अग्निवीरों को विभिन्न सुरक्षा सेवाओं में आरक्षण, बंद नहीं होगी -अग्निपथ योजना

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अग्निपथ योजना पर विपक्ष फैला रहा अफवाह और रच रहा षड्यंत्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारगिल विजय के 25 वर्ष पूर्ण करने के अवसर पर द्रास क्षेत्र का दौरा किया। इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिया कि अग्निपथ योजना फिलहाल बंद नहीं होने जा रही है। इसी के साथ इस अवसर पर भाजपा शासित राज्यों ने अग्निवीरों को आरक्षरण की घोषणा करके विपक्ष के विरोध की धार को कुंद करने का प्रयास किया। लोकसभा चुनावों में अग्निपथ योजना को विपक्ष ने एक बड़ा मुद्दा बनाया था, भारतीय जनता पार्टी के 240 सीटों पर सिमट जाने पर अब विपक्ष अग्निपथ योजना पर अपने को सही सिद्ध मान रहा है और उसके नेता यत्र तत्र इंडी सरकार आने पर इस योजना को समाप्त करने की घोषणा कर रहे हैं । यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कारगिल विजय दिवस के अवसर पर अग्निपथ योजना की प्रमुखता से चर्चा की ।

अग्निपथ योजना का विरोध राजग गठबंधन में शामिल जनता दल (यूनाइटेड) ने भी किया है और इसमें संशोधन करने की मांग कर रखी है। स्मरणीय है कि इस योजना की घोषणा के बाद बिहार में ही सबसे अधिक उपद्रव हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के सभी आरोपों व उनके द्वारा फैलाए गए झूठे नैरेटिव को खारिज करते हुए कहा कि अग्निपथ का उद्देश्य सेनाओं को युद्ध के लिए तैयार रखना है। प्रधानमंत्री ने विपक्ष के उन दावों को भी खंडन किया कि पेंशन के पैसे बचाने के लिए अग्निपथ योजना प्रारम्भ की गई है। प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद भी विरोधी दल सत्य को अंगीकार करने को तैयार नहीं है। समाजवादी पार्टी के नये नवेले अति उत्साही सांसद अवधेश प्रसाद व अन्य दलों के नेताओ ने कहा कि जब इंडी गठबंधन की सरकार बनेगी तब अग्निपथ योजना को 24 घंटे में बंद कर दिया जायेगा।

उधर प्रधानमंत्री मोदी का वक्तव्य आने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी पुलिस और पीएसी में अग्निवीरों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, उत्तराखंड, गुजरात, हरियाणा, असम और अरुणांचल प्रदेश आदि राज्यों ने भी अग्निवीरों के लिए पुलिस भर्ती में 10 प्रतिशत आरक्षण देकर युवाओं को बेहद आकर्षक उपहार दिया है और उनके मन से यह डर दूर करने का प्रयास किया है कि सेना में चार साल की सेवा के बाद उनका क्या होगा। विपक्षी दल यही डर दिखाकर भ्रम फैलाते रहे हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहले ही केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षाबल की भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। मंत्रालय ने बीएसएफ और सीआईएसएफ में भी अग्निवीरों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने सहित ऊपरी आयु सीमा में पांच साल और अन्य बैचों के उम्मीदवारों के लिए तीन साल तक की छूट देने की महत्वपूर्ण घोषणा की है। अग्निपथ योजना में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं के लिए सरकार के पास अभी अन्य अवसर भी हैं जिनकी घोषणा समय आने पर की जाएगी।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 में भारतीय सेना में भर्ती के लिए अग्निपथ योजना लागू की थी जिसके अंतर्गत थल, जल और वायु सेना में 4 वर्ष के लिए युवाओं को भर्ती किया जाता है जिसमें छह महीने का प्रशिक्षण भी शामिल है। 4 वर्ष की सेवा के बाद अग्निवीरों की रेटिंग तैयार की जायेगी इसी रेटिंग लिस्ट को मानक मानकर 25 प्रतिशत अग्निवीरों को स्थायी नियुक्ति दी जायेगी। इस योजना के अंतर्गत 17.5 से 21 वर्ष तक के युवक और युवतियां अपना आवेदन कर सकते हैं।अग्निपथ योजना में भर्ती होने के लिए कक्षा 10 व 12वीं उत्तीर्ण होना अनिवार्य है।अग्निपथ योजना की अनेक विशेषताएं है। इस योजना में योग्यता व समानता के आधार पर ही भर्ती होगी। सेवा समाप्ति के बाद अग्निवीरों को उनके कौशल के अनुरूप स्किल प्रमाणपत्र दिया जायेगा जिसके आधार पर वह अपना व्यवसाय कर सकते हैं अथवा नौकरी करने जायेंगे तो उस कौशल के लिए प्रशिक्षित होंगे। सेवा के दौरान किसी प्रकार की अनहोनी होने की अवस्था में अग्निवीरों का बीमा भी किया जा रहा है।

