बल के साथ शील की उपासना से राष्ट्र निर्माण या नागरिक चरित्र से होगा राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण

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शिवेश प्रताप

मोहन भागवत जी का आज का विजयादशमी उद्बोधन भारतीय समाज और राष्ट्र निर्माण के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक संदेश था। एक मजबूत नागरिक चरित्र से ही एक मजबूत राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण होता है। अपने वक्तव्य ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और समसामयिक संदर्भों के माध्यम से उन्होंने समाज और राष्ट्र के उत्थान में नागरिकों के कर्तव्यों पर जोर दिया। उन्होंने संवैधानिक अनुशासन के साथ मन, कर्म और वचन के विवेक पर ध्यान देते हुए बल के साथ शील की उपासना से राष्ट्र निर्माण पर जोर देने की बात कही।

उनके वक्तव्य का मर्म था की हम सभी को यह समझना होगा कि हमारी सामूहिक शक्ति ही हमें वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाएगी। हमें मिलकर सुख, शांति, और सद्भावना के लिए कार्य करना चाहिए, ताकि भारत एक ऐसा राष्ट्र बने जो न केवल अपने नागरिकों के लिए बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत कर सके। आइये उनके भाषण मे कहे गए विचारों की विस्तार से चर्चा करें;

भारतीय संस्कृति और महान विभूतियों का स्मरण:

मोहन भागवत जी ने महारानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर, स्वामी दयानंद सरस्वती, और भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों का स्मरण करते हुए बताया कि ये विभूतियां हमारे समाज और राष्ट्र के लिए आदर्श हैं। इन महापुरुषों ने निस्वार्थ भाव से देश और समाज के लिए काम किया और अपने जीवन के माध्यम से समाज को नई दिशा दी। उनका जीवन आदर्श और निष्ठा का प्रतीक था, जिसने भारतीय समाज को एकता, साहस और निस्वार्थ सेवा का पाठ पढ़ाया। ये महापुरुष व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र के उन्नयन का प्रतीक हैं, और हमें उनसे प्रेरणा लेकर अपने समाज और देश को मजबूत बनाना होगा।

व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता:

उनके भाषण का एक प्रमुख पहलू था व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र का महत्त्व। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक राष्ट्र का वैभव और शक्ति उसके नागरिकों के चारित्रिक गुणों पर निर्भर करते हैं। जो समाज अपने नागरिकों में निष्ठा, साहस, और सत्यनिष्ठा के गुणों को विकसित करता है, वह ही सशक्त और समर्थ बनता है। उन्होंने भारतीय समाज में इन गुणों को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। वे मानते हैं कि जब तक समाज में चारित्रिक बल नहीं होगा, तब तक राष्ट्रीय प्रगति संभव नहीं है। यही कारण है कि उन्होंने समाज के हर क्षेत्र में ऐसे गुणों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

विज्ञान प्रगति के साथ नैतिक प्रगति आवश्यक:

मोहन भागवत जी ने भारतीय समाज और राष्ट्र की वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी में प्रगति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत टेक्नोलॉजी, शिक्षा, और विज्ञान के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह प्रगति हमारे समाज की समझदारी और नवाचार के परिणामस्वरूप हो रही है। लेकिन उन्होंने यह भी चेताया कि प्रगति का मार्ग चुनौतियों से भरा होता है। इसीलिए हमें न केवल भौतिक दृष्टि से बल्कि चारित्रिक और नैतिक दृष्टि से भी मजबूत होना चाहिए, ताकि हम हर प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सकें।

वैश्विक परिदृश्य और चुनौतियां:

भागवत जी ने वैश्विक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने इसराइल-हमास युद्ध और अन्य वैश्विक संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि आज का मानव समाज भले ही वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से बहुत उन्नत हो गया हो, लेकिन स्वार्थ और अहंकार के कारण दुनिया में कई संघर्ष और समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्होंने चेताया कि भारत की प्रगति से कुछ विदेशी ताकतें खुश नहीं हैं और वे तरह-तरह के षड्यंत्र करके भारत को रोकने का प्रयास कर रही हैं। यह वैश्विक स्थिति हमें सतर्क करती है कि हमें केवल भौतिक प्रगति पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमें नैतिक और चारित्रिक बल की भी आवश्यकता है ताकि हम विश्व मंच पर मजबूती से खड़े रह सकें।

सामाजिक एकता और कट्टरता का मुकाबला:

मोहन भागवत जी ने अपने भाषण में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के खिलाफ हो रहे अत्याचारों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कट्टरपंथ की प्रवृत्ति, चाहे वह किसी भी समाज में हो, समाज को कमजोर करती है। भारत में सामाजिक एकता और सौहार्द बनाए रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि विभाजन और कट्टरता देश की प्रगति में बड़ी बाधाएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को संगठित रहना चाहिए और देश के विकास में अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। यह केवल हिंदू समाज के लिए नहीं, बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए भी आवश्यक है।

संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान:

संघ प्रमुख ने संघ के कार्यों का जिक्र करते हुए बताया कि संघ ने पिछले 99 वर्षों में समाज को संगठित करने और उसे नैतिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संघ का उद्देश्य समाज को एकजुट करना और समाज में नैतिक और चारित्रिक बल को विकसित करना है। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन का विस्तार नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति में चारित्रिक गुणों का विकास करना है ताकि वह राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सके।

भागवत जी ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में भारत के सामने कई चुनौतियां हैं, जिनसे निपटने के लिए समाज को जागरूक और संगठित होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सामाजिक असमानता, जातिवाद, और धार्मिक कट्टरता जैसी समस्याएं समाज को कमजोर करती हैं। यदि समाज इन चुनौतियों से निपटने में सफल होता है, तो भारत न केवल आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टि से बल्कि चारित्रिक दृष्टि से भी विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।

युवा में देश के प्रति गर्व की भावना:

मोहन भागवत जी ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवा में देश के प्रति गर्व की भावना जाग रही है और यह एक सकारात्मक संकेत है। युवा पीढ़ी में साहस, निष्ठा, और सेवा के गुणों का विकास करना आवश्यक है ताकि वे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे केवल व्यक्तिगत लाभ के बारे में न सोचें, बल्कि समाज और देश के विकास के लिए भी योगदान दें।

सामाजिक समरसता का महत्व:

भागवत जी ने अपने भाषण में सामाजिक समरसता और सद्भावना की चर्चा की, जिसे उन्होंने स्वस्थ समाज की पहली शर्त माना। उनके अनुसार, संगठन और एकता केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रमों से नहीं आएगी, बल्कि व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर काम करने से आएगी। यह विचार दर्शाता है कि एकता और सहयोग की भावना केवल समारोहों और आयोजनों से नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के व्यक्तिगत प्रयासों से ही विकसित होगी।

उन्होंने कहा कि सभी वर्गों के बीच मित्रता होनी चाहिए। जब हम विभिन्न पंथ, भाषा और रीति-रिवाजों के बावजूद एक-दूसरे के प्रति मित्रता का भाव रखेंगे, तभी समाज में वास्तविक समरसता आएगी। इसके लिए भागवत जी ने सुझाव दिया कि विभिन्न धार्मिक उत्सवों को सभी को मिलकर मनाना चाहिए। जैसे कि वाल्मीकि जयंती और रविदास जयंती आदि पर्वों को पूरे हिंदू समाज द्वारा मनाना चाहिए।

जातिगत नेतृत्व और सामूहिक प्रयास:

भागवत जी ने जातिगत नेतृत्व की महत्वपूर्णता को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि जाति और वर्ग के सभी मुखिया अगर ब्लॉक स्तर पर एकत्र होकर समाज की समस्याओं पर चर्चा करें और उन्हें सुलझाने का प्रयास करें, तो समाज में सद्भावना को बनाए रखने में मदद मिलेगी। उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे राजपूत समाज ने वाल्मीकि बंधुओं की समस्या को समझा और उनके बच्चों के लिए विद्यालय में निःशुल्क शिक्षा का निर्णय लिया। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि जब विभिन्न जातियां मिलकर काम करती हैं, तो समाज में सहयोग और एकता का माहौल बनता है। इससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव हो सकता है।

पर्यावरणीय चिंताओं पर सार्थक प्रयास को बल:

