गौमुख ग्लेशियर के निकट दो लाख से अधिक देवदार के पेड़ों पर संकट-सुरेश भाई

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12 हजार करोड़ रुपये की 889 किमी लम्बी चार धाम सड़क चौड़ीकरण परियोजना के अन्तर्गत 10-24 मीटर तक सड़क चौड़ी करने से अब तक दो लाख से अधिक छोटे-बड़े पेड़-पौधों को काटा जा चुका है। यह केन्द्र सरकार की महत्वकांक्षी परियोजना है।

मध्य हिमालय में स्थित उत्तराखण्ड के गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और पिथौरागढ़ तक जाने वाली सड़क को चौड़ा करने के लिये सन् 2016 से काम चल रहा है। सर्वविदित है कि यहाँ के ऊँचे-नीचे पर्वत, नदी -घाटियाँ बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प के लिये अत्यंत संवेदनशील हैं। यहाँ की भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, यमुना आदि नदियों का जल हिमनदों और इसमें मिलने वाली छोटी नदियों, झरनों पर आधारित है। इन्हीं नदियों के किनारों से होकर चार धाम के लिये पहले से ही 4-6 मीटर चौड़ी डामर वाली सड़क मौजूद हैं। अब इसे 10-24 मीटर तक चौड़ा करने से संवेदनशील खड़े पहाड़ों की चट्टानों को काटकर टनों मिट्टी मलवे के रूप में चौड़ीकरण के दौरान सीधे गंगा और इसकी सहायक नदियों में उड़ेला गया है। इस निर्माण कार्य में भारी विस्फोटों और जेसीबी मशीनों के प्रयोग से पहाड़ अस्थिर और संवेदनशील बन गये हैं। चार धाम सड़क मार्ग पर बने दर्जनों डेंजर जोन इसका उदाहरण हैं, जहाँ पर वर्षात् के समय आवाजाही संकट में पड़ जाती है। केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग 2013 की आपदा के बाद सुरंग आधारित परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण में प्रयोग किए गए विस्फोटों और काटे गए लाखों पेड़ों के बाद बहुत नासूर हो गया है।

इस भारी निर्माण के कारण पहाड़ों की उपजाऊ मिट्टी बर्बाद हुई है। अनेक जलस्रोत सूख गये हैं। जहाँ सड़कों के किनारे पर तीर्थयात्रियों को ठंडा जल मिल जाता था अब वहाँ सीमेंटेड दीवारें खड़ी हो गई हैं। यहाँ की अनेक छोटी-छोटी बस्तियां, ग्रामीण बाजार जहाँ पर लोगों की आजीविका के अनेक साधन जैसे होटल, ढाबे, दुकान आदि प्रभावित हुये हैं। कृषि भूमि और चारागाह समाप्त हुये हैं। इस बर्बादी का कारण है कि यहाँ की संवेदनशील हिमालयी भौगोलिक संरचना के अनुसार जहाँ केवल 7-8 मीटर चौड़ी सड़क बन सकती थी, वहाँ 10-24 मीटर तक चौड़ीकरण का कार्य किया जा रहा है। जिसने पहाड़ की जड़ें हिला कर रख दी हैं। चार धाम सड़क चौड़ीकरण का विरोध गढ़वाल और कुमांऊ दोनों क्षेत्र में हुआ है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाई पॉवर कमेटी का गठन भी किया गया था, जिसकी सिफारिशें हाशिये पर चली गई हैं।

ऑलवेदर के नाम से विख्यात इस चार धाम सड़क का कार्य अभी उत्तरकाशी से गंगोत्री के बीच लगभग 95 किमी में ही बाकी बचा हुआ है, जिसे गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग कहते हैं। जिसपर देवदार जैसे दुर्लभ प्रजाति के पेड़ों को काटा जाना है, जिन पर निशान लगे हुये हैं। वन विभाग ने लगभग 6500 बड़े पेड़ों पर निशान लगाये हैं, लेकिन इसके बीच में असंख्य छोटे-छोटे पेड़ों व जैव विविधता को गिनती से हटा दिया है, जिसके कारण यहाँ पर 2 लाख से अधिक देवदार और अन्य प्रजातियों के छोटे-बड़े पेड़ -पौधों को नुकसान पहुँचाने की तैयारी चल रही है। यहां सबसे अधिक देवदार के पेड़ सुक्खी बैंड से सीधे झाला, जांगला, गंगोत्री तक कटेंगे, जिसकी लम्बाई लगभग 20 किमी है।

