शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की योजना पर विस्तृत चर्चा होगी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक का आयोजन केशव कुंज (दिल्ली) में 04 से 06 जुलाई तक होने वाला है। बैठक में मुख्यतः संगठनात्मक विषयों पर चर्चा होगी। यह बैठक कोई निर्णय लेने वाली बैठक नहीं है। प्रांतों में संगठन के कार्य की प्रगति व अनुभवों पर चर्चा होती है। कार्य विभागों के कार्य को लेकर भी चर्चा होती है। बैठक में पूजनीय सरसंघचालक, माननीय सरकार्यवाह की उपस्थिति रहती है। उनका मार्गदर्शन सभी कार्यकर्ताओं को प्राप्त होता है। बैठक में सभी सह सरकार्यवाह, कार्य विभाग प्रमुख और संघ प्रेरित 32 विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्री उपस्थित रहेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने आज केशव कुंज में पत्रकारों से बातचीत के दौरान बैठक में आने वाले विषयों के संबंध में जानकारी प्रदान की। इस अवसर पर उनके साथ सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, प्रदीप जोशी भी उपस्थित रहे।

उन्होंने बताया कि मार्च के पश्चात देशभर में अब तक 100 प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन हुआ है। जिसमें 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के 75 तथा 40 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के 25 वर्ग आयोजित हुए हैं। प्रशिक्षण वर्गों के दौरान सेवा विभाग सहित विभिन्न कार्य विभागों का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। स्वयंसेवक स्थायी प्रकल्पों में भी लगते हैं, और आपदा के समय भी स्वयंसेवक सेवा कार्य में जुटते हैं। पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा, अहमदाबाद विमान हादसे के दौरान भी स्वयंसेवक सेवा कार्य में लगे।

उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष इस बैठक का मुख्य विषय है। सभी प्रांतों ने तैयारी की है, अपनी-अपनी योजना बनाई है। उस पर बैठक में चर्चा होगी, बैठक के पश्चात इस संबंध में जानकारी प्रदान की जाएगी।

शताब्दी वर्ष का शुभारंभ नागपुर में 02 अक्तूबर को विजयादशमी उत्सव के साथ होगा। जिसमें पूजनीय सरसंघचालक जी उपस्थित रहेंगे। इसके पश्चात अगले एक वर्ष तक शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम चलेंगे। उसी दिन देशभर में शाखा/मंडल/बस्ती के स्तर पर उत्सव आयोजित होंगे। एक अन्य विशेष अभियान के तहत स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। गृह संपर्क अभियान के दौरान स्वयंसेवक संघ साहित्य देकर वार्ता करेंगे।

देशभर में नगर/खंड स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन होगा। इसमें विभिन्न वर्गों के प्रमुख लोग एकत्रित आकर समाज से कुरीतियों को दूर करने, सद्भाव व समरसता को बढ़ाने के लिए चर्चा करेंगे। साथ ही जिला केंद्रों पर प्रमुख नागरिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। गोष्ठियों में हिन्दुत्व, राष्ट्रहित, भविष्य के भारत के संकल्प को लेकर चर्चा होगी। शताब्दी के निमित्त युवाओं की सहभागिता की दृष्टि से विशेष कार्यक्रमों का आयोजन होगा।

उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के दृष्टिगत पूजनीय सरसंघचालक जी के प्रवास योजना पर भी चर्चा होगी। शताब्दी वर्ष के निमित्त सरसंघचालक जी के साथ विशेष संवाद कार्यक्रम देश के चाऱ प्रमुख शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकता, बैंगलुरु में आयोजित होंगे। जिसमें समाज के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि समाज में संघ को जानने व संघ से जुड़ने के लिए विशेष उत्साह देखा जा रहा है। युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में संघ से जुड़ने का इच्छुक है। इस वर्ष आयोजित प्रशिक्षण वर्गों में युवाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया है। साथ ही, अप्रैल से जून के बीच ज्वाइन आरएसएस के माध्यम से 28,571 लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण करवाया है।

उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने समाज के समक्ष पंच परिवर्तन का विचार रखा है, इसके अंतर्गत संपूर्ण समाज की सहभागिता से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना लक्ष्य है। सामाजिक समरसता के तहत समाज में सद्भाव बढ़े, परिवारों की पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली बने, स्व-बोध का गौरव, कुटुंब में आत्मीयता व संस्कारों का वर्धन, नागरिक कर्तव्यों के पालन के प्रति जागरूकता बढ़े। इसके लिए संघ के स्वयंसेवक समाज की सहभागिता से आगे बढ़ेंगे।

