संस्कृति स्वाभिमान और वैदिक सत्य की पुनर्प्रतिष्ठा में जीवन समर्पित

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भारतीय वाड्मय में ऋषियों के जीवन का वर्णन मिलता है । जो अलौकिक सत्य के साधक तो रहे ही साथ ही लौकिक जगत जीवन के कल्याण के लिये भी नये मानविन्दु स्थापित करते थे । आधुनिक युग के ऐसे ही साधक हैं स्वामी दयानन्द सरस्वती। जिन्होंने अपनी साधना और अंतर्चेतना से न केवल मानवीय जीवन के आदर्श मूल्यों के आधारभूत मानदंड स्थापित किये अपितु राष्ट्र और संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये ही जीवन समर्पित कर दिया।

स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन शैली और दर्शन के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि वे साधारण मानव नहीं थे । मानों कोई अवतारी महर्षि थे । वे संसार में एक उद्देश्य और संदेश लेकर आये, समाज में जाग्रति की ज्योत जलाई और चले दिये ।

ऐसे महामानव महर्षि दयानन्द सरस्वती का जन्म फाल्गुन कृष्ण पक्ष दसवीं विक्रम संवत 1981 (ईस्वी सन् 1924) को हुआ था । यह तिथि इस वर्ष 12 फरवरी को है, गत वर्ष यह 15 फरवरी को थी । गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के ग्राम मोरवी में जन्में दयानन्द सरस्वती सनातन संस्कृति और धर्म के पुनर्द्धारक थे । उनके पिता कृष्णलाल जी तिवारी भी वैदिक विद्वान थे । और माता यशोदाबाई परम शिवभक्त । पिता ने वैदिक शिक्षा के साथ उस समय की अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा भी ग्रहण की थी । इस नाते पिता कर कलेक्टर हो गये । इससे परिवार का प्रभाव और प्रतिष्ठा पूरे क्षेत्र में फैली । महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म धनु राशि के अंतर्गत मूल नक्षत्र में हुआ था । इसलिये पिता ने अपने पारिवारिक पुरोहित जी के परामर्श से इनका नाम मूलशंकर रखा । इसमें पिता के परंपरा के साथ माता की शिव भक्ति भी आ गई। उनका बाल्यकाल बहुत सुख सुविधा के साथ बीता। प्रारंम्भिक शिक्षा काठियावाड़ में हुई और संस्कृत एवं वैदिक शिक्षा बनारस में । वे बचपन से बहुत जिज्ञासु स्वभाव के थे । परिवार के संस्कार से मिले आध्यात्मिक रुझान के चलते उन्होने अपने विद्यार्थी जीवन में निर्धारित अध्ययन के साथ धार्मिक पुस्तकों और ग्रथों का अध्ययन भी आरंभ किया । उनकी स्मरण शक्ति अद्भुतथी वे एक बार पढ़ लेते या सुन लेते तो कभी भूलते थे । सुनकर, पढ़कर या देखकर प्रश्न करना उनका स्वभाव था ।

उनके बचपन की एक घटना से मानों मूलशंकर का नया जन्म हुआ । महाशिवरात्रि का त्यौहार था । परिवार में व्रत उपवास पूजन चल रहा था । परिवार की परंपरानुसार बालक मूलशंकर ने भी व्रत रखा था । शिव मंदिर में कथा चल रही थी तभी एक चूहा आया और शिवलिंग पर रखा प्रसाद कुतरने लगा । यह देखकर बालक मूल शंकर के मन मेंअनेक जिज्ञासा जागी । यह चूहा क्या कोई प्रकृति की नियति है ? और शिव के आकार का सत्य क्या है ? ईश्वरीय सत्ता का स्वरूप क्या है ? ऐसे अनेक प्रश्न उनके मन में उठे । वे इन प्रश्नों का समाधान खोजने में लग गये । उन्होंने माता पिता से भी पूछा और प्रवचन कर्ताओं से भी। अभी वे इन प्रश्नों का उत्तर खोज ही रहे थे कि क्षेत्र में हैजे की बीमारी फैली जिसमें छोटी बहन एवं चाचा की मृत्यु हो गई। इस घटना से उनके मन में कुछ नये प्रश्न उठे और जीवन-मरण के अर्थ की जिज्ञासा भी जागी । वे इनके समाधान के लिये बैचेन रहते । उनकी यह मनोदशा देखकर माता पिता को चिंता हुई । माता-पिता ने समाधान केलिये अपने पुत्र मूलशंकर का विवाह करने का सोचा । पर मूलशंकर विवाह के लिये तैयार नहीं हुये । जब बहुत दबाव आया तो वे घर छोड़कर सत्य और ईश्वर की खोज के अनंत मार्ग पर चल दिये ।

