Eikhoigi Imphal International Film Festival 2025: Cinema as a Catalyst for Change

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Imphal – The 2nd Eikhoigi Imphal International Film Festival (EIIFF) opened its doors to a global audience this year, bringing the cinematic world to Manipur, a state that has faced political unrest in recent years. The festival, launched as part of a broader effort to reassert Manipur’s identity, has become a beacon of hope and change. Sunzu Bachaspatimayum, Festival Director and Secretary of the Manipur State Film Development Society (MSFDS), shared his vision behind this initiative that aims to use cinema and culture as tools for peace and reconciliation.

“We believe cinema is more than just entertainment,” Sunzu explained. “It’s a powerful medium to foster dialogue, build understanding, and rebuild our community’s image. Despite the challenges, the festival is a statement that Manipur is not just a conflict zone, but a space where creativity and culture can thrive.”

While Manipur has long been isolated in the broader film industry, Sunzu sees the EIIFF as a crucial step toward changing that narrative. He shared, “Our state is geographically positioned as India’s gateway to Southeast Asia. We have a vibrant film industry, but it’s been limited by resources and accessibility. We want to bring the world to us, to provide a platform for local filmmakers to showcase their talent and engage with the global cinematic community.”

This year’s festival introduced a series of masterclasses, pitching sessions, and panel discussions aimed at developing the skills of emerging filmmakers in the region. Sunzu highlighted the importance of these initiatives, saying, “Manipur lacks formal academic institutions for film studies, but we’re compensating for this gap by bringing experts and professionals from across the world. This is essential for elevating our industry and creating opportunities.”

Prominent filmmakers such as Umesh Kulkarni and Shyamal Sengupta offered their expertise, providing invaluable insights into the nuances of short films, distribution, and marketing. Documentary filmmaker Sean McAllister led an online session on crafting intimate character-driven documentaries, while industry experts from Japan and India discussed international collaborations and production strategies. “We want to shift the mindset here,” Sunzu said. “Filmmakers often think that their market is limited to Manipur, but we need to teach them about the international market and how to pitch their stories to global audiences.”

The festival also paid homage to Manipur’s rich cinematic legacy. Sunzu reflected on the legacy of “Ishanou,” a film that was recently restored and screened at Cannes. “This film represents the golden era of Manipuri cinema, and now, films like Boong are representing the future of Manipur’s film industry,” he said, underscoring the transformation that has taken place.

The EIIFF is not just about film screenings; it is a celebration of Manipur’s cultural heritage. The state, known for its scenic beauty, boasts landmarks like the Loktak Lake and the Keibul Lamjao National Park. These locations offer a unique backdrop for the films shown at the festival, adding to the region’s cinematic appeal.

Despite financial limitations and staffing challenges, the MSFDS is committed to growing this festival into a global platform. “It’s not going to be easy, but we are determined to continue,” Sunzu concluded. “This festival is a small but significant step towards building a sustainable film ecosystem here.”

The 2nd EIIFF marks a new chapter for Manipur, one where cinema and culture can heal and unite a state marked by conflict. As the festival continues to grow, it holds the promise of transforming Manipur into a thriving hub for filmmaking in Southeast Asia.

सनातन, आस्था व विकास को समर्पित योगी सरकार का बजट

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उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने वर्ष 2025 -26 के लिए  सनातन को समर्पित करते हुए सामाजिक सरोकारों वाला व्यापक बजट प्रस्तुत किया है जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग तथा जीवन के हर क्षेत्र का ध्यान रखा गया है। सर्वसमावेशी होने के कारण छात्र, किसान, व्यापारी, महिलाएं, विषय विशेषज्ञ और उद्योगपति सभी इस बजट की सराहना कर रहे हैं। बजट में धर्मस्थलों के विकास व पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त धन दिया गया है। प्रदेश सरकार के बजट में हर उस क्षेत्र तक पहुंच बनाने का प्रयास किया गया है जो आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बजट में अयोध्या, मथुरा, नैमिषारण्य और चित्रकूट जैसे धार्मिक स्थलों पर विशेष ध्यान दिया गया है। 

