सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है भारत: केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत

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बृजेश भट्ट

प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर और प्रसिद्ध संस्कृत साहित्यकार डॉ. हरेकृष्ण मेहेर संस्कार भारती के ’भरतमुनि सम्मान 2024’ से सम्मानित

नई दिल्ली, 23 फरवरी 2025: केन्द्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री गजेंन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है और इस दिशा में आगे बढ़ते हुए हम सभी को सजग और सतर्क रहने की जरूरत है।
श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत संस्कार भारती के कार्यक्रम ‘भरतमुनि सम्मान-2024’ में उपस्थित कला एवं साहित्य क्षेत्र से जुड़े साधकों को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने लखनऊ कत्थक केन्द्र से दीक्षा प्राप्त प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर एवं आधुनिक संस्कृत साहित्य के प्रतिष्ठित कवि एवं गीतकार डॉ. हरेकृष्ण मेहेर को ‘भरतमुनि सम्मान-2024’ से सम्मानित किया। सम्मान के रूप में एक स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र एवं 1.51 लाख रुपए की राशि समर्पित की गई। श्री शेखावत ने कहा कि कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में ‘भरतमुनि सम्मान’ से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पुरस्कार विजेताओं ने पुरातन कला एवं संस्कृति को जीवंत रखने का काम किया है। भारत एक बार फिर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है। हालांकि आगे बढ़ते हुए सभी को सजग एवं सतर्क रहने की भी आवश्यकता है।

‘भरतमुनि सम्मान 2024’ से सम्मानित कत्थक नृत्यांगना डा. कुमकुम धर ने कहा कि पंचम वेद से विख्यात नाट्य शास्त्र के रचियता महर्षि भरतमुनि सम्मान को पाकर वह अभिभूत है। इस सम्मान के लिये चुने जाने पर उन्होंने चयनसमिति का आभार जताया। उन्होंने कहा कि कला मानव चित्त को निर्मल और जीवन को अनुशासित करती है। कला साधना वाले मर्यादित और देशप्रेम के भाव वाले होते हैं।

भरतमुनि सम्मान – 2024’ से सम्मानित साहित्यकार डा.ॅ हरेकृष्ण मेहेर ने साहित्य जगत के प्रति संस्कार भारती के सम्मान को अत्यंत गौरव की बात बताया। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे संस्कृत साहित्य के लिये जो सम्मान दिया गया है, उससे में कृतज्ञ महसूस कर रहा हूं। यह मेरा सौभाग्य है।’’ यह देश और उनके प्रदेश ओड़ीशा के लिये गौरव की बात है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी ने अपने सारगर्भित संबोधन में उपस्थित श्रोताओं को भारतीय कला-संस्कृति के लिए समर्पित होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा महर्षि भरतमुनि ने जीवन भर साधना की, कठिन साधना से ही सफलता मिलती है। ऐसे ही दो साधकों को जिन्होंने जीवन भर कड़ी साधना की, उन्हें आज संस्कार भारती ने सम्मानित किया। उन्होंने कहा, ‘शब्द’ और ‘स्वरों’ की अपनी दुनिया है; रंग-रेखाओं की अपनी दुनिया है। वहीं भाव- भंगिमाओं की भी अलग दुनिया है। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ ने इन सभी को एक स्थान पर ला दिया।

गणित और संगीत ही पूरी दुनिया है। विश्व कल्याण के लिए मानव का संस्कारी होना आवश्यक है, संस्कार शून्यता रही तो कभी भी देश आगे नहीं बढ़ सकता और संपूर्ण भारत को संस्कारित करना ही संस्कार भारती का उद्देश्य है। इस दिशा में कला ही श्रेष्ठतम साधन है।

इस अवसर पर संस्कार भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष डॉ. मैसूर मंजूनाथ ने कहा कि महर्षि भरतमुनि को समर्पित इस सम्मान के लिए विशिष्ट कलाकारों और साहित्यकारों को सम्मानित करते हुए संस्कार भारती गौरवान्वित अनुभव कर रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गत वर्ष बेंगलुरु में आयोजित ‘कलासाधक संगम’ में इस प्रतिष्ठित सम्मान देने का शुभारंभ किया था। प्रथम पुरस्कार मुंबई के चित्रकार श्री विजय दशरथ आचरेकर एवं लोककला क्षेत्र में सिंधुदुर्ग के श्री गणपत सखाराम मसगे को दिया गया था। यह वार्षिक सम्मान प्रतिवर्ष दो विधाओं में दिया जाता है। सम्मान के लिये संस्थाओं, कला विश्वविद्यालयों एवं व्यक्तिगत संपर्कों के आधार पर प्राप्त आवेदनों का निर्णायक मंडल द्वारा चयन किया जाता है।

