हमारा अभी ब्रेनवाश नहीं हुआ है

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स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

जरा दिमाग पर जोर डालिये और मात्र दस साल पहले 2014 अगस्त याद कीजिये जब कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को ठेका दिया था राहुल गांधी को राजनीति में चमकाने का! प्रशांत ने 350 करोड़ में राहुल गांधी को राजनीति का सूरज बना देने का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। अगस्त के आखिर में प्रशांत किशोर ने बाकायदा सोशल मीडिया पर एक विज्ञप्ति निकाली थी कि जो लोग सोशल मीडिया पर लिखने में एक्सपर्ट हैं वे उससे जुड़े और करीब 60 हजार लोगों की लिस्ट बनी थी मुंबई में एक मीटिंग रखी गई दूसरी बनारस में। लगभग पांच हजार लोगों को छांट कर एक आईटी सेल बनाई गई जो दिन रात कांग्रेस को अपग्रेड करते थे!

दूसरा आपको ‘द वायर’ याद हैं! जिसने अमित शाह के बेटे पर 300% मुनाफा कमाने का आरोप लगाया था और रातों रात चर्चा में आई थी?? हालांकि ‘द वायर’ ने बाद में केजरीवाल की तरह माफी भी मांगी और कोर्ट में जुर्माना भी भरा था लेकिन द वायर को चर्चा में आना था सो वह आ गई।

अब तीसरा हाल ही का ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ को भी याद कीजिए कि हजार करोड़ लेकर कांग्रेस से सरकार बनवाने का कॉन्ट्रेक्ट इसी कम्पनी ने लिया था। ये कैम्ब्रिज अमेरिकी कंपनी हैं जिसने ट्रम्प का प्रचार किया था और कांग्रेस ने इसी बेस पर इसे राहुल गांधी के लिये हजार करोड़ देकर यहां भारत मे एप्रोच किया!

अब प्रशांत किशोर ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया हैं लेकिन जाते जाते आईटी सेल दे गया। उसकी बनाई आईटी सेल के हर व्यक्ति को बीस हजार महीने से लेकर योग्यता अनुसार लाख से ऊपर तक महीने की तनख्वाह दी जाती हैं। प्रशिक्षण देकर लाइव डिबेट के लिये तैयार किया जाता हैं।

हर विषय को कैसे हैंडल करना है, इसपर बाकायदा किताबे छपी हुई हैं और ये सब लोग रात दिन अपनी तनख्वाह बढ़ाने के चक्कर मे सोशल मीडिया पर लगे हुए हैं जो आज भी जारी है और हर महीने सैकड़ों करोड़ पानी की तरह इनपर कांग्रेस बहा रही है।

अब ‘द वायर’ जैसी हजारों वेबसाइट और ब्लॉग धड़ल्ले से चल रहे हैं जिनका काम सिर्फ न्यूज लिंक क्रिएट करना हैं और वही न्यूज बनानी है जो आईटी सेल चाहती हैं।

कैम्ब्रिज ने इनसे दो कदम आगे बढ़कर वो फार्मूला आजमाया जो ये गोरे शुरू से आजमाते हैं। कैम्ब्रिज ने 2014 के वोट प्रतिशत और किस जगह से कितने आये किस जाति से कितने आए इसकी डिटेल निकाली और इन वोटों को तोड़ने की उसने बाकायदा आधिकारिक घोषणा की कि वह इस हिंदुत्व की एकता को ही तोड़ देंगे ‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’।

