मेरे लिए नृत्य साधना है-डा समीक्षा शर्मा

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शशिप्रभा तिवारी

डा समीक्षा शर्मा कथक नृत्य के क्षेत्र में जाना माना नाम है। उन्होंने युवा कथक कलाकारों की श्रेणी में अपनी साधना से एक अलग पहचान बनाई है। एक ओर वह अच्छी नृत्यांगना हैं, वहीं दूसरी ओर शास्त्र पक्ष की भी अच्छी समझ रखती हैं। उन्होंने कथक पर उज्बेक भाषा में अनुवादित एक पुस्तक लिखी है। उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से उज्बेकिस्तान में सांस्कृतिक दूत के पद पर कार्य कर चुकी हैं। वह दूरदर्शन और आईसीसीआर द्वारा मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। उन्हें इंडिया एक्सलेंस अवार्ड, अंतरराष्ट्रीय महिला एसोसिएशन सम्मान, ग्वालियर रत्न और नृत्य श्रृंगार मणि मिल चुका है। उन्हें खजुराहो नृत्य समारोह, कालिदास महोत्सव, सार्क तरोना लारी, बार्सिलोना उत्सव में शिरकत कर चुकी हैं।

पिछले दिनों इंडिया इंरनेशनल सेंटर में माॅनसून उत्सव 23 अगस्त को आयोजित था। इस समारोह में कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने एकल नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने नवाचार करते हुए, स्वरचित नृत्य रचना कृष्ण अंग बहुरंग पेश किया। इस प्रस्तुति का आरंभ उन्होंने खाटू श्याम की वंदना से किया। इसमें उन्होंने खाटू श्याम के अवतरण और उनके जीवन व वंदन की कथा की व्याख्या पेश किया। यह वंदना रचना ‘खाटू श्या मजी अरज सुनो जी‘ पर आधारित थी। इस भजन की रचना समीक्षा शर्मा ने किया था। यह राग मिश्र मांड और दीपचंदी ताल में निबद्ध था। नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने प्रसंग को बहुत सरलता और सहजता से पेश किया। ‘शीश के दानी‘ व ‘भंवर में नैया‘ बोल को भाव और नाव की गत व सरपण गति से मोहक अंदाज में दर्शाया।

उनकी दूसरी प्रस्तुति थी-कृष्ण अंग बहुरंग। इस की परिकल्पना उन्होंने अपने गुरु पंडित राजेंद्र गंगानी के मार्गदर्शन में किया था। इसमें सांभरी के पशु पक्ष्यिों के प्रति प्रेम और प्राकृतिक प्रेम को विशेष् तौर पर समाहित किया गया था।

इसमें ऋषि संाभ्री के मछली प्रेम को दर्शाया। इसी के अगले अंश में विष्णु अवतार कृष्ण द्वारा कालिया मर्दन प्रसंग को दिखाया। इसके लिए सूरदास के पद तांडव गति मुंडन पर नाचत गिरिधारी का चयन किया गया था। इस प्रसंग को दर्शाने के क्रम में नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने मृग, गज, व्याघ्र, मीन, सर्प हस्तकों के जरिए दर्शाते हुए, गतियों को प्रभावकारी अंदाज में पेश किया। नृत्य में भाव पक्ष का प्रयोग संुदर था। इसके साथ तिहाइयों, टुकड़ो और गतों को बखूबी पेश किया। नृत्य का समापन कलिया मर्दन प्रसंग के बाद बावन चक्कर को प्रस्तुत किया।

