कानूनी का भय नहीं, लापरवाही का आलम है आगरा के मोहल्लों, बस्तियों में बसा है भोपाल

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कुछ नहीं सीखा भोपाल गैस त्रासदी से हमने। हादसों और मानव निर्मित आपदाओं के कगार पर खड़ा है आगरा। भोपाल की दुखद विरासत का भूत हर दिन बड़ा हो रहा है, क्योंकि शहर का औद्योगिक परिदृश्य, सुरक्षा मानकों में ढिलाई और नियामक उदासीनता से पीड़ित है।

अतीत के भयावह सबक के बावजूद, आगरा के उद्योग व्यवसाय, बेखौफ होकर काम चल रहे हैं, सुरक्षा प्रोटोकॉल के प्रति उनकी उपेक्षा आपदा के लिए न्यौता है। फिर भी अधिकारी आंखें मूंद लेते हैं, मानव जीवन से ज्यादा प्रॉफिट को प्राथमिकता देते हैं।

जनता की सुरक्षा के लिए बनाई गई नियामक एजेंसियां ​​नौकरशाही की अक्षमता में फंसी हुई हैं। निरीक्षण अनियमित और सतही हैं, और प्रवर्तन ढीला है। इस प्रणालीगत विफलता ने उदासीनता की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जहां आपदा की संभावना आर्थिक विचारों से ढक जाती है।

1984 की भोपाल आपदा की भयावह याद के बावजूद, जहाँ हज़ारों लोगों ने अपनी जान गंवाई और अनगिनत अन्य लोग इसके बाद पीड़ित हुए, आगरा के निवासी औद्योगिक लापरवाही के बारूद के ढेर पर अनिश्चित रूप से बैठे हैं। अपर्याप्त सुरक्षा उपायों और लापरवाह प्रवर्तन का जहरीला कॉकटेल आपदा के लिए एक विस्फोटक सूत्र है। एक के बाद एक इलाके, घर और व्यवसाय खतरनाक सामग्रियों को संभालने वाली फ़ैक्टरियों के बहुत करीब स्थित हैं, फिर भी ये प्रतिष्ठान भय मुक्त होकर काम करते हैं, उनके सुरक्षा प्रोटोकॉल अक्सर नौकरशाही के रूप में सिर्फ़ चेकबॉक्स तक सीमित रह जाते हैं। निरीक्षण बहुत कम होते हैं, और जब होते हैं, तो अक्सर वास्तविक जवाबदेही के बजाय सतही अनुपालन होता है।

आपातकालीन प्रक्रियाएँ और लास्ट मिनिट सुरक्षा कवायदें सक्रिय नहीं, बल्कि औपचारिक होती हैं। आगरा द्वारा अपने समुदायों के आसपास निहित जोखिमों को नकारना न केवल इसके निवासियों की भलाई को खतरे में डालता है, बल्कि खोए हुए लोगों की यादों का सम्मान करने में एक गंभीर विफलता का संकेत भी देता है, ये कहते हैं लोक स्वर संस्था के अध्यक्ष राजीव गुप्ता।

पर्यावरणविद् देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि नागरिक अधिकारियों की उदासीनता के कारण, देश भर के शहरी क्षेत्रों में आपदाएँ घटित होने का इंतज़ार कर रही हैं। भोपाल गैस त्रासदी, दुनिया की सबसे खराब औद्योगिक आपदाओं में से एक है, जिसमें एक ही रात में 3,500 से अधिक लोग मारे गए और अनुमानतः 25,000 लोग अपंग हो गए। यह 3 दिसंबर, 1984 को घटित हुई थी।”

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बिल्डरों को बिना अनिवार्य जांच के अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए, जिससे लोगों की जान जोखिम में पड़ गई। उदाहरण के लिए, आगरा नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि कचरा और सीवरेज का निपटान कैसे किया जाता है। ताज नगरी में स्थिति भयावह है, क्योंकि बोरवेल के जरिए सीवेज को सीधे धरती में डाला जा रहा है। किसी भी दिन विस्फोट हो सकता है, क्योंकि मीथेन और अन्य हानिकारक गैसें बन रही हैं। शहर विस्फोटकों के बीच बसा हुआ है।

वास्तव में, हर इलाके में एक भोपाल है, अवैध गोदामों, कारखानों, कार्यशालाओं, जहरीली गैसों को छोड़ने वाली चोक सीवर लाइनों, कोल्ड स्टोरेज, स्टीम बॉयलर वाली तेल मिलों के रूप में। नियमित निगरानी और निरीक्षण का काम सौंपे गए सरकारी एजेंसियों ने कोई तत्परता या गंभीरता नहीं दिखाई, जिसका नतीजा यह हुआ कि आगरा में लगभग हर महीने किसी न किसी रिहायशी इलाके में आग लगने की घटना होती है।