प्रशांत किशोर से लेकर केंब्रिज के बीच और भी बहुत प्रयास हुए हैं।

अब इस गेम को समझिए की कहाँ से आते हैं वो फोटोशॉप जो नफरत फैलाते हैं? कैसे गलत न्यूज रातों रात वायरल हो जाती हैं? कैसे मोदी के बयान को तोड़कर उसे गलत सिद्ध करने के लिये तुरन्त लिंक न्यूज फैल जाते हैं? कैसे अखबार की एडिट कटिंग तुरन्त मिल जाती हैं? लेकिन बात यहीं तक नही हैं ये मोदी विरोध के चक्कर मे कब देश का विरोध करने लगे उन्हें भी नहीं पता! कब जातिवाद के चक्कर में धर्म को गालियां देने लगे इन्हें भी नही पता हैं! मोदी विरोध के फेर में ये भारत को ही गालियां देने लगे हैं।

आईटी सेल के हर व्यक्ति को मोदी विरोध का पैसा मिलता हैं। जो जितना ज्यादा प्रभावी ढंग से विरोध करेगा उतना ही ज्यादा पैसा हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नही की हमारी अक्ल घास चर रही हैं! केवल चार साल में इनका फैलाया जहर इस हद तक फैल गया कि दिमाग में एक दूसरे के लिए सिर्फ नफरत को जगह हैं बाकी ब्लेंक!

याद रखिये ‘अंध विरोध की काट अंधभक्त होना ही हैं’ हमारे आपके जैसे अंधभक्तो ने प्रशांत किशोर, द वायर और कैम्ब्रिज जैसो को घुटनों पर ला दिया हैं और आगे भी कोई देशविरोधी होंगे तो उन्हें भी लाएंगे!

हिन्दू समाज के परिष्कार के लिये हुई विहिप की स्थापना

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अम्बरीष

दिल्ली । विश्व हिन्दू परिषद अपनी जीवन यात्रा के 61 वर्ष पूर्ण कर रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य दिवस पर परिषद् की स्थापना एक दैवी संयोग ही है,श्रीकृष्ण के अवतार के कालखण्ड में देश की परिस्थिति और परिषद के स्थापना के समय देश की स्थिति में अनूठा साम्य दिखता है। 61 वर्ष की गौरवशाली यात्रा के कुछ अविस्मरणीय और अनूठे पड़ाव हैं,कुछ को पढ़ा है, कुछ को बड़ों से सुना है और कुछ का तो स्वयं मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं। स्थापना काल के समय कैसा मनोहारी रहा होगा वह दृश्य ? स्वामी चिन्मयानन्द जी के आश्रम संदीपनी साधनालय मुंबई में,विश्व भर के हिन्दुओं की दिशा और दशा के चिंतन हेतु एकत्रित देश के लब्धप्रतिष्ठित महानुभाव स्वामी चिन्मयानन्द जी, संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य श्री गुरूजी, श्री के.एम्. मुनशी , मास्टर तारा सिंह,पूज्य कुशक बकुला, पूज्य सुशील मुनि सदृश मनीषी।

उनके द्वारा विराट हिन्दू समाज को जाति,मत,पंथ और भाषा से ऊपर उठ हिन्दू के नाते संगठित करने का संकल्प। प्रयाग के पावन संगम तट पर महाकुम्भ के अवसर पर आयोजित प्रथम विश्व हिन्दू सम्मलेन का ऐतिहासिक दृश्य हिन्दू समाज ने वर्षों बाद अपने सभी मत पन्थों के पूज्य धर्माचार्यों को एक मन्च पर देखा, यह सुयोग बन पाया पूज्य श्री गुरूजी की प्रेरणा और विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम महामन्त्री दादा साहब आप्टे के अनथक श्रम से, स्मरण आ रहा है पूज्य संतो के मार्मिक भाषण के अंश,मैं इस विराट हिन्दू समाज का अंगभूत घटक हूं, मेरे पंथ के प्रथम पुरुष ने हिन्दू समाज के संगठन और परिष्कार के लिये ही इस पंथ की स्थापना की थी हम अनवरत इस पुनीत कार्य में लगे हैं और लगे रहेंगे। 1969 में उडुपी में हिन्दू सम्मलेन मन्च पर विराजमान पूज्य संतों द्वारा उदघोष “हिन्दवः सोदरा सर्वे न हिन्दू पतितो भवेत” अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारित ,हिन्दू के लिये ऐतिहासिक क्षण ।

