महाकुंभ ने रचा इतिहास : योगी सरकार का अतुल्य प्रयास

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उत्तर प्रदेश के प्रयाग में आयोजित महाकुंभ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। चूंकि उत्तर प्रदेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध राज्य है, इसलिए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। इसके अंतर्गत योगी सरकार ने महाकुंभ के भव्य आयोजन के लिए 6,990 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। उन्होंने महाकुंभ के सफल आयोजन के लिए संबंधित अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए थे।

उल्लेखनीय है कि प्रयागराज में 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा स्नान के साथ कुंभ मेले का शुभारंभ हुआ था तथा 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के अंतिम स्नान के साथ इसका समापन हो गया। इस समयावधि में 50 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने स्नान किया। शाही स्नान 14 जनवरी को मकर संक्रांति पर, 29 जनवरी को मौनी अमावस्या पर, 3 फरवरी को बसंत पंचमी पर, 12 फरवरी को माघी पूर्णिमा पर तथा 26 फरवरी को महाशिवरात्रि पर हुआ। इन विशेष दिनों में श्रद्धालुओं की अत्यधिक भीड़ अधिक देखी गई।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ सहित देश के लगभग सभी राजनेता, अभिनेता, खिलाड़ी, व्यवसायी आदि संगम में स्नान कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संगम में डुबकी लगाई। इसके पश्चात उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि महाकुंभ में आज पवित्र संगम में डुबकी लगाकर मैं भी करोड़ों लोगों की तरह धन्य हुआ। मां गंगा सभी को असीम शांति, बुद्धि, सौहार्द और अच्छा स्वास्थ्य दें।

गृहमंत्री अमित शाह ने संगम में स्नान करने के पश्चात कहा कि कुंभ हमें शांति और सौहार्द का संदेश देता है। कुंभ आपसे यह नहीं पूछता है कि आप धर्म, जाति या संप्रदाय से हैं। यह सभी लोगों को गले लगाता है। इससे पूर्व उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा था कि महाकुंभ’ सनातन संस्कृति की अविरल धारा का अद्वितीय प्रतीक है। कुंभ समरसता पर आधारित हमारे सनातन जीवन-दर्शन को दर्शाता है। आज धर्म नगरी प्रयागराज में एकता और अखंडता के इस महापर्व में संगम स्नान करने और संतजनों का आशीर्वाद लेने के लिए उत्सुक हूं।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी संगम में दुबकी लगाई। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
आज तीर्थराज प्रयागराज में, भारत की शाश्वत आध्यात्मिक विरासत और लोक आस्था के प्रतीक महाकुंभ में स्नान-ध्यान करके स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विगत दिसंबर में महाकुंभ के दृष्टिगत प्रयागराज में लगभग 5500 करोड़ रुपये की विभिन्नम विकास परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्याृस किया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह विश्व के सबसे बड़े समागमों में से एक है, जहां 45 दिनों तक चलने वाले महायज्ञ के लिए प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं का स्वागत किया जाता है और इस अवसर के लिए एक नया नगर बसाया जाता है। प्रयागराज की धरती पर एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि महाकुंभ, देश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को नए शिखर पर ले जाएगा। उन्होंने कहा कि एकता के ऐसे महायज्ञ की चर्चा संपूर्ण विश्व में होगी।

भारत को पवित्र स्थलों और तीर्थों की भूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि यह गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और कई अन्य असंख्य नदियों की भूमि है। प्रयाग को इन नदियों के संगम, संग्रह, समागम, संयोजन, प्रभाव और शक्ति के रूप में वर्णित करते हुए तथा कई तीर्थ स्थलों के महत्व और उनकी महानता के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रयाग केवल तीन नदियों का संगम नहीं है, अपितु उससे भी कहीं अधिक है। यह एक पवित्र समय होता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब सभी दिव्य शक्तियां, अमृत, ऋषि और संत प्रयाग में उतरते हैं। प्रयाग एक ऐसा स्थान है जिसके बिना पुराण अधूरे रह जाएंगे। प्रयाग एक ऐसा स्थान है जिसकी स्तुति वेदों की ऋचाओं में की गई है। प्रयाग एक ऐसा स्थान है, जहां हर कदम पर पवित्र स्थान और पुण्य क्षेत्र हैं। प्रयागराज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने एक संस्कृत श्लोक पढ़ा और इसे समझाते हुए कहा कि त्रिवेणी का प्रभाव, वेणीमाधव की महिमा, सोमेश्वर का आशीर्वाद, ऋषि भारद्वाज की तपस्थली, भगवान नागराज वसु जी की विशेष भूमि, अक्षयवट की अमरता और ईश्वर की कृपा यही हमारे तीर्थराज प्रयाग को बनाती है। प्रयागराज एक ऐसी जगह है, जहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों तत्व उपलब्ध हैं। प्रयागराज केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, यह आध्यात्मिकता का अनुभव करने की जगह है।

