भारतीय कुटुम्ब परंपरा ही अनुकरणीय

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पूरी दूनियाँ मानवीय मूल्यों की गिरावट और आचरण हीन होती युवा पीढ़ी और परिवार के बुजुर्गों की देखभाल की समस्या से परेशान है । अब माना जा रहा है कि परिवार परंपरा का विघटन ही वुजुर्ग पीढ़ी के तिरस्कार कारण है इसलिए पूरी दुनियाँ ने एक मत से समाज में बुजुर्गों का सम्मान स्थापित करने का निर्णय लिया है और इसके लिये 1 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की ।

एक ओर मानवीय विकास चन्द्रमा के पार पहुँच गया है । समृद्धि और साधनों का भी अंबार लग रहा है । पर इसके साथ एक बड़ी समस्या उन लोगों के सामने आ रही है जिन्होंने आसमान की ऊँचाइयों तक उड़ने की नींव रखी थी वर्तमान की इस पीढ़ी को उंगली पकड़कर आगे बढ़ना सिखाया था । जिस पीढ़ी ने रात दिन परिश्रम करके अपनी आने वाली संतानों केलिये स्वर्णिम भविष्य की इबारत लिखी थी, वह पीढ़ी अब अंपेक्षित और, असहाय हो रही है । समय के साथ शरीर थकता है, आय घटती है, बीमारियाँ बढ़तीं हैं। और अपनी बात कहने, सुनने, और हँसने बोलने की इच्छा होती है । तब लगता है कोई पास हो । जब इस पीढ़ी को सहयोग और साथ की सर्वाधिक आवश्यकता थी तब असहाय हो रही है । समय की तेज रफ्तार से आगे बढ़ता समाज अपने ही बुजुर्गों से कन्नी काटने लगा है । यह समस्या किसी एक देश की नहीं पूरे विश्व की है । इससे वह भारत भी अछूता नहीं रहा जहाँ कुटुम्ब परंपरा रही है । ऋग्वेद से लेकर सभी ग्रंथों में पितरों केलिये प्रार्थना है । एक ओर पूरी दुनियाँ के समाज शास्त्री भारत कुटुम्ब परंपरा पर शोध करके वृद्ध जनों के सम्मान का सूत्र ढूँढ रहे हैं, लेकिन अब भारत में भी संस्कृति के ह्रास के कारण बुज़ुर्ग पीढ़ी अब वृद्धाश्रमों में अपना भविष्य ढूंढ रही है। एक ओर पूरे विश्व में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर उनकी उपेक्षा भी । 2006 के आकड़ों के अनुसार विश्व में वृद्ध जनों की संख्या 11% थी जो 2016 में बढ़कर 14% हो गई। अनुमान है 2050 तक यह अनुपात 22% हो जायेगा । यह भी अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक स्तर पर वृद्ध व्यक्तियों की संख्या युवाओं से अधिक हो जाएगी, और यह वृद्धि विकासशील देशों में सबसे तेज़ होगी। इस परिदृश्य ने आने वाले समय के लिये अनेक प्रकार की चुनौतियों का संकेत दे दिया है । यदि समाज में चेतना नहीं आई तो स्थिति भयावह होगी । इस स्थिति पर 1982 से राष्ट्र संघ ने विश्व स्तर पर अध्ययन आरंभ किया ।

