ब्रज मंडल में शोर और कोलाहल, प्राचीन मंदिर संगीत विलुप्त हो चुका है

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यमुना नदी प्रदूषित हो रही है, बाग वन नष्ट हो रहे हैं, कुंड तालाब लुप्त हो चुके हैं, पवित्र ब्रज की रज कंक्रीटीकरण से जहरीली हो रही है, मंदिर धर्मशालाओं में कॉम्प्लेक्स खुल रहे हैं, पेड़ों की धुआंधार कटाई हो रही है, चारों तरफ विकास की गंगा बह रही है !!
ब्रज मंडल, जो कभी श्री कृष्ण की बांसुरी के मधुर सुरों और प्राचीन मंदिरों के शास्त्रीय संगीत से गूंजता था, अब केवल शोर और कोलाहल से भरा हुआ है। वृंदावन, मथुरा, गोवर्धन और बरसाना जैसे पवित्र स्थलों पर यह बदलाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
पारंपरिक ब्रज लोकगीत और शास्त्रीय संगीत की जगह अब कान फोड़ू और बेहूदे लोकगीतों ने ले ली है। इन संगीतों में विद्यमान द्विअर्थी संवाद और नृत्य केवल दर्शकों का मनोरंजन नहीं करते, बल्कि पवित्रता को खो रहे संस्कृति को भी विकृत करते हैं। मंदिरों में अब प्री रिकॉर्डेड संगीत पर बजने वाले जोरदार भक्ति गीतों का बोलबाला है, जो तीर्थयात्रियों को परेशान करते हैं और आध्यात्मिकता को कमज़ोर करते हैं।

स्थानीय संगीताचार्य और शिक्षाविदों ने इस ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह सांस्कृतिक प्रदूषण ब्रज मंडल की आध्यात्मिक शांति को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि हम इस दिशा में जागरूकता पैदा करें और पारंपरिक संगीत और कला को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें। यह केवल संगीत का मामला नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा का भी प्रश्न है। हमें इस ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ एकजुट होना होगा, ताकि ब्रज मंडल की शांति और सौंदर्य प्रभावित न हो।

एक समय था जब पारंपरिक वाद्य यंत्रों के मधुर सुरों से प्रकृति आनंदित रहती थी, कालिंदी का कल कल संगीत, मंदिरों में समाज गायन, अष्ट छाप कवियों के भजन गवते थे, आज हर जगह डेक पर कान फोड़ू और निहायत बेहूदे लोकगीत, रसिया, द्विअर्थी संवाद सुन ने को मिल रहे हैं।

कभी हवेली संगीत के लिए जाने वाले मंदिर मधुर और दिव्य धुनों से गूंजते थे, वहीं आज आपको केवल अज्ञात कलाकारों द्वारा सीडी पर जोरदार कोलाहलपूर्ण भक्ति गीत सुनने को मिलते हैं, जिन्हें सैकड़ों दुकानों पर फुल वॉल्यूम में बजाया जाता है, जो कृष्ण-राधा कथा से जुड़े मंदिरों में आने वाले तीर्थयात्रियों को धार्मिक वस्तुएं बेचते हैं।

वृंदावन के हृदय में श्री बांके बिहारी मंदिर की गलियों से लगे बाजारों में तमाम प्री रिकॉर्डेड पेन ड्राइव, विडियोज, सीडी, आदि बेचने वालों की भरमार है। एक संगीताचार्य कहते हैं, “इन दुकानों से चौबीसों घंटे होने वाले हाई वोल्टेज शोर ने मूर्खता के स्तर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है।”

यानी, अब आप पवित्र और प्राचीन शास्त्रीय संगीत या दिव्य भजन नहीं सुन सकते, जो शरीर और मन दोनों पर सुखदायक और उपचारात्मक प्रभाव डालते हों। यह बड़े साउंड बॉक्स से आने वाला शोर है। आप कुछ भी नहीं सुन सकते और घर के अंदर आप बिना विचलित हुए ध्यान नहीं लगा सकते, या अपने दैनिक काम नहीं कर सकते। बुजुर्ग लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं। महिलाएं और बच्चे उच्च डेसिबल स्तर के कारण आसानी से चिढ़ जाते हैं और अपना आपा खो देते हैं।

