राजनीति में तथाकथित समाजवाद का दुष्प्रभाव

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एस. के. सिंह

भारतीय संस्कृति में “समाज” (समम अंजंति इति समाज) अर्थात् सबको साथ लेकर चलने की प्रक्रिया है। पुनः सबको साथ लेकर चलने में ऊर्जा शक्ति ‘संबंधों’ से मिलती है। लाखों वर्ष पूर्व उपनिषद्कारों ने समाज शब्द का का वृहत् उपयोग किया है। अतः इस दृष्टिकोण से देखें तो ‘समाजवाद’ शब्द जो हाल के समय से प्रयोग में लाया जाता है प्रयोग में वृहत् नहीं है बल्कि यह संकीर्ण है। ‘वाद’ पर आधारित व्यवस्था और सोच हीं आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी समस्या है। जहां भी वाद आया, वहाँ समस्या बढ़ती चली गयी। उल्लेखनीय है कि ‘वाद’ का हीं विस्तार समाजवाद, साम्यवाद , आतंकवाद, पूंजीवाद आदि है। यूरोप ने पहले समाजवाद नामक व्यवस्था लाया , जब यह असफल हो गया तो पूंजीवाद लाया। यह व्यवस्था भी वहाँ क़रीब-क़रीब धँसने के कगार पर है। हमारे नीति-निर्माताओं ने बिना सोचे-समझे एक असफल व्यवस्था को अपनाया पुनः जो व्यवस्थ पतित हो गई उसे हम अभी भी लेकर चल रहे हैं।

आज पुरे देश में सबको साथ लेकर नहीं, तुष्टीकरण के माध्यम से “कुछ को साथ लेकर चलने की प्रक्रिया” ही समाजवाद के रूप में उभरी है। इसके कारण राजनितिक तुष्टिकरण ने समाजवाद का स्थान ले लिया है। माना जाता है कि समाजवाद न केवल विभिन्न क्षेत्रों में, बल्कि सभी सामाजिक रैंकों और वर्गों में भी धन की असमानता को कम करेगा। इसके विपरीत राजनीति में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक नया वर्ग उभरा है, जो समाजवाद के नाम पर असमानता पैदा कर रहा है और धन इकट्ठा कर रहा है। भारत में समाजवाद के नाम पर परिवार के नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों द्वारा जमा की गई शक्ति और संपत्ति को उजागर करने की जरूरत है।

भारत में समाजवाद एक राजनीतिक आंदोलन है जिसकी स्थापना 20वीं सदी की शुरुआत में औपनिवेशिक शासन से भारतीय स्वतंत्रता हासिल करने के व्यापक आंदोलन के एक हिस्से के रूप में की गई थी। इस आंदोलन की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी क्योंकि इसने जमींदारों, राजसी वर्ग और जमींदारों के खिलाफ भारत के किसानों और मजदूरों के हितों का समर्थन किया। आजादी के बाद और 1990 के दशक की शुरुआत तक समाजवाद ने भारत सरकार की कुछ आर्थिक और सामाजिक नीतियों को आकार दिया।

आपातकाल के दौरान 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम द्वारा भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी शब्द जोड़ा गया था। इसका तात्पर्य सामाजिक और आर्थिक समानता से है। इस संदर्भ में सामाजिक समानता का अर्थ केवल जाति, रंग, पंथ, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर भेदभाव का अभाव है। सामाजिक समानता के तहत सभी को समान दर्जा और अवसर प्राप्त हैं। इस संदर्भ में आर्थिक समानता का अर्थ है कि सरकार धन के वितरण को अधिक समान बनाने और सभी के लिए एक सभ्य जीवन स्तर प्रदान करने का प्रयास करेगी।

कांग्रेस और वाम मोर्चे के अलावा, भारत में अन्य तथाकथित समाजवादी और धर्मनिरपेक्षपार्टियाँ सक्रिय हैं, विशेष रूप से समाजवादी पार्टी, जो उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा गठित जनता दल से निकली थी और अब उनके बेटे अखिलेश यादव के नेतृत्व में है। बिहार ने कर्पूरी ठाकुर, लालू-राबड़ी शासन और उसके बाद समाजवाद के नारे पर नीतीश कुमार का शासन देखा है। वाम दलों ने खुद को प्रासंगिक बनाने के लिए जब भी जरूरत पड़ी, उनका समर्थन किया है। चिराग पासवान जैसी परिवार संचालित पार्टियाँ, जिन्हें अपने पिता स्वर्गीय राम विलास पासवान से कमान मिली थी, भी समाजवादी राजनीति का अनुसरण करने का दावा करती हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी जरुरत के अनुसार समय – समय पर मुलायम और नीतीश को समाजवादी मानती है।