भविष्य के युद्धों के लिए तैयार होती भारतीय सेना

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दिल्ली । वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से ही भारत अपनी सेनाओं को आत्मनिर्भर, स्वदेशी तकनीक से समृद्ध, सुदृढ़ व सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। भारतीय सेना को भविष्य की रक्षा चुनौतियों लिए इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि भूमि से लेकर वायु और समुद्र की गहराई से लेकर अंतरिक्ष की ऊंचाईयों तक अपनी सुरक्षा के लिए किसी अन्य पर निर्भर न रहना पड़े। आज अति आधुनिक ड्रोन से लेकर अविश्वसनीय मारक क्षमता वाली मिसाइलों तक का निर्माण भारत में किया जा रहा है।

विगत दिनों ईरान- इजराइल के मध्य संघर्ष के बीच ईरान के शक्तिशाली व मजबूत परमाणु संयंत्रो को नष्ट करने की क्षमता न होने के कारण इजराइल को भी अमेरिका की शरण में जाना पड़ा था। ऐसी ही परिस्थतियों से बचने के लिए भारत अब बंकर ब्लस्टर बम बनाने की दिशा में भी अग्रसर है। वर्तमान समय में कुछ ही राष्ट्रों के पास बंकर ब्लस्टर जैसी सुविधा उपलब्ध है और जब भारत भी उस श्रेणी में आ जाएगा। जब भारत का यह स्वदेशी बंकर ब्लस्टर बम बनकर तैयार हो जाएगा तब हमारी अग्नि -5 मिसाइल दुश्मन के मजबूत ठिकानों और तहखानों को मिनटों में ध्वस्त करक वापस चली आएगी।

भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं संगठन अग्नि 5 मिसाइल के दो नये एडवांस प्रारूप विकसित कर रहा है जिसमें प्रथम प्रारूप बंकर ब्लस्टर वॉरहेड या विस्फोटक ले जाने वाला होगा जो जमीन के भीतर 80 से 100 मीटर तक जाकर दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त करेगा जबकि दूसरा प्रारूप विस्फोटक ले जाने वाला होगा।ये दोनों ही प्रारूप दुश्मन के डिफेंस सिस्टम, न्यूक्लियर सिस्टम, रडार सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और हथियार डिपो को ध्वस्त करके वापस लौट आएंगे। अग्नि -5 बंकर ब्लस्टर मिसाइल जमीन, सड़क और मोबाइल लांचर से दागी जाएगी।अग्नि -5 भारत की एक ऐसी मिसाइल है जो एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक निशाना लगा सकती है।इसकी रेंज 5 से 7 हजार किमी तक हैं ये परमाणु हथियार भी ले जा सकती है। भारत का बंकर ब्लस्टर बम अमेरिकी बम से भी अधिक क्षमतावान बनाया जा रहा है।भारत की बंकर ब्लस्टर मिसाइल अमेरिकी बम से अधिक गहराई तक निशाना लगा सकती है।भारत को चीन और पाकिस्तान से पैदा हुए खतरे को देखते हुए ही इस प्रकार की मिसाइल का निर्माण किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना को मिला तमाल – इसी प्रकार ब्रहमोस मिसाइलों से लैस अब तक का सबसे घातक आधुनिक स्टील्थ युद्धपोत आईएनएस तमाल अब भारतीय नौसेना में शामिल हो गया है जिसके कारण अब समुद्र में भी भारत की ताकत बढ़ गई है।इस बहुददेशीय अतिआधुनिक युद्धपोत का जलावतरण रूस के केलिनिनग्राद में हुआ। नौसेना के पश्चिमी बेड़े में शामिल यह युद्धपोत हिंद सागर में तैनात होगा और पाकिस्तान से लगती सीमा पर निगरानी में भारत की सबसे बड़ी ताकत बन जायेगा। तमाल युद्धपोत विगत दो दशकों में रूस से प्राप्त क्रियाक श्रेणी के युद्धपोतों की श्रृंखला में आठवां युद्धपोत है। यह पूर्ववर्ती संस्करणों की तुलना में अधिक उन्नत है। इसमें लंबवत प्रक्षेपित सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें उन्नत 100 मिलीमी की तोप , मानक 30 मिलीमीटर गन क्लोज -इन हथियार प्रणाली के अलावा आधुनिक समय की प्रणाली अत्यधिक भार वाले टारपीडो तत्काल हमला करने वाले पनडुब्बी रोधी, रॉकेट और अनेक निगरानी एवं अग्नि नियंत्रण रडार तथा अन्य प्रणालियां शामिल हैं।