पद्मश्री पंडित रामदयाल शर्मा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, कथक केंद्र निदेशक प्रणामी भगवती, नेशनल मॉडन आर्ट गैलरी निदेशक पूजा हल्ली, हरियाणा प्रान्त अध्यक्षा पद्मश्री सुमित्रा गुहा,अधिवक्ता सोशल एक्टिविस्ट सुबुही खान,सोशल एक्टिविस्ट प्रीति पाण्डेय और देश के नामचीन कला साधक और अनेक कला संस्थानों,साचि अध्यक्ष सहित समाजिक जगत डॉक्टर, प्रोफेसर विद्यार्थी आदि उपस्थित थे

लेख- महाकुंभ और कांग्रेस: हिंदू समाज से बढ़ती दूरी का दंश! — सोनम लववंशी

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प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—जहाँ भी कुंभ का आयोजन होता है, वहाँ करोड़ों श्रद्धालु उमड़ते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई, व्यापकता और एकता का महोत्सव है। यह सनातन परंपराओं का जीता-जागता प्रमाण है, जहाँ साधु-संतों से लेकर आमजन तक, आस्था के इस महासागर में डुबकी लगाने पहुँचते हैं। लेकिन जब देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, जिसने दशकों तक सत्ता चलाई, इस महापर्व से स्वयं को दूर कर ले, तो यह केवल राजनीतिक चूक नहीं, एक गहरी वैचारिक खाई का संकेत देता है।

कुंभ में हर बार राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि आते रहे हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रीगण और अन्य नेता संतों का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं, लेकिन कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता का वहाँ न पहुँचना महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति जान पड़ती है। आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस आयोजन से दूरी बना लेता है? क्या कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन है, या फिर यह भारत की आत्मा से जुड़ा एक सांस्कृतिक पर्व भी है? दरअसल, कांग्रेस के अंदर पिछले कुछ दशकों में एक विचारधारा विकसित हुई है, जिसमें हिंदू प्रतीकों और आयोजनों से दूरी बनाने को ‘धर्मनिरपेक्षता’ समझा जाता है। यह पार्टी एक समय में सर्वसमावेशी हुआ करती थी, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों को साथ लिया। लेकिन आज यह अपने ही मूल स्वरूप से भटक गई है। यह वही कांग्रेस है, जिसने कभी राम जन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया, रामसेतु के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाया, और हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द गढ़कर सनातन आस्थाओं को कटघरे में खड़ा किया।

यदि कुंभ किसी विशेष राजनीतिक दल का आयोजन नहीं है, तो फिर कांग्रेस इसे अपने कार्यक्रमों की सूची से बाहर क्यों रखती है? क्या उसे यह भय है कि यदि वह ऐसे आयोजनों में शामिल हुई तो उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि धूमिल हो जाएगी? लेकिन धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से दूरी बनाना तो कतई नहीं होता, बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करना होता है। जब कांग्रेस के नेता ईद की शुभकामनाएँ देने मस्जिदों में जा सकते हैं, क्रिसमस के मौकों पर चर्चों में प्रार्थना कर सकते हैं, तो फिर कुंभ में शामिल होने में कैसी हिचकिचाहट? क्या हिंदुओं के पर्वों से दूरी बनाकर ही वह अपनी ‘समावेशी राजनीति’ को बचाए रखना चाहती है? कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसका महत्व किसी भी मेले या राजनीतिक सभा से कहीं अधिक है। यहाँ आकर केवल स्नान नहीं होता, बल्कि संत-समागम के माध्यम से समाज को दिशा मिलती है, आध्यात्मिक चिंतन होता है, संस्कृति का संरक्षण होता है। जब राजनेता और शासक यहाँ आकर संतों का आशीर्वाद लेते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं रहता, पूरे समाज के प्रति एक सकारात्मक संकेत होता है। लेकिन कांग्रेस का इससे विमुख रहना उसके वर्तमान वैचारिक संकट को उजागर करता है। इसका असर भी स्पष्ट दिखता है।

