शोधार्थियों के लिए निःशुल्क ऑनलाइन आर्काइव और डिजिटल लाइब्रेरी

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इतिहास, समाज-विज्ञान और साहित्य के शोधार्थियों के लिए कुछ निःशुल्क ऑनलाइन आर्काइव की सूची । यह सूची इन विषयों में रुचि रखने वाले अध्येताओं और पाठकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो सकती है।

1. इंटरनेट आर्काइव : 1996 में शुरू हुई ‘इंटरनेट आर्काइव’ अभी दुनिया की सबसे बड़ी निःशुल्क ऑनलाइन आर्काइव है। जिसमें चार करोड़ से ज़्यादा किताबें और टेक्स्ट तथा लाखों वीडियो, ऑडियो और तस्वीरें उपलब्ध हैं।

2. अभिलेख पटल : राष्ट्रीय अभिलेखागार के ऑनलाइन पोर्टल अभिलेख पटल पर आप केवल लॉग-इन आईडी बनाकर लाखों ऐतिहासिक दस्तावेज देख-पढ़ सकते हैं बिलकुल मुफ्त।

3. डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया : शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित और आईआईटी, खड़गपुर द्वारा विकसित इस वेबसाइट से आपको अपने शोध के संदर्भ में काफ़ी सामग्री मिल सकती है।

4. गांधी हेरिटेज पोर्टल : सम्पूर्ण गांधी वांगमय के साथ-साथ महात्मा गांधी से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, तस्वीरों, पत्रों का शानदार ऑनलाइन संग्रह, जो पूरी तरह निःशुल्क है।

5. राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन : 2003 में शुरू हुए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अंतर्गत पांडुलिपियों के डिजिटाईजेशन का काम बखूबी किया गया है। दुर्लभ पांडुलिपियों की उपलब्धता, उनके लोकेशन आदि की सटीक जानकारी अब आप पांडुलिपि पटल पर देख सकते हैं।

6. लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस : अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस ने अपने बेहतरीन संग्रह का एक बड़ा हिस्सा डिज़िटाईज़ कर ऑनलाइन उपलब्ध कराया है। इसे ज़रूर देखें।

7. डिजिटल साउथ एशिया लाइब्रेरी : शिकागो यूनिवर्सिटी की इस वेबसाइट पर पर दक्षिण एशिया से जुड़ी शोध सामग्री मिलेगी।

8. नैशनल सेंटर फ़ॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़ : बेंगलुरु स्थित एनसीबीएस ने भारत में विज्ञान के इतिहास से जुड़े आर्काइव के निर्माण और उसे निःशुल्क उपलब्ध कराने का सराहनीय काम किया है।

9. सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़ : कोलकाता स्थित सीएसएसएस ने बांग्ला और असमिया भाषा की पत्र-पत्रिकाओं और दुर्लभ पुस्तकों को डिजि टाईज़ कर छात्रों के लिए ऑनलाइन उपलब्ध कराया है।

10. भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद : अगर आप संस्थागत इतिहास और आज़ादी के बाद शिक्षण संस्थानों के इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं। तो आईआईएम, अहमदाबाद का ऑनलाइन आर्काइव आपको ज़रूर देखना चाहिए।

11. भोजपुरी साहित्यांगन : अगर आप भोजपुरी भाषा व साहित्य के इतिहास और लोक-संस्कृति में दिलचस्पी रखते हैं, तो भोजपुरी साहित्यांगन की वेबसाइट आपके लिए ही है। इस वेबसाइट पर भोजपुरी की हज़ार से अधिक किताबें और भोजपुरी पत्रिकाओं के अंक ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

12. मार्क्सिस्ट आर्काइव : कार्ल मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन सहित दुनिया भर के प्रमुख मार्क्सवादी विचारकों के लेखन पर केंद्रित ऑनलाइन आर्काइव।

13. डिजिटल पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ़ अमेरिका : इस वेबसाइट पर अमेरिका के आर्काइव, लाइब्रेरी और म्यूज़ियम से डिजिटाईज़ की सामग्री देखी जा सकती है।

जर्नल में प्रकाशित लेखों के लिए

1. Sci-Hub : सब्सक्रिप्शन आधारित जर्नलों में प्रकाशित लेखों की तलाश इस वेबसाइट के ज़रिए निःशुल्क पूरी हो सकती है।

2. JSTOR : JSTOR पर लॉग-इन कर आप हर महीने सौ लेख ऑनलाइन निःशुल्क पढ़ सकते हैं। यह भी बहुत उपयोगी है।

महात्मा गांधी की प्रासंगिकता और विचारधारा घटी है या बढ़ी है?