विरोधी दल यह अफवाह भी फैला रहे हैं कि अग्निपथ योजना के अंतर्गत बलिदान होने वाले जवानों को पुरस्कृत नहीं किया जायेगा जबकि वास्तविकता यह है कि अग्निपथ योजना के अंतर्गत बलिदान होने वाले जवानों को भी पुरस्कार दिये जायेंगे। योजना के अंतर्गत अग्निवीरों का आरंभिक वेतन 30,000 रुपये प्रतिमाह है जो चौथे साल तक बढ़कर 40,000 तक हो जायेगा। सेवा समाप्ति के चार साल बाद सैनिकों को 10 से 12 लाख रुपये तक दिये जायेंगे जो पूरी तरह से टैक्स फ्री होंगे। विपक्ष यह आरोप भी लगा रहा है कि मात्र छह माह के प्रशिक्षण में ही अग्निवीर कैसे प्रशिक्षित हो सकेगा और देश की सीमाओं की सुरक्षा कर सकेगा, यह आरोप भी पूरी तरह से भ्रामक तथ्यों पर आधारित है।अग्निवीर भी अन्य सैनिकों की तरह ही प्रशिक्षित किया जायेगा ।

विपक्ष यह भी आरोप लगा रहा है कि सरकार ने यह योजना सेना के साथ बिना किसी विचार -विमर्ष के लागू कर दी है यह आरोप भी पूरी तरह से झूठ है। जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार के समय कारगिल युद्ध हुआ तभी सेना की औसत आयु कम करने की आवश्यकता अनुभव की गई थी और सेना के कमांडरों की बैठक में इस योजना पर व्यापक विचार विमर्ष हुआ था । वर्तमान रक्षा मंत्री ने इस विषय पर विभिन्न हितधारकों के साथ हुई लम्बी और तथ्य परक बैठकों के विषय में सदन में विस्तृत जानकारी दी है।अग्निवीर जैसी योजनाएं इजराइयल सहित कई देशों में लागू हैं।

आज भारत के समस्त विरोधी दल अग्निपथ योजना का विरोध सुनियोजित षड्यंत्र के अंतर्गत ही कर रहे हैं। इस योजना का विरोध वो लोग कर रहे हैं जिन्होंने कभी सेना व सैनिकों का साथ नहीं दिया है। वो लोग अग्निपथ योजना का उपहास उड़ा रहे हैं जो सेना एयरस्ट्राइक का सबूत मांगते हैं। यह वही लोग हैं जिन्होंने पूर्व दिवंगत थलसेना प्रमुख विपिन चन्द्र रावत को गली का गुंडा कहा था।यह वही लोग हैं जिनके कारण सेना के जवानों के पास बुलेटप्रूफ जैकेट व जूते तक नहीं होते थे किंतु अब जब हमारी सेना हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रही है तो इनके पेट में दर्द हो रहा है। वो लोग अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे हैं जिनके हाथ बड़े- बड़े रक्षा घोटालों से सने हुए हैं। वो लोग अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे हैं जिनको कारगिल विजय दिवस की उपलब्घि महत्वहीन लगती है। यह वही लोग हैं जिन्होंने 2004 से 2014 तक कारगिल विजय दिवस मनाया ही नहीं। वो लोग अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे हैं जिनके कार्यकाल में सीमा पर आतंकवाद का शिकार सैनिकों के क्षत विक्षत शवों पर कोई संवेदना तक व्यक्त नहीं की जाती थी। वास्तव में इन दलों को डर सता रहा है कि अगर यह योजना सफल हो गई तो बेरोजगारी का मुद्दा उनके हाथ से निकल जायेगा।अनुशासित युवा, सशक्त युवा और प्रशिक्षित युवा इन नेताओ के कहने से चक्का जाम करने नहीं आएगा।