नृत्यांगना समीक्षा ने बताया कि मैं बचपन से ही नृत्य करती हूं। नृत्य करने से मुझे आत्मसंतुष्टि मिलती है। मैं समय के साथ अपना सफर करते हुए, धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही हूं। इसके बावजूद लगता है कि अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के इस आयोजन के दौरान अपनी प्रस्तुति के संदर्भ में उन्होंने बताया कि नृत्य के देवता भगवान शिव यानी नटराज को माना जाता है। हमलोग कृष्ण को नटनागर मानते हैं। वह भी कालिया सर्प के फन पर खड़े होकर नृत्य करते हैं। इस प्रसंग को कथक और अन्य नृत्य शैलियों के कलाकार कालिया मर्दन प्रसंग में पेश करते हैं। मैं कृष्ण से जुडे इस प्रसंग को थोड़े अलग तरीके से पेश करना चाहती थी। इसी क्रम में मुझे स्रांभि ऋषि प्रसंग का पता चला। फिर मैं मथुरा स्थित जैत गांव में गई। वहां मैंने लोककथा सुनी। यहां कालिया सर्प के मूर्ति को देखा। वहां लोगों ने बताया कि अंग्रेजों ने कालिया सर्प की मूर्ति पऱ गोलियां चलाई थी, जिससे उनके सिर से खून निकला था और ढेर सारे सर्प बिल में से निकल कर आ गए थे। इससे मुझे एक नया विचार मिला और मैंने इसे अपने प्रस्तुति में शामिल किया।

पंडित राजेंद्र गंगानी कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा के गुरु हैं। उनके संदर्भ में वह कहती हैं कि गुरु जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी निरंतरता है। जब भी बात करिए तब वह सबसे पहले पूछते हैं कि आपने रियाज किया या नहीं। वह बिना नागा किए रोज रियाज करते हैं। उनकी यह बात मुझे बहुत प्रेरित करता है।

बहरहाल, इस समारोह में कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा के साथ संगत करने वाले कलाकार थे-तबले पर निशित गंगानी, गायक शोएब हसन, पखावज पर महावीर गंगानीा, सारंगी पर अयूब खान और पढंत पर प्रवीण प्रसाद।

अमेरिकी स्वपन का अंत निकट तो नहीं

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अमेरिका विश्व के लगभग समस्त देशों पर अपनी चौधराहट सफलतापूर्वक लागू करता रहा है। पूरे विश्व में, एक तरह से लगभग समस्त क्षेत्रों में, विभिन्न प्रकार की नीतियों को प्रभावित करने में अमेरिका सफल रहा है एवं इस प्रकार अपनी प्रसारवादी नीतियों को भी लागू करता रहा है। परंतु, हाल ही के वर्षों में अमेरिका की आंतरिक स्थिति, लगभग समस्त क्षेत्रों यथा आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आदि, में लगातार बिगड़ती जा रही है। अमेरिका सहित विकसित देशों की, आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र में, आंतरिक स्थिति को देखते हुए अब तो पश्चिमी सभ्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगे हैं। अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों में आर्थिक विपन्नता एवं परिवार तथा समाज के खंड खंड होने के बाद पश्चिमी सभ्यता को पतित सभ्यता कहा जाने लगा है और इसे अब अमेरिकी स्वपन के अंत की शुरुआत भी माना जाने लगा है। अमेरिका में तो राष्ट्रीय ऋण 35 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार, सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर, लगभग 25 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का है। इसका आश्य यह है कि आय की तुलना में ऋण अधिक ले लिया गया है। अमेरिकी वित्त व्यवस्था पर दबाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अमेरिकी सरकार को अपने सामान्य खर्चों को चलाने के लिए भी बाजार से और अधिक ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती है और इस उद्देश्य से प्रति वर्ष अमेरिकी संसद में स्वीकृति प्राप्त करने हेतु पहुंचना होता है। यह स्थिति है विश्व के सबसे अधिक शक्तिशाली देश अमेरिका की।

वर्ष 1776 में जब पूंजीवाद के जनक कहे जाने वाले एडम स्मिथ ने अपनी कृति “द वेल्थ आफ नेशनस” नामक किताब जारी की थी उस समय पूंजीवाद अपने शैशावस्था में ही था। उनका महत्वपूर्ण मुख्य सिद्धांत था कि व्यवसायी, जो अपनी लाभप्रदता को अधिकतम करना चाहते हैं, वे अपने व्यवसाय को बहुत ही कुशलता के साथ चलाना चाहते हैं। इस तरह ये व्यवसायी न केवल अपने आप को धनाडय बनाएंगे बल्कि वह देश इन धनाडयों के संसाधनों को जोड़कर स्वयं भी एक धनी देश बन जाएगा। पूरी 19वीं शताब्दी एवं 20वीं शताब्दी में अमेरिका इसी सिद्धांत पर कार्य करता रहा है एवं अपने देश में धनाडयों की संख्या में अपार वृद्धि करता रहा है। इससे अमेरिकी नागरिकों में व्यक्तिवाद पनपा एवं वे परिवार एवं समाज के भले को भूलकर केवल अपने बारे में ही सोचने लगे एवं अपने व्यापार को पूरे विश्व में फैलाने लगे। इससे अमेरिका में गरीबों की संख्या में लगातार वृद्धि होती रही।