लापरवाही का रवैया घर से ही शुरू हो जाता है, रसोई और बाथरूम से। गृहिणी पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि लोग न तो गैस सिलेंडर पाइपलाइनों के बारे में सावधान रहते हैं और न ही बिजली की फिटिंग के बारे में, जिसके कारण अक्सर शॉर्ट-सर्किटिंग होती है। उन्होंने कहा, “अक्सर अग्नि सुरक्षा इकाइयाँ या बुझाने वाले यंत्र काम नहीं करते हैं, और ऊँची इमारतों में लिफ्टों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर जाँच नहीं की जाती है।”

नियम पुस्तिकाओं का पालन न करने के कारण बहुत सी मौतें हुई हैं। कोल्ड स्टोरेज से गैस लीक, बॉयलर ब्लास्ट, बिना उपचार के सामुदायिक जल संसाधनों में खतरनाक अपशिष्टों का निर्वहन, गटर की सफाई में दुर्घटनाएँ आदि के कारण जान-माल का नुकसान हुआ है।

उनकी प्रत्येक भोपाल यात्रा में हुआ कार्य विस्तार

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा आरंभ हो गई है । लगातार हमलों के बीच भी यदि संघ का स्वरूप निरंतर विस्तृत हुआ है तो उसका आधार संघ की समयानुकूल व्यवहारिक कार्यशैली है। संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब जी देवरस भी संघ की कार्यशैली में ऐसे ही व्यवहारिक विस्तार देने के लिये जाने जाते हैं। उनकी प्रत्येक भोपाल यात्रा से संघ कार्यकर्ताओं को नया उत्साह आया ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी ।लेकिन नियमित शाखाएँ लगभग डेढ़ वर्ष बाद आरंभ हुईं। देवरसजी संघ की प्रारंभिक शाखा के स्वयंसेवक बने । तब उनकी आयु मात्र ग्यारह वर्ष थी । इस शाखा का शुभारंभ संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार जी ने स्वयं किया था । स्वयंसेवकों के इस प्रथम शाखा में बालासाहब के साथ केशवराव वकील, त्र्यंबक झिलेदार, अल्हाड़ अंबेडकर, बापू रावदिवाकर, नरहरि पारखी, बाली यशकुण्यवर,, माधवराव मुले और एकनाथ रानाडे भी थे । बाला साहब बचपन से बहुत कुशाग्र और तीक्ष्ण बुद्धि थे । विषय को सुनकर प्रस्तुतिकरण करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी । इसलिये वे इस टोली के स्वभाविक समन्वयक के रूप में उभरे । डाॅक्टर जी स्वयं इस शाखा के शिक्षक और संचालक थे। इसलिए बालासाहब सहित इस पूरी टोली की संघ शिक्षा डॉक्टर जी के माध्यम से ही हुई । देवरस जी के विषय प्रस्तुतिकरण में भी डॉक्टरजी की झलक साफ होती थी । समय के साथ संघ की संकल्पना, शिक्षा, और डाक्टरजी के मार्गदर्शन से बालासाहब देवरस जी इतने प्रभावित हुये कि संघ को माध्यम बनाकर अपना पूरा जीवन राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित कर दिया । देवरसजी ने संघ की स्थापना का उद्देश्य, कार्यशैली, सिद्धांत और व्यहवार सब डॉक्टर जी से ही समझा था । इसलिये देवरस जी के व्यवहार और प्रबोधन में डॉक्टरजी झलक सदैव मिलती थी । देवरसजी द्वारा प्रस्तुत विषयों में गहराई और व्यापकता कुछ ऐसी होती थी कि श्रोता वर्ग में संघ के स्वयं सेवक हों अथवा समाज के प्रबुद्ध जन, सभी एकाग्र होकर सुनते थे। देवरसजी एक प्रचारक से लेकर सरसंघचालक तक लगभग सभी दायित्वों पर रहे । और भारत के हर क्षेत्र की यात्रा की । उन्होंने 6 जून 1973 को सरसंघचालक के रूप में संघ प्रमुख का दायित्व संभाला था । 5 जून1973 को संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य ‘गुरुजी’ का निधन हुआ। देवरसजी तब आंध्रप्रदेश के प्रवास पर थे । तब उनके पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह का दायित्व था । उन्हें प.पू. गुरुजी के निधन सूचना मिली वे नागपुर पहुँचे। और गुरुजी की अंतिम इच्छा के अनुरूप देवरस जी ने “सरसंघचालक” का दायित्व संभाला। संघ की परंपरानुसार प.पू. गुरूजी संसार से विदा होने से पहले एक पत्र लिखकर देवरसजी को अपना उत्तराधिकार सौंप गये थे। वे लगभग दो दशक तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे । जब उन्होंने सरसंघचालक का पदभार संभाला तब उनकी आयु 58 वर्ष थी । मधुमेह रोग ने भी उन्हें प्रभावित कर लिया था । फिर भीषअपने शरीर और स्वास्थ्य की बिना परवाह किये उन्होंने देश व्यापी यात्रा की । उन्हीं दिनों भारत में मँहगाई विरोधी आँदोलन तेज हुआ । यह आँदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हो रहा था । लेकिन व्यक्तिगत तौर हर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता सहभागी हो रहे थे । आपातकाल के पूर्व के इन लगभग दो वर्षों में उन्होंने देशभर की व्यापक यात्रा की और समाज एवं राष्ट्रहित केलिये एकजुट होने का आव्हान किया । उनकी इन यात्राओं से समाज में संघ को लेकर वे भ्रांत धारणाएँ स्पष्ट होने लगी जो कतिपय संघ विरोधी शक्तियों ने फैला रखीं थीं। उनकी इन यात्राओं से एक ओर जहाँ संघ कार्यकर्ताओं में उत्साह आया वहीं समाज में विस्तार भी हुआ । संघ कार्यकर्ताओं का यह उत्साह मंहगाई विरोधी आँदोलन की ओर मुड़ गया । इस तथ्य से सरकार भी अवगत हो गई थी । आपातकाल लगने से पहले देवरस जी को आभास हो गया था कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी कोई कड़ा निर्णय ले सकतीं हैं। उन्होंने अपने आकलन से संघ के प्रमुख अधिकारियों को सावधान कर दिया था । यह देवरस जी की दूरदृष्टि थी की आपातकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगने और देशभर में लगभग एक लाख स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी के बाद भी संघ की सक्रियता बनी रही और आपातकाल हटने के तुरन्त बाद से संघ पुनः अपनी गति से काम करने लगा ।