उन्होंने कहा कि महाकुंभ हमारी आस्था, आध्यात्म और संस्कृति के दिव्य पर्व की विरासत की जीवंत पहचान है। हर बार महाकुंभ धर्म, ज्ञान, भक्ति और कला के दिव्य समागम का प्रतीक होता है। संगम में डुबकी लगाना करोड़ों तीर्थ स्थ लों की यात्रा के बराबर है। पवित्र डुबकी लगाने वाला व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। आस्था का यह शाश्वत प्रवाह विभिन्न सम्राटों और राज्यों के शासनकाल, यहां तक कि अंग्रेजों के निरंकुश शासन के दौरान भी कभी नहीं रुका और इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि कुंभ किसी बाहरी ताकतों द्वारा संचालित नहीं होता है। कुंभ मनुष्य की अंतरात्मा की चेतना का प्रतिनिधित्व करता है, वह चेतना जो भीतर से आती है और भारत के हर कोने से लोगों को संगम के तट पर खींचती है। गांवों, कस्बों, शहरों से लोग प्रयागराज की ओर निकलते हैं और सामूहिकता और जनसमूह की ऐसी शक्ति शायद ही कहीं और देखने को मिलती है। एक बार महाकुंभ में आने के बाद हर कोई एक हो जाता है, चाहे वह संत हो, मुनि हो, ज्ञानी हो या आम आदमी हो और जाति-पंथ का भेद भी खत्म हो जाता है। करोड़ों लोग एक लक्ष्य और एक विचार से जुड़ते हैं। महाकुंभ के दौरान विभिन्न राज्यों से अलग-अलग भाषा, जाति, विश्वास वाले करोड़ों लोग संगम पर एकत्र होकर एकजुटता का प्रदर्शन करते हैं। यही उनकी मान्यता है कि महाकुंभ एकता का महायज्ञ है, जहां हर तरह के भेदभाव का त्याग किया जाता है और यहां संगम में डुबकी लगाने वाला हर भारतीय एक भारत, श्रेष्ठ भारत की सुंदर तस्वीर पेश करता है।

उन्होंने भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा में कुंभ के महत्व पर बल दिया और बताया कि कैसे यह हमेशा से संतों के बीच महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों और चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श का मंच रहा है। उन्होंने कहा कि जब अतीत में आधुनिक संचार के माध्य्म मौजूद नहीं थे, तब कुंभ महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तनों का आधार बन गया, जहां संत और विद्वान राष्ट्र के कल्याण पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए और वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों पर विचार-विमर्श किया, जिससे देश की विचार प्रक्रिया को नई दिशा और ऊर्जा मिली। आज भी कुंभ एक ऐसे मंच के रूप में अपना महत्व बनाए हुए है, जहां इस तरह की चर्चाएं जारी रहती हैं, जो पूरे देश में सकारात्मक संदेश भेजती हैं और राष्ट्रीय कल्याण पर सामूहिक विचारों को प्रेरित करती हैं। भले ही ऐसे समारोहों के नाम, उपलब्धि और मार्ग अलग-अलग हों, लेकिन उद्देश्य और यात्रा एक ही है। कुंभ राष्ट्रीय विमर्श का प्रतीक और भविष्य की प्रगति का एक प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।

उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर मौजूदा सरकार के तहत भारत की परंपराओं और आस्था के प्रति गहरा सम्मान है। केंद्र और राज्य दोनों की सरकारें कुंभ में आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं प्रदान करना अपनी जिम्मेदारी मानती हैं। सरकार का लक्ष्यक विकास के साथ-साथ भारत की विरासत को समृद्ध करना भी है।

कुंभ सहायक
केंद्र एवं राज्य सरकारों ने महाकुंभ में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा। कुंभ के लिए पहली बार एआई और चैटबॉट तकनीक के उपयोग को चिह्नित करते हुए ‘कुंभ सहायक’ चैटबॉट का शुभारंभ किया गया, जो ग्यारह भारतीय भाषाओं में संवाद करने में सक्षम है। इससे लोगों को बहुत लाभ हुआ।