अग्निपथ योजना भारत की सेना व भारत के युवा दोनों के लिए अतिमहत्वपूर्ण है। इससे एक ओर युवाओं के लिए नये अवसर खुल रहे हैं दूसरी ओर आतकंवाद के खतरनाक दौर में देश को अतिरिक्त सैनिक मिल रहे हैं। अग्निपथ योजना के विरुद्ध विपक्ष उसी प्रकार विरोध की मुहिम चला रहा है जिस प्रकार कोविड वैक्सीन के विरुद्ध चलाई थी। केंद्र व राज्य सरकारों ने अग्निवीरों को आरक्षण देकर एक बहुत बड़ा उपहार दिया है और यह भी बताने का प्रयास किया है कि वर्तमान सरकार अग्निवीरों के साथ खड़ी है और आगे भी खड़ी रहेगी।

मात्र मोदी विरोध के लिए अग्निपथ योजना का विरोध करने वाले विपक्ष को ये नहीं भूलना चाहिए कि संतानी भारतीय भारत की धरती को अपनी माँ से भी उच्च स्थान देते हुए इसे भारत माँ कहते हैं और भारत की सेना का हिस्सा बनना केवल एक नौकरी मात्र नहीं अपितु देश व समाज की सेवा करने का सशक्त माध्यम माना जाता है। सेना से सेवानिवृत्त हो जाने के बाद भी सैनिकों में मन में देश सेवा करने के लिए अप्रतिम स्थान होता है। सच तो यह है कि अग्निवीर योजना जैसे- जैसे आगे बढ़ेगी, अग्निवीर सामर्थ्यवान होकर घर लौटेंगे वैसे वैसे विपक्ष के झूठ धराशायी होता जाएगा।

28 जुलाई 1891 : सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और समाजसेवी ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन

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भारतीय शिक्षण परंपरा और नारी सम्मान का अद्भुत अभियान चलाया

उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा, संस्कृति, परंपरा और समाज के मानसिक दमन के अभियान का समय था । गुरुकुल नष्ट कर दिये गये थे, चर्च और वायबिल आधारित शिक्षा आरंभ करदी थी । ऐसे किसी ऐसे व्यक्तित्व की आवश्यकता थी । जो भारतीय समाज में आत्मविश्वास जगाकर अपने स्वत्व से जोड़ने का अभियान छेड़े। यही काम सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, समाजसेवी ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने किया ।

अंग्रेजों ने भारत की मूल संस्कृति, शिक्षा, समाज व्यवस्था और आर्थिक आत्मनिर्भरता को नष्ट करने में हीशअपनी सत्ता का सुरक्षित भविष्य समझा और इसकी तैयारी 1757 में प्लासी का युद्ध जीतने के साथ ही तैयारी आरंभ कर दी थी और 1773 के बाद चर्च ने भारत के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और मानसिक दमन के लिये बाकायदा सर्वे किया और 1806 में दिल्ली पर अधिकार करने के साथ तेजी से अमल करना भी आरंभ कर दिया था । यद्यपि कुछ सामाजिक और धार्मिक कार्यकर्ता समाज में जागरण का अभियान चला रहे थे पर फिर भी बदली परिस्थिति के अनुरूप सामंजस्य बिठाकर काम करने की आवश्यकता थी । इसी धारा पर सबसे प्रभावी कार्य किया था ईश्वरचंन्द्र विद्यासागर ने । उनका जन्म 26 सितम्बर 1820 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के अंतर्गत वीरसिंह गाँव में हुआ था । पिता का ठाकुरदास वन्द्योपाध्याय संस्कृत के अद्भुत विद्वान थे किंतु आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी । बचपन में संस्कृत शिक्षा उन्होने घर पर ही पिता से प्राप्त की । और फिर कलकत्ता के संस्कृत महाविद्यालय में प्रवेश लिया । वे बाल अवस्था से ही कलकत्ता में अपने भोजन का प्रबंध करके शिक्षा ले रहे थे । लेकिन हर कक्षा में प्रथम आते थे । अपनी शिक्षा पूरी कर 1841 मेंषफोर्ट विलियम महाविद्यालय में मुख्य पण्डित पद पर नियुक्ति मिल गई। वे अपने निर्धारित कार्य के लिये शास्त्रों के अध्ययन में भी रत रहते थे । यहीं उन्हें ‘विद्यासागर’ उपाधि से विभूषित किया गया । उन्हें यहाँ पचास रुपये मासिक मानदेय मिलता था । लेकिन वे अपने पास कुछ नहीं रखते थे । वे अपने निजी जीवन में बहुत मितव्यय थे । सारा पैसा निर्धन बच्चों की फीस और भोजन पर व्यय कर देते थे इससे लोग इन्हें ‘दानवीर विद्यासागर’ कहते थे । 1946 में इसी संस्थान में प्राचार्य पर पदोन्नत हुए । 1851 में काॅलेज में मुख्याध्यक्ष बने, 1855 में असिस्टेंट इंस्पेक्टर, और फिर स्पेशल इंस्पेक्टर नियुक्त हुए। 1858 में त्यागपत्र देकर साहित्य एवं समाजसेवा में लग गये ।