भागवत जी ने आज की वैश्विक समस्याओं, विशेषकर पर्यावरणीय चिंताओं, पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि और पर्यावरण की रक्षा के लिए एक नई दृष्टि की आवश्यकता है। हमारे देश में विभिन्न पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, जैसे जल संकट, वायु प्रदूषण, और वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में आ गया है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि हम सभी को अपने पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होना पड़ेगा और उसके प्रति जिम्मेदारी से कार्य करना पड़ेगा। इस संदर्भ में, उन्होंने जैविक कृषि और स्थानीय वृक्षों के महत्व को बताया। उन्होंने आग्रह किया कि हमें प्लास्टिक का उपयोग कम करना चाहिए और जल संरक्षण की दिशा में काम करना चाहिए।

संस्कार और शिक्षा से चरित्र निर्माण:

भागवत जी ने शिक्षा और संस्कार के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल विद्यालयों में नहीं, बल्कि घर पर भी प्रारंभ होती है। मातृ-पितृ की भूमिका और घर का वातावरण बच्चों के संस्कार के निर्माण में अहम होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि नयी शिक्षा नीति में सांस्कृतिक मूल्यों का प्रशिक्षण शामिल होना चाहिए।

इस संदर्भ में, उन्होंने शिक्षकों की जिम्मेदारी का उल्लेख किया कि वे विद्यार्थियों के लिए आदर्श बने और सही मार्गदर्शन करें। उन्होंने कहा कि समाज में जो प्रमुख लोग होते हैं, उन्हें अपने आचरण से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनना चाहिए।

संविधान परिभाषित एक अनुशासन की आवश्यकता:

सरसंघचालक जी ने कहा की देश को एक अनुशासन की आवश्यकता है, जो हमारे संविधान द्वारा परिभाषित है। संविधान की प्रस्तावना में पहला वाक्य है: “हम भारत के लोग अपने आप को इस संविधान को अर्पण करते हैं,” जो हमारे देश के संचालन का आधार है। सभी नागरिकों को संविधान के चार महत्वपूर्ण प्रकरणों—प्रस्तावना, मार्गदर्शक तत्व, मूलभूत कर्तव्य, और मूलभूत अधिकार—की जानकारी होनी चाहिए।

उन्होंने कहा की हमें एक साथ मिलकर चलने की कला विकसित करनी होगी, जिसमें पारस्परिक व्यवहार, सद्भावना, भद्रता, और समाज के प्रति आत्मीयता शामिल हो। कानून और संविधान का निर्दोष पालन व्यक्तिगत और राष्ट्रीय विकास का आधार है, और देश की सुरक्षा, एकता, अखंडता, और विकास के लिए ये पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका त्रुटि रहित और संपूर्ण होना आवश्यक है।

मन, वचन, और कर्म का विवेक:

उन्होंने बताया की मन, वचन, और कर्म का विवेक राष्ट्रीय चरित्र का एक महत्वपूर्ण पहलू है। भारत एक विविधता से भरा देश है, जहां विभिन्न स्थितियों में लोग रहते हैं। इसलिए, कोई एक बात या कानून सभी के लिए स्वीकार्य होना असंभव है। इस विविधता को लेकर आपस में लड़ाई-झगड़ा करना उचित नहीं है। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन उसे संयम के साथ व्यक्त किया जाना चाहिए। किसी एक वर्ग को पूरे समूह के लिए जिम्मेदार ठहराना गलत है; सहिष्णुता और सद्भावना हमारी परंपरा का हिस्सा हैं। असहिष्णुता मानवता के खिलाफ है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी महापुरुष, ग्रंथ, या संत का अपमान न हो, और जब ऐसा हो, तो हमें संयमित रहना चाहिए। बैर से बैर की शांति नहीं होती; हमें सभी के प्रति सद्भाव और सद्भावना का पालन करना चाहिए, क्योंकि समाज की एकात्मता और सदाचार सबसे महत्वपूर्ण हैं।

बल के साथ शील की उपासना:

उन्होंने बताया की यह परम सत्य है कि किसी भी राष्ट्र के लिए मनुष्यों के सुखी अस्तित्व और सहजीवन का एकमात्र उपाय शक्ति है। दुर्बल धर्म का वहन नहीं कर सकते; इसीलिए सशक्त समाज की आवश्यकता है, जो आत्म-निर्भर और समृद्ध हो। जब भारत की शक्ति कमजोर थी, तब उसके प्रति अपमान और अन्याय का सिलसिला जारी था। हालाँकि, अब जब भारत की शक्ति बढ़ गई है, तब नागरिकों की प्रतिष्ठा भी ऊंचाई पर पहुंच गई है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है जो दर्शाता है कि जब राष्ट्र मजबूत होता है, तब उसकी आवाज़ भी विश्व स्तर पर सुनी जाती है।

शक्ति की साधना शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सभी क्षेत्रों में आवश्यक है। इस दृष्टि से, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे संगठन इस दिशा में कार्य कर रहे हैं, जहां शक्ति को शील और नैतिकता के साथ जोड़कर देखा जाता है। उनका मानना है कि वास्तविक शक्ति केवल तभी प्रासंगिक है जब वह सकारात्मक दिशा में कार्य करती हो। आज का पर्व शक्ति की साधना का प्रतीक है, जिसमें देवी शक्ति का जागरण किया जाता है, जिससे विश्व में सद्भावना और शांति का आधार स्थापित होता है।

व्यक्तिगत स्तर पर परिवर्तन की आवश्यकता:

भागवत जी ने कहा कि परिवर्तन का आरंभ व्यक्तिगत स्तर से होना चाहिए। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने घरों में छोटे-छोटे बदलाव करें, जैसे पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना और प्लास्टिक का कम से कम उपयोग करना। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि बड़े बदलाव छोटे-छोटे कदमों से ही संभव हैं।

आज के समय में, जब ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ रहा है, भागवत जी ने इसके प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज के प्रमुख व्यक्तियों को ध्यान रखना चाहिए कि उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला संदेश समाज में भद्रता और संस्कार को बनाए रखे।

मोहन भागवत जी का विजयादशमी भाषण भारतीय समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने चारित्रिक बल, सामाजिक एकता, और राष्ट्र निर्माण के महत्व को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उनका स्पष्ट संदेश है कि समाज नैतिक और चारित्रिक रूप से मजबूत होने पर ही प्रगति स्थायी होगी। हमें अपने समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर से प्रेरणा लेकर एकजुट होना होगा। भौतिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ नैतिकता, निष्ठा, और चारित्रिक बल भी आवश्यक हैं। भागवत जी ने सामाजिक समरसता, जातिगत नेतृत्व, और पर्यावरणीय चिंताओं पर जोर देते हुए बताया कि एक मजबूत नागरिक चरित्र ही एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करेगा। भारत की महानता उसकी विविधता में निहित है। मित्रता और सहयोग का भाव रखते हुए हम एक सफल राष्ट्र की ओर बढ़ सकते हैं। यह भाषण हमें प्रेरित करता है कि छोटे-छोटे प्रयासों से बड़े परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाएं।

हमें व्यक्तिगत प्रगति के साथ-साथ समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए भी योगदान देना चाहिए। एकता में शक्ति है, और सभी जातियाँ, पंथ, और वर्ग मिलकर सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। भागवत जी का संदेश हमें याद दिलाता है कि समाज को एक नए आयाम की ओर ले जाना हमारे कर्तव्यों में शामिल है, ताकि हम एक ऐसा भारत बना सकें जो मानवता के लिए एक उदाहरण बने।

लेखक: शिवेश प्रताप एक लोकनीति विश्लेषक एवं संघ अध्येता हैं

प.पू. डॉ एम. भागवत के बौद्धिक का विश्लेषण

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डॉ. आदित्य

आज सरसंघचालकडॉ मोहन राव भागवत जी ने विजयादशमी पर अपना उद्बोधन दिया। यह उद्बोधन काफी सामान्य श्रेणी का था। संघ कभी अराजक बौद्धिक नहीं करता । यहां साधारण  लहजे में की जाने वाली बातों को भी बौद्धिक ही कहा जाता है। हम प्रत्येक से पू. गोलवलकर वाली उम्मीद नहीं कर सकते। उनका बौद्धिक सामान्य सोसल मीडिया कंटेंट की तरह प्रतीत हो रहा है।  डॉ भागवत ऐसी ही बातें करते हैं। विजयादशमी के बौद्धिक में कोई कोडीफाइड ज्ञान या संकेत नहीं है। संघ बोलने में कमजोर है या यूं कहें कि संगठन को डिसलेक्सिया है।

संघ का विकास ही ऐसा हुआ है। संघ बहुत व्यवहारिक संस्था है। ये बोलने से ज्यादा करने में विश्वास करता है। संघ के राष्ट्र की परिकल्पना के लिये लाखों प्रचारकों ने अपना जीवन लगा दिया है। लाखों मतलब लाखों। प्रचारक बन जाने के कारण कई घर सूने हो गए । संघ की सबसे बड़ी उपलब्धि भाजपा है।

