संस्था के नाम का देश भर में दुरुपयोग

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आज दिनांक 25-12-2025 दिन बुधवार को ऑल इंडिया प्रेज़िडन्ट एसोसिएशन (आईपा) के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी की ऑनलाइन बैठक की गई | बैठक का विषय संस्था के नाम का देश भर मे दुरुपयोग और संस्था के नाम पर बिना बोर्ड ऑफ ट्रस्टी के संज्ञान के चल रही बैठकों पर था |

जैसा की संज्ञान मे आया है की आईपा के नाम पर विपिन सोलंकी निवासी इज्जत नगर, बरेली के द्वारा गत दिनों संगठन के सदस्यों के साथ ऑनलाइन बैठक की गई और फरवरी माह मे नेनीताल मे एक राष्ट्रीय बैठक की योजना बनाई गई है – उक्त जानकारी संगठन को सोशल मीडिया और समाचार पत्रों मे छपी खबरों के माध्यम से हुआ | इस जानकारी के बाद ये आकस्मिक बैठक की गई उक्त बैठक मे संगठन के अध्यक्ष- विक्रम कुमार शिवम,उपाध्यक्ष – गौरव सिंह, महासचिव अभिषेक पाण्डेय, संयुक्त सचिव और सदस्य , इफराहिम,अक्षय शर्मा मोजूद रहे l सभी पदाधिकारियों ने सर्वसम्मति से ये निर्णय लिया की विपिन सोलंकी जो आईपा संगठन मे कोई दायितत्व नहीं रखते हैं उनके द्वारा की जा रही किसी भी गतिविधि से संगठन को लेना देना नहीं है तथा संगठन से जुड़े देश भर के राष्ट्रपति स्काउट/गाइड,रोवर रेंजर को भी ये सूचित किया जाता है की इनके द्वारा किसी भी प्रकार के आयोजन मे अगर आप सम्मिलित होते हैं तो उसका आईपा संगठन से कोई लेना देना नहीं होगा |

सर्व साधारण को ये भी सूचित किया जाता है की विपिन सोलंकी पर पूर्व मे अनियमितता और अन्य कईं गंभीर आरोप लग चुके हैं – अगर इस निर्णय के बाद भी वह आईपा संगठन के नाम पर कोई गतिविधि करते हैं तो संस्था के द्वारा कानूनी कार्यवाही का भी रुख किया जाएगा |

बैठक मे निर्णय लिया गया की जल्द ही आईपा संगठन की एक राष्ट्रीय बैठक आहूत की जाएगी जिसमे अग्रिम कार्यकर्मों की योजना बनाई जाएगी |

(Media Scan में प्रकाशित किसी समाचार के संबंध में mediainvite2017@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

गुरु गोविन्द सिंह के साहबजादों को दी गई क्रूर यातनाओं और बलिदान का स्मृति दिवस

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दिसम्बर माह की 21 से लेकर 27 के बीच गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों को दी गई क्रूरतम यातनाओं और बलिदान की स्मृतियाँ तिथियाँ हैं। ऐसा उदाहरण विश्व के किसी इतिहास में नहीं मिलता। इनमें 26 दिसम्बर के दिन दो अवोध बालकों ने स्वत्व और राष्ट्र संस्कृति की रक्षा के बलिदान दिया । प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी ने गत वर्ष इस दिन को “वीर बाल दिवस” के रूप में मनाने का आव्हान किया था ।

सनातन संस्कृति, राष्ट्र और परंपराओं की रक्षा केलिये भारत में असंख्य बलिदान हुये हैं। इनमें कुछ परिवारों की तो पीढ़ियों का बलिदान हुआ । इसमें गुरु गोविन्दसिंह की वंश परंपरा भी है जिनकी पीढियों का बलिदान इतिहास पन्नों में दर्ज है । दिसम्बर के अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों पुत्रों को दी गई क्रूरतम यातनाएँ और उनका बलिदान का विवरण आज भी रोंगटे खड़े कर देता है । इस बलिदान का स्मरण सामाजिक स्तर पर पूरा देश 21 दिसम्बर से 27 दिसम्बर के बीच करता है । गत वर्ष पहली बार केन्द्र सरकार के स्तर पर आयोजन की घोषणा की गई है । और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस के रूप में मनाने का आव्हान किया।