कुंभवाणी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गत 10 जनवरी को प्रयागराज स्थित सर्किट हाउस से महाकुंभ 2025 को समर्पित आकाशवाणी के विशेष एफएम चैनल‘कुंभवाणी एवं ‘कुंभ मंगल ध्वनि का लोकार्पण किया। उन्होंने कुंभ मंगल ध्वनि का भी लोकार्पण किया। उन्होंने कहा था कि कुम्भवाणी द्वारा प्रसारित आंखों देखा हाल उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभदायक होगा, जो कुंभ में भाग लेने के लिए प्रयागराज नहीं आ सकेंगे। यह इस ऐतिहासिक महाकुंभ के माहौल को देश व दुनिया तक पहुंचाने में सहायक होगा। देश के लोक सेवा प्रसारक प्रसार भारती की ये पहल न केवल भारत में आस्था की ऐतिहासिक परंपरा को बढ़ावा देगी, अपितु श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण जानकारी देगी व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का घर बैठे अनुभव करवाएगी।

उल्लेखनीय है कि योगी सरकर ने महाकुंभ से पूर्व प्रयागराज के ऐतिहासिक मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया। इसके साथ-साथ मंदिरों का नवीनीकरण भी किया गया। इसके अतिरिक्त राज्य में हरित क्षेत्र के विस्तार को बढ़ावा दिया गया। विशेषकर प्रयागराज जिले में सड़कों के किनारे पौधे लगाए गए। यह भी उल्लेखनीय है कि स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया गया। क्षेत्रों को पॉलीथिन से मुक्त रखने का भी प्रयास किया गया। इसके अंतर्गत महाकुंभ में सिंगल यूज्ड प्लास्टिक पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया गया था। मेले में प्राकृतिक उत्पाद जैसे दोना, पत्तल, कुल्हड़ एवं जूट व कपड़े के थैलों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया। योगी सरकार ने श्रद्धालुओं की प्रत्येक सुविधा का ध्यान रखा। इसके अंतर्गत यातावात की भी समुचित व्यवस्था की गई। प्रयागराज आने वाली बसों, रेलगाड़ियों एवं वायुयान की संख्या में वृद्धि की गई। महाकुंभ के लिए रेलवे द्वारा लगभग 1200 रेलगाड़ियां तथा परिवहन विभाग द्वारा सात हजार बसों का संचालन किया गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं हवाई जहाज से मेला स्थल का निरीक्षण किया। इसलिए यह कहना उचित है कि महाकुंभ के सफल आयोजन के लिए योगी सरकार बधाई की पात्र है।

(लेखक – लखनऊ विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर है)

दिल्ली दंगा के 5 साल

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मृत्युंजय कुमार

‘हम देखेंगे’ वाले कहीं दिख क्यों नहीं रहे? दिल्ली को लहूलुहान करने वाले बताएं कि CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई‍‍!

23, 24 एवं 25 फरवरी, 2020 भारत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत की तैयारियां कर रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति का यह भारत दौरा दुनिया भर में सुर्खियों में था। लेकिन देश की राजधानी में बैठे मुट्ठी भर लोग किसी और तैयारी में थे। जिस वक्त अमेरिकी राष्ट्रपति दिल्ली में मौजूद थे, वहां से चंद किलोमीटर दूर दंगा भड़क उठा। चुन-चुनकर हिंदुओं, सरकारी कर्मचारियों और पुलिस को निशाना बनाया जाने लगा।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति के दिल्ली में मौजूद रहने के दौरान ही दिल्ली को लहूलुहान करने की प्लानिंग हुई थी ताकि इसे वैश्विक मीडिया में ज्यादा से ज्यादा भुनाया जा सके। इन सबकी पृष्ठभूमि में CAA के खिलाफ चल रहा एक आंदोलन था। जिसका केंद्र दिल्ली का शाहीनबाग था। देश की राजधानी में सेकुलर-लिबरल गिरोह की गोद में पल रहे इस आंदोलन की तासीर शुरू से सांप्रदायिक थी। वहां के पोस्टर विषाक्त आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की कहानी कहते थे। पाकिस्तानी कवि फैज रातोंरात इन आंदोलनकारियों के धर्मपिता बन गए और ‘हम देखेंगे’ का नारा बुलंद होने लगा। देश की राजधानी में सड़क घेरकर ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ जैसे जिहादी जुमले पढ़े जाने लगे। पूर्वोत्तर भारत को देश से काटने की योजना मंच से समझाई जा रही थी। शाहीनबाग में नेशनल मीडिया के रिपोर्टर्स से मारपीट की खबरें आए दिन आती थीं। इस दौरान दिल्ली का शाहीनबाग एक ऐसा इलाका बन गया था, जहां पुलिस, प्रशासन और सरकार की कोई परवाह नहीं थी। एक तरह से वहां समानांतर सरकार चलाने की कोशिश की गई। लेकिन भाजपा विरोध में अंधे आंदोलनजीवी इन सबसे मुंह मोड़े रहे। शाहीनबाग के गर्भ में पल रहे इस सांप्रदायिक दंगे में उन्होंने क्रांति की किरण देखी। मीडिया प्रोपगैंडा के दम पर 80 साल की एक अनपढ़ बुजुर्ग महिला को आंदोलन का आइकॉन बनाया गया। दुनिया भर में ऐसा प्रचारित किया गया कि भारत अपने यहां के अल्पसंख्यकों से नागरिकता का अधिकार छीनने वाला है।