वे उस समय के परम् प्रतिष्ठित संत गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर के सानिध्य में उन्होने पाणिनी व्याकरण, पातंजलि-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन किया । स्वामी विरजानंद तीन बातों पर चिंतित रहते थे । एक दासत्व के चलते देश की दुरावस्था, दूसरी सनातन संस्कृति का होता निरंतर ह्रास और तीसरा सनातन संस्कृति में मिथ्या धारणाएँ। स्वामी विरजानंद को आभास हो गया था कि शाष्य मूलशंकर इनका समाधान खोज सकता है । शिक्षा पूर्ण होने पर स्वामी विरजानन्द जी ने अपने शिष्य गुरु दक्षिणा में मांगा- “विद्या को सफल करके दिखाओ, परोपकार करो, संसार से अविद्या का अंधकार मिटाओ और सनातन राष्ट्र के सूर्य को प्रखर करो । गुरूदेव ने कहा कि वैदिक प्रकाश से विश्व आलोकित हो और भारत प्रतिष्ठित हो। यही तुम्हारी गुरु दक्षिणा है । गुरुजी ने ही उनको दयानंद नाम दिया । उन्होंने गुरुदेव का आदेश शिरोधार्य किया । गुरुदक्षिणा पूर्ति के लिये “मूल शंकर” का दयानन्द सरस्वती स्वरूप सामने आया । वे वेदों के प्रकाश से अज्ञान रूपी अंधकार दूर करने में लग गये ।

जब उन्होने भारत का भ्रमण आरंभ किया तब उन्होंने देखा कि किस प्रकार भारतीय जीवन दीन हीन हो गया है । उनके सामने वे घटनाएँ भी छुपी न रहीं कि किस प्रकार पेट भरने और प्राण बचाने केलिये लोगों ने मतान्तरण किया । उन्हे लगा कि यदि जीवन विपन्न और भयभीत है तब कोई कैसे सत्य को समझेगा इसलिये उन्होंने एक साथ एक से अधिक दिशाओं में कार्य आरंभ किया । सबसे पहले अपनी संस्कृति के वास्तविक ज्ञान अर्जित करने, स्वाभिमान जाग्रत करने का अभायान छेड़ा। उनके इस प्रयास से विदेशी शासन की कुचेष्ठा स्पष्ट हुई और समाज अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित होने लगा। स्वामी ने अनुभव किया कि भारत बैचेन है और संघर्ष के दिये तैयार है लेकिन संगठन और मार्गदर्शन का अभाव है । स्वामीजी ने इसी दिशा में काम आरंभ किया । इस कार्य के लिये उन्होंने समूची संत शक्ति को सक्रिय किया । इसके लिये जो टोली तैयार हुई उसका नेतृत्वकर्ता स्वामी दयानन्द जी ने ही किया । इस टोली ने समाज के प्रबुद्ध और प्रभावशाली व्यक्तियों को संगठित करना आरंभ किया । उस काल-खंड के लगभग वे सभी लोग स्वामी जी के संपर्क में आये जो भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक वैभव को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिये चिंतित थे । इनमें नाना साहब पेशवा, तात्या टोपे, हाजी मुल्ला और बाला साहब जैसे वीर महापुरुष भी थे । कार्य आगे बढ़ाने के लिये संदेश वाहकों की टीम तैयार हुई । स्वामी जी के प्रवचन होते और वहाँ लोगों को संगठित कर क्रांति के लिये तैयार किया जाता ।