सिक्ख परंपरा में गुरु गुरु गोबिंद सिंह दसवें गुरू थे । उनके पुत्रों के बलिदान ईस्वी सन् 1705 में हुये थे इनमें दो सबसे छोटे पुत्रों साहिबजादा जोरावर सिंह व साहिबजादा फतेह सिंह का बलिदान 26 दिसम्बर को बहुत छोटी सी आयु में हुआ था । यह सिख पंथ के गरिमामयी गौरव परंपरा और राष्ट्र संस्कृति की रक्षा के लिए दी गई प्राणों क आहूति थी । उनके दो पुत्रों ने युद्ध भूमि में वीरता और अनोखे साहस का परिचय दिया वहीं दो छोटे साहिबजादों ने जिन्दा दीवार में दफ़न होना पसंद किया पर धर्मांतरण न किया । उनके सबसे बड़े पुत्र की आयु सत्रह वर्ष और सबसे छोटे पुत्र की आयु मात्र पाँच वर्ष थी । इनके साथ इनकी दादी माता गूजरी का बलिदान भी क्रूरतम यातनाओं के साथ हुआ ।

वह समय भारत में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन का अंतिम समय था । उसने सिख पंथ को जड़ से समाप्त करने का संकल्प कर लिया था । मुगल फौज पंजाब में फौज सिखों की तलाश में लगी थी । सिखों को को ढूंढ ढूंढ कर यातनाएँ दी जाने लगी । मतान्तरण का दबाब बना जो न मानें उनका बलिदान। उन दिनों सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह आनंदपुर किले में थे । मुगलों की फौज ने इस किले का घेरा डाला हुआ था । यह घेरा करीब छै माह तक पड़ा रहा । एक समय ऐसा आया जब किले का राशन पानी सब खत्म हो गया था । गुरू गोविन्द सिंह के सामने दो ही रास्ते थे एक अंतिम युद्ध लड़कर बलिदान हो जांय दूसरा सुरक्षित निकलकर युद्ध जारी रखा जाय । गुरु गोविन्द सिंह ने दूसरा मार्ग चुना । वे आनंदपुर से निकलकर चमकौर की ओर पहुँचे । यहां एक पुराना किला था वहां के निवासी सिख गुरु के प्रति श्रद्धा रखते थे । गुरु गोविन्द सिंह ने अपने परिवार और विश्वस्त सैनिकों के साथ यहीं आये । वे 21 दिसम्बर 1705 की रात थी जब वे चमकौर पहुँचे । गुरु गोविन्द सिंह जी आनंदपुर से निकलने की खबर मुगल सेना को लग गयी थी । मुगल फौज की एक टुकड़ी भी इस काफिले के पीछे चलने लगी । मुगलों की फौज का नेतृत्व सरहिन्द के नबाब बजीर खां के हाथ में था । जब गुरु गोविन्दसिंह चमकौर किले में पहुँचे तो मुगल फौज ने चमकौर किले पर घेरा डाल लिया । चमकौर की यह इमारत पुरानी थी । वह इस स्थिति में नहीं थी कि लंबे समय तक सुरक्षित रह सके । कुछ दीवारें तो केवल मिट्टी की थीं । इतिहास की पुस्तकों में मुगल फौज की संख्या तीन लाख अंकित है । जबकि किले के भीतर सिखों की संख्या मात्र दो हजार थी जिसमें सामान्य नागरिक और स्त्री बच्चे अधिक थे, सैनिक कम थे । सैनिकों की संख्या तो मात्र कुछ सैकड़ा ही थी । लेकिन सिख सेनानियों ने संख्या बल कम होने की चिंता नहीं की ।