कांग्रेस, जो कभी देश के हर वर्ग की पार्टी मानी जाती थी, आज हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग की नज़र में अविश्वसनीय बन चुकी है। मंदिरों में दर्शन करना उसे राजनीतिक मजबूरी लगती है, जबकि दूसरी ओर अन्य दल इसे सहज रूप में अपनाते हैं। क्या यह अजीब नहीं कि जिस देश में बहुसंख्यक हिंदू हैं, वहाँ की सबसे पुरानी पार्टी हिंदू प्रतीकों से कतराने लगी है? क्या यह महज संयोग है कि कांग्रेस का समर्थन आधार दिनोंदिन सिकुड़ता जा रहा है? यहाँ एक और सवाल उठता है—क्या हिंदू समाज कांग्रेस के इस व्यवहार को समझ नहीं रहा? क्या वह नहीं देख रहा कि कांग्रेस का झुकाव किस दिशा में बढ़ रहा है? जब हिंदू आस्थाओं की बात आती है, तो कांग्रेस अक्सर या तो चुप्पी साध लेती है या फिर उसका स्वर आलोचनात्मक हो जाता है। जबकि अन्य समुदायों के मामलों में वह फौरन सक्रिय हो जाती है। यह भेदभाव स्पष्ट है और यही वजह है कि हिंदू समाज अब कांग्रेस को शक की नजर से देखने लगा है।

कुंभ से दूरी बनाकर कांग्रेस यह संकेत देती है कि वह अब अपने ही देश की सांस्कृतिक धारा से कट चुकी है। लेकिन क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह स्थिति लाभकारी हो सकती है? इतिहास गवाह है कि जो दल जनता की आस्थाओं को समझने में चूक करता है, वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। कांग्रेस का अस्तित्व भी इसी मोड़ पर खड़ा है—क्या वह अपने इस रवैये से कोई सबक लेगी? या फिर वह अपने ही ऐतिहासिक विरासत को भूलकर एक ऐसे मार्ग पर बढ़ती रहेगी, जो उसे राजनीतिक हाशिए पर ला खड़ा करेगा? कुंभ का आयोजन किसी सरकार या राजनीतिक दल की पहल पर नहीं होता, यह भारत की सनातन परंपरा का हिस्सा है। इसे किसी पार्टी के चश्मे से देखने की भूल करना कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकता है। अगर वह अपनी जड़ें बचाना चाहती है, तो उसे इस कटु सत्य को समझना होगा कि हिंदू समाज को नकारकर, हिंदुत्व से दूरी बनाकर, और अपनी विचारधारा को महज तुष्टीकरण तक सीमित करके वह न तो धर्मनिरपेक्ष रह पाएगी और न ही राजनीतिक रूप से प्रासंगिक। कुंभ तो हर बार आएगा, लेकिन क्या कांग्रेस को इसमें कोई स्थान मिलेगा? यह सवाल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा है।

संघर्ष एक भारतीय प्रवासी परिवार का

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– कर्नल मूल भार्गव

दिल्ली। वर्ष 2014 अप्रैल, परमानेंट रेसिडेंटशिप लेकर, पत्नी और दो किशोर बच्चों को लेकर पर्थ आ तो गया था परंतु यहां आकर पता चला कि परमानेंट रेजिडेंट किसी नौकरी का सीधा माध्यम नहीं था। बल्कि कोई साधारण नौकरी पाने के लिए भी धक्के खाने पड़ेंगे। और भारत का अनुभव या डिग्री का कोई खास महत्व शुरू में नहीं होता।

भारत की जमा पूंजी यहां लाकर एक स्टोर खरीदा था, शुरू में ठीक चला पर कुछ ही महीनों बाद दो बड़े स्टोर और खुल गए और बिक्री धड़ाम से नीचे आ गिरी थी।

घर का किराया, स्टोर का किराया, बच्चों की बड़ी बड़ी फीस, कुछ महीने में ही सारे जीवन की पूंजी ठिकाने लगने लगी थी और ऑस्ट्रेलिया आने का निर्णय एक दुस्वप्न सा लगने लगा था। जहां नजर आती थी, किसी भी नौकरी के लिए अर्जी डाल देना शुरू हो गया। पर कोई अर्जी फलीभूत नहीं होती थी। एक मित्र की सलाह पर टैक्सी चलाने का लाइसेंस लेने की ट्रेनिंग भी शुरू कर दी।

