Chief Minister Vishnudev Sai Implements PM Modi’s Vision: Medical Education in Hindi Begins on Hindi Day

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Hindi Language MBBS Courses to Start at Government Medical Colleges

Raipur, September 14, 2024 – On Hindi Day, Chief Minister Vishnudev Sai announced a landmark initiative, implementing Prime Minister Narendra Modi’s vision by introducing medical education in Hindi at government medical colleges across the state. During a press conference at his residence office, with Health Minister Shyam Bihari Jaiswal present, the Chief Minister confirmed that starting from the academic session 2024-25, MBBS courses will be available in Hindi. Necessary textbooks in Hindi will be provided to students as per the directives given to the Health Department.

Chief Minister Sai highlighted that the true significance of Hindi Day is in advancing and promoting Hindi in all spheres of governance, administration, and education. He noted that this initiative, inspired by Prime Minister Modi’s announcement in February 2022 during a rally in Unnao, Uttar Pradesh, is now being realized in Chhattisgarh.

With ten government medical colleges in the state, this move is expected to greatly benefit students from rural backgrounds who are primarily from Hindi-medium schools and face difficulties with English. Providing education in their native language will enhance their understanding and strengthen their foundation as future medical professionals. Chief Minister Sai affirmed his commitment to implementing this policy at every level in Chhattisgarh.

स्वयं की प्रतिभा,अस्तित्व और देशाभिमान का भाव जगाती है हमारी हिन्दी

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पराधीनता से मुक्ति केलिये विदेशियों को बाहर कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित करना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही आवश्यक है स्वयं के विचार और भाव भाषा के आधार पर अपने जीवन, समाज और देश का विकास की ओर बढ़ना । इसी प्राथमिकता, सम्मान और स्वाभिमान का वोध कराता है हमारा यह राष्ट्रीय हिन्दी दिवस ।

हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया था कि हिन्दी भारत सरकार की आधिकारिक भाषा होगी क्योंकि भारत के अधिकांश क्षेत्रों में सर्वाधिक हिन्दी ही बोली जाती है इसलिए हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया और इस निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में जन जन तक पहुँचाने के लिये वर्ष 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाने की अधिकृत घोषणा हुई । स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से ही स्वतंत्र भारत की राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने का अभियान आरंभ हो गया था । देश के जनमत की इसी भावना को हरिविष्णु कामथ, काका कालेलकर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्द दास, व्यौहार राजेन्द्र सिंह आदि साहित्यकारों ने अथक प्रयास किये। तब संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 को अपने निर्णय की घोषणा की और भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की अनुच्छेद 343(1) में भारत संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी राजकीय भाषा के रूप में और अंकों के अंतराष्ट्रीय स्वरूप यनि अंग्रेजी के ही स्वीकृत किये गये । इसलिये 14 सितम्बर का यही दिन राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के रूप में निर्धारित हुआ । जिसकी विधिवत घोषणा 1953 में की गई। संयोग से यह तिथि हिन्दी की स्वीकार्यता के लिये अथक परिश्रम करने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंह की पचासवीं साल गिरह थी इसलिए साहित्य की दुनियाँ में यह तिथि अतिरिक्त आनंद लेकर आई । और देश भर में उत्सव आयोजन हुये ।