सभी सिख सैनिकों ने साहस से मुकाबला किया । यहीं से यह कहावत प्रसिद्ध हुई कि “सवा लाख से एक लड़ांऊ” । यहाँ दो निर्णय हुये जत्थों के साथ युद्ध किया जाय और गुरुजी यनि गुरु गोविन्द सिंह को सुरक्षित निकाला जाय । जत्था तैयार करके युद्ध लड़ने की रणनीति बनी । और प्रत्येक जत्थें में केवल दस ही सैनिक होंगे । पहले जत्थे का नेतृत्व साहबजादे अजीत सिंह को सौंपा गया । हालांकि अन्य सैनिकों ने साहबजादे को रोका पर अजीतसिंह न माने । गुरु गोविन्दसिंह ने अपने बेटे को स्वयं हथियार दिये । साहबजादे निकले और शत्रु सेना पर टूट पड़े । वे बहुत अच्छे तीरंदाज थे । उनके पास तीर कमान और तलवार दोनों थी । दूसरी ओर मुगल सैनिकों के पास बंदूकें भी थीं। सभी सिख सैनिक जानते थे कि युद्ध का परिणाम क्या होगा पर भी उन्होंने युद्ध किया और अपने अंतिम तीर तक युद्ध किया । तलवार से भी तब तक युद्ध किया जब तक तलवार टूट न गयी । कोई इस वीरता की कल्पना कर सकता है कि केवल दस सैनिकों को लेकर एक नायक ने युद्ध लड़ा हो फिर भी यह युद्ध दिन के तीसरे पहर तक चला । यह 23 दिसम्बर का दिन था जब साहबजादे अजीत सिंह का बलिदान हुआ । अगले दिन का युद्ध दूसरे साहबजादे फतेह सिंह के नेतृत्व में सिख जत्थे ने लड़ा । तब फतेह सिंह की आयु मात्र पन्द्रह साल थी । वे भी वीरता पूर्वक बलिदान हुये । तब पंच प्यारों ने गुरू जी से सुरक्षित निकल जाने का आग्रह किया ।

उनका आग्रह मानकर गुरु गोविन्द सिंह अपने परिवार और कुछ सैनिकों के साथ किले के गुप्त मार्ग से निकलना स्वीकार कर लिया । यह संख्या कुल इक्यावन थी । कहीं कहीं यह संख्या साठ भी लिखी है । बाकी लोगों ने किले में ही रहकर मुकाबला करने का निर्णय लिया ताकि मुगल सैनिकों को यह संदेह न हो कि गुरुजी निकल गये । चमकौर के पास सरसा नदी बहती थी । यह 24 और 25 दिसम्बर 1705 की दरम्यानी रात थी । भयानक ठंड और मावट का मौसम । पानी बर्फ की तरह ठंडा था । अभी गुरू गोविन्द सिंह का काफिला नदी पार भी न कर पाया था कि वजीर खान को खबर लग गयी । उसकी सेना नदी पर टूट पड़ी । इस अफरा तफरी मे गुरु गोविन्द सिंह का परिवार बिखर गया । सबसे छोटे दो साहबजादे जोरावर सिंह सात वर्ष और जुझार सिंह पाँच वर्ष दादी माता गुजरी के साथ बिछुड़ गये इनके साथ न कोई सेवक और न कोई सैनिक । अंधेरी रात और भीषण सर्दी के बीच दादी दोनों बच्चों ने नदी पार की । दादी अंधेरे में ही दोनों बच्चों को लेकर जहाँ राह मिली उसी ओर चल दी । कितना चलीं कितनी राह निकली कुछ पता नहीं । सबेरा हुआ । सूरज निकला । एक स्थान पर थकान मिटाने रुकीं, बच्चो को भोजन भी जुटाना था । तभी एक व्यक्ति दिखा । जिसका नाम गंगू था । वह गुरू गोविन्द सिंह का पुराना सेवक था । उसने माता गुजरी को पहचाना और विश्वास दिलाकर अपने घर ले गया ।

