ताज नगरी: भारत का बहुआयामी रत्न, नकारात्मक प्रचार का शिकार है

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दशकों से, आगरा नकारात्मक छवि का शिकार रहा है। आगरा विरोधी लॉबी ने शहर को गंदा, असुरक्षित, प्रदूषित, धोखेबाजों से भरा और रात में ठहरने के लिए अनुपयुक्त बताया है।

दुर्भाग्य से, विरासत संरक्षण में आगरा के योगदान और लघु उद्योग क्षेत्र में इसके उत्कृष्ट प्रदर्शन को शायद ही कभी मान्यता दी गई हो। ताज-केंद्रित पर्यटन पर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने के कारण, लाभकारी रोजगार के अन्य क्षेत्रों पर कम ध्यान दिया गया।

स्थानीय लोगों का मानना ​​है कि “आगरा, जो ऐतिहासिक रूप से अपने शानदार स्मारकों के लिए जाना जाता है, अक्सर नकारात्मक रूढ़िवादिता से प्रभावित होता है।” लेकिन, करीब से देखने पर पता चलता है कि शहर में सकारात्मकता की एक समृद्ध झलक है जो इसके अनूठे आकर्षण और जीवंतता में योगदान करती है।

विश्व धरोहर स्मारकों के रूप में पहचाने जाने वाले तीन वास्तुशिल्प चमत्कारों – ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी के अलावा, आगरा चमड़े के जूते, लौह फाउंड्री क्लस्टर जैसे विविध उत्पादों का एक अग्रणी विनिर्माण केंद्र रहा है, जिसने हरित क्रांति और वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्र में योगदान दिया, फिरोजाबाद से कांच के बने पदार्थ की रेंज जो आगरा जिले का हिस्सा थी। आगरा का अतीत गौरवशाली रहा है और भविष्य सकारात्मक दिखता है। हाल ही में इन दो ऐतिहासिक स्थलों को जोड़ने वाली मेट्रो प्रणाली की शुरूआत ने न केवल पर्यटकों के लिए परिवहन को आसान बनाया है, बल्कि शहर के बुनियादी ढांचे और पहुंच में भी सुधार किया है। यह विकास अपने ऐतिहासिक खजाने को संरक्षित करते हुए आधुनिकीकरण के लिए आगरा की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। “आगरा सिर्फ़ पर्यटन केंद्र ही नहीं है, बल्कि एक औद्योगिक शहर भी है, जहाँ उद्यमी वर्ग काफ़ी विकसित है। यह शहर अपनी लोहे की ढलाई, चमड़े के जूते, कांच के बर्तन, पेठा (एक स्थानीय मिठाई), हस्तशिल्प, ज़रदोज़ी कढ़ाई और कालीन बुनाई के लिए प्रसिद्ध है। आगरा के संपन्न उद्योग न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं, बल्कि शहर की शिल्पकला और कलात्मक विरासत को भी प्रदर्शित करते हैं,” उद्योग जगत के एक नेता राजीव गुप्ता कहते हैं। जब आधे से ज़्यादा भारत अंधकारमय था, तब आगरा के व्यापारी मुगल राजकुमारों और ईस्ट इंडिया कंपनी को पैसे उधार देते थे। जब औपचारिक बैंकिंग प्रणाली भारत में नहीं आई थी, तब आगरा का व्यापारी वर्ग व्यापार के लिए ड्राफ्ट और हुंडी जारी करता था। “शहर में तेल मिलें, आटा मिलें, कताई मिलें, कच्चा लोहा पाइप और मैनहोल बनाने वाली इकाइयाँ थीं, साथ ही कांच उद्योग भी थे। शहर का औद्योगिक विकास विरासत संरक्षण से नहीं टकराया, जैसा कि स्वार्थी समूहों ने कहा था,” हरित कार्यकर्ता डॉ देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं। यात्रियों द्वारा लिखे गए ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि मध्यकालीन युग में आगरा एक चमकता हुआ रत्न था, जो यूरोप के शहरों की तुलना में अधिक विकसित महानगर था।

इसके अलावा, यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि आगरा कई अग्रणी संस्थानों का घर है जो प्रगति और कल्याण के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। इसमें भारत का पहला मानसिक अस्पताल है, जो मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के प्रति शहर के प्रयासों को दर्शाता है। एसएन मेडिकल कॉलेज और आगरा विश्वविद्यालय जैसे संस्थान शिक्षा और अनुसंधान के लंबे समय से स्तंभ रहे हैं, जिसने आगरा को इस क्षेत्र में एक शैक्षिक केंद्र के रूप में स्थापित किया है। यूरोप के बाहर पहला कॉन्वेंट 1842 में फ्रांसीसी ननों द्वारा स्थापित किया गया था।