संघ पहले राजनीतिक शक्ति से ज्यादा सामाजिक शक्ति में भरोसा करता था। चूंकि स्वत्रंतर्योत्तर भारतीय समाज कायर है अतः संघ, सामाजिक शक्ति से ज्यादा राजनीतिक शक्ति में निवेश करने लगा। हरियाणा चुनाव में ऐसा लग रहा था कि भाजपा हार जाएगी। लेकिन संघ ने जीजान लगाकर भाजपा को जितवा दिया। 

संघ से बेहतर राजनीतिक सलाह देने वाली आजतक कोई संस्था ही नहीं है। भारत में लोकतंत्र अध्ययन के लिये बड़ी बड़ी संस्थाएं हैं। अशोक यूनिवर्सिटी, ADR, CSDS etc लेकिन ये राजनीति को संघ से बेहतर नहीं समझ सकते। आज डॉ भागवत ने कल्चरल मार्क्सवाद, डीप स्टेट और वोकइज्म शब्द का इस्तेमाल किया।

वस्तुतः लगभग 6 दशक पूर्व ही सांस्कृतिक मार्क्सवाद का देहांत हो चुका है। इस विषय पर आज चर्चा करना हास्यास्पद है, ऐसा लगता है संघ इस जिन्न को पोटली से बाहर निकालना चाहता है।भारत वोकइज्म का विश्व बाप है, भारत से ज्यादा वोक इस दुनियां में पैदा ही नहीं हुए। महात्मा बुद्ध से लेकर मक्कली गोशला सब वोक ही तो थे ! और आज से लगभग 300 ईसापूर्व (?) चाणक्य ने डीप स्टेट के विषय में भरपूर बोला, समझाया और उदाहरण प्रस्तुत करके गए। 

इसलिये ये सब कोई नई बातें नहीं हैं। पूरब की बातें जब पश्चिम से घूम कर आती है तो नया और क्रांतिकारी विचार लगने लगता है। कुल मिलाकर आज का प्रबोधन हर बार की तरह समाधान मूलक ना होकर बस समस्या और विफलता मूलक था। 

संपूर्ण क्रांति के महानायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 122 वीं जयंती समारोह मनाई गई

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दिल्ली। दिनांक 11 अक्टूबर 2024 को लोकनायक जयप्रकाश अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विकास केंद्र एवं राष्ट्रीय संगत पंगत के संयुक्त तत्वावधान में जेपी स्मृति पार्क , बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग , पर नई दिल्ली में भारत के महान् स्वतंत्रता सेनानी एवं संपूर्ण क्रांति के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 121 बी जयंती समारोह वृहत स्तर पर मनाई गई। इस कार्यकर्म को मुख्य अतिथि के रूप में भारत सरकार के केंद्रीय शहरी विकास मंत्री माननीय श्री मनोहर लाल खट्टर ने जेपी की भव्य प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित किया। इस अवसर पर उन्होंने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण समाज के सभी वर्गों के हिमायती थे, उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक है , जितना उस समय थे। जेपी एक अकेले ऐसे राजनेता थे जिन्होंने कभी भी पद प्रतिष्ठा की लालसा नहीं की और देश की आजादी और आजाद भारत में सरकार की तानाशाही के खिलाफ रहे और भारत में लोकशाही की स्थापना की।

श्री मनोहर लाल खट्टर ने जेपी स्मृति पार्क के रख रखाव पर उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित करते हुए यह भी आश्वासन दिया कि संस्था एक समिति बनाकर केन्द्र सरकार को पहल करे तो इस जेपी स्मृति उद्यान का रख रखाव एवं पर्यटन स्थल के रुप विकसित किया जाएगा।

इसके पूर्व लोकनायक जयप्रकाश अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विकास केंद्र के राष्ट्रीय महासचिव अभय सिन्हा ने बताया कि भारत की राजधानी दिल्ली में पिछले 24 वर्षों से संस्था 11 अक्टूबर को जेपी जयंती समारोह , 5 जून को संपूर्ण क्रांति दिवस , 8 अप्रैल को जेपी आंदोलन दिवस एवं 8 अगस्त को अगस्त क्रान्ति दिवस का आयोजन लगातार किया गया है। श्री सिन्हा ने आज के नौजवानों से अपील किया की आज भी जेपी की संपूर्ण क्रांति की विचारधारा लोगों के मन में जीवित है , इस आन्दोलन को धार देने के लिए आप आगे आएं। उन्होंने कार्यकर्म में आए सभी लोगों के प्रति ह्रदय से आभार व्यक्त किया।

कार्यकर्म के अध्यक्ष पूर्व सांसद राज्यसभा एवं राष्ट्रीय संगत पंगत के संस्थापक श्री आर के सिन्हा ने कहा कि जेपी देश के ऐसे महान् नेता रहे जो कभी भी किसी विधान सभा या लोकसभा में नहीं गए लेकिन राजनीति में उनका कद इतना बड़ा था की जब उस समय देश की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जब देश में आपातकाल लागू की तो जेपी ने पूरे देश में भ्रमण कर लोकशक्ति को इकट्ठा कर एक ऐसा माहौल बनाया जो कालांतर में इंदिरा गांधी को घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ा और अन्ततः लोकशाही की जीत हुई।

इस सभा को प्रख्यात पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष पदमश्री राम बहादुर राय , देश के जाने माने पत्रकार एवं लेखक श्री सुधांशु रंजन , अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अध्यक्ष एवं पूर्व आई आर एस अधिकारी डॉ. अनुप श्रीवास्तव , भारत तिब्बत समन्वय केन्द्र के दलाई लामा के प्रसिद्ध अनुनायी आचार्य फैंस्टोक , सुप्रीम कोर्ट के गवर्नमेंट काउंसिल डॉ. ए पी सिंह , भोजपुरी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक श्रीवास्तव , राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के अध्यक्ष श्री मयंक श्रीवास्तव , अखिल भारतीय सेवा दल के अध्यक्ष श्री राम नगीना सिंह , आर्ट एंड कल्चरल ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ शूल पाणी सिंह, राष्ट्रीय संगत पंगत के श्री अनुरंजन श्रीवास्तव ने कार्यकम को संबोधित किया। इसके पूर्व कथक गुरु नृत्यांगना श्रीमति प्रभा दूबे और उनकी शिष्या के द्वारा संस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। जबकि कार्यकर्म का संचालन श्रीमती रंजीता श्रीवास्तव ने किया और धन्यवाद ज्ञापन संगत पंगत की श्रीमती रत्ना सिन्हा ने किया। इस कार्यकर्म में दिल्ली एवं एनसीआर से भारी संख्या में लोग शामिल हुए।

प. पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहन जी भागवत द्वारा विजयादशमी उत्सव के अवसर पर दिये उद्बोधन का सारांश

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(आश्विन शुद्ध दशमी, शनिवार दि. 12 अक्तूबर 2024)
श्री विजयादशमी युगाब्द 5126)

आज के कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. कोपिल्लिल राधाकृष्णन जी, मंच पर उपस्थित विदर्भ प्रांत के मा. संघचालक, मा. सह संघचालक, नागपुर महानगर के मा. संघचालक, अन्य अधिकारी गण, नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु ।

श्री विजयादशमी युगाब्द 5126 के पुण्यपर्व पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने कार्य के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।

पुण्य स्मरण

पिछले वर्ष इसी पर्व पर हमने महारानी दुर्गावती के तेजस्वी जीवन यज्ञ का उनकी जन्मजयंती के 500वें वर्ष के निमित्त स्मरण किया था। इस वर्ष पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होलकर जी की 300वीं जन्मशती का वर्ष मनाया जा रहा है। देवी अहिल्याबाई एक कुशल राज्य प्रशासक, प्रजाहितदक्ष कर्तव्यपरायण शासक, धर्म संस्कृति व देश की अभिमानी, शीलसंपन्नता का उत्तम आदर्श तथा रण – नीति की उत्कृष्ट समझ रखने वाली राज्यकर्ता थी। अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी अद्भुत क्षमता का परिचय देते हुए घर को, राज्य को; स्वयं की अखिल भारतीय दृष्टि के कारण अपनी राज्य सीमा के बाहर भी, तीर्थ क्षेत्रों के जीर्णोद्धार व देवस्थानों के निर्माण द्वारा समाज के सामरस्य को तथा समाज में संस्कृति को उन्होंने जिस तरह सम्भाला वह आज के समय में भी मातृशक्ति सहित हम सब के लिए अनुकरणीय उदाहरण है। साथ ही यह भारत की मातृशक्ति के कर्तृत्व व नेतृत्व की दैदीप्यमान परंपरा का उज्ज्वल प्रतीक भी है।

आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी की 200वीं जन्म जयन्ती का भी यही वर्ष है। पराधीनता से मुक्त होकर काल के प्रवाह में आचार धर्म व सामाजिक रीति-रिवाजों में आयी विकृतियों को दूर कर, समाज को अपने मूल के शाश्वत मूल्यों पर खड़ा करने का प्रचंड उद्यम उन्होंने किया। भारत वर्ष के नवोत्थान की प्रेरक शक्तियों में उनका नाम प्रमुख है। रामराज्य सदृश ऐसा वातावरण निर्माण होने के लिए प्रजा की गुणवत्ता व चारित्र्य तथा स्वधर्म पर दृढ़ता जैसी होना अनिवार्य है, वैसा संस्कार व दायित्वबोध सब में उत्पन्न करने वाला “सत्संग” अभियान परमपूज्य श्री श्री अनुकूलचन्द्र ठाकुर के द्वारा प्रवर्तित किया गया था। आज के बांग्लादेश तथा उस समय के उत्तर बंगाल के पाबना में जन्मे श्री श्री अनुकूलचन्द्र ठाकुर जी होमियोपैथी चिकित्सक थे तथा स्वयं की माता जी के द्वारा ही अध्यात्म साधना में दीक्षित थे। व्यक्तिगत समस्याओं को लेकर उनके सम्पर्क में आने वाले लोगों में सहज रूप से चरित्र विकास तथा सेवा भावना के विकास की प्रक्रिया ही ‘सत्संग’ बनी, जिसे ईस्वी सन् 1925 में धर्मार्थ संस्था के रूप में पंजीकृत किया गया। 2024 से 2025 ‘सत्संग’ के मुख्यालय देवघर (झारखंड) में उस कर्मधारा की भी शताब्दी मनने वाली है। सेवा, संस्कार तथा विकास के अनेक उपक्रमों को लेकर यह अभियान आगे बढ़ रहा है।

आगामी 15 नवम्बर से भगवान बिरसा मुंडा की जन्मजयंती का 150वां वर्ष प्रारंभ होगा। यह सार्धशती हमें, जनजातीय बंधुओं की गुलामी तथा शोषण से, स्वदेश पर विदेशी वर्चस्व से मुक्ति, अस्तित्व व अस्मिता की रक्षा एवं स्वधर्म रक्षा के लिए भगवान बिरसा मुंडा के द्वारा प्रवर्तित उलगुलान की प्रेरणा का स्मरण करा देगी। भगवान बिरसा मुंडा के तेजस्वी जीवनयज्ञ के कारण ही अपने जनजातीय बंधुओं के स्वाभिमान, विकास तथा राष्ट्रीय जीवन में योगदान के लिए एक सुदृढ़ आधार मिल गया है।

व्यक्तिगत_व_राष्ट्रीय_चारित्र्य

प्रामाणिकता से, निःस्वार्थ भावना से देश, धर्म, संस्कृति व समाज के हित में जीवन लगा देने वाले ऐसी विभूतियों को हम इसलिए स्मरण करते हैं कि उन्होंने हम सब के हित में कार्य तो किया है ही, अपितु अपने स्वयं के जीवन से हमारे लिए अनुकरणीय जीवन व्यवहार का उत्तम उदाहरण उपस्थित किया है। अलग-अलग कालखंडों में, अलग-अलग कार्यक्षेत्रों में कार्य करने वाले इन सबके जीवन व्यवहार की कुछ समान बातें थीं। निस्पृहता, निर्वैरता व निर्भयता उनका स्वभाव था। संघर्ष का कर्तव्य जब-जब उपस्थित हुआ, तब-तब पूर्ण शक्ति के साथ, आवश्यक कठोरता बरतते हुए उन्होंने उसे निभाया। परंतु वे कभी भी द्वेष या शत्रुता पालने वाले नहीं बने। उज्ज्वल शीलसंपन्नता उनके जीवन की पहचान थी। इस लिए उनकी उपस्थिति दुर्जनों के लिए धाक व सज्जनों को आश्वस्त करने वाली थी। हम सभी से आज इसी प्रकार के जीवन व्यवहार की अपेक्षा परिस्थिति कर रही है। परिस्थिति अनुकूल हो या प्रतिकूल, व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चारित्र्य की ऐसी दृढ़ता ही मांगल्य व सज्जनता की विजय के लिए शक्ति का आधार बनती है।

देश_की_आगे_कूच (देश के बढ़ते कदम)

आज का युग मानव जाति की द्रुतगति से भौतिक प्रगति का युग है। विज्ञान व तकनीकी के सहारे जीवन को हमने सुविधाओं से परिपूर्ण बनाया है। परन्तु दूसरी ओर हमारे अपने स्वार्थों के कल 6ह हमें विनाश की ओर धकेल रहे हैं। मध्यपूर्व में इस्राएल के साथ हमास का छिड़ा हुआ संघर्ष अब कहां तक फैलेगा यह चिंता सबके सामने उपस्थित है। अपने देश में भी परिस्थितियों में आशा आकांक्षाओं के साथ चुनौतियां व समस्याएं भी विद्यमान हैं। परम्परा से संघ के इस विजयादशमी भाषण में इन दोनों की यथासंभव विस्तृत चर्चा की जाती है। परन्तु आज मैं केवल कुछ चुनौतियों की चर्चा करूंगा। क्योंकि आशा आकांक्षाओं की पूर्ति की ओर जो गति देश ने पकड़ी है, वह जारी रहेगी। यह सभी अनुभव करते हैं कि गत वर्षों में भारत एक राष्ट्र के तौर पर विश्व में सशक्त और प्रतिष्ठित हुआ है। विश्व में उसकी साख बढ़ी है। स्वाभाविक ही कई क्षेत्रों में हमारी परम्परा तथा भावना में अन्तर्निहित विचारों का सम्मान बढ़ा है। हमारी विश्वबंधुत्व की भावना पर्यावरण के प्रति हमारी दृष्टि की स्वीकृति, योग इत्यादि को विश्व निःसंकोच स्वीकार कर रहा है। समाज में विशेषकर युवा पीढ़ी में स्व का गौरव बोध बढ़ते जा रहा है। कई क्षेत्रों में हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते जा रहे हैं। जम्मू कश्मीर सहित सब चुनाव भी शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गए हैं। देश की युवा शक्ति, मातृशक्ति, उद्यमी, किसान, श्रमिक, जवान, प्रशासन, शासन सभी, प्रतिबद्धता पूर्वक अपने अपने कार्य में डटे रहेंगे, यह विश्वास है। गत वर्षों में देशहित की प्रेरणा से इन सबके द्वारा किए गए पुरुषार्थ से ही विश्वपटल पर भारत की छवि, शक्ति, कीर्ति व स्थान निरन्तर उन्नत हो रहा है। परन्तु हम सबके इस कृतनिश्चय की मानो परीक्षा लेने कुछ मायावी षड्यंत्र हमारे सामने उपस्थित हुए हैं, जिन्हें ठीक से समझना आवश्यक है। अपने देश के वर्तमान परिदृश्य पर एक नजर डालते हैं तो ऐसी चुनौतियां स्पष्ट रूप से हमारे सामने दिखाई देती हैं। देश के चारों तरफ के क्षेत्रों को अशांत व अस्थिर करने के प्रयास गति पकड़ते हुए दिखाई देते हैं।

देश विरोधी कुप्रयास

विश्व में भारत के प्रमुखत्व पाने से, जिनके निहित स्वार्थ मार खाते हैं, ऐसी शक्तियां भारत को एक मर्यादा के अंदर ही बढ़ने देना चाहेंगी, यह अपेक्षाकृत ही हो रहा है। अपने आप को उदार, जनतांत्रिक स्वभाव के तथा विश्वशांति के लिए कटिबद्ध बताने वाले देशों की यह कटिबद्धता उनकी सुरक्षा व स्वार्थों का प्रश्न आते ही अंतर्धान हो जाती है। तब दूसरे देशों पर आक्रमण करने में अथवा जनतांत्रिक पद्धति से चुनी गई वहां की सरकारों को अवैध अथवा हिंसक तरीकों से उलट देने से वे चूकते नहीं हैं। भारत के अंदर व बाहर विश्व में जो घटनाक्रम चलता है, उस पर गौर करने से यह बातें सभी समझ सकते हैं। भारत की छवि को मलिन करने का हेतु पुरस्सर प्रयास, असत्य अथवा अर्धसत्य के आधार पर चलता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है।