एक स्थानीय शिक्षाविद् ने कहा, “अब इस तरह के ध्वनि प्रदूषण को बर्दाश्त करना असंभव हो गया है।” एक मंदिर के गोस्वामी ने गहरा अफसोस जताया कि “यह वर्तमान संगीत विपणन वृंदावन की आध्यात्मिक शांति को इतना प्रभावित कर रहा है और पूरी तरह से बृज लोक संगीत परंपराओं के खिलाफ है कि नकारात्मक प्रवृत्ति को रोकने के लिए तत्काल कुछ करने की जरूरत है।” उन्होंने यह भी कहा कि स्वामी हरि दास की महान संगीत परंपराओं को पोषित करने और बढ़ावा देने के लिए वृंदावन में एक उचित संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना की जानी चाहिए।

यह शोर शराबा सिर्फ़ वृंदावन में ही नहीं है, गोवर्धन, मथुरा, बरसाना, हर जगह आपको संगीत सामग्री की दुकानें मिलेंगी। एक मोटे अनुमान के अनुसार ब्रज मंडल में कम से कम सैकड़ों काउंटर खुले हैं जहां से ब्रज संगीत खरीदा जा सकता है। इनमें होली के, देवी जागरण के, परिक्रमा, यात्रा, त्यौहारों से जुड़ा गायन भी है। अब हमारे पास स्थानीय स्टूडियो भी हैं जो नृत्य संगीत आधारित कार्यक्रम रिकॉर्ड करते हैं, और मार्केट करते हैं। और बहुत सारे अप्रशिक्षित संगीतकार और गायक हैं जो बॉलीवुड संगीत से काफ़ी प्रेरणा लेते हैं और अपने खुद के गीत जोड़ते हैं और इको या झंकार और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स जैसे विशेष ध्वनि प्रभाव शामिल करते हैं। इस त्यौहारी सीज़न में तेज़ी से कारोबार करने वाले दर्जनों गाने लोकप्रिय हैं। डीजे वाले भजन डिमांड में हैं क्योंकि ये लोकगीत दोहरे अर्थ वाले शब्दों से भरे होते हैं और कई मर्तबा सेक्सी संकेत देते हैं। वास्तव में, जबकि स्थानीय संगीत उद्योग समृद्ध हो रहा है, आउटपुट की गुणवत्ता चिंता का विषय है। यू ट्यूबर्स और रील मेकर्स की भी अच्छी खासी संख्या है, जो इस नए ट्रेंड को बढ़ावा दे रहे हैं। वृंदावन के कथा वाचकों ने भी अपनी अपनी संगीत नृत्य की मंडलियां खड़ी कर रखी हैं। मतलब ब्रज संस्कृति के प्रचार, प्रसार का ये गोल्डन पीरियड है।

इस आधुनिक युग के संगीत के आक्रमण से पहले ब्रज के मंदिरों में संगीतकारों और भजन गायकों के समूह थे, जो पारंपरिक ताल के साथ पीलू, भैरवी, गारा, बसंत और मांड जैसे शास्त्रीय रागों पर आधारित ब्रज लोकगीतों में माहिर थे।

पवित्र यमुना के तट पर बसा वृंदावन ध्रुपद गायन का केंद्र था। भागवत पुराण में कहा गया है कि ललिता सखी ने प्रसिद्ध “रास”-नृत्य के दौरान ध्रुपद शैली में गायन किया था। तब से भगवान कृष्ण की पूजा के प्राचीन रूप की यह परंपरा वृंदावन के मंदिरों में कायम है। ध्रुपद ब्रज मंडल से संबंधित शास्त्रीय संगीत की एक विशेष उत्तर भारतीय शैली है। इसे विश्व प्रसिद्ध तानसेन के गुरु, वृंदावन के प्रसिद्ध स्वामी हरिदास द्वारा समृद्ध और दिव्य ऊंचाइयों तक बढ़ाया गया था।

लेकिन आज यह केवल कान को चीर देने वाला शोर है जो एकाग्रता को बाधित करता है। एक वैष्णव संत कहते हैं, “इसमें दिल्ली और आस-पास से सैकड़ों वाहनों का आना-जाना भी शामिल है, जो दर्शन करने की जल्दी में रास्ते में कुछ कीर्तन संगीत, लोक गायन की सीडी या अन्य गेजेट्स उठा लेते हैं। मूल्यों और माहौल का प्रदूषण ब्रज मंडल के मूल चरित्र को खतरे में डाल रहा है, जो कभी भक्ति और प्रेम रस से भरा हुआ था। गोवर्धन पहाड़ियों के एक परिक्रमार्थी कहते हैं, “वृंदावन में अंतरराष्ट्रीय संतों द्वारा खोले गए नए आश्रम और मंदिर अप्रत्यक्ष रूप से श्री कृष्ण भूमि में सामान्य गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं।”