प्रदेश के वित्तमंत्री सुरेश खन्ना ने बजट भाषण का प्रारम्भ महाकुंभ के आयोजन से किया और फिर धर्मस्थलों के विकास के लिए अपना खजाना खोल दिया। 
श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर व मां विन्ध्यवासिनी कॉरिडोर की स्थापना के बाद सरकार मथुरा में श्री बांकेबिहारी जी महाराज मंदिर, मथुरा -वृंदावन कॉरिडोर का निर्माण  करायेगी। इसके लिए भूमि उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 100 करोड़ और निर्माण के लिए 50 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। नैमिषारण्य में वेद विज्ञान केंद्र की स्थपना के लिए 100 करोड़ रु. खर्च किये जायेंगे। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए पहले ही 25 करोड़ बजट के साथ पांच एकड़ भूमि  आवंटित की जा चुकी है। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के केंद्र में वैदिक पर्यावरण, वैदिक गणित, वैदिक विधिशास्त्र, वैदिक योग विज्ञान, वैदिक वन औषधियां वनस्पति आदि पाठ्यक्रम  होंगे। यहां पर बड़े वैदिक पुस्तकालय का भी निर्माण  कराया जाएगा, साथ ही वेदशाला,वैदिक संग्रहालय, तारा मंडल, संगोष्ठी कक्ष बनाये जाएंगे। केंद्र में गुरुकुल व आधुनिक पद्धति के अंतर्गत कक्षाएं बनायी जायेंगी।

मुख्यमंत्री पर्यटन स्थल विकास योजना के तहत 400 करोड़ रु.खर्च किये जायेंगे। अयोध्या में पर्यटन अवस्थापना विकास के लिए 150 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। इसी तरह मथुरा में 125 करोड़ नैमिषारण्य मे 100 करोड़ चित्रकूट में 50 करोड़ खर्च करने का प्रावधान किया गया है। मिर्जापुर में मां विन्ध्यवासिनी मंदिर,मां अष्टभुजा मंदिर मां काली खोह  मंदिर के परिक्रमा पथ व जनसुविधा स्थलों का विकास किया जायेगा।  संरक्षित मंदिरो के जीर्णोद्वार के लिए 30 करोड़,  महाभारत सर्किट के पर्यटन विकास के लिए 10 करोड़, जैन सर्किट के विकास के लिए भी धन उपलब्ध कराया गया है। विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी धन का प्रावधान किया गया है।गुरुस्वामी हरिदास की स्मृति में अंतरराष्ट्रीय संगीत समारोह  के लिए एक करोड़ और अयोध्या में जिला स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय के लिए भी एक करोड़  की धनराशि रखी गई है।योगी सरकार ने वर्तमान बजट से धार्मिक पर्यटन के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की लौ प्रदीप्त की है। 

बजट में महापुरुषों पर भी ध्यान दिया गया है जिसके अंतर्गत बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के नाम पर लखनऊ में स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की जाएगी। इसके साथ ही हर जिले में 100 एकड़ में पीपीपी मॉडल पर सरदार पटेल जनपदीय आर्थिक क्षेत्र स्थापित किया जायेगा। संत कबीर के नाम पर 10 वस्त्रोद्योग पार्क तथा संत रविदास के नाम पर दो चर्मोद्योग स्थापित किये जाएंगे। पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी के जन्म शताब्दी वर्ष में उनके सम्मान में नगरीय क्षेत्रों में पुस्तकालय की  स्थापना की जाएगी।लखनऊ स्थित अटारी कृषि प्रक्षेत्र पर 251 करोड़ रु. की लागत से पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चरण सिंह के नाम पर सीड पार्क की स्थापना होगी।प्रत्येक कृषि मंडी में माता शबरी के नाम पर कैंटीन और विश्रामालाय स्थापित किये जायेंगे।बजट में युवाओं और छात्राओं  को आकर्षित करने के लिए भी प्रावधान किये गये हैं। अब प्रदेश की हर मेधावी छात्रा को स्कूटी दी जायेगी छात्राओं के लिए 400 करोड़ रु. रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना  का ऐलान किया गया है। यही नही माता अहिल्याबाई होल्कर के नाम पर श्रमजीवी महिलाओं के लिए छात्रावास भी बनेंगे। 

प्रदेश के बजट में युवा उद्यमी अभियान के लिए भी 1000 करोड़ रु.  का प्रावधान किया गया है।संपूर्ण उत्तर प्रदेश के व्यापक विकास का विस्तृत खाका बजट में रखा गया है।बजट के अनुसार अवध में केवल अयोध्या का ही विकास नहीं हो रहा अपितु अवध के हर जिले के विकास की अद्भुत पटकथा लिखी जायेगी।बजट के प्रावधान इस प्रकार से बनाये गये हैं कि एक प्रकार से यह आगामी 25 वर्षों के विकास का रोडमैप प्रस्तुत कर रहा है। 

