शृंखला आलेख – 11: मौत, मुखबिर और मानवाधिकार

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माओवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं का जो सबसे सामान्य कारण बताया जाता है वह है ग्रामीणों द्वारा कथित रूप से की जाने वाली मुखबिरी। लगभग दो दशकों से मैं बस्तर परिक्षेत्र के समाजशास्त्रीय विषयों पर कार्य कर रहा हूँ और जानता हूँ कि केवल संदेह के आधार पर ही अनेक ग्रामीण माओवादियों द्वारा मौत के घाट उतार दिए गए। अनेक बार झूठी शिकायत पर भी किसी ग्रामीण को मुखबिर बता दिया गया और फिर धार विहीन हथियार से माओवादियों ने निर्ममता भरी मौत दी है। एक ऐसे ही परिवार सें मैं कुछ समय पूर्व मिला था जिसके परिजन की केवल इसलिए हत्या कर दी गई थी कि उसका एक सहपाठी सिपाही हो गया था और दोनों मित्र बाजार में बात करते देखे गये। एक ग्रामीण को केवल इसलिए मार दिया गया था क्योंकि उसे बैंक में पैसा जमा करते देखा गया था, पूछने पर ज्ञात हुआ कि वह तो अपने फसल से अर्जित राशि जमा करने गया था न कि किसी तरह की मुखबिरी करने या पुलिस को सहयोग करने। यह संभावना भी है कि अनेक ने पुलिस तंत्र का जाने अनजाने सहयोग किया हो लेकिन इसके लिए माओवादियों के पास मौत के घाट उतार देने जैसी एकमेव सजा क्यों है?

मैंने माओवादियों को और शहरी नक्सलियों को, सर्वदा एक ही स्वर में मानवाधिकार का नारा लगाते सुना है। उनकी सारी कवायद सुरक्षाबलों के विरुद्ध रहती है लेकिन स्वयं माओवादियों द्वारा मानव को मानव न समझे जाने के प्रश्न पर उनकी ओर से कभी कोई उत्तर नहीं आया। मेरा प्रश्न है कि क्या नक्सलक्षेत्र के ग्रामीणों का मानव अधिकार नहीं होता? आज इस प्रश्न का सामान्य कुछ आंकड़ों से करते हैं। इस विवेचना में मैंने केवल एक वर्ष (फरवरी 2024 से जनवरी 2025 तक) का आंकड़ा लिया है। इस अवधि में मैंने प्रत्येक माह में वह संख्या निकाली है जो नक्सलियों द्वारा की गई उन ग्रामीणों की हत्या है जिन पर मुखबिरी करने के आरोप लगाए गए थे। प्रतिमाह के आँकड़े देखें तो -(2 हत्या) फरवरी 2024, (4 हत्या) मार्च 2024, (4 हत्या) अप्रैल 2024, (1 हत्या) मई 2024, (3 हत्या) जून 2024, (2 हत्या) जुलाई 2024, (4 हत्या) अगस्त 2024, (3 हत्या) सितंबर 2024, (3 हत्या) अक्टूबर 2024, (1 हत्या) नवंबर 2024, (5 हत्या) दिसंबर 2024, (1 हत्या) जनवरी 2025; इस तरझ केवल एक वर्ष की अवधि में तैंतीस (33) ग्रामीणों को मुखबिर बताया कर मार दिया गया। मारे जाने वाले ग्रामीणों में 100% जनजातीय समाज के व्यक्ति हैं।

केवल एक साल में तैंतीस व्यक्ति मार दिए गए, इस बात को देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने याकि मीडिया ने संज्ञान में क्यों नहीं लिया? क्या साल में तैंतीस हत्याओं का आंकड़ा कोई छोटी संख्या है? माह दर माह होने वाली ये हत्यायें बस्तर में सामान्य घटना बना दी गई हैं। शहरी नक्सलवाद जो नैरेटिव परोसता है उससे इतर इन ग्रामीणों की हत्या पर क्यों मानवाधिकार की मोमबत्तियाँ भीग जाती हैं? शोकसभाओं पर क्या बिजली गिर पड़ती है? मौत, मुखबिर और मानवाधिकार पर बस्तर में कभी खुल कर बहस हुई ही नहीं, शायद इसलिए क्योंकि यहाँ अवस्थित मानव अधिकार की दूकानों के एजेंडे अलग हैं और मीडिया की टीआरपी के लिए ऐसी खबरें कोई योगदान नहीं करतीं.