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लाख कोशिशों के बावजूद महात्मा गांधी के जीवन आदर्श और गांधीवादी विचारधारा से, भारत की वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था के कप्तान, मुक्ति नहीं पा सके हैं।

कांग्रेसियों ने कभी गांधी को जीया ही नहीं, और हिंदुत्ववादी विचारकों को शुरू से ही गांधी नाम से ही घिन या चिढ़ रही है।
गांधी का कद छोटा करने के लिए, तमाम पिग्मी साइज नेताओं को मार्केट किया गया, लेकिन दुनिया ने उन्हें नहीं स्वीकारा। अभी भी विदेश से कोई भी नेता आता है, उसे सरकार सबसे पहले राज घाट ले जाकर गांधी जी को दंडवत कराती है।हकीकत ये है कि वैचारिक सोच के स्तर पर विश्व दो भागों में विभाजित हो चुका है: प्रो गांधी और एंटी गांधी, यानी गांधी हिमायती और गांधी विरोधी।
पश्चिमी एशिया और उत्तरी यूरोप, युद्ध की विभीषिका से जूझ रहे हैं। बढ़ती हिंसा, प्रति हिंसा, नफरत, द्वेष, आतंकवाद, और भय के साए में कुलबुलाती मानवता की मजबूरी है गांधी। युद्ध और हिंसा से कभी कोई मसला स्थाई तौर पर हाल नहीं हुआ है।

“जितने भी राज नेता, धार्मिक गुरु अंबानी परिवार की शादी में शामिल हुऐ, उनको गांधीवाद से प्रेम प्रदर्शन करने का ढोंग नहीं करना चाहिए,” कहते हैं बाबा राम किशोर, लखनऊ वाले। गांधी को समझकर जिंदगी में ढालना आज के नेताओं के वश की बात नहीं!
एक लिहाज से देखें तो अच्छा ही हुआ कि गांधी जी समय से पहले ही चले गए, वरना आजादी बाद के नेताओं के कुकर्मों को देखकर उनका आखरी वक्त बेहद तकलीफदायक हो सकता था।

एक आरोप जो गांधी पर अक्सर लगाया जाता रहा है कि देश का विभाजन उनकी वजह से हुआ, अब खारिज हो चुका है।आज बहुत लोग मानते हैं कि पार्टीशन होने की वजह से ही हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान बचे हैं।

बहरहाल, दो अक्टूबर फिर आ गया है, आओ महात्मा गांधी को फिर एक दिन याद करें।

महात्मा गांधी, एक एतिहासिक महा पुरुष ही नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं जिन्हें न तो भुलाया जा सकता है और न ही दरकिनार किया जा सकता है। महात्मा गांधी की प्रासंगिकता के बारे में सवालों के बावजूद, एक राजनीतिक रणनीतिकार और अहिंसक प्रतिरोध तकनीकों के प्रवर्तक के रूप में गांधी का योगदान अद्वितीय है।

हालाँकि, हम अक्सर उन्हें केवल 2 अक्टूबर और 30 जनवरी को ही याद करते हैं, उनकी शिक्षाओं को चरखा चलाने, भजन सुनाने और खादी को छूट पर बेचने जैसे प्रतीकात्मक गतिविधियों तक सीमित कर देते हैं।

महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास करने में कठिनाई होगी कि गांधी जैसा व्यक्ति जीता जागता कभी अस्तित्व में था। अपनी मृत्यु के दशकों बाद, गांधी अपने ही देश में एक किंवदंती और मिथक बन गए हैं, उनके शब्दों और कार्यों को काफी हद तक भुला दिया गया है।

आज आधुनिक भारत में पाखंड और झूठ ने जब अपनी जड़ें जमा ली हैं, तब गांधी की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों की जमात में तेजी से इजाफा हो रहा है। दुनिया, खासकर गरीब देशों को सामाजिक-आर्थिक समस्याओं और मानव मनोविज्ञान के बारे में गांधी की अंतर्दृष्टि की जरूरत है। उनके अहिंसक प्रतिरोध के तरीकों ने कपट और धोखे पर निर्भर आधुनिक राज्यों की कमजोरी को प्रदर्शित किया है।