आगरा की बहुसांस्कृतिक विरासत इसके महानगरीय चरित्र का प्रमाण है। शहर में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, अर्मेनियाई और अन्य लोगों की एक विविध आबादी है, जो परंपराओं और विश्वासों के अपने समृद्ध ताने-बाने में योगदान करते हैं। यह सांस्कृतिक विविधता कई स्मारकों, मंदिरों, चर्चों और मस्जिदों में परिलक्षित होती है जो शहर के परिदृश्य को दर्शाती हैं, जो आगरा के विश्वासों और इतिहास के उदार मिश्रण को प्रदर्शित करती हैं। आगरा का आध्यात्मिक महत्व विभिन्न धार्मिक आंदोलनों के केंद्र के रूप में इसकी स्थिति से और भी अधिक स्पष्ट होता है। शहर में चार शिव मंदिर हैं, जो इसकी गहरी आध्यात्मिक परंपराओं को दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त, आगरा राधास्वामी मत के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करता है और दयालबाग कम्युनिटी डेवलपमेंट से जुड़े प्रयोगों का घर रहा है, जो आध्यात्मिक ज्ञान और सद्भाव को बढ़ावा देने में इसके महत्व को दर्शाता है। इसके अलावा, आगरा की सामाजिक चेतना जालमा के कुष्ठ रोग केंद्र जैसी पहलों के माध्यम से उदाहरणित होती है। मानवता के प्रति यह समर्पण आगरा के दयालु लोकाचार और हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए समावेशिता और समर्थन की दिशा में इसके प्रयासों को रेखांकित करता है। भौगोलिक दृष्टि से, आगरा का रणनीतिक स्थान इसके आकर्षण और महत्व को बढ़ाता है। राजस्थान के रेगिस्तान, दोआब क्षेत्र, दक्कन के पठार, अरावली पर्वतमाला और चंबल और यमुना के घाटियों के करीब स्थित, आगरा में एक विविध स्थलाकृति है जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता और आकर्षण को बढ़ाती है। शहर की समृद्ध, उपजाऊ मिट्टी इसके कृषि महत्व और व्यापार और वाणिज्य के केंद्र के रूप में ऐतिहासिक विरासत को और भी अधिक रेखांकित करती है। अंत में, मुगल और ब्रिटिश विरासत से प्रभावित आगरा की ऐतिहासिक विरासत, वास्तुकला की भव्यता और सांस्कृतिक समृद्धि का एक अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती है। शहर की सदियों पुरानी संस्थाएँ और संरचनाएँ इसके शानदार अतीत और स्थायी विरासत के प्रमाण के रूप में खड़ी हैं, जो इतिहासकारों, विद्वानों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करती हैं।

भारत के संदर्भ में हमें गढ़ने होंगे अपने विमर्श

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ग्वालियर : आज वैश्विक स्तर पर भारत के विरुद्ध कई झूठे विमर्श गढ़े जा रहे हैं। हाल ही के समय में इस प्रक्रिया ने कुछ रफ्तार पकड़ी है। विमर्श के माध्यम से जनता के मानस को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। विमर्श सत्य, अर्द्धसत्य अथवा झूठ भी हो सकता है। यह, विमर्श गढ़ने वाले व्यक्ति द्वारा किन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु इसे गढ़ा जा रहा है, पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए कुछ देशों के सम्बंध में प्रायः कुछ विमर्श गढ़े गए हैं, जैसे, अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वहां सामान्यतः व्यापार पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ब्रिटेन के बारे में धारणा है कि वहां राजनीति पर अधिक ध्यान दिया जाता है। जर्मनी के सम्बंध में कहा जाता है कि वहां युद्ध कौशल के बारे में अधिक चर्चा की जाती है। इसी प्रकार, भारत के बारे में पूरे विश्व में धारणा है कि यहां आध्यात्मिकता की पराकाष्ठा रही है। परंतु, अब पूरे विश्व में विशेष रूप से भारत के संदर्भ में पुराने विमर्श टूट रहे हैं और नित नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं। भारत चूंकि, हाल ही के समय में वैश्विक स्तर पर एक मजबूत आर्थिक ताकत बन कर उभर रहा है, भारत की यह प्रगति कुछ देशों को रास नहीं आ रही है एवं ये देश भारत के सम्बंध में झूठे विमर्श गढ़ रहे हैं।