इस पूरी कवायद के नतीजे में दिल्ली को जख्म और एक बदनुमा दाग मिला। देश की राजधानी में दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क के राष्ट्रपति की मौजूदगी में दंगा हुआ। हिंदुओं की संपत्ति कोे चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी के नेता की छत पर एक बड़ी गुलेल मिली, जिसके सहारे पत्थर और पेट्रोल बम हिंदू घरों पर फेंके जा रहे थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा शुरू होने के समय वैश्विक मीडिया में भारत की बढ़ती सामरिक, राजनैतिक और आर्थिक शक्ति की खबरें थीं। लेकिन 23, 24 एवं 25 फरवरी के बीच स्थिति बदल गई। अब वैश्विक मीडिया के केंद्र में दिल्ली का दंगा था। भारत की छवि एक युद्धग्रस्त, आतंरिक कलह से जूझते देश के रूप में गढ़ने की नाकाम कोशिश की गई।

हालांकि इस दंगे को 5 साल बीत चुके हैं। बीते दिनों CAA भी शांतिपूर्ण तरीके से लागू हो गया। दंगाई जेल भी गए। देश सामरिक, राजनैतिक और आर्थिक मोर्चे पर नित्य नई ऊंचाइयां छू रहा है।

लेकिन इन सबके बीच फिर वही सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली को दंगे की आग में क्यों झोंका गया? 5 साल पहले के सोशल मीडिया पोस्ट्स और मीडिया की सुर्खियां देखेंगे तो पाएंगे कि उसमें CAA को नागरिकता छीनने वाला कानून बताया गया था। मुसलमानों के मन में डर बैठाया गया कि CAA के लागू होते ही उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी। दूसरी ओर, सरकार की ओर से लगातार सफाई पेश की जाती रही कि CAA पड़ोसी देशों के सताए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने वाला कानून है न कि किसी की नागरिकता छीनने वाला। लेकिन नई-नई शुरू हुई यूट्यूब पत्रकारिता के उस दौर में अफवाह सच से तेज निकली। दिल्ली को झुलसना पड़ा। तिकड़मबाजी के चक्कर में नौकरी गंवाने वाले पुराने संपादक माइक लेकर सड़कों पर उतर आए। झूठ फैलाने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। बदले में इन्होंने यूट्यूब पर अपना साम्राज्य खड़ा किया और दिल्ली के हिस्से में दंगा आया। आज दिल्ली के दंगाई तो जेल में हैं। लेकिन वे सिर्फ प्यादे भर थे। जिन्होंने इस दंगे को भड़काया, वे आज भी अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे हैं, यूट्यूब पर भ्रामक थंबनेल के सहारे पेट पाल रहे हैं।

दिल्ली दंगे के 5 साल बाद शाहीनबाग के आंदोलन को हवा देने वाले स्वघोषित बुद्धिजीवियों से पूछा जाना चाहिए कि इतने दिनों में CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई, कितने मुसलमानों को पाकिस्तान भेजा गया। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लखनऊ से लेकर हैदराबाद और पटना से लेकर दिल्ली को दहलाने का क्या मतलब था? CAA को देश के मुसलमानों के खिलाफ बताने वाली मीडिया रिपोर्ट्स का क्या मकसद था?

क्या ‘हम देखेंगे’ का नारा बुलंद करने वाले आंदोलनजीवियों की जिम्मेदारी नहीं है कि वह एक ख्याली मुद्दे पर आंदोलन शुरू करने और देश को दंगे में झोंकने के लिए माफी मांगें?