सत्याग्रह, उपवास और हड़ताल के उनके तरीकों को आगे बढ़ाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध सहित गांधीवादी मूल्यों पर फिर से विचार करने का समय आ गया है, जो आज भी प्रासंगिक हैं। गांधी के विचार २१ वीं सदी के लिए हैं ।

दुर्भाग्य से, अहिंसक आंदोलनों का दायरा बढ़ाने में हम असफल रहे हैं, और गांधीवादी संस्थान, जिसे चर्च ऑफ गांधी, कहा जाने लगा है, बिना किसी नई सोच के हर जगह कुकुरमुत्तों के जैसे फैल गए हैं।

वर्तमान में उस भ्रामक तर्क का मुकाबला करने का समय आ गया है जो प्रचारित करता है कि किसी राष्ट्र की प्रतिष्ठा उसके लोगों की भलाई के बजाय उसकी सैन्य शक्ति से मापी जाती है।

वास्तव में, वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि अच्छी सेहत का निर्धारण स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर के कारकों जैसे शिक्षा, आय और रहने की स्थिति से होता है। यह गांधी के कल्याण के प्रति समग्र दृष्टिकोण से मेल खाता है।
आइए गांधी की शिक्षाओं और मूल्यों पर फिर से विचार करें, प्रतीकात्मक इशारों से आगे बढ़कर सार्थक कार्रवाई करें। दुनिया को आज उनकी अहिंसा, प्रेम, भाईचारे की पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है।

राष्ट्रीय अवकाश के अवसर पर गांधी, अम्बेडकर और लाल बहादुर शास्त्री को याद करते हुए

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वर्तमान भारत में, राजनीतिक दलों द्वारा वोट प्राप्त करने की राजनीतिक मजबूरियों ने गांधीजी को “सरकारी गांधी” और अंबेडकर को “सामाजिक चैंपियन अंबेडकर” बना दिया है। गांधी और अंबेडकर की प्रासंगिकता को आज नई विश्व व्यवस्था में उभरते भारत के संदर्भ में देखने की जरूरत है, जहां यह अनुमान है कि भारत 2047 तक दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा। 90 के दशक तक अपनाए गए सामाजिक एजेंडे को उस समय से परे देखने के लिए मजबूर किया गया था जब स्थिरता के संकट ने देश को प्रभावित किया और भारत को केवल स्थिरता से परे देखने के लिए मजबूर होना पड़ा और इसने खुद को खुली अर्थव्यवस्था में धन और रोजगार सृजन के लिए बदल दिया।

विडम्बना यह है कि लाल बहादुर शास्त्री के दृष्टिकोण को शायद ही याद किया जाता है और राजनीतिक एवं सामाजिक विमर्श में इसका इस्तेमाल भी मुश्किल से ही किया जाता है। लाल बहादुर शास्त्री के आर्थिक विचार शासन के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण दर्शाते थे, जिसमें विकेंद्रीकरण, कृषि आधुनिकीकरण और उदार आर्थिक नीतियों का पता लगाने की इच्छा पर जोर दिया गया था। हालाँकि उनका कार्यकाल छोटा कर दिया गया, लेकिन उनके दृष्टिकोण ने भारत में भविष्य के आर्थिक सुधारों के लिए आधार तैयार किया। शास्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता की दृष्टि भारत की आर्थिक रणनीतियों को प्रभावित करती रही है, जो आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर देती है। इसकी तुलना मोदी सरकार की “मेक इन इंडिया पॉलिसी” के वर्तमान महत्व से की जा सकती है। खाद्यान्न आपूर्ति के लिए मोदी की गारंटी का पता लाल बहादुर शास्त्री की विरासत और भारत को भोजन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए किए गए प्रयासों और शासन से लगाया जा सकता है।

पिछले लोकसभा चुनाव में जाति जनगणना की कहानी ने भारत में जाति-राजनीति की गतिशीलता पर बहस छेड़ दी है। जाति व्यवस्था गहन राजनीतिक बहस और सुधार प्रयासों का विषय रही है। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्रता के बाद की राजनीति तक, जाति भारत की सामाजिक-राजनीतिक कथा का केंद्र रही है। दो प्रमुख हस्तियां जिन्होंने इस चर्चा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वे हैं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और संविधान निर्माता भीमराव रामजी अंबेडकर। भारतीय राजनीति के दो दिग्गज, जबकि जनता द्वारा समान रूप से सम्मानित थे, जाति व्यवस्था पर उनके विचार विपरीत थे। उनकी बाद की बहसों ने भारतीय समाज और राजनीति की दिशा को आकार दिया है।