उसके गाँव का नाम खैहैड़ी था । उसने भोजन दिया विश्राम कराया । और घर से निकल लिया । यह 25 दिसम्बर का दिन था । उसने खबर बजीर खान को दी और इनाम में सोने की मुहर प्राप्त की । शाम तक मुगल सैनिक आ धमके । माता गुजरी और दोनों बच्चो को पकड़ ले गये । उन्हे रात भर बिना कपड़ो के बुर्ज की दीवार पर बांधकर रखा गया । अगले दिन वजीर खान के सामने पेश किया गया । वह 26 दिसम्बर 1704 का दिन था । वजीर खान ने माता गुजरी और दोनों बच्चो से इस्लाम कुबूल करने को कहा । बच्चो ने इंकार करदिया । वजीर खान ने आदेश दिया कि यदि बच्चे इस्लाम कुबूल न करें तो इन्हे जिन्दा दीवार में चुन दिया जाय । बच्चों को भूखा रखा गया । रात भर फिर बुर्ज पर पटका । पर दोनों साहबजादे अडिग रहे । उन्हें 27 दिसम्बर को जिन्दा दीवार में चुन दिया गया । और माता गुजरी के प्राण भी भीषण यातनाएं देकर लिये । इस तरह दिसम्बर माह का यह अंतिम सप्ताह गुरु गोविन्द सिंह के चारों साहबजादों और माता गूजरी के बलिदान की स्मृति के दिन हैं ।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 26 दिसम्बर वीर बाल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया । और पिछले वर्ष से 26 दिसम्बर को वीर बाल दिवस के रुप में मनाया जाता है ।

गुरुकुल पद्धति के माध्यम से आत्मनिर्भर शिक्षक छात्र एवं आत्मनिर्भर भारत

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समीर कौशिक

यह कहने में कोई अतिरेक नही है कि भारत की प्राचीन शिक्षा पद्धति में गुरुकुलों का महत्वपूर्ण एवं सर्वोच्च स्थान था। गुरुकुलों में शिक्षा, संस्कार, राष्ट्रबोध, धर्म, सँस्कृति का विवेक और जीवन कौशल प्रबंधन द्वारा आत्मनिर्भरता का समावेश होता था, जो विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर और समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनाता था। यह प्रणाली केवल शैक्षिक ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की भावना को प्रोत्साहित करती थी। आज भी, यदि हम गुरुकुलों की परंपरा को समझें और उसे समकालीन शिक्षा व्यवस्था में लागू करें, तो हम आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अहम योगदान दे सकते हैं।

गुरूकुल रोजगार के कई प्रकार के अवसर भी प्रदान करते थे। गुरुकुल समाज के लिए मात्र न शैक्षिक केंद्र होते थे, बल्कि वे एक प्रकार के सामुदायिक और सामाजिक विकास एवं चिंतन केंद्र भी थे, जहाँ से विभिन्न प्रकार के कार्यों और रोजगार के अवसर उत्पन्न होते थे।

प्राचीन समय में गुरुकुलों से जुड़ी रोजगार की संभावनाएं असीम थी जिसमें से कुछ वर्तमान में व्यवहारिक पक्षों को प्रकाशित करने का प्रयास इस लेख में करने का किया गया है

शिक्षक का रोजगार गुरुकुलों में शिक्षा देने के लिए गुरु की आवश्यकता होती थी। जो व्यक्ति वेद, शास्त्र, धर्म, दर्शन, आध्यत्म गणित, विज्ञान, भूगोल, खगोल, ज्योतिष, संस्कार शास्त्रों और संस्कृत एवं अन्य स्थानीय भारतिय भाषाओं के ज्ञाता होते थे, वे गुरुकुलों में शिक्षा प्रदान करते थे। गुरु का कार्य न केवल छात्रों को शास्त्रों का ज्ञान देना, बल्कि उन्हें जीवन की नैतिकता, धर्म और संस्कारों का पालन भी सिखाना था। विद्यार्थियों को कौशल, आत्मनिर्भरता स्वावलंबी और रोजगार के अवसरों से भी जोड़ना था। गुरुकुलों में शिक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भरता की अवधारणा को महत्वपूर्ण माना जाता था।
गुरुकुलों में केवल धार्मिक आध्यात्मिक या दार्शनिक शिक्षा नहीं दी जाती थी, बल्कि विद्यार्थियों को विभिन्न शिल्पों और तकनीकी कौशलों में भी पारंगत किया जाता था। जैसे कि ताम्र शिल्प, धातु विज्ञान, भस्म निर्माण, खनिज, अयस्कों हस्तशिल्प, निर्माण कार्य, औषधि निर्माण, और वास्तुकला, धातु विज्ञान, वस्त्र निर्माण, अभियांत्रिकी आदि का प्रशिक्षण गुरुकुलों के माध्यम से दिया जाता रहा है ।