इससे परस्पर संबंध बने और एकता आयी । “रोटी और कमल” इस अभियान का प्रतीक चिन्ह बना । संपर्क कार्य के लिये पुजारी, पुरोहित और साधु संत भी जुड़े । पूरे देश में स्वाधीनता का एक ज्वार उठ आया । 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि में कुछ रियासतों के अपने स्थानीय कारण तो थे पर सबको संगठित करके एक सूत्र में पिरोने का काम स्वामी जी के प्रवचनों सभाओं और संतों ने किया । स्वामी जी की सभाएँ कानपुर, लखनऊ, मेरठ, लाहौर, इंदौर, आदि अनेक स्थानों हुईं। मेरठ क्रांति के समय स्वामी जी मेरठ में ही थे । समय के साथ क्रान्ति आरंभ हुई किन्तु सफल न हो सकी । इससे स्वामी जी निराश नहीं हुये । उनके मन में नकारात्मकता का कोई भाव न था । उनकी मान्यता थी कि शताब्दियों की दासता से मुक्ति किसी एक झटके में नहीं मिल सकती । इसके लिये लंबा संघर्ष करना होगा । वे समझाते थे कि प्रसन्नता एक आंतरिक संकल्प है । आशा की निरंतरता से ऐसी आत्मशक्ति से उत्पन्न होती है जो सफलता और असफलता दोनों से ऊपर होती है । उन्होनें अपने प्रवचनों का अभियान तेज किया इससे समाज में नई ऊर्जा का संचार होने लगा और लोग नये सिरे से सक्रिय होने लगे । नयी परिस्थिति में गुरु स्वामी विरजानंद जी ने स्वामी दयानन्द जी ने इस अभियान के साथ वैदिक वाड्मय की व्याख्या करने की भी सलाह दी । दयानन्द जी जन जागरण के साथ इस काम में भी जुट और हरिद्वार आये । यहाँ उन्होंने ‘पाखण्डखण्डिनी पताका’ फहराई । स्वामी जी कर्मकांड के विरोधी नहीं थे पर कर्मकांड के नाम पर दिखावे का जोरदार खंडन किया । उनका कहना था कर्मकांड में भावनात्मक समर्पण होना चाहिए। केवल गंगा नहाने, सिर मुंडाने और केवल भभूत मलने से स्वर्ग का मार्ग नहीं मिलता मिलता, इसके लिये प्राणशक्ति, ज्ञान शक्ति और आत्म शक्ति में तादात्म्य होना चाहिए । जीवन में माता पिता और वरिष्ठ जनों अपमान करने वाले यदि बुजुर्गों की मृत्यु के बाद उनका श्राद्ध करें तो यह केवल ढोंग ही होगा इससे न दिवंगत की आत्मा शाँत होगी और न समाज का कल्याण होगा । समय के साथ समाज में आई॔ विकृतियों के विरुद्ध भी स्वामी जी ने जागरुकत अभियान चलाया । वे समाज को संगठित करके वह सनातन स्वरूप देना चाहते थे जो वास्तव में वेदों और सनातन संस्कृति का मूल है । स्वामी जी का स्पष्ट मत था कि विदेशी शक्तियों ने भारतीय समाज में आये विखराव का लाभ उठाया और इससे बढ़ाने का षड्यंत्र भी किया। उन्होंने धर्मान्तरित लोगों की घर वापसी के द्वार खोले। असमानता और आडंबरों को दूर कर महिलाओं की स्थिति सुधारने के प्रयत्न किए ।

ग्रन्थ रचना और वेदों का भाष्य

आर्यसमाज की स्थापना के साथ स्वामी जी ने हिन्दी में ग्रन्थों की रचना आरम्भ की। और स्वयं के द्वारा पहले रचित संस्कृत ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद भी किया। ‘ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका’ उनकी असाधारण भाष्य दृष्टि साकार ग्रन्थ है। ‘सत्यार्थप्रकाश’ इस अभियान के केन्द्र में रहा। उन्होंने श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सांख्ययोग को अपनाया । जो उनका दार्शनिक लक्ष्य था । यही उनका दार्शनिक स्वरूप था इसी के माध्यम से उन्होने वेदों की भी व्याख्या की। और जीवन की अन्तिम श्वाँस तक वे इसी अभियान मे लगे रहे । उन्होंने पण्डितों से ही नहीं मौलवियों और पादरियों से भी शास्त्रार्थ किया ।

आर्य समाज की स्थापना

1863 से 1875 ई. तक स्वामी जी देश भर का भ्रमण करके अपने विचारों का प्रचार किया । वेदों के प्रचार उनका प्रमुख लक्ष्य था । और इस काम को पूरा करने के लिए अप्रैल 1875 ई. में ‘आर्य समाज’ नामक संस्था की स्थापना की । शीघ्र ही इसकी शाखाएं देश-भर में फैल गई। देश के सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नवजागरण में आर्य समाज की बहुत बड़ी देन रही है। हिन्दू समाज को इससे नई चेतना मिली । स्वामी जी एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे। उन्होंने जातिवाद और बाल-विवाह का विरोध किया और नारी शिक्षा तथा विधवा विवाह को प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि किसी भी अहिन्दू को हिन्दू धर्म में लिया जा सकता है। इससे हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रूक गया।

हिन्दी भाषा का प्रचार

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने विचारों के प्रचार के लिए हिन्दी भाषा को अपनाया। उनकी सभी रचनाएं और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ मूल रूप में हिन्दी भाषा में लिखा गया। उनका कहना था – “मेरी आंख तो उस दिन को देखने के लिए तरस रही है। जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा बोलने और समझने लग जाएंगे।”
स्वामी जी की अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाओं में सत्यार्थप्रकाश (1874 संस्कृत), पाखण्ड खण्डन (1866), वेद भाष्य भूमिका (1876), ऋग्वेद भाष्य (1877), अद्वैतमत का खण्डन (1873), पंचमहायज्ञ विधि (1875), वल्लभाचार्य मत का खण्डन (1875) आदि हैं ।