भारत की प्रगति को रोकने, कम करने अथवा प्रभावित करने के उद्देश्य से दरअसल, चार शक्तियों ने हाथ मिला लिए हैं। ये चार शक्तियां हैं, कट्टरवादी इस्लाम, प्रसारवादी चर्च, सांस्कृतिक मार्क्सवाद एवं वैश्विक बाजार शक्तियां। हालांकि उक्त चारों शक्तियों की अन्य देशों में आपसी लड़ाई है परंतु भारत के मामले में यह एक हो गई हैं और भारत में यह आपस में मिलकर भारत के हितों के विरुद्ध कार्य करती हुई दिखाई दे रही हैं।

पश्चिमी एवं भारतीय विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर है। जैसे भारत में व्यापार के मामले में “शुभ लाभ” की विचारधारा पर कार्य किया जाता है। परंतु, पश्चिमी देशों में पूंजीवाद का अनुसरण करते हुए व्यापार में अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया जाता है इसके लिए चाहे सामान्यजन को कितना ही नुक्सान क्यों नहीं उठाना पड़े, इसे “शुद्ध लाभ” की संज्ञा दी जाती है। और, इसी प्रकार, वामपंथी विचारधारा में अप्रत्यक्ष रूप से “शून्य लाभ” के लिए कार्य होता दिखाई देता है जिससे अंततः व्यापार ही समाप्त होने की ओर आगे बढ़ जाता है। पश्चिमी एवं अन्य कई देशों में आज पूंजीवाद की विचारधारा को ही अपना लिया गया है। जिसके परिणामस्वरूप केवल लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से व्यापार करने वाली अमेरिकी कम्पनियों की सम्पत्ति आज कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य करने वाली माइक्रोसॉफ्ट नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 3.126 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की हो गई है। एप्पल नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 2.65 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। ऐमेजोन नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सम्पत्ति 1.87 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। इसी प्रकार, मेटा नामक अमेरिकी कम्पनी की सम्पत्ति 1.23 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की है। अमेरिका ने अधिकतम लाभ अर्जन को मुख्य उद्देश्य मानकर पूंजीवाद को बढ़ावा दिया जिससे आज अमेरिका कई अरबपति बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का स्वर्ग बन गया है और आज इन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सम्पत्ति कई देशों के सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो गई है। ब्रिटेन, कनाडा, फ्रान्स आदि जैसी विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के आसपास है। भारतीय परम्परा में व्यापार में शुभ लाभ इसलिए कहा गया है क्योंकि भारतीय शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि व्यापार में होने वाले लाभ को 7 हिस्सों में बांटकर समाज में अति पिछड़ा वर्ग की मदद हेतु भी एक हिस्सा उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि अति गरीब वर्ग भूखा न रहे। यह संस्कार भारतीय नागरिकों में “वसुधैव क़ुटुम्बकम” की भावना का संचार करते है। इसी कारण से आज विश्व भर में फैले आतंकवाद से निपटने में केवल भारतीय सनातन संस्कृति ही सक्षम दिखाई देती है। अतः भारतीय सनातन संस्कृति को पूरे विश्व के हितार्थ समस्त देशों को अपनाना चाहिए, आज यह विमर्श खड़ा किए जाने की सख्त आवश्यकता है।

पश्चिमी देशों के नागरिकों के लक्ष्य भौतिक (जड़) हो रहे हैं और चेतना कहीं पीछे छूट रही है। केवल आर्थिक विकास अर्थात अर्थ का अर्जन करना ही जैसे इस जीवन का मुख्य उद्देश्य हो। परंतु, भारत के नागरिक सनातन संस्कृति का अनुसरण करते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास के प्रति भी सजग दिखाई देते हैं, अर्थात उनमें चेतना के दर्शन भी होते हैं। इसीलिए भारत ने विश्व में दिलों को जीता है एवं कभी भी किसी देश पर आक्रमण करते हुए उनकी भूमि के एक इंच हिस्से पर भी अपना कब्जा नहीं जमाया है। साथ ही, भारत में “संयुक्त परिवार ही भारतीय नागरिकों के सुख का आधार है”। पश्चिमी देशों में तो आज संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं और इसके दुष्परिणाम के रूप में वहां पर सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होता दिखाई दे रहा है। इन देशों में तलाक की दर बहुत अधिक है और इन देशों में नागरिक एक जीवन में 7 शादियां तक कर लेते हैं जबकि भारत में शादी को एक पवित्र बंधन मानते हुए पति-पत्नी के लिए विवाह नामक संस्था को 7 जन्मों का बंधन माना जाता है। एक से अधिक शादियां करने के चलते पश्चिमी देशों में बच्चों को अपने पिता के बारे में ही जानकारी नहीं रह पाती है। बुजुर्ग दम्पति अपने अंतिम समय पर बहुत पीड़ादायी जीवन जीने को मजबूर हैं। बच्चों में हिंसा की प्रवृति बढ़ रही है एवं छोटे छोटे बच्चे डीप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। उक्त प्रकार की कई सामाजिक बुराईयों ने इन देशों में अपना घर बना लिया है। “भारत ने विश्व का दिल जीता है” एवं “भारतीय संयुक्त परिवार ही सुख का आधार है”, “सेवा कार्य भारतीय नागरिकों के DNA में है” जैसे विमर्श आज हम भारतीयों को गढ़ने की जरूरत है।