उत्तर प्रदेश में चार नए एक्सप्रेस वे के निर्माण से तीन तीर्थस्थलों  काशी, प्रयागराज व हरिद्वार की यात्रा सरल हो जायेगी।चार नए एक्सप्रेस वे के लिए बजट में 1,050 करोड़ रु. की व्यवस्था कर दी गई है। गंगा एक्सप्रेस वे को प्रयागराज, मिर्जापुर , वाराणसी, चंदौली होते हुए सोनभद्र से जोड़ने के लिए विन्ध्य लिंक एक्सप्रेस वे का निर्माण किया जायेगा।इससे इस क्षेत्र के विकास की गति दोगुनी हो जायेगी व धार्मिक पर्यटन और बढ़ेगा। 

विशेषज्ञों का मानना है कि यह युवाओं को रोजगार देने वाला बजट है।बजट में एमएसएमई, नई तकनीक, एआई व साइबर  सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है।नए एक्सप्रेस- वे बनने से दूर की यात्रा आसान होगी।नए एक्सप्रेस वे बनने से व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा।एआई सिटी बनाने की घोषणा से स्टार्टअप और आईटी उद्योग को बढ़ावा मिलेगा।प्रदेश का बजट इंफ्रास्टक्चर को बढ़ावा देने के साथ बेरोजगारों को रोजगारपरक बनाने वाला बजट है।  यह बजट राज्य की तकनीकी प्रगति औद्योगिक विकास और स्वास्थ्य  अवसंरचना के लिए प्रतिबद्धता को दर्शा रहा है। प्रदेश के बजट में सड़क  राजमार्ग  के चौड़ीकरण पर भी पर्याप्त फोकस किया गया है। इसका सर्वाधिक लाभ राजधानी लखनऊ व उसके आसपास के जिलों व कस्बों आदि को मिलेगा ।मोहनलालगंज -गोसाईगंज होते हुए पूर्वांचल एक्सप्रेस- वे निकल रहा है  इसका चौड़ीकरण किया जायेगा। इसी तरह बनी से ही एक रोड हरौनी होते हुए मोहन को निकली है इसे भी दो लेन का किया जायेगा। 

यह बजट समग्र विकास वाला बजट है। इसमें किसानों, उद्यमियों,  महिलाओं और युवाओं के लिए अनेक प्रावधान किये गये हैं। बजट में  कोरोना काल में अनाथ 1430 बच्चों को आर्थिक सहायता प्रादन करने के लिए 250 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। बजट में सात सरोकारों  पर्यावरण संरक्षण ,नारी सशक्तीकरण, जल सरंक्षण, सुशिक्षित समाज, जनसंख्या नियोजन, स्वस्थ समाज, गरीबी उन्मूलन पर भी ध्यान दिया गया है।पर्यावरण संरक्षण के लिए बजट का 23 प्रतिशत हिस्सा पर्यावरण अनुकूलन पहली पर खर्च किया जायेगा। 

सरकार वनीकरण, कार्बन अवशोषण और पयार्वरण एवं प्राकृतिक संसाधनों के सरंक्षण को और अधिक बढ़ावा देने जा रही है।इसी प्रकार सुशिक्षित समाज के अंतर्गत शिक्षा क्षेत्र पर कुल बजट का 13 प्रतिशत हिस्सा खर्च किया जायेगा।इसी प्रकार स्वस्थ समाज के लिए कुल बजट का छह प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च होगा। प्रदेश में जलसंरक्षण को बढ़ावा देने के लिए 4500 करोड़ रु. की व्यवस्था की गई है। इसके अंतर्गत वर्षा जल संचयन एवं भूजल संवर्धन के लिए 90 करोड़ रु. की व्यवस्था प्रस्तावित है।इसमें तालाबों का जीर्णोद्धार तथा निर्माणा भी शामिल है। जनसंख्या नियोजन के अंतर्गत युवाओं को नवाचार से जोड़ने के लिए इनोवेशन फंड स्थापित किया जा रहा है। गरीबी उन्मूलन के लिए भी 250 करोड़ रु. की व्यवस्था प्रस्तावित है। बजट में सभी मंडल मुख्यालयों  पर विकास प्राधिकरणों ,नगर निकायों द्वारा कन्वेंशन सेंटर का निर्माण कराया जायेगा।ग्राम पंचायतों में वैवाहिक उत्सव एवं अन्य  सामाजिक  आयोजनों के लिए उत्सव भवन निर्माण की कार्ययोजना पर भी कार्य किया जायेगा। 