इन सभी तथाकथित समाजवादी पार्टियों में एक बात आम है कि वे जाति को जीवित रखने और मुस्लिम समुदायों के वोट हासिल करने के लिए तुष्टीकरण की कार्रवाई करके सत्ता हासिल करने की कोशिश करते हैं। एक समय था जब बिहार में स्वर्गीय रामविलास पासवान मुस्लिम समुदाय का वोट हासिल करने के लिए ओसामा बिन लादेन जैसे दिखने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ हवाई यात्राएं कर रहे थे। अब उनके बेटे का दावा है कि उनके पिता सच्चे समाजवादी और उदारवादी थे। स्थिति का विरोधाभास यह है कि बिहार के तथाकथित बुद्धिजीवी चिराग पासवान के साथ फोटो शूट कराने और उन्हें प्रगतिशील गिनने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं।

इन सभी तथाकथित समाजवादी पार्टियों के एजेंडे में एक बात छिपी हुई है कि ये वोट के लिए पिछड़ेपन और तुष्टीकरण को बढ़ावा देना चाहते हैं। हकीकत यह है की मुस्लिमों के वास्तविक प्रोग्रेस करने के लिए उनके शिक्षा और बेहतर जीवन शैली पर किसी को कोई दिचस्पी नहीं है। भारतीय जनता पार्टी अपनी सुविधा के अनुसार चिराग पासवान और नीतीश कुमार जैसे छोटे दलों के साथ भी गठबंधन कर लेती है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार के वास्तविक विकास के प्रति उदासीन है और इसका प्रमाण है – कुछ साल पहले केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने बिहार में एक तथाकथित अति पिछड़ी जाति से राज्यपाल सह चांसलर नियुक्त किया था, जिसने उत्तर प्रदेश से लगभग आधा दर्जन कुलपति नियुक्त किए थे, जो पहले से ही भ्रष्टाचार और गबन के आरोपों का सामना कर रहे थे। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार बिहार के उप मुख्यमंत्री के रूप में तार किशोर प्रसाद और रेनू देवी का चयन और नियुक्ति प्रशासनिक कौशल की कीमत पर अति पिछड़ी जातियों को खुश करने का एक राजनीतिक कदम था। यह तथाकथित समाजवाद के दुष्परिणामों को दर्शाता है।

बिहार में कांग्रेस लालू यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल जैसे भ्रष्ट राजनीतिक दलों का समर्थन करती है, जिन पर आपराधिक आरोप लगाए गए हैं और अदालत द्वारा आपराधिक रूप से दोषी पाया गया है। विडम्बना यह है कि इस देश के बुद्धिजीवी और वामपंथी दार्शनिक सामाजिक न्याय के नाम पर इन तथाकथित परिवार संचालित समाजवादी पार्टियों के राजनीतिक एजेंडे की वकालत करते नहीं थकते। जबकि सच्चाई यह है कि लगभाग इन सभी तथाकथित समाजवादी और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया है और वंचितों के हितों की कीमत पर राज किया है, जो सामाजिक और राजनीतिक रूप से बेहतर व्यवहार के हकदार थे। जननायक कर्पोरि ठाकुर के शिष्य होने का दावा करने वाले लालू और नीतीश ने बिहार की राजनीति का मजाक बना दिया है। सत्ता हासिल करने के लिए लालू कर्पूरी ठाकुर को कभी “कपटी ठाकुर” कहते थे और सार्वजानिक रूप से उनकी बेइज्जती करते थे।

बिहार में वामपंथी दल लगभग अलोकतांत्रिक हो गए हैं और समाजवाद तथा इंकलाब के नाम पर एक ही व्यक्ति दशकों से शीर्ष पद पर काबिज है। भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व वोट पाने के लिए जरूरत पड़ने पर अपना रंग बदलता रहता है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने उत्तर प्रदेश में खास वर्ग तथा जाति के वोट पाने के लिए मुलायम सिंह यादव जैसे व्यक्ति को पद्म विभूषण से सम्मानित किया और हाल ही में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किया। कांग्रेस पार्टी ने अपना समाजवादी चरित्र खो दिया है और वे अस्तित्व के लिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की शरण में चले गए हैं।