पश्चिमी विचारधारा में उत्पादों के अधिकतम उपभोग को जगह दी गई है। आज को अच्छी तरह से जी लें, कल किसने देखा है, यह पश्चिमी सोच, चर्च की प्रेरणा एवं भौतिकवाद पर आधारित है। इस्लाम एवं ईसाईयत में पुनर्जन्म पर विश्वास नहीं किया जाता है। जो कुछ भी करना है वह इसी जन्म में करना है। इसके ठीक विपरीत भारतीय सनातन संस्कृति पुनर्जन्म में विश्वास करती है इससे भारतीय नागरिकों द्वारा उपभोग में संयम बरता जाता है एवं उत्पादन में बहुलता होने की विचारधारा पर कार्य करते हुए दिखाई देते हैं। ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि “प्रभु इतना दीजिए कि मैं भी भूखा ना रहूं और अन्य कोई भी भूखा ना सोय”, यह भारतीय विचारधारा है। हिंदू एक जीवन पद्धति है इसे धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। धर्म का आश्य अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से है। जबकि कई बार हिंदू शब्द को धर्म से जोड़ दिया जाता है और हिंदू को एक अलग धर्म मान लिया जाता है। हिंदू राष्ट्र भारत की संकल्पना है।

अतः आज यदि कुछ विदेशी शक्तियां भारत के विरुद्ध झूठे विमर्श गढ़ने में व्यस्त हैं तो भारत को भी अपने बारे में सत्य पर आधारित विमर्श गढ़ने की महती आवश्यकता है। भारतीय सनातन संस्कृति तो इस धरा पर उपस्थित समस्त जीवों के भले की बात करती है, इसीलिए भारत में पर्वत, नदी, पेड़, पौधों, जंतुओं आदि को भी पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। परंतु, दुर्भाग्य से आज पूरे विश्व में हिंसा व्याप्त है। इस हिंसा को केवल और केवल भारतीय सनातन संस्कृति के संस्कारों को अपना कर ही रोका जा सकता है। भारत के बारे में वास्तविक एवं सत्य पर आधारित विमर्श को गढ़कर, इस विमर्श के माध्यम से विश्व के अन्य देशों के नागरिकों को भारतीय सनातन संस्कृति की ओर आकर्षित किया जा सकता है।

अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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ग्वालियर : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों एवं भारतीय समाज के लिए संघ के अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करना एक गर्व का विषय हो सकता है। संघ के स्वयंसेवक समाज में अपना सेवा कार्य पूरी प्रामाणिकता से बहुत ही शांतिपूर्वक तरीके से करते रहते हैं। वरना, भारत सहित पूरे विश्व में आज ऐसा माहौल बन गया है कि कुछ संगठन जो समाज में सेवा कार्य करते तो बहुत थोड़ा है परंतु उस कार्य का बहुत अधिक प्रचार प्रसार करते हैं। इसके ठीक विपरीत संघ के स्वयंसेवक चुपचाप समाज में अपने ईश्वरीय कार्य को सम्पादित करते रहते हैं, कई बार तो संघ के पदाधिकारियों को भी इस बात का आभास नहीं हो पाता है कि हमारे संघ के स्वयंसेवकों ने समाज में कोई विशेष सेवा कार्य सम्पन्न किया है। दरअसल, संघ के स्वयंसेवकों को यह संस्कार संघ की शाखा में प्रदान किए जाते हैं। और, इसी प्रकार की कई अन्य विशेषताओं के चलते, आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे विश्व में सबसे बड़ा सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन कहा जाने लगा है।

भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में शायद ही कोई ऐसा संगठन रहा होगा जो अपनी स्थापना के समय से ही निर्धारित किए गए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की ओर लगातार सफलतापूर्वक आगे बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उस समय हुई थी, जब अंग्रेजों की दासता में भारतीय संस्कृति का सर्वनाश हो रहा था। इससे व्यथित होकर डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना विजयादशमी के पावन अवसर पर वर्ष 1925 में की थी। मार्च 2024 में संघ की नागपुर में आयोजित प्रतिनिधि सभा में उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 922 जिलों, 6597 खंडों एवं 27,720 मंडलों में 73,117 दैनिक शाखाएं हैं, प्रत्येक मंडल में 12 से 15 गांव शामिल हैं। समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में संघ की प्रेरणा से 40 से अधिक विभिन्न संगठन अपना कार्य कर रहे हैं जो राष्ट्र निर्माण तथा हिंदू समाज को संगठित करने में अपना योगदान दे रहे हैं। देश में राजनैतिक कारणों के चलते संघ पर तीन बार प्रतिबंध भी लगाया गया है – वर्ष 1948, वर्ष 1975 एवं वर्ष 1992 में – परंतु तीनों ही बार संघ पहिले से भी अधिक सशक्त होकर भारतीय समाज के बीच उभरा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ “हिंदू” शब्द की व्याख्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में करता है जो किसी भी तरह से (पश्चिमी) धार्मिक अवधारणा के समान नहीं है। इसकी विचारधारा और मिशन का जीवंत सम्बंध स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद, बाल गंगाधर तिलक और बी सी पाल जैसे हिंदू विचारकों के दर्शन से हैं। विवेकानंद ने यह महसूस किया था कि “एक सही अर्थों में हिंदू संगठन अत्यंत आवश्यक है जो हिंदुओं को परस्पर सहयोग और सराहना का भाव सिखाए”।

स्वामी विवेकानंद के इस विचार को डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने व्यवहार में बदल दिया। उनका मानना था कि हिंदुओं को एक ऐसे कार्य दर्शन की आवश्यकता है जो इतिहास और संस्कृति पर आधारित हो, जो उनके अतीत का हिस्सा हो और जिसके बारे में उन्हें कुछ जानकारी हो। संघ की शाखाएं “स्व” के भाव को परिशुद्ध कर उसे एक बड़े सामाजिक और राष्ट्रीय हित की भावना में मिला देती हैं। वस्तुतः यह कह सकते हैं कि हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र करने व हिंदू समाज, हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा कर राष्ट्र को परम वैभव तक पहुंचाने के उद्देश्य से डॉक्टर साहब ने संघ की स्थापना की। आज संघ का केवल एक ही ध्येय है कि भारत को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित करना।

संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार जी की दृष्टि हिंदू संस्कृति के बारे में बहुत स्पष्ट थी एवं वे इसे भारत में पुनः प्रतिष्ठित कराना चाहते थे। डॉक्टर साहब के अनुसार, “हिंदू संस्कृति हिंदुस्तान का प्राण है। अतएव हिंदुस्तान का संरक्षण करना हो तो हिंदू संस्कृति का संरक्षण करना हमारा पहला कर्त्तव्य हो जाता है। हिंदुस्तान की हिंदू संस्कृति ही नष्ट होने वाली हो तो, हिंदू समाज का नामोनिशान हिंदुस्तान से मिटने वाला हो, तो फिर शेष जमीन के टुकड़े को हिंदुस्तान या हिंदू राष्ट्र कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि राष्ट्र जमीन के टुकड़े का नाम तो नहीं है …… यह बात एकदम सत्य है। फिर भी हिंदू धर्म तथा हिंदू संस्कृति की सुरक्षा एवं प्रतिदिन विधर्मियों द्वारा हिंदू समाज पर हो रहे विनाशकरी हमलों को कांग्रेस द्वारा दुरलक्षित किया जा रहा है, इसलिए इस अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आवश्यकता है।”

जिस खंडकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी वह मुस्लिम तुष्टिकरण का काल था। वर्ष 1920 में देश में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ। मुसलमानों का नेतृत्व मुल्ला-मौलवियों के हाथों में था। इस खंडकाल में मुसलमानों ने देश में अनेक दंगे किए। केरल में मोपला मुसलमानों ने विद्रोह किया। उसमें हजारों हिंदू मारे गए। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण के कारण हिंदुओं में अत्यंत असुरक्षिता की भावना फैली थी। हिंदू संगठित हुए बिना मुस्लिम आक्राताओं के सामने टिक नहीं सकेंगे, यह विचार अनेक लोगों ने प्रस्तुत किया और इस प्रकार हिंदू हितों के रक्षार्थ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। संघ के प्रयासों से भारत में विस्मृत राष्ट्रभाव का पुनर्जागरण प्रारम्भ हुआ।