यह बजट सभी वर्गो के लिए है अर्थात समग्रता पर आधारित है जिससे इसकी छाप वैश्विक होने जा रही है ।  प्रदेश की सुदृढ़ होती कानून -व्यवस्था से देश विदेश के निवेशक  भी अब आकर्षित हो रहे हैं तथा प्रदेश में भारी निवेश भी हो रहा है। प्रदेश सरकार ने वर्तमान बजट से 2050 तक का लक्ष्य साधने का प्रयास किया है यही कारण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  यह अब तक का सबसे बड़ा बजट है जिसका सीधा अर्थ यह हे कि विकास का लक्ष्य और पैमाना बहुत बड़ा है। यह तुष्टिकरण वाला बजट नहीं अपितु सभी के संतुष्टिकरण वाला बजट है। 

सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है भारत: केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत

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बृजेश भट्ट

प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर और प्रसिद्ध संस्कृत साहित्यकार डॉ. हरेकृष्ण मेहेर संस्कार भारती के ’भरतमुनि सम्मान 2024’ से सम्मानित

नई दिल्ली, 23 फरवरी 2025: केन्द्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री गजेंन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है और इस दिशा में आगे बढ़ते हुए हम सभी को सजग और सतर्क रहने की जरूरत है।
श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत संस्कार भारती के कार्यक्रम ‘भरतमुनि सम्मान-2024’ में उपस्थित कला एवं साहित्य क्षेत्र से जुड़े साधकों को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने लखनऊ कत्थक केन्द्र से दीक्षा प्राप्त प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना डॉ. कुमकुम धर एवं आधुनिक संस्कृत साहित्य के प्रतिष्ठित कवि एवं गीतकार डॉ. हरेकृष्ण मेहेर को ‘भरतमुनि सम्मान-2024’ से सम्मानित किया। सम्मान के रूप में एक स्मृति चिन्ह, सम्मान पत्र एवं 1.51 लाख रुपए की राशि समर्पित की गई। श्री शेखावत ने कहा कि कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में ‘भरतमुनि सम्मान’ से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पुरस्कार विजेताओं ने पुरातन कला एवं संस्कृति को जीवंत रखने का काम किया है। भारत एक बार फिर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है। हालांकि आगे बढ़ते हुए सभी को सजग एवं सतर्क रहने की भी आवश्यकता है।

‘भरतमुनि सम्मान 2024’ से सम्मानित कत्थक नृत्यांगना डा. कुमकुम धर ने कहा कि पंचम वेद से विख्यात नाट्य शास्त्र के रचियता महर्षि भरतमुनि सम्मान को पाकर वह अभिभूत है। इस सम्मान के लिये चुने जाने पर उन्होंने चयनसमिति का आभार जताया। उन्होंने कहा कि कला मानव चित्त को निर्मल और जीवन को अनुशासित करती है। कला साधना वाले मर्यादित और देशप्रेम के भाव वाले होते हैं।

भरतमुनि सम्मान – 2024’ से सम्मानित साहित्यकार डा.ॅ हरेकृष्ण मेहेर ने साहित्य जगत के प्रति संस्कार भारती के सम्मान को अत्यंत गौरव की बात बताया। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे संस्कृत साहित्य के लिये जो सम्मान दिया गया है, उससे में कृतज्ञ महसूस कर रहा हूं। यह मेरा सौभाग्य है।’’ यह देश और उनके प्रदेश ओड़ीशा के लिये गौरव की बात है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश सोनी ने अपने सारगर्भित संबोधन में उपस्थित श्रोताओं को भारतीय कला-संस्कृति के लिए समर्पित होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा महर्षि भरतमुनि ने जीवन भर साधना की, कठिन साधना से ही सफलता मिलती है। ऐसे ही दो साधकों को जिन्होंने जीवन भर कड़ी साधना की, उन्हें आज संस्कार भारती ने सम्मानित किया। उन्होंने कहा, ‘शब्द’ और ‘स्वरों’ की अपनी दुनिया है; रंग-रेखाओं की अपनी दुनिया है। वहीं भाव- भंगिमाओं की भी अलग दुनिया है। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ ने इन सभी को एक स्थान पर ला दिया।