कार्ल मार्क्स ने बताया है कि जाति व्यवस्था की तुलना में वर्ग व्यवस्था अधिक प्रभावशाली है और यह बात भारतीय राजनीति और विशेष रूप से बिहार में साबित हुई है। पिछडे वर्ग की राजनीति पार्टी से निकले परिवार के कुलीन नेता व्यवसाय चलाते हैं, जैसे तेजस्वी यादव, चिराग पासवान आदि समाजवाद के नाम पर शाही जीवन जीते हैं और अब वे ज्यादातर उच्च जाति के अमीर और प्रभावशाली लोगों से घिरे हुए हैं क्योंकि उनके वर्ग को समृद्धि की आड़ में बदल दिया गया है।

समाजवाद के नाम पर बिहार में हाल ही में हुई जाति जनगणना ने देश में सत्ता के खेल के लिए लोगों को विभाजित करने का एक नया खतरा पैदा कर दिया है और दिलचस्प बात यह है कि भाजपा सहित सभी राजनीतिक पार्टियों ने इसका समर्थन किया है। समाजवाद के नाम पर सभी राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित बिहार की जाति जनगणना बिहार सरकार द्वारा एक राजनीतिक और सामाजिक धोखाधड़ी है। जाति सर्वेक्षण का उपयोग जानबूझकर कुछ जातियों की जनसंख्या को उनकी वास्तविक जनसंख्या से अधिक दिखाने और कुछ जातियों की जनसंख्या को कम दिखाने के लिए किया गया था। इस तथ्य का प्रमाण यह है कि अत्यंत पिछड़ी जाति और अगड़ी जाति के कई समूहों ने सार्वजनिक प्रदर्शन के माध्यम से जाति सर्वेक्षण के खिलाफ नाराजगी जताई। अयोध्या में राम मंदिर की लहर के लिए धन्यवाद, यह जाति सर्वेक्षण निहितार्थ कम हो गया है, अन्यथा यह भारत के अन्य राज्यों में सामाजिक उथल-पुथल पैदा कर सकता था।

लालू और कांग्रेस नेताओं का नारा – “जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी” भारत को लबनान जैसी स्थिति में पहुंचा देगा। बिहार के सीमांचल की जनसांख्यिकी पहले से ही काफी बदल गई है और बहुत जल्द यह एक गंभीर समस्या पैदा करने वाली है। बिहार पीएफआई का केंद्र बन गया है और यह बिहार की सभी सरकारों की तुष्टीकरण नीति का परिणाम रहा है।

९१७१ तक लेबनान भारत की ही तरह एक विभिन धर्मों के समूहों का एक देश था जहाँ पर क्रिस्चियन बहुल आबादी थी और मुस्लिम अल्पसंख्यक थे। लेबननन कि राजधानी बेरुत को किसी समय पेरिस ऑफ़ डी ईस्ट कहा जाता था। अच्छे सोच वाले लोग वहां रहते थे। सिनेमा की शूटिंग करने के लिए लोग वहां जाते थे। 60 के दशक की मशहूर हिंदी सिनेमा ‘आँखे’ की शूटिंग के कुछ दृश्य बेरुत के हैं। लोग अन्य जगहों से वहां पर छुटियाँ मनाने जाते थे। इसको एक तरह से सांस्कृतिक रूप से यूरोप के एक्सटेंशन के तौर पर देखा जाता था।

20 वर्षो में लेबनान की जनसांख्यिकी बदल गयी। मुस्लिम अल्पसंख्यक से बहुसंख्यको गए। उसके बाद जनसँख्या के प्रतिनिधित्व के आधार पर लेबनान में राजनितिक भागीदारी सुनिश्चित होने लगी। परिणाम यह हुआ कि वहां के क्रिस्चियन समाज के लोग लेबनान छोड़ कर भागने लगा। गृह युद्ध होने लगा। हिजबुल्लाह जैसे आतंकी संगठन अपनी पैठ बनाने लगे। इन आतंकी संगठनों को पडोसी मुस्लिम देशो से फंडिंग होने लगी और आज लेबनान कि गिनती आतंकवादी देश के रूप में शुमार है।