-1979 प्रयागराज के संगम तट पर ही द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन तब तक परिषद् का विस्तार 7 समुद्र पार तक पहुँच चूका था देश विदेश के हिन्दू समाज और धर्म धाराओं का मिलन हुआ। 1981 में मिनाक्षीपुरम के दुर्भाग्यपूर्ण धर्मान्तरण के बाद गिरिवासी वनवासी बंधुओं के बीच सेवा कार्यों की श्रंखला खड़ी करने का संकल्प ,”धोखा लालच पेट्रो डालर नहीं चलेगा” का शंखनाद। बड़े परिमाण में सेवा कार्य आरम्भ का संकल्प लिया गया। 1983 में गंगा माता और भारतमाता रथारूढ़ हो एकात्मता यात्रा के रूप में गांव गली गलियारे में अपने भक्तों के बीच निकलीं,सभी भेद टूट गये पूरे देश के दिग-दिगन्त में गूँज उठा भारतमाता की जय गंगा माता जय का जयघोष। 1984 श्री अयोध्या जी में सरयू की पावन रेती पर पूज्य संतों के नेतृत्व में रामभक्तों ने संकल्प लिया रामलला की जन्मभूमि पर विदेशी आक्रमणकारी बाबर के नाम पर बनी ईमारत में ताले में बन्द रामजी के विग्रह को मुक्त कर भव्य राममन्दिर के निर्माण का,आकाश गुंजायमान हो गया “बच्चा बच्चा राम का जन्म भूमि के काम का” , “राम लला हम आयेंगे मंदिर यहीं बनायेंगे”, “राम ने उत्तर दक्षिण जोड़ा भेदभाव का बन्धन तोड़ा” और आरम्भ हो गया दुनिया का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा जनांदोलन। यह आन्दोलन लाखों राममंदिर में कोई एक और राममन्दिर बनाने के लिये नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के पुनर्प्रतिष्ठा के रुके हुये उस महाअनुष्ठान का अगला चरण था जिसका आरम्भ देश के प्रथम गृहमन्त्री सरदार पटेल ने सोमनाथ के मन्दिर के पुनर्प्रतिष्ठा से की थी।

6 दिसम्बर 1992 को हिन्दू शक्ति ने पराधीनता के प्रतीक ढाँचे को ढहा दिया। हिन्दू के इस विराट सामूहिक शक्ति प्रदर्शन का सुपरिणाम रामजी के मन्दिर निर्माण की बाधाएं दूर हुईं भव्य मंदिर तीव्र गति से पूर्णता की ओर अग्रसर है। हिन्दू समाज के सम्मान के प्रत्येक संघर्ष में परिषद का अनूठा योगदान है। अमरनाथ यात्रा का पुनर्जीवन,रामसेतु आन्दोलन,गऊ रक्षा समर्पित कार्यकर्ताओं और हिन्दू समाज की श्रद्धा के बल पर हिन्दू जागरण में परिषद ने अग्रणी भूमिका निभा रहा है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य,स्वामी रामानन्द तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मान्तरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है । मठ मंदिर,अर्चक पुरोहित ,तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है । गिरिवासी वनवासी अञ्चल में अपने बंधुओं के बीच सेवा कार्यों की श्रृंखला विविध उपक्रमों से परिषद समाज देवता की साधना में निरन्तर लगा हुआ है।
संगठन बढ़ा कार्य बढ़ा लेकिन 61वर्ष में हिन्दु समाज और देश के समक्ष चुनोतियाँ भी बढ़ी हैं।