महान व्यक्तित्व व राष्ट्रवादी विचारधारा के उद्योगपति – रतन टाटा

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भारत के महान उद्योगपति रतन टाटा जी के निधन पर पूरे भारत ने उन्हें अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करी। रतना टाटा जी का व्यक्तित्व अनुपम व सराहनीय था यही कारण रहा कि उनके निधन का समाचार आते ही उनसे किसी न किसी रूप से जुड़े हर व्यक्ति ने उन्हें नमन किया। रतन टाटा न केवल एक उद्योगपति थे अपितु दूरदर्शीऔर मानवतावादी व्यक्ति थे।उन्होंने समाज के लिए अद्वितीय योगदान दिया और मानवीय आदर्शों को मूर्तरूप दिया।

रतन टाटा स्वदेशी की भावना को बढ़ावा देने वाले व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “मेक इन इंडिया“ मिशन के सच्चे सारथी थे। रतन टाटा ने राष्ट्रप्रथम की भावना से कार्य करते हुए राष्ट्र को व्यापारिक हितों से ऊपर रखा। उनका व्यवसायिक दृष्टिकोण वास्तव में देश के लिए परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। रतन टाटा हर प्रकार की आधुनिक सुविधाएं होते हुए भी सादगी भरा जीवन व्यतीत करने थे। यह रतन टाटा की कंपनियों का ही कमाल है कि आज भारत के हर घर- घर में उनकी उपस्थिति है, आयोडीन युक्त टाटा नमक से लेकर सुबह की चाय की पत्ती तक में टाटा का नाम है। रतन टाटा मात्र बिजनेस टाइटन ही नहीं थे अपितु अपने आप में एक संस्थान थे। रतन टाटा ने अपने परिश्रम के बल पर भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में स्थान दिलाया। रतन टाटा ने न केवल राष्ट्र निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया अपितु वह बहुत बड़े समाजसेवी, दानवीर व पशु संरक्षक भी थे । यह रतन टाटा ने केवल कोविडकाल में ही 1500 करोड़ की धनराशि दान की थी।

रतन टाटा का जीवन भारत के उद्यमियों के लिए वैश्विक स्तर पर सोचने और आगे बढ़ने, बेदाग प्रतिष्ठा तथा कारपोरेट प्रशासन के उच्च मानक को बनाये रखने के लिए सदा प्रेरणास्रोत रहेगा। उन्होंने उद्योगपति रहते हुए भी अपने समस्त जीवन में ईमानदारी, विनम्रता तथा सामाजिक जिम्मेदारी के मूल्यों को अपनाया। राजनीति से दूर रहते हुए भी भारत के समावेशी विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अनुकरणीय है। वह नैतिक नेतृत्व के पर्याय हैं।

रतन टाटा का लालन -पालन 10 वर्ष की अवस्था से उनकी दादी ने ही किया क्योंकि उनके माता -पिता अलग हो गए थे। उन्होंने अमेरिका से आर्किटेक्चर की डिग्री ली और और दो साल वहां की एक फर्म में नौकरी भी की। रतन ने 1991 में जेआरडी टाटा से टाटा समूह की कमान संभाली और अपनी दूरदर्शिता, व्यापार कौशल और नैतिक नेतृत्व के बल पर टाटा समूह को वैश्विक पहचान दिलाई।1991 से 2012 तक रतन टाटा के कार्यकाल में टाटा समूह का राजस्व 46 गुना बढ़कर 4.75लाख करोड़ रुपए पहुंच गया। समूह का लाभ 51 गुना बढ़कर 33.5 करोड़ रुपए अधिक पहुंच गया। उनके कार्यकाल में टाटा समूह ने नए वेंचर्स और अंतरराष्ट्रीय विस्तार के बाद स्वयं को बदला जिससे समूह का बाजार पूंजीकरण 33 गुना बढ़ गया। टाटा के नेतृत्व में ही 2004 में टीसीएस का आईपीओ आया जो उस समय देश का सबसे बड़ा और एशिया का दूसरा बड़ा इश्यू था। टाटा समूह निवेशकों की पहली पसंद बन गया ।रतन टाटा ने सर्वप्रथम नैनो कार का सपना देखा, दिखाया पूरा भी किया। जब पहली लाल रंग की नैनो कार भारत की सड़कों पर उतरी तो हर नागरिक उसे देखकर हर्षित हुआ।