दरअसल बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता समाजवाद के नाम पर राजनीतिक और सरकारी संस्थाओं के पक्षपातपूर्ण रवैये का परिणाम है। सत्ता में बने रहने के लिए भारतीय जनता पार्टी साहित सभी राजनीतिक दलों के छद्म समाजवादी दृष्टिकोण को जनता के सामने बेनकाब करने का समय आ गया है। चूंकि बिहार समाजवादी राजनीति की प्रयोगशाला के रूप में उभरा है, इसलिए सभी राजनीतिक दलों के छद्म सामाजिक एजेंडे को बिहार में सुधारना उचित है। बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव से पहले समर्थ बिहार इस मुद्दे को एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाएगा।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माधवहरि अणे : राष्ट्र संस्कृति और संस्कृत के लिये समर्पित रहा जीवन

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माधवहरि अणे भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। वे कहते थे यदि अंग्रेजों से मुक्ति चाहते हो तो पूरी अंग्रेजियत से मुक्ति होना चाहिये । अंग्रेजों के साथ उनकी अंग्रेजी भाषा भूषा शैली सब से मुक्ति होना चाहिए। वे भारतीय संस्कृति और संस्कृत के लिये एक समर्पित जीवन जिये । श्री माधव श्रीहरि अणे का जन्म 29 अगस्त, 1880 को महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में वणी नामक स्थान में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा यवतमाल और पुणे में हुई और वेउच्च शिक्षा के लिये कोलकाता चले गये । उन्होंने ‘कोलकाता विश्वविद्यालय’ से उच्च शिक्षा प्राप्त की । उच्च शिक्षा के साथ ही वे उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया । 1904 से 1907 के बीच अध्यापन का कार्य के साथ उन्होने वकालत की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली । वकालत पास करके यवतमाल लौट आये और वकालत करने लगे । अपनी शिक्षा और वकालत करने के साथ उनकी संस्कृति और समाज सेवा के कार्य साथ साथ चलते रहे । इसका कारण था कि उनके पिता संस्कृत और मराठी भाषा के विद्वान् थे। इस नाते माधवहरि जी को संस्कृत और संस्कृति के प्रति समर्पण के संस्कार अपने परिवार में बचपन से ही मिले थे । आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में वे लोकमान्य तिलक जी से प्रभावित थे । छात्र जीवन जहाँ सामाजिक कार्यों में सक्रिय वहीं अब वकालत के साथ स्वाधीनता संघर्ष से जुड़ गये । इसके लिये उन्होंने कांग्रेस’ की सदस्यता ली और काँग्रेस के आव्हान पर विभिन्न आदोलनों में हिस्सा लिया और जेल भी गये।

अणे पर लोकमान्य तिलक जी का प्रभाव उनके समाचारपत्र ‘मराठा’ और ‘केसरी’ के कारण पड़ा। वे इन पत्रों के नियमित पाठक थे । 1914 में जब तिलक जी जेल से छूटकर आये तो अणे जी उनसे मिलने वालों में शामिल थे। इसी भेंट के बाद उनके तिलक जी से संबंध बने और वे तिलक जी के निकट आ गये । तिलक जी ने उन्हे काँग्रेस में आगे बढ़ाया।अणे जी यवतमाल में कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बनाये गये । जब ‘होमरूल लीग’ की स्थापना हुई तो अणे जी उसके उपाध्यक्ष बने । 1921 से 1930 तक उन्होंने विदर्भ प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्षता की। वे कांग्रेस’ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे। यद्यपि 1921 में असहयोगआंदोलन के खिलाफत आंदोलन साथ-साथ चलाने के वे पक्ष में नहीं थे । इस विषय पर उनके काँग्रेस में मतभेद भी हुये पर उन्होंने कांग्रेस न छोड़ी । तिलक जी के निधन के बाद उनका संपर्क डा मुंजे और सावरकर से भी बना । सावरकरजी ने उन्हे हिन्दु महासभा में आमंत्रित भी किया पर वे काँग्रेस छोड़कर न गये । उनका कहना था कि जाति धर्म व्यक्ति का निजीत्व है वह राजनीति से दूर हो । बाद में ‘स्वराज्य पार्टी’ की ओर से वे केन्द्रीय असेम्बली के सदस्य चुने गए और वहाँ अपने दल के मंत्री बनाए गये । लेकिन समय के साथ उनके काँग्रेस में मतभेद बढ़ते गये और उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और ‘कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी’ नामक एक नया दल गठित कर लिया । 1941 में वाइसराय ने अणे को अपनी कार्यकारिणी का सदस्य मनोनीत कर लिया । परन्तु वे भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थक थे और 1943 में जब गांधी जी ने आगा ख़ाँ महल में अनशन आरम्भ किया तो अणे जी ने उनके समर्थन में वाइसराय की कार्यकारिणी से त्यागपत्र दे दिया । स्वतंत्रता के बाद वे विहार के राज्यपाल भी रहे । समाज में उनके प्रति श्रद्धा सदैव रही । लोग उन्हें ‘बापूजी अणे’ या ‘लोकनायक अणे’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये ।