जबकि गांधी ने अस्पृश्यता की निंदा की, उन्होंने अपने जीवन के अधिकांश समय में व्यवसाय पर आधारित सामाजिक पदानुक्रम, वर्ण व्यवस्था की निंदा नहीं की। वह अस्पृश्यता को समाप्त करके और प्रत्येक व्यवसाय को समान दर्जा देकर जाति व्यवस्था में सुधार करने में विश्वास करते थे। दूसरी ओर, बी.आर अंबेडकर, जो स्वयं एक दलित थे, ने तर्क दिया कि जाति व्यवस्था अव्यवस्थित है और हिंदू समाज को हतोत्साहित करती है, जिससे यह जातियों के समूह में सिमट कर रह जाता है। अम्बेडकर ने वेदों और धर्मग्रंथों की निंदा की, उनका मानना था कि जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता हिंदू धार्मिक ग्रंथों की अभिव्यक्तियाँ थीं। उन्होंने सबसे पहले भारतीय समाज में जातिगत असमानता को स्पष्ट किया और “जाति के उन्मूलन” के लिए काम किया, उनका मानना था कि जाति पर बनी कोई भी चीज़ अनिवार्य रूप से असमानता पैदा करेगी।

दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र के विचार का अंबेडकर ने समर्थन किया था लेकिन गांधी ने इसका पुरजोर विरोध किया। महात्मा गांधी का मानना था कि दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाने से भारतीय समाज धार्मिक और जातिगत आधार पर और अधिक विखंडित हो जाएगा। उनका यह भी मानना था कि अंग्रेज “हिंदू धर्म को नष्ट करने के लिए जहर घोलने” की कोशिश कर रहे थे। चुनावी प्रणाली के माध्यम से जातिगत असमानताओं को कैसे संबोधित किया जाए, इस पर महात्मा गांधी और बी.आर अंबेडकर में मतभेद था। उनके आदान-प्रदान से 1932 का पूना समझौता हुआ, जिसने भारत की चुनावी राजनीति में आरक्षण प्रणाली को आकार दिया।

1964 से 1966 तक भारत के प्रधान मंत्री के रूप में, लाल बहादुर शास्त्री ने कई आर्थिक नीतियों को लागू किया जिन्होंने देश के विकास पर एक अमिट छाप छोड़ी। शास्त्री के कार्यकाल की असाधारण उपलब्धियों में से एक हरित क्रांति का शुभारंभ था। इस परिवर्तनकारी कृषि आंदोलन का उद्देश्य खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देना और खाद्य आयात पर भारत की निर्भरता को कम करना था, जो देश के विदेशी मुद्रा भंडार को ख़त्म कर रहा था। शास्त्री के नेतृत्व में सरकार ने अधिक उपज देने वाली फसल की किस्में, बेहतर सिंचाई प्रणाली और आधुनिक कृषि तकनीकें पेश कीं। हरित क्रांति भारत के आर्थिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण से कम नहीं थी, जिसने देश को आत्मनिर्भर खाद्य उत्पादकों की श्रेणी में पहुंचा दिया।

शास्त्री ने प्रसिद्ध घोषणा की थी, “जय जवान, जय किसान” (सैनिक की जय हो, किसान की जय हो)। इस प्रतिष्ठित नारे ने शास्त्री के इस विश्वास को उजागर किया कि एक मजबूत कृषि क्षेत्र भारत के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक शक्तिशाली सेना जितना ही महत्वपूर्ण था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान शास्त्री की आर्थिक कुशलता की सबसे कठिन परीक्षा हुई। इस संघर्ष ने भारत के वित्त और संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाला। हालाँकि, शास्त्री ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करते हुए उल्लेखनीय लचीलापन प्रदर्शित किया।

युद्धकालीन चुनौतियों के बावजूद, शास्त्री की सरकार भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में कामयाब रही, जो उनके नेतृत्व और आर्थिक कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण था। लाल बहादुर शास्त्री की आर्थिक नीतियां, जो अक्सर अन्य नेताओं की विशाल उपस्थिति से प्रभावित होती थीं, ने भारत के आर्थिक परिदृश्य पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला है। 1965 के युद्ध सहित अशांत समय के दौरान उनके नेतृत्व ने विकास लक्ष्यों का अथक प्रयास करते हुए आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।