इस जंगल को बचाने का विकल्प भी शासन- प्रशासन को रक्षा सूत्र आंदोलन की टीम द्वारा दिया गया है। यदि सरकार यहाँ के सामरिक महत्व के साथ संवेदनशील पर्यावरण की रक्षा के लिये भी ध्यान दें तो यहाँ पर देवदार के वनों को बचाने के लिये जसपुर से पुराली, हर्षिल, बगोरी, मुखवा (गंगा का गाँव) से जॉंगला तक नयी सड़क बनायी जा सकती है। जहॉ पर बहुत ही न्यूनतम पेड़ों की क्षति होगी। और नये गाँव भी सड़क से जुड़ जायेंगे। संसद में केबिनेट मन्त्री नितिन गडकरी जी ने कहा है कि वे मार्ग निर्माण में आने वाले पौधों को रिप्लाण्ट करेंगे जो देवदार के पेड़ों के लिए संभव नहीं है। यदि गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित झाला से जांगला तक सड़क की चौड़ाई 7 मीटर तक रखी जाए तो गंगोत्री जाने वाली गाड़ी धराली होते हुये जा सकती हैं, और वापस आने के लिये जांगला से मुखवा, हर्षिल, बगोरी, जसपुर से सुखी होते हुये उत्तरकाशी पहुॅचा जा सकता है। इस तरह गंगोत्री के बचे- खुचे इन हरे देवदार के छोडे-बडे लाखों पेड़ो को बचाया जा सकता है। क्योंकि घने जंगल के बीच 24-30 मीटर की चौडाई में पेड़ों की अन्धाधुन्ध कटाई करने से भागीरथी संवेदनशील जोन को असीमित नुकसान की संभावना है।

उत्तरकाशी के जिलाधिकारियों ने पिछले 8- 9 वर्षों से इस समस्या को भली भांति देखा है। लेकिन यह केन्द्र व राज्य सरकार की इच्छा पर ही निर्भर करता है। जबकि स्थानीय स्तर पर मुखवा गॉॅव की ग्राम प्रधान शिवकला देवी के अलावा अन्य लोगों ने भी गंगोत्री के देवदार के हरे पेड़ों को बचाने के लिये नितिन गडकरी जी को पत्र लिखा है। उत्तराखंड आंदोलन की नेता पुष्पा चौहान, नागेंद्र दत्त जगूड़ी, बसंती नेगी आदि लोग भी इसका विरोध करने के लिए सड़कों पर आए हैं। लोगों ने यहां पेड़ों को बचाने के लिए रक्षा सूत्र बांधे हैं।

उत्तरकाशी में ऑलवेदर चारधाम सड़क संधर्ष समिति द्वारा तेखला बाई पास से प्रस्तावित नयी सड़क के निर्माण का विरोध भी किया है। जो इसलिए जायज है कि पहले से ही निर्मित सड़क पर लोगों की अनेकों व्यावसायिक गतिविधियों है, जिन्हें बचाना पड़ रहा है।