युद्धपोत का नाम तमाल देवताओं के राजा इंद्र की पौराणिक तलवार से लिया गया है। इसकी मारक क्षमता भी उसी तरह तेज, आक्रामक और निर्णायक है। इसका शुभंकर भारतीय पौराणिक कथाओं के अमर भालू जाम्बवंत और रूसी राष्ट्रीय पशु यूरेशियन भूरे भालू की समानता से प्रेरित है।तमाल युद्धपोत का निर्माण रूस के कैलिनिनग्राद स्थित यांतर शिपयार्ड में हुआ है और इसमें 26 प्रतिशत स्वदेशी उपकरण हैं।सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आखिरी युद्धपोत है जो विदेश में बना है अब ऐसा कोई भी युद्धपोत भारत में ही बनेगा जिसके बाद भारत की नौसेना की शक्ति और बढ़ जाएगी। इस युद्धपोत के कुशल संचालन व रखरखाव के लिए 250 नौसेना कर्मियों ने रूस में प्रशिक्षण प्राप्त किया है। यह बहु मिशन युद्धपोत भारत के समुद्री हितों के क्षेत्र में पारंपरिक और गैर पारंपरिक दोनों तरह के खतरों से निपटने में सक्षम है।

भारत की नोसेना को एक और स्वदेशी युद्धपोत उदयगिरि का उपहार भी मिला है। इस युद्धपोत में सुपरसोनिक सतह से सतह से मार करने वाली प्रणाली लगी है। इसमें 76मिमी गन, 30 मिमी और 12.7 मिमी की रैपिड फायर गन सहित डीजल इंजन और गैस टर्बाइन युक्त सीओडीजी प्रणाली है। इस 3900 टन वजनी और 125 मीटर लंबे युद्धपोत में सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें लैस हैं।यह देनों ही युद्धपोत भारत की समुद्री सीमा की सुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभाने वाले हैं।

बिहार में आसान नहीं है, गलत को गलत बोलना

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कोई भी आरटीआई कार्यकर्ता यह जानना चाहे कि उसके घर के सामने बनी सड़क के लिए कितना पैसा खर्च हुआ, वह धन विधायक फंड से आया या किसी अन्य स्रोत से, और उसे किस कंपनी के माध्यम से खर्च किया गया-यह सारी जानकारी आरटीआई के जरिए मांगी जा सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय, मेहनत और संसाधनों की जरूरत होती है। दुर्भाग्यवश, बिहार में आरटीआई कार्यकर्ताओं का यह समूह धीरे-धीरे थक रहा है। जब समाज में भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिल चुकी हो, तो कोई कितने दिन अपनी जमा-पूंजी और ऊर्जा लगाकर परिवर्तन की लड़ाई लड़े? यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, जब समाज के लिए लड़ने वाला व्यक्ति अपने ही मोहल्ले में दर्जनों दुश्मन बना लेता है। विडंबना यह है कि जिनके लिए वह लड़ रहा होता है, वे अक्सर अपराधियों और भ्रष्ट लोगों के साथ उठते-बैठते हैं और उसी कार्यकर्ता को दलाल या गलत ठहरा देते हैं।

पटना। बिहार में एक आरटीआई कार्यकर्ता ने पूरे राज्य की पंचायतों में किए गए विकास कार्यों की जानकारी जुटाने का बीड़ा उठाया। इस कार्यकर्ता ने आरटीआई के माध्यम से हर पंचायत के विकास कार्यों का ब्योरा मांगा, जो स्थानीय मुखिया द्वारा पंचायती फंड से किए गए थे। बिहार का कोई भी नागरिक इस तरह की जानकारी आरटीआई के जरिए प्राप्त कर सकता है। आप भी अपने पंचायत में कितना अैर किस किस मद में खर्च हुआ है, इसका ब्यौरा मंगा सकते हैं?