स्वामी विवेकानंद ने वेदांत के आधार पर सार्वभौम हिंदुत्व का प्रचार किया। आधुनिक भारत के अंतरराष्ट्रीय शंकराचार्य के रूप में उन्हें प्रतिष्ठित किया जा सकता है। उनके प्रयासों से हिंदू धर्म का न केवल उद्धार हुआ, अपती हिंदू समाज को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित भी किया। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, राजनारायण बोस, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, योगी अरविंद, डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जैसे हिंदू हितचिंतकों ने विश्व के समक्ष यह संदेश दिया कि हिंदुस्तान में राष्ट्रीय एकता का आधार हिंदू धर्म है और स्वयं हिंदू एक धर्म प्रधान एवं प्रकृति के सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधार जीवन पद्धति है।

पश्चिमी देशों में जीवन के लक्ष्य का सदैव अभाव रहा है। भौतिक सुख-समृद्धि ही जीवन का मानक बन गया था। इसलिए पश्चिमी देश असंवेदनशील हो गए थे। साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद जैसी वैचारिकी इस भौतिकवादी पृष्ठभूमि की उपज रही है। भौतिकता की अंधी दौड़ ने अंततः नाजीवादी, फासीवाद एवं साम्यवाद जैसे विचारों को जन्म देकर पश्चिमी देशों को महायुद्धों की विनाशलीला में झोंक दिया था। स्वामी विवेकानंद जैसे हिंदू चिंतकों द्वारा पश्चिमी देशों में हिंदुत्व के आदर्शों को प्रस्थापित कर उन्हें अंधकार से अलग करने का प्रयास किया गया था। हिंदू आदर्शों का यदि अनुपालन किया जाता तो सम्भवत: मानवीय विनाश के उन दृश्यों को रोका जा सकता था जो विश्व मानव की छाती पर एक भीषण घटित दुर्घटना के चोट के चिन्ह रूप में विद्यमान है। स्वामी विवेकानंद ने जीवन जीने के लक्ष्य एवं मानव संस्कृति के मूल रहस्यों को पश्चिमी समाज के समक्ष उद्घाटित किया था। स्वामी विवेकानंद के प्रयासों से पश्चिमी समाज में हिंदुत्व के प्रति एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ था और लोग हिंदू संस्कृति के मूल रहस्यों को जानने के लिए आकर्षित हुए। स्वामी विवेकानंद को हिंदू राष्ट्रीयता का विश्व में प्रथम उद्घोषक कहा जा सकता है। उन्होंने विश्व के समक्ष भारत की मूल्यवान आध्यात्मिक धरोहर को प्रतिष्ठित किया तथा हिंदू धर्म के मूल रहस्यों से विश्व को अवगत कराया। स्वामी रामतीर्थ, महर्षि दयानंद, डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार, महात्मा गांधी, डॉक्टर अम्बेडकर, एम एस गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगढ़ी जैसे चिंतकों ने हिंदुओं को चिंतन की एक नयी शैली एवं विधा से सुसज्जित कर हिंदुत्व के पुनरुत्थान का सार्थक प्रयास किया। उक्त हिन्दू चिंतकों ने विश्व समुदाय में हिन्दुत्व के प्रति फैले भ्रम को न केवल दूर करने का प्रयास किया, अपितु हिन्दुस्तान में सनातन संस्कृति के प्रति जो वैषम्यतापूर्ण विचारधाराएं बलवती हो रही थीं उन्हें भी प्रतिबन्धित करने का प्रयास किया। इन विचारकों ने सामाजिक समरसता स्थापित करने के लिए उन समस्त कुरीतियों को दूर करने का आह्वान भी किया।