यह क्षेत्र (भागीरथी जलागम) बहुत ही संवेदनशील है। जहॉ बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प से भारी तबाही हो चुकी है। केंद्र की सरकार ने भी इसे इकोसेंसिटिव जोन के नाम से चिन्हित कर रखा है ।मनेरी भाली जल विद्युत परियोजना (90 मेगा) की टनल भी यहाँ से गुजर रही हैं जिसके ऊपर जामक आदि गाँव में सन् 1991 के भूकम्प से दर्जनों लोग मारे गये थे। इसलिए यहाँ पर बडे निर्माण कार्य जानलेवा साबित होंगें। इसलिये यह ध्यान रखा जाय कि यहाँ पर चल रहे बडे निर्माण कार्य सोच-समझकर करने की आवश्यकता है। निर्माण से निकल रहे मलवे के निस्तारण के लिये हरित निर्माण तकनीकि का उपयोग नहीं हो रहा है। वनों की अधिकतम क्षति रोकी जाय। लोगों की खेती-बाडी और आजीविका की वस्तुयें जैसे होटल, ढावे, दुकानों से चल रहे रोजगार समाप्त न हो। जिस सुखी गाँव ने 1962 के युद्ध के समय गंगोत्री तक सड़क मार्ग के लिए अपनी किसी योग्य जमीन सरकार को निशुल्क दान दी है, इस मौजूदा मार्ग से ऑलवेदर सड़क को यथावत रखते हुए गांव के नीचे से टनल का निर्माण न हो। क्योंकि यहां पर आशंका है कि जिस तरह से जोशीमठ में भू धंसाव हुआ है लोग उसे देख कर बहुत भयभीत भी हैं। 2010-13 तक लगातार यहां पर बहुत बड़े बाढ़ और भूस्खलन से अपार जन धन की हानि हुई है ।1991 में भूकंप से इस क्षेत्र के सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवायी है ।ऐसे क्षेत्र में बड़े निर्माण कार्य को सोच समझकर करना पड़ेगा। इसी राजमार्ग पर तेखला से सिरोर गॉव होते हुये हिना-मनेरी तक प्रस्तावित नयी सड़क यदि सुरंग बांध की टनल के ऊपर से बनती है तो यह क्षेत्र असुरक्षित हो सकता है। यहां हिमालय की बर्बादी को रोकने के लिए जरूरी है कि गंगा भागीरथी में असीमित मलवा न गिरें। इस प्रकार यहाँ के संवेदनशील पर्वतों को भारी छेड़छाड़ से बचाया जाए। मौजूदा सड़क मार्ग पर चल रहे रोजगार व व्यावसायिक गतिविधियों को मजबूती प्रदान की जाय। जिससे यहाँ के लोगों का पलायन रुकेगा और रोजगार भी चलेगा।
अंधाधुंध वनों के कटान से गंगा का उद्गम स्थल गोमुख ग्लेशियर पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। हिमालय में हो रही इस तरह की छेड़छाड़ के कारण ही भारी जल प्रलय देखा जा रहा है। जिसका प्रभाव गंगा के मैदान में करोड़ों लोगों की आबादी पर पड़ रहा है।

(आलेख वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत के सहयोग से प्राप्त हुआ)

शेयर बाज़ार की स्थिरता की राह में एक बाधा है

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स्टॉक एक्सचेंजों को आम तौर पर प्रभावी पूंजी आवंटन को सक्षम करके आर्थिक वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला माना जाता है, जबकि तथ्य यह है कि स्टॉक एक्सचेंज स्थिरता की राह में एक बाधा है।

स्टॉक एक्सचेंज को एक उपकरण के रूप में उपयोग करके वर्तमान आर्थिक विकास पथ को कुछ चुनिंदा लोगों के पक्ष में झुका दिया गया है। एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध कंपनियां और उन कंपनियों के निवेशक, अपने दृष्टिकोण में तेजी से अल्पकालिक होते जा रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे कॉर्पोरेट व्यवहार के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव को महत्व नहीं देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉरपोरेट्स स्टॉक एक्सचेंज की इच्छा से संचालित होते हैं और कॉरपोरेट्स की कार्य परिभाषा और प्राथमिकताएं अप्रत्यक्ष रूप से स्टॉक एक्सचेंज द्वारा तय की जाती हैं और यह ज्यादातर समय स्थिरता की जरूरतों के खिलाफ होता है।

इसके लिए इस बात की समझ और समझ में सुधार की आवश्यकता है कि उभरती बाजार संरचना मुख्य पूंजी जुटाने की गतिविधियों और बाजारों के आवंटन कार्य पर कैसे प्रभाव डालती है और इस संबंध को प्रतिबिंबित करने के लिए बाजार की गुणवत्ता को फिर से परिभाषित करती है। हालाँकि, बाजार स्थिरता के लिए अनुकूलित होने पर भी स्थिरता की चुनौती का समाधान नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उन्हें चलाने के बजाय सामाजिक मानदंडों और अपेक्षाओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए। शेयर बाजार लोगों के पैसे का उपयोग क्राउड फंडिंग के रूप में कर रहा है और अपने लाभ को अधिकतम करने के लिए कुछ चुनिंदा लोगों की प्रभावशीलता के लिए काम कर रहा है।