दिसंबर 2014 आ गया था। भारतीय सेना के उच्च पधाधिकारी से टैक्सी चालक की ट्रेनिंग का सफर अर्श से फर्श तक जैसा था। 10 महीने बीत चुके थे और भविष्य पूर्णतः अंधकार में नजर आ रहा था।

बड़ी उहापोह में, एक वीरवार शाम को कार चलाते हुए एलेनब्रुक जा रहा था कि अचानक मेरा मोबाइल घनघनाया। एक अनजान लैंडलाइन से फोन आ रहा था। तुरंत गाड़ी साइड में लगाकर फोन उठाया तो उधर से अंग्रेजी में एक मधुर सी आवाज आई।
आप मूल भार्गव बोल रहे हैं?

जी जी, मैं मूल भार्गव ही हूं

मैं जैनेट बोल रही हूं। आपने माउंट मैग्नेट डिस्ट्रिक्ट हाई स्कूल में रजिस्ट्रार की नौकरी के लिए आवेदन किया था?

मेरी दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई, तुरंत बोला, जी जी किया तो था!!

जी ठीक है, हम आपको साक्षात्कार (इंटरव्यू) के लिए बुलाना चाहते हैं, मैं आपकी प्रिंसिपल से बात करती हूं। होल्ड कीजिए।

ये बोल कर उस महिला ने मुझे होल्ड पर डाल दिया। तब तक मेरा दिल बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ने लगा था। कुछ तो आस की किरण आई। परंतु ये क्या, अचानक फोन कट गया!!! और किस्मत देखिए, उन दिनों मेरे सस्ते फोन सर्विस प्रोवाइडर की समस्या के कारण उनके नंबरों से लैंडलाइन पर फोन नहीं हो रहे थे, कई बार डायल करने पर भी नंबर नहीं मिला।

बदहवास सा मैं गाड़ी चलाता हुआ अपने मित्र के घर एलेनब्रुक की और भागा। मुझे सड़क कम और उसके घर का फोन ज्यादा नजर आ रहा था। घर पहुंचा तो उसकी पत्नी मिली। उसने मुझे नमस्ते की पर मैंने हांफते हांफते उसे कहा मुझे जल्दी अपना फोन दो। अधिकतर मुझे शांत देखने वाली ज्योति भी घबरा गई और झट से फोन मेरे हाथ में पकड़ा दिया।

मैं लगभग कांपते हाथों से नंबर मिलाया, घंटी बजी और थोड़ी ही देर में फिर वही मधुर आवाज सुनाई दी।

हाय, मैं मूल भार्गव, आपका फोन कट गया था।

जैनेट बोली, हां हां मूल, ठहरो मैं तुम्हारी बात लिज से कराती हूं।

कुछ ही क्षण में अंग्रेजी में एक बड़ी संयमित सी आवाज आई।

हाय मूल, मैं माउंट मैग्नेट डिस्ट्रिक्ट हाई स्कूल की प्रिंसिपल एलिजाबेथ बोल रही हूं। आपने यहां रजिस्ट्रार के लिए आवेदन किया था, क्या आप इंटरव्यू के लिए आना चाहेंगे?

मैंने तपाक से जवाब दिया, जी जी बिलकुल।

लिज (एलिजाबेथ) बोली, ठीक है, तो आप कब आ सकते हैं?

मैंने झट से कहा – मैं कल सुबह ही आ सकता हूं।

उधर अचानक सन्नाटा सा हो गया।

मूल तुम्हे मालूम है माउंट मैग्नेट कहां है?

अब सन्नाटे की बारी मेरी थी!!

सचाई थी कि मैं कहीं भी किसी नौकरी के लिए आवेदन डाल रहा था। ना कोई रिसर्च का टाइम था ना स्थिति। बस कोई भी नौकरी चाहिए थी। मुझे ऑस्ट्रेलिया के बारे में धेला नहीं पता था।

शरमाते हुए मैने धीरे से कहा, जी नहीं ये तो नहीं मालूम।
लिज ने एक लंबी सांस ली और बोली, देखिए माउंट मैग्नेट पर्थ से 550 किलोमीटर दूर एक छोटा सा कस्बा है। क्या आप यहां आना पसंद करेंगे?