दुनियाँ भर के वृद्धजनों के सामने मुख्य रूप से छै प्रकार की समस्याएँ देखीं गईं। इनमें आयु बढ़ने के साथ शारीरिक रूप से दुर्बलता आना । ऊर्जा घटने और शारीरिक रोगों का कारण अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ती है । दूसरी समस्या मानसिक रोगों की है । शरीरिक क्षीणता के कारण जब शारीरिक रोग होने पर उचित देखभाल न हो तो मानसिक हीनता उत्पन्न होती है । यह मानसिक हीनता अनेक मानसिक रोगों को जन्म देती है । तीसरी समस्या अकेलेपन की होती है । वृद्धजन चाहते हैं कि कोई उनके पास बैठें जिससे वे अपने जीवन के अनुभव साँझा कर सकें । चौथी समस्याआर्थिक असुरक्षा की होती है । आय घटती है और बढ़ते रोगों के कारण व्यय बढ़ता है । तो आर्थिक असुरक्षा का भाव उत्पन्न होता है । पाँचवी समस्या संयुक्त परिवार के अभाव की होती है । बच्चे अपने केरियर के लिये घर से दूर पढ़ते हैं, जाॅव करते हैं तो उन्हे अपने बुजुर्गों से लगाव नहीं रहता । इसलिये वृद्धजनों को जब सबसे अधिक आवश्यकता होती है तब वे अकेले रह जाते हैं। और छठी समस्या सामूहिकता और मनोरंजन की समस्या भी देखी गई है । बुजुर्गों का भी मन होता है हँसने बोलने और घूमने फिरने का । पर समय के साथ वे अकेले हो जाते हैं। अनेक तो ऐसे उनके सामने रहने और, खाने तक की समस्या उत्पन्न हो जाती है ।

इन समस्याओं के समाधान केलिये संयुक्त राष्ट्र महासभा ने समाज में जागरूकता लाने केलिये यह मार्ग निकाला ।

संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने 14 दिसंबर 1990 को इन विन्दुओं पर विचार किया और एक संकल्प पारित किया । ताकि दुनियाँ भर में वृद्धों के साथ अपमान और तिरस्कार की बढ़ती घटनाएँ बंद हों एवं उन्हें समाज में उन्हें उचित सम्मान मिल सके । इस प्रस्ताव के माध्यम से प्रति वर्ष 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस का आयोजन होने लगा । पहली बार 1 अक्टूबर 1991 को वृद्धजन दिवस मनाया गया । इस दिवस के माध्यम से वुजुर्गों के प्रति समाज को दायित्वबोध कराने का अभियान आरंभ किया गया है । इसके लिये प्रतिवर्ष एक विशेष थीम होती है ।

इस वर्ष की थीम : गरिमा के साथ वृद्धावस्था

इस वर्ष 1 अक्टूबर 2024 को आयोजन होने वाले वृद्धजन दिवस की थीम “गरिमा के साथ वृद्धावस्था” है । जैसा कि इस वाक्य से ही स्पष्ट है कि इस वर्ष इस थीम के अंतर्गत दुनियाँ भर में बुजुर्गों के जीवन और उनके अनुभव के महत्व के प्रति जन जागरण अभियान चलाया जायेगा । वृद्ध व्यक्तियों की देखभाल और सहायता प्रणालियों को मजबूत करने का महत्व समझाया जायेगा। पिछले वर्ष की थीम समाज और परिवारों में वृद्धजनों के प्रति होरहे बुरे बर्ताव के विरुद्ध आवाज उठाना थी । वर्ष 2021 की थीम ‘सभी उम्र के लिये डिजिटल इक्विटी’ थी और वर्ष 2022 की थीम ‘बदलते विश्व में वृद्धजनों का समावेशन’ थी।
इस वर्ष के आयोजन में सभी बुजुर्ग के रहने की स्थिति, सुविधा, देखभाल केलिये समाज जागरण किरा जायेगा । विशेषकर बुजुर्ग महिलाओं पर अतिरिक्त ध्यान देने का प्रयास किया जायेगा। चूँकि वृद्धावस्था में महिलाओं को शारीरिक बीमारियाँ अपेक्षाकृत अधिक होती हैं । इसलिए इस वर्ष परिवार और समाज के विकास में महिलाओं के योगदान और वृद्धावस्था उनकी देखभाल की आवश्यकता समझाई जायेगी ।
इस वर्ष के कार्यक्रम में समाज के बीज समाजशास्त्री और प्रबुद्धजन मिलकर नीतियों, कानूनों और प्रथाओं पर चर्चा करेंगे तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिए देखभाल और सहायता प्रणालियों को सशक्त और सुगम बनाने पर चर्चा करेंगे । आवश्यक चिकित्सा सहायता और व्यवहारिक चिकित्सा प्रशिक्षण देने वृद्धाश्रमों सुविधा का विस्तार करने, देखभाल को व्यवहारिक बनाने पर जोर दिया जायेगा । इसके साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व स्तर पर आयु और लिंग आधारित डेटा भी तैयार किया है ताकि इन आँकड़ों के आधार पर भविष्य की योजनाओं का प्रारूप तैयार किया जा सके। इस अभियान में संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों, संस्थाओं और सहयोगी संगठनों को भी जोड़ा गया है । इन आँकड़ों के आधार पर समाज में लैंगिक असमानता को दूर करने एवं बुजुर्ग महिलाओं के प्रति अतिरिक्त जाग्रति लायी जायेगी ।