1999 में डॉटकॉम विस्फोट और 2020 में कोरोना महामारी ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है कि पहले मामले में आम आदमी की दुर्दशा के लिए बढ़ा हुआ शेयर बाजार कैसे जिम्मेदार था और बाद के मामले में यह कैसे अप्रभावी और नपुंसक था। आजीविका की स्थिरता और प्रकृति की स्थिरता के व्यापक हित में स्टॉक एक्सचेंज तंत्र और इसके संचालन को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है।

स्टॉक मार्केट में मौजूद पैसा बिना किसी राजनीतिक सीमा के देशों में कॉरपोरेट्स को नशीली दवाओं की तस्करी और युद्ध जारी रखने सहित आर्थिक गतिविधियों को आकार देने और प्राथमिकता देने में मार्गदर्शन करता है। संक्षेप में कहें तो शेयर बाजार स्थिरता के खिलाफ समाज के एक वर्ग की मौन सहमति से काम कर रहा है।

स्टॉक मार्केट को उन कंपनियों को निवेश पूंजी निर्देशित करने वाले सतत निवेश के असर की आवश्यकता है जो स्थिरता के लिए कॉर्पोरेट जिम्मेदारी को बढ़ावा देते हुए गरीबी, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण विनाश से निपटना चाहते हैं।

यह एक खुला रहस्य है कि शेयर बाजार देशों में राजनीतिक शासन के परिवर्तन के लिए भी जिम्मेदार है और इस खतरे का प्रभाव तब और बढ़ जाता है जब गहरे देश शेयर बाजार को अपने संचालन के लिए उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं।

पाँच वर्षों में ₹15,000 करोड़ का व्यवसाय करेगी भारतीय बीज सहकारी समिति: योगेंद्र कुमार, अध्यक्ष

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2023-24 में 78 बीज उत्पादकों ने 1100 एकड़ में आधारीय बीज बोये
• खरीफ 2025 से स्वयं उत्पादित बीज होंगे बाजारों में उपलब्ध
• पारंपरिक (मीठे) बीजों के उत्पादन और विपणन का रखेंगे विशेष ध्यान
• दालों एवं तिलहन बीजों के उत्पादन और वितरण की है विशेष प्रबंध

नई दिल्ली, 28 सितंबर, 2024; आज भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड की द्वितीय वार्षिक आम सभा का आयोजन इफको मुख्यालय में किया गया। सहकार से समृद्धि के दृष्टिकोण को अपनाते हुए देश में सहकारिता आंदोलन की मजबूती के लिए भारत के प्रथम सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह जी के दिशा निर्देश में उच्च गुणवत्ता एवं अधिक उपज के साथ देश के किसानों की आय बढ़ने हेतु भारतीय बीज सहकारी समिति जो की एक बहुराज्य सहकारी समिति है का गठन 2023 में किया गया।

श्री योगेंद्र कुमार, अध्यक्ष बीबीएसएसऐल एवं विपणन निदेशक इफको ने अपने उद्बोधन में सभी को सूचित किया की सभी प्रवर्तक संस्थाओं एवं सहकारिता मंत्रालय भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चर्चा के उपरांत पाँचवें वित्तीय वर्ष के अंत में अनुमानतः पंद्रह हजार करोड़ टर्न ओवर का आकलन किया गया। बीज उत्पादन कार्यक्रम एवं विपणन हेतु विधिक आवश्यक अनुज्ञा पत्र राज्यों से प्राप्त हो गए है। बीज उत्पादन करने हेतु प्रदेशों में कार्यरत सहकारी संस्थाओं एवं प्रतिनिधियों से वार्ता करके क्षमतानुसार बीज व्यवसाय हेतु प्रयास शीघ्रता से किए जा रहे है साथ ही समिति अपने बीजों के विक्रय हेतु राज्य सरकारों से सम्पर्क करके निविदाओं में सम्मिलित होने का प्रयास कर रही है।