मैं सुन कर एक बार तो सन्न सा रह गया, पर सेना में इतने सुदूर इलाकों में रहने के बाद, सुदूर के इलाकों से डर कभी नहीं लगता था। इसलिए तुरंत संभल कर तपाक से बोला, जी, कोई बात नहीं, मैं आ सकता हूं।

लिज़ ने तुरंत कहा, ठीक है, अगले मंगलवार को मिलते हैं। मैं आपको बाकी सूचना ईमेल कर देती हूं। धन्यवाद।
फोन कट गया, अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या हुआ। वहां से चाय वाय पीकर शाम को घर लौटा। फिर अपना लैपटॉप खोलकर, गूगल माता से पूछा – माउंट मैग्नेट”। लाल रेगिस्तान के बीचों बीच एक छोटा सा बिंदु!!!! जनसंख्या 600!!

अरे भाई, मेरी तो बटालियन में भी सात सौ लोग होते थे। ये कौन सी जगह है? तनख्वाह भी 60-70 हजार डॉलर ही थी। दो दिन सोच विचार में निकल गए। तय हुआ कि इंटरव्यू के लिए जरूर जाऊंगा। थोड़ी बहुत इंटरव्यू की तैयारी भी कर ली। वीकेंड पर दो ट्रक ड्राइवरों की उसी क्षेत्र में रेगिस्तान में, रास्ता भूल कर, मरने की भी खबर आ गई।

फिर भी सोमवार सुबह पूरा सामान लेकर गाड़ी में बैठा और निकल लिए। थोड़ी दूर जाकर ही एहसास हुआ कि मेरी थर्ड या फोर्थ हैंड पुरानी गाड़ी 600 किलोमीटर तक जाने की स्तिथि में नहीं थी। सो वापिस घर की तरफ आना ही उचित समझा। उहापोह की स्तिथि में लिज़ को दुबारा फोन किया और कार की स्तिथि बताई। लिज़ ने तुरंत कहा कि गैरभरोसेमंद कार लेकर बिल्कुल भी उतनी दूर और उस तरफ ना जाऊं।

लिज ने मेरा इंटरव्यू टेलीफोन पर ही लेने का निर्णय लिया और दो दिन बाद का समय निर्धारित कर दिया। मुझे अंदाजा ही नहीं था कि ऑस्ट्रेलिया में टेलीफोन पर भी इंटरव्यू हो जाता है!

खैर, मैं फिर इंटरव्यू की तैयारी में जुट गया। रजिस्ट्रार का जॉब डिस्क्रिप्शन कई बार फिर से पढ़ा। मुख्यत: वित्तीय और मानव संसाधन से जुड़ा काम था और दोनो विषयों में मेरी महारथ थी। पर फिर भी, ऑस्ट्रेलिया के खराब अनुभव से आत्मविश्वास हिला हुआ सा था। सब कुछ दांव पर लगा था। 25 साल पहले भारतीय सेना के अधिकारी पद के लिए इंटरव्यू पहली बार भी बिना किसी तैयारी के पास कर लिया था। पर अबकी बार मैं कोई चांस नहीं लेना चाहता था। सारे पुराने नोट्स, इंटरनेट इत्यादि खंगाल डाले। ऑस्ट्रेलियाई शिक्षा से संबंधित भी और अन्य भी।

इंटरव्यू से पहले मैं इयरफोन लगा कर बैठ गया। घर में सबको बिल्कुल चुप रहने का निर्देश दे दिया था। घबराहट तो मुझे कभी नहीं हुई पर थोड़ा बैचेन सा जरूर था। नीयत समय पर फोन आया और प्रश्नोत्तरी शुरू हुई। चार पांच लोगों ने अलग प्रश्न पूछे और मैने, शांति से सबका अच्छे से जवाब दे दिए। मुझे भी बाद में आश्चर्य हुआ की ऐन इंटरव्यू के समय मैं बिल्कुल शांत और निश्चिंत था। शायद मेरा ज्ञान और अनुभव काम आ गया।
इंटरव्यू समाप्ति पर प्रिंसिपल ने कहा कि बाद में मुझे बता दिया जाएगा। परंतु मैं आश्वस्त सा था कि मैने सब ठीक किया है। और आश्चर्यजनक रूप से मुझे परिणाम की कोई चिंता सी ही नहीं हुई!!
दो तीन घंटे बाद फिर फोन आया।
हाय मूल, लिज हेयर। तुम्हारा इंटरव्यू बहुत अच्छा था, हम सब खुश हैं।