हिन्दी को राजभाषा बनाने का संघर्ष

हिन्दी को राजभाषा का यह सम्मान सरलता से नहीं मिला । यह हिन्दी के लिये एक लंबे संघर्ष के बाद मिला सम्मान था । हिन्दी अथवा देवनागरी लिपि को सम्मान दिलाने का यह संघर्ष कब से प्रारंभ हुआ यह बात तो ठीक से नहीं कही जा सकती । पर 1850 से भारत की स्वतंत्रता के लिये किये गये संघर्ष के साथ हिन्दी की प्रतिष्ठापना के अभियान का भी विवरण मिलता है । 1868 में का तो विधिवत ज्ञापन देने का विवरण इतिहास में मिलता है । इसकी पहल राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ ने की थी । उन्होंने तत्कालीन संयुक्त प्रांत सरकार को एक ज्ञापन सौंपा था । जबकि 1850 के आसपास हिन्दी के प्रति जन जागरण का कार्य स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किये जाने के उल्लेख मिलते हैं । उनके लेख, प्रबोधनों का संकलन और वेदों का हिन्दी अनुवाद इसका प्रमाण है । उस काल-खंड में सामाजिक और राष्ट्र जागरण के लिये तैयार हुये लोक साहित्य में भी इसकी स्पष्ट झलक मिलती है । 1857 की क्राँति का संदेश लेकर जो संदेश वाहक कानपुर और मेरठ से निकले थे उनकी भाषा भी हिन्दी थी । इसका कारण इन संदेश वाहकों में अधिकांश उत्तर प्रदेश के साधु संयासी थे ।इतिहास के पन्नों में 1868 के जिस ज्ञापन में विवरण मिलता है । वह “मेमोरेंडम – ‘कोर्ट कैरेक्टर इन दी अपर प्रोविंसेज ऑफ इंडिया’ के नाम से रिकार्ड में दर्ज है । इसी बात को और आगे बढ़ाया भारतेंदु हरिश्चंद्र ने । उनका अधिकांश साहित्य हिन्दी में था । जिसमें अन्य विधाओं के साथ राष्ट्र जागरण का आव्हान भी होता । वे यह अपील भी करते थे कि लोकभाषा व्यवहार हिन्दी में होना चाहिए। हिन्दी आँदोलन के इसी बीजारोपण को आगे बढ़ाया गाँधीजी, पं मदनमोहन मालवीय, नवीनचन्द्र राय, श्रद्धाराम फिल्लौरी, पंडित सत्यनारायण शास्त्री, पंडित गौरीदत्त, व्यौहार राजेन्द्र सिंह, सेठ गोविन्द दास, काका कालेलकर, पुरुषोत्तमदास टंडन, आदि साहित्यकारों, स्वतंत्रता सेनानियों और पत्रकारों ने । 1917 में गाँधी जी ने हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने की आवश्यकता बताई थी । गाँधी की मातृभाषा गुजराती थी, पर वे हिन्दी को संपर्क भाषा बनाने के समर्थक थे । समय की गति के साथ कुछ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और साहित्यकारों का साथ छूटा तो कुछ नये जुड़े पर हिन्दी अभियान न रुका । वह निरन्तर रहा । अंततः हिंदी भारत राष्ट्र के ललाट की बिन्दी बनी और राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गई।

हिन्दी भाषा की वैज्ञानिकता

संसार में प्रचलित सभी भाषाओं में हिन्दी सबसे समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है । संस्कृत के बाद हिन्दी ही एक मात्र ऐसी भाषा है जिसमें जो लिखा जाता है । वही बोला जाता है । और जो बोला जाता है वही लिखा जाता है । दुनियाँ अन्य भाषाओं में वर्णाक्षरों का उच्चारण शब्दों के प्रयोग में बदल जाता है । कभी कभी तो एक ही अक्षर का अलग अलग शब्दों के प्रयोग में उच्चारण अलग हो जाता है । लेकिन हिन्दी में ऐसा नहीं होता । वर्ण या अक्षर के रूप में जो उच्चारण होता है, वही शब्द प्रयोग में भी होता है । हिन्दी की यह विशेषता भी है कि संसार की किसी भी भाषा के शब्द या उच्चारण को हिन्दी में ज्यों का त्यों लिखा जा सकता है । भले वे उच्चारण अंग्रेजी के हों, चीनी भाषा के हों या अरबी फारसी के । यह विशेषता संसार की किसी भाषा में नहीं। इसका कारण यह है कि हिन्दी की वर्ण माला “स्वर विज्ञान” पर निर्धारित है । यही नहीं वर्णमाला में वर्णाक्षर की पंक्ति का निर्धारण भी वैज्ञानिक अनुसंधान के बाद हुआ है । जैसे “क” पंक्ति के पाँचों अक्षर एक “स्वर शैली” के और “च” पंक्ति के पाँचों अक्षर में दूसरी “स्वर शैली” के हैं।

