वर्तमान वैश्विक पटल पर भारत के लिए आपदा में अवसर हैं

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भोपाल। अमेरिका ने अन्य देशों से अमेरिका में होने वाली आयातित उत्पादों पर भारी भरकम टैरिफ लगाकर विश्व के लगभग समस्त देशों के विरुद्द एक तरह से व्यापार युद्ध छेड़ दिया है। इससे यह आभास हो रहा है आगे आने वाले समय में विभिन्न देशों के बीच सापेक्ष युद्ध न होकर व्यापार युद्ध होने लगेगा। चीन से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर तो अमेरिका ने 145 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है। एक तरह से अमेरिका की ओर से चीन को यह खुली चुनौती है कि अब अपने उत्पादों को अमेरिका में निर्यात कर के बताए। 145 प्रतिशत के आयात कर पर कौन सा देश अमेरिका को अपने उत्पादों का निर्यात कर पाएगा, यह लगभग असम्भव है। इससे चीन की अर्थव्यस्था छिन्न भिन्न हो सकती है, यदि चीन, अमेरिका के स्थान पर विश्व के अन्य देशों को अपने उत्पादों का निर्यात नहीं बढ़ा पाया। बगैर प्रत्यक्ष युद्ध किए, अमेरिका ने चीन पर एक तरह से विजय ही प्राप्त कर ली है और चीन की अर्थव्यवस्था को भारी नुक्सान करने के रास्ते खोल दिए हैं, हालांकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। परंतु, ट्रम्प प्रशासन ने विश्व के 75 देशों पर लागू किए गए टैरिफ को 90 दिनों के लिए स्थगित कर दिया है। इससे अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर अन्यथा होने वाले विपरीत प्रभाव को बहुत बड़ी हद्द तक कम कर लिए गया है। अमेरिका संभवत चाहता है कि आर्थिक मोर्चे पर चीन पर इतना दबाव बढ़ाया जाए कि चीन की जनता चीन के वर्तमान सत्ताधरियों के विरुद्ध उठ खड़ी हो और चीन एक तरह से टूट जाए। अमेरिका ने लगभग इसी प्रकार का दबाव बनाकर सोवियत रूस को भी तोड़ दिया था।

कुल मिलाकर पूरे विश्व में विभिन्न देशों के बीच अब नए समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं। यूरोपीयन यूनियन के समस्त सदस्य देश आपस में मिलकर अब अपनी सुरक्षा स्वयं करना चाहते हैं। अभी तक ये देश अमेरिका के सखा देश होने के चलते अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर रहते थे। परंतु, वैश्विक स्तर पर बदली हुई परिस्थितियों के बीच इन देशों का अमेरिका पर विश्वास कम हुआ है एवं यह देश आपस में मिलकर अपनी स्वयं की सुरक्षा व्यवस्था खड़ी करना चाहते हैं। आगे आने वाले समय में यूरोपीयन यूनियन के समस्त देश अपने सुरक्षा बजट में भारी भरकम वृद्धि कर सकते हैं। यहां, भारत के लिए अवसर निर्मित हो सकते हैं क्योंकि भारत में हाल ही के समय में सुरक्षा के क्षेत्र में उत्पादों की नई एवं भारी मात्रा में उत्पादन क्षमता निर्मित हुई है। भारत आज सुरक्षा के क्षेत्र में तेजी से न केवल आत्म निर्भर हो रहा है बल्कि भारी मात्रा में उत्पादों का निर्यात भी करने लगा है। आज सिंगापुर जैसे विकसित देश भी भारत से सुरक्षा उत्पाद खरीदने हेतु करार करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। यदि यूरोपीयन देशों के साथ भारत की पटरी ठीक बैठ जाती है तो सुरक्षा के क्षेत्र में भारत के लिए अपार सम्भावनाएं मौजूद है। भारत, यूरोपीयन देशों के साथ सामूहिक तौर पर द्विपक्षीय व्यापार समझौता करने के प्रयास भी कर रहा है।