5 साल बाद यह बात शीशे की तरह साफ हो गई है कि दिल्ली का दंगा एक साजिश था। जिस आंदोलन ने यह दंगा फैलाया, उसकी कोई वजह ही नहीं थी। एक ख्याली मुद्दे पर आंदोलन शुरू किया गया था।

अगर पैटर्न देखें तो पाएंगे कि शाहीनबाग का आंदोलन और दिल्ली दंगा इकलौता ऐसा मामला नहीं है। इससे पहले 2015 का जेएनयू विवाद हो या 2021 का लालकिला हिंसा। हर बार हिंसा से सहारे देश को अस्थिर करने की कोशिश हुई। इन सबके पीछे आंदोलनजीवी टूलकिट गैंग का हाथ पाया गया।
इस टूलकिट गैंग की बैचेनी समझना भी ज्यादा मुश्किल नहीं है। दरअसल, आजादी के बाद इन्हें लगातार सत्ता का साथ मिलता रहा। सत्ता की गोद में बैठकर एनजीओ, सभा-समितियों, मीडिया और शिक्षण संस्थानों पर 6 दशक तक कब्जा जमाए रखने वाला यह वर्ग 2014 के बाद से खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा था। भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय गिरोहों से मिलने वाली इनकी मदद भी प्रायः बंद हो गई। दूसरी ओर, देश की जनता चुनावों में खुलकर भारतीयता और सनातन का पक्ष लेने लगी।

ऐसी स्थिति में टूलकिल गैंग ने देश को अस्थिर करने की असफल कोशिश की। उपद्रव के सहारे लोकतंत्र के कुचलने की कोशिश हुई। बिल्कुल यही पैटर्न श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में भी देखने को मिला। अंतर बस इतना है कि श्रीलंका, म्यांमार और बांग्लादेश में उपद्रव करके सरकार गिरा दी गई। लेकिन भारतवंशियों ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रभक्ति के दम पर देसी-विदेशी टूटकिट गैंग के प्रोपगैंडे को ध्वस्त कर दिया।

दिल्ली दंगे की बरसी इस पूरे प्रसंग के अवलोकन का समय होना चाहिए। अगर भारत को सशक्त, समृद्ध और वैभवशाली राष्ट्र के रूप में खड़ा करना है तो इस टूलकिट गैंग से निपटने और उपद्रव करके देश को अस्थिर करने वाली साजिशों को बेनकाब करते रहना होगा। सरकार के पास ऐसी ताकतों से निपटने के लिए पर्याप्त बल है। लेकिन राष्ट्र विरोधी प्रोपगैंडा से लड़ने के लिए देश के सुधी नागरिकों को भी आगे आना होगा।

दिल्ली दंगे की बरसी पर आंदोलनजीवियों से पूछना होगा कि ‘हम देखेंगे’ वाले कहीं दिख क्यों नहीं रहे? दिल्ली को लहूलुहान करने वाले बताएं कि CAA से कितने मुसलमानों की नागरिकता गई‍‍! अगर इससे किसी की नागरिकता नहीं गई (जो कि सच्चाई है) तो देश को दंगे में झोंकने वाले बुद्धिजीवी शर्म करें और राष्ट्र के प्रति इस गंभीर अपराध के लिए माफी मांगें।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान में पत्रकारिता पढ़ाते हैं)

एक डरावना ख्वाब या हक़ीक़त?

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2047 के “विकसित भारत” में आगरा की क्या तस्वीर होगी? क्या ताज सिटी आगरा भारत के टॉप 5 स्मार्ट शहरों में शुमार होगा? या फिर ये शहरी बदहवासी और लापरवाही के साये में एक डरावने ख्वाब में तब्दील हो जाएगा?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने टाइम मशीन का सहारा लिया। “टीएम” के लेंस के जरिए हमने भविष्य के आगरा की एक झलक देखी…जो इतनी डरावनी थी कि दिल दहल गया।
हमारी रिपोर्ट:

“ये 2047 की एक तपती हुई सोमवार की दोपहर है। मैं दिल्ली-आगरा हाईवे पर उतरता हूँ। सिकंदरा से लेकर ताजमहल तक, सड़कें बर्बादी का एक डरावना नज़ारा पेश कर रही हैं। धूल और कूड़े से भरी हुई ये सड़कें, ढहती हुई इमारतों से घिरी हुई हैं। बसें जहरीला धुआँ उगल रही हैं, जिससे हवा में बदबू फैल रही है।