वे जानते थे कि अंग्रेजों के समानान्तर कार्य नहीं कर सकते । इसलिए उन्होंने सामंजस्य का मार्ग निकाला और श्री बेथ्यून की सहायता से एक कन्या शाला की स्थापना की फिर मेट्रोपोलिस काॅलेज की स्थापना की। साथ ही समाज से सहायता प्राप्त करके अन्य स्थानों पर भी विद्यालय आरंभ किये । संस्कृत अध्ययन की सुगम प्रणाली निर्मित की । इसके साथ ही समाज की विसंगतियों के सुधार का भी अभियान चलाया । इसमें विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा आदि थे । उन्होंने न केवल विधवा विवाह का सामाजिक वातावरण बनाना आरंभ किया अपितु अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा स्त्री से ही किया। इसके अतिरिक्त योजनाबद्ध तरीके से सनातन समाज में फैलाये जा रहे भेदभाव को मिटाकर सबको समान नागरिक सम्मान का भी अभियान चलाया । यद्यपि उनकी मात्र भाषा बँगला थी । उन्होंने बंगला में ही साहित्य रचना की पर वे चाहते थे कि प्रत्येक बंगाली को संस्कृत आनी चाहिए। वे कहते थे कि संस्कृत भारत की पहचान है । उन्होंने कुल 52 पुस्तकों की रचना की, इनमें 17 संस्कृत की, थी, पाँच अँग्रेजी में, और तीस पुस्तकों की रचना बँगला भाषा में की । इनमें ‘वैताल पंचविंशति’, ‘शकुंतला’ तथा ‘सीतावनवास’ बहुत प्रसिद्ध हुईं।

वे स्वदेशी भाषा, स्वदेशी दिनचर्या और स्वाभिमान के समर्थक थे । वे अपने निजी जीवन में सभी वस्तुएँ स्वदेशी ही प्रयोग करते थे । यहाँ तक कि कपड़े भी घर में बुने हुये पहनते थे । उन दिनों आजकल का बिहार और झारखंड भी बंगाल का अंग था । उन्होंने अपने काम का विस्तार किया और 1873 में जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में आ गये । यह क्षेत्र अब झारखण्ड में है । यहाँ आकर वे संथाल वनवासियों के बीच सक्रिय हो गये । उन दिनों इस क्षेत्र में चर्च और सरकार के अपने अपने दबाव थे । सरकार जहाँ वन संपदा पर अधिकार करके वनवासियों को भुखमरी की कगार पर ला दिया था तो चर्च उनकी सेवा सहायता करके मतान्तरण का अभियान चलाये हुये थे । ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जी ने इस क्षेत्र में किसी से बिना कोई टकराव लिये संथाल वनवासियों के कल्याण के काम आरंभ किये यहाँ उन्होंने अपना घर भी बनाया जिसका नाम ‘नन्दन कानन’ रखा । कहने के लिये यह उनका घर था । पर वास्तव में यह एक कन्या विद्यालय था । जीवन के अंतिम लगभग अठारह वर्ष उन्होंने इसी क्षेत्र में बिताये और निरन्तर समाज की सेवा करते हुये उन्होंने 28 जुलाई 1891 को संसार से विदा ली ।