इसी प्रकार, आगे आने वाले समय में यदि चीन के निर्यात अमेरिका को कम होते हैं तो चीन से विनिर्माण इकाईयों का पलायन तेजी से प्रारम्भ होगा। संभवत इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र, टेक्स्टायल क्षेत्र, फार्मा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र, प्रेशस मेटल के क्षेत्र में भारत के लिए अपार सम्भावनाएं बनती हुई दिखाई दे रही है, क्योंकि, उक्त समस्त क्षेत्रों से चीन, अमेरिका को भारी मात्रा में निर्यात करता है। अब 145 प्रतिशत के टैरिफ की दर पर चीन में निर्मित उत्पाद अमेरिका में नहीं बिक पाएंगे। अतः भारत के लिए इन समस्त क्षेत्रों में अपार सम्भावनाएं बनती हुई दिखाई दे रही हैं। टेक्स्टायल के क्षेत्र में तो वर्तमान में भारत के पास बहुत भारी मात्रा में उत्पादन क्षमता भी उपलब्ध है। टेक्स्टायल के क्षेत्र में भारत के पड़ौसी देश ही अधिक प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं, जैसे बंगलादेश, पाकिस्तान, चीन, वियतनाम आदि। इस समस्त देशों पर अमेरिका द्वारा लगाई गई टैरिफ की दर, भारत की तुलना में कहीं अधिक है। अतः टेक्स्टायल के क्षेत्र में भारत में निर्मित विभिन्न उत्पाद तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी बन गए हैं। इसका सीधा सीधा लाभ भारतीय टेक्स्टायल उद्योग द्वारा उठाया जा सकता है। इसी प्रकार, मोबाइल फोन का उत्पादन करने वाली विश्व की सबसे बड़ी कम्पनियों में से सैमसंग एवं ऐपल नामक कम्पनियां भारत में अपनी उत्पादन क्षमता में भारी भरकम वृद्धि करने के बारे में विचार कर रही हैं। वर्ष 2024 में भारत से 2040 करोड़ अमेरिकी डॉलर के मोबाइल फोन का निर्यात विभिन्न देशों को हुआ हैं, यह वर्ष 2023 में हुए निर्यात की राशि से 44 प्रतिशत अधिक है। और, मोबाइल फोन के निर्यात में हुई इस भारी भरकम वृद्धि में ऐपल एवं सैमसंग कम्पनियों का योगदान सबसे अधिक रहा है। केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई उत्पादन प्रोत्साहन योजना का लाभ भी भारत में मोबाइल निर्माता कम्पनियों ने भारी मात्रा में उठाया है। भारत आज स्मार्ट मोबाइल के उत्पादन के क्षेत्र में पूरे विश्व में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। यदि वैश्विक स्तर पर परिस्थितियां इसी प्रकार बनी रहती हैं तो शीघ्र ही भारत मोबाइल उत्पादन के क्षेत्र में पूरे विश्व में प्रथम स्थान पर आ जाएगा।

अन्य क्षेत्रों में उत्पादन करने वाली बहुराष्ट्रीय बड़ी बड़ी कम्पनियां भी अपनी विनिर्माण इकाईयों को चीन से स्थानांतरित कर भारत में स्थापित कर सकती हैं। कोविड महामारी के खंडकाल के समय भी यह उम्मीद की जा रही थी और चीन+1 नीति का अनुपालन करने के सम्बंध में कई कम्पनियों ने घोषणा की थी परंतु उस समय पर कई कम्पनियां अपनी विनिर्माण इकाईयों को ताईवान, वियतनाम, एवं थाईलैंड, आदि जैसे छोटे छोटे देशों में ले गईं थी और इसका लाभ भारत को बहुत कम मिला था। परंतु, आज परिस्थितियां बहुत बदली हुई हैं। छोटे छोटे देशों में बहुत भारी मात्रा में उत्पादन करने वाली विनिर्माण इकाईयां स्थापित करने की बहुत सीमाएं हैं। इन देशों में श्रमबल की उपलब्धता सीमित मात्रा में है। जबकि भारत में इस दौरान आधारिक संरचना एवं मूलभूत सुविधाओं में अतुलनीय सुधार हुआ है और भारत में श्रमबल भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