वृद्धजनों की सुरक्षा और देखभाल की योजनाएँ

भारत में यद्यपि वृद्धजनों की स्थिति में उतनी गिरावट नहीं है जितनी विश्व के पश्चिमी देशों में है । फिर भी यहाँ दोनों प्रकार के आँकड़े बढ़ रहे हैं। वृद्धजनों की संख्या भी और उनके साथ उपेक्षा अपमान के व्यवहार के भी ।
2001 के अनुसार भारत में वृद्धजनों की कुल जनसंख्या 7.7 करोड़ थी । इनमें 3.8 करोड़ पुरुष और 3.9 करोड़ महिलाएँ थीं की जनसंख्या क्रमशः 3.8 करोड़ और 3.9 करोड़ थी । जो कुल आबादी में लगभग 7% थी जो अब बढ़कर 11% प्रतिशत हो गई है । इसमें लगभग चार प्रतिशत वृद्धजन अकेलेपन के शिकार हैं। इनमें वह संख्या भी है जिन्हें आर्थिक समस्या उतनी नहीं है जितनी अकेलेपन की है । फिर भी दो करोड़ वृद्धजन ऐसे हैं जिन्हें स्वास्थ्य और अकेलेपन के साथ आर्थिक समस्या भी है । इनके लिये भारत सरकार ने तीनों प्रकार के कदम उठाये हैं। एक सेल्टर होम भी तैयार किये, दूसरा स्वास्थ्य योजना लागू की और तीसरा मासिक पेंशन देना भी आरंभ किया । पेंशन की यह योजना 1992 में हुई थी जिसमें 1997 में सुधार हुआ और 2017 में इसे बहुउद्देशीय बनाया गया ।
भारत सरकार की योजनाएँ दोनों प्रकार की हैं एक तो वृद्धजनों को सीधे सहायता करने की और दूसरी उन संस्थाओं को सहायता करने की भी जो वृद्धजनों की सेवा सुरक्षा में लगीं हैं । भारत सरकार ने “राष्ट्रीय वृद्धजन परिषद” का भी गठन किया है । इसकी स्थापना 1999 में गई थी । भारत सरकार ने चिकित्सा सहायता के अतिरिक्त गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले वृद्धजनों को वृद्धावस्था 600 रुपये प्रतिमाह पेंशन आरंभ की है। इसके साथ वरिष्ठ जनों को यात्रा केलिये रेल्वे के किराये में पच्चीस प्रतिशत रियायत का प्रावधान है जो करोना काल में बंद हो गया था लेकिन अब पुनः प्रारंभ हो गया ।

वृद्धजनों को सामाजिक और कानूनी सहायता

2017 में आरंभ प्रधानमंत्री वय वंदना योजना के अंतर्गत वृद्धजनों को सामाजिक और कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है ।
यह वरिष्ठ नागरिकों के लिये एक पेंशन योजना है। इस स्कीम के तहत 10 वर्षों की अवधि तक गारंटीड रिटर्न दर के आधार पर एक निश्चित या आश्वासित पेंशन दी जाती है और इसमें मासिक, तिमाही, छमाही अथवा वार्षिक आधार पर अपनी पेंशन का चयन करने का विकल्प दिया गया है। इसके साथ वृद्धजनों को संरक्षण देने केलिये कुछ कानूनी प्रावधान भी किये हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तो यही है कि वृद्धजन अपनी संपत्ति किसे देना चाहते हैं इसका निर्णय वे स्वयं कर सकते हैं। चाहें तो अपनी संतान को अपनी संपत्ति से बेदखल भी कर सकते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान है कि वृद्धजन यदि चाहें तो उनके मकान से संतान को निकालकर बाहर कर सकते हैं पुलिस प्राथमिकता से सहायता करेगी । तीसरी वे अपनी संतान से अपना गुजारा भत्ता ले सकते हैं।