हरित क्रांति ने भारत के कृषि क्षेत्र में क्रांति ला दी, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की और कृषि विकास की नींव रखी। इस्पात उत्पादन, विदेशी मुद्रा भंडार, लघु उद्योग और बुनियादी ढांचे के विकास पर शास्त्री का ध्यान भारत के आर्थिक दर्शन को आकार देना जारी रखता है, जो एक मार्मिक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि दूरदर्शी नेतृत्व और अच्छी तरह से सोची गई आर्थिक नीतियां वास्तव में एक राष्ट्र की नियति को बदल सकती हैं। भारत के आर्थिक विकास में लाल बहादुर शास्त्री के योगदान को दृढ़ नेतृत्व और मजबूत आर्थिक दृष्टि की शक्ति के प्रमाण के रूप में मनाया जाना चाहिए।

इन नीतियों के साथ, शास्त्री ने आने वाले दशकों में भारत की आर्थिक प्रगति के लिए आधारशिला रखी। आज, भारत आत्मनिर्भरता और आर्थिक विकास के उनके दृष्टिकोण के प्रमाण के रूप में खड़ा है, एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भविष्य के लिए प्रयास करके उनकी विरासत का सम्मान कर रहा है। अब भारतीय राजनीतिक दलों के लिए अपने राजनीतिक विमर्श में लाल बहादुर शास्त्री के दृष्टिकोण का उपयोग करने और अपनी सीमित वोट राजनीति से परे देखने का समय आ गया है।

संघ की दृष्टि में ऐसे हैं महात्मा गांधी

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~डॉ. मनमोहन वैद्य

संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता

एक बात मैंने देखी है। जो गांधी जी के असली अनुयायी हैं। वे अपने आचरण पर अधिक ध्यान देते हैं, वे कभी गोडसे का नाम तक नहीं लेते। संघ में भी गांधी जी की चर्चा तो अनेक बार होती देखी है पर गोडसे के नाम की चर्चा मैंने कभी नहीं सुनी। परंतु अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए गांधी जी के नाम को भुनाने के लिए, ऐसे-ऐसे लोग गोडसे का नाम बार-बार लेते हैं जिनका आचरण और जिनकी नीतियों का गांधी जी के विचारों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं दिखता। वे तो सरासर असत्य और हिंसा का आश्रय लेने वाले और अपने स्वार्थ के लिए गांधी जी का उपयोग करने वाले ही होते हैं।

एक दैनिक के सम्पादक ने, जो संघ के स्वयंसेवक भी हैं, कहा कि एक गांधीवादी विचारक के लेख हमारे दैनिक में प्रकाशित हो रहे हैं। उस सम्पादक ने यह भी कहा कि उन गांधीवादी विचारक ने लेख लिखने की बात करते समय यह कहा था कि संघ के और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह मैं जानता हूं, फिर भी मैं उन कुछ पहलुओं के बारे में लिखूंगा जिनके बारे में आप अनजान हैं। यह सुन कर मैंने प्रश्न किया कि संघ और गांधीजी के संबंध कैसे थे, यह वे विचारक सही में जानते हैं? लोग बिना जाने, बिना अध्ययन किए अपनी धारणाएं बना लेते हैं। संघ के बारे में तो अनेक विद्वान, स्कॉलर कहलाने वाले लोग भी पूरा अध्ययन करने का कष्ट किए बिना या, सिलेक्टिव अध्ययन के आधार पर या एक विशिष्ट दृष्टिकोण से लिखे साहित्य के आधार पर ही अपने ‘विद्वतापूर्ण’ विचार व्यक्त करते हैं। किन्तु वास्तविकता यह है कि इन विचारों का ‘सत्य’ से कोई लेना-देना नहीं होता है।
महात्मा गांधी के कुछ मतों से घोर असहमति होते हुए भी, उनके संघ से संबंध कैसे थे, इस पर उपलब्ध जानकारी पर नजर डालनी चाहिए। भारत की आजादी के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष में जनाधार को व्यापक बनाने के शुद्ध उद्देश्य से मुसलमानों के कट्टर और जिहादी मानसिकता वाले हिस्से के सामने उनकी शरणागति से सहमत न होते हुए भी, आजादी के आंदोलन में सर्वसामान्य लोगों को सहभागी होने के लिए उन्होंने चरखे जैसा सहज उपलब्ध अमोघ साधन और सत्याग्रह जैसा सहज स्वीकार्य तरीका दिया, वह उनकी महानता है। ग्राम स्वराज्य, स्वदेशी, गोरक्षा, अस्पृश्यता निर्मूलन आदि उनके आग्रह के विषयों से भारत के मूलभूत हिंदू चिंतन से उनके लगाव और आग्रह के महत्व को कोई नकार नहीं सकता। उनका स्वयं का मूल्याधारित जीवन अनेक युवक-युवतियों को आजीवन व्रतधारी बनकर समाज की सेवा में लगने की प्रेरणा देने वाला था।