अमेरिका की 1940 के दशक में पूरे विश्व के विनिर्माण क्षेत्र में 50 प्रतिशत की हिस्सेदारी हो गई थी, परंतु अब यह घटकर 17 प्रतिशत से भी कम हो गई है। कई उद्योगों के मामले में उत्पादन का जो एकाधिकार अमेरिका के पास होता था वह एकाधिकार अब अन्य देशों के पास चला गया है। अमेरिकी कम्पनियों ने कुशल कर्मचारियों को आकर्षित करने के उद्देश्य से कर्मचारियों के स्वास्थ्य खर्चे की पूरी लागत स्वयं वहन करना प्रारम्भ किया था। अमेरिका में श्रम लागत भी बहुत अधिक बढ़ चुकी थी, अन्य देशों में श्रमिक, अमेरिकी श्रम लागत की तुलना में, आधी से भी कम राशि में ही काम करने को तैयार हो रहे थे। इस बीच अमेरिकी सरकार ने आय कर की दरें भी बढ़ाकर 35 प्रतिशत से अधिक कर दी थीं। जबकि अन्य देशों में आय कर की दरें 20/25 प्रतिशत थीं। इससे अमेरिका में विभिन्न उत्पादों की उत्पादन लागत बढ़ने लगी। अतः धीरे धीरे अमेरिका में विनिर्माण इकाईयां बंद होने लगीं। वर्ष 1979 में अमेरिका में 20 प्रतिशत श्रमिक विनिर्माण इकाईयों में कार्यरत थे अब यह संख्या घटकर 10 प्रतिशत से भी कम हो गई है। अमेरिका में 2 करोड़ कर्मचारी विनिर्माण इकाईयों में कार्य कर रहे थे जो घटकर 1 करोड़ 20 लाख हो गए हैं। अमेरिका में जब प्रथम राष्ट्रपति ने शपथ ली थी उस समय 10 श्रमिकों में से 9 श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत थे (छोटे कृषक) जबकि आज केवल 2 प्रतिशत श्रमिक ही कृषि क्षेत्र में कार्य करते हैं। इस प्रकार अमेरिका में रोजगार की दृष्टि से कृषि एवं उद्योग क्षेत्र में बहुत अधिक संकुचन हुआ है।

1950 के दशक से लेकर अमेरिका में स्टील उद्योग, कपड़ा उद्योग (वस्त्र, परिधान एवं टेक्सटाइल), उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग लगभग समाप्त से हो गए हैं। वाहन उद्योग के क्षेत्र की बड़ी बड़ी कम्पनियों ने अपनी विनिर्माण इकाईयां चीन आदि देशों में स्थापित की हैं। साथ ही, जापान की कई कम्पनियों ने वाहन के क्षेत्र में अमेरिका में आकर अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना की है। इस प्रकार, कुल मिलाकर उक्त उद्योगों में अमेरिकी मूल के नागरिकों के लिए रोजगार के अवसर बहुत कम हो गए हैं अथवा बिलकुल ही समाप्त हो गए हैं। अमेरिका में उपयोग हो रहे स्मार्ट सेल फोन के 50 प्रतिशत से अधिक उपकरण आयात किए जा रहे हैं एवं इनका उत्पादन अमेरिका में नहीं हो रहा है।