राजा हो कर देश की समस्याएं नहीं सुलझा सकता कोई: नाना जी देशमुख

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दयानंद पांडेय

नाना जी देशमुख अब नहीं है। पर मेरा मानना है कि अगर देश में दस-बीस नाना जी देशमुख भी हो जाएं तो देश की सूरत और सीरत दोनों बदल जाएगी। नाना जी ने सत्ता और राजनीति का शहद चखने के बाद वनवासी जीवन चुना। एक समय वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य थे। बाद में वह जनसंघ में आए। इमरजेंसी में वह जे पी के साथ आ गए। मुझे वह फ़ोटो अभी तक नहीं भूली जो इंडियन एक्सप्रेस ने छापी थी। उस फ़ोटो में पुलिस जे पी पर लाठियां बरसा रही है और नाना जी देशमुख उन लाठियों को अपने सीने पर ऐसे खा रहे हैं गोया वह जे पी की ढाल हों। जे पी नीचे हैं और उन के ऊपर सीना ताने लेटे नाना जी देशमुख। नाना जी जेल में भी गए जे पी के साथ। बाद में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब वह मोरार जी देसाई सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने का प्रस्ताव ठुकरा बैठे। जल्दी ही वह राजनीति से भी छुट्टी ले बैठे। और समाज सेवा में लग गए। इस के लिए भी महाराष्ट्रियन होते हुए भी उन्हों ने उत्तर प्रदेश को ही चुना। पहले गोंडा में प्रभावती ग्राम बनाया। फिर चित्रकूट चले गए। यकीन मानिए चित्रकूट में नाना जी ने जो और जितना काम किया है वह अनूठा है। मैं समझता हूं कि आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में अगर नाना जी न आए होते तो यह क्षेत्र दंतेवाड़ा से भी ज़्यादा खतरनाक इलाका हुआ होता नक्सल मूवमेंट के लिहाज़ से। नाना जी ने अपने कामों से यहां सामाजिक और आर्थिक खाई को बहुत हद तक पाटा। क्या तो काम किए हैं उन्हों ने इस क्षेत्र में। आदिवासी बच्चों के लिए नि:शुल्क आवासीय शिक्षा। उच्चतर सिक्षा भी। उन को रोजगार सिखाने के लिए कई उपक्रम। आयुर्वेद का एक बड़ा शोध संस्थान। जहां जड़ी-बूटी से ले कर सौ से अधिक किस्म की देसी गाय। और भी तमाम कुछ । नाना जी का एक किस्सा बहुत सुनता था कि एक बार वह लखनऊ में यशपाल जी के पास गए और उन से कहा कि आप पांचजन्य के लिए कुछ लिखिए। और आप का लिखा जस का तस छपेगा। यशपाल ने लिखा भी और वह छपा भी। जस का तस। जब नाना जी से मैं १९९७ में जून की गरमियों में चित्रकूट में मिला तो उन की वह सहिष्णुता भी देखी। उन की सरलता और शालीनता भी देखी। ज़मीन पर उन के साथ बैठ कर खाना भी खाया। उन्हों ने अपना पत्तल भी खुद उठाया। जब कि वृद्धावस्था के चलते उन का उठना बैठना बहुत सरल नहीं था। उन से पूछा कि आप ने चित्रकूट ही क्यों चुना सेवा के लिए तो वह बोले मुझे वनवासी राम की ही छवि अच्छी लगती है। राजा राम की नहीं।

कभी सक्रिय राजनीति करने वाले नाना जी देशमुख तब राजनीति के बारे में कोई बात नहीं करना चाहते थे। २० साल हो गए थे तब उन्हें राजनीति से संन्यास लिए हुए। नाना जी देशमुख उत्तर प्रदेश में तब की बसपा भाजपा की साझा सरकार के बारे में कहने लगे कि, ‘मैं इस सरकार के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। खास कर उस सरकार के बारे में जहां दोनों दल एक दूसरे को सांप कह रहे हों।’ वह कहने लगे, ‘इस चक्कर में एक दूसरे का मज़ाक उड़ाना तो राजनीति में आम बात हो गई है।’ पेश है नाना जी से देशमुख से खास बात-चीत :