लेकिन यह कार्य उतना आसान नहीं था। कार्यकर्ता के लिए ऐसी पंचायत ढूंढना चुनौतीपूर्ण रहा, जहां आवंटित धनराशि के अनुरूप वास्तव में काम हुआ हो। कई जगह कागजों पर सड़कें बन गईं, लेकिन गांव में उनकी मौजूदगी तक नहीं थी। यह आपके गांव का हाल भी हो सकता है? आपने जानकारी इकट्ठी की है क्या?

ऐसे में सवाल उठता है कि जब कागजों पर विकास हो रहा हो और जमीनी हकीकत कुछ और हो, तो न्याय की लड़ाई कौन लड़ेगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला व्यक्ति न केवल अपनी जेब से खर्च करता है, बल्कि स्थानीय नेताओं और मुखियाओं की दुश्मनी भी मोल लेता है। कई बार वह अपनी लड़ाई में इतना अकेला पड़ जाता है कि सड़क पर चलते चलते कोई ट्रक उसे रौंद कर एक दिन चली जाती है और उसके आस पास के समाज को इससे फर्क तक नहीं पड़ता। या फिर दो चार दिन समाचार पत्रों में चर्चा होती है फिर सब भूल जाते हैं।
जो लोग गलत रास्ते पर होते हैं, वे अक्सर भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी ले कर चुप्पी साध लेते हैं। यह रास्ता अब लाइजनिंग और वसूली गिरोहों में सबसे प्रचलित है इन दिनों। बिहार के एक चर्चित यू ट्यूबर से जुड़ी ऐसी दर्जनों कहानियां बिहार के लोगों को पता है।

अब उसके समर्थक ही कहते हैं कि ईमानदारी से बिहार के लोगों के लिए लड़ता तो किसी दिन कोई शूटर ठोक कर चला जाता। क्रांतिकारी की इमेज भी बचा ली और दलाली की दूकान भी चल रही है। यही नए दौर की राजनीति है। यह जिसने नहीं सीखा वह राजनीति कर नहीं पाएगा।

बिहार में सुधार की शुरुआत कहां से हो? पंचायतों से, या नगर निगम से जहां एक साल के कार्यकाल में ही मुखिया हो या पार्षद घर के सामने स्कॉर्पियो खड़ी कर लेता है। गांव वाले हों या वार्ड वाले वे सब देखते हैं, लेकिन इस मुद्दे को अपनी बातचीत में शामिल करने से बचते हैं। इसके बजाय, वे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों—जैसे मोदी, राहुल गांधी या ट्रंप की विदेश नीति—पर चर्चा करना पसंद करते हैं। आप समझते हैं, वे ऐसा क्यों करते हैं?

बिहार को राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश माना जाता है, लेकिन यह जागरूकता अक्सर सुरक्षित मुद्दों तक सीमित रहती है। कोई भी स्थानीय स्तर पर मुखिया हो या वार्ड सदस्य की आलोचना करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता, क्योंकि इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

बिहार ही नहीं, पूरे देश में लोग भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराइयों के साथ जीना सीख रहे हैं। परिवर्तन की उम्मीद धूमिल हो चुकी है। परिवर्तन की कहानी सुनाकर कोई केजरीवाल अपनी फैमिली का फ्यूचर बनाने में लग जाता है। अपने परिवार के हेल्थ पर लाखों रुपए साल में खर्च कर रहा है और दिल्ली वालों को मोहल्ला क्लिनिक देकर कहना कि यह विश्वस्तरीय है। यह ठगी ठीक नहीं है।

लोग मानते हैं कि उपलब्ध विकल्पों में मौजूदा नेतृत्व ही सर्वश्रेष्ठ है, और इसलिए वे उसी के साथ खड़े रहते हैं। धीरे-धीरे समाज में आत्मकेंद्रित लोगों की संख्या बढ़ रही है, जहां ‘स्व’ का मतलब केवल व्यक्ति, उसकी पत्नी और बच्चे तक सीमित हो गया है। स्व का विकास का अर्थ है, मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चों का विकास।
देश और समाज की चिंता अब उनके लिए प्राथमिकता नहीं रही। इस स्थिति में सवाल यह है कि क्या बिहार में बदलाव संभव है? इसके लिए न केवल जागरूकता, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति और साहस की जरूरत है।

आरटीआई जैसे उपकरण सशक्त हो सकते हैं, लेकिन जब तक समाज भ्रष्टाचार को सामान्य मानना बंद नहीं करता, तब तक कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाएगी, यह कहना मुश्किल है।