गऊ माँ के देश में उसका बहता हुआ रक्त, अपने ही देश में शरणार्थी काश्मीरी हिन्दू, बांग्लादेशी घुसपैठिये,जेहादी आतंकवाद,लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण,हिन्दू समाज के विखंडन के षडयंत्र , सिमटती पतितपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदल रहे तीर्थस्थल राष्ट्रहित की भी कीमत पर तुष्टिकरण । इन चुनौतियों का सामना करने के लिये हमें अनथक श्रम कर गिरिवासीवनवासी,नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव गांव तक संगठन के तंत्र को फैला देने का संकल्प करना है और उसे पूर्णता की ओर पहुंचाना है।

हमारा लक्ष्य संगठित ,आग्रही, सक्रिय, जागरूक श्रद्धालु और आक्रामक हिन्दू । हम सफल ही होंगे हमारी ध्येयनिष्ठा और श्रम के साथ हमारे रामजी की कृपा हमारे साथ है।

(लेखक विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता हैं)

संग्राम सेनापति

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~ रमेश पतंगे

मुंबई । देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 79वें स्वतंत्रता दिवस का भाषण, हमेशा की तरह, उत्कृष्ट रहा — ऐसा प्रमाण पत्र देने की कोई आवश्यकता नहीं। यह भाषण 102 मिनट का था। ऐसे भाषण से राष्ट्रीय नेतृत्व के गुण झलकते हैं। राष्ट्र का नेता कठोर, दूरदर्शी, देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का गहरा ज्ञान रखने वाला, सही समय पर सही और कठोर निर्णय लेने वाला, और उन निर्णयों के परिणामों की पूर्ण समझ रखने वाला होना चाहिए। इस संदर्भ में दुनिया के कुछ नेताओं का उल्लेख किया जाना उचित होगा । प्रथम विश्व युद्ध में अमेरिका का नेतृत्व थिओडोर रूजवेल्ट ने किया और इन सभी गुणों का प्रदर्शन उनके नेतृत्व में दिखा। द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका के नेता फ्रैंकलिन रूजवेल्ट थे, ब्रिटेन के नेता विंस्टन चर्चिल थे। बाद में रूस से संघर्ष करने वाले जॉन एफ. कैनेडी थे। इन सभी नेताओं के नेतृत्व में उपरोक्त गुणों का चरम दिखाई देता है। हाल के समय में मार्गरेट थैचर, जर्मनी की एंजेला मर्केल, सिंगापुर के ली कुआन यू भी ऐसे महान नेताओं की पंक्ति में खड़े होते हैं। आज हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सूची में सहजता से शामिल होते दिखाई देते हैं।

अपने लंबे भाषण में नरेंद्र मोदी ने बहुत दृढ़ता से पाकिस्तान को चेतावनी दी कि भारत परमाणु युद्ध की धमकी से नहीं डरता। हम किसी भी प्रकार का ब्लैकमेल सहन नहीं करेंगे। सिंधु जल समझौते के संदर्भ में उन्होंने कहा कि “रक्त और पानी एक साथ बह नहीं सकते। सिंधु का पानी बंद मतलब बंद।” ऑपरेशन सिंदूर के बारे में उन्होंने कहा कि हमने सेना को पूरी आज़ादी दी, उन्होंने रणनीति तय की, लक्ष्य चुना और लक्ष्य पर प्रहार किया। कई दशकों के बाद यह पराक्रम हमारी सेना ने किया। रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए हम लड़ाकू विमानों के स्वदेशी उत्पादन पर काम कर रहे हैं। स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत हमारा लक्ष्य है। ट्रम्प का नाम लिए बिना उन्होंने संकेत दिया कि आर्थिक धमकियों के आगे भारत नहीं झुकेगा।

कुछ दशक पहले कटोरा लेकर भीख मांगने वाले देश के रूप में ही दुनिया में भारत की छवि थी। चीन से मार खाने वाला और पाकिस्तानी आतंकवादियों से झुलसा हुआ भारत — यही भारत की पहचान थी। वैश्विक शांति के खोखले प्रवचन देने वाला, लेकिन अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ भारत — इस दुर्बल भारत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दस वर्षों में सीधा खड़ा कर दिया, स्वाभिमानी बना दिया। आज का भारत जैसे को तैसा ही जवाब देने वाला भारत बन चुका है।