क्या लोग आप से मिलने नहीं आते?
-मुझे क्या मतलब? कोई आए न आए।

कोई भी साथी नहीं आता?
-अभी तक तो नहीं आया। हां चंद्रशेखर आता है। एन. डी. तिवारी भी, पर इन से भी राजनीति पर बात नहीं होती।

आप के साथी आप से मिलने नहीं आते तो आप को तकलीफ़ नहीं होती?
-नहीं। लेकिन जब और कोई मिलने आता है वह कोई भी हो मैं सब से मिलता हूं, पर राजनीति पर बात नहीं करता। वैसे मुलायम भी मेरे मित्र हैं।

मुलायम जो जातिवादी राजनीति कर रहे हैं?
-तो मैं क्या कर सकता हूं?

वह इन दिनों हरिजन एक्ट खत्म करने की बात कर रहे हैं।
-वह चाहे जो करें- हम से क्या?

आप को नहीं लगता कि राजनीति में अच्छे लोगों को होना चाहिए?
-बिलकुल होना चाहिए। हर जगह अच्छे लोग रहने चाहिए।

तो फिर आप राजनीति क्यों छोड़ बैठे?
-मुझे रास नहीं आई। लगा कि यहां ज़्यादा अच्छा काम कर सकता हूं।

तो जितने समय आप ने राजनीति की वह समय आप का व्यर्थ गया?
-व्यर्थ क्यों गया? वह भी एक अनुभव था। वहीं रह कर जाना कि यह काम मैं ज़्यादा अच्छा कर सकता हूं।

यह काम राजनीति में रह कर भी कर सकते थे?
-इस दिशा में राजनीति में रह कर काम करना संभव नहीं था। उपेक्षित कामों को करने के लिए राजनीति छोड़ी।

आप को नहीं लगता कि राजनीति छोड़ कर गलती की?
-मुझे लगता है राजनीति छोड़ कर बहुत ठीक किया।

किस लिहाज़ से?
-मैं थोड़ा बहुत काम कर पा रहा हूं इस लिहाज़ से।

पर सरकार में रह कर आप इन योजनाओं के लिए बेहतर संसाधन जुटा सकते थे?
– यह आप का खयाल है। क्यों कि सरकार के भरोसे कुछ नहीं होता। सरकार के भरोसे अगर कुछ होता तो रुस फ़ेल नहीं होता। इस देश में ऐसे भी शासक रहे हैं जिन के शासनकाल में सूरज डूबता नहीं था। तो इन्हें भगाने वाले कौन सरकारी लोग थे? आप जानिए कि नौकरशाही में प्रेरणा नहीं होती, पर युवकों में होती है। कष्ट सह कर देश के लिए यह काम कर सकता है। राजा हो कर देश की समस्याएं नहीं सुलझा सकता कोई। राजा हो कर राम भी पराक्रमी नहीं बने। वह तो वनवासी हो कर ही पराक्रमी बने। तो समाज में काम करना ज़रुरी है, सरकार में काम करना ज़रुरी नहीं है।

संसाधन जुटाने में दिक्कत नहीं होती?
-संसाधन से तो लोग भाग रहे हैं। सारे प्राकृतिक संसाधन गांव में हैं। शहरों में न खेत हैं, न जंगल, न भूगर्भ पदार्थ, न पशु। इन संसाधनों को ले कर लोग गांवों में भी संपन्न ह्जो सकते हैं। पर लोग तो शहरों में भाग रहे हैं। झोपड़पट्टी जीवन जीने के लिए। कोई उन्हें बताने वाला नहीं।

सुना है आप अपने प्रोजेक्टस के लिए विदेशी एजेंसियों से अनुदान नहीं लेते?
-विदेशी धन से आत्म-निर्भरता हम प्राप्त नहीं कर सकते। दूसरे यह हमारी स्वतंत्रता पर चोट करता है। हम देश को स्वावलंबन और स्वाभिमान के आधार पर खड़ा करना चाहते हैं। हां विदेशों से आर्तिक सहायता की जगह तकनीकी सहायता लेना उपयोगी हो सकता है।