1921 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, इन दोनों सत्याग्रहों में डॉक्टर हेडगेवार सहभागी हुए थे। इस कारण उन्हें 19 अगस्त 1921 से 12 जुलाई 1922 तक और 21 जुलाई,1930 से 14 फरवरी, 1931 तक, दो बार सश्रम कारावास की सजा भी हुई।

महात्मा गांधी को 18 मार्च, 1922 को छह वर्ष की सजा हुई। तब से उनकी मुक्ति तक प्रत्येक महीने की 18 तारीख ‘गांधी दिन’ के रूप में मनाई जाती थी। 1922 के अक्तूबर मास में ‘गांधी दिन’ के अवसर पर दिए गए भाषण में डॉक्टर हेडगेवार ने कहा कि आज का दिन अत्यंत पवित्र है। महात्मा जी जैसे पुण्यश्लोक पुरुष के जीवन में व्याप्त सद्गुणों के श्रवण एवं चिंतन का यह दिन है। उनके अनुयायी कहलाने में गौरव अनुभव करने वालों के सिर पर तो उनके इन गुणों का अनुकरण करने की जिम्मेदारी विशेषकर है।

1934 में वर्धा में श्री जमनालाल बजाज के यहां जब गांधी जी का निवास था तब पास ही संघ का शीत शिविर चल रहा था। उत्सुकतावश गांधी जी वहां गए, संघ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया और स्वयंसेवकों के साथ उनका वार्तालाप भी हुआ। वार्तालाप के दौरान जब उन्हें पता चला कि शिविर में अनुसूचित जाति से भी स्वयंसेवक हैं, और उनसे किसी भी प्रकार का भेदभाव किए बिना सब भाईचारे के साथ स्नेहपूर्वक साथ रहते हैं, सारे कार्यक्रम साथ करते हैं, तब उन्होंने बहुत प्रसन्नता व्यक्त की।

स्वतंत्रता के पश्चात जब गांधी जी का निवास दिल्ली में मैला ढोने वाले समाज की कॉलोनी में था, तब सामने मैदान में संघ की प्रभात शाखा चलती थी। सितम्बर में गांधी जी ने प्रमुख स्वयंसेवकों से बात करने की इच्छा व्यक्त की और सम्बोधित किया-‘बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे। स्व. जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे। मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छुआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था। तब से संघ काफी बढ़ गया है। मैं तो हमेशा से यह मानता हूं कि जो भी संस्था सेवा और आत्म-त्याग के आदर्श से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है। लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्याग भाव के साथ ध्येय की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन आवश्यक है। ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीजों का अभाव हो, समाज के लिए अनर्थकारी सिद्ध हुआ है।’ (यह सम्बोधन ‘गांधी समग्र वाड्मय’ के खंड 89 में 215-217 पृष्ठ पर प्रकाशित है।)

30 जनवरी, 1948 को तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी मद्रास में एक कार्यक्रम में थे, जब उन्हें गांधी जी की मृत्यु का समाचार मिला। उन्होंने तुरंत ही प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल और गांधी जी के सुपुत्र देवदास गांधी को टेलीग्राम द्वारा अपनी शोक संवेदना भेजी। उसमें श्री गुरुजी ने लिखा, ‘प्राणघातक क्रूर हमले के फलस्वरूप एक महान विभूति की दु:खद हत्या का समाचार सुनकर मुझे बड़ा आघात लगा। वर्तमान कठिन परिस्थिति में इससे देश की अपरिमित हानि हुई है। अतुलनीय संगठक के तिरोधान से जो रिक्तता पैदा हुई है, उसे पूर्ण करने और जो गुरुतर भार कंधों पर आ पड़ा है, उसे पूर्ण करने का सामर्थ्य भगवान हमें प्रदान करें।’