पर मैं तुम्हे जॉब ऑफर अभी नहीं दे रही हूं। आप यहां आकर देख लो, अगर सब ठीक लगे, तो आप ऑफर ले लीजिएगा।

मैं तब तक कुछ उदासीन सा हो गया था। अनजानी जगह, अनजाने लोग, अनजान सी नौकरी। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूं।
तभी लिज़ की आवाज दुबारा आई। वो बोलीं,
मूल, हम आपको यहां आकर देखने के लिए हवाई यात्रा का टिकट भेज सकते हैं, यहां की एक बड़ी खदान कंपनी अपने हवाई जहाज़ में एक स्थान दे सकती।

अब मुझ में एक नई जान सी आ गई, मानो स्वयं मां लक्ष्मी की आवाज मेरे कानो में पड़ गई हो, तुरंत मेरे मुंह से हां निकल गई। अगले ही सोमवार को ही, सुबह सुबह मैं हवाई यात्रा से माउंट मैग्नेट की ओर निकल गया। 15 या 20 यात्रियों वाले, तिनके की तरह उड़ते, छोटे से हवाई जहाज़ में, दिसंबर की भरी गर्मी में कोट पैंट और टाई पहन कर, मैं जीवन की एक नई और अनजान यात्रा पर निकल लिया। अनजान स्थानों की तरफ ऐसी यात्राएं मैने सेना की सेवा के दौरान अनेकों बार की थी। पर इस बार का रोमांच और अनिश्चितता कुछ अलग सी थी।

खिड़की से नीचे देखने से लाल सुर्ख, अनंत रेगिस्तान नज़र आ रहा था। दूर दूर तक जीवन का नामो निशान नहीं दिख रहा था।लगभग डेढ़ घंटे के बाद मेरा हवाई जहाज़ माउंट मैग्नेट की लाल सुर्ख बजरी की पट्टी पर उतर गया। मालूम नहीं था वहां कौन मिलेगा, क्या होगा, कैसे स्कूल पहुंचूंगा, आदि आदि।

जहाज़ की सीढ़ी से उतरते ही लगभग 60 साल की एक दुबली पतली गोरी महिला मेरी तरफ तेजी से आई और तपाक से जोर से बोली,
हे, यू मस्ट बी मूल!!

मैं हैरान था कि इसने मुझे कैसे पहचान लिया? मैंने तुरंत हां में सिर हिलाया और उसने आगे हाथ बढ़ाकर अंग्रेजी में बोला, मैं मैरिलिन हूं। उस दिन तुमसे बात हुई थी। चलिए।

मैरीलिन वहां की स्थाई रजिस्ट्रार थी और एक वर्ष के अवकाश पर जा रही। उसी की जगह मुझे एक वर्ष के लिए अनुबंध मिलना था। मैरीलिन मुझे बाहर की ओर ले चली। एयरपोर्ट भी बस एक खुले मैदान सा ही था। छोटे से गेट बाहर आकर हम एक कार में बैठकर चल दिए। स्कूल वहां से 7 या 8 किलोमीटर था। मैरीलिन मुझे कस्बे की और स्कूल की बातें बताते हुए गाड़ी चलाते हुए आगे बढ़ रही थी।

उत्सुकता में मैने उस से पूछा, आपने मुझे पहचाना कैसे? मैरीलिन, हंसते हुए, तपाक से बोली, 45 डिग्री तापमान में कोट और टाई पहने सिर्फ एक यात्री, वो भी अकेला भारतीय, तुम्हारे अलावा और कौन हो सकता था??