शृंखला आलेख – 10: यह देश गूंगा-बहरा क्यों है?

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रायपुर : यह बात वर्ष 2018 की है, सुकमा जिले के अंतर्गत आने वाले कुंदनपाल गाँव के उन्नीस वर्षीय छात्र कुंजामी शंकर की अपहरण के पश्चात माओवदियों ने बहुत ही निर्ममता से हत्या कर दी थी। किशोर तथा नव-युवक छात्रों की हत्या करना माओवादियों के लिए बहुत आम है, ऐसी हत्याएं कुंजामी शंकर से पहले भी होती रहीं हैं, समय बदल कर आज वर्ष 2025 हो चला है और अब भी क्या बदला है?

17 जून, 2025 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के पेदाकोरमा गाँव से अनेक ग्रामीणों को अगवा किया, सभी के साथ अमानवीय रूप से मारपीट की गयी और तीन लड़कों जूंगू मोडियम, सोमा मोडियम और अनिल मांडवी की हत्या कर दी। माओवादियों ने जिनकी हत्या की वे स्कूली छात्र थे और एक तो केवल तेरह वर्ष का बालक था।जिन बंधकों को छोड़ा गया उनमें से अधिकांश किशोर थे, उन्हें आगे से स्कूल न जाने की हिदायत माओवादियों द्वारा दी गई है। सोचिए कि वह कौन की क्रांति है जो तेरह-चौदह वर्ष के किशोरों की आहूति मांग रही है? हत्या भी रस्सी से गला घोंट कर की गयी, अपराध यह कि इनका एक परिजन पूर्व-माओवादी था और आत्मसमर्पण कर चुका है। एक बार के लिए मान लेते हैं कि ये मारे गए बालक पुलिस के मुखबिर थे या ऐसा ही कोई अन्य कार्य उन्होंने किया जिसे माओवादी अपराध मानते हैं तो भी उनकी निर्मम हत्या करने का अधिकार कैसे प्राप्त हो जाता है? दुनिया का कौन सा कानून इतना अमानवीय है कि अल्पव्ययस्कों को मौत की सजा देता है? क्या यही कार्ल मार्क्स के सपने का रास्ता और माओत्से तुंग का तौर तरीका है?

बात एक बार फिर नैरेटिव की करूंगा क्योंकि इस समय हमारा देश सोनम ने अपने पति की हत्या क्यों की, इस प्रश्न में उलझा हुआ है। वही देश यह क्यों नहीं जानना चाहता कि कुंजामी शंकर को क्यों मारा गया या कि जूंगू मोडियम, सोमा मोडियम और अनिल मांडवी की हत्या क्यों और किस तरह की गयी? थोड़ा दिमाग पर जोर डालिये, याद कीजिए दक्षिण भारत के विश्वविद्यालय में पढने वाले एक छात्र ने आत्महत्या की थी, तब देश संवेदित ही नहीं, उग्र और आंदोलित भी हो उठा था। दिल्ली के एक विश्वविद्यालय का छात्र लापता हुआ था, सारा देश एक स्वर में उठ खडा हुआ। ये प्रकरण निश्चय ही आन्दोलित होने का समुचित आधार हैं, यदि हम अपने छात्रों के पक्ष में नहीं खडे हैं तो फिर देश के भविष्य को अंधेरा ही मानिये।….अब सोचिये कि यही देश माओवादियों द्वारा बस्तर में सतत मारे जा रहे किशोर छात्रों के पक्ष में क्यों नहीं खडा हैं? माओवादियों द्वारा की जाने वाली ऐसी नृशंसतम हत्याओं में ऐसी क्या विशेषता है कि उनपर खामोशी पसरी रहती है?