गांधी जी के प्रति सम्मान रूप शोक व्यक्त करने के लिए 13 दिन तक संघ का दैनिक कार्य स्थगित करने की सूचना उन्होंने देशभर के स्वयंसेवकों को दी। दूसरे ही दिन 31 जनवरी, 1948 को श्री गुरुजी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को एक विस्तृत पत्र लिखा। उसमें वे लिखते हैं- ‘कल मद्रास में वह भयंकर वार्ता सुनी कि किसी अविचारी भ्रष्ट-हृदय व्यक्ति ने पूज्य महात्मा जी पर गोली चलकर उस महापुरुष के आकस्मिक-असामयिक निधन का नीरघृण कृत्य किया। यह निंदा कृत्य संसार के सम्मुख अपने समाज पर कलंक लगाने वाला हुआ है।’

ये सारी जानकारी ‘Justice on Trial’ नामक पुस्तक में और श्री गुरुजी समग्र में उपलब्ध है। 6 अक्तूबर, 1969 में महात्मा गांधी जी की जन्मशताब्दी के समय महाराष्ट्र के सांगली में गांधी जी की प्रतिमा का श्री गुरुजी के द्वारा अनावरण किया गया। उस समय श्री गुरुजी ने कहा-‘आज एक महत्वपूर्ण व पवित्र अवसर पर हम एकत्र हुए हैं। सौ वर्ष पूर्व इसी दिन सौराष्ट्र में एक बालक का जन्म हुआ था। उस दिन अनेक बालकों का जन्म हुआ होगा, पर हम उनकी जन्म-शताब्दी नहीं मनाते। महात्मा गांधी जी का जन्म सामान्य व्यक्ति के समान हुआ, पर वे अपने कर्तव्य और अंत:करण के प्रेम से परमश्रेष्ठ पुरुष की कोटि तक पहुंचे। उनका जीवन अपने सम्मुख रखकर, अपने जीवन को हम उसी प्रकार ढालें। उनके जीवन का जितना अधिकाधिक अनुकरण हम कर सकते हैं, उतना करें’।

‘लोकमान्य तिलक के पश्चात महात्मा गांधी ने अपने हाथों में स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्र संभाले और इस दिशा में बहुत प्रयास किए। शिक्षित-अशिक्षित स्त्री-पुरुषों में यह प्रेरणा जगाई कि अंग्रेजों का राज्य हटाना चाहिए, देश को स्वतंत्र करना चाहिए और स्व के तंत्र से चलने के लिए जो कुछ मूल्य देना होगा, वह हम देंगे। महात्मा गांधी ने मिट्टी से सोना बनाया। साधारण लोगों में असाधारणत्व निर्माण किया। इस सारे वातावरण से ही अंग्रेजों को हटना पड़ा’।

‘वे कहा करते थे-मैं कट्टर हिन्दू हूं, इसलिए केवल मानवों से ही नहीं, सम्पूर्ण जीवमात्र से प्रेम करता हूं।’ उनके जीवन व राजनीति में सत्य व अहिंसा को जो प्रधानता मिली, वह कट्टर हिंदुत्व के कारण ही मिली।

‘जिस हिंदू-धर्म के बारे में हम इतना बोलते हैं, उस धर्म के भवितव्य पर उन्होंने ‘फ्यूचर ऑफ हिंदुइज्म’ शीर्षक से अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने लिखा है-‘ हिंदू धर्म यानी न रुकने वाला, आग्रह के साथ बढ़ने वाला, सत्य की खोज का मार्ग है। आज यह धर्म थका हुआ-सा, आगे जाने की प्रेरणा देने में सहायक प्रतीत होता अनुभव में नहीं आता। इसका कारण है कि हम थक गए है, पर धर्म नहीं थका। जिस क्षण हमारी यह थकावट दूर होगी, उस क्षण हिंदू धर्म का भारी विस्फोट होगा जो भूतकाल में कभी नहीं हुआ, इतने बड़े परिमाण में हिंदू धर्म अपने प्रभाव और प्रकाश से दुनिया में चमक उठेगा’। महात्मा जी की यह भविष्यवाणी पूरी करने की जिम्मेदारी हमारी है।

‘ देश को राजकीय स्वतंत्रता चाहिए, आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए। उसी भांति इस तरह की धार्मिक स्वतंत्रता चाहिए कि कोई किसी का अपमान न कर सके, भिन्न-भिन्न पंथ के, मत के लोग साथ-साथ रह सकें। विदेशी विचारों की दासता से अपनी मुक्ति होनी चाहिए। गांधी जी की यही सीख थी। मैं गांधी जी से अनेक बार मिला हूं। उनसे बहुत चर्चा भी की है। उन्होंने जो विचार व्यक्त किए, उन्हीं के अध्ययन से मैं यह कह रहा हूं। इसीलिए अंत:करण की अनुभूति से मुझे महात्मा जी के प्रति नितांत आदर है।