हरि पर्वत चौराहे पर, ट्रैफिक पुलिस मास्क और इनहेलर बांट रही है, ताकि लोग जहरीली हवा से बच सकें। जब हम राजा की मंडी पहुँचते हैं, तो हमें ऑक्सीजन बूथ पर ले जाया जाता है, ताकि हम अपने फेफड़ों को ताज़ी हवा से भर सकें। जून की गर्मी इतनी तेज़ है कि सहन करना मुश्किल है।
हम एक रेस्तरां में शरण लेते हैं, लेकिन वहाँ बिजली गुल होने की वजह से अंधेरा और बदबूदार माहौल है। सड़कों पर दम घुट रहा है, हॉर्न बजाते वाहनों की भीड़ है, और शोर इतना ज़्यादा है कि कान पक जाएँ। मेट्रो सेवाएँ, जो कभी उम्मीद की किरण हुआ करती थीं, बहुत पहले बंद कर दी गई थीं, क्योंकि औसत यात्री महंगे टिकट नहीं खरीद पा रहा था। मेडिकल कॉलेज आधा खाली पड़ा है, इसके हॉल अव्यवस्था से भरे हुए हैं। बाहर लंबी लाइन लगी है। सूर सदन खस्ता हाल दिख रहा है। वॉचमैन कह रहा है, ‘अब सब घर बैठे देखते हैं।’ हर कोई खौफज़दा है। सड़क पर कम लोग हैं, वाहनों से कम। ऐसा लग रहा है कि शहर का बुनियादी ढांचा लगातार दबाव के कारण ढह गया है।

यमुना नदी, जो कभी जीवन रेखा हुआ करती थी, अब एक स्थिर, प्रदूषित धारा बन गई है। इसके किनारों पर झुग्गियाँ हैं, और नदी के तल पर कॉलोनियाँ उग आई हैं। तथाकथित ‘स्मार्ट सिटी’ एक अव्यवस्थित फैलाव में बदल गई है, जो अनियोजित शहरीकरण का शिकार है। कॉलेज परिसर भयावह रूप से खाली हैं, क्योंकि छात्र अपने उपकरणों से चिपके हुए हैं। उन्हें ऐसी दुनिया में कक्षाओं की कोई ज़रूरत नहीं है, जहाँ AI ही सारा सोचने का काम करता है।

आगरा में प्रदूषण की एक गहरी धुंध छाई हुई है, जो राजसी ताजमहल को ढक रही है। हवा में ज़हर घुला हुआ है, हर शख़्स परेशान दिख रहा है। नदी, औद्योगिक कचरे का कब्रिस्तान बन गई है। सामुदायिक तालाब और नहर नेटवर्क, जो कभी जीवन से गुलज़ार रहते थे, अब घुटन भरे आशियानों से भर गए हैं – विफल शहरी नियोजन का एक डरावना सबूत। सड़कें अव्यवस्थित गंदगी से भरी हैं। जीर्ण-शीर्ण इमारतें उपेक्षा के बोझ तले ढह रही हैं, उनके अग्रभाग पर गंदगी के निशान हैं। कभी जीवंत और रंगीन रहने वाले बाजार अब भूतिया छाया बनकर रह गए हैं। दुकानें वीरान खड़ी हैं, उनकी खामोशी केवल गड्ढों से भरी सड़कों पर चलने वाले खस्ताहाल वाहनों के कराहते इंजनों से टूटती है।

आगरा में ‘विकसित भारत’ का वादा धूल में मिल गया है। स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, जिन्हें कभी उद्धारक के रूप में सराहा गया था, अब विफल महत्वाकांक्षाओं के खोखले स्मारक बनकर रह गई हैं। गहरे मुद्दों को छिपाने के लिए किए गए सौंदर्यीकरण के प्रयास गुमनामी में खो गए हैं। ताजमहल, जो कभी शाश्वत प्रेम का प्रतीक था, पर एसिड रेन और उपेक्षा के निशान हैं। शहर की गंदगी से दूर रहने वाले पर्यटक गायब हो गए हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है। AI होटल के कमरों में आराम से वर्चुअल टूरिज्म की व्यवस्था करता है।

युवा लोग उम्मीद की किरण दिखाने वाले शहरों में अवसरों की तलाश में भाग गए हैं। केवल बूढ़े, बीमार और बेसहारा लोग ही बचे हैं, जो एक ऐसे शहर में फंसे हुए हैं जिसने उन्हें छोड़ दिया है। कभी आगरा की शान रहे शैक्षणिक संस्थान वीरान हो चुके हैं, उनके पुस्तकालय धूल खा रहे हैं। शहर की जीवंत संस्कृति मुरझा गई है, उसकी जगह निराशा ने ले ली है।