1.*गुरुकुल पद्धति से आत्मनिर्भर भारत का संकल्प कौशल विकास*

आत्मनिर्भर भारत का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों में भी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। आत्मनिर्भर भारत का निर्माण उन व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा संभव है, जो स्वयं में निर्णय करने में सक्षम हों और जो अपने प्रयासों से समाज और देश की प्रगति में भागीदार बन सकें। गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति ने न केवल शैक्षिक ज्ञान दिया, बल्कि यह जीवन के हर आयाम में आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा भी दी।

2.*छात्रों की आत्मनिर्भरता*

गुरुकुलों में शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन में सही निर्णय लेने, समाज में अपनी भूमिका निभाने, और स्वयं के जीवन के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनाने का था। एक आत्मनिर्भर छात्र वह है जो न केवल पुस्तकीय ज्ञान में परिपूर्ण हो, बल्कि वह अपनी सोच, कार्य और निर्णयों में स्वतंत्र हो। उसे अपने कार्यों के परिणामों का बोध हो और वह दूसरों पर निर्भर रहने की अपेक्षा स्वयं मार्ग तय करने में सक्षम हो । रोजगार करने खोजने के स्थान पर रोजगार दाता बनें ।

गुरुकुलों में विद्यार्थी को संस्कार, नैतिक शिक्षा और जीवन कौशल सिखाए जाते थे। यह शिक्षा उसे जीवन के विभिन्न संघर्षों और समस्याओं का समाधान ढूंढने की क्षमता देती थी। आत्मनिर्भर छात्र वही है, जो न केवल आत्मनिर्भरता की ओर बढ़े, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करें और समाज में बदलाव लाने का कार्य करें।

वेदों और शास्त्रों की शिक्षा के माध्यम से वेदों और उपनिषदों के अध्ययन से विद्यार्थियों में भाषायी कौशल, विचारशीलता, तर्कशक्ति, और काव्य रचनात्मकता का विकास होता था। इसके अतिरिक्त संस्कृत साहित्य, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, और अन्य शास्त्रों का अध्ययन भी किया जाता था।

गुरुकुलों में आयुर्वेद और चिकित्सा, आत्मरक्षा, युद्धकला, शस्त्र विद्या शस्त्रनिर्माण, वाणिज्य व्यवसाय , विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा, देश की सीमा सुरक्षा, हर व्यक्ति का सैन्य प्रशिक्षण, तर्क शास्त्र, खेल कूद, कृषि विज्ञान, मौसम विज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। आयुर्वेदाचार्य, वैद्य, और चिकित्सक शल्य चिकित्सक के रूप में रोजगार प्राप्त करने के अवसर थे। इस प्रकार के विशेषज्ञ व्यक्ति गुरुकुलों से प्रशिक्षित होकर स्वास्थ्य सेवाओं में कार्य करते थे। वस्तुतः प्राचीन भारत गुरुकुलों के माध्यम से ही अपनी सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्माण करता था, एवं समाज के सामूहिक प्रयास से गुरुकुलों का संचालन भी होता था हर क्षेत्र में अपने स्वायत्त गुरुकुलों की व्यवस्था होती थी । गुरुकुलों के माध्यम से ही भारत मे लघु एवं कुटीर उधोगों का एक व्यापक प्रसार था । वस्तुतः भारत कृषि प्रधान देश नहीं एक रोजगार प्रधान, उत्पादक एवं वस्तु निर्यातक देश था इन्हीं गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति ने भारत को विश्वगुरु के पद पर हज़ारों लाखो वर्षों तक आसीन रखा ।