हिन्दी भाषा की प्राचीनता

भारत में हिन्दी भाषा के अस्तित्व का इतिहास बहुत पुराना है । इतिहास में जहाँ तक दृष्टि जाती है । हिन्दी का अस्तित्व मिलता है । प्राचीन भारत में यदि शोध, अनुसंधान और आख्यानों की भाषा संस्कृत रही है तो सामाजिक जीवन में बोलचाल की व्यवहारिक भाषा हिन्दी ही रही है । इसका प्रमाण लोकभाषा में रचा गया साहित्य है । इसीलिए हिन्दी और संस्कृत का व्याकरण एक ही है । व्याकरण की दृष्टि से संस्कृत और हिन्दी में दो तीन मामूली अंतर हैं । वह है संस्कृत शब्द के अंत से “म्” को प्रथक करना और शब्द संधि का सरलीकरण । इसलिए हिन्दी को संस्कृत का सरलीकृत स्वरूप ही माना गया । यह अलग बात है कि मध्यकाल में हुये सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उथल पुथल के चलते हिन्दी विखर गई और क्षेत्रीय बोलियाँ उभर आईं । जिन्हे अब हम अवधी, बुन्देली, मालवीय, ब्रजभाषा, भोजपुरी आदि प्रांतीय बोलियों या भाषाओं के रूप में देख सकते हैं। इन सबके मूल में हिन्दी या संस्कृत के ही शब्द हैं। समय के साथ भारतीय मनीषियों ने यह आवश्यकता अनुभव की और देश को पुनः भाषा के एक सूत्र में बाँधने का संकल्प लिया । स्वभाषा का यह सूत्र ही अंग्रेजों से मुक्ति का महामंत्र बना । यह संस्कृत का “वंदे मातरम्” और हिन्दी में ” अंग्रेजो भारत छोड़ो” उद्घोष ही था कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्र करने के लिये विवश हुये । देश भर में स्वभाषा चेतना ने अंगड़ाई ली । यह स्वराष्ट्र और स्वभाषा के साधकों की तपस्या थी कि 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई ।

संसार में हिन्दी की व्यापकता

हिन्दी संसार में तीसरी सबसे महत्वपूर्ण भाषा है । पूरी दुनियाँ में पचास से अधिक देश हैं जिनमें हिन्दी जानने वाले या समझने वाले लोगों बड़ी संख्या है । अनेक देशों अपनी भाषा है, वहाँ निवासियों ने हिन्दी कभी नहीं पढ़ी फिर भी वे हिन्दी समझ लेते हैं । इनमें पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, म्यामार, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका और अफगानिस्तान जैसे देश हैं जिनके निवासी हिन्दी भले न जाने पर हिन्दी में संदेश समझ लेते हैं । इन देशों में हिन्दी समझने और जानने वालों की संख्या चौदह करोड़ के आसपास मानी गई है । इनके अतिरिक्त अमेरिका और ब्रिटेन सहित पच्चीस से अधिक देश ऐसे हैं जिनके अनेक विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग है और हिन्दी के शिक्षक भी हैं। फिजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम और नेपाल आदि देश ऐसे हैं आम बोलचाल में भी हिन्दी देखी सुनी जा सकती है । इस प्रकार पूरी दुनियाँ में लगभग सवा सौ करोड़ लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं। इनमें अस्सी करोड़ लोग भारत में निवास करते हैं। इनमें साठ करोड़ भारतीय हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते हैं। न्यूजीलैंड में हिन्दी चौथी महत्वपूर्ण भाषा मानी गई है ।