उन्होंने आगे बताया की, भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने भारतीय बीज सहकारी समिति को दालों एवं तेल वाली फसलों में बीजों के वितरण हेतु नोडल संस्थाओं में शामिल कर लिया है। वर्ष २०२३-२४ की रबी फसलों बीज के उत्पादन हेतु चार राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात में ७८ बीज उत्पादकों के प्रक्षेत्रों में लगभग ११०० एकड़ क्षेत्र में गेंहू, चना, सरसों एवं मटर फसलों के जनक से आधारीय बीजों का उत्पादन कराया गया है जिससे आने वाले वर्ष २०२४-२५ की रबी फसलों के प्रमाणित बीजों के उत्पादन में प्रयोग किया जायेगा। खरीफ २०२४ की कुछ फसलों का जनक बीज कृषि मंत्रालय भारत सरकार द्वारा आवंटन प्राप्त हुआ है जिसका आधारीय बीजों के उत्पादन में प्रयोग किया गया है।

भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड ने वित्तीय वर्ष के शुरुआत से ही सदस्यता अभियान की शुरूआत कर दी थी। कुल 11759 आवेदकों के शेयर प्रमाण पत्र जारी किया जाना प्रस्तावित है, तथा 14 आवेदकों के आवेदन वापस कर दिए गए है। श्री योगेंद्र कुमार ने सभी समितियों से निवेदन किया की वह शीघ्र-अतिशीघ्र अपने पंजीकरण कर लें। उन्होंने बताया की किसान ऐप के माध्यम से भी पंजीकरण कर सकते हैं।

कार्यक्रम में श्री डी के वर्मा, निदेशक सहकारिता, श्री कपिल मीना, निदेशक सहकारिता भारत सरकार, डॉ आर के यादव, संयोजक मण्डल, बीबीएसएसएल, श्री चेतन जोशी, प्रबंध निदेशक, बीबीएसएसएल, श्री दिनेश कुमार, उप-निदेशक, एनसीडीसी एवं श्री बाल्मीकि त्रिपाठी, आद्यक्ष यूपीपीसीएफ कार्यक्रम में उपस्थित रहे एवं अन्य गणमान्य व्यक्तिगन एवं सहकारी बंधु ऑनलाइन रूप से जुड़े रहे। आम सभा को हाइब्रिड रूप से आयोजित किया गया, अर्थात कार्यक्रम में 7000+ से अधिक किसान एवं सदस्य विडिओ कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े हुए थे।

समिति के नियंत्रण एवं निर्देशन हेतु पांचों प्रवर्तक संस्थाओं (इफको, करिभको, नाफेड, एनसीडीसी एवं एंडीडीबी) से एक-एक प्रतिनिधि को चुन कर अंतरिम बोर्ड का गठन हुआ। वैधानिक आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु एक नियमित बोर्ड का गठन जुलाई २०२३ में हुआ और बोर्ड के सदस्यों के चुनाव के बाद श्री योगेंद्र कुमार को सर्वसम्मति से बोर्ड का अध्यक्ष चुना गया।

भारतीय बीज सहकारी समिति द्वारा समय-समय पर समिति के विकास हेतु आवश्यक प्रयास किए गए है जिसमें २६ अक्टूबर २०२३ में विज्ञान भवन में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका उद्घाटन आदरणीय श्री अमित शाह ग्रह एवं सहकारिता मंत्री भारत सरकार द्वारा किया गया। इस संगोष्ठी में सहकारिता के माध्यम से उन्नत एवं पारम्परिक बीजों का उत्पादन विषय पर विशेषज्ञों द्वारा अपने विचार प्रस्तुत किए गए इस कार्यक्रम में देश भर के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग २००० से अधिक सहकारिता क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भाग लिया इस कार्यक्रम में इफको, कृभको, नेफेड, एनसीडीसी एवं एनडीडीबी के अधिकारियों, आईसीएआर एवं कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।