ब्यूरो आफ लेबर स्टेटिस्टिक्स – मासिक लेबर रिव्यू दिसम्बर 2016 के अनुसार, अमेरिका में प्रति घंटा वास्तविक मजदूरी दर – वर्ष 1947 में 5.35 अमेरिकी डॉलर थी जो वर्ष 1973 में बढ़कर 9.26 अमेरिकी डॉलर हो गई। परंतु, उसके बाद से लगभग उसी स्तर पर बनी हुई है जो वर्ष 2015 में 9.07 अमेरिकी डॉलर थी। वर्ष 1947 से 1973 के बीच प्रति घंटा वास्तविक मजदूरी दर 73 प्रतिशत से बढ़ी थी जबकि इसी दौरान उत्पादकता में 95 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वहीं वर्ष 1973 से 2015 के बीच प्रति घंटा वास्तविक मजदूरी दर 3 प्रतिशत कम हुई है और उत्पादकता 109 प्रतिशत बढ़ी है। इस बीच रोजगार के नए अधिकतम अवसर उच्च मजदूरी वाले क्षेत्रों से घटकर कम मजदूरी वाले क्षेत्रों में बढ़े हैं। जैसे विनिर्माण इकाईयों के बंद होने से भारी संख्या में श्रमिक वर्ग को सेवा क्षेत्र में कम मजदूरी के रोजगार स्वीकार करने पड़े है। वर्ष 1979 के बाद से 40 प्रतिशत से अधिक रोजगार के अवसर विनिर्माण क्षेत्र में कम हुए हैं। साथ ही, तकनीकी विकास ने भी उत्पादकता तो बढ़ाई है परंतु मजदूरी की दरें नहीं बढ़ पाई हैं।

अमेरिका में समय के साथ साथ विनिर्माण इकाईयां बंद होती गईं एवं उच्च तकनीकी, सूचना आधारित सेवा क्षेत्र में, सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र में, रोजगार के अधिक अवसर उभरते गए। अब तो बहि:स्त्रोतन (आउट्सॉर्सिंग) के चलते सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भी रोजगार के अवसरों पर विपरीत प्रभाव पड़ता दिखाई दे रहा है। अतः अमेरिका में आने वाले समय में विनिर्माण इकाईयों के साथ साथ सेवा क्षेत्र में भी रोजगार के अवसरों में कमी आ सकती है।

उक्त कारणों के चलते अमेरिका में गरीबी की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। गरीबी के चलते इस वर्ग के बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पाती है, यह वर्ग बहुत ही तंग हालत में रहता है एवं अंततः सामाजिक अपराधी गतिविधियों में संलग्न हो जाता है। इनके मकानों में बहुत कम सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं। अमेरिका में गरीबी रेखा का निर्धारण अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रति वर्ष किया जाता है। वर्ष 2015 में गरीबी आंकलन के लिए प्रत्येक चार व्यक्तियों के परिवार के लिए प्रतिवर्ष 24,300 अमेरिकी डॉलर की आय तय की गई थी। इससे कम आय वाले परिवार गरीबी रेखा के नीचे माने जाते हैं। आय की उक्त गणना के आधार पर अमेरिका में 13.5 प्रतिशत परिवार (4.31 करोड़ अमेरिकी नागरिक) गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे थे।

गरीब वर्ग के नागरिकों के आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहने के चलते अमेरिका में 22 लाख अमेरिकी गरीब नागरिक जेलों में बंद थे एवं 50 लाख गरीब नागरिक पैरोल अथवा परीक्षण पर थे एवं अन्य 10 लाख नागरिक जो जेलों से छूट गए थे, वे न तो पेरोल पर थे और न ही परीक्षण पर थे, परंतु वे कभी भी पुनः जेलों में भेजे जा सकते हैं।

आपराधिक गतिविधियों में लिप्त नागरिकों के अतिरिक्त 20 लाख से 30 लाख नागरिक ऐसे भी हैं जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है जिन्हें यहां “होमलेस” कहा जाता है। 50 लाख अमेरिकी नागरिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं एवं 80 लाख नागरिक सामाजिक सुरक्षा एवं विकलांग योजना का लाभ ले रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार, अमेरिका में तीन से साढ़े तीन करोड़ नागरिक स्थायी निम्नवर्ग की श्रेणी में आते हैं, जो अमेरिका की कुल 32.5 करोड़ जनसंख्या का 10 प्रतिशत है। प्रत्येक 5 अमेरिकी बच्चों में से एक बच्चा गरीब वर्ग का है। इतना अधिक खर्च करने के बाद भी अमेरिका में सामाजिक सहायता व्यवस्था अन्य अमीर एवं विकसित देशों की तुलना में कमतर ही मानी जाती है। करोड़ों अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिक केयर डॉक्टर की सुविधा उपलब्ध नहीं है। यदि यह सुविधा उपलब्ध भी है तो चार में से केवल एक नागरिक को ही डॉक्टर से उसी दिन का मिलने का समय मिल पाता है।

अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों में इस प्रकार के हालात देख कर अब तो कई अर्थशास्त्रियों द्वारा आर्थिक विकास के पूंजीवादी मॉडल पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया जाने लगा है एवं यह कहा जा रहा है कि कहीं अमेरिकी स्वपन का अंत निकट तो नहीं है।

राष्ट्रीय छात्र पर्यावरण प्रतियोगिता(NSPC) 2024 में 7 लाख से अधिक प्रतिभागियों की सहभागिता

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राजीव

शिक्षा मंत्रालयf और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा समर्थित पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के तहत राष्ट्रीय स्कूल पर्यावरण प्रतियोगिता का परिणाम 30 अगस्त को एक आभासी कार्यक्रम में किया गया। यह प्रतियोगिता विशेष रूप से छात्रों के बीच पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी सक्रिय भागीदारी के उद्देश्य से आयोजित की गई ।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में चलाए जा रहे अभियान में एक नया कीर्तिमान स्थापित हुआ है। इस अभियान में 7,91,173 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया ।
इस अभियान के अंतर्गत 107 देशों के साथ-साथ भारत के 11 क्षेत्र और 46 प्रांतों के प्रतिभागियों ने भाग लिया। देश के 681 जिलों में यह अभियान चलाया गया, जिससे इसकी भौगोलिक पहुंच और भी प्रभावशाली हो गई ।

इस अभियान में 45022 संस्थानों के प्रतिभागियों ने सक्रिय भूमिका निभाई , जिससे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जागरूकता और सक्रियता में काफी वृद्धि देखी जा सकती है। इस कार्यक्रम में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के निदेशक श्री अमित दत्ता,डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन( दिल्ली सरकार) श्री अशोक त्यागी,भारत स्काउट & गाइड की निदेशिका दर्शना जी,विद्या भारती उत्तर क्षेत्र सह संगठन मंत्री श्री बालकृष्ण जी के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के कार्यकर्ताओं की सहभागिता रही।

श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान चंद्रकिशोर जायसवाल, साहित्य सम्मान सुश्री रेनू यादव को

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नई दिल्लीः उर्वरक क्षेत्र की अग्रणी सहकारी संस्था इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) द्वारा वर्ष 2024 के श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य सम्मान’ के लिए कथाकार श्री चंद्रकिशोर जायसवाल एवं प्रथम ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको युवा साहित्य सम्मान’ के लिए सुश्री रेनू यादव के नाम की घोषणा की गई है। रचनाकारों का चयन वरिष्ठ साहित्यकार श्री असग़र वजाहत की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने किया है। इस वर्ष की सम्‍मान चयन समिति में डॉ. अनामिका, श्री प्रियदर्शन, श्री यतीन्‍द्र मिश्र, श्री उत्‍कर्ष शुक्‍ल एवं डॉ. नलिन विकास शामिल थे।