रतन टाटा ने अपनी कंपनियों व विभिन्न समूहों के माध्यम से गरीबों, किसानों, महिलाओं और युवाओं का उद्धार किया। टाटा ट्रस्ट ने कुपोषण दर को कम करने और मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए सरकारों के साथ काम किया। राष्ट्रीय पोषण मिशन के साथ साझेदारी में ट्रस्ट ने 1200 से अधिक फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया। कैंसर के इलाज तथा देखभाल के लिए भी संस्थानों के साथ साझेदारी कर अत्याधुनिक सुविधाएं दीं। टाटा समूह ने शिक्षा एवं कौशल विकास पर पर भी ध्यान दिया। टाटा ट्रस्ट किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद कर रहा है।ग्रामीण किसानों को फसल विविधीकरण और कुशल जल उपयोग जैसी स्थायी कृषि प्रणाली अपनाने मे भी मदद की है। रतन टाटा का समूह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अभिनव योजना हर घर नल से जल योजना में भी भागीदारी कर रहा है।
ऐसा नही है कि रतन टाटा को अपने कैरियर में कभी विरोध नहीं झेलना पड़ा। बंगाल में उनकी परियोजनाओं का तीखा विरेध हुआ था और 2008 में उनको बंगाल से अपनी परयोजना बाहर हटानी पड़ी थी। तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने रतन टाटा को एक शब्द का संदेश भेजकर उनकी टाटा नैनो परियोजना को गुजरात बुला लिया। नरेंद्र मोदी का वह एक शब्द था “वेलकम“। फिर 2010 में साणंद में 2000 करोड़ रुपए के निवेश से निर्मित टाटा नैनो संयंत्र का उद्घाटन किया गया।

ऐसा कहा जा सकता है कि रतन टाटा का जीवन वटवृक्ष की तरह था जिसने उद्योग, शिक्षा और समाजसेवा के अनगिनत क्षेत्रों को पोषित किया। वह खेलों की दुनिया के संपर्क में भी रहे और सिनेमा जगत में भी अपना हाथ आजमाया किन्तु एक फिल्म में काम करने के बाद उसको विराम दे दिया । टाटा समूह ने अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय हर समय में दिया और रतन ने इस परिपाटी को आगे बढ़ाया। वह हर क्षेत्र मे स्वदेशीकरण चाहते थे चाहे वह माचिस की डिब्बी बनाने का काम हो या फिर कार बनाने से लेकर हवाई जहाज या फिर लड़ाकू विमान बनाना।

रतन टाटा सदा भारत के अनमोल रतन की तरह स्मरण किये जाएंगे। उनके नेतृत्व में ही टाटा समूह की कंपनियां विश्व की जानी मानी कंपनियो से स्पर्धा करने में सक्षम बनीं। रतन टाटा सदा आम भारतीयों के सुख की चिंता किया करते थे।उनका लक्ष्य आम जन के जीवन स्तर को बेहतर बनाना था। वह भारत की आर्थिक उन्नति को लेकर सदा सक्रिय रहे और इसीलिए उन्होंने कई स्टार्टअप को आगे बढ़ने में सहायता की।

रतन टाटा का मानवीय पहलू उस समय सभी ने देखा जब 2008 में मुबई में 26/11 आतंकी हमले के बाद वो सभी 80 पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे। इसी प्रकार अपने एक कर्मचारी के अस्वस्थ होने पर उन्होंने उसके घर पहुंचकर स्वयं परिस्थिति को समझा और उचित सहायता उपलब्ध करायी। कोविडकाल के दौरान आर्थिक संकट से जूझ रहे एक हॉकर की सहायता के लिए वह उससे प्रतिदिन 14 समाचार पत्र खरीदने लगे थे। रतन टाटा के संवेदनशील मन के ऐसे अनगिनत प्रमाण आज उनके अवसान पर सामने आ रहे हैं ।