अभी-अभी बांग्लादेश में जो हिंसक तख्तापलट हुआ, उसके तात्कालिक व स्थानीय कारण उस घटनाक्रम का एक पहलू है। परन्तु तद्देशीय हिन्दू समाज पर अकारण नृशंस अत्याचारों की परंपरा को फिर से दोहराया गया। उन अत्याचारों के विरोध में वहां का हिन्दू समाज इस बार संगठित होकर स्वयं के बचाव में घर के बाहर आया, इसलिए थोड़ा बचाव हुआ। परन्तु यह अत्याचारी कट्टरपंथी स्वभाव जब तक वहां विद्यमान है, तब तक वहां के हिन्दुओं सहित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के सिर पर खतरे की तलवार लटकी रहेगी। इसीलिए उस देश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ व उसके कारण उत्पन्न जनसंख्या असंतुलन देश में सामान्य जनों में भी गंभीर चिंता का विषय बना है। देश में आपसी सद्भाव व देश की सुरक्षा पर भी इस अवैध घुसपैठ के कारण प्रश्न चिन्ह लगते हैं। उदारता, मानवता, तथा सद्भावना के पक्षधर सभी के, विशेष कर भारत सरकार तथा विश्वभर के हिन्दुओं की सहायता की बांग्लादेश में अल्पसंख्यक बने हिन्दू समाज को आवश्यकता रहेगी। असंगठित रहना व दुर्बल रहना यह दुष्टों के द्वारा अत्याचारों को निमंत्रण देना है, यह पाठ भी विश्व भर के हिन्दू समाज को ग्रहण करना चाहिए। परन्तु बात यहां रुकती नहीं। अब वहां भारत से बचने के लिए पाकिस्तान से मिलने की बात हो रही है। ऐसे विमर्श खड़े कर व स्थापित कर कौन से देश भारत पर दबाव बनाना चाहते हैं, इसको बताने की आवश्यकता नहीं है। इसके उपाय यह शासन का विषय है। परंतु समाज के लिए सर्वाधिक चिन्ता की बात यह है कि समाज में विद्यमान भद्रता व संस्कार को नष्ट-भ्रष्ट करने के, विविधता को अलगाव में बदलने के, समस्याओं से पीड़ित समूहों में

व्यवस्था के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न करने के तथा असन्तोष को अराजकता में रूपांतरित करने के प्रयास बढ़े हैं। ‘डीप स्टेट’, ‘वोकिज़म’, ‘कल्चरल मार्क्सिस्ट’, ऐसे शब्द आजकल चर्चा में हैं। वास्तव में ये सभी सांस्कृतिक परम्पराओं के घोषित शत्रु हैं। सांस्कृतिक मूल्यों, परम्पराओं तथा जहां जहां जो भी भद्र, मंगल माना जाता है, उसका समूल उच्छेद इस समूह की कार्यप्रणाली का ही अंग है। समाज मन बनाने वाले तंत्र व संस्थानों को उदा. शिक्षा तंत्र व शिक्षा संस्थान, संवाद माध्यम, बौद्धिक संवाद आदि अपने प्रभाव में लाना, उनके द्वारा समाज का विचार, संस्कार, तथा आस्था को नष्ट करना, यह इस कार्यप्रणाली का प्रथम चरण होता है। एक-साथ रहने वाले समाज में किसी घटक को उसकी कोई वास्तविक या कृत्रिम रीति से उत्पन्न की गई विशिष्टता, मांग, आवश्यकता अथवा समस्या के आधार पर अलगाव के लिए प्रेरित किया जाता है। उनमें अन्यायग्रस्तता की भावना उत्पन्न की जाती है। असंतोष को हवा देकर उस घटक को शेष समाज से अलग, व्यवस्था के विरुद्ध, उग्र बनाया जाता है। समाज में टकराव की सम्भावनाओं को (fault lines) ढूंढ कर प्रत्यक्ष टकराव खड़े किए जाते हैं। व्यवस्था, कानून, शासन, प्रशासन आदि के प्रति अश्रद्धा व द्वेष को उग्र बना कर अराजकता व भय का वातावरण खड़ा किया जाता है। इससे उस देश पर अपना वर्चस्व स्थापित करना सरल हो जाता है।

बहुदलीय प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली में सत्ता प्राप्त करने हेतु दलों की स्पर्धा चलती है। अगर समाज में विद्यमान छोटे स्वार्थ, परस्पर सद्भावना अथवा राष्ट्र की एकता व अखंडता से अधिक महत्वपूर्ण हो गए; अथवा दलों की स्पर्धा में समाज की सद्भावना व राष्ट्र का गौरव व एकात्मता गौण माने गए, तो ऐसी दलीय राजनीति में एक पक्ष की सहायता में खड़े होकर पर्यायी राजनीति के नाम पर अपनी उच्छेदक कार्यसूची को आगे बढ़ाना इनकी कार्यपद्धति है। यह कपोल कल्पित कहानी नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों पर बीती हुई वास्तविकता है। पाश्चात्य जगत के प्रगत देशों में इस मंत्रविप्लव के परिणाम स्वरूप जीवन की स्थिरता, शांति व मांगल्य संकट में पड़ा हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देता है। तथाकथित “अरब स्प्रिंग” से लेकर अभी-अभी पड़ोस के बांग्लादेश में जो घटित हुआ, वहां तक इस पद्धति को काम करते हुए हमने देखा है। भारत के चारों ओर के विशेषतः सीमावर्ती तथा जनजातीय जनसंख्या वाले प्रदेशों में इसी प्रकार के कुप्रयासों को हम देख रहे हैं।

सांस्कृतिक एकात्मता एवं श्रेष्ठ सभ्यता की सुदृढ़ आधारशिला पर अपना राष्ट्र जीवन खड़ा है। अपना सामाजिक जीवन उदात्त जीवन मूल्यों से प्रेरित एवं पोषित है। अपने ऐसे राष्ट्र जीवन को क्षति पहुँचाने के अथवा नष्ट करने के उपरोक्त कुप्रयासों को समय पूर्व ही रोकना आवश्यक है। इस हेतु जागरूक समाज को ही प्रयत्न करना पड़ेगा। इसके लिए अपने संस्कृतिजन्य जीवन दर्शन तथा संविधान प्रदत्त मार्ग से लोकतंत्रीय योजना बनानी चाहिए। एक सशक्त विमर्श खड़ा करते हुए, वैचारिक एवं सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने वाले इन षड्यंत्रों से समाज को सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है।

संस्कार_क्षरण_के_दुष्परिणाम

विभिन्न तंत्रों तथा संस्थानों के द्वारा कराए गए विकृत प्रचार व कुसंस्कार भारत में, विशेषतः नयी पीढ़ी के मन-वचन-कर्मों को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। बड़ों के साथ बच्चों के हाथों में भी चल दूरभाष पहुंच गया है, वहां क्या दिखा रहे हैं और बच्चे क्या देख रहे हैं, इस पर नियंत्रण नहीं के बराबर है। उस सामग्री का उल्लेख करना भी भद्रता का उल्लंघन होगा, इतनी वह वीभत्स है। अपने-अपने घर परिवारों में हमारे तथा समाज में विज्ञापनों तथा विकृत दृक्श्राव्य सामग्री पर कानून के नियंत्रण की त्वरित आवश्यकता प्रतीत होती है। युवा पीढ़ी में जंगल में आग की तरह फैलने वाली नशीले पदार्थों की आदत भी समाज को अंदर से खोखला कर रही है। अच्छाई की ओर ले जाने वाले संस्कार पुनर्जीवित करने होंगे।

संस्कार क्षय का ही यह परिणाम है कि “मातृवत् परदारेषु” के आचरण की मान्यता वाले हमारे देश में बलात्कार जैसी घटनाओं का मातृशक्ति को कई जगह सामना करना पड़ रहा है। कोलकाता के आर.जी. कर अस्पताल में घटी घटना सारे समाज को कलंकित करने वाली लज्जाजनक घटनाओं में एक है। उसके निषेध तथा त्वरित व संवेदनशील कार्यवाही की मांग को लेकर चिकित्सक बंधुओं के साथ सारा समाज तो खड़ा हुआ। परन्तु ऐसा जघन्य पाप घटने पर भी, कुछ लोगों के द्वारा जिस प्रकार अपराधियों को संरक्षण देने के घृणास्पद प्रयास हुए, यह सब अपराध, राजनीति तथा अपसंस्कृति का गठबंधन हमें किस तरह बिगाड़ रहा है, यह दिखाता है। महिलाओं की ओर देखने की हमारी दृष्टि “मातृवत् परदारेषु” हमारी सांस्कृतिक देन है जो हमें हमारी संस्कार परम्परा से प्राप्त होती है। परिवारों में, तथा समाज जिन से मनोरंजन के साथ ही जाने-अनजाने प्रबोधन भी प्राप्त कर रहा है,