मुगलकाल एवं ब्रिटिश शासन के अंतर्गत हिन्दू लोक जीवन विखंडित हो गया था। हिन्दू धर्म के मूल रहस्यों से अनभिज्ञ आक्रांताओं ने न केवल वैयक्तिक अधिकारों का हनन किया अपितु हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथों को भी नष्ट कर दिया। 1000 वर्षो तक सनातन संस्कृति विधर्मियों के प्रहार को झेलती हुई लगभग मृतप्राय बना दी गई थी। अब आवश्यकता है कि मूल्य परक हिन्दू जीवन पद्धति जिससे न केवल मानव अपितु प्रकृति एवं जीव-जन्तु जगत का भी उत्थान सम्भव है, उसे पुनः प्रतिष्ठित किया जाए। वस्तुतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आज भी लक्ष्य हिंदुओं को जाति, क्षेत्र और भाषा के कृत्रिम विभाजन के चलते उत्पन्न सामाजिक सांस्कृतिक विरोधभासों से उबारना है। इसकी आकांक्षा है कि भारत को विश्व गुरु का स्थान अपने कर्तृत्व, दर्शन और सांस्कृतिक प्रभाव से पुनः मिले। भारतीय समाज को संघ के इन प्रयासों से अपने आप को जोड़ना चाहिए तभी भारत को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकेगा।

वीर सीताराम कंवर के नेतृत्व में 78 क्राँतिकारियों के बलिदान

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सत्य और स्वत्वाधिकार की स्थापना के लिये महा भारत के बाद सबसे बड़े महा युद्ध 1857 में भारतीय वीरों की पराजय के बाद अंग्रेजों ने देश में स्थानीय स्तर पर दमन आरंभ किया । जिसमें उनका लक्ष्य वनवासी क्षेत्र ही रहे । इसका कारण यह था कि उस 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के बाद अधिकाँश क्राँतिकारी वनों में चले गये थे । अंग्रेजी टुकड़ियां उनकी तलाश करने वनों में टूट पड़ी । अंग्रेजी टुकड़ियों के वनवासियों पर हुये इस अत्याचार और आतंक का न तो कहीं विधिवत वर्णन मिलता है और न कहीं दस्तावेज । हाँ अंग्रेज अफसरों के पत्र व्यवहार में इसकी झलक अवश्य मिलती है । इसी से हम अनुमान लगा सकते हैं कि 1857 क्रांति की असफलता के बाद अंग्रेजों के दमन के कितने शिकार वनवासी अंचल ही हुये । इसमें मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल भी प्रमुख है । इस अंचल में नौ और दस अक्टूबर 1958 को अंग्रेजों ने जो दमन किया उसका विवरण रौंगटे खड़े कर देने वाला है । 9 अक्टूबर तिथि ऐसी है जब 78 क्राँतिकारियों के बलिदान हुये । उनके बाद अंग्रेजों डंग गाँव सहित आसपास के अनेक गांवो में सर्चिंग शुरू की ।

गांवो खेतों और जंगल में आग लगा दी, जो जहाँ दिखा उसे वहीं मौत के घाट उतारा । अंग्रेजों ने इस क्षेत्र में सामूहिक अत्यचार किये गाँव के गाँव उजाड़े । जो क्राँतिकारी नहीं थे उन्हे भी न छोड़ा । यह डंग गाँव अंग्रेजों के अत्याचार का शिकार इसलिये हुआ था कि वीर सीताराम कंवर का जन्म इसी डंग गाँव में हुआ था । उनके नेतृत्व में ही वनवासियों की टुकड़ी ने यहीं अंग्रेजी फौज से मुकाबला किया था । इस संघर्ष में 20 क्राँतिकारी मुकाबला करते हुये ही बलिदान हुये । वीर सीताराम कंवर का बलिदान होते ही शेष क्राँतिकारी बंदी बना लिये गये । इन बंदियों की संख्या 58 थी । जिन्हें कैंप में लगाकर तोप से उड़ा दिया गया । इस तरह इस संघर्ष में कुल 78 बलिदान हुये । अंग्रेजों ने वीर सीताराम कंवर का शीश काटा और तलवार में फंसा कर पूरे क्षेत्र में घुमाया । इसके पीछे अंग्रेजों की मंशा दहशत पैदा करना थी । यह काम अगले दिन यनि दस अक्टूबर को हुआ । वीर सीताराम कंवर के बलिदान के समाचार से फैले आतंक से गांव के गाँव खाली हो गये । अंग्रेजों ने गाँवों में मकानों को ध्वस्त किया । जो मिला उसका शीश काट दिया गया । इस अत्याचार में कुल कितने बलिदान हुये इसका विवरण नहीं मिलता । हाँ एक पत्र है जो मेजर कीटिंग ने अंग्रेज गवर्नर को लिखा था ।