कुछ परंपराओं को व्यवहारिक बनाया

बालासाहब देवरस जी ने संघ की कुछ परंपराओं को समयानुकूल व्यवहारिक बनाया । इसमें सबसे पहले था “परम पूज्यनीय” संबोधन । जब उन्हें “परम पूजनीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस” संबोधित किया गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि “परम् पूज्यनीय” संबोधन “सरसंघचालक” दायित्व के लिये हो व्यक्ति के लिये नहीं।

बालासाहेब देवरस ने बौद्धिक परंपरा को उभय पक्षीय बनाया । उन्होंने विभिन्न स्तरों पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया । उनका मानना था कि यदि स्वयंसेवकों के मन में कोई प्रश्न उठ रहा है तो इसका समाधान होना चाहिए। इसलिये बौद्धिक समागम में शंका समाधान के लिये भी समय रहे ।

संघ में सरसंघचालक का दायित्व सौंपने की एक परंपरा थी । वर्तमान सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी का चयन करके एक पत्र लिखकर रख देते थे । जो उनके निधन के बाद खोला जाता था । डाॅक्टर जी के निधन के बाद उनका पत्र पढ़ा गया उसके अनुसार ही “गोलवलकर जी उपाख्य गुरुजी” को दायित्व सौंपा गया । और “गुरूजी” के पत्र के बाद यह दायित्व बालासाहब देवरस जी को मिला । लेकिन देवरस जी ने इस परंपरा में एक परिवर्तन किया । उन्होंने अपने जीवन काल में सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया था । और रज्जू भैया ने भी इस परम्परा का पालन किया और अपने जीवनकाल में ही यह दायित्व सुदर्शन जी को सौंप दिया था । और सुदर्शन जी ने अपने जीवन काल में ही यह दायित्व वर्तमान सरसंघचालक डा मोहन भागवत जी सौंप दिया था ।

कुछ प्रमुख भोपाल यात्राएँ

अपनी देश व्यापी यात्राओं के क्रम में वे अनेक बार भोपाल आये । सरसंघचालक के रूप में भी और इससे पहले सरकार्यवाह एवं सहसरकार्यवाह के रूप में भी । उनके कुछ प्रमुख कार्यक्रमों एक आयोजन सरस्वती शिशु मंदिरों के विद्यार्थियों का समागम था । यह आयोजन तात्या टोपे नगर भोपाल के स्टेडियम में हुआ था । इसमें लगभग चार से अधिक बच्चे थे । नगर प्रबुद्ध जनों की संख्या भी बहुत अधिक थे । देवरसजी ने हिन्दुत्व और सामाजिक स्वरूप की व्याख्या की थी । उनके संबोधन में दो धाराएँ बहुत स्पष्ट थीं। उनका एक आव्हान बच्चों से था । देवरसजी आधुनिकता के समर्थक थे लेकिन अपने मूल एवं आत्म गौरव के साथ । उन्होंने उभरती पीढ़ी से सैद्धांतिक अडिगता के साथ समय के अनुरूप व्यवहारिक होने का संदेश दिया जबकि समाज के वरिष्ठ और प्रबुद्ध जनों से भ्रांत धारणाओं से मुक्त होकर आगामी पीढ़ी को समाज के मूल स्वरूप से परिचित कराने का आव्हान किया । हिन्दुत्व की व्याख्या में उनके उदाहरण इतने प्रभावशाली थे कि वे भोपाल के प्रबुद्ध जनों में विमर्श के विन्दु बने । उनकी एक अन्य भोपाल यात्रा वर्तमान भारत माता चौराहे के समीप भदभदा रोड पर भारतीय मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद भवन के भूमि पूजन में आये । इस आयोजन में भी इन दोनों संस्थाओं से सम्बद्ध कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त प्रबुद्ध जन भी आमंत्रित किये गये थे । सतह दृष्टि से देंखे तो मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद दो अलग धाराएँ हैं पर देवरस जी का संबोधन दोनों संस्थाओं के लिये प्रेरक रहा । वे अपनी एक यात्रा में उन्होंने पत्रकारों से पृथक से भी भेंट की थी । यद्यपि उनके सार्वजनिक आयोजनों में प्रबुद्ध जनों के साथ पत्रकार भी होते थे । कुछ पत्रकारों ने उनके साथ भोजन भी किया है । उनका तर्कशील प्रबोधन और विषय का प्रस्तुतिकरण सदैव प्रभावी रहता ।