इस प्रकार, प्राचीन गुरुकुल न केवल शिक्षा का केंद्र थे, बल्कि रोजगार के विभिन्न अवसर भी प्रदान करते थे, जिससे समाज के हर वर्ग को अपनी दक्षताओं का उपयोग करने का अवसर मिलता था।

वर्तमान में भी कुछ गुरुकुल आयुर्वेद, योग और स्वस्थ जीवनशैली से जुड़े शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा चिकित्सक, योग प्रशिक्षक, और आयुर्वेदिक सलाहकार के रूप में रोजगार प्राप्त किया जा सकता है। इस तरह गुरुकुलों से रोजगार के विभिन्न मार्ग खुल सकते हैं, यदि सही दिशा में कार्य किया जाए।

गुरुकुलों के माध्यम से आध्यात्मिक पर्यटन को भी बढ़ाया जा सकता है अपितु यदि प्रयोग आरम्भ किये जाएं तो सामान्य विद्यालयों में गुरुकुल के अनुशासन एवं आचरण का आरंभ करके इसे वर्तमान में भी क्रियान्वित किया जा सकता है और कुछ स्तरों पर देश मे इसका आरम्भ शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास जैसे स्वयंसेवी संगठनों एवं शैक्षिक संस्थाओ के माध्यम से आरम्भ भी हो चुका है । गुरुकुलों में शिक्षा लेने आने वाले छात्रों या श्रद्धालुओं के लिए, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं, जैसे- यात्रा मार्गदर्शक, अतिथियों पर्यटकों तीर्थयात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था आदि।
हस्तशिल्प और कला कुछ गुरुकुल पारंपरिक कलाओं और हस्तशिल्प को सिखाते हैं, जिससे रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं। छात्र अपने कौशल को बाजार में बेच सकते हैं या शिल्प उत्पादों की बिक्री के लिए बाज़ारों में काम कर सकते हैं।

3.*शिक्षक की आत्मनिर्भरता*

गुरुकुलों में शिक्षक का कार्य केवल पढ़ाना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना था। वह एक मार्गदर्शक, एक मित्र और एक संरक्षक के रूप में कार्य करते थे। आत्मनिर्भर शिक्षक वह होता है, जो न केवल शैक्षिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का निर्माण करता है। ऐसे शिक्षक विद्यार्थियों को इस बात का एहसास कराते हैं कि शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में सफलता और संतुष्टि पाने के लिए है।

आत्मनिर्भर शिक्षक वह है, जो अपने ज्ञान के साथ-साथ अपनी शिक्षा की विधियों में भी नवाचार सृजन करता है और विद्यार्थियों को अपने प्रयासों से समाज और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। शिक्षक का यह दायित्व है कि वह विद्यार्थियों को केवल पढ़ाई में ही नहीं, बल्कि जीवन के अन्य पहलुओं में भी सफलता के मंत्र सिखाए।

4.*गुरुकुलों से शिक्षा और आत्मनिर्भरता का संबंध*

गुरुकुलों की शिक्षा पद्धति में हर विद्यार्थी को स्वतंत्र रूप से सोचने, जीवन के विभिन्न पहलुओं में संतुलन बनाने, और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझने की प्रेरणा मिलती थी। यहां पर विद्यार्थियों को अपने हाथों से काम करने, कठिनाइयों का सामना करने और आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दी जाती थी। गुरुकुलों का यह संदेश आज भी प्रासंगिक है। यदि हम इस परंपरा को अपनाएं और शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दें, तो हम न केवल अपने विद्यार्थियों को सफल बना सकते हैं, बल्कि एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण भी कर सकते हैं।

आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार हो सकता है, जब हम अपने विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाएंगे और उन्हें अपने जीवन के सभी पहलुओं में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का अहसास कराएंगे। गुरुकुलों से प्राप्त शिक्षा पद्धति को आज के समय में अपनाकर हम आत्मनिर्भर छात्र और आत्मनिर्भर शिक्षक तैयार कर सकते हैं, जो अंततः एक आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत का निर्माण करेंगे।