जिसमें उसने 78 का तो आकड़ा दिया और लिखा कि “गांवो में कांम्बिग आपरेशन कर लिया गया, अब कोई विद्रोही न बचा” । यह पत्र 16 अक्टूबर 1858 का है । तब अंग्रेजों की तलाश अभियान में यह काम्बिग आपरेशन शब्द प्रचलित था । इसका आशय था कि जिस तरह कंघी से सिर में जुँये की तलाश की जाती है वैसा ही । हमें काम्बिग आपरेशन का आशय आसानी से समझा में आ सकता है कि तब क्या हुआ होगा । ऐजेंट मेजर कीटिंग और वायसराय के बीच यह पत्र व्यवहार पहला नहीं हैं । इससे पहले एक पत्र 27 सितम्बर 1858 का भी मिलता है जिसमें कीटिंग ने वायसराय को वीर सीताराम कंवर का मूवमेंट लिखा था और सूचना दी थी कि “वह सीताराम कंवर और विद्रोहियों को समाप्त करने दो टुकड़ियों के साथ डंग जा रहा है । इस पत्र में कीटिंग ने अंग्रेजी सेना में दो टुकड़ियों के नायक बदलने की भी सूचना दी थी । इन दोनों टुकड़ियों के नये नायकों के नाम फरज अली और दिलेर खाँ दर्ज हैं । अंग्रेजों का यह दमन अभियान इन्हीं के नेतृत्व में चला ।

आज भले प्रशासनिक और राजनैतिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ पृथक प्रांत हो लेकिन एक समय मालवा का निमाड़ क्षेत्र, महाकौशल और छत्तीसगढ़ एक ही साम्राज्य रहा करता था । इसे बोलचाल की भाषा में तो गोंडवाना कहते थे जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से इसका नाम महाकौशल हुआ करता था । इस राज्य की राजकुमारी कौशल्या ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी की माता रहीं हैं । उनकी जन्म स्थलि अब छत्तीसगढ़ में । इस पूरे अंचल में गौड़ वनवासी रहते हैं । जिनका उपनाम “कंवर” हुआ करता है । आज भी कंवर उपनाम के वनवासी जबलपुर, मंडला, छत्तीसगढ़ और निमाड़ क्षेत्र में मिलते हैं । इनका आंतरिक संगठन, ज्ञान और वीरता का भाव अद्भुत होता है । हर युग के विदेशी आक्रांता का मुकाबला इस समाज ने सदैव साहस और वीरता से किया है । इंदौर के होल्कर राज्य में भी अधिकांश मैदानी प्रधान के पद “कंवर” वीरों के पास ही रहे हैं ।

क्राँतिकारी वीर सीताराम कंवर का जन्म स्थल निमाड़ क्षेत्र में खरगोन जिले का डंग गाँव था । वे गोंडवाना राज्य का केन्द्र रहे जबलपुर में नायक शंकर शाह के यहाँ गुप्तचर विभाग के प्रमुख रहे हैं । लेकिन सितम्बर 1958 में अंग्रेजों ने गौंडवाना का दमन कर दिया था । वीर शंकर शाह और उनके पुत्र रघुनाथ शाह को तोप के मुँह पर बाँध कर उड़ाया था । गौंडवाना राज्य के दमन के बाद वीर सीताराम कंवर अपनी टोली के साथ निमाड़ आ गये थे । यहां उन्होंने होल्कर राज्य में पदाधिकारी वन वासियों से संपर्क किया और 1857 की क्रांति के भूमिगत नायकों से संपर्क किया और वनवासियों की टुकड़ी तैयार की । इसकी सूचना अंग्रेजों को लग गयी थी । यह भी माना जाता है कि गोंडवाना के दमन के साथ ही अंग्रेजों की नजर वीर सीताराम कंवर पर थी, उनके हर मूवमेंट पर अंग्रेजों की नजर थी । इसीलिए गोंडवाना के दमन के साथ ही कीटिंग को निमाड़ रवाना किया गया । वीर सीताराम कंवर के दमन के लिये अंग्रेजों ने तीन ओर से घेरा था । दो टुकड़ियाँ तो कीटिंग के साथ थीं । तीसरी टुकड़ी नागपुर से आई । जिसका कैंप बैतूल में था । डंग गाँव को को रात में ही घेर लिया गया था । मुकाबला बड़े सबेरे मुँह अंधेरे शुरु हो गया । इस कारण वनवासियों की टुकड़ी ठीक से संभल भी न पाई थी । फिर भी साहस से सामना हुआ । मुकाबला दो प्रहर तक चला । शाम तक कैंप की तलाशी और बंदी बनाये गये सिपाहियों का दमन, अगले दिन पूरे क्षेत्र में सर्चिंग, दमन, और अत्याचार । दमन का ऐसा अंधकार सहकर यह स्वतंत्रता की सुहानी सुबह हो सकी । सभी बलिदानियों को शत शत नमन्

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