संक्षिप्त जीवन परिचय

बालासाहब देवरस जी का पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था लेकिन उन्हें बालासाहेब देवरस के नाम से जाना जाता है । उन्हें मध्यप्रदेश से बहुत लगाव था । परिवार यद्यपि आन्ध्रप्रदेश का मूल निवासी था । लेकिन पिता दत्तात्रेय जी शासकीय सेवा के चलते मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में रहे । बालासाहब का जन्म बालाघाट जिले के करंजा नामक स्थान पर अगहन् शुक्ल पक्ष की पंचमी संवत् 1971 को हुआ । अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार उनकी जन्मतिथि 11 दिसम्बर 1915 थी । इस वर्ष यह पंचमी तिथि 6 दिसम्बर को पड़ रही है । पिता दत्तात्रेय कृष्णराव देवरस और माता पार्वती बाई दोनों भारतीय परंपराओं और मान्यताओं के लिये समर्पित थे । उनके जन्म के साथ ही पिता का स्थानान्तर हुआ और परिवार नागपुर आ गया । बालासाहेब की शिक्षा नागपुर के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में हुई थी। उन्होंने 1931 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। नागपुर महाविद्यालय से वकालत पास की ।
वे बाल स्वयंसेवक थे । पढ़ाई पूरी करके संघ के प्रचारक बने । प्रचारक के रूप में संघ कार्य विस्तार केलिये उन्हे पहला दायित्व बंगाल का मिला ।1946 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के का सहसरकार्यवाह और 1965 सरकार्यवाह बने। 6 जून, 1973 को संघ के सरसंघचालक बने । उनके दायित्व संभालने के दो साल बाद ही देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू हो गया 30 जून को देवरसजी गिरफ्तार कर लिये गये । उन्हें यरवदा जेल में रखा गया। 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा जो 1977 तक जारी रहा। 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और देवरसजी सहित संघ के अन्य कार्यकर्त्ता रिहा हो सके । आपातकाल के दौरान देवरस जी 20 महीनों से भी अधिक समय तक जेल में रहे।
सरसंघचालक के रूप में उनके कार्यकाल में संघ पर दूसरी बार प्रतिबंध 1992 में लगा । तब अयोध्या में विवादास्पद बाबरी ढांचा ढहने के बाद 10 दिसंबर 1992 को नरसिम्हा राव सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया था जो छै माह तक लगा रहा था । बालासाहेब 1994 तक सरसंघचालक रहे । स्वास्थ्य की गिरावट के कारण उन्होंने पद छोड़ दिया और प्रो. राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया को संघ का सरसंघचालक नियुक्त कर दिया था । 17 जून 1996 को देवरस जी ने देह त्यागकर संसार से विदा ले ली ।

अमेरिका में होने वाले सत्ता परिवर्तन का भारत पर सम्भावित असर

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दिनांक 20 जनवरी 2025 को अमेरिका में श्री डॉनल्ड ट्रम्प राष्ट्रपति के रूप में दूसरी बार कार्यभार सम्हालने जा रहे हैं। ट्रम्प प्रशासन ने अपने पहिले कार्यकाल में अमेरिका के रिश्तों को भारत के साथ मजबूत करने का प्रयास किया था। परंतु, नवम्बर 2024 में सम्पन्न हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान श्री ट्रम्प लगातार यह आभास देते रहे हैं कि वे अमेरिका को एक बार पुनः विनिर्माण इकाईयों का हब बनाने का प्रयास करेंगे और इसके लिए अन्य देशों विशेष रूप से चीन से आने वाले सस्ते उत्पादों पर 60 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगा सकते हैं, जिससे चीन से आयातित उत्पाद अमेरिका में महंगे हों जाएंगे एवं विनिर्माण इकाईयां अमेरिका में ही इन वस्तुओं का उत्पादन प्रारम्भ करेंगी। दूसरे, अमेरिका में आज भारी मात्रा में अन्य देशों से अप्रवासी नागरिक गैर कानूनी रूप से रह रहे हैं, विशेष रूप से अमेरिका के पड़ौसी देश मैक्सिको के नागरिक आसानी से सीमा पार कर अमेरिका में पहुंच जाते हैं, अतः गैर कानूनी रूप से अमेरिका में रह रहे नागरिकों को अमेरिका से बाहर भेजेंगे। उक्त दो विषयों को श्री ट्रम्प ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान जोर शोर से उठाया था। अमेरिका को एक बार पुनः महान बनाने की बात भी जोर शोर से कही गई थी।