आज जापान, इजराईल, ताईवान, रूस, जर्मनी, फ्रान्स, आस्ट्रेलिया आदि विकसित देश श्रमबल की कमी से जूझ रहे हैं। कई विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि दर लगभग शून्य के स्तर पर आ गई है। बल्कि, कुछ देशों में तो जनसंख्या में कमी होती हुई दिखाई दे रही है। दूसरे, इन देशों में प्रौढ़ नागरिकों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है और इन प्रौढ़ नागरिकों की देखभाल के लिए भी युवा नागरिकों की आवश्यकता है। अब कुछ देशों जैसे जापान, इजराईल, ताईवान आदि ने भारत सरकार से भारतीय नागरिकों के इन देशों में बसाने के बारे में विचार करने को कहा है। इजराईल सरकार ने लगभग 1 लाख भारतीयों की मांग भारत सरकार से की है, जापान सरकार ने भी लगभग 2 लाख भारतीयों की मांग की है एवं ताईवान सरकार ने भी लगभग 1 लाख भारतीयों की मांग की है। भारत आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे युवा देश है। अतः भारत आज इस स्थिति में है कि अपने नागरिकों को इन देशों में बसाने के लिए भेज सके। वैसे भी विश्व के कई देशों में आज लगभग 4 करोड़ भारतीय मूल के नागरिक निवास कर रहे हैं एवं इन देशों की अर्थव्यवथा में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मजबूत भागीदारी सुनिश्चित कर रहे हैं। भारतीय नागरिक वैसे भी हिंदू सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हैं एवं इन देशों में शांतिपूर्ण तरीके से जीवन यापन करते हैं। इतिहास गवाह है कि भारत ने कभी भी किसी भी देश पर अपनी ओर से आक्रमण नहीं किया है। भारतीय नागरिक “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना में विश्वास रखते हैं अतः किसी भी देश में वहां के स्थानीय नागरिकों के साथ तुरंत घुलमिल जाते हैं। अतः भारत के लिए विभिन्न देशों को श्रमबल उपलब्ध कराने के क्षेत्र में भी अपार सम्भावनाएं बनती हुई दिखाई दे रही है।

कुल मिलाकर भारत सरकार ने भी विभिन्न देशों के साथ अपने द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को शीघ्रता के साथ अंतिम रूप देना प्रारम्भ कर दिया है क्योंकि आगे आने वाले समय में विश्व व्यापार संगठन की उपयोगिता लगभग समाप्त हो जाएगी और आगे आने वाले समय में विदेशी व्यापार के क्षेत्र में दो देशों के बीच आपस में किए गए द्विपक्षीय व्यापार समझौते ही अपनी विशेष भूमिका निभाते हुए नजर आएंगे। अतः भारत सरकार को इन देशों से होने वाले द्विपक्षीय समझौतों में भारत के हितों की रक्षा करने पर विशेष ध्यान देना होगा। बहुत सम्भव है कि भारत का अमेरिका के साथ भी द्विपक्षीय व्यापार समझौता आगामी 6 माह के अंदर सम्पन्न हो जाए और फिर भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात के लिए एक नया रास्ता खुल जाए।

क्या मोदी 75 के बाद रिटायर होंगे या 2029 के चुनावों के बाद ?

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नई दिल्ली। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय का दौरा किया, तो क्या उन्होंने सितंबर में 75 वर्ष की आयु के बाद पद छोड़ने का फैसला करने पर उत्तराधिकार योजना पर चर्चा की? मोदी के बाद कौन? यह सवाल कई राज्यों की राजधानियों के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां तक ​​कि विपक्ष भी किसी बड़े बदलाव का इंतजार कर रहा है।

मोदी 17 सितंबर को 75 वर्ष के हो जाएंगे, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य के बारे में अटकलें फिर से शुरू हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर, एक अनौपचारिक परंपरा है कि नेता 75 वर्ष की आयु में सक्रिय भूमिकाओं से हट जाते हैं, हालांकि यह कोई कोडिफाईड नियम नहीं है।
अब तक मोदी ने पद छोड़ने का कोई इरादा नहीं जताया है, और गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र के नेता देवेंद्र फडणवीस सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने स्पष्ट किया है कि मोदी 2025 के बाद भी, संभवतः 2029 के आम चुनावों तक भाजपा का नेतृत्व जारी रखेंगे।