षड्यंत्र से देह त्यागी

स्वामी दयानन्द सरस्वती को बहुत विरोध का सामना करना पड़ा । यह विरोध दोनों तरफ से था एक ओर धर्मान्तरित हिन्दुओः की घर वापसी केलिये और दूसरी ओर आडंबर मुक्ति अभियान के लिये भी । और इसी कुचक्र के अंतर्गत उन्होंने देह त्यागी। एक वेश्या के कुचक्र से हुआ। कहते हैं षड्यंत्र कारियों ने स्वामी जी के रसोइये को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और दूध में विष मिलाकर स्वामी जी को पिला दिया। इसी षड्यंत्र में 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन स्वामीजी भौतिक शरीर त्यागकर अनंतयात्रा पर चल दिये।
अपनी अंतिम यात्रा का आभास संभवतः स्वामी जी को हो गया था । उन्होंने 27 फरवरी 1883 को उदयपुर में एक स्वीकारपत्र प्रकाशित किया था जिसमें 23 सदस्यों को परोपकारिणी सभा की जिम्मेदारी सौंपी थी जो उनके बाद उनके काम को आगे बढ़ा सकें। इनमें महादेव गोविन्द रानडे का नाम सबसे प्रमुख था। इस स्वीकारपत्र पर 13 गणमान्य व्यक्तियों के साक्षी के रूप में हस्ताक्षर हैं। इसके छः माह पश्चात उन्होंने देह त्यागी ।
स्वामी जी भले असमय संसार छोड़ गये पर उनकी शिक्षाएँ, संदेश और संस्था ‘आर्यसमाज’ के माध्यम से वैदिक आन्दोलन भारतीय इतिहास में अमर है ।

सिर्फ इमारतें ही नहीं, क्रांति, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम का गढ़ रहा है आगरा

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लखनऊ: आगरा को अक्सर ताजमहल की मोहब्बत की निशानी और मुगलों की विरासत के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह शहर केवल संगमरमर की खूबसूरती तक सीमित नहीं है। समूचा ब्रज क्षेत्र साहित्य, पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम की प्रचंड अग्नि में भी तपा है।

हिंदी और उर्दू साहित्य के प्रख्यात रचनाकारों ने इस शहर को अपनी कलम से नवाजा और क्रांति की ज्वाला को प्रज्वलित किया। आज़ादी की लड़ाई में यहाँ के पत्रकारों, कवियों और क्रांतिकारियों ने जो भूमिका निभाई, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान आगरा क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। 1857 की पहली जंगे-आज़ादी की चिंगारी में आगरा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह शहर क्रांतिकारी विचारों का केंद्र बना, जहाँ से आज़ादी की ज्वाला फैली। नाना साहब, अज़ीमुल्ला खां और मौलवी अहमदुल्ला शाह जैसे बड़े क्रांतिकारी आगरा आए और विद्रोह की रणनीति बनाई। ठाकुर हीरा सिंह, ठाकुर गोविंद सिंह, चाँद बाबा और ठाकुर पृथ्वी सिंह ने अदम्य साहस के साथ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया।

1857 की क्रांति में आगरा के ग्रामीण क्षेत्रों से भी व्यापक समर्थन मिला। हजारों हिंदू और मुसलमान सैनिकों और किसानों ने विद्रोह में हिस्सा लिया। उनकी गतिविधियों ने ब्रिटिश शासन को इतना हिला दिया कि उन्हें आगरा में मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। आगरा कॉलेज और गोकुलपुरा जैसे स्थान असंतोष और क्रांतिकारी गतिविधियों के केंद्र बन गए।

रेलवे के आगमन के बाद आगरा पूर्वी भारत से आने वाले क्रांतिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण पारगमन स्थल बन गया। 1862 में टूंडला रेलवे स्टेशन बनने के बाद यहाँ क्रांतिकारी गतिविधियाँ और भी तेज़ हो गईं।

बीसवीं सदी के स्वतंत्रता संग्राम में भी आगरा अग्रणी रहा। 1920 और 1929 में महात्मा गांधी के आगरा दौरे ने युवाओं में जागरूकता फैलाई। बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय जैसे नेताओं ने भी इस शहर को अपने आंदोलनों का केंद्र बनाया।

भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव ने भी आगरा में शरण ली थी। नूरी दरवाजा क्षेत्र में क्रांतिकारी बम बनाए जाते थे। हार्डी बम केस, शीतला गली विस्फोट, मोती कटरा और बारह भाई की गली में होने वाले धमाकों ने ब्रिटिश प्रशासन को हिला कर रख दिया था। आगरा में 110 से अधिक हिंसक घटनाएँ दर्ज हुईं, जिनमें पोस्टल रॉबरी केस, रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट और ब्रिटिश अधिकारियों की हत्याएँ शामिल थीं।