उनकी मृत्यु पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था- “लोग आश्चर्य करते हैं कि ईश्वर ने चालीस लाख बंगालियों में कैसे एक मनुष्य को पैदा किया!” उनकी मृत्यु के कूछ दिनों बाद उनके परिवार ने इस “नन्दन कानन” को कोलकाता के एक व्यापारी को बेच दिया था किन्तु बिहार के बंगाली संघ ने घर-घर से एक एक रूपया एकत्र कर 29 मार्च 1974 को उसे खरीद लिया और पुनः बालिका विद्यालय और एक चिकित्सा केन्द्र प्रारम्भ किया । जिसका नामकरण विद्यासागर जी के नाम पर किया । यह चिकित्सा केन्द्र स्थानीय जनता की निशुल्क सेवा कर रहा है।

महाश्वेता देवी की नजर में ‘पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है’

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प्रभात सुमन

महान साहित्यकार की आज आठवीं पुण्यतिथि है, उन्हें याद करते हुए 1084वें की मां पुस्तक मंगाई है

उस दिन महाश्वेता देवी भंडरिया के एक गांव में थीं। उन्होंने एक महिला से पूछा, ‘आज का खाया है’। इस पर महिला का जवाब था, ‘गेंठी आऊ सरई खईले ही मईंया’। ये दोनों चीजें महाश्वेता देवी के लिए नई थीं। साथ में पलामू के वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वरम भी थे। वह अपनी ‘दीदी’ (महाश्वेता देवी) को बताते हैं, ‘ये जंगली कंद-मूल है। पौधों की जड़ी, इस महिला ने इसे उबाल कर खाया है।’ इस पर दीदी बोल पड़ती हैं, ‘इतनी गरीबी…दर्दनाक।’

आज महाश्वेता देवी की आठवीं पुण्यतिथि है। बांग्ला की इस महान लेखिका का पलामू से गहरा जुड़ाव था। यूं कहें कि पलामू उनका दूसरा घर था तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महुआमिलान, मैक्लुस्कीगंज होते हुए वह पलामू आईं और डालटनगंज के एक चौपाल में कहा, ‘पलामू स्वयं में भारत है, भारत का आईना है’। उनकी कही हुई यह बात वर्षों तक क्रांति कुटीर के सामने शिवाजी मैदान की दीवार पर लिखी हुई थी।

एक बार महाश्वेता देवी रामेश्वरम जी के यहां आई हैं। मैं तुरंत वहां पहुंच गया। ‘चचा हमरा महाश्वेता जी से मिलेला बा’ मेरे यह कहते ही वह तुरंत मुझे भीतर के कमरे में ले गए और महाश्वेता जी से कहा, ‘ये प्रभात सुमन हैं, छात्र नेता रहे हैं, अभी पत्रकार हैं।’ इसके बाद महाश्वेता जी ने थोड़ी देर बातें की और कहा, ‘जब मौका मिले तब पलामू पर लिखना।’ आज जब भी पलामू पर कुछ लिखता हूं तो महाश्वेता जी और रामेश्वरम जी बहुत याद याते हैं।

प्रो. सुभाष चंद्र मिश्रा टाउनहॉल के एक कार्यक्रम में थे। लोग मंच पर महाश्वेता देवी की तारीफ कर रहे थे। उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा था। जब प्रो. मिश्रा की बारी आई तो उन्होंने कहा, ‘मैं आपकी तारीफ नहीं कर रहा हूं। मैं आपके लेखन की तारीफ कर रहा हूं। आप साहित्य, सौम्यता और संघर्ष की संगम हैं। आपका लेखन समाज को नई दिशा दिखाता है, आपकी सौम्यता लोगों को आकर्षित करती है और आपका संघर्ष लोगों को जीने की प्रेरणा देता है।’