मोदी ने भाजपा को शानदार चुनावी जीत दिलाई है और देश के राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार दिया है। उनका कार्यकाल आर्थिक सुधारों, दृढ़ राष्ट्रवादीता और बुनियादी ढांचे के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिए जाना जाता है। शासन और पार्टी संगठन दोनों पर मजबूत पकड़ के साथ, मोदी का नेतृत्व भाजपा के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। लेकिन यह राजनीति है, और सभी राजनेताओं की महत्वाकांक्षाएं होती हैं। इसलिए, पीएम मोदी के अनौपचारिक आयु मानदंड के करीब आने पर पार्टी के भीतर उत्तराधिकार पर चर्चा अपरिहार्य है।

भाजपा का नेतृत्व परिवर्तन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो इसका वैचारिक जनक है। जबकि आरएसएस ने पारंपरिक रूप से नेतृत्व के फैसलों में भूमिका निभाई है, मोदी के मजबूत व्यक्तिगत आकर्षण ने इस प्रभाव को कुछ हद तक कम कर दिया है। यदि वह 2025 में पद छोड़ते हैं, तो भाजपा के अगले नेता को पार्टी की विचारधारा और व्यापक चुनावी अपील के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी। नए नेता को वोट खींचने वाला होना चाहिए, जो पार्टी के लिए चुनाव जीतने में सक्षम हो।

आज की स्थिति के अनुसार, गृह मंत्री अमित शाह मोदी द्वारा राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित होने के कारण एक स्वाभाविक विकल्प प्रतीत होते हैं। मोदी के करीबी सहयोगी, शाह भाजपा की चुनावी सफलताओं के पीछे एक प्रमुख रणनीतिकार रहे हैं। “आधुनिक चाणक्य” कहे जाने वाले, वह पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण अधिकार रखते हैं। अगस्त 2024 के इंडिया टुडे मूड ऑफ द नेशन पोल ने संकेत दिया था कि 25% जवाब देने वालों ने उन्हें मोदी के संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा। हालांकि, उनकी ध्रुवीकरण शैली और मूल समर्थकों से परे भाजपा के मतदाता आधार का विस्तार करने की चुनौती उनकी मुख्य सीमाएं हो सकती हैं।

अगले नंबर पर योगी हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भाजपा के आधार के बीच मजबूत अपील वाले एक उग्र हिंदू राष्ट्रवादी हैं। उनके कठोर शासन और कानून-व्यवस्था के रुख ने उन्हें समर्पित वोटर बेस दिया है। 2023 में 25% से 2024 में 19% तक उनकी लोकप्रियता में गिरावट के बावजूद, उत्तर प्रदेश पर उनका नियंत्रण—एक महत्वपूर्ण चुनावी युद्धक्षेत्र—उन्हें एक दुर्जेय दावेदार के रूप में स्थापित करता है। हालांकि, आरएसएस पृष्ठभूमि की कमी नेतृत्व विचार-विमर्श में उनके खिलाफ काम कर सकती है।

एक समझौता उम्मीदवार केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी हो सकते हैं। वह अपनी प्रशासनिक दक्षता और व्यापक अपील के लिए जाने जाते हैं। 2024 के सर्वेक्षण में 13% समर्थन के साथ, वह एक सम्मानित व्यक्ति बने हुए हैं। हालांकि वह आरएसएस के करीब हैं, लेकिन उनमें मोदी या शाह जैसे जन करिश्मा की कमी है, जिससे वह एक लोकलुभावन नेता के बजाय एक आम सहमति वाले उम्मीदवार बन जाते हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता ग्रामीण कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने के कारण बढ़ी है। एक नरम नेतृत्व शैली और 2024 में 5.4% समर्थन के साथ, वह एक संभावित विकल्प के रूप में उभर रहे हैं।