हिंदू थॉट: ए फाउंडेशन ऑफ द मॉरल लिविंग’ पुस्तक का भव्य विमोचन समारोह

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दिल्ली: केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बुधवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में ‘हिंदू थॉट: ए फाउंडेशन ऑफ द मॉरल लिविंग’ पुस्तक का विमोचन किया। यह पुस्तक दिल्ली विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वरुण गुलाटी द्वारा लिखी गई है। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई और इसमें प्रमुख अतिथियों के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री डॉ. बीआर शंकरानंद, सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली, डीन ऑफ कॉलेजेज़ प्रो. बलराम पाणी और रजिस्ट्रार प्रो. विकास गुप्ता उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान गजेंद्र सिंह शेखावत ने पुस्तक की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा,  “यह पुस्तक प्रासंगिक और समय की आवश्यकता है। अब देश बदल रहा है और यह कार्यक्रम बदलते भारत के प्रतीक की तरह है।” उन्होंने सनातन संस्कृति के ‘सनातन’ होने के तात्त्विक बिंदुओं पर चर्चा की आवश्यकता को रेखांकित किया। साथ ही, भारतीय दर्शन की व्यापकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, “भारतीय दर्शन इतना विशाल है कि कोई व्यक्ति उसमें अपने लिए कुछ ना कुछ आसानी से पा सकता है।”

उन्होंने पाश्चात्य और भारतीय दृष्टिकोणों की तुलना करते हुए कहा,  “पाश्चत्य संस्कृति ‘थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन’ की बात करती है, इसलिए उनके लिए जो नया है वही श्रेष्ठ है, जबकि भारत की संस्कृति कहती है कि चार युगों के बाद जीवन का अंतिम लक्ष्य ईश्वर का साक्षात्कार करना है। हमारा दर्शन यह मानता है कि हर जन्मा व्यक्ति ईश्वर का अंश है।” शेखावत ने कहा, “हम जिन वैज्ञानिक ताकतों के भरोसे दुनिया पर विजय करना चाहते थे, आज वही वैज्ञानिक प्रकृति के प्रकोप से सबसे ज्यादा डरे हुए हैं जबकि हमारे ऋषियों ने इन ताकतों को जीवन पद्धति से जोड़ा, और जो देता है उसे देवता के रूप में स्वीकार किया। चाहे माता-पिता, गुरु हों या पृथ्वी, नदियां, वृक्ष और गाय।”

उन्होंने आगे कहा कि 800 वर्षों की गुलामी के बावजूद भारत की संस्कृति इसलिए बची रही क्योंकि इसे ऋषियों ने जीवन पद्धति से जोड़ दिया था। जब भारत की छवि बदल रही है, तो दुनिया की दृष्टि भी भारत की ओर बदल रही है। हमें साहस के साथ अपनी संस्कृति के विचारों पर बात करनी होगी।

भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री डॉ. बी.आर. शंकरानंद ने पुस्तक की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा, “किसी विचार को समाज के सामने रखते समय सावधान रहना होता है। आधार के बिना एक शब्द भी नहीं लिखा जाना चाहिए। इस पुस्तक में हर शब्द और वाक्य महत्वपूर्ण है।”
उन्होंने वैदिक परंपरा और भारतीय विमर्श पद्धति की ओर इशारा करते हुए कहा, “हिंदू कोई ‘Ism’ नहीं है। यह वाद से आगे बहुत से विषयों को समेटे हुए है। भारत में वाद की लंबी परंपरा है, वाद के लिए धैर्य चाहिए। यही धैर्य वैचारिक दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि से आता है।”