स्वतंत्रता के बाद वे संविधान सभा के सदस्य चुने गए । फिर उन्हे विहार का राज्यपाल बनाया गया । वे इस पद पर 1952 तक रहे। 1959 से 1967 तक लोक सभा के सदस्य चुने गये।

अणे जी अनेक सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़े रहे । वे पूना के ‘वैदिक शोधक मंडल’ के अध्यक्ष भी रहे । माधवहरि अणे जी भागवत के अध्याय का पाठ और संध्या वंदन उनकी दैनिक दिनचर्या का अंग था । उन्होंने लोकमान्य तिलक जी के जीवन पर संस्कृत में बारह हजार श्लोकों का महा काव्य लिखा । उन्हे उनकी दीर्घकालीन सेवा के सम्मान स्वरूप ‘पद्म विभूषण’ की मानद पदवी से सम्मानित किया था । समाज राष्ट्र और संस्कृति की सेवा करते हुये उन्होंने 26 जनवरी 1968 को इस संसार से विदा ली । समाज राष्ट्र और संस्कृति की सेवा के उनके यशस्वी कार्य से पूरा क्षेत्र आज भी ऋणी है ।

क्या चिराग पासवान भी अपने पिता रामविलास पासवान की तरह मौसम वैज्ञानिक होने की तरफ बढ़ रहे हैं!

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एस. के. सिंह

रामविलास पासवान  को राजनीति का मौसम वैज्ञानिक भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने आने वाले दिनों में राजनीतिक सत्ता की संभावनाओं की भविष्यवाणी की थी और सत्ता का आनंद लेने के लिए उसी के अनुरूप पाला बदल लिया था। इस प्रक्रिया में उन्होंने सत्ता की खातिर अवसरवादिता की रेखा पर चलकर राजनीतिक आभा को नुकसान पहुंचाया और उन्हें अपने भाई, बेटे, भतीजे को बढ़ावा देने के लिए परिवार के स्वामित्व वाली राजनीतिक पार्टी को बढ़ावा देने के लिए भी गिना जा सकता है। 

बिहार के राम विलास पासवान, लल्लू यादव जैसे नेता राजनीति में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। भाई-भतीजावाद के अलावा, जब रामविलास पासवान मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए ओसामाबिन जैसे दिखने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ राजनीतिक रैली के लिए जाते थे, तो रामविलास पासवान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया गया था। उनके बेटे चिराग पासवान के वर्तमान राजनीतिक रुख को सत्ता के लिए सौदेबाजी की क्षमता बनाए रखने के लिए अपने पिता की लाइन पर चलते हुए माना जा रहा है।

इस तथ्य के बावजूद कि चिराग पासवान मोदी 3.0 कैबिनेट का हिस्सा हैं और जातिगत जनगणना, क्रीमी लेयर और अनुसूचित जाति के भीतर उप-जातियों के वर्गीकरण जैसे मुद्दों पर जनता के बीच उनका निहित और स्पष्ट रुख एक अलग लाइन पर चलने के उनके छिपे हुए एजेंडे के समान है। बिहार की राजनीति के लिए बौद्धिक  वर्ग को चिराग पासवान से काफी उम्मीदें थीं लेकिन वह खुद को बिहार के उन्हीं सामान्य राजनेताओं में से एक साबित कर रहे हैं। वह यह भूल रहे हैं कि बिहार राजनीति की प्रयोगशाला है और बिहार की आम जनता अपेक्षित राजनीतिक कौशल से सुसज्जित है और 2025 के राज्य चुनाव में लोग स्वेच्छा से साधारण राजनेताओं और सुशासन को खारिज कर देंगे।