यदि ट्रम्प प्रशासन अमेरिका में आयात कर को बढ़ा देता हैं तो इसका प्रभाव भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले उत्पादों पर भी पड़े बिना नहीं रह सकेगा। हालांकि अमेरिका में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि अमेरिका में श्रम की लागत बहुत अधिक है। अमेरिका में निर्मित उत्पादों की लागत तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक रहने वाली है, इसके कारण एवं अमेरिका में आयातित उत्पादों पर आयात शुल्क के बढ़ाने से अमेरिका में मुद्रा स्फीति की समस्या भी पुनः खड़ी हो सकती है। दूसरे, अमेरिका यदि आयात को प्रतिबंधित करता है तो अमेरिकी डॉलर की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में और अधिक मजबूत होगी एवं अन्य देशों की मुद्राओं की बाजार कीमत गिरेगी जिससे इन देशों में उत्पादित वस्तुओं के निर्यात और अधिक आकर्षक होने लगेंगे। बल्कि इससे तो भारत से टेक्स्टायल, लेदर, विनिर्माण एवं कृषि क्षेत्र से उत्पादों के निर्यात अमेरिका को बढ़ेंगे। अमेरिका से निर्यात कम होने लगेंगे क्योंकि अन्य देशों को अमेरिका से आयातित वस्तुओं के एवज में महंगे डॉलर का भुगतान करना होगा। परंतु, ट्रम्प प्रशासन ने तो आगे आने वाले समय का आभास अभी से देना शुरू पर दिया है और मेक्सिको और कनाडा से आयातित वस्तुओं पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत का आयात शुल्क एवं चीन से आयातित वस्तुओं पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की घोषणा कर दी है। हालांकि अभी भारत से आयातित वस्तुओं पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की घोषणा अभी नहीं की गई है।

यदि ट्रम्प प्रशासन आगे आने वाले समय में चीन से आयातित उत्पादों पर इतना भारी भरकम आयात शुल्क लागू करता है तो इससे भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिका में जगह बन सकती है और विशेष रूप से ऑटो पार्ट्स, सौर ऊर्जा उपकरण एवं रासायनिक उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भारतीय विनिर्माण इकाईयां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती हैं। इसी प्रकार, यदि अमेरिकी प्रशासन द्वारा चीन से आयातित वस्तुओं पर भारी मात्रा में आयात शुल्क लगाया जाता है तो चीन के निर्यात कम होंगे और इससे चीन में आर्थिक वृद्धि दर कम होगी और ऊर्जा उत्पादों (कच्चे तेल, पेट्रोल, डीजल, गैस, आदि) की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम होगी, जिससे कच्चे तेल की कीमतें भी कम होंगी, इसका सीधा सीधा लाभ भारत को हो सकता है, क्योंकि भारत विश्व में कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है। साथ ही, श्री ट्रम्प ने अमेरिका में भी कच्चे तेल के उत्पादन को आगे आने वाले समय में बढ़ाने की घोषणा की है और तुलनात्मक रूप से कुछ सस्ते दामों पर कच्चे तेल का निर्यात भारत को किया जा सकता है। विनिर्माण एवं सुरक्षा (डिफेन्स) के क्षेत्र में भी भारतीय कम्पनियों को लाभ हो सकता है। ट्रम्प प्रशासन ने ट्रम्प के प्रथम कार्यकाल में भारत के साथ कई बड़े रक्षा सौदे सम्पन्न किए थे। अमेरिकी सैन्य क्षमताओं को और अधिक मजबूत करने के लिए, अमेरिका भारत से सुरक्षा क्षेत्र के उत्पादों का आयात आगे आने वाले समय में बढ़ा सकता है।

यदि ट्रम्प प्रसाशन आयात करों में अतुलनीय वृद्धि करता है तो इससे अमेरिका में मुद्रा स्फीति की समस्या एक बार पुनः खड़ी हो सकती है जिससे सम्भव है कि बढ़ी हुई मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए फेडरल रिजर्व एक बार पुनः फेड रेट (ब्याज दरों) में वृद्धि करे। जिसका असर विश्व की अन्य अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ेगा। अमेरिका का वित्तीय बजट घाटा भारी मात्रा में ऋणात्मक है एवं अमेरिका के ऊपर 36 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की ऋण देयताएं हैं। अतः अमेरिकी प्रशासन का सोचना है कि प्रतिवर्ष 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के खर्च को कम करने हेतु प्रयास करने होंगे। यदि यह वास्तव में होता है तो अमेरिका में सरकारी कर्मचारियों की बड़ी संख्या में कमी की जा सकती है। अमेरिकी सरकार के खर्चे यदि कम होते हैं तो इससे देश के आर्थिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। टैक्स कटौती एवं राजकोषीय उपायों के चलते अमेरिकी डॉलर मजबूत हो सकता है एवं इससे अमेरिकी बांड यील्ड बढ़ सकती हैं। भारत पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। रुपया अमेरिकी डॉलर की तुलना में कमजोर होगा और भारत में आयात किए जाने वाले उत्पादों विशेष रूप से कच्चे तेल की लागत बढ़ जाएगी और इससे अंततः भारत में भी महंगाई बढ़ सकती है।