इस प्रश्न का उत्तर कुनैन की तरह कड़वा है और शहरी नक्सलवाद का मर्म है। यह देश किस हैडलाईन से संचालित होगा इसका निर्णय लेने वाले अधिकांश मष्तिष्क लाल हैं। आत्महंता वैमुला पर खबर वैश्विक हो जाएगी लेकिन कुंजामी शंकर पर चुप्पी और घनघोर चुप्पी। दिल्ली के लापता छात्र पर पूरी शिक्षा व्यवस्था कटघरे में होगी, लेकिन जिन छात्रों को आगे से स्कूल न जाने की धमकी माओवादियों ने दी है उस संदर्भ पर बात करने से बचना ही प्रगतिशीलता है। रायपुर के अखबार तो ऐसी घटनाओं पर बीच के किसी पन्ने में “तीन ग्रामीणों की मौत” कह कर इतिश्री कर भी लेते हैं लेकिन दिल्ली सोनम से जब जब फुरसत पाती है वह तत्क्षण गाजा के आँसू पोंछने निकल पड़ती है। सोचिए कि सच पर इतना कोहरा क्यों है? सोचिए कि यह देश देश गूंगा-बहरा क्यों है?

शृंखला आलेख – 9: मार्क्सवाद की कनपट्टी पर बंदूख

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रायपुर: सारा बखेड़ा उस एक व्यक्ति की सोच का है जिसे आज हम कार्ल मार्क्स के नाम से जानते हैं। नर्म या गर्म, जिस भी तरह का वामपंथ हो, इसके पीछे इसी एक व्यक्ति की अव्यावहारिक-अव्यावहारिक सोच विद्यमान है। माओवाद के संबंध में क्रांति की जो अवधारणा हमारे सामने आती है उसके पीछे मार्क्सवाद में, वर्ग विहीन समाज बनाये जाने की काल्पनिक किन्तु आदर्श स्थिति है, जहाँ कोई सामाजिक वर्ग नहीं होगा यहाँ तककि उत्पादन के साधनों पर सभी का समान स्वामित्व होगा। मार्क्स का मानना था कि राज्य एक वर्ग-आधारित समाज का उपकरण है, और जब वर्ग समाप्त हो जाएंगे, तो राज्य भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। इस विचारक का मानना था कि वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लिए, सर्वहारा वर्ग को पूंजीपति वर्ग के खिलाफ संघर्ष करना होगा और सत्ता हासिल करनी होगी। यह संघर्ष क्रांति के माध्यम से हो सकता है, जिसमें सर्वहारा वर्ग पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकता है और सत्ता पर कब्जा कर लेता है। इसी प्रकार की तथाकथित क्रांति की संकल्पना वह बारीक रेखा है जहाँ नरम वामपंथी और उग्रवामपंथी के बीच का भेद विद्यमान है।

किसी दार्शनिक की सोच सही हो सकती है, गलत भी होती है। विचार को भी कसौटी पर कसना आवश्यक है। अबूझमाड़ में अतीत से वर्तमान तक भी वर्ग विहीन समाज की ही उपस्थिति है। इस परिक्षेत्र में किसी भी तरह से व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य सर्वहारा और पूंजीपति वाला विभेद करना संभव नहीं है। यहाँ समुपस्थित शिकारी और संग्राहक जन-समूह, परंपरागत रूप से स्थानिक कृषि पर निर्भर हैं।  स्थानिक कृषि, जिसे झूम खेती या स्थानान्तरी कृषि भी कहा जाता है, एक प्रकार की कृषि प्रक्रिया है जिसमें भूमि के एक टुकड़े पर कुछ समय के लिए खेती की जाती है, फिर उर्वरता कम होने पर उसे छोड़ दिया जाता है और दूसरे टुकड़े पर खेती की जाती है। इस तरह की खेती में, पहले छोड़े गए टुकड़े पर प्राकृतिक वनस्पति फिर से उग आती है।