श्री चन्द्रकिशोर जायसवाल का जन्म 15 फरवरी, 1940 को बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में हुआ। आपने पटना विश्वविद्यालय, पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और अरसे तक अध्यापन करने के बाद भागलपुर अभियंत्रणा महाविद्यालय, भागलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘गवाह गैरहाजिर’, ‘जीबछ का बेटा बुद्ध’, ‘शीर्षक’, ‘चिरंजीव’, ‘माँ’, ‘दाह’ ‘पलटनिया’, ‘सात फेरे’, ‘मणिग्राम’, ‘भट्ठा’, ‘दुखग्राम’ (उपन्यास); ‘मैं नहिं माखन खायो’, ‘मर गया दीपनाथ’, ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’, ‘जंग’, ‘नकबेसर कागा ले भागा’, ‘दुखिया दास कबीर’, ‘किताब में लिखा है’, ‘आघातपुष्प’, ‘तर्पण’, ‘जमीन’, ‘खट्टे नहीं अंगूर’, ‘हम आजाद हो गए!’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘शृंगार’, ‘सिंहासन’, ‘चीर-हरण’, ‘रतजगा’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘रंग-भंग’ (नाटक); ‘आज कौन दिन है?’, ‘त्राहिमाम’, ‘शिकस्त’, ‘जबान की बन्दिश’ (एकांकी)।
आप ‘रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान’ (हजारीबाग), ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ (आरा), ‘आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान’ (लखनऊ), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का ‘साहित्य साधना सम्मान’ (पटना) और बिहार सरकार का जननायक ‘कर्पूरी ठाकुरी सम्मान’ (पटना) से सम्मानित हैं।
आपके उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ पर राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘रूई का बोझ’ और कहानी ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’ पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित फ़िल्में काफी चर्चित रही हैं। ‘रूई का बोझ’ नेशनल फ़िल्म फेस्टिवल पैनोरमा (1998) के लिए चयनित हुई थी और अनेक अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है।

सुश्री रेनू यादव का जन्म 16 सितम्बर, 1984 को गोरखपुर में हुआ। शिक्षा- एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी., यू.जी.सी-नेट संप्रति- असिस्टेंट प्रोफेसर, भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग (हिन्दी), गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा
आपकी प्रमुख कृतियां है- ‘महादेवी वर्मा के काव्य में वेदना का मनोविश्लेषण’ (आलोचनात्मक पुस्तक), ‘मैं मुक्त हूँ’ (काव्य-संग्रह), साक्षात्कारों के आईने में – सुधा ओम ढींगरा (संपादित पुस्तक)। शोध-पत्र – स्त्री विमर्श के आईने में राधा का प्रेम और अस्तित्व, पद्मावत और पूर्वराग, प्रवास में स्त्री-विमर्श टहल रहा है। मासिक पत्रिका साहित्य नंदिनी में ‘चर्चा के बहाने’ स्तम्भ (कॉलम) प्रकाशित होता है तथा इससे पहले कैनेडा से निकलने वाली पत्रिका हिन्दी चेतना में ‘ओरियानी के नीचे’ नामक स्तम्भ प्रकाशित होता था। स्त्री-विमर्श पर केन्द्रित कहानियाँ, कविताएँ एवं शोधात्मक आलेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित ।
सम्मान / पुरस्कार – ‘सृजन श्री’ सम्मान सृजन-सम्मान बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था एवं प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर (छत्तीसगढ़)। ‘विरांगना सावित्रीबाई फूले नेशनल फेलोशिप अवार्ड’ भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली।

मूर्धन्य कथाशिल्पी श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में वर्ष 2011 में शुरू किया गया यह सम्मान प्रत्येक वर्ष ऐसे हिन्दी लेखक को दिया जाता है जिसकी रचनाओं में मुख्यतः ग्रामीण व कृषि जीवन का चित्रण किया गया हो। इससे पहले यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल, शेखर जोशी, संजीव, मिथिलेश्वर, अष्टभुजा शुक्ल, कमलाकांत त्रिपाठी, रामदेव धुरंधर, रामधारी सिंह दिवाकर, महेश कटारे, रणेंद्र, शिवमूर्ति, जयनंदन और मधु कांकरिया को प्रदान किया गया है। इस पुरस्कार के अन्तर्गत सम्मानित साहित्यकार को एक प्रतीक चिह्न, प्रशस्ति पत्र तथा ग्यारह लाख रुपये की राशि का चैक प्रदान किया जाता है।

इफको निदेशक मंडल के अनुमोदन से इस वर्ष से शुरू हुए ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको युवा साहित्य सम्मान’ के अंतर्गत सम्मानित साहित्यकार को एक प्रतीक चिह्न, प्रशस्ति-पत्र और ढाई लाख रुपये का चैक प्रदान किया जाएगा।

श्री चंद्रकिशोर जायसवाल एवं सुश्री रेनू यादव को यह सम्मान 30 सितंबर, 2024 को नई दिल्‍ली में आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।

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