ट्रम्प प्रशासन ने अपने पहिले कार्यकाल में भी भारत के खिलाफ कुछ आर्थिक कदम उठाए थे जैसे भारत को जनरलाइज्ड सिस्टम आफ प्रेफ्रेन्सेज (जीएसपी) से हटा दिया था। लेकिन अंततोगत्वा भारत पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं हुआ था। वर्ष 2018 में अमेरिका ने स्टील पर 25 प्रतिशत, अल्यूमिनियम पर 10 प्रतिशत, वशिंग मशीन पर 35 प्रतिशत का उत्पाद शुल्क लगाया था परंतु वर्ष 2019 से वर्ष 2021 के बीच अमेरिका को भारत का स्टील निर्यात 44 प्रतिशत बढ़ गया था। इसी प्रकार, फूटवीयर, मिनरल्स, रसायन, इलेक्ट्रिकल व मशीनरी जैसे उत्पादों का निर्यात भी भारत से अमेरिका को बढ़ा है, इससे सिद्ध होता है कि भारत कई उत्पादों के मामले में चीन के मुकाबले वैश्विक सप्लाई चैन में होने वाले बदलाव का अधिक लाभ उठाने की स्थिति में हैं। फिर भी, भारत को अपने विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार करना होगा। भारत को नए निर्यात बाजार को तलाशना होगा एवं आयात कम करने के लिया आत्म निर्भरता प्राप्त करने की ओर और अधिक मजबूती से आगे बढ़ना होगा। ट्रम्प प्रशासन यदि चीन के विरुद्ध कारोबारी युद्ध को प्रारम्भ करते है, जिसकी कि प्रबल सम्भावना दिखाई देती है, तो इसका लाभ भारत को मिल सकता है। फार्मा, टेक्स्टाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में सप्लाई चैन में होने बदलावों के देखते हुए, भारत लाभ की स्थिति में रह सकता है।

श्री ट्रम्प, अमेरिका में आय कर एवं कारपोरेट कर में कमी की घोषणा भी कर सकते हैं। इससे अमेरिका के नागरिकों के हाथों में अधिक पैसा आएगा एवं कारपोरेट जगत के लाभ में वृद्धि होगी जिससे अंततः उत्पादों की मांग में वृद्धि होगी। ट्रम्प प्रशासन की व्यापार अनुकूल नीतियों के चलते अमेरिकी शेयर बाजार में तेजी आ सकती है।

श्री ट्रम्प ने रूस – यूक्रेन युद्ध एवं हम्मास, लेबनान – इजराईल के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए भी प्रयास किए जाने के बारे में कहा है। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक स्तर पर सप्लाई चैन में सुधार हो सकता है एवं भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मदद मिल सकती है। लेबनान – इजराईल के बीच तो युद्ध विराम की घोषणा हो भी चुकी है।

ट्रम्प प्रशासन के प्रथम कार्यकाल में अमेरिका में वीजा के नियमों को कठिन बना दिया गया था। यदि अपने दूसरे कार्यकाल में भी एच-1बी वीजा के नियमों को कड़ा किया जाता है तो इसका सबसे अधिक प्रभाव भारतीय मूल के नागरिकों पर पड़ेगा। क्योंकि, अमेरिका में प्रतिवर्ष लगभग 85,000 एच-1बी वीजा जारी किए जाते हैं एवं इसमें से लगभग 60,000 वीजा भारतीय मूल के नागरिकों को जारी होते हैं। भारतीय मूल के नागरिकों पर वीजा सम्बंधी नियमों के कड़े किए जाने का प्रभाव सबसे अधिक हो सकता है। इससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कम्पनियों पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।

भारत की तुलना में अमेरिका के पास 3.5 गुणा अधिक जमीन है, जबकि जनसंख्या, भारत की तुलना में एक चौथाई ही है। अमेरिका के पास 95,000 किलोमीटर लम्बी समुद्री तट रेखा उपलब्ध है, अमेरिका के पास पूरे विश्व का 45 प्रतिशत पानी उपलब्ध है, पूरे विश्व के कोयला भंडारण का 22 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका के पास है, पूरे विश्व की जमीन का 6 प्रतिशत भाग अमेरिका में है, पूरे विश्व की कृषि योग्य भूमि का 10 प्रतिशत भाग अमेरिका के पास है जबकि विश्व की केवल 4 प्रतिशत जनसंख्या ही अमेरिका में निवास करती है। अमेरिका के पास 25,600 करोड़ बैरल कच्चे तेल के भंडार हैं जो सऊदी अरब में कच्चे तेल के कुल भंडारण से भी 20 प्रतिशत अधिक है। अब ट्रम्प प्रशासन कच्चे तेल के इस भंडार में से अधिक मात्रा में कच्चा तेल निकालकर उपयोग करना शुरू करेगा। वर्ष 2018 तक अमेरिका कच्चे तेल का आयात ही करता रहा है जबकि इसके बाद से अमेरिका कच्चे तेल का निर्यात भी करने लगा है। इसके चलते ही अमेरिका को पूरे विश्व में विशेष राष्ट्र का दर्जा प्राप्त है। ट्रम्प प्रशासन भारत को अपना स्ट्रेटेजिक भागीदार मानता रहा है। अमेरिका से विशेष दोस्ती होने के चलते आगे आने वाले समय में भारत को विशेष रूप से आर्थिक क्षेत्र में विशेष लाभ होने की सम्भावना दिखाई देती है।