उन माध्यमों में इस का भान न रहना, इन मूल्यों की उपेक्षा या तिरस्कार होना बहुत महंगा पड़ रहा है। हमें परिवार, समाज तथा संवाद माध्यमों के द्वारा इन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रबोधन की व्यवस्था को फिर से जागृत करना होगा।

शक्ति_का_महत्व

आज भारत में सर्वत्र संस्कारों के क्षरण व विभेदकारी तत्वों के समाज को तोड़ने के खेलों की परिस्थिति दिखाई देती है। सामान्य समाज को जाति, भाषा, प्रान्त आदि छोटी विशेषताओं के आधार पर अलग कर टकराव उत्पन्न करने का प्रयास चला है। छोटे स्वार्थ व छोटी पहचानों में उलझकर सर पर मंडराते सबको खाने वाले संकट को बहुत देर होते तक समाज समझ न सके, यह व्यवस्था की जा रही है। इसके चलते आज देश की वायव्य सीमा से लगे पंजाब, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख; समुद्री सीमा पर स्थित केरल, तमिलनाडु, तथा बिहार से मणिपुर तक का सम्पूर्ण पूर्वांचल अस्वस्थ है। इस भाषण में पूर्व में उल्लेखित सारी परिस्थिति इन सब प्रदेशों में भी उपस्थित है।

देश में बिना कारण कट्टरपन को उकसाने वाली घटनाओं में भी अचानक वृद्धि हुई दिख रही है। परिस्थिति या नीतियों को लेकर मन में असंतुष्टि हो सकती है, परन्तु उसको व्यक्त करने के और उनका विरोध करने के प्रजातांत्रिक मार्ग होते हैं। उनका अवलंबन न करते हुए हिंसा पर उतर आना, समाज के एकाध विशिष्ट वर्ग पर आक्रमण करना, बिना कारण हिंसा पर उतारू होना, भय पैदा करने का प्रयास करना, यह तो गुंडागर्दी है। इसको उकसाने के प्रयास होते हैं अथवा योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है, ऐसे आचरण को पूज्य डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर जी ने अराजकता का व्याकरण (‘Grammar of Anarchy’) कहा है। अभी बीत गए गणेशोत्सवों के समय श्री गणपति विसर्जन की शोभायात्राओं पर अकारण पथराव की तथा तदोपरान्त बनी तनावपूर्ण परिस्थिति की घटनाएं उसी व्याकरण का उदाहरण हैं। ऐसी घटनाओं को होने नहीं देना, वो होती हैं तो तुरंत नियंत्रित करना, उपद्रवियों को त्वरित दण्डित करना, यह प्रशासन का काम है। परन्तु उनके पहुँचने तक तो समाज को ही अपने तथा अपनों के प्राणों की व सम्पत्ति की रक्षा करनी पड़ती है। इसलिए समाज में भी सदैव पूर्ण सतर्क व सन्नद्ध रहने की तथा इन कुप्रवृत्तियों को, उन्हें प्रश्रय देने वालों को पहचानने की आवश्यकता उत्पन्न हो गयी है।

परिस्थिति का उपरोक्त वर्णन यह डरने, डराने या लड़ाने के लिए नहीं है। ऐसी परिस्थिति विद्यमान है, यह हम सब अनुभव कर रहे हैं। साथ में इस देश को एकात्म, सुख शान्तिमय, समृद्ध व बल संपन्न बनाना यह सबकी इच्छा है, सबका कर्तव्य भी है। इसमें हिन्दू समाज की जिम्मेवारी अधिक है। इसलिए समाज की एक विशिष्ठ प्रकार की स्थिति, सजगता तथा एक विशिष्ट दिशा में मिलकर प्रयासों की आवश्यकता है। समाज स्वयं जगता है, अपने भाग्य को अपने पुरुषार्थ से लिखता है तब महापुरुष, संगठन, संस्थाएं, प्रशासन, शासन आदि सब सहायक होते हैं। शरीर की स्वस्थ अवस्था में क्षरण पहले आता है, बाद में रोग उसको घेरते हैं। दुर्बलों की परवाह देव भी नहीं करते, ऐसा एक सुभाषित प्रसिद्ध है।

अश्वं नैव गजं नैव, व्याघ्रं नैव च नैव च।
अजापुत्रं बलिं दद्यात्, देवो दुर्बल घातकः।।

इसीलिए शताब्दी वर्ष के पूरे होने के पश्चात समाज में कुछ विषय लेकर सभी सज्जनों को सक्रिय करने का विचार संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं।

समरसता_व_सद्भावना

समाज की स्वस्थ व सबल स्थिति की पहली शर्त है सामाजिक समरसता तथा समाज के विभिन्न वर्गों में परस्पर सद्भाव। कुछ संकेतात्मक कार्यक्रम मात्र करने से यह कार्य संपन्न नहीं होता है। समाज के सभी वर्गों व स्तरों में व्यक्ति की व कुटुम्बों की मित्रता होनी चाहिए। यह पहल हम सभी को व्यक्तिगत तथा पारिवारिक स्तर से करनी होगी। परस्परों के पर्व प्रसंगों में सभी की सहभागिता होकर वे पूरे समाज के पर्व प्रसंग बनने चाहिए। सार्वजनिक उपयोग व श्रद्धा के स्थल यथा मंदिर, पानी, श्मशान आदि में समाज के सभी वर्गों को सहभागी होने का वातावरण चाहिए। परिस्थिति के कारण समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताएं सभी वर्गों को समझ में आनी चाहिए। जैसे कुटुंब में समर्थ घटक दुर्बल घटकों के लिए अधिक प्रावधान, कभी कभी अपना नुकसान सहन करके भी करते हैं, वैसे अपनेपन की दृष्टि रखकर ऐसी आवश्यकताओं का विचार होना चाहिए।

समाज में अनेक जाति वर्गों का संचालन करने वाली उनकी अपनी-अपनी रचनाएँ, संस्थाएं भी हैं। अपने अपने जाति वर्ग की उन्नति का, सुधार का तथा उनके हित प्रबोधन का विचार इन रचनाओं के नेतृत्व के द्वारा किया जाता है। जाति बिरादरी के नेतृत्व करने वाले लोग मिल बैठ कर और दो विषयों का विचार नित्य करेंगे तो समाज में सर्वत्र सद्भावनापूर्ण व्यवहार का वातावरण बनेगा। समाज को बांटने का कोई कुचक्र सफल हो नहीं सकेगा। पहला विषय है कि हम सब अलग अलग जाति वर्ग मिलकर देश हित की, अपने कार्यक्षेत्र के सम्पूर्ण

समाज के हित की कौन-कौन सी बातें करा सकते हैं, योजना बनाकर उनको परिणाम तक ले जा सकते हैं। ऐसे ही दूसरा विषय है कि हम सब मिलकर, हममें जो दुर्बल जाति अथवा वर्ग है, उनके हित साधन के लिए क्या कर सकते हैं? नियमित क्रम से ऐसा विचार एवं कृति होती रही तो समाज स्वस्थ भी बनेगा व सद्भाव का वातावरण भी बनेगा।