आगरा के पंडित श्री राम शर्मा, महेंद्र जैन, देवेंद्र शर्मा, गोवर्धन दास, गणपति केला और हरिशंकर शर्मा जैसे पत्रकारों ने क्रांति की अलख जगाई। प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामचंद्र बिस्मिल ने भी अपने लेखन से युवाओं में जोश भरा। उनकी कालजयी पंक्तियाँ—
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”
आज भी लोगों के दिलों में गूँजती हैं।

आगरा ने हिंदी और उर्दू पत्रकारिता में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 1925 में श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल ने ‘सैनिक’ अख़बार शुरू किया, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नाक में दम कर दिया। बाद में यह अख़बार दैनिक के रूप में प्रकाशित हुआ और स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख भूमिका निभाई। अज्ञेय समेत कई प्रतिष्ठित पत्रकार इस दैनिक से जुड़े रहे।

‘सैनिक’ की सफलता ने अन्य अख़बारों को प्रेरित किया। ‘ताजा तार’, ‘प्रकाश’, ‘स्वदेश बांधव’, ‘प्रजा हितैषी’ और ‘उजाला’ जैसे समाचार पत्र स्वतंत्रता संग्राम के समर्थक बने। उर्दू अख़बार ‘अख़बार-ए-आगरा’ और अंग्रेज़ी सिखाने के उद्देश्य से निकाला गया ‘अंग्रेजी शिक्षक’ भी इसी दौर में प्रकाशित हुआ।

1942 में डोरीलाल अग्रवाल ‘उजाला’ से जुड़े और 1948 में उन्होंने ‘अमर उजाला’ की नींव रखी। आगरा में प्रकाशित इन समाचार पत्रों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आगरा के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी रही। सरोज गौरिहार, पार्वती देवी, भगवती देवी पालीवाल, सुख देवी, दमयंती देवी चतुर्वेदी, सत्यवती, अंगूरी देवी जैन, शिवा दीक्षित, चंद्रकांता मिश्रा और हीरा बहन जैसी महिलाओं ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। आज़ाद हिंद फौज (आईएनए) की हेमराज बेटई भी इस आंदोलन की प्रमुख नायिकाओं में थीं। मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार आंदोलन ने आगरा में जबरदस्त सफलता हासिल की।

आगरा ने स्वतंत्रता आंदोलन में कई महान सेनानी दिए, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में धुंधले पड़ गए हैं। ठाकुर राम सिंह, जिन्हें ‘काला पानी के हीरो’ के रूप में जाना जाता है, और प्रोफेसर सिद्धेश्वर नाथ श्रीवास्तव, दोनों ने आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।I
अंग्रेजों ने आगरा के कई क्रांतिकारियों को जेल में डाला, सैकड़ों को फाँसी दी और हजारों को यातनाएँ दीं। आगरा के लगभग 400 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी विभिन्न कालखंडों में गिरफ्तार किए गए।

आगरा का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान महत्वपूर्ण होते हुए भी पहचान का मोहताज है।

आगरा विश्वविद्यालय और अन्य शोध संस्थानों को चाहिए कि वे इस विषय पर गहन शोध करें और आगरा के वीर सपूतों और पत्रकारों के योगदान को उजागर करें। आज़ादी की लड़ाई में आगरा की भूमिका को इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में फिर से स्थान मिलना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इस गौरवशाली इतिहास से प्रेरणा ले सकें।

आगरा सिर्फ ताजमहल की नगरी नहीं, यह क्रांति और संघर्ष की भूमि भी है। यह वह धरती है, जहाँ कलम भी तलवार बनी और विचार भी आंदोलन।

आत्मनिर्भर राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भर छात्र आवश्यक – दत्तात्रेय होसबाले

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मनुष्यता को प्राचीन भारत की देन अद्भुत है, सभी क्षेत्रों में भारत के योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकता। भारत के इस अद्भुत ज्ञान का परिचय आज की युवा पीढ़ी से कराना बहुत आवश्यक है। यह कहना है इसरो के अध्यक्ष वी नारायण का। श्री नारायण ने ज्ञान महाकुंभ 2018 के समापन अवसर पर कहा कि हमारे पास अनेक साक्ष्य हैं कि भारत में अनेक देशों के छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। हमारे यहाँ के आयुर्वेद ने सभी सीमाओं को पार कर वैश्विक मान्यता प्राप्त की थी। श्री नारायण ने कहा कि अंग्रेजों के आने के बाद भारत में शिक्षा का स्तर बढ़ा, इस कथन को मैं सिरे से नकारता हूँ। उनका कहना था कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति उत्कृष्ट थी और इसे आक्रांताओं ने आहत किया। लेकिन आज हम सभी का कर्तव्य बनता है कि देश के प्राचीन ज्ञान और संस्कृति के आधार पर इसे विकसित राष्ट्र बनाएँ। भारत आज सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है।