अलीपुर षड्यंत्र में जेल : हजारों युवाओं को देशभक्त बनाया

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स्वतंत्रता आँदोलन में जितनी महत्वपूर्ण भूमिका राजनेताओं की रही है उससे कयी गुना अधिक योगदान उन संतों का है जो सीधा संघर्ष करके जेल भी गये और अपनी आत्मशक्ति से पूरी पीढ़ी को जाग्रत करके स्वाधीनता संग्राम के लिये प्रेरित किया । महर्षि अरविंद ऐसे ही महान सेनानी थे जो जेल भी गये और स्वतंत्रता संघर्ष के लिये युवाओं को तैयार भी किया ।

महर्षि अरविंद का वास्तविक नाम अरविंद घोष था उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था । पिता डॉक्टर कृष्ण धन घोष एक प्रतिष्ठित चिकित्सक और प्रभावशाली व्यक्ति थे लेकिन पूरी तरह पश्चिमी जीवन शैली में रचे बसे थे जबकि माता स्वर्णलता देवी भारतीय परंपराओं और आध्यात्मिक धारा के प्रति समर्पित स्वभाव की थीं। घर में दोनों प्रकार का वातावरण था ।कृष्णधन जी भले पश्चिमी शैली के समर्थक थे पर पत्नि की सेवा पूजा और आध्यात्मिक परंपरा पालन में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे । इस मिले जुले वातावरण में बालक अरविंद ने आँख खोली ।उनके मन मस्तिष्क पर दोनों प्रभाव थे। भारतीय विशेषताओं के भी और पश्चिमी प्रगति यात्रा के भी । पिता ने पाँच वर्ष की आयु में दार्जिलिंग के अंग्रेज़ी स्कूल में और दो वर्ष बाद आगे की पढ़ाई के लिये लंदन भेजा । अरविंद जब पढ़ने लंदन जा रहे थे तब माँ ने भारतीय संस्कृति और दर्शन से संबंधित कुछ पुस्तकें उनके साथ रख दीं । अरविन्द अपनी पढ़ाई के साथ समय निकालकर माँ के द्वारा दीं गई पुस्तकों को पढ़ते ।

इंग्लैड में उनके रहने की व्यवस्था एक अंग्रेज परिवार में की गई थी । इस तरह उन्हें भारतीय दर्शन एवं संस्कृति के साथ यूरोपीय जीवनशैली का भी परिचय मिला । इसीलिये उनके जीवन में इन दोनों साँस्कृतिक धाराओं का समन्वय देखने को मिलता है । पढ़ाई के दौरान ही लंदन में उनका परिचय बड़ौदा नरेश से हुआ । बड़ौदा नरेश युवा अरबिंद घोष से प्रभावित हुए और अपना निजी सचिव बनने प्रस्ताव रखा । जिसे अरविन्द घोष ने स्वीकार कर लिया । 1892 में पढ़ाई पूरी करके बड़ौदा आये । कुछ समय नरेश के निजी सचिव का कार्य किया फिर राजा की सहमति से बड़ौदा कॉलेज में प्रोफेसर और फिर वाइस प्रिंसीपल बने। इसके साथ ही भारतीय संस्कृति और पुरातन साहित्य का अध्ययन भी निरंतर रहा । वे 1896 से 1905 तक बड़ौदा में विभिन्न दायित्वों पर रहे । बड़ौदा में रहते हुये ही बंगाल के क्राँतिकारियों से उनका संपर्क बन गया था । उनके बड़े भाई बारिन घोष सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी थे और अनुशीलन समिति में सक्रिय थे । उनके माध्यम से अरविंद भी 1902 में अनुशीलन समिति से जुड़ गये थे ।

इसीलिए अरविन्द जी बड़ौदा के महाविद्यालय में रहते हुये युवाओं को पश्चमी शिक्षा का अध्ययन तो कराते लेकिन व्यक्तित्व निर्माण केलिये स्वशिक्षा और स्वसंस्कृति पर गर्व करने का संदेश दिया करते थे । उनके द्वारा दी गई संस्कार और देशभक्ति की शिक्षा ने छात्रों में राष्ट्र भक्ति की ऐसी ज्योति जगाई थी कि उनमें से अधिकांश युवा आगे चलकर स्वतंत्रता आँदोलन में सहभागी बने । अरविन्द जी अपनी धुन में काम कर रहे थे कि 1905 में अंग्रेजों द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा हुई। इसका विरोध हुआ । अरविन्द जी बड़ौदा की नौकरी छोड़कर कलकत्ता आ गये और आँदोलन से जुड़ गये । गिरफ्तार हुये और जेल भेज दिये गये ।