पर्यावरण

चारों ओर के वातावरण में एक विश्वव्यापी समस्या, जिसका अनुभव हाल के वर्षों में अपने देश में भी हो रहा है, वह है पर्यावरण की दुःस्थिति। ऋतुचक्र अनियमित व उग्र बन गया है। उपभोगवादी तथा जड़वादी अधूरे वैचारिक आधार पर चली मानव की तथाकथित विकास यात्रा मानवों सहित सम्पूर्ण सृष्टि की विनाश यात्रा लगभग बन गयी है। अपने भारतवर्ष की परम्परा से प्राप्त सम्पूर्ण, समग्र व एकात्म दृष्टि के आधार पर हमने अपने विकास पथ को बनाना चाहिए था, परन्तु हमने ऐसा नहीं किया। अभी इस प्रकार का विचार थोड़ा थोड़ा सुनाई दे रहा है, परन्तु ऊपरी तौर पर कुछ बातें स्वीकार हुई हैं, कुछ बातों का परिवर्तन हुआ है। इससे अधिक काम नहीं हुआ है। विकास के बहाने विनाश की ओर ले जाने वाले अधूरे विकास पथ के अन्धानुसरण के परिणाम हम भी भुगत रहे हैं। गर्मी की ऋतु झुलसा देती है, वर्षा बहा कर ले जाती है और शीत ऋतु जीवन को जड़वत् जमा देती है। ऋतुओं की यह विक्षिप्त तीव्रता हम अनुभव कर रहे हैं। जंगल काटने से हरियाली नष्ट हो गयी, नदियाँ सूख गयीं, रसायनों ने हमारे अन्न, जल, वायु व धरती तक को विषाक्त कर दिया, पर्वत ढहने लगे, भूमि फटने लगी, यह सारे अनुभव पिछले कुछ वर्षों में देश भर में हम अनुभव कर रहे हैं। अपने वैचारिक आधार पर, इस सारे नुकसान को पूरा कर हमको धारणाक्षम, समग्र व एकात्म विकास देने वाला हमारा पथ हम निर्माण करें, इसका कोई पर्याय नहीं है। सम्पूर्ण देश में इसकी समान वैचारिक भूमिका बने व देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए क्रियान्वयन का विकेन्द्रित विचार हो, तब यह संभव है। परन्तु हम सामान्य लोग अपने घर से तीन छोटी छोटी सरल बातों का आचरण करते हुए प्रारम्भ कर सकते हैं। पहली बात है जल का न्यूनतम आवश्यक उपयोग तथा वर्षा जल का संधारण। दूसरी बात है – प्लास्टिक वस्तुओं का उपयोग नहीं करना। जिसको अंग्रेजी में single use plastic कहते हैं, उसका उपयोग पूर्णतः वर्जित करना। तीसरी बात अपने घर से लेकर बाहर भी हरियाली बढ़े, वृक्ष लगें, अपने जंगलों के और परम्परा से लगाए जाने वाले वृक्ष सर्वत्र खड़े हों, इसकी चिंता करना। पर्यावरण के सम्बन्ध में नीतिगत प्रश्नों का समाधान होने के लिए समय लगेगा, परन्तु यह सहज कृति अपने घर से हम त्वरित प्रारम्भ कर सकते हैं।

संस्कार_जागरण

जहां तक संस्कारों के क्षरण का प्रश्न है, तीन स्थानों पर जहां से संस्कार मिलते हैं, संस्कार प्रदान की व्यवस्था को पुनर्स्थापित व समर्थ, सक्षम करना पड़ेगा। शिक्षा पद्धति पेट भरने की शिक्षा देने के साथ साथ छात्रों के व्यक्तित्व विकास का भी काम करती है। अपने देश के सांस्कृतिक मूल्य सारांश में बताने वाला एक सुभाषित है –

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् । आत्मवत् सर्व भूतेषु यः पश्यति सः पंडित

महिलाओं को माता समान देखने की दृष्टि, पराया धन मिट्टी समान मानते हुए स्वयं के परिश्रम से व सन्मार्ग से ही धनार्जन करना और दूसरों को दुःख कष्ट हो ऐसे आचरण, कार्य नहीं करना, यह जिसका व्यवहार है उसको अपने यहाँ शिक्षित मानते हैं। नई शिक्षा नीति में इस प्रकार के मूल्य शिक्षा की व्यवस्था व तदनुरूप पाठ्यक्रम का प्रयास चला है। परन्तु प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक शिक्षकों के उदाहरण छात्रों के सामने उपस्थित हुए बिना यह शिक्षा प्रभावी नहीं होगी। इसलिए शिक्षकों के प्रशिक्षण की नई व्यवस्था निर्माण करनी पड़ेगी। दूसरा स्थान है समाज का वातावरण। समाज के जो प्रमुख लोग हैं, जिनकी लोकप्रियता के कारण अनेक लोग उनका अनुकरण करते हैं, उनके आचरण में ये सारी बातें दिखनी चाहिए। इन बातों का मंडन भी उन प्रमुख लोगों को करना चाहिए और उनके प्रभाव से समाज में चलने वाले विभिन्न प्रबोधन कार्यों से यह मूल्य प्रबोधन किया जाना चाहिए। समाज संवाद माध्यमों का (social media) उपयोग करने वाले सभी सज्जनों को माध्यमों का उपयोग समाज को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए न हो, सुसंस्कृत करने के लिए है, अपसंस्कृति फैलाने के लिए नहीं, इस बात की सावधानी बरतनी होगी।

परन्तु शिक्षा का मूलारम्भ व उसके कारण बनने वाली स्वभाव प्रवृत्ति, 3 से 12 साल तक की आयु में घर में ही बनती है। घर के बड़ों का व्यवहार, घर का वातावरण और घर में होने वाला आत्मीयता युक्त संवाद इनसे यह शिक्षा संपन्न होती है। हममें से प्रत्येक को अपने घर की चिंता करते हुए, अगर सहज यह संवाद नहीं है तो साप्ताहिक आयोजन से, इस संवाद का प्रारम्भ करना पड़ेगा। स्व गौरव, देश प्रेम, नीतिमत्ता, श्रेयबोध, कर्तव्यबोध आदि कई गुणों

का निर्माण इसी कालावधि में होता है। यह समझकर हमको इस कार्य को स्वयं के घर से प्रारम्भ करना पड़ेगा।

नागरिक_अनुशासन

संस्कारों की अभिव्यक्ति का दूसरा पहलू है, हमारा सामाजिक व्यवहार। समाज में हम एक साथ रहते हैं। साथ में सुखपूर्वक रह सकें इसलिए कुछ नियम बने होते हैं। देश काल परिस्थितिनुसार उनमें परिवर्तन भी होते रहता है। परन्तु हम सुखपूर्वक एकत्र रह सकें इसलिए उन नियमों के श्रद्धापूर्वक पालन की अनिवार्यता रहती है। एकत्र रहते हैं तो हमारे परस्परों के प्रति व्यवहार के भी कुछ कर्तव्य और उनके अनुशासन बन जाते हैं। कानून व संविधान भी ऐसा ही, एक सामाजिक अनुशासन है। समाज में सब लोग सुखपूर्वक, एकत्र रहें, उन्नति करते रहें, बिखरें नहीं, इसलिए बना हुआ अधिष्ठान व नियम है। हम भारत के लोगों ने अपने आप को यह संविधान से प्रतिबद्धता दी है। संविधान की प्रस्तावना के इस वाक्य के इस भाव को ध्यान में रखकर संविधान प्रदत्त कर्तव्यों का और कानून का योग्य निर्वहन सभी को करना होता है। छोटी बड़ी सभी बातों में इस नियम व्यवस्था का पालन हमें करना चाहिए। रहदारी के नियम होते हैं, विभिन्न प्रकार के कर समय पर भरने पड़ते हैं, स्वयं के व्यक्तिगत तथा सामाजिक अर्थायाम की शुद्धता व पारदर्शिता का अनुशासन भी होता है। ऐसे अनेक प्रकार के नियमों का कर्त्तव्य बुद्धि से पूर्ण निर्वहन होना चाहिए। नियम व व्यवस्था का पालन शब्दशः व भाव ध्यान में रखते हुए, (in letter and spirit) दोनों प्रकार से करना चाहिए। यह ठीक प्रकार से हो सके इसलिए विशेष कर अपने संविधान के चार प्रकरणों की जानकारी, यथा संविधान की प्रस्तावना, मार्गदर्शक तत्व, नागरिक कर्तव्य व नागरिक अधिकार – का प्रबोधन सर्वत्र होते रहना चाहिए। परिवार से प्राप्त पारस्परिक व्यवहार का अनुशासन, परस्पर व्यवहार में मांगल्य, सद्भावना और भद्रता तथा सामाजिक व्यवहार में देशभक्ति व समाज के प्रति आत्मीयता के साथ कानून संविधान का निर्दोष पालन इन सबको मिलाकर व्यक्ति का व्यक्तिगत व राष्ट्रीय चारित्र्य बनता है। देश की सुरक्षा, एकात्मता, अखण्डता व विकास साधने के लिए चारित्र्य के इन दो पहलुओं का त्रुटिविहीन व सम्पूर्ण होना अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। हम सभी को व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय चारित्र्य की इस साधना में सजगता व सातत्य के साथ लगे रहना पड़ेगा।