ज्ञान महाकुंभ के समापन सत्र के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत में समस्याओं की कमी नहीं है, लेकिन समस्याओं की ही चर्चा करते रहे तो देश आगे बढ़ ही नहीं सकता। यही कारण है कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने अपना जो ध्येय वाक्य रखा है, उसमें प्रमुख है कि समस्या नहीं समाधान की चर्चा करें। श्री होसबाले ने कहा कि देश के शिक्षा क्षेत्र में ऐसा बदलाव चाहिए, जिससे भारत में भविष्य निर्माता, विद्यार्थियों में ज्ञान और जीवन मूल्य को स्थापित कर सके। श्री होसबाले के अनुसार, भारतीय दृष्टि से क्या होना चाहिए, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने इसकी न तो केवल सरकार से अपेक्षा रखी, बल्कि ऐसी मांग ही नहीं की। बल्कि न्यास ने समाज में प्रबोधन का कार्य भी किया है। श्री होसबाले ने कहा कि न्यास द्वारा भारत के शिक्षाविदों, चिंतकों, विद्वत्-जनों को एक मंच पर लाकर इस विषय के समाधान को लेकर समय-समय पर मंथन किया है। इसके साथ ही न्यास ने शिक्षण संस्था संचालित करने वालों को भी आवश्यक परिवर्तन की भूमिका से परिचित कराया और इस दृष्टि से शैक्षिक संस्थान चलाने के लिए प्रेरित किया। श्री होसबाले ने आगे कहा कि भारतीय मूल्यों के लिहाज से संस्कार देने वाली शिक्षा के साथ ही चरित्र निर्माण को लेकर भी न्यास ने कार्यक्रम चलाए। इसके साथ ही पर्यावरण, भारतीय भाषा जैसे अनेक आयामों पर कार्यक्रम करते हुए और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में संघर्ष के साथ ही आवश्यक होने पर शासन के सामने विचार रखते हुए न्यास ने ना केवल योग्य वातावरण बनाने का प्रयत्न किया है, बल्कि विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों, संचालकों, शिक्षाविदों के लिए शैक्षिक परिवर्तन के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में उनकी सहभागिता और भूमिका को लेकर जागृति लाने का भी प्रशंसनीय कार्य किया है।

ज्ञातव्य है कि ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ अर्थात् दुनिया में ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं है। श्रीमद्भगवद् गीता की इस पंक्ति की सार्थकता को व्यापक रूप देने को लेकर प्रयागराज में ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ ने ज्ञान महाकुंभ – 2081 का आयोजन किया, जो 10 जनवरी से शुरू होकर 10 फरवरी तक चला। जिसका उद्घाटन उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य ने किया।

इस ज्ञान महाकुंभ में 01 फरवरी 2025 को भारत को इंडिया कहे जाने की सार्थकता को लेकर मंथन हुआ। इस विशिष्ट कार्यक्रम के संयोजक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ने कहा कि ‘इंडिया’ शब्द सिर्फ़ नाम तक सीमित है, जबकि ‘भारत’ हमारे लिए भावना है, हमारे पूर्वजों की विरासत है। यह मात्र एक भू-भाग नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रतिबिंबित करता है। इस आयोजन में श्री एम. गुरु जी ने कहा कि “ये भारत है, हम भारतीय हैं और हम भारत की ही चिंता करते हैं, ‘इंडिया’ शब्द से हमारा कोई संबंध नहीं, हम भारत के जन कभी भी इसे मान्यता नहीं दे सकते।”

ज्ञान महाकुंभ में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के संयुक्त तत्वावधान में हरित महाकुंभ-2081 का 5 और 6 फरवरी को आयोजन किया गया। इसमें न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने हरित महाकुंभ की संकल्पना साझा की। डॉ कोठारी ने कहा, “पर्यावरण की इस हालत के लिए सिर्फ़ हम ज़िम्मेदार हैं और इसके दुष्परिणाम से हमें और कोई नहीं बल्कि स्वयं हम ही बचा सकते हैं।” इस आयोजन में मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान के निदेशक प्रो. आर एस वर्मा ने उपस्थित प्रतिभागियों को पर्यावरण के प्रति सजग करते हुए कहा कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट से ही हम डेवलपमेंट रिटेन कर सकते हैं। प्रो. वर्मा ने प्लास्टिक के प्रयोग के दुष्परिणामों से आगाह करते हुए उसके न्यूनतम इस्तेमाल पर बल‌ दिया। इस दौरान गोपाल आर्य ने पर्यावरण को मातृभाषा हिंदी की समृद्धि से जोड़ते हुए कहा कि हरित से हरि को पाया जा सकता है, और ‘ग्रीन’ अंग्रेज़ी शब्द ‘ग्रीड’ का पर्याय-सा लगता है।