बातें करते करते हम स्कूल पहुंचे, तो एलिजाबेथ ने स्वागत किया। मैरीलिन मुझे अपने ऑफिस में ले गई और काम समझाने लगी। बड़ा ही सुन्दर, वातानुकूलित ऑफिस था और काम भी मेरी रुचि के अनुसार। साथ ही लिज, मैरिलिन और जैनेट के व्यवहार और शालीनता से मुझे एकदम से अपनत्व का सा आभास हुआ। मुझे लगा शायद ऑस्ट्रेलिया में मेरी नियति मुझे सही जगह खींच लाई है। सारी अनिश्चितता, शंकाए समाप्त सी होती चली गई। कुछ देर बाद जब लिज़ ने मुझ से पूछा तो इतने सुदूर शहर में भी हां कहने में जरा भी हिचक नहीं हुई। कुछ ही देर में मेरा एक वर्ष का अनुबंध बन कर आ गया। मैंने उसे थोड़ा ध्यान से पढ़ा और हस्ताक्षर कर दिए।

जब हस्ताक्षर के नीचे तिथि लिखी, 15 दिसंबर 2014, तो ध्यान आया कि गजब का संयोग था। 15 दिसंबर 1990 को मुझे भारतीय सेना में अधिकारी नियुक्त किया गया था और ठीक 24 वर्ष बाद, ऑस्ट्रेलिया में मेरा नया करियर प्रारंभ हो रहा था!! माउंट मैग्नेट डिस्ट्रिक्ट हाई स्कूल में प्राप्त अनुभव और प्रशिक्षण के कारण मैंने फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। अगले दो वर्ष में ही उन्नति पाते हुए पर्थ मेट्रो के एक प्रतिष्ठित स्कूल में मैनेजर, कॉर्पोरेट सर्विसेज के पद पर स्थाई रूप से नियुक्ति पा गया और धीरे धीरे ऑस्ट्रेलिया में जीवन सुलभ होता चला गया।

दो हजार सैनिकों की टुकड़ी बनाई : मुक्ति के लिये अंग्रेजी सेना से गुरिल्ला युद्ध किया

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अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 की सशस्त्र क्रान्ति के बारे सब जानते हैं। निसंदेह वह एक संगठित अभियान था । पर इससे पहले भी स्थानीय स्तर पर अनेक सशस्त्र संघर्ष हुये हैं। इससे पहले ऐसा ही एक सशस्त्र आन्ध्र प्रदेश में हुआ था जिसके नायक थे नरसिंह रेड्डी। क्रांति से अंग्रेजी सेना में अधिकारी रहे थे । उनकी कमान में दो हजार सैनिक थे । लेकिन जब अंग्रेजों ने किसानों से जबरन बसूली आरंभ की तब उन्होंने विद्रोह कर दिया और अंग्रेजों से तीन किले छीनकर स्वतंत्र ध्वज फहरा दिया था ।

ऐसे सशस्त्र क्रांति के नायक उय्यालवड़ा नरसिंह रेड्डी का जन्म आन्ध्रप्रदेश के कुर्नूल जिला अंतर्गत उय्यालवड़ा मे 24 नवंबर 1806 को हुआ था । उय्यालवड़ा उनका जन्म स्थान था । इसलिये अपने नाम के आगे वे सदैव उय्यलावड़ा लगाते थे ।