एक और उम्मीदवार वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण हो सकती हैं। सीतारमण ने भारत की आर्थिक नीतियों को, विशेष रूप से COVID-19 महामारी जैसे चुनौतीपूर्ण समय में, निर्देशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जबकि उनके पास कोई जन राजनीतिक आधार नहीं है, उनकी प्रशासनिक विशेषज्ञता और मोदी के आर्थिक दृष्टिकोण के साथ जुड़ाव और मेल उन्हें पार्टी के भीतर प्रमुख नेतृत्व भूमिकाओं के लिए एक संभावित उम्मीदवार बनाते हैं, संभवतः एक वरिष्ठ नीति निर्माता या सरकार में एक मार्गदर्शक व्यक्ति के रूप में।

एक व्यक्ति जिसने विदेशी मामलों के प्रति अपने जुनून और उत्साह से सभी को प्रभावित किया है, वह हैं एस. जयशंकर, जो विदेश मंत्री के रूप में भारत की विदेश नीति को आकार देने और इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा को बढ़ाने में सहायक रहे हैं। हालांकि वह एक पेशेवर राजनेता नहीं हैं, उनकी रणनीतिक अंतर्दृष्टि और राजनयिक कौशल उन्हें भाजपा के शासन ढांचे में एक प्रभावशाली व्यक्ति बनाते हैं। यदि प्रत्यक्ष नेतृत्व भूमिका में नहीं, तो वह भारत की अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना जारी रख सकते हैं।

मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में भाजपा की पसंद आंतरिक शक्ति गतिशीलता, चुनावी रणनीतियों और आरएसएस प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगी। मोदी ने खुद कहा है, “मेरा कोई उत्तराधिकारी नहीं है, इस देश के लोग मेरे उत्तराधिकारी हैं,” यह संकेत देते हुए कि वह स्पष्ट रूप से किसी का समर्थन नहीं कर सकते हैं। यदि वह 2025 के बाद भी जारी रखते हैं, तो वह संभवतः 2029 के चुनावों की ओर संक्रमण प्रक्रिया का मार्गदर्शन करेंगे। पहले प्रस्थान की स्थिति में, शाह और आदित्यनाथ सबसे मजबूत दावेदार बने हुए हैं, गडकरी, चौहान, सीतारमण और जयशंकर विभिन्न क्षमताओं में संभावित विकल्प हैं।

हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि नरेंद्र मोदी को विस्तार मिलना तय है और वह 2029 के लोकसभा चुनावों तक एनडीए का नेतृत्व करेंगे।

हम आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या विरासत तैयार कर रहे हैं?

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आगरा। ग्रामीण भारत के एक ढहते हुए सरकारी स्कूल में कदम रखें, फिर एक चमचमाते निजी संस्थान की दहलीज पार करें—चाहे वह डीपीएस हो, सेंट पॉल हो या कॉनराड स्कूल— असमानता वज्रपात की तरह आपको कौंधा देगी । एक बच्चा, मोटा है, लाड़-प्यार में पलता है, दूसरा, खोखली आँखों वाला, मुफ़्त मिड डे मील के लिए कटोरा थामे खड़ा है।

सिर्फ़ एक विरोधाभास नहीं है ये, बल्कि एक नैतिक घाव है, जो उस समाज के नीचे सड़ रहा है जो प्रगति का दावा करता है लेकिन असमानता को बढ़ावा देता है।भारत शिक्षा के दो समानांतर ब्रह्मांडों को क्यों बनाए रखता है—एक अभिजात वर्ग के लिए, दूसरा ग़रीबों के लिए?

संपन्न बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में सफल होते हैं – जिन्हें अक्सर “कॉन्वेंट स्कूल” का नाम दिया जाता है – जबकि गरीबों को कम वित्तपोषित सरकारी स्कूलों, नगरपालिका कक्षाओं, मदरसों या स्थानीय भाषा के स्कूलों में भेजा जाता है। यह महज असमानता नहीं है; यह भारत के भविष्य को विभाजित करने वाला एक प्रणालीगत फ्रैक्चर है।