ज्ञान महाकुंभ में ‘भारतीय शिक्षा : राष्ट्रीय संकल्पना’ पर केंद्रित तीन दिवसीय आयोजन भी हुआ। इसके उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने ज्ञान महाकुंभ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, इस अलौकिक महाकुंभ में ज्ञान महाकुंभ का आयोजन अपने आप में ही अद्भुत संयोग है। इस कार्यक्रम से पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को एक नई ऊर्जा और भारतीय ज्ञान परंपरा से युक्त दिशा मिलेगी। इस सत्र के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा में एकांगी शिक्षा नहीं दी जाती थी, परंतु आज संपूर्ण विश्व एकांगी शिक्षा व्यवस्था से ग्रसित है। हमें समाज में एक बार फिर भारतीय ज्ञान परंपरा की चेतना का जागरण करना होगा। इस आयोजन में उपस्थित विशिष्ट अतिथि यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डी. पी. सिंह ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की सराहना करते हुए कहा कि अध्यात्म विद्या सभी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ है। भारतीय ज्ञान परंपरा आध्यात्म और शिक्षा का अद्भुत मिश्रण कर रही है और हमें इस परंपरा को एक बार फिर बल देना होगा।

तीन दिवसीय इस आयोजन में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, विश्व जागृति फाउंडेशन के वागीश स्वरूप, विनय सहस्रबुद्धे, साध्वी ऋतंभरा, राष्ट्रीय सेविका समिति की सीता अक्का, एनआईटी प्रयागराज के निदेशक प्रो आर.एस. शर्मा, मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त मनोज श्रीवास्तव, राजस्थान उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त ओमप्रकाश बैरवा, हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो कैलाश शर्मा, इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव, नीति आयोग के शिक्षा निदेशक डॉ शेषांक शाह, पद्मश्री आनंद कुमार की उपस्थिति विशेष रही।

तीन दिन चले इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में निजी शैक्षिक संस्थाओं की शिक्षा में भूमिका, शासन-प्रशासन की शिक्षा में भूमिका, विकसित भारत और भारतीय भाषाएं जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। इस कार्यक्रम में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सभी प्रांतों के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दस हजार से अधिक विद्यार्थी, शिक्षाविद, आचार्य आदि ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिसमें 100 से अधिक केंद्रीय और राजकीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों के कुलपति, निदेशक, अध्यक्ष शामिल रहे। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने सोशल इंटर्नशिप के माध्यम से इस ज्ञान महाकुंभ में अपनी सेवाएँ दी तथा विद्यार्थियों हेतु विभिन्न कक्षाओं जैसे वैदिक गणित, दैनिक योग अभ्यास व संस्कृत कार्यशाला आदि का आयोजन भी हुआ।

गोदी से सर पर चढ़ा भारतीय मीडिया

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दिल्ली। भारतीय मीडिया, ( जनसंचार माध्यम), आज़ादी के कई दशकों बाद तक, झूठा ही सही या दिखावे के लिए, विपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाता रहा। बड़े-बड़े खुलासे हुए, सरकारें तक गिर गईं। कार्टूनिस्टों को भी नेताओं की खिंचाई के लिए खूब मौके मिलते थे। 1970 का दशक प्रेस की स्वतंत्रता का काला और स्वर्णिम युग था। आपातकाल के पहले और बाद में मीडिया ने आज़ादी का भरपूर उपयोग किया।

अगले तीस वर्षों तक समाचार पत्रों और टीवी चैनल्स ने, कुछ अपवादों को छोड़कर, निष्पक्ष और सशक्त भूमिका निभाई।