रिहाई के बाद पुनः पीढ़ी निर्माण में लग गये । साथ ही अपने जीवन यापन केलिये कलकत्ता नेशनल लाॅ कॉलेज में अध्यापन कार्य करने लगे। इससे उनके दोनों काम हो रहे थे । जीवन यापन का साधन भी और युवाओं में स्वत्व एवं स्वाभिमान का जागरण भी । उन्होंने एक साधारण मकान में रहकर साधा जीवन जीने का निर्णय लिया । केवल धोती कुर्ता पहनते, स्वदेशी आँदोलन भी आरंभ किया । जन जाग्रति के लिये बंगला भाषा में पत्रिका “बन्दे मातरम्” का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

भारत की स्वतंत्रता के लिये बंगाल में दोनों प्रकार के प्रयास हो रहे थे । सामाजिक जागरण का भी और क्राँतिकारी आँदोलन का भी । तभी 1908 में अलीपुर बम विस्फोट हुआ । अंग्रेज सरकार को बहाना मिला और 37 बंगाली युवकों को आरोपी बनाया गया । इसमें अरविन्द घोष और उनके बड़े भाई बारिन घोष भी 2 मई 1908 को बंदी बनाये गये । सभी बंदी जेल भेज दिये गये । अलीपुर में अरविंद घोष और बारिन घोष के पिता कृष्णधन घोष का एक गार्डन हाउस था जो सशस्त्र क्रांति की योजना बनाने की गतिविधियों का केन्द्र बन गया था । वहाँ हथियार जमा किये जाते और बम भी बनाये जाते थे । लेकिन दिखावे के लिये भजन कीर्तन के चलता था ताकि किसी को कोई संदेह न हो। बम बनाते समय एक दिन विस्फोट हो गया जिसमें एक युवक की मृत्यु हो गई। पुलिस ने पूरा इलाका घेरा और सभी संबंधित युवकों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया । इस काँड में अरविन्द जी को एक साल जेल की सजा हुई । वे 6 मई 1909 को रिहा हुये । अलीपुर जेल जीवन का यह एकवर्ष उनके जीवन को बदल गया। वे स्वधीनता संघर्ष के राही तो रहे पर मार्ग पूरी तरह बदलकर । जेल की कोठरी में उनका समय अध्ययन और साधना में बीता था । पढ़ाई के दौरान लंदन की जीवन शैली और बाद में भारतीय जीवन दोनों तस्वीर उनके सामने थी । विशेषताएँ भी और वर्जनाएँ भी । कारण भी और विसंगति भी । उन्होंने कारणों के निवारण के लिये भारतीय समाज जीवन में आत्मिक शक्ति को जगाने का संकल्प किया । और इसके लिये आध्यात्म और शिक्षा का मार्ग चुना । इसकी झलक 30 मई 1909 को उत्तरपाड़ा की उस आमसभा में मिलती है जो रिहाई के बाद अरविन्द जी के सम्मान में आयोजित की गई थी । इस सभा में अरविन्द जी ने जेल के कुछ संस्मरण तो सुनाये पर उनका अधिकांश संबोधन आध्यात्मिक शक्ति को जगाकर संकल्पवान बनने का था ।

संघर्ष और दर्शन के लिये उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का जीवन और गीता का संदेश अद्भुत लगा । उन्होंने यही मार्ग अपनाया । जेल से रिहा तो पर उनपर निगरानी थी वे अपना वेष बदलकर गुप्त रूप से पांडिचेरी चले गए। पांडिचेरी अंग्रेजों के अधिकार में नहीं। वहाँ फ्रांसीसी शासन था । पांडिचेरी जाकर अरविंद जी योग साधना केन्द्र आरंभ किया । और योग से आरोग्य एवं संकल्पशक्ति जागरण के वैज्ञानिक तर्क देकर युवा पीढ़ी को भी आकर्षित किया । इससे उनकी और उनके आश्रम की ख्याति बढ़ी । आगे चलकर उन्होंने वेद को भी जोड़ा और वेदों के वैज्ञानिक पक्ष को समाज के सामने प्रस्तुत किया । वेद से जुड़ते ही उनकी ख्याति महर्षि अरविंद के रूप में हुई । उनका उद्देश्य समाज जीवन में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की जाग्रति उत्पन्न कर एक स्वाभिमान सम्पन्न समाज का निर्माण करना था । और उन्होंने इसी उद्देश्य पूर्ति के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया ।

महर्षि अरविंद एक महान योगी और दार्शनिक थे। उनके दर्शन का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा। भारतीयों के साथ विदेशी नागरिक भी उनके शिष्य बने और भारतीय संस्कृति से जुड़े । उन्होंने वेद उपनिषद और गीता पर टीका लिखी । भारतीय स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आध्यात्मिक साधना का मंत्र देने वाले इस महान योगी ने 5 दिसंबर 1950 को अपने जीवन की अंतिम श्वाँस ली । 4 दिन तक उनके शिष्यों खे दर्शन के लिये दिव्य रखी गई और 9 दिसंबर को उन्हें आश्रम में समाधि दी गई।

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