भारत की शिक्षा प्रणाली इसके आर्थिक विभाजन को दर्शाती है: 25 करोड़ माध्यमिक छात्र ऐसे परिदृश्य में आगे बढ़ रहे हैं जहाँ विशेषाधिकार और गैर बराबरी क्षमता को प्रभावित करते हैं। सरकारी स्कूल, जिनमें इनमें से 60% से अधिक छात्र (लगभग 15 करोड़, यूनेस्को 2023 के अनुमान के अनुसार) एनरोल्ड हैं, वे खस्ताहाल अवशेष हैं – जिनमें पुस्तकालय, प्रयोगशालाएँ या कार्यात्मक शौचालय नहीं हैं।

इस बीच, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, निजी स्कूलों में लगातार संख्या बढ़ रही है, जहाँ 4.5 करोड़ छात्र (कुल का 18%) बेहतर सुविधाओं, खेल और तकनीक-संचालित शिक्षा के लिए सालाना ₹20,000 से ₹2 लाख का भुगतान कर रहे हैं।

शीर्ष पर 972 अंतर्राष्ट्रीय विद्यालय हैं इंटरनेशनल स्कूल्स, जो चीन के बाद दूसरे स्थान पर हैं – जो छात्रों को आइवी Ivy लीग और वैश्विक करियर के लिए तैयार करने के लिए सालाना ₹4 लाख से ₹10 लाख शुल्क लेते हैं (इंटरनेशनल स्कूल कंसल्टेंसी, 2025)।

सरकारी स्कूल, जो कभी जन शिक्षा के स्तंभ थे, ढह रहे हैं। कर्नाटक और हरियाणा जैसे राज्यों ने पिछले पांच वर्षों में नामांकन में गिरावट का हवाला देते हुए 800 से अधिक स्कूल बंद कर दिए हैं (शिक्षा मंत्रालय, 2024)। शिक्षकों की कमी व्यवस्था को त्रस्त करती है – देश भर में 1.2 मिलियन रिक्तियां हैं (नीति आयोग, 2023) – जबकि 30% ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी बिजली की कमी है (एएसईआर 2024)। इसकी तुलना निजी स्कूलों से करें, जो 1:20 शिक्षक-छात्र अनुपात और डिजिटल कक्षाओं का दावा करते हैं। इस गिरावट को उलटने में मोदी सरकार की असमर्थता एक बड़ी विफलता है।

अवसरों का प्रवेश द्वार अंग्रेजी भाषा गरीबों के लिए मायावी बनी हुई है। 2023 के विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि सरकारी स्कूल के 78% छात्रों में 10वीं कक्षा तक बुनियादी अंग्रेजी दक्षता की कमी है, जबकि निजी स्कूल के साथियों में 92% धाराप्रवाह हैं। माता-पिता जानते हैं कि यह विभाजन भविष्य को निर्धारित करता है – नौकरी, गतिशीलता, सम्मान – फिर भी सरकारी स्कूल इस “गोल्डन टिकट” को देने में विफल हैं। भाषा विवाद ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। मातृ भाषा कविता पाठ के लिए, अंग्रेजी रोजगार के लिए। ये कब तक चलेगा?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने सुधार का वादा किया – मातृभाषा और अंग्रेजी पहुँच के साथ संतुलित – लेकिन प्रगति सहमी हुई है। इसके ₹1 लाख करोड़ के बजट का केवल 12% उपयोग किया गया है (आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25), बुनियादी ढाँचा और शिक्षक प्रशिक्षण अधर में लटके हुए हैं।

शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. पारस नाथ चौधरी चेतावनी देते हुए सुझाव देते हैं। “सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में पेश करें , शिक्षकों को कठोर प्रशिक्षण दें, कक्षाओं को डिजिटल करें, पुस्तकालय बनाएँ और सार्वजनिक-निजी भागीदारी बनाएँ। इस खाई को पाटने के लिए किफायती निजी स्कूलों को आगे आना चाहिए।

भारत एक चौराहे पर खड़ा है। अगर इन ट्रेंड्स पर लगाम नहीं लगाई गई तो यह शैक्षिक रंगभेद समाज को दो राष्ट्रों में विभाजित कर देगा: एक में शानदार स्नातक वैश्विक मंचों पर विजय प्राप्त करेंगे, जबकि दूसरे में मुफ्त भोजन और फीकी पाठ्यपुस्तकों की पट्टियाँ होंगी। आंकड़े चौंकाने वाले हैं- सरकारी स्कूलों के केवल 23% छात्र उच्च शिक्षा तक पहुँचते हैं, जबकि निजी स्कूलों के 67% छात्र उच्च शिक्षा तक पहुँचते हैं (ASER 2024)।
मोदी जी बताइए, क्या हम समान संभावनाओं वाले भविष्य की कल्पना कर सकते हैं, या अमीरी गरीबी की ये खाई और चौड़ी होगी?

ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़, सम्मान की प्यासी आशा वालंटियर्स

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नई दिल्ली। पिछले माह केंद्रीय स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा ने राज्य सभा में आशा वालंटियर्स के महत्वपूर्ण योगदान को सराहते हुए वायदा किया कि उनका मंत्रालय वेतन सुधार की मांगों पर विचार करेगा और ज्यादा सहूलियतें मुहैया कराएगा।

सालों से ये वायदे हो रहे हैं, मगर एक्शन नहीं हो रहा है। लगभग दो दशकों से, भारत की ‘आशा’ कार्यकर्ताएँ ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ की हड्डी बनी हुई हैं, एक ऐसी फौज जो चुपचाप मगर दृढ़ता से दूरदराज के गाँवों और औपचारिक चिकित्सा सेवाओं के बीच एक सेतु का काम कर रही है।

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत शुरू हुई, दस लाख महिलाओं की यह सेना, माँ और बच्चे की सेहत में ज़बरदस्त सुधार ला रही है, परिवार नियोजन, टीका करन व अन्य सरकारी हेल्थ स्कीम्स आशा वालंटियर्स के जरिए ही लोगों तक पहुंचती हैं।

लेकिन अफसोस, कि आशा ताइयां कम तनख्वाह, बिना नौकरी की सुरक्षा और कम सम्मान के साथ मुश्किल हालात में काम कर रही हैं। कोविड-19 महामारी ने इनके ज़रूरी रोल को उजागर किया, जब उन्होंने घर-घर जाकर स्क्रीनिंग और टीकाकरण अभियान चलाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, पर कभी-कभार मिलने वाली तारीफ से आगे, इन फ्रंटलाइन वॉरियर्स को सिस्टम की अनदेखी का सामना करना पड़ता है।

अगर भारत यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज हासिल करने के बारे में गंभीर है, तो उसे ‘आशा’ कार्यक्रम में फौरन सुधार करना चाहिए, अपने सबसे ज़रूरी हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए सही तनख्वाह, बेहतर काम करने के हालात और सम्मान तय करना चाहिए।

एक रिटायर्ड आशा वॉलंटियर ने बताया कि ऑफिशियली “वॉलंटियर” के तौर पर मानी जाने वाली ‘आशा’ वर्कर्स को औपचारिक नौकरी के फायदे नहीं मिलते, कोई फिक्स तनख्वाह, पेंशन, हेल्थ इंश्योरेंस या मैटरनिटी लीव नहीं। उनके परफॉरमेंस पर आधारित इंसेंटिव से उनकी कमाई औसतन ₹5,000 से ₹10,000 प्रति माह होती है, जो गुज़ारे के लिए बहुत कम है, भुगतान में अक्सर देरी होती है, जिससे कई लोगों को एक्स्ट्रा काम करना पड़ता है।

सोचिए, ‘आशा’ कार्यकर्ता लगभग 30 काम एक साथ करती हैं, टीकाकरण अभियान से लेकर मातृ स्वास्थ्य परामर्श तक, अक्सर हफ्ते में 20+ घंटे काम करती हैं। कई लोग बिना ट्रांसपोर्ट अलाउंस, पीपीई किट या बेसिक मेडिकल सप्लाई के हर दिन कई मील पैदल चलते हैं। उन्हें कभी भी हटाया जा सकता है, जिससे वे फाइनेंशियली कमज़ोर हो जाती हैं, कई लोगों ने सहायक नर्स दाइयों (एएनएम) और मेडिकल ऑफिसर्स से खराब बर्ताव की शिकायत की है, जिसमें बहुत कम कंस्ट्रक्टिव सुपरविज़न है। महिला ‘आशा’ वर्कर्स को घरेलू झगड़ों का सामना करना पड़ता है, कुछ को तो उनके काम के लिए तलाक की धमकी भी दी जाती है, ऊँची जाति के परिवार अक्सर उन्हें एंट्री देने से मना कर देते हैं, जिससे हेल्थ सर्विस में रुकावट आती है।