लंदन में किया था असहयोग का आह्वाहन, आईसीएस का प्रस्ताव ठुकराया

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सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी और विचारक लाला हरदयाल की गणना उन विरले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में होती है जिन्होंने भारत, अमेरिका और लंदन में अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध अभियान चलाया और राष्ट्र जागरण की अलख जगाई । लालाजी ने अंग्रेजों का हर प्रलोभन ठुकराया । अंग्रेजों ने लंदन में उन्हे उस समय की सबसे प्रतिष्ठित आईसीएस पद के प्रस्ताव भी दिया था जिसे लालाजी ने ठुकरा दिया था । यही आईसीएस सेवा अब आईएएस के रूप में जाना जाता है ।

लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को दिल्ली में हुआ था । उनका दिल्ली के चाँदनी चौक में गुरुद्वारा शीशगंज के पीछे था । गुरुद्वारा शीशगंज उसी स्थल पर है जहाँ औरंगजेब की कठोर यातनाओ के कारण गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान हुआ था । उनकी स्मृति में यह गुरुद्वारा 1783 में स्थापित हुआ था । उनके पिता पं गोरेलाल संस्कृत के विद्वान और कोर्ट में रीडर थे, माता भोलारानी रामचरित मानस की विदुषी मानी जाती थीं । परिवार आर्य समाज स

के जाग्रति अभियान से जुड़ गया था । इस प्रकार घर और पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतिष्ठापना का वातावरण था । इसी वातावरण में लाला हरदयाल का जन्म 14 अक्टूबर 1884 को हुआ । परिवार के संस्कारों ने उन्हे बचपन से राष्ट्रीय, साँस्कृतिक और सामाजिक चेतना से ओतप्रोत कर दिया था । उन्हें बचपन में माँ से रामायण की और पिता से संस्कृत शिक्षा मिली । इसीलिए उन्हें रामायण की चौपाइयाँ और संस्कृत के अनेक श्लोक कंठस्थ थे । बचपन में संस्कृत की शिक्षा देकर ही उन्हें पढ़ने के लिये शासकीय विद्यालय भेजा गया । उन दिनों के सभी शासकीय विद्यालयों में चर्च का नियंत्रण हुआ करता था । उनकी प्राथमिक शिक्षा कैम्ब्रिज मिशन स्कूल में हुईं और महाविद्यालयीन शिक्षा सेन्ट स्टीफन कालेज में वे पढ़ने में बहुत कुशाग्र थे सदेव प्रथम आते । उनकी स्मरण शक्ति बहुत अद्भुत थी उन्हे एक बार सुनकर पूरा पाठ कंठस्थ हो जाता था । उनकी गणना ऐसे विरले व्यक्तियों में होती थी जो अंग्रेजी और संस्कृत दोनों भाषाएँ धाराप्रवाह बोल लेते थे । इस विशेषता ने उन्हे पूरे महाविद्यालय में लोकप्रिय बना दिया था । वे महाविद्यालयीन शिक्षा में कालेज में टाप पर रहे । उन्हे 200 पाउण्ड की छात्रवृत्ति मिली इस राशि से वे आगे पढ़ने के लिये लंदन गये । उन्होंने 1905 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया । लालाजी ने वहां भारतीयो के साथ हीनता से भरा व्यवहार देखा जिससे वे विचलित हुये ।

यद्यपि इसका आभास उन्हें दिल्ली के सेन्ट स्टीफन कालेज में भी हो गया था । इसके लिये उन्होने अपने छात्र जीवन में जाग्रति और वैचारिक संगठन का अभियान भी चलाया था लेकिन यहाँ उनका यह काम केवल संगोष्ठियों, कविताओं और डिवेट तक सीमित रहा । दिल्ली कालेज में वे ऐसे कार्यक्रम आयोजित करत जिनमें भारतीय चिंतन की प्रतिष्ठा और भारतीयों की गरिमा के साथ ओज का भाव प्रकट हो । लेकिन लंदन में वे यहीं तक सीमित न रह सके । उन्होने इसे संगठनात्मक स्वरूप देने का विचार किया । यह वह काल-खंड था जब लंदन में मास्टर अमीरचंद क्रांतिकारी आँदोलन चला रहे थे । लाला हरदयाल जी उनके संपर्क में आये । उनका संपर्क क्रातिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा से भी हुआ । श्याम कृष्ण जी ने लंदन में इंडिया हाउस की स्थापना की थी । लालाजी उसके सदस्य बन गये । क्रातिकारियों के संपर्क और अध्ययन से लालाजी को यह भी आभास हुआ कि पूरी दुनियाँ में अंग्रेजों का दबदबा भारतीय सैनिकों के कारण है । जहां कभी भी सेना भेजना होती वहां सबसे अधिक सैनिकों की संख्या भारतीय मूल के सैनिकों की होती लेकिन अंग्रेज उनसे सम्मान जनक व्यवहार नहीं करते थे । उनकी कुशाग्रता और सक्रियता अंग्रेजों से छुपी न रह सकी उन्हे 1906 में आईसीएस सेवा का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने ठुकराते हुये वाक्य बोला “भाड़ में जाय” । प्रस्ताव ठुकराकर वे लंदन में भारतीयों के संगठन और स्वाभिमान जागरण के अभियान में लग गये । उन्होने 1907 में असहयोग आंदोलन चलाने का आव्हान किया । उन दिनों चर्च और मिशनरियों ने युवाओं को जोड़ने के लिये एक संस्था बना रखी थी उसका नाम “यंग मैन क्रिश्चियन एसोशियेशन” था ।