उनके परिवार की पृष्ठभूमि कृषि और सेना की रही थी । उनके पूर्वज पहले कृषि करते थे । समय के साथ परिवार की शिक्षा बढ़ी और दादा जयारामी रेड्डी एवं पिता उय्यलावडा पेडडामल्ला रेड्डी भी सेना में रहे थे । परिवार की सैन्य पृष्ठभूमि के कारण नरसिम्हा रेड्डी को सेना में उच्चपद मिला । उन्हें कदपा, अनंतपुर, बेल्लारी और कुर्नूल जैसे 66 गांवों में अंग्रेजी शासन का वर्चस्व बनाने की कमान सौंपी गई। और उनकी सैन्य टुकड़ी को धन संग्रह का लक्ष्य देकर बल पूर्वक बसूली का काम सौंपा गया । नरसिम्हा रेड्डी जी कृषकों से कर तो बसूलना चाहते थे । लेकिन बल पूर्वक नहीं। विशेषकर उन किसानों को राहत देना चाहते थे जिनकी फसल खराब हो गई। उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों के सामने अपना पक्ष रखा पर बात न बनी । अंततः उन्होंने अपनी कमान के सैनिकों से विद्रोह का आव्हान किया । जो सहमत हो गये और 10 जून 1846 को उनकी कमान में एक सशस्त्र टुकड़ी ने कोइलकुंटला में खजाने पर हमला किया, खजाना लूटा और सूखा पीड़ित किसानों में धन बाँट दिया । उसके बाद वे कंबम की ओर रवाना हुये जहाँ अंग्रेज अधिकारी को मारकर वह क्षेत्र को अंग्रेजों से मुक्त घोषित कर दिया । इस घटना को अंग्रेज सरकार ने गंभीरता से लिया और कैप्टन नॉट और कैप्टन वॉटसन की कमान में दो सैन्य टुकड़ियाँ नरसिम्हा रेड्डी को पकड़ने के लिये भेजी । लेकिन सफलता नहीं मिली । सैन्य संचालन में दक्ष नरसिम्हा रेड्डी ने छापामार शैली अपनाई । वे अंग्रेज कैंप पर हमला करते और भाग जाते । उनकी इस छापामार शैली से आतंकित अंग्रेज सरकार ने उनपर नरसिम्हा रेड्डी की सूचना देने वाले को 5000 रुपये और सिर लाकर देने वाले को दस हजार रुपये का ईनाम देने की घोषणा की । ईनाम की इस राशि से ही यह अनुमान सहज लगाया जा सकता है कि क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी का अंग्रेजों पर कितना भय होगा । पर अपने ऊपर ईनाम और अंग्रेजों की किसी कार्यवाही की बिना परवाह किये नरसिम्हा रेड्डी ने 23 जुलाई 1846 को गिद्दलूर में सेना के कैंप पर आक्रमण कर दिया । यह हमला इतना प्रबल था कि अंग्रेज सेना को कैंप छोड़कर भागना पड़ा । नरसिम्हा रेड्डी को यहाँ भारी मात्रा में हथियार और धन मिला । इससे उन्होने अपनी टुकड़ी में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर तीन हजार कर कर ली ।

जब उन्हें पकड़ने के लिये अंग्रेज सरकार के सभी प्रयास विफल हो गये तब अंग्रेजी सेना ने इनके पूरे परिवार और अनेक रिश्तेदारों को भी बंदी बना लिया । जब यह सूचना क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी को मिली तब नल्लामला वन क्षेत्र में थे । उन्होंने सेना के कैंप पर हमला करके परिवार जनों को मुक्त करने की योजना बनाई और नल्लामला वन क्षेत्र से कोइलकुंतला क्षेत्र आए । इसके समीप ही रामबाधुनीपल्ले गांव में सैन्य छावनी थी जहाँ उनका परिवार बंदी था । नरसिम्हा रेड्डी ने इस गाँव के पास जगन्नाथ कोंडा गांव में अपनी एक टोली तैनात की और समय की प्रतिक्षा करने लगे । संभवतः यह अंग्रेजों की ही कूटनीति थी । उनका कोई भेदिया क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी की टोली में होगा । चूँकि जगन्नाथ कोंडा गाँव के आसपास सेना ने अपनी जमावट कर रखी थी ।

अंग्रेज सेना ने रातों रात वह क्षेत्र घेरा और 6 अक्टूबर 1846 की रात में सोते समय उन्हें बन्दी बना लिया गया। उनके साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ । अनेक प्रकार की शारीरिक यातनाएँ दीं गई। फिर जंजीरों में बाँधकर पूरे क्षेत्र में घुमाया गया । चौराहो पर खड़ा करके सबके सामने यातनाएँ दी जाती । अंग्रेज इन्हे प्रताड़ित करके अपना भय बनाना चाहते थे ताकि उस क्षेत्र में फिर कभी कोई विद्रोह का साहस न कर सके ।

उनके साथ कुल 901 लोग बंदी बनाये गये थे । प्रताड़नाओं से कुछ लोग टूटे उन्होने वफादारी की सौगंध खाई ऐसे 412 लोगों को मुक्त दिया गया । अन्य को अलग-अलग दंड मिला । कुछ को अंडमान जेल में भेजा गया और कुछ अन्य जेलों में भेजे गये । यह सब कार्रवाई लगभग साढ़े तीन महीने चली । अंत में क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी को कुर्नूल जिला अंतर्गत जुर्रेती कोइलकुंटला में भारी भीड़ के सामने फांसी दी गई। वह 22 फ़रवरी 1847 का दिन था ।

वे भले दुनियाँ से चले गये । पर उस पूरे क्षेत्र में उनकी स्मृति एक लोक नायक के रूप में है ।

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