मैं झटकों को झेलने के लिए शाहजहां के बगीचे में रुकता हूं। प्यास से कलेजा बैठा है, एक दुकान से पानी की बोतल मांगता हूं, ” पानी नहीं है, नुक्कड़ के स्टोर से ठंडी बीयर ले लो,” शॉप कीपर एक नेक सलाह देता है।
मैं सोचता हूं, वास्तव में, “आगरा 2047″ एक चेतावनी भरी कहानी है। ये याद दिलाती है कि जब शहरी समस्याओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है, जब अल्पकालिक समाधान दीर्घकालिक समाधानों पर हावी हो जाते हैं, और जब लालच और उदासीनता दूरदर्शिता और करुणा पर हावी हो जाती है, तो क्या होता है। ये एक ऐसा शहर है जो अपना रास्ता खो चुका है, एक ऐसा शहर जिसने क्षणभंगुर लाभों के लिए अपने भविष्य का बलिदान कर दिया है। ये अनियंत्रित शहरी क्षय के विनाशकारी परिणामों का एक डरावना प्रमाण है।”

चिंतित और खौफज़दा हम टाइम मशीन में दाखिल होकर, वर्तमान में लौटने का फैसला करते हैं। लेकिन आगरा के संभावित पतन की भयावह दृष्टि बनी हुई है। क्या हम अपने प्यारे शहर को बचाने के लिए अभी कदम उठाएंगे, या हम इसे बर्बाद होने देंगे? ये चुनाव करना हमारा अधिकार है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का इतिहास भारत और विश्व मे मातृभाषाओं की स्थिति

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समीर कौशिक

मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहचान, संस्कृति और समाज से जुड़ी होती है। यह भाषा, जो एक व्यक्ति बचपन से ही सीखता है, भाषा न केवल संचार का माध्यम है, बल्कि यह समाज के सोचने और समझने का तरीका भी बन जाती है। विश्व भर में भाषाओं की स्थिति और उनका अस्तित्व बहुत विविधतापूर्ण है। आज के समय में, मातृभाषाओं का अस्तित्व संकट में है, और यह संकट कई कारणों से उत्पन्न हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) द्वारा 1999 में घोषित किया गया था। यह दिवस भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मातृभाषा किसी भी व्यक्ति के आत्म-संस्कार, संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा होती है, और इस दिन को मनाने का उद्देश्य मातृभाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
इस दिन की शुरुआत बांग्लादेश में 1952 में हुए एक ऐतिहासिक घटना से हुई। उस समय बांग्लादेश (जो तब पूर्व पाकिस्तान था) में उर्दू को राष्ट्रभाषा के रूप में लागू करने का विरोध किया गया था, क्योंकि बांग्लादेशी लोग अपनी मातृभाषा बंगाली में बात करते थे। इस विरोध के दौरान, 21 फरवरी 1952 को ढाका में पुलिस फायरिंग में कई छात्रों की मृत्यु हो गई। इस घटना को याद करते हुए, 1999 में UNESCO ने 21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।

भारत में मातृभाषा का विशेष महत्व है क्योंकि यहां की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता विश्वभर में प्रसिद्ध है। भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं, जिन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा, लगभग 122 प्रमुख भाषाएं और 1599 बोलियाँ देश में बोली जाती हैं। प्रत्येक राज्य और क्षेत्र की अपनी एक प्रमुख मातृभाषा है, जिसे लोग अपनी दैनिक जीवनशैली और संचार में इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, भारत में मातृभाषाओं की स्थिति में कई बदलाव आए हैं। आजकल, शिक्षा, सरकारी कामकाजी भाषा और मीडिया में अंग्रेजी का प्रभाव बढ़ गया है, जिसके कारण कई मातृभाषाएं संकट की स्थिती में हैं। विशेष रूप से बड़े शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर दक्षिणी एवं पूर्वोत्तर के राज्यों में लोग अपनी मातृभाषाओं की जगह अंग्रेजी का अधिक प्रयोग करने लगे हैं, जिससे स्थानीय भाषाओं का प्रयोग घट रहा है। कई भाषाएं अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान खो रही हैं।