इतना भर जान लेने से बात पूरी नहीं हो जाती, अबूझमाड़ परिक्षेत्र में सामूहिक खेती की भी परिपाटी है। सामूहिक खेती ऐसी प्रणाली है जिसमें उस गांव के सभी किसान मिलकर किसी भूमि में साझा खेती करते हैं। किसान एक साथ मिलकर योजना बनाते हैं, संसाधनों को साझा करते हैं, और सामूहिक रूप से फसल उगाते हैं। उत्पादित फसल का बटवारा भी समान रूप से उसी समूह में होता है। यदि इन परंपराओं और जीवन शैली को भलीभाँति विवेचित किया जाये तो यही वह आदर्श स्थिति है जिसके लिए कथित क्रांति की रूपरेखा बुनी-बनाई गई है। यहाँ कोई सामाजिक वर्ग नहीं है यहाँ तककि उत्पादन के साधनों पर सभी का समान स्वामित्व भी है। अगर कार्ल मार्क्स ऐसी ही दुनियाँ रचना चाहते थे तो माओवादी बस्तर संभाग के विविध जिलों, विशेषरूप से अबूझमाड में क्या कर रहे हैं? वे तो कार्लमार्क्स के सपने की छाती पर ही एके-47 ले कर खड़े दिखाई पड़ते हैं?

हमें इस उदाहरण से समझना होगा कि माओवाद का संबंध किसी विचार की धारा से नहीं है यह विशुद्ध आतंकवाद है। यदि वर्गविहीन समाज का स्वप्न ही सच करना है तो अबूझमाड के वर्गविहीन समाज को कुचल कर वहीं पर आधार इलका बनाने की आवश्यकता क्यों थी? शहरी नक्सलियों के शब्द जाल में सोचने समझने वाले उलझ ही जाते हैं लेकिन तर्कशील होना किसी विषयवस्तु पर समझ बनाने के लिए जरूरी तत्व है। जहाँ विचार समाप्त होते हैं, तर्क के मायने नहीं रह जाते वहाँ पर ही कनपट्टी पर बंदूख टिकाई जाती है। 

यूएस—ईरान के तकरार में, एक्सपोज हुआ यूट्यबर्स का इको सिस्टम

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विदेश नीति को साधने निकले यू ट्यूबर विश्वविद्यालय के सारे विशेषज्ञों से पूछा जाना चाहिए कि गोदी मीडिया से लेकर वाट्सएप यूनिवर्सिटी तक के ज्ञान पर महीनों इन्होंने जो दर्जनों वीडियो बनाई हैं।

अब वह सारी कहानियां उनके सामने खड़े होकर सवाल पूछ रहीं हैं कि बताओ अब इस कृत्य के लिए तुम्हारे ज्ञान को क्या नाम दें? कहां से इम्पोर्ट किया है इतना ज्ञान, जहां से भी आया है, उस विश्वविद्यालय को क्या नाम दिया जाए।

तुम्हारे मोनोलॉग में संवाद के लिए कोई जगह नहीं। ऐसी एकपक्षीय टिप्पणियों को पत्रकारिता कहना ठीक नहीं। फिर क्या कहें?

वास्तव में पत्रकारिता के लिए यह चिंता और चिंतन दोनों का समय है कि कुछ सालों पहले तक भारतीय मीडिया में स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकार जब यू ट्यूब पर आकर किसी राजनीतिक दल के आईटी सेल की तरह काम करने लगे फिर सूचना के लिए आम आदमी किस पर विश्वास करे?

 

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