आदरणीय अमित शाह जी गृह एवं सहकारिता मंत्री, भारत सरकार द्वारा भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड के नए भवन परिसर का उद्घाटन 13 मार्च 2024 को वर्ड ट्रेड टावर, नारोजी नगर, नई दिल्ली में किया।

भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड सहकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के साथ मिलकर केंद्र एवं राज्य सरकारों की सहायता से उन्नत एवं पारम्परिक बीजों के उत्पादन एवं वितरण में नई ऊँचाइयों को प्राप्त करने का प्रयास करेगा। बीज व्यवसाय की शुरूआत भी प्रमाणित/ट्रुथफुल बीजों के द्वारा सहकारी समितियों के साथ मिलकर शुरू करेगा। अपने समिति के स्वयं के उत्पादित बीजों का व्यवसाय रबी २०२५-२६ +से प्रारंभ हो जायेगा। जिसके लिए कई राज्यों की संस्थाओं के साथ व्यवसायिक समझौते भी किए जा रहे।

क्या बिहार इस तबाही से बचने के लिए तैयार है

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दिनेश मिश्र
खबर है कि कल दोहर तक कोसी में 6.81 लाख क्यूसेक पानी आने आने की आशंका है। मैं सिर्फ याद दिलाना चाहता हूँ कि कोसी में अब तक का सर्वाधिक प्रवाह 9.13 लाख क्यूसेक 5 अक्टूबर, 1968 के दिन देखा गया था जबकि कोसी तटबन्धों के बीच 9.50  क्यूसेककी प्रवाह क्षमता के लिए तटबन्ध की डिजाइन की गई थी। उस बार नदी के पश्चिमी तटबन्ध में दरभंगा जिले के जमालपुर के नीचे घोंघेपुर के बीच में पाँच जगह दरार पड़ी थी और भारी तबाही हुई थी। इस दुर्घटना की जाँच केन्द्रीय जल आयोग के एक इंजीनियर पी. एन. कुमरा ने की थी। उन्होनें इसके लिए चूहों को  जिम्मेवार ठहराया था। कालक्रम में यह दरारें भर दी गई थीं।  
इस बार आशंका व्यक्त की जा रही है कि कोसी तटबन्धों के बीच 28 सितम्बर  दोपहर तक नदी का प्रवाह 6.81 लाख क्यूसेक अनुमानित है। 1968 के बाद का यह सर्वाधिक प्रवाह बताया जा रहा है। हम आशा करते हैं कि यह दौर बिना किसी अनिष्ट के कुशलपूर्वक बीत जायेगा। राज्य सरकार ने सभी कर्मचारियों और अफसरान की छुट्टियाँ  रद्द करके अच्छा संकेत दिया है और और सभी सुरक्षात्मक उपाय पूरा कर लेने की तैयारी का उद्घोष भी किया है जो प्रशांशनीय है।
2008 में कुसहा में जो तटबन्ध टूटा था वह दुर्भाग्यवश 1.44 लाख क्यूसेक पर ही  टूट गया था जो एक चिंताजनक घटना थी। विश्वास है कि इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। उस घटना को याद करके नदी के जिस प्रवाह की बात की जा रही है वह भयावह लगता है।  मुझे याद है कि मुख्यमंत्री ने तब सबको आश्वस्त किया था कि तटबन्ध को इतना मजबूत कर दिया गया है कि अब तीस साल तक कुछ नहीं होने वाला है। यह समय सीमा अभी पूरी नहीं हुई है और ईश्वर इस दुर्योग से सबकी रक्षा करेगा।  हम यह भी कहना चाहेंगे कि जब इतना पानी सफलता पूर्वक तटबन्धों के बीच से गुजरेगा तब उनके बीच रहने वालों की परेशानी बेतरह बढ़ेगी। उनके हितों का ध्यान सरकार जरूर रखेगी। तटबन्ध के साथ परेशानी यही है कि अगर उसे कुछ हो जाता है तो वह कंट्री साइड में उपद्रव करेगा और सुरक्षित रहेगा तो रिवर साइड में जिंदगी दुश्वार करेगा। तीसरा कोई विकल्प नहीं है। ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारी रक्षा करे।

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