आत्मनिर्भर भारत के प्रणेता -भारतरत्न श्रद्धेय अटलजी

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी एक कुशल राजनीतिज्ञ, सहृदय व्यक्तित्व के धनी, भावपूर्ण कवि और प्रख्यात पत्रकार थे जिनके मन में सदैव देश ही सर्वोपरि रहता था। आज भारत जिस तेज गति से मिसाइलों के परीक्षणों के द्वारा अपनी सुरक्षा को अभेद्य बना रहा है और भारत के शत्रु इसकी बढ़ती सैन्य शक्ति व आत्मनिर्भर हो रही रक्षा प्रणाली से भयभीत हो रहे हैं वह अटल जी की ही सरकार का प्रारंभ किया हुआ कार्य है जिसे मोदी जी पूरा कर रहे हैं ।

अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में जिन परियोजनाओं पर काम किया गया वही अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के शासनकाल में धरातल पर उतर रही हैं। इनमे से अधिकांश बीच में आई सरकारों ने ठन्डे बस्ते में डाल दी थीं। अटल जी का एक सपना अयोध्या में भव्य राम मंदिर के रूप में पूरा हो रहा है, दूसरी ओर जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद -370 और 35- ए का समापन हो चुका है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के शासनकाल में आगे बढ़ते कार्यों में सर्वत्र अटल जी की ही छाप है।

अटलजी का जन्म 25 दिसम्बर 1926 को शिंदे की छावनी (मध्य प्रदेश )में प्राइमरी स्कूल अध्यापक स्वर्गीय पंडित कृष्ण बिहारी बाजपेयी के घर पर हुआ।उनकी माता का नाम श्रीमती कृष्णा देवी था जो कि धर्मपरायण महिला थीं। अटल जी का पूरा परिवार संघ के प्रति निष्ठावान था। वह आठ वर्ष की आयु में ही संघ के संपर्क में आ गये और विद्यार्थी जीवन में ही संघ से प्रेरित होकर मन में ठान लिया था कि वे देश के लिये जियेंगे और दे केश लिये ही मरेंगे। अटल जी की शिक्षा दीक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज और कानपुर के डी ए वी कालेज में संपन्न हुई। स्नातक और उसके उपरांत राजनीति शस्त्र में स्नातकोत्तर कि परीक्षाएं अटल जी ने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं ।इसके बाद अपने पिता के साथ ही एल एल बी किया । छात्र जीवन में छात्र राजनीति में सक्रिय रहकर वे विक्टोरिया कालेज छात्र संघ के महामंत्री ,ग्वालियर छात्र संघ के अध्यक्ष एव आर्य कुमार सभा के महामंत्री बने।

अटल जी को मां सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त था जिससे वे छात्र जीवन में ही वाद विवाद और काव्य पाठ आदि में भाग लेकर लोकप्रिय हो गए थे । वह लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म ,पांचजन्य और वीर अर्जुन तथा स्वदेश जैसे समाचार पत्र पत्रिकाओें के संपादक रहे।उन्होंने 1946 में ही अपना जीवन संघ को समर्पित कर दिया था उन्होंने काफी समय तक पूर्णकालिक प्रचारक के रूप मे कार्य किया।अटल जी कहा करते थे कि भारत का प्रत्येक कण स्वर्ग से भी अधिक पवित्र है तथा महान तीर्थ है। उनका कहना था कि हमारे एकमात्र देवी देवता हमारे देशवासी हैं। उनकी पूजा अर्चना ही सच्ची मानवता है।हमारे राष्ट्रीय जीवन का मूल स्रोत हमारा धर्म है। निष्काम कर्मयोगी अटल जी भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक थे।

अटल जी का राजनैतिक जीवन संघर्ष पूर्ण रहा। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल को उखाड़ फेकने में अटल जी ने महती भूमिका निभाई। अटल जी व संघ ने आपातकाल के विरुद्ध अनथक संघर्ष किया जिसके परिणामस्वरूप ही मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी जिसमें अटल जी विदेश मंत्री बने ।वह देश के ऐसे पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया।