हिन्दी के प्रचार के प्रयास

संसार की वैज्ञानिक भाषा और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये भारत में आयोजित यह राष्ट्रीय हिन्दी दिवस एक दिन का नहीं होता । इसके आयोजन पूरे सप्ताह चलते हैं और अलग अलग दिनों में अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। इनमें लेखन, संभाषण, वाद विवाद अथवा तात्कालिक प्रश्नोत्तरी आदि शामिल हैं। आयोजन कार्यालयों में भी होते हैं और विद्यालयों में भी । इनमें अच्छी भाषा शैली का प्रस्तुतिकरण करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया जाता है । इन पुरस्कारों के नाम में आंशिक बदलाव किया गया । अब ये पुरस्कार किसी व्यक्ति नाम पर देने की बजाय “राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार” और “राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार” जैसे नाम से दिये जाते हैं । इसमें राजभाषा गौरव पुरस्कार दस हजार से लेकर दो लाख रुपये तक है । इस श्रंखला में कुल तेरह पुरस्कार दिये जाते हैं जो तकनीकी और विज्ञान विषय पर लिखने वाले प्रतिभागी को दिया जाता है। इसमें कुल तेरह पुरस्कार होते हैं। प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को दो लाख रूपए, द्वितीय को डेढ़ लाख और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये के अतिरिक्त दस लोगों को दस-दस हजार रूपए प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किया जाता है। वहीं राजभाषा कीर्ति पुरस्कार कुल 39 प्रतिभागियों को दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्य करने पर दिये जाते हैं।
यह भारत सरकार और प्रांतीय सरकारों के प्रोत्साहन प्रयत्नों और समाज की जाग्रति का परिणाम है कि अब “राष्ट्रीय हिन्दी दिवस” के आयोजन केवल औपचारिकता भर नहीं रह गये । पूरा समाज और विशेषकर युवा पीढ़ी उत्साह से हिस्सा लेती है । भारतीयों में हिन्दी के प्रति अटूट प्रेम है कि अब भारत ने अंगड़ाई ली है । विश्व में अपनी प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने की स्पर्धा में सबसे आगे है । और क्यों न हो धरती के हर भूभाग की अपनी केमिस्ट्री होती है जिसका प्रभाव केवल फसलों की विविधता या प्राणियों की शक्ल सूरत पर ही नहीं होता अपितु मनुष्य के स्वभाव ज्ञान बुद्धि, प्रतिभा, मेधा और कर्म शक्ति पर भी होता है। प्रत्येक क्षेत्र में अपनी भाषा में विविधता होती है । उस भूक्षेत्र के निवासी जब अपने मूल से जुड़कर आगे बढ़ते हैं तो शीर् की यात्रा सुगम होती है । अपने क्षेत्र की भाषा और मिट्टी की गंध न केवल व्यक्ति में स्वाभिमान को जगाती है अपितु उसके प्रगति यात्रा में ऊर्जा भी देती है । इसलिए अब नये दौर में स्वभाषा हिन्दी के प्रति भारतीयों का बढ़ता प्रेम ही उन्हे आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है । आशा की जानी चाहिए कि प्रति वर्ष की भाँति इस वर्ष भी “राष्ट्रीय हिन्दी दिवस” का आयोजन भारतीय युवाओं को स्वाभिमान और प्रतिष्ठा की दिशा में आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित करेगा ।

हिन्दी की प्रतिष्ठा में अग्रणी मध्यप्रदेश

भारत में हिन्दी प्रतिष्ठित हो भावना लगभग सभी नेतृत्व कर्ताओं की रही है । संविधान सभा और संसद में भी अनेक बार प्रसंग आये । संविधान सभा की भावना के अनुरूप भारत सरकार ने 1953 से राष्ट्रीय हिन्दी दिवस आयोजन की अधिकृत घोषणा की और 18 जनवरी 1968 को भारतीय संसद में शासकीय कार्य हिन्दी में करने का संकल्प भी पारित किया । पर कार्य वैसी गति न ले सका जैसी संसद की भावना रही थी । पर इसकी पहल देश के हृदय प्राँत मध्यप्रदेश ने की । मध्यप्रदेश ने न केवल हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना की अपितु इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई भी हिन्दी में प्रारंभ की । मध्यप्रदेश के इन कार्यों की प्रशंसा पिछले दिनों प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी की । इससे पूर्व वर्ष 2016 में भोपाल में संपन्न विश्व हिन्द सम्मेलन में मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने प्रशासनिक कार्य हिन्दी में करने की घोषणा की थी । उसके अनुरूप शासन की अधिकांश योजनाओं का विवरण हिन्दी में आ चुका है । अनेक पोर्टल भी हिन्दी में आरंभ हो चुके हैं ।
हिन्दी की प्रतिष्ठा यात्रा में गति के लिये समाज को संकल्प के साथ आगे आना होगा । लेकिन वह दिन दूर नहीं जब हमारी हिन्दी भारत राष्ट्र के साथ विश्व में प्रतिष्ठित होगी ।