इसे संक्षिप्त में “वाय एम सी ए” कहा जाता है । इसकी शाखायें भारत में भी थीं लाला हरदयाल जी ने भारतीय युवकों में चेतना जगाने के लिये क्रान्तिकारियों की एक संस्था “यंगमैन इंडिया एसोसिएशन” का गठन किया । उनकी सक्रियता देख उन पर स्थानीय प्रशासन का दबाब बना वे 1908 में भारत लौट आये । यहाँ आकर भी वे युवकों के संग़ठन में लग गये उनका अभियान था कि भारतीय युवक ब्रिटिश शासन और सेना की मजबूती में कोई सहायता न करें । इसके लिये उन्होंने देश व्यापी यात्रा की । लोकमान्य तिलक से मिले । उन्होंने लाहौर जाकर एक अंग्रेजी में समाचार पत्र आरंभ किया । उनका समाचार पत्र राष्ट्रीय चेतना से भरा हुआ था । लाला हरदयाल जी के युवा आयोजन में ही अल्लामा इकबाल ने वह प्रसिद्ध तराना सुनाया था “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा” । यह अलग बात है कि आगे चल कर अल्लामा इकबाल मोहम्मद अली जिन्ना की संगत में पढ़कर पाकिस्तान गठन के लिये काम करने लगे थे । अंग्रेजों को लाला हरदयाल की सक्रियता पसंद न आई । अंग्रेजी समाचार पत्र के एक समाचार के बहाने उनपर एक मुकदमा दर्ज हुआ । इसकी खबर उन्हे लग गयी और वे अमेरिका चले गये । अमेरिका जाकर भी उनका भारतीयों को जाग्रत करने का अभियान जारी रहा ।

उन्होंने अमेरिका जाकर गदर पार्टी की स्थापना की । उन्होंने कनाडा और अमेरिका में घूम घूम कर वहां निवासी भारतीयों को स्वयं के गौरव और भारत की स्वतंत्रता के लिये जागरूक किया । तभी काकोरी कांड के षडयंत्र कारियों में उनका भी नाम आया । अंग्रेजों ने उन्हे भारत लाने के प्रयास किये । पहले तो अमेरिकी सरकार ने अनुमति नहीं दी । लेकिन बाद में 1938 अनुमति दे दी । उन्हें 1939 भारत लाया जा रहा था कि रास्ते में फिलाडेल्फिया में रहस्यमय परिस्थिति में उनकी मौत हो गई । आशंका है कि उन्हें मार्ग में विष दिया गया । पर उनकी मृत्यु का रहस्य आज भी बना हुआ है । कि पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति अचानक कैसे शरीर त्याग सकता है । 4 मार्च 1939 को इस नश्वर संसार को त्याग कर वे परम् ज्योति में विलीन हो गये। कोटिशः नमन ऐसे महान क्रान्तिकारी को ।

आज के दिन आदतन रावण का महिमामंडन करने वालों के लिए

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मनोज श्रीवास्तव

विजयेन्द्र मोहंती जैसे लोग जो रावणायन की कामिक स्ट्रिप लिख रहे हैं या तमिल नाटककार मनोहर जिन्होंने ‘लंकेश्वरम’ नाटक लिखा, रावण के परिप्रेक्ष्य से भी इस कथा को सुनने समझने की कोशिश कर रहे हैं। रावण एक पल को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जा सकता है जिसने सीता के प्रति अपने प्यार के चक्कर में अपनी जान दे दी। एक फॉरबिडन लव, एक ट्रेजिक हीरो। अच्छी कहानी बनती है। रावण ने एक असाध्य प्रेम के लिए अपनी मृत्यु सुनिश्चित की।