गणित और संगीत ही पूरी दुनिया है। विश्व कल्याण के लिए मानव का संस्कारी होना आवश्यक है, संस्कार शून्यता रही तो कभी भी देश आगे नहीं बढ़ सकता और संपूर्ण भारत को संस्कारित करना ही संस्कार भारती का उद्देश्य है। इस दिशा में कला ही श्रेष्ठतम साधन है।

इस अवसर पर संस्कार भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष डॉ. मैसूर मंजूनाथ ने कहा कि महर्षि भरतमुनि को समर्पित इस सम्मान के लिए विशिष्ट कलाकारों और साहित्यकारों को सम्मानित करते हुए संस्कार भारती गौरवान्वित अनुभव कर रही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गत वर्ष बेंगलुरु में आयोजित ‘कलासाधक संगम’ में इस प्रतिष्ठित सम्मान देने का शुभारंभ किया था। प्रथम पुरस्कार मुंबई के चित्रकार श्री विजय दशरथ आचरेकर एवं लोककला क्षेत्र में सिंधुदुर्ग के श्री गणपत सखाराम मसगे को दिया गया था। यह वार्षिक सम्मान प्रतिवर्ष दो विधाओं में दिया जाता है। सम्मान के लिये संस्थाओं, कला विश्वविद्यालयों एवं व्यक्तिगत संपर्कों के आधार पर प्राप्त आवेदनों का निर्णायक मंडल द्वारा चयन किया जाता है।

पद्मश्री पंडित रामदयाल शर्मा, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी, कथक केंद्र निदेशक प्रणामी भगवती, नेशनल मॉडन आर्ट गैलरी निदेशक पूजा हल्ली, हरियाणा प्रान्त अध्यक्षा पद्मश्री सुमित्रा गुहा,अधिवक्ता सोशल एक्टिविस्ट सुबुही खान,सोशल एक्टिविस्ट प्रीति पाण्डेय और देश के नामचीन कला साधक और अनेक कला संस्थानों,साचि अध्यक्ष सहित समाजिक जगत डॉक्टर, प्रोफेसर विद्यार्थी आदि उपस्थित थे

लेख- महाकुंभ और कांग्रेस: हिंदू समाज से बढ़ती दूरी का दंश! — सोनम लववंशी

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प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक—जहाँ भी कुंभ का आयोजन होता है, वहाँ करोड़ों श्रद्धालु उमड़ते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की गहराई, व्यापकता और एकता का महोत्सव है। यह सनातन परंपराओं का जीता-जागता प्रमाण है, जहाँ साधु-संतों से लेकर आमजन तक, आस्था के इस महासागर में डुबकी लगाने पहुँचते हैं। लेकिन जब देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, जिसने दशकों तक सत्ता चलाई, इस महापर्व से स्वयं को दूर कर ले, तो यह केवल राजनीतिक चूक नहीं, एक गहरी वैचारिक खाई का संकेत देता है।

कुंभ में हर बार राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि आते रहे हैं। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रीगण और अन्य नेता संतों का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं, लेकिन कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता का वहाँ न पहुँचना महज संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति जान पड़ती है। आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इस आयोजन से दूरी बना लेता है? क्या कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन है, या फिर यह भारत की आत्मा से जुड़ा एक सांस्कृतिक पर्व भी है? दरअसल, कांग्रेस के अंदर पिछले कुछ दशकों में एक विचारधारा विकसित हुई है, जिसमें हिंदू प्रतीकों और आयोजनों से दूरी बनाने को ‘धर्मनिरपेक्षता’ समझा जाता है। यह पार्टी एक समय में सर्वसमावेशी हुआ करती थी, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में सभी समुदायों को साथ लिया। लेकिन आज यह अपने ही मूल स्वरूप से भटक गई है। यह वही कांग्रेस है, जिसने कभी राम जन्मभूमि आंदोलन का विरोध किया, रामसेतु के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाया, और हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द गढ़कर सनातन आस्थाओं को कटघरे में खड़ा किया।