चिराग पासवान, तेजस्वी यादव जैसे नेता अपने समुदाय के वंचितों की कीमत पर सत्ता का आनंद ले रहे हैं…. लेकिन कब तक???  मोदी 3.0 सरकार ने सामाजिक न्याय के लिए आम लोगों की आकांक्षाओं को तब निराश किया जब कैबिनेट ने शेड्यूल कास्ट में क्रीमी लेयर को परिभाषित करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों को लागू करने से इनकार कर दिया, जो आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं और वंचितों की कीमत पर अपना मोटापा बढ़ा रहे हैं। 

चिराग पासवान की पार्टी ने 5 लोकसभा सीटें जीतीं क्योंकि एनडीए वोट ने उनके उम्मीदवारों का समर्थन किया अन्यथा उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में अकेले ही अपनी ताकत का मूल्यांकन किया था जब उन्हें शून्य स्कोर मिला था।

अब यह बिहार के बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे सभी नेताओं को खारिज करने के लिए लोगों के बीच एक सही कहानी फैलाएं जो अपने समुदायों में वंचितों की कीमत पर राजनीतिक मामलों के शीर्ष पर हैं। मोदी 3.0 सरकार के पास बहुमत नहीं है और वह छोटी पार्टियों पर निर्भर है और अब मोदीजी के स्वयंभू हनुमान चिराग पासवान ने अधिक से अधिक सौदेबाजी करने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं।

सनातनियों को एकजुट रहने का मन्त्र और विपक्ष की बौखलाहट

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मृत्युंजय दीक्षित 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुखर होकर सनातन धर्म और हिंदुत्व की बात करते हैं और निरंतर  हिन्दू समाज को एकता और राष्ट्र प्रथम का सन्देश देते रहते हैं । बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हो रही वीभत्स हिंसा का सन्दर्भ लेते हुए उन्होंने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि ”हम बटेंगे तो कटेंगे“। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का सीधा सन्देश हिन्दू समाज को जातियों में बाँटने से रोकने और हिन्दुओं के लिए इसके कुप्रभावों के प्रति जागरुक करना था।

उत्तर प्रदेश में योगी जी के राज्य का मुखिया बनने के साथ ही सभी थानों में  श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा है जिसने इस पर्व को प्रदेश में एक नया उत्साह दिया है। स्वाभाविक रूप से सेक्यलुर यानि हिन्दू विरोधी शक्तियों को यह उल्लास अच्छा नहीं लगता है। इस बार श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर योगी जी ने आगरा – मथुरा में कई कार्यक्रमों में भाग लिया और जन समुदाय को संबोधित किया। इनमें सबसे अधिक चर्चा उनके आगरा में मारवाड़ शासक  महराजा जसवंत सिंह के सेनापति  दुर्गादास राठौर की प्रतिमा अनावरण समारोह को संबोधित करते हुए वक्तव्य की हो रही है। इस वक्तव्य में मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं  हो सकता, राष्ट्र तभी सशक्त हो सकता है जब हम एकजुट रहेंगे। उन्होंने कहा कि  बांग्लादेश में देख रहे हो न क्या हो रहा है? ऐसी गलती यहां नहीं होनी चाहिए, समाज जाति भाषा के नाम पर बांटने  वाली ताकतों से सावधान रहना होगा। मुख्यमंत्री ने  श्री कृष्णजन्माष्टमी बधाई देते हुए कहा, पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने धर्म पथ का अनुसरण करने को सत्य व न्याय का सन्देश दिया था। हम सभी लोकमंगल व राष्ट्रमंगल के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करें। ताकि हम सभी मिलकर विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान कर सकें।इधर कई अवसरों पर मुख्यमंत्री ने सनातन धर्म पर अपने विचार रख रहे हैं तथा स्पष्ट रूप से कहा है कि सनातन धर्म ही भारत का एकमात्र धर्म है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों से समावजादी मुखिया अखिलेश यादव और मुसलमानों के एकमात्र स्वयंभू नेता बनने के लिए लालायित एआईआईएएम के असदुद्दुदीन ओवैसी बौखला गए हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि योगी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। कम से कम उन्हें प्रधानमंत्री का रोल नहीं अदा करना चाहिए। यह वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने लोकसभा में चंद सीटें बढ़ते ही लखनऊ में अपने प्रधानमंत्री पद की चाहत वाले पोस्टर लगवा दिये गये थे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदू जनमानस से बिल्कुल सटीक व स्पष्ट बात कह रहे हैं क्योकि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जिस तरह से अत्याचार हुए उस पर दुनिया में किसी ने भी कहीं भी कोई भी आवाज नहीं उठायी। बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हिंदुओं पर लगातार आत्याचार होते आ रहे हैं  किंतु किसी भी मानवाधिकारी की कलम नहीं चली और जो अमेरिका भारत में होने वाली छोटी मोटी घटनाओं पर उपदेश देता रहता  उसके मन में कोई संवेदना नहीं जागी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बांग्लादेश की घटनाओं  पर कड़ी चिंता व्यक्त की तब कहीं जाकर कुछ सुस्ती टूटी है पर वह नाकाफी है तथा बांग्लादेश के दूरदराज के हिस्सों में अभी  भी हिन्दुओं पर उसी प्रकार से अत्याचार किया जा रहा है।