लेकिन तथ्य यह नहीं है। वाल्मीकि रामायण के आधारग्रंथ में रावण का यह तथाकथित ‘डिवाइन रोमांस’ किसी तरह दिव्य नहीं है। सीता को अपहृत करके लाना राम को निपटाने की तरकीब थी।

अकंपन ने अरण्यकांड के 31वें सर्ग में रावण को सलाह दी थी : “उस विशाल वन में जिस किसी भी उपाय से राम को धोखे में डालकर आप उनकी पत्नी का अपहरण कर लें। सीता से बिछुड़ जाने पर राम कदापि जीवित नहीं रहेंगे।” यह थी रावण के दिव्य प्रेम की तथाकथित प्रेरणा।

फिर शूर्पणखा रावण को सरासर झूठ बोल कर उकसाती है : “महाबाहो ! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचों वाली उस सुमुखी स्त्री को जब मैं तुम्हारी भार्या बनाने के लिए ले जाने को उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह कुरूप बना दिया।” मारीच से छत्तीसवें सर्ग में वह यह भी कहता है कि “उसके बाद स्त्री का अपहरण हो जाने से जब राम अत्यन्त दुखी और दुर्बल हो जाएगा, उस समय में निर्भय होकर सुखपूर्वक उसके ऊपर कृतार्थ चित्त से प्रकार करूंगा।”

तो रावण के द्वारा सीता का अपहरण रावण के अमर प्रेम का परिणाम नहीं था। सीता के राम के प्रति अमर-प्रेम का परिणाम था। अयोध्याकांड के सत्ताईसवें सर्ग के 21वें श्लोक में सीता यह कहती हैं कि “पुरुष सिंह आपके बिना यदि मुझे स्वर्गलेाक को निवास भी मिल रहा हो तो वह मेरे लिए रुचिकर नहीं हो सकता। मैं उसे लेना नहीं चाहूंगी।” दूसरी ओर तीसवें सर्ग के 27वें श्लोक में राम कहते हैं कि “सीते तुम्हें दुख देकर मुझे स्वर्ग का सुख मिलता हो मैं उसे भी नहीं चाहूंगा।” दोनों एक-दूसरे को अभिन्न मानते हैं।

जबकि रावण के लिए सीता राम को कमजोर करने का एक अस्त्र भर है। सीता से रावण का कोई आत्मिक आध्यात्मिक लगाव कहीं नजर नहीं आता।

दूसरे जिस एक बात को रावण का पुनर्लेखन करने वाले लोग नजर अंदाज कर रहे हैं, वह है सीता को चुराकर लाना। रावण जिसकी तथाकथित वीरता के किस्से सुनाते लोग नहीं अघाते, वीर्यशुल्का सीता को उसके स्वयंवर में क्यों नहीं जीत सका? या स्वयं राम या लक्ष्मण के सामने ही युद्ध करके क्यों नहीं जीत सका? यदि राम के हाथों वीरगति की उसकी गुप्त इच्छा थी तो सीतापहरण के समय उसने यह सीधी मुठभेड़ क्यों न कर ली? योद्धा का कवच पहनकर राम के सामने क्यों नहीं गया? परिव्राजक का वेष धरकर सीता के सामने क्यों गया? हार की जीत कहानी में नायक को यह भय है कि आगे से लोग अंधे पर भरोसा करना नहीं छोड़ दें। लेकिन पौलस्त्य को भय नहीं कि उसकी इस हरकत के बाद परिव्राजकों पर लोग भरोसा करना छोड़ देंगे?

छियालीसवें सर्ग (वा.रा.अ.कां.): वाल्मीकि लिखते हैं: “राम से बदला लेने का अवसर ढूंढ़ने वाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूप में विदेहकुमारी सीता के पास पहुंचा।” वह संस्कृति जो ‘भिक्षां देहि’ के सिद्धान्त पर चलती थी, उसकी इस गुणवत्ता का का ऐसा उपयोग?