ऐसे भारत का सपना सुभाषचंद्र बोस ने देखा था, स्वामी विवेकानंद ने देखा था, स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने देखा था, सरदार पटेल ने देखा था और इस सपने को साकार करने का काम पिछले सौ वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं संघ के स्वयंसेवक हैं और उन्हें इस पर गर्व है। मातृभूमि की सेवा के लिए जीवन समर्पित करने की प्रेरणा उन्हें संघ से ही मिली है।

इस बार लाल किले से अपने भाषण में उन्होंने संघ शताब्दी का अत्यंत संक्षिप्त उल्लेख किया। उनके ही शब्दों में —
“आज, मैं गर्व के साथ कहना चाहता हूं कि 100 साल पहले, एक संगठन का जन्म हुआ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। राष्ट्र की सेवा के सौ वर्ष एक गौरवपूर्ण, स्वर्णिम अध्याय हैं। ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के संकल्प के साथ, मां भारती के कल्याण के उद्देश्य से, स्वयंसेवकों ने अपना जीवन हमारी मातृभूमि के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।”

देश के प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में संघ का गौरवपूर्ण उल्लेख होना, यह पहला ही प्रसंग है। देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू संघ के घोर विरोधी थे। उनकी पुत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी वही परंपरा आगे बढ़ाई, और सोनिया गांधी परिवार भी उसी विरासत में जी रहा है। कौन किस विरासत में जीना चाहता है, यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ की विरासत में जीने वाले प्रधानमंत्री हैं। संघ का मंत्र है — “राष्ट्र प्रथम, अन्य सभी बातें बाद में।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण में ‘मां भारती’ जैसे शब्द बार-बार प्रयोग करते हैं। भारतमाता की कर्ममय भक्ति संघ की विचारधारा का आधार है।

इससे पहले भी स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी भी देश के प्रधानमंत्री थे। लाल किले से उनके भी भाषण हुए, लेकिन उन्होंने अपने भाषण में अकारण संघ का उल्लेख नहीं किया । महान राजनेता वही है जो सही समय पर सही बात कहे। संघ शताब्दी का वर्ष यही सही समय है और इस समय को पकड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ के बारे में कहा है। उन्होंने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के संघ मंत्र का उच्चारण किया।

संघ की शताब्दी का अर्थ क्या है? यह शताब्दी राष्ट्र जागरण की शताब्दी है। यह ‘स्व’ बोध जागरण की शताब्दी है। यह समरस समाज जीवन निर्माण की शताब्दी है। यह शताब्दी ‘स्व’ कर्तव्य जागरण की शताब्दी है। यह राष्ट्र को सामर्थ्यवान बनाने वाले त्यागमय परिश्रम की शताब्दी है। यह राष्ट्र को समृद्ध बनाने वाले महान यज्ञ की शताब्दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महान राष्ट्र के पुनर्निर्माण के संग्राम के महान सेनापति हैं। इसलिए उनका संघ विषयक वक्तव्य कोई औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि आचरण के मंत्र हैं — इसका यही अर्थ निकालना होगा। ऐसे महान नेता को अंतःकरणपूर्वक वंदन!

(अनुवादक हेमंत मुक्तिबोध)

सावरकर की महानता पर कांग्रेस का नया ड्रामा, बेचारे राहुल गांधी फंसे!