आप को नहीं लगता कि आप ने बहुत कठिन रास्ता चुन लिया?
-कठिन क्यों मस्ती भरा है। वैसे तो ज़िंदगी भी कठिन है।

देश के वर्तमान हालात पर कुछ कहेंगे?
-देश के हालात अखबारों से पता चलता है। पर अखबार तथ्यों से कम सनसनीखेज खबरों में ज़्यादा विश्वास करते हैं। इस का कारण है कि जो राजनीति चल रही है, वह जनहित का विचार कम कर रही है। राजनीतिज्ञ दूसरों की विफलता और बदनामी कर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाना चाहता है। देश में विषमता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। बेकारी और प्रदूषण बढ़ रहा है। पर्यावरण बिगड़ रहा है। प्राकृतिक संसाधन घट रहे हैं। हर एक दल सदस्यता अभियान चलाता है, मतदाताओं को अपने अनुकूल बनाता है, पर इन समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए कोई दल कुछ नहीं कर रहा है। अब बताइए लालू आरोप लगा रहे हैं कि देवगौड़ा उन के यहां छापे डलवा रहे हैं तो देवगौड़ा कुछ कह रहे हैं। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। देश की हालत यह है तो क्या कहें?

एक बात और इन तमाम कमों के लिए आप को कभी फंड आदि की दिक्कत नहीं होती?
-कभी नहीं। तमाम लोग फंड ले कर खुद मेरे पास आते हैं। जितना उचित समझता हूं, रख लेता हूं। बाकी वापस दे देता हूं।

यह कौन लोग हैं आप को फंड करने वाले?
-तमाम लोग। बहुत सारे उद्योगपति। राजनीतिक लोग भी। आम लोग भी। लेकिन मैं कभी किसी के पास पैसा मांगने नहीं जाता। जिस को देना होता है खुद आता है यहां चित्रकूट में। यह मुलायम और चंद्रशेखर जैसे लोग कहते हैं कि हमारे इटावा भी चलिए, बलिया चलिए। ऐसा ही कोई काम अपनी स्वतंत्रता से करिए। कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसे और भी बहुत से लोग हैं। हर जगह बुलाते रहते हैं।

तो आप क्यों नहीं चले जाते?
-अब उम्र हो गई है। इतनी क्षमता नहीं रह गई है। यही जो शुरु किया है, निभा ले जाऊं तो बहुत है। अपने ऊपर दाग भी नहीं लगाना चाहता।

एक व्यक्तिगत सवाल पूछना चाहता हूं।
-पूछिए। नि:संकोच पूछिए।

आप को क्या लगता है कि विवाह न कर के आप ने ठीक किया किया कि गलत?
-अब इस सवाल का कोई महत्व नहीं रह गया है।

फिर भी?
– हां यह सच है कि अगर विवाह किए होता तो जीवन में ज़्यादा ऊर्जा होती। जीवन ज़्यादा बेहतर होता। समाज में और बेहतर काम करना संभव बन पाया होता।

तो विवाह न कर के पछताते हैं आप?
ऐसा भी नहीं है। कह कर वह मुसकुराते हैं। अब जो हो गया है , हो गया है। अब जो आगे वही सत्य है, सुंदर है।

लातेहार में जनजातीय कृषक पंचायत का हुआ आयोजन

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रांची (झारखंड) : विकास भारती द्वारा एचडीएफ़सी बैंक के सहयोग से लातेहार ज़िले के गारू प्रखंड में विगत 3 वर्षों से चल रही ‘संपोषित समग्र ग्रामीण विकास योजना’ के समाप्ति पर गारू प्रखंड के कोटाम गाँव में 27 सितंबर, 2024 को “जनजातीय कृषक पंचायत” का आयोजन किया गया।जिसमें बतौर मुख्य अतिथि केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री,भारत सरकार श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। 

इस दौरान कृषि विज्ञान केंद्र गुमला, एचडीएफ़सी बैंक व बीआरएलएफ के द्वारा जीवंत प्रदर्शनी लगायी गई तथा स्वयं सहायता समूह की “लखपति दीदी” को सम्मानित किया गया। 