गुरुजी कहते हैं, ‘महात्मा जी से मेरी अंतिम भेंट सन् 1947 में हुई थी। उस समय देश को स्वाधीनता मिलने से शासन-सूत्र संभालने के कारण नेतागण खुशी में थे। उसी समय दिल्ली में दंगा हो गया। मैं उस समय शांति प्रस्थापना करने का काम कर रहा था। गृह मंत्री सरदार पटेल भी प्रयत्न कर रहे थे और उस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली। ऐसे वातावरण में मेरी महात्मा गांधी से भेंट हुई थी। महात्मा जी ने मुझसे कहा-देखो यह क्या हो रहा है? मैंने कहा-यह अपना दुर्भाग्य है।

अंग्रेज कहा करते थे कि हमारे जाने पर तुम लोग एक-दूसरे का गला काटोगे। आज प्रत्यक्ष में वही हो रहा है। दुनिया में हमारी अप्रतिष्ठा हो रही है। इसे रोकना चाहिए। गांधीजी ने उस दिन अपनी प्रार्थना सभा में मेरे नाम का उल्लेख गौरवपूर्ण शब्दों में कर, मेरे विचार लोगों को बताए और देश की हो रही अप्रतिष्ठा रोकने की प्रार्थना की। उस महात्मा के मुख से मेरा गौरवपूर्ण उल्लेख हुआ, यह मेरा सौभाग्य था। इन सारे सम्बन्धों से ही मैं कहता हूं कि हमें उनका अनुकरण करना चाहिए।’

मैं जब वडोदरा में प्रचारक था तब (1987-90) सहसरकार्यवह श्री यादवराव जोशी का वडोदरा में प्रकट व्याख्यान था। उसमें श्री यादवराव जी ने महात्मा गांधी जी का बहुत सम्मान के साथ उल्लेख किया। व्याख्यान के पश्चात कार्यालय में एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा कि आज आपने महात्मा गांधी जी का सम्मानपूर्वक जो उल्लेख किया, वह क्या मन से किया था? इस पर यादवराव जी ने कहा कि मन में ना होते हुए भी, मैं केवल बोलने वाला कोई राजकीय नेता नहीं हूं। जो कहता हूं, मन से ही कहता हूं। फिर उन्होंने समझाया कि जब किसी व्यक्ति का हम आदर-सम्मान करते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि उनके सभी विचारों से हम सहमत होते हैं। एक विशिष्ट प्रभावी गुण के लिए हम उन्हें याद करते हैं, आदर्श मानते हैं। जैसे पितामह भीष्म को हम उनकी प्रतिज्ञा की दृढ़ता के लिए अवश्य स्मरण करते हैं, परंतु राज सभा में द्रौपदी के वस्त्रहरण के समय वे सारा अन्याय मौन बैठे देखते रहे, इसका समर्थन हम नहीं कर सकते हैं। इसी तरह कट्टर और जिहादी मुस्लिम नेतृत्व के संबंध में गांधी जी के व्यवहार के बारे में घोर असहमति होने के बावजूद, स्वतंत्रता आंदोलन में जनसामान्य को सहभागी होने के लिए उनके द्वारा दिया गया अवसर, स्वतंत्रता के लिए सामान्य लोगों में उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई ज्वाला, भारतीय चिंतन पर आधारित उनके अनेक आग्रह के विषय, सत्याग्रह के माध्यम से व्यक्त किया जन आक्रोश-ये उनका योगदान निश्चित ही सराहनीय और प्रेरणादायी है।

इन सारे तथ्यों को ध्यान में लिए बिना संघ और गांधी जी के संबंध पर टिप्पणी करना असत्य और अनुचित ही कहा जा सकता है। ग्राम विकास, सेंद्रिय कृषि, गोसंवर्धन, सामाजिक समरसता, मातृभाषा में शिक्षा और स्वदेशी अर्थ व्यवस्था एवं जीवनशैली-ऐसे महात्मा गांधी जी के प्रिय एवं आग्रह के क्षेत्रों में संघ स्वयंसेवक पूर्ण मनोयोग से सक्रिय हैं। इस वर्ष महात्मा गांधी जी की 150 वीं जयंती है। उनकी पावन स्मृति को विनम्र आदरांजलि।

(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य हैं, लेख पाञ्चजन्य की आर्काइव से लिया गया है )

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