अटल जी तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने।पहले 13 दिन, फिर 13 माह व फिर पूरे सत्र के लिए । अटल जी की सरकार में कई ऐतिहासिक कदम उठाये गये थे जिनकी गूंज आज भी सुनायी दे रही है।अटल जी सरकार ने वैश्विक दबाव को नजरअंदाज करते हुए परमाणु परीक्षण किये जिसके करण कई देशों ने भारत पर प्रतिबंध भी लगाये लेकिन वह किसी दबाव में नहीं झुके।अटल जी ने पाकिस्तान के साथ मैत्री को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लाहौर से बस यात्रा भी की लेकिन इसके बदले में भारत को पाकिस्तान के विश्वासघात का सामना करना पड़ा लेकिन कारगिल की पहाड़ियों पर भारतीय सेना ने अपना पराक्रम दिखाया और अटल सरकार की नेतृत्व क्षमता उजागर हुयी। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने पर अटल जी सरकार में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम शुरू हुए। सौ वर्ष पुराना कावेरी विवाद सुलझाया गया। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना प्रारंभ हुई।

अटल जी को अपने राजनैतिक जीवन में कई पुरस्कार प्राप्त हुए जिसमें 1992 में पद्म विभूषण,1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार एवं भारतरत्न प्रमुख हैं । उन्हें कानपुर विश्वविद्यालय ने 1993 में डी लिट की मानद उपाधि भी प्रदान की। 2015 में बांग्लादेश की ओर से फ्रेंडस आफ बांग्लादेश लिबरेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया।अटल जी एक ऐसे राजनेता थे जिनका सम्मान विरोधी का विचारधारा के लोग भी करते थे।
अटल जी ने अपने संसदीय क्षेत्र लखनऊ को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया। अटल जी लखनऊ से पांच बार सांसद रहे जिसमें तीन बार प्रधानमंत्री बने। अटल जी लखनऊ में 1991, 1996, 1998 1999 और 2004 में सांसद बने। 1991 में उन्होंने कांग्रेस के रंजीत सिह को हराया,19996 में उन्होंने सपा के राजबब्बर को, 1998 में सपा के मुजफ्फर अली को 1999 में कांग्रेस के डा कर्ण सिंह को और 2004 में सपा की मधु गुप्ता को दो लाख मतों के भारी अंतर से पराजित करने का रिकार्ड बना दिया। लखनऊ में अटल जी को पराजित करने के लिये विपक्ष ने हर चुनाव में नये तरीके आजमाए लेकिन हर बार उन्हें पराजय ही मिली।

अटल जी ने लखनऊ को एक माडल के रूप में विकसित किया।वह नये औेर पुराने शहर की बराबर चिंता किया करते थे।अटल जी को लखनऊ की तेजी से बढ़ रही आबादी का अनुमान था।इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने गोमती नगर रेलवे स्टेशन को चारबाग जैसी सुविधाओं के साथ बनाने का प्रस्ताव तैयार कराया। फैजाबाद रोड से अमौसी तक अमर शहीद पथ के निर्माण की कल्पना उन्हीं की देन है। लखनऊ- कानुपर हाईवे का चौड़ीकरण लखनऊ – हरदोई का चौड़ीकरण, दीन दयाल स्मृतिका, निशातगंज फ्लाईओवर ,कल्याण मंडप भी अटल जी की ही देन है। अटल जी ने ही साइंटिफिक कन्वेंशन सेंटर बनवाया तथा टिकैतराय तालाब और कुड़ियाघाट का जीर्णोद्धार कराया। अटल जी की ही पहल पर पुराने लखनऊ की संकरी गलियों में गहरे गड्ढों वाली पतली सीवर लाइन की बुनियाद पड़ी।बाद में पूरे शहर के सीवरेज सिस्टम की योजना बनी। लखनऊ मेट्रो की कल्पना भी उन्हीं के कार्यकाल में आयी थी। राजधानी लखनऊ अटल जी की राजनैतिक कर्मभूमि थी। अटल जी ने 25 अप्रैल 2007 को कपूरथला चौराहे पर भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में अंतिम बार एक चुनावी सभा को संबोधित किया था ।

अटल जी के जीवन में “सादा जीवन उच्च विचार” के मन्त्र का वास्तविक स्वरुप दिखता है।

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