यदि कुंभ किसी विशेष राजनीतिक दल का आयोजन नहीं है, तो फिर कांग्रेस इसे अपने कार्यक्रमों की सूची से बाहर क्यों रखती है? क्या उसे यह भय है कि यदि वह ऐसे आयोजनों में शामिल हुई तो उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि धूमिल हो जाएगी? लेकिन धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म से दूरी बनाना तो कतई नहीं होता, बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करना होता है। जब कांग्रेस के नेता ईद की शुभकामनाएँ देने मस्जिदों में जा सकते हैं, क्रिसमस के मौकों पर चर्चों में प्रार्थना कर सकते हैं, तो फिर कुंभ में शामिल होने में कैसी हिचकिचाहट? क्या हिंदुओं के पर्वों से दूरी बनाकर ही वह अपनी ‘समावेशी राजनीति’ को बचाए रखना चाहती है? कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसका महत्व किसी भी मेले या राजनीतिक सभा से कहीं अधिक है। यहाँ आकर केवल स्नान नहीं होता, बल्कि संत-समागम के माध्यम से समाज को दिशा मिलती है, आध्यात्मिक चिंतन होता है, संस्कृति का संरक्षण होता है। जब राजनेता और शासक यहाँ आकर संतों का आशीर्वाद लेते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं रहता, पूरे समाज के प्रति एक सकारात्मक संकेत होता है। लेकिन कांग्रेस का इससे विमुख रहना उसके वर्तमान वैचारिक संकट को उजागर करता है। इसका असर भी स्पष्ट दिखता है।

कांग्रेस, जो कभी देश के हर वर्ग की पार्टी मानी जाती थी, आज हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग की नज़र में अविश्वसनीय बन चुकी है। मंदिरों में दर्शन करना उसे राजनीतिक मजबूरी लगती है, जबकि दूसरी ओर अन्य दल इसे सहज रूप में अपनाते हैं। क्या यह अजीब नहीं कि जिस देश में बहुसंख्यक हिंदू हैं, वहाँ की सबसे पुरानी पार्टी हिंदू प्रतीकों से कतराने लगी है? क्या यह महज संयोग है कि कांग्रेस का समर्थन आधार दिनोंदिन सिकुड़ता जा रहा है? यहाँ एक और सवाल उठता है—क्या हिंदू समाज कांग्रेस के इस व्यवहार को समझ नहीं रहा? क्या वह नहीं देख रहा कि कांग्रेस का झुकाव किस दिशा में बढ़ रहा है? जब हिंदू आस्थाओं की बात आती है, तो कांग्रेस अक्सर या तो चुप्पी साध लेती है या फिर उसका स्वर आलोचनात्मक हो जाता है। जबकि अन्य समुदायों के मामलों में वह फौरन सक्रिय हो जाती है। यह भेदभाव स्पष्ट है और यही वजह है कि हिंदू समाज अब कांग्रेस को शक की नजर से देखने लगा है।

कुंभ से दूरी बनाकर कांग्रेस यह संकेत देती है कि वह अब अपने ही देश की सांस्कृतिक धारा से कट चुकी है। लेकिन क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह स्थिति लाभकारी हो सकती है? इतिहास गवाह है कि जो दल जनता की आस्थाओं को समझने में चूक करता है, वह धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। कांग्रेस का अस्तित्व भी इसी मोड़ पर खड़ा है—क्या वह अपने इस रवैये से कोई सबक लेगी? या फिर वह अपने ही ऐतिहासिक विरासत को भूलकर एक ऐसे मार्ग पर बढ़ती रहेगी, जो उसे राजनीतिक हाशिए पर ला खड़ा करेगा? कुंभ का आयोजन किसी सरकार या राजनीतिक दल की पहल पर नहीं होता, यह भारत की सनातन परंपरा का हिस्सा है। इसे किसी पार्टी के चश्मे से देखने की भूल करना कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकता है। अगर वह अपनी जड़ें बचाना चाहती है, तो उसे इस कटु सत्य को समझना होगा कि हिंदू समाज को नकारकर, हिंदुत्व से दूरी बनाकर, और अपनी विचारधारा को महज तुष्टीकरण तक सीमित करके वह न तो धर्मनिरपेक्ष रह पाएगी और न ही राजनीतिक रूप से प्रासंगिक। कुंभ तो हर बार आएगा, लेकिन क्या कांग्रेस को इसमें कोई स्थान मिलेगा? यह सवाल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा है।

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