महाश्वेता देवी के साथ रामेश्वरम के बाद सबसे ज्यादा समय बिताने का मौका बलराम तिवारी जी को मिला है। पेशे से अधिवक्ता बलराम जी कहते हैं, ‘मैं कई गांवों नेऊरा, सेमरा, पनेरीबांध, भंडरिया व न जाने कितने और में दीदी के साथ रहा। वह टूटी-फूटी हिंदी बोलतीं थी। पलमूआ बोली भी समझ जाती थी। जहां नहीं समझ पातीं थी वहां रामेश्वरम जी को माने बताने के लिए कहतीं थी। एक बार एक वृद्ध महिला ने कहा-‘का कहूं दीदी उठे-बईठे में ना बनला, इसपर महाश्वेता ने कहा-लाठी रखा करो, उठने-बैठने में भी काम देगा और जानवर व लोगों को भगाने में भी काम देगा।’ बलराम जी के अनुसार, ‘दीदी, पलामू के लोगों को नई राह दिखा कर गई हैं। अगर वह कम समय के लिए पलामू आतीं तो रामेश्वरम जी शिवाजी मैदान में ही चौपाल लगा देते थे। इस चौपाल में मजदूर, ग्रामीण से लेकर बुद्धिजीवी वर्ग के लोग बड़ी संख्या में मौजूद रहते थे।’
रवींद्र त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने महाश्वेता देवी का साक्षात्कार तब लिया था जब वे जनसत्ता, दिल्ली में कार्यरत थे। त्रिपाठी जी बताते हैं, ‘महाश्वेता बेबाक और साफगोई से अपनी बात रखतीं थी। उन्होंने झांसी की रानी और भगवान बिरसा मुंडा को आधार बना कर कई रचनाएं लिखीं। इनमें महिला और आदिवासी समाज के संघर्ष की झलक साफ दिखती है। जब उन्हें पता चला कि मैं पलामू से हूं तो आत्मीयता और बढ़ गई। उन्होंने बंधुआ मुक्ति चौपाल से लेकर पलामू की कई घटनाओं का का जिक्र किया।’ रवींद्र त्रिपाठी जी ने इस महान लेखिका का इंटरव्यू दूरदर्शन के लिए भी लिया था।

एक बार डालटनगंज के टाउन हॉल में ‘जंगल के दावेदार’ नाटक का मंचन हो रहा था। यह महाश्वेता देवी की महान कृतियों में से एक है। इस नाटक का रुपांतरण और निर्देशन उपेंद्र मिश्र (वर्तमान में इप्टा के झारखंड महासचिव) ने किया था। उपेंद्र जी के शब्दों में, ‘महाश्वेता जी ने मिलने के बाद कहा कि अपनी कृति का नाट्य रुपांतरण विस्मित करने वाला है। मुझे नहीं लगता था कि इसका इस तरह से मंचन भी हो सकता है। नाटक देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं पूरी टीम को बधाई देती हूं।’
सैकत चटर्जी आज रंगमंच और फोटोग्राफी के चर्चित नाम हैं। उन्हें भी रामेश्वरम ने ही महाश्वेता देवी से यह कहते हुए मिलवाया था, ‘ई सैकत हव दीदी। फोटो खींच हव, नाटककार हव।’ सैकत कहते हैं, ‘इस मुलाकात में तो कुछ खास नहीं हुआ। किसी ने मेरे कैमरे से ही उनके साथ मेरी तस्वीर ली और मैं वहां से चला आया। अगले दिन मैं अपनी खींची तस्वीरें लेकर उनके पास पहुंचा। इन्हें देखकर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी वह मेरा उत्साह बढ़ाने वाली थीं। उन्होंने कहा था-तुम्हारे फोटो में तो पूरा पलामू दिखता है।’ सैकत ‘जंगल के दावेदार’ के मंचन के समय वहां मौजूद थे। वह कहते हैं, ‘महाश्वेता जी ने नाटक देखने के बाद कहा कि लिखे तो सोचा भी नहीं था कि पलामू के भाई लोग इसका मंचन करेंगे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि अन्याय हो रहा है, इसी पर बात की जानी चाहिए।’

शंभू चौरसिया पलामू के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह कहते हैं, ‘मैं पहली बार पनेरीबांध में आयोजित बंधुआ मुक्ति चौपाल के समय उनसे मिला था। मिलाने वाले रामेश्वरम जी ही थे। महाश्वेता जी मिलने के बाद लोगों का उत्साह बढ़ातीं थी। पलामू के प्रति उनका गहरा लगाव था जिसे यहां के लोग कभी नहीं भूल सकते हैं।’