अनियमित अपस्किलिंग प्रोग्राम्स की वजह से मेंटल हेल्थ, डिजीज मॉनिटरिंग और इमरजेंसी केयर में नॉलेज की कमी बनी हुई है। इन मुश्किलों के बावजूद, ‘आशा’ कार्यकर्ताओं ने माँ और बच्चे की मृत्यु दर में कमी, टीकाकरण दरों में बढ़ोतरी, टीबी और एचआईवी के बारे में जागरूकता में सुधार, मानसिक स्वास्थ्य सहायता देने और हेल्थ रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण जैसे क्षेत्रों में ज़रूरी रोल निभाया है। उनका गहरा कम्युनिटी ट्रस्ट लास्ट माइल हेल्थकेयर डिलीवरी को सुनिश्चित करता है, चाहे महामारी हो, बाढ़ हो या रेगुलर मैटरनिटी केयर, फिर भी, उनके बलिदानों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

आशा कार्यकर्ताओं को पावरफुल बनाने के लिए, एक्सपर्ट्स ने ढेरों सुझाव ऑलरेडी सरकार को दे रखे हैं। इंसेंटिव-बेस्ड पेमेंट्स को फिक्स तनख्वाह (कम से कम ₹15,000/माह) + परफॉरमेंस बोनस के साथ बदलना, पेंशन, हेल्थ इंश्योरेंस और मैटरनिटी बेनिफिट्स देना, ट्रांसपोर्ट अलाउंस, स्मार्टफोन, पीपीई किट और हेल्थ सेंटर्स पर आराम करने की जगह देना, देरी और भ्रष्टाचार से बचने के लिए पेमेंट्स को आसान बनाना, मेंटल हेल्थ, एनसीडी और इमरजेंसी रिस्पांस में रेगुलर स्किल डेवलपमेंट करना, ‘आशा’ को असिस्टेंट नर्स या पब्लिक हेल्थ वर्कर के रूप में सर्टिफाई करने के लिए मेडिकल कॉलेजों के साथ ब्रिज कोर्स करना, ऊँची हेल्थ सर्विस रोल में प्रमोशन के क्लियर रास्ते बनाना, जाति और लिंग के आधार पर रुकावटों के लिए सख्त भेदभाव विरोधी नीतियाँ बनाना, घरेलू झगड़ों को कम करने के लिए फैमिली सेंसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाना, और मुख्य मेडिकल ड्यूटीज पर ध्यान देने के लिए नॉन-हेल्थ कामों को कम करना ज़रूरी है। ₹49,269 करोड़ के बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन वर्कर्स वेलफेयर सेस फंड को आंशिक रूप से ‘आशा’ वेलफेयर को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने पहले ही बेहतर तनख्वाह स्ट्रक्चर का ट्रायल शुरू कर दिया है, इन मॉडलों को नेशनल लेवल पर लागू किया जाना चाहिए।

‘आशा’ कार्यकर्ता “वॉलंटियर” नहीं हैं, वे ज़रूरी हेल्थ सर्विस प्रोफेशनल हैं। अगर भारत वाकई अपनी रूरल हेल्थ सिस्टम को वैल्यू देता है, तो यह दिखावटी सेवा से आगे बढ़ने और उन्हें वह सम्मान, तनख्वाह और सपोर्ट देने का वक्त है जिसकी वे हकदार हैं। उनकी लगातार सर्विस ने लाखों लोगों की जान बचाई है, अब, सिस्टम को उन्हें थकान और अनदेखी से बचाना चाहिए, ‘आशा’ कार्यकर्ताओं को पावरफुल बनाएँ, वरना रूरल हेल्थ सर्विस को टूटते हुए देखें, अभी एक्शन लेने का वक्त है।

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