भारत सरकार ने भाषाओं के संरक्षण के लिए कई उपाय किए हैं, जैसे ‘संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषाओं का समावेश’, ‘राष्ट्रीय भाषा नीति’ 2020 और ‘मातृभाषा में शिक्षा’ को बढ़ावा देना। इसके अलावा, कई गैर सरकारी संगठन और भाषा संस्थान भी मातृभाषाओं के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए काम कर रहे हैं। फिर भी, भारत में कुछ भाषाएं ऐसे संकट का सामना कर रही हैं, जो भविष्य में विलुप्त हो सकती हैं।

विश्व में मातृभाषाओं की स्थिति भी आज विचारणीय है जिसे कुछ बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है ।

भाषाई विधाताओं के रूप में यदि समझा जाए तो विश्व में लगभग 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही प्रमुख हैं, और बहुत सी भाषाएँ कम बोलने वाले समुदायों द्वारा बोली जाती हैं। यूनेस्को के अनुसार, 90% भाषाओं में से आधी से अधिक भाषाएं ऐसे संकट में हैं जो विलुप्त हो सकती हैं। यह संकट मुख्य रूप से शहरीकरण, शिक्षा, और वैश्वीकरण के प्रभावों के कारण उत्पन्न हुआ है, जिसके चलते लोग अपनी मातृभाषाओं के स्थान पर अधिक व्यापक भाषाओं का उपयोग करते हैं, जैसे कि अंग्रेजी, हिंदी, स्पैनिश आदि।

वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) का अपना एक अलग प्रभाव विश्व भर में मातृभाषाओं पर देखा जा सकता है जिसके चलते आज बहुतायत मातृभाषाओं के स्थान पर अंग्रेजी भाषा लेती जा रही है जैसे कि भारत के पूर्वोत्तर के राज्योँ की स्थिति है अफ़्रीकी देशों के समेत विश्व में बहुत सारे देश हैं जंहा पर स्थानीय मातृभाषाओं के साथ ऐसी स्थिति है ।

विश्व में आज लगभग 2,500 भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। ये भाषाएँ अक्सर छोटे समुदायों द्वारा बोली जाती हैं, और जब इस समुदाय की संख्या घटती जाती है, तो उस भाषा का प्रयोग भी धीरे-धीरे कम होता जाता है। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा अंग्रेजी भाषा का प्रसार बढ़ाया गया। इसके परिणामस्वरूप, मातृभाषाओं की उपयोगिता में कमी आई है। विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, बच्चों को अपनी मातृभाषा के बजाय अंग्रेजी या अन्य प्रमुख भाषाएँ सिखाई जा रही हैं। इसके कारण, मातृभाषाएँ शिक्षा, सरकार और मीडिया के प्रभाव से बाहर हो रही हैं, और उनका संरक्षण और प्रोत्साहन चुनौतीपूर्ण हो गया है ।

कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भाषाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं। यूनेस्को द्वारा विभिन्न भाषाओं के संरक्षण के लिए ‘इंटरनेशनल डे फॉर लिंग्विस्टिक डाइवर्सिटी’ जैसे पहल किए गए हैं। कई सरकारें अपनी मातृभाषाओं को बढ़ावा देने के लिए नीति बना रही हैं। जैसे, चीन ने मांचू, म्यामार ने बर्मी, और भारत ने हिंदी, तमिल, बंगाली, आदि भाषाओं के संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं ।

मातृभाषा न केवल वार्तालाप का माध्यम होती है, बल्कि यह किसी समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं का भी संवाहक होती है। जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसके साथ उस भाषा के बोलने वालों की सांस्कृतिक पहचान भी समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही, भाषा के साथ जुड़ी हुई काव्य, गीत, लोककथाएँ, और परंपराएँ भी समाप्त हो जाती हैं ।

मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए समाज और सरकार दोनों का योगदान आवश्यक है। सरकारों को चाहिए कि वे मातृभाषाओं को शिक्षा, प्रशासन, और मीडिया में प्राथमिकता दें। इसके साथ ही, मातृभाषाओं को बच्चों को सिखाने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना चाहिए। समाज को भी इन भाषाओं को जीवित रखने के लिए स्थानीय स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए और युवा पीढ़ी को इन भाषाओं के प्रति जागरूक करना चाहिए ।

आज के युग में, विश्व भर में मातृभाषाओं के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। हालांकि, कई भाषाओं के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन वैश्वीकरण, शिक्षा की एकरूपता और शहरीकरण जैसे कारणों से यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। हर समाज और देश का यह कर्तव्य है कि वह अपनी मातृभाषाओं को संरक्षित करे और उन्हें अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखे, ताकि भाषा और संस्कृति की समृद्धि बनी रहे ।

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