वीआईपी संस्कृति: भारत के लोकतंत्र पर एक धब्बा

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अनेकों बार आपके साथ ऐसा हुआ होगा। आप जल्दी में अपने गंतव्य पर पहुंचना चाहते हैं, लेकिन चौराहे पर ट्रैफिक रुका हुआ है क्योंकि किसी वीआईपी को उधर से गुजरना है। आप किसी बड़े मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लगे हैं तभी नेताजी अपने चमचों के साथ आगे बढ़ते चले जाते हैं, बिना रोक टोक के।

भारत की व्यापक वीआईपी संस्कृति देश की अलोकतांत्रिक और सामंती मानसिकता की एक कठोर याद दिलाती है। यह अभिजात्य घटना इस धारणा को कायम रखती है कि कुछ व्यक्ति दूसरों की तुलना में अधिक समान हैं, जो कानून के शासन और समाजवादी मूल्यों को नकारती है। यह वर्ग पूर्वाग्रह को मजबूत करता है, भेद भाव और संपन्न एवं वंचितों के बीच मतभेदों को बढ़ाता है।

अभिजात्य संस्कृति न केवल आंखों में खटकती है, बल्कि प्रणालीगत असमानता के खिलाफ गहरी नाराजगी का प्रतिबिंब भी है। राजनेता और नौकरशाह विशेषाधिकार प्राप्त व्यवहार का आनंद लेते हैं, कारों के काफिले और कष्टप्रद सुरक्षा से घिरे रहते हैं, जबकि आम लोगों को छोटा और महत्वहीन महसूस कराया जाता है।

मोदी सरकार की सांकेतिक पहलों ने इस हानिकारक जनविरोधी संस्कृति को खत्म करने के लिए बहुत कम असर किया है। वर्तमान व्यवस्था के लिए सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक समीकरणों को बदलने के लिए प्रमुख समानता पहल शुरू करने का समय आ गया है। भारत को एक अधिक मानवीय, समतावादी समाज की आवश्यकता है जो सभी नागरिकों के नागरिक अधिकारों का सम्मान करे, न कि केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का।

भारत में वीआईपी संस्कृति की जड़ें औपनिवेशिक युग में हैं, जब अंग्रेजों ने अपने हितों की सेवा के लिए अभिजात वर्ग का एक वर्ग बनाया था। स्वतंत्रता के बाद, यह संस्कृति जारी रही, जिसमें नए शासक वर्ग ने अपने औपनिवेशिक पूर्ववर्तियों के समान ही प्रथाओं और दृष्टिकोणों को अपनाया।

वीआईपी संस्कृति की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्तियों में से एक है कारों पर लाल बत्ती का उपयोग, जो शक्ति और विशेषाधिकार का प्रतीक है। उन पर प्रतिबंध लगाने के प्रयासों के बावजूद, कई राजनेता और नौकरशाह उनका उपयोग करना जारी रखते हैं, जो उनके अधिकार की भावना और कानून के प्रति उपेक्षा को दर्शाता है।

राजनेताओं और नौकरशाहों के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था वीआईपी संस्कृति का एक और पहलू है। जबकि सुरक्षा उन लोगों के लिए आवश्यक है जो वास्तविक खतरों का सामना करते हैं, इसे अक्सर उन लोगों द्वारा स्टेटस सिंबल के रूप में उपयोग किया जाता है जो नहीं करते हैं।

वीआईपी संस्कृति का सार्वजनिक सेवाओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। वीआईपी की ज़रूरतें और हित आम लोगों की ज़रूरतों और हितों से ज़्यादा अहमियत रखते हैं, जिससे असमानता बढ़ती है और संस्थाओं में लोगों का भरोसा कम होता है।

वीआईपी संस्कृति को खत्म करने के लिए, अंतर्निहित सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करना ज़रूरी है। इसके लिए समावेशी विकास को बढ़ावा देने, संसाधनों और अवसरों तक समान पहुँच सुनिश्चित करने और धन और शक्ति का अधिक न्यायसंगत वितरण बनाने के लिए एक ठोस प्रयास की आवश्यकता है।