2014 के बाद मीडिया ने राष्ट्रवाद और विकास की ओर रुख किया। देश के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में मेनस्ट्रीम मीडिया ने वर्तमान व्यवस्था का पूर्ण समर्थन किया, जिसकी वजह से निराश विपक्ष ने उसे “गोदी मीडिया” कहना शुरू कर दिया। आस्था और भक्ति मार्ग से प्रेरित मीडिया संस्थानों ने अतीत की ग़लतियों का सुधार करते हुए, अपनी नीतियों को देश के विकासोन्मुख एजेंडा के साथ ढाला।
हाल के वर्षों में भारतीय मीडिया ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। समाज के विभिन्न तबकों ने मीडिया पर नाराज़गी भी जताई है। मास मीडिया की बढ़ती ताक़त और पहुँच ने इसे विपरीत भूमिकाएँ निभाने के लिए प्रेरित किया है। सोशल मीडिया के उदय ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है, जहाँ पाठक अब सक्रिय भागीदार बन गए हैं। यह बदलाव भारतीय मीडिया के लिए नई चुनौतियाँ लेकर आया है।
भारतीय मीडिया अन्य व्यवसायों की तरह ही बदलाव की प्रक्रिया से गुज़र रहा है। पुरानी पीढ़ी इसे पत्रकारिता में गिरावट के रूप में देखती है, जबकि नई पीढ़ी इसे एक रोमांचक परिवर्तन मानती है। 1947 के बाद के मिशनरी मानसिकता से मुक्त होकर, मीडिया अब लाभ कमाने वाली औद्योगिक गतिविधियों पर केंद्रित हो गया है।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, “1970 के दशक तक मीडिया की भूमिका विरोधात्मक थी, लेकिन आज यह व्यावसायिक हितों से प्रभावित हो रहा है। व्यापारिक गतिविधियों की बढ़ती भूमिका ने मीडिया के मूल लक्ष्य, यानी जनता की आवाज़ को उठाना, को पीछे धकेल दिया है।” समाचारपत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर यह आरोप लगता है कि वे फंड देने वालों की रुचि के अनुसार कंटेंट तैयार करते हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में टीआरपी की दौड़ ने गंभीर मानवीय मुद्दों को नज़रअंदाज़ कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाओं ने इसकी पुष्टि की है।
उदाहरण के लिए, पटियाला में एक व्यवसायी ने कैमरे के सामने खुद को आग लगा ली, लेकिन मीडिया ने उसे बचाने के बजाय सिर्फ दर्शकों को आकर्षित करने पर ध्यान दिया। इसी तरह, मध्य प्रदेश में एक परिवार ने आर्थिक तंगी के कारण कैमरे के सामने ज़हर खा लिया, और गुजरात में एक महिला को अंत:वस्त्र में गलियों में चलने के लिए मजबूर किया गया। ये घटनाएँ मीडिया की नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

आजकल डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया ने सूचनाओं के संचार के तरीकों को बदल दिया है।

“ट्विटर, इंस्टा, फेसबुक, यूट्यूब, खबरी ऐप्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म अब समाचारों के प्रमुख स्रोत बन गए हैं। हालाँकि, इसके साथ ही फ़ेक न्यूज़ और मीडिया ड्रिलिंग और ट्रायल जैसी समस्याएँ भी सामने आई हैं। सूचना की सटीकता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं,” कंसल्टेंट मुक्ता गुप्ता ने कहा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग भी मीडिया में बढ़ रहा है। AI की मदद से समाचार लेखन और डेटा विश्लेषण तेज़ी से किया जा रहा है, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या मानव पत्रकारिता की गुणवत्ता और नैतिकता को बनाए रखा जा सकेगा। AI द्वारा उत्पन्न सामग्री में अनैतिकता और पूर्वाग्रह की समस्याएँ होती हैं, जो मीडिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं।

सीनियर जर्नलिस्ट अजय के मुताबिक, “व्यवसायीकरण ने मीडिया को विज्ञापनदाताओं के प्रभाव में ला दिया है। कई मीडिया हाउस अब विज्ञापनदाताओं के हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे स्वतंत्र पत्रकारिता ख़तरे में पड़ गई है। समाचार की नैतिकता और प्रस्तुति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। इन सभी चुनौतियों के बीच, मीडिया की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है।”

नई परिस्थितियों में निष्पक्षता, सटीकता और विश्वसनीयता बनाए रखना आवश्यक है। मीडिया संगठनों को नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ संदेहास्पद सूचनाओं का सही तरीके से सत्यापन करना होगा, शिक्षक आशुतोष कहते हैं।

बैंगलोर के वरिष्ठ मीडिया कर्मी जोसफ सेंटी कहते हैं, “भारतीय मीडिया को अपने आप को इन परिवर्तनों के अनुरूप ढालने की आवश्यकता है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए दृढ़ नीतियाँ और गहन सोच की आवश्यकता है। मीडिया को सामान्य नागरिकों के लिए एक सही और न्यायपूर्ण सूचना का स्रोत बनना चाहिए। यही वह रास्ता है जो भारतीय मीडिया को अपनी गरिमा और विश्वसनीयता बनाए रखने में मदद करेगा।”

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