जिस तरह बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ बर्बरता की गई व पवित्र मंदिरों को ध्वस्त किया गया वह बहुत  ही हृदय विदारक था। किंतु इस भयावह मानवीय त्रासदी पर मोमबत्ती हाथ में लेकर एक भी वामपंथी जुलूस नहीं निकला। भारत के तथाकथित वामपंथी व इंडी गठबंधन के सभी नेता व विचारक फिलीस्तीन और  गाजा पर तो आंसू बहाते रहते हैं और सोशल मीडिया पर कैपेंन चलाते रहते हैं किंतु बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर मौन हो जाते हैं।

 इनकी सभी समीक्षाएं व चर्चायें  पूरी तरह से हिंदू विरोध पर ही केन्द्रित रहती हैं क्योकि संगठित हिंदू इनका वोटबैक नहीं है और आजकल ये कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में हिंदू समाज को टुकडों में टुकड़ो में विभाजित करने के लिए हर जगह हिन्दुओं की जाति खोज रहे हैं।
योगीजी के बयानों पर विपक्षी विचारकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में आगामी उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए वह इस प्रकार की बयान बाजी कर रहे हैं, यह तर्क पूरी तरह से असत्य है क्योंकि जब से योगी जी ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है उन्होंने अयोध्या, मथुरा और काशी को विकास कार्यों के केंद्र में रखा है और विभिन्न अवसरों पर सनातन धर्म पर विचार व्यक्त किये हैं। तथाकथित वामपंथी विचारक यह अर्नगल बात भी कह रहे हैं कि योगी जी के बयानों के कारण बांग्लादेश के साथ सम्बंध खराब हो सकते है। क्या ऐसे हिन्दू द्रोही वामपंथी समाजवादी  विचारों के कारण हम बांलादेश के हिंदुओं की चिंता करना बंद कर दें?

जिस तरह विपक्ष के बड़े नेता कह रहे हैं कि एक दिन भारत के हालात भी बांग्लादेश की तरह होने वाले हैं वह चिंताजनक है। विपक्ष की यह बयानबाजी वास्तव में  हिंदुओं के लिए चेतावनी है। यही कारण है कि योगी जी को हिन्दू समाज से कहना पड़ रहा रहे है कि “हम बटेंगे तो कटंगे“।

योगी जी के बयान की निंदा करने वाले वाही लोग हैं जो माफिया की मौत पर उनके घर पर शोक संवेदना व्यक्त करने जाते रहे हैं। असदुद्दुदीन जैसे लोग चाहते हैं वो संसद में फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लगाएं लेकिन भारत संबंधों की दुहाई के नाम पर बांग्लादेश के हिंदुओं को असहाय छोड़ दे।

सच तो यह है कि उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सनातन हिंदू धर्म के ध्वजवाहक बन कर उभर रहे हैं। भले ही राजनैतिक विश्लेषक मुख्यमंत्री के बयानों को मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की नीति कहें किन्तु वास्तविकता यही है कि योगी आदित्यनाथ सदा से ही सनातन की रक्षा के लिए तत्पर रहे हैं और सनातन की बात करना उनके लिए संकल्प है राजनीति नहीं ।

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