स्व_गौरव

इन सारी बातों का आचरण सतत होता रहे इसलिए जो प्रेरणा आवश्यक है, वह ‘स्व गौरव’ की प्रेरणा है। हम कौन हैं? हमारी परम्परा और हमारा गंतव्य क्या है? भारतवासियों के नाते हमारी सब विविधताओं के बावजूद हमें जो एक बड़ी, सर्व समावेशक, प्राचीन काल से चलती आयी हुई मानवीय पहचान मिली है, उसका स्पष्ट स्वरूप क्या है? इन सब बातों का ज्ञान होना, सबके लिए आवश्यक है। उस पहचान के उज्ज्वल गुणों को धारण करके, उसका गौरव मन और बुद्धि में स्थापित होता है, तो उसके आधार पर स्वाभिमान प्राप्त होता है। स्व-गौरव की प्रेरणा का बल ही जगत में हमारी उन्नति व स्वावलंबन का कारण बनने वाला व्यवहार उत्पन्न करता है।

उसी को हम स्वदेशी का आचरण कहते हैं। राष्ट्रीय नीति में उसकी अभिव्यक्ति बहुत बड़ी मात्रा में, समाज में दैनंदिन जीवन में व्यक्तियों द्वारा होने वाले स्वदेशी व्यवहार पर निर्भर करती है। इसी को स्वदेशी का आचरण कहते हैं। जो घर में बनता है वो बाहर से नहीं लाना, देश का रोजगार चले, बढ़े इतना अपने देश में घर के बाहर से लाना। जो देश में बनता है वो बाहर से नहीं लाना। जो देश में बनता नहीं, उसके बिना काम चलाना। कोई जीवनावश्यक वस्तु है, जिसके बिना काम चलता नहीं वही केवल विदेश से लेना। घर के अन्दर भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण और भोजन ये अपना हो, अपनी परम्परा का हो यह ध्यान रखना, यह सारांश में स्वदेशी व्यवहार है। सब क्षेत्रों में देश के स्वावलंबी बनने से स्वदेशी व्यवहार करना सरल होता है। इसलिए स्वतन्त्र देश की नीति में देश के स्वावलंबी बनने का परिणाम साध सकने वाली नीति जुड़नी चाहिए, साथ ही समाज ने प्रयत्न पूर्वक स्वदेशी व्यवहार को जीवन तथा स्वभाव का अंग बनाना चाहिए।

मन_वचन_कर्म_का_विवेक

राष्ट्रीय चारित्र्य के व्यवहार का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, किसी भी प्रकार की अतिवादिता तथा अवैध पद्धति से अपने आप को दूर रखना। अपना देश विविधताओं से भरा हुआ देश है। उनको हम भेद नहीं मानते, न ही मानना चाहिए। हमारी विविधताएं सृष्टि की स्वाभाविक विशिष्टताएं है। इतने प्राचीन इतिहास वाले, विस्तीर्ण क्षेत्रफल वाले तथा विशाल जनसंख्या वाले देश में यह सभी विशिष्टताएं स्वाभाविक हैं। अपनी-अपनी विशिष्टता का गौरव तथा उनके प्रति अपनी-अपनी संवेदनशीलता भी स्वाभाविक है। इस विविधता के चलते समाज जीवन में व देश के संचालन में होने वाली सब बातें सदा सर्वदा सबके अनुकूल अथवा सबको प्रसन्न करने वाली होंगी ही, ऐसा नहीं होता। ये सारी बातें किसी एक समाज के द्वारा होती हैं,

ऐसा नहीं है। इनकी प्रतिक्रिया में कानून और व्यवस्था को धत्ता बता कर अवैध या हिंसात्मक मार्ग से उपद्रव खड़े करना, समाज के किसी एक सम्पूर्ण वर्ग को उनका जिम्मेवार मानना, मन-वचन और कर्म से मर्यादा का उल्लंघन करते हुए चलना, यह देश के लिए देश में किसी के लिए न विहित है, न हितकारी। सहिष्णुता व सद्भावना भारत की परंपरा है। असहिष्णुता व दुर्भावना भारत विरोधी व मानव विरोधी दुर्गुण है। इसलिए क्षोभ कितना भी हो, ऐसे असंयम से बचना चाहिए तथा अपने लोगों को बचाना चाहिए। अपने मन, वाणी अथवा कृति से किसी की श्रद्धा का, श्रद्धास्पद स्थान, महापुरुष, ग्रंथ, अवतार, संत आदि का अपमान न हो, इस का ध्यान स्वयं के व्यवहार में रखना चाहिए। दुर्भाग्यवश अन्य किसी से ऐसा कुछ होने पर भी स्वयं पर नियंत्रण रखकर ही चलना चाहिए। सब बातों के परे, सब बातों के ऊपर महत्त्व समाज की एकात्मता, सद्भाव व सद्व्यवहार का है। यह किसी भी काल में, किसी भी राष्ट्र के लिए परम सत्य है, तथा मनुष्यों के सुखी अस्तित्व तथा सहजीवन का एकमात्र उपाय है।

सहन_शक्ति_तथा_शुद्ध_शील_ही_शान्ति_व_उन्नति_का_आधार

परन्तु, जैसे आधुनिक जगत की रीति है, सत्य को सत्य के अपने मूल्य पर जगत स्वीकार नहीं करता। जगत शक्ति को स्वीकार करता है। भारत वर्ष बड़ा होने से दुनिया में अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में सद्भावना व संतुलन उत्पन्न होकर शान्ति और बंधुता की ओर विश्व बढ़ेगा, यह विश्व में सब राष्ट्र जानते हैं। फिर भी अपने संकुचित स्वार्थ और अहंकार या द्वेष को लेकर भारत वर्ष को एक मर्यादा में बांधकर रखने की शक्तिशाली देशों की चेष्टा को हम सब अनुभव करते हैं। भारत वर्ष की शक्ति जितनी बढ़ेगी उतनी ही भारत वर्ष की स्वीकार्यता रहेगी।

‘बलहीनों को नहीं पूछता, बलवानों को विश्व पूजता’

यह आज के जगत की रीति है। इसलिए उपरोक्त सद्भाव व संयमपूर्ण वातावरण की स्थापना के लिए सज्जनों को शक्ति संपन्न होना ही पड़ेगा। शक्ति जब शीलसंपन्न होकर आती है, तब वह शान्ति का आधार बनाती है। दुर्जन स्वार्थ के लिए एकत्र रहते हैं और सजग रहते हैं। उनका नियंत्रण सशक्त ही कर सकते हैं। सज्जन सबके प्रति सद्भाव रखते हैं, परन्तु एकत्र होना नहीं जानते। इसीलिए दुर्बल दिखाई देते हैं। उनको यह संगठित सामर्थ्य के निर्माण की कला सीखनी पड़ेगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दू समाज की इसी शीलसंपन्न शक्ति साधना का नाम है। इस भाषण में इसके पूर्व वर्णित सद्व्यवहार के पांच बिंदु लेकर समाज में सज्जनों को जोड़ने का विचार संघ के स्वयंसेवक कर रहे हैं। भारत को बढ़ने देना न चाहने वाले, अपने स्वार्थ के लिए ऐसे भारत विरोधियों के साथ आने वाले तथा स्वभाव से जो बैर और द्वेष में ही आनंद मानते हैं, ऐसी शक्तियों से सुरक्षित रहकर देश को आगे बढ़ना है। इसलिए शील संपन्न व्यवहार के साथ शक्ति साधना भी महत्त्वपूर्ण है। इसलिए संघ की प्रार्थना में, कोई परास्त न कर सके ऐसी शक्ति और विश्व विनम्र हो ऐसा शील भगवान से मांगा गया है। विश्व के, मानवता के कल्याण का कोई काम अनुकूल परिस्थिति में भी इन दो गुणों के बिना संपन्न नहीं होता। नौ अहोरात्रि जागरण करते हुए सभी देवताओं ने अपनी अपनी शक्तियों को एक में संगठित किया, तब उस शील संपन्न संहत शक्ति से चिन्मयी जगदम्बा जागी, दुष्टों का निर्दलन हुआ, सज्जनों का परित्राण हुआ, विश्व का कल्याण हुआ। इसी विश्व मंगल साधना में मौन पुजारी के नाते संघ लगा है। हम सबको यही साधना अपनी पवित्र मातृभूमि को परमवैभवसंपन्न बनाने की शक्ति व सफलता प्रदान करेगी। इसी साधना से विश्व के सभी राष्ट्र अपना अपना उत्कर्ष साधकर नए, सुख- शान्ति व सद्भावना युक्त विश्व को बनाने में अपना योगदान प्रदान करेंगे। उस साधना में आप सभी सादर निमंत्रित है।

हिन्दू भूमि का कण कण हो अब, शक्ति का अवतार उठे, जल थल से अम्बर से फिर, हिन्दू की जय जय कार उठे जग जननी का जयकार उठे

(विजयादशमी_उत्सव_2024 नागपुर नागपुरमहानगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक)

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