बी.आर. शंकरानंद ने हिंदू शब्द की उत्पत्ति पर हो रहे भ्रम को स्पष्ट करते हुए कहा, “कुछ लोग मानते हैं कि सिंधु नदी संस्कृति से ‘हिंदू’ शब्द आया। परंतु सरस्वती नदी की खोज के बाद स्पष्ट हो गया है कि यह संस्कृति सिंधु से भी प्राचीन है। कुछ मतों के अनुसार बाहर से आए लोग ‘स’ नहीं कह सकते थे, वे ‘ह’ कहते थे और वहीं से हिंदू शब्द आया। इस पर विवाद होता है।” उन्होंने बृहस्पति आगम के श्लोक का हवाला देते हुए कहा, “हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्, तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षत। से स्पष्ट होता है कि हिंदू शब्द मौजूदा अर्थ से कहीं अधिक प्राचीन है।” उन्होंने हिंदू धर्म को भारत की आत्मा बताया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा, “हिंदू विचार पर लिखना आसान नहीं है। समाज कितना स्वीकार करेगा, यह एक बड़ा प्रश्न है। यह पुस्तक अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल की तरह है।” उन्होंने कहा, “यह universal truth को पुनः प्रस्तुत करती है।” उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में हमारे वैल्यू सिस्टम और विचार पर सवाल किए जाते हैं और उनकी आलोचना की जाती है, आज के समाज को देखते हुए, मॉडल लिविंग को लेकर हमारी आलोचना की जाती है। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब भी हम शिक्षा और विद्या की बात करते हैं तो ज्ञान और बुद्धि की बात करते हैं। लेकिन हमारा सारा ध्यान ज्ञान पर ही है और बुद्धि को इग्नोर किया जाता रहा है। समझ की समझ को विकसित करना ही शिक्षा है। उच्च शिक्षा संस्थाओं में इस तरह की समस्याएं हैं।

साथ ही, उन्होंने कहा, “फाइनेंशियल लिटरेसी जैसे कोर्स लोकप्रिय हो रहे हैं लेकिन नैतिक-बौद्धिक पाठ्यक्रम नहीं। आतंकियों के पास ज्ञान और डिग्रियां थीं, लेकिन सही और गलत में फर्क करने की बुद्धि नहीं थी।”
उन्होंने कहा, “आज भारत में सबसे ज़्यादा कमी राष्ट्रीय चरित्र की है। देश के भीतर वो मन तैयार नहीं हुए, ये ही 800 वर्षों की गुलामी का सबसे बड़ा कारण था। राष्ट्रीय चरित्र के बिना व्यक्तिगत चरित्र घातक भी हो सकता है।” योगेश सिंह ने कहा, “धर्मो रक्षति रक्षत:, अगर आप धर्म की रक्षा नहीं करेंगे तो धर्म भी आपकी रक्षा नहीं करेगा। हिंदुओं का ज़्यादा अच्छा होना उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ है, हमारे वर्षों तक इसका ध्यान नहीं था और आज इस पर ध्यान किए जाने की ज़रूरत है।”

पुस्तक के लेखक डॉ. वरुण गुलाटी ने इस अवसर को अपने लिए एक भावुक क्षण बताया। उन्होंने कहा, “हिंदू विचार को समझने के लिए धैर्य चाहिए। विदेश से आए कुछ लोगों ने हमारी संस्कृति को नीचा दिखाने की कोशिश की, धर्मग्रंथों को पिछड़ा बताया और हमारी आत्मा में भ्रम पैदा किया।” डॉ. गुलाटी ने कहा, “यह पुस्तक हिंदू विचार को पुर्नजीवित करने का प्रयास है। यह किसी व्यक्ति की जीवनी नहीं, हमारी सांस्कृतिक आत्मा का पुनर्पाठ है।”

इस पुस्तक के प्रकाशक सुरुचि प्रकाशन के अध्यक्ष राजीव तुली ने संस्था की ऐतिहासिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शास्त्र हमारे नयन हैं और सुरुचि प्रकाशन पिछले 55 वर्षों से राष्ट्रीय साहित्य का प्रकाशन कर रहा है। उन्होंने कहा, “सुरुचि प्रकाशन उस समय से है जब छापने और पढ़ने वाले कम थे। देश की स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय विचारधारा को छापने वाले बहुत कम होते थे। करीब 450 टाइटल्स सुरुचि प्रकाशन ने छापे हैं।” तुली ने कहा, “हमारा उद्देश्य किताबें बेचकर पैसा कमाना नहीं है। हमने 350 से अधिक पुस्तकें ऑनलाइन निशुल्क उपलब्ध कराई हैं, जिन्हें 39 देशों के लाखों पाठक हर माह डाउनलोड कर पढ़ते हैं।”

कार्यक्रम के अंत में सुरुचि प्रकाशन के मैनेजिंग डायरेक्टर रजनीश जिंदल ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षाविदों और उपस्थित लोगों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से हिंदू विचारधारा की गहराई को जन-जन तक पहुंचाना ही सुरुचि प्रकाशन का उद्देश्य है और भविष्य में भी ऐसे विमर्शों को आगे बढ़ाने का प्रयास लगातार जारी रहेगा।

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