ज्ञातव्य हो कि इस परियोजना के माध्यम से 3 वर्षों में विकास भारती बिशुनपुर द्वारा लातेहार ज़िले के अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र गारू प्रखंड के 20 गाँव में 30 कुआँ का निर्माण, 10 गाँव में 10 तालाब का निर्माण, 15 गाँव में सोलर आधारित सिंचाई, 6 गाँव में डीज़ल आधारित सिंचाई की व्यवस्था तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर 20 गाँव में 40 स्वास्थ्य कैंप,  हज़ारों फलदार व औषधीय पौधे सहित कई आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया गया।जिसके फलस्वरूप गाँव पूर्ण स्वावलंबन की ओर अग्रसर है।

कार्यक्रम में उपस्थित चतरा लोकसभा के सांसद श्री कालीचरण सिंह, पूर्व सांसद श्री सुनील सिंह, एचडीएफ़सी बैंक के पदाधिकारी, लातेहार ज़िला परिषद की अध्यक्ष श्रीमती पूनम जी सहित अन्य अतिथिगण व गारू प्रखंड के 5000 किसान बंधु उपस्थित रहें.

भारत को समझने के लिए महाभारत को पढ़ने की जरूरत है : चितरंजन त्रिपाठी

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आज संस्कार भारती, दिल्ली प्रान्त द्वारा ‘कला संकुल’ में कला एवं साहित्य को बढ़ावा देने के क्रम में आयोजित मासिक नाट्या संगोष्ठी का कार्यक्रम संपन्न हुआ। ‘आधुनिक रंग-लेखक में भारतीय दृष्टि एवं चुनौतियाँ’ विषय पर बात करने लिए बतौर मुख्य अतिथि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी और प्रसिद्ध नाट्य समीक्षक अनिल गोयल मौजूद रहे।

चितरंजन त्रिपाठी ने भारतीय संस्थाओं पर बात करते हुए लेखन सामग्री में भारी कमी को दोष दिया। समाज को गलत तरीके से पेश करने वाले नाट्य लेखनों को जवाब देने के लिए सही नजरिये पर काम नहीं किया गया। उन्होंने आज के लेखकों से भारत को समझने के लिए महाभारत को पढ़ने पर भी जोर दिया क्योंकि आप कला और अपने इतिहास को बेहतर समझ पाएंगे। आज का युवा नाटक देखना चाहता है, उसमें रूचि भी रखता है मगर उसके लिए लेखन भारतीय दिशा में रखना बहुत जरूरी है।


हम जब लोक को समझ जाएंगे तो नाट्य को बेहतर करना हम सीख जाएंगे। लोक नाट्य लोगों के बीच तैयार होता है, लोगों के लिए तैयार होता है, उन्हीं के बीच में चल रहे व्यवहार को ध्यान में रखकर लोक नाट्य लिखे जाते हैं और इसे केवल लोक ही जीवित रख सकता है।

इसी विषय पर बात करते हुए वरिष्ठ नाट्य समीक्षक अनिल गोयल ने भारतीय नाट्य परम्परा पर बात करते हुए कहा कि 90 के दशक में कई नाट्यकारों ने भारतीय इतिहास को गलत तरीके से पेश करने का काम किया। उन्होंने आज की सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर भारत में युवा रंग लेखन में कमी को बताया है। नाट्य जगत को हमेशा अच्छे लेखकों की कमी महसूस हुई है। फिल्म क्षेत्र को बेहतर लेखक मिले मगर नाट्य जगत में इसकी कमी देखी गई। 1962 और 71 की लड़ाई पर फिल्मों का लेखन हुआ मगर किसी ने इसपर प्रभावी नाटक नहीं तैयार किया। पॉलिटिकल करेक्ट बनने की कोशिश में हमने सदैव कड़े विषयों को नाटक क्षेत्र से दूर रखा है।

संगोष्ठी के उद्घाटन में संस्कार भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री अभिजीत गोखले, चितरंजन त्रिपाठी, अनिल गोयल, कुलदीप शर्मा जी मौजूद रहे थे।

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