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दोस्तों, तैयार हो जाइए एक और तमाशे के लिए! वीर सावरकर, जिनका नाम एक समय भारतीय संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक सम्मान से लिया जाता था, आज कांग्रेस के कुछ “ज्ञानी” नेताओं और उनके पसंदीदा यूट्यूब कथावाचकों के निशाने पर हैं। लेकिन अरे भाई, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले ये “कुपढ़” (मुकेश कुमार, अजीत अंजुम, साक्षी जोशी, आरफा खानम, अभिसार शर्मा) आखिर कहां ले जा रहे हैं बेचारे राहुल गांधी को? इनके व्यूज और पैसों की भूख ने तो रिसर्च और पढ़ाई-लिखाई को कब का ताला लगा दिया। और परिणाम? सावरकर को गलत तरीके से पेश कर कांग्रेस का इतिहास बोध भी कहीं खो गया!

आइए, थोड़ा इतिहास की किताब खोलते हैं, जो इन यूट्यूब महारथियों ने शायद कभी नहीं पढ़ी। पुराने समय में, चाहे वो सर्वपल्ली राधाकृष्ण हों, जाकिर हुसैन हों, लाल बहादुर शास्त्री हों या इंदिरा गांधी, सभी ने सावरकर के शौर्य और देशभक्ति को सलाम किया। संसद की कार्यवाहियां और सरकारी दस्तावेज आज भी इसकी गवाही देते हैं। लेकिन आज की कांग्रेस? लगता है वोट बैंक की चिंता में इतिहास की किताबें फाड़ दी गईं!

अब बात करते हैं नेहरू जी और सावरकर के जेल जीवन की, जो इन कथावाचकों की पसंदीदा डिबेटिंग पॉइंट है। नेहरू जी अहमदनगर किले में रहे, जहां लाइब्रेरी, बागवानी (गुलाब के बाग की कहानी तो मशहूर है!), नौकर-रसोइया, प्राइवेट टॉयलेट और परिवार से मिलने की सुविधा थी। वहीं, सावरकर ने 11 साल काल कोठरी में गुजारे, जहां हालात जानवरों से भी बदतर थे। सश्रम कारावास में कैदियों को बैल की तरह नारियल तेल निकालने के लिए जोता जाता था। 90% कैदी मौत के मुंह में चले जाते थे। और निकलने के बाद भी 27 साल की नजरबंदी और जिलाबंदी!

यहां दी गई तस्वीर सावरकर की उस काल कोठरी की है-एक छोटा सा कमरा, जहां तकलीफों की कहानी दीवारों में समाई हुई है।

लेकिन आज के कांग्रेसियों को ये फर्क दिखाई नहीं देता। उनके ‘गाइडेड टूर’ वाले इतिहास में सावरकर को अपमानित करना ही मकसद बन गया है। राहुल गांधी, जो शायद इन यूट्यूब कथावाचकों के चक्कर में पड़ गए, को भी ये ‘इको सिस्टम’ गुमराह कर रहा है। अरे भाई राहुल, थोड़ा सा वक्त निकालो, किताबें पढ़ो, दस्तावेज देखो-सावरकर का सम्मान करने वालों में तुम्हारी दादी इंदिरा गांधी भी थीं!

इन यूट्यूब महाशयों को तो बस व्यूज चाहिए। रिसर्च? वो क्या होता है? सावरकर के बारे में गलत राय बनाकर वे कांग्रेस के ‘नए इतिहास’ को हवा दे रहे हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि कांग्रेस के अपने नेता भी कभी सावरकर को सम्मान देते थे। अब वोट बैंक की राजनीति ने सब बदल दिया।

तो कांग्रेसियों, जागो! इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने से पहले थोड़ा पढ़ाई-लिखाई कर लो। और राहुल भाई, इन कुपढ़ यूट्यूबर्स की सलाह छोड़ो, सावरकर की काल कोठरी जाकर देख आओ-शायद आंखें खुल जाएं! वरना ये “इको सिस्टम” तुम्हें भी उसी गड्ढे में धकेल देगा, जहां ये खुद पड़े हैं-ज्ञान के अंधेरे में!

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