यून्स, नेचर राइटिंग एंड इट्स केथार्टिक यानि हर विषय को इतना जटिल बनाओ कि यदि कोई सुनने वाला चला आये तो उससे हड़प्पा की उस लिपि में ‘बात’ करो जो आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

इन कार्यक्रमों में दर्शक आते हैं श्रोता नहीं। ऊपर से इसे सोसाइटी ने नॉलेज कुम्भ का नाम दे दिया और पाप छिपाने एक प्रबुद्ध मंत्री और एक साहित्यकार को भी आमंत्रित कर लिया। कई सत्र तो ऐसे थे कि मंच पर पाँच वक्ता थे और श्रोताओं में चार। वे पाँच भी एक- दूसरे की पीठ खुजाते रहे।भीड़ जैसा कुछ दिखाने स्थानीय नामी एलीट संस्थाओं के छात्रों को भाड़े पर(?) लाया गया था जिनके लिये साहित्य काला अक्षर भैंस बराबर था।

ऐसा कार्यक्रम जो स्थानीय जन को न जोड़ सके, स्थानीय भाषा में न हो सके, स्थानीय भावनाओं को अभिव्यक्त न कर सके वह चूँ- चूँ का मुरब्बा हो सकता है साहित्य नहीं। सोसाइटी अपने इस उद्देश्य में पूरी सफलता प्राप्त कर गई है। आयोजकों को कच्चे धागे से हाँथ बांधकर भोपाल के बड़े तालाब की परिक्रमा कर प्रायश्चित करना चाहिये कि लाखों रुपया और समय ऐसे कार्यक्रम पर बरबाद कर दिये जिसे कोई कभी याद भी नहीं करना चाहेगा।

भूख के अहसास को शेरो सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाक़िफ हो गई
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

मुझको सब्रो ज़ब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरण तक ले चलो

ख़ुद को ज़ख़्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बाँकपन तक ले चलो।

(यदि फेस्टिवल से जुड़ा कोई पक्ष सहमति या असहमति का आपका है तो आप अपने विचार mediainvite2017@gmail.com पर लिख कर भेज दीजिए)

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