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के ढाका (अब बांग्लादेश) में हुआ था। 28 जुलाई 2016 को उन्होंने कोलकाता में आखिरी सांस ली। आदिवासी, दलित, वंचित समुदाय के लिए जीवन भर लिखने वाली और संघर्ष करने वाली इस महान लेखिका को सादर नमन।

(सभी लोगों से बातचीत दो साल पहले हुई थी)

दिल्ली: दुर्घटना, जाम और अनाधिकृत पार्किंग

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आजकल इतनी ऊंची—ऊंची कारें बाजार में आ गई हैं कि उसमें बैठने वालों को जमीन का पता ही नहीं चलता। या फिर उसमें बैठने के बाद उनमें इंसान को इंसान समझने की सलाहियत नहीं बचती।

दोपहर में आज हल्की हल्की बुंदा बांदी हो रही थी। रास्ते में देखा, मजनू के टीले (दिल्ली) के पास एक बाइक सवार एक गाड़ी के नीचे आ गया था। दस बारह दूसरे बाइक सवार अपनी मोटर सायकिल सड़क के किनारे लगाकर उसे बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे। इतनी ऊंची गाड़ी थी कि उसका पैर गाड़ी में फंस गया था। इस दुर्घटना स्थल से चार सौ मीटर पहले एक और गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त अवस्था में पड़ी हुई थी।

निश्चित तौर पर इन दोनों गाड़ियों को जल्दी रही होगी। दुर्घटना के बाद वह सारी जल्दी हवा हुई होगी। उसके बाद पुलिस की शिकायत, सिर पर एक दुर्घटना का बोझ और जिसकी दुर्घटना हुई है, उसका तो उसका पूरा जीवन ही आगे बैसाखियों के सहारे कटेगा।

दिल्ली में जल्दी से जल्दी कोई भी व्यक्ति जाम से निकल जाना चाहता है और कई बार जाम इसलिए लगा होता है क्योंकि सड़क की एक पूरी कतार अनाधिकृत पार्किंग की भेंट चढ़ी होती है। सालों से मजनू टिले पर ऐसी पार्किग होती आ रही है। जो इस रास्ते पर जाम की वजह है। इसी तरह प्रगति मैदान को जो अंडरपास इंडिया गेट से जोड़ता है। इंडिया गेट वाले छोड़ पर निकलते ही वहां 500—700 मीटर लंबी अनाधिकृत पार्किग की कतार होती है। जिसकी वजह से लंबा जाम लगता है लेकिन दिल्ली के प्राइम लोकेशन पर भी ट्रेफिक पुलिसवाले देख बुझ कर भी मानों सब इग्नोर करते हैं।

एक तो दिल्ली में क्षमता से अधिक गाड़ियां बीक चुकी हैं। इसलिए पार्किंग को लेकर झगड़ा यहां आम बात है। एक अनुमान के अनुसार आधी से अधिक आबादी दिल्ली में ऐसी है, जिसने गाड़ी खरीद ली है लेकिन उसके पास पार्किंग नहीं है। गाड़ी बेचने वाले इंडिया में किसी कस्टमर से पूछते भी नहीं कि इतनी बड़ी गाड़ी खरीद रहे हो, इसे लगाने के लिए अपनी पार्किंग है या इसे सड़क के किनारे ही खड़ा करना है?

दिल्ली में जाम की समस्या तब तक नहीं सुलझेगी, जब तक अनाधिकृत पार्किंग पर लगाम नहीं लगती और बिना पार्किग स्पेस दिखलाए गाड़ी बेचने पर प्रतिबंध नहीं लगता।

जाम में फंसी गाड़ियां जिस बेतरतीब तरीके से एक दूसरे का रास्ता काटती हैं, कई बार लगता है कि इसके लिए इन गाड़ियों का अलग से चालान होना चाहिए।

जब तक दिल्ली में ट्रेफिक नियम में सख्ती नहीं बरती जाएगी। गाड़ियों की स्पीड पर लगाम नहीं लगेगी। ओवर स्पीड गाड़ियों में बैठे किसी बड़ी पैरवी वाले बंदे की पैरवी का दबाव काम करना बंद नहीं होगा, तब तक ये दुर्घटनाएं कैसे रूकेंगी, समझ नहीं आता।

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