इसी सर्ग के 32वें से 36वें श्लोकों में बाल्मीकि बताते हैं : “वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मण-वेष में वहां पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि सत्कार के लिए उपयोगी सभी सामग्रियों द्वारा उसका पूजन किया। पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य निवेदन किया। तदनंतर ऊपर से सौम्य दिखायी देने वाले उस अतिथि को भोजन के लिए निमंत्रित करते हुए कहा- “ब्राह्मण ! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये।” “वह ब्राह्मण के वेष में आया था। कमण्डलु और गेरूआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण भेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असंभव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय कराने वाले चिन्ह दिखाई देते थे, अतः उस रूप में आये हुये उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिए ही उसे निमन्त्रित किया। वे बोलीं- “ब्राह्मण ! यह चटाई है, इस पर इच्छानुसार बैठ जाइए। यह पैर धोने के लिए जल है, इसे ग्रहण कीजिए और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-फूल आपके लिए ही तैयार करके रखा गया है, यहां शान्त भाव से उसका उपभोग कीजिए।”

सीता ब्राह्मण, भिक्षा और आतिथ्य के तीन दायित्वों को एक अजनबी के प्रति भी निभाती हैं और रावण छल और प्रवंचना को-अंग्रेजी शब्द में कहें तो chicanery को- इस सहज विश्वासी निश्छलहृदया नारी के विरुद्ध प्रयुक्त करता है।

सीता उचित ही राम और रावण में यह फर्क तभी बता देती हैं : “वन में रहने वाले सिंह और सियार में, समुद्र और छोटी नदी में तथा अमृत और कांजी में जो अंतर है, वही अन्तर राम और तुझमें है। सोने में और सीसे में, चंदन मिश्रित जल और कीचड़ में तथा वन में रहने वाले हाथी और बिलाव में जो अन्तर है, वही अंतर राम और तुझमें है। गरूड़ और कौए में, मोर और जलकाक में तथा वनवासी हंस और गीध में जो अन्तर है, वही अंतर राम और तुझमें है।”

यह सीता के लिए प्रेम नहीं, सीता का अपमान था और 48वें सर्ग (अ.का.) के अंतिम श्लोक में सीता इसे कहती भी हैं :

“राक्षस। वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शचि का तिरस्कार करके संभव है कोई उसके बाद भी चिरकाल तक जीवित रह जाए, परन्तु मेरी जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तू छूट नहीं सकता।”

अंग्रेजी में धोखे के लिए ‘मंकी-साइंस’ नाम या ‘मंकी बिजनेस’ नाम गलत रखा गया है। रावण जिस तरह से अपहरण को सेट अप करता है, उससे लगता है कि रावण के नाम पर मिथ्याचार का नाम होना था। क्या ऐसी धूर्तता और फरेब को हम ‘पराजित’ का इतिहास लिखने के नाम पर रक्षित कर सकते हैं?

लगता है, राम को ब्राह्मणवाद का प्रतिनिधि बताने वालों के लिए भी जरूरी हो जाता है कि वे रावण की मक्कारी, ईमान फरामोशी और साजिश को भी महिमा मंडित करें। चूंकि राम की किसी भी तरह लानत-मलानत करनी है तो इनके लिए जरूरी है कि रावण के द्वारा किए गए बलात्कारों पर चुप ही रहा जाए। न वेदवती के बारे में कुछ बोला जाए, न पुंजिकास्थली के बारे में कुछ बोला जाए, न रंभा के बारे में बल्कि उसके बारे में यह प्रचारित किया जाए कि उसने जिसका भी अपहरण किया, उनकी मर्जी से किया।

एक तमिल वर्शन रामायण का अभी आया है जिसमें सीता राम, लव, कुश को छोड़कर रावण के पास वापस चली जाती हैं, वीणा सीखने। यदि रावण सभी को उनकी मर्जी से ही हर ले गया था तो यह क्यों हुआ कि नलकूबर ने जब रावण को यह शाप दिया कि “वह आज से दूसरी किसी ऐसी युवती से समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो। यदि वह कामपीड़ित होकर उसे न चाहने वाली युवती पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तक के सात टुकड़े हो जाएंगे,” तो वह जिन-जिन पतिव्रता स्त्रियों को हरकर ले गया था, उन सबके मन को नलकूबर का दिया हुआ वह शाप बड़ा प्रिय लगा और उसे सुनकर वे सब-की-सब बहुत प्रसन्न हुईं।”

पराजित के प्रति सहानुभूति और ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतीकों से घृणा के चक्करों में हम रावण के किन-किन कुकर्मों को इग्नोर करेंगे?

(फेसबुक से साभार)

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