सरकार को वीआईपी संस्कृति के प्रतीकों और प्रथाओं को खत्म करने, यह सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए कि सार्वजनिक सेवाएँ सभी नागरिकों के लिए सुलभ और उत्तरदायी हों, और पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के शासन के लिए प्रतिबद्ध हों।

भारत में वीआईपी संस्कृति देश के लोकतंत्र पर एक धब्बा है, जो समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों को कमज़ोर करती है, सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को बढ़ाती है, और आम लोगों में अलगाव और आक्रोश की भावना पैदा करती है। अधिक समावेशी और समतावादी समाज बनाने के लिए, वीआईपी संस्कृति को खत्म करना और समानता और सामाजिक न्याय की संस्कृति को बढ़ावा देना ज़रूरी है। बदलाव का समय अब ​​आ गया है।

World Ozone Day 2024 celebrated in New Delhi with the theme: “Montreal Protocol – Advancing Climate Actions”

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·        Union Environment Secretary Stresses the importance of the Montreal Protocol for Effective Climate Change Mitigation

·        Prime Minister’s ‘Ek Ped Maa Ke Naam’ initiative promotes a sustainable future and protects Mother Earth: Ms. Leena Nandan

Delhi : The Ministry of Environment, Forest and Climate Change organised an event to mark the 30th World Ozone Day in New Delhi today. The theme for World Ozone Day 2024 is “Montreal Protocol: Advancing Climate Actions” reflecting the Montreal Protocol’s crucial role in both protecting the ozone layer and driving broader climate action initiatives globally. World Ozone Day reminds us that the ozone layer is essential for life on Earth and highlights the need for ongoing climate action to protect it for future generations. Ms Leena Nandan, Union Secretary of the Ministry of Environment, Forest and Climate Change presided over the event.

Speaking at the event, Ms Leena Nandan highlighted that rising temperatures are leading to increased use of cooling systems like refrigerators and air conditioners, which in turn worsen the temperature rise, creating a vicious cycle. She emphasized that effectively implementing the Montreal Protocol is crucial and deeply intertwined with our broader efforts to combat climate change.
She emphasized that India has been leadership in the Montreal Protocol implementation, especially the reduction targets of controlled substances achieved ahead of schedule under the Protocol, which has not only shielded the ozone layer but has also been making substantial contributions to global efforts to combat climate change.

She also highlighted the other initiatives of the ministry including Mission LiFE (Lifestyle for Environment), a campaign to promote and encourage a sustainable and environmentally conscious way of living through mindful individual choices and decisions in daily life towards environment-conscious lifestyle. She also emphasized the significance of the national initiative of the Prime Minister ‘Ek Ped Maa Ke Naam’ which is vital for a sustainable future and the protection of Mother Earth.

The winning entries of the National Level Poster and Slogan Competitions were announced. These competitions aimed at raising awareness about ozone layer protection and climate-friendly lifestyles to combat global warming, received an overwhelming response with 4,187 poster entries and 1,299 slogan entries submitted through a dedicated web portal.

The 26th Edition of the Montreal Protocol: India’s Success Story, Action Plan for Implementation of Recommendation of India Cooling Action Plan w.r.t Transport Air Conditioning Sector and the third edition of News TRAC, a quarterly news magazine for RAC technicians were released. A few guidebooks were also released including “Sustainable Technologies for Cold Chain Sector, Sustainable Refrigeration and Air-conditioning Equipment and Passive Cooling Strategies for Sustainable Buildings.

India, as a Party to the Montreal Protocol since June 1992, has been successfully implementing the Montreal Protocol and its ozone-depleting substances phase-out projects and activities in line with the phase-out schedule of the Protocol. India has phased out Chlorofluorocarbons, Carbon tetrachloride, Halons, Methyl Bromide and Methyl Chloroform for controlled uses as on 1 January 2010, in line with the Montreal Protocol phase-out schedule. Currently, Hydrochlorofluorocarbons (HCFCs) are being phased out as per the accelerated schedule of the Montreal Protocol.

The event was participated by Ms Neena Pahuja, Executive Member of NCVET, Ms Rajashree Ray, Economic Advisor in MoEFCC, Mr. Valentin Foltescu from UNEP, Ms Angela Lusigi from UNDP, Mr. Aditya Narayan Singh, Scientist in the ministry, Subject Experts and around 500 school children.

 

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