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मध्यप्रदेश में एक नहीं, तीन थीं भोजशालाएँ
परमार राजवंश में राजा भोज ने अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। ऐसी दो और भोजशालाएँ थीं, जिन्हें ध्वस्त कर दिया गया था। पहली भोजशाला थी-उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में। राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे। ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण।
ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद तीन सौ वर्षों तक ये केंद्र सक्रिय रहे। परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया। उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए। धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय “मंडपदुर्ग’ के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था।

साल 2000-2001 में मुझे परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के साथ इन तीनों भोजशालाओं को निकट से देखने का अवसर मिला था। वह वाकई रोमांचकारी अनुभव था, जिनके प्रमाण दस्तावेजों में भी बिखरे हुए हैं।
उज्जैन में कहां
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महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है। डॉ. भट्ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहाँ कई बार आए थे। उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया। मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था।
इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक “भोजराज’ में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं। उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर “बिना नींव की मस्जिद’ कहलाता है। इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया। यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी।
मांडू में कहाँ
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शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है। “विक्रम स्मृति ग्रंथ’ में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष। इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्ट “परमारों की तीन भोजशालाएं’ विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए।

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-“धार एंड मांडू।’ 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था।
कौन था दिलावर खाँ
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दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खाँ गौरी को मालवा के नियंत्रण के लिए भेजा गया था। अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव की पराजय के बाद वे मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे। तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान् स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई। मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है। मांडू म्युजियम में इस्लामी दौर के विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं।
राजा भोज का रचना विश्व
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संग्रहालय की लाइब्रेरी में 417 पेज का यह शोध ग्रंथ भी भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है। इसके विभिन्न अध्यायों में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है। वे कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी। उनकी विद्वानों की परिषद में पाँच सौ से अधिक सृजनशील लोग थे। इनके लिए ही धार में सरस्वती कंठाभरण या शारदासदम् नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था। इसके पेज 309 पर शारदासदम को भारती भवन भी कहा गया है। यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है। यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भग्रह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था।
गुजरात के राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन: राजपुरोहित के अनुसार राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में यहाँ आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे। यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे। एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का। पेज 315 पर उल्लेख है कि मंडपदुर्ग के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्ट के पुत्र धनपति भट्ट को भोज ने भूमिदान की थी। एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी।
ग्यारह वर्ष जेल में रहीं: स्वतंत्रता के बाद संन्यासिन बनीं
भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में ऐसे क्राँतिकारियों की संख्या अनंत है जिन्होने अपने व्यक्तिगत भविष्य को दाव पर लगाकर स्वत्व और स्वाभिमान के लिये संघर्ष किया । ऐसी ही क्राँतिकारी थीं सुहासिनी गांगुली जो अपना उज्जवल भविष्य की दिशा को छोड़कर क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़ीं। स्वतंत्रता के बाद वे राजनीति में नहीं आईं अपितु सन्यासिन बनकर समाज की सेवा में जुटीं।
सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी सुहासिनी गांगुली का जन्म 3 फरवरी 1909 को बंगाल के खुलना में हुआ था । अब यह क्षेत्र बंगलादेश में है । परिवार भारतीय संस्कृति और परंपरा के लिये समर्पित था । इसके साथ ही समय की धारा के अनुरूप आधुनिक शिक्षा का भी पक्षधर था । इसीलिए सुहासिनी ने अपनी विद्यालयीन शिक्षा आरंभ की । वे प्रत्येक कक्षा में प्रथम रहतीं थीं । उन्होंने 1927 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की वह भी प्रथम श्रेणी में। वह चाहतीं तो बड़ी प्रशासनिक अधिकारी हो सकतीं थीं । लेकिन उन्होंने स्वाधीनता के संघर्ष का अपनाया । लेकिन बड़ी विडम्बना यह रही कि स्वतंत्रता के बाद उनके सामने जीवन यापन का भी संकट उत्पन्न हो गया । वे सन्यासिन होकर गुमनामी में चलीं गईं ।
उनके पिता का नाम अविनाश गांगुली और माता का नाम सरला देवी था । सुभाषिनी की पढ़ाई ढाका में हुई । ढाका के ईडन हाई स्कूल से 1924 में हाई स्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की और ईडन कालेज से 1927 में स्नातक बनीं । वे बहुत कुशाग्र बुद्धि और प्रत्येक कक्षा में अग्रणी तो रहती थीं किन्तु छात्र जीवन में भारतीयों के साथ अंग्रेज शिक्षकों का वर्ताव उन्हे सदैव विचलित करता था । उस समय का वातावरण ऐसा था कि यदि सड़क चलते किसी अंग्रेज ने किसी भारतीय नागरिकों के साथ अभद्रता की तो उसकी शिकायत नहीं हो सकती थी । अंग्रेजों द्वारा किये गये अपमान को सिर झुका कर स्वीकार करना ही होता था । सबसे बड़ी बात तो यह थी कि स्कूल और कालेज दोनों में प्रतिदिन इंग्लैंड की महारानी के प्रति समर्पण की प्रार्थना होती थी । सुहासिनी को यह प्रार्थना कभी अच्छी न लगती थी । वे यह प्रार्थना गातीं तो थीं पर उससे जुड़ न पाईं । स्कूल कालेज के अनुशासन और प्रार्थना शपथ की अनिवार्यता के चलते वे पंक्ति में खड़ी तो होती थीं पर उनके मन में सदैव प्रतिक्रिया होती और वे उद्विग्न हो उठतीं थीं । वे इससे बचने और देश वासियों को बचाने के विचारों में खो जातीं । तभी महाविद्यालयीन जीवन में उनका संपर्क दो ऐसी क्राँतिकारी महिलाओं से हो गया जो अंग्रेजों के विरुद्ध युवाओं को संगठित करने में लगीं थीं । ये दोनों क्राँतिकारी महिलाएँ थीं कल्याणी दास और कमलादास । जो स्वयं तो सीधे क्राँति की गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेती थी पर क्राँतिकारियों के बीच संपर्क सूत्र का काम करती थीं । विशेषकर संदेशों और शस्त्रों को लाने ले जाने के कार्य में । सुहासिनी को उनकी बातें अच्छी लगीं और वह अपना निजी भविष्य छोड़कर स्वाधीनता संग्राम की दिशा में मुड़ गई। उनका संपर्क क्राँतिकारियों से हुआ । क्राँतिकारी कल्याणी दास ने सुहासिनी को क्रांतिकारी नायक हेमन्त तरफदार से मिलवाया । हेमन्त तरफदार क्राँतिकारियों के समन्वय और शस्त्र संचालन सिखाने का काम करते थे । सुहासिनी ने इनसे पिस्तौल और बंदूक चलाना और समय आने पर स्वयं की सुरक्षा करने के तरीके भी सीखे ।
1930 में चटगाँव शस्त्रागार कांड हुआ । यह शस्त्रागार अंग्रेजों की सेना का था । क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के लिये शस्त्रों की आवश्यकता थी । क्रांतिकारियों ने इस शस्त्रागार लूटने की योजना बनाई । ताकि क्राँतिकारियों के पास पर्याप्त हथियार हो सकें । चटगाँव के इस शस्त्रागार लूटने की योजना में क्राँतिकारियों के बीच समन्वय की भूमिका सुहासिनी ने ही निभाई थी । इस कांड के बाद वे योजना अनुसार वे चंद्रपुर चलीं गयीं वहाँ क्रांतिकारी शशिधर आचार्य के साथ पत्नि का वेश बनाकर रहने लगीं और दोनों ने स्कूल शुरू कर लिया । स्कूल का संचालन और दोनों का पति पत्नि रूप रहना केवल वाह्य रूप था । वस्तुतः उनका घर और स्कूल दोनों क्रातिकारियों के मिलने और बैठकें करने का केन्द्र था। क्राँतिकारी वहां आते, ठहरते और संदेशों का आदान प्रदान करके चले जाते थे । पुलिस को इसकी भनक पुलिस को लग गयी थी । एक सितम्बर 1930 को इस विद्यालय में क्राँतिकारियों की एक बैठक चल रही थी । पुलिस ने विद्यालय घेर लिया । आमने सामने की गोली चली । क्रांतिकारी जीवन घोषाल बलिदान हो गये । शेष अन्य घायल हुये और गिरफ्तार कर लिये गये । जो गिरफ्तार हुये उनमें गणेश घोष, लोकनाथ बल, हेमन्त तरफदार और शशिधर आचार्य शामिल थे । सुहासिनी भी गिरफ्तार कर लीं गयीं । उन्हे आठ साल की सजा सुनाई गयी । उन्हे हिजली जेल में रखा गया । वे 1938 में जेल से रिहा हुईं । तब तक अंग्रेज भारत में क्राँतिकारी आदोलन का दमन कर चुके थे । लेकिन सुहासिनी चुप न रहीं वे अपने स्तर पर महिलाओं को संगठित करके स्थानीय समस्याओं और मानवाधिकार के लिए आँदोलन करती रहीं । उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में हिस्सा लिया उन्हे पुनः गिरफ्तार कर लिया गया और तीन साल की जेल हुई ।
वे 1945 में जेल से रिहा हुईं । जब जेल से बाहर आईं तो उन्हे ज्ञात हुआ कि क्रांतिकारी हेमन्त तरफदार एक सन्यासी के वैष में धनबाद में रह रहे हैं । सुहासिनी उनसे मिलने धनबाद गयीं और स्वयं भी सन्यासी होकर वहीं रहने लगीं । समाज सेवा करने लगीं । उस क्षेत्र में सुहासिनी दीदी के नाम से जानी जातीं । आजादी के बाद उनका आना जाना कलकत्ता आरंभ हुआ उन्होंने यहां भी एक आश्रम आरंभ किया और बच्चो को शिक्षा देने लगी । उन्होंने मूक बघिर बच्चो की सेवा को प्राथमिकता दी । और सन्यासी के रूप में ही उन्होंने 23 मार्च 1965 को देह त्यागी । उनके देह त्यागने के बाद ही उनके बारे में स्थानीय लोग जान सके ।






