क्या चिराग पासवान भी अपने पिता रामविलास पासवान की तरह मौसम वैज्ञानिक होने की तरफ बढ़ रहे हैं!

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एस. के. सिंह

रामविलास पासवान  को राजनीति का मौसम वैज्ञानिक भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने आने वाले दिनों में राजनीतिक सत्ता की संभावनाओं की भविष्यवाणी की थी और सत्ता का आनंद लेने के लिए उसी के अनुरूप पाला बदल लिया था। इस प्रक्रिया में उन्होंने सत्ता की खातिर अवसरवादिता की रेखा पर चलकर राजनीतिक आभा को नुकसान पहुंचाया और उन्हें अपने भाई, बेटे, भतीजे को बढ़ावा देने के लिए परिवार के स्वामित्व वाली राजनीतिक पार्टी को बढ़ावा देने के लिए भी गिना जा सकता है। 

बिहार के राम विलास पासवान, लल्लू यादव जैसे नेता राजनीति में भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हैं। भाई-भतीजावाद के अलावा, जब रामविलास पासवान मुस्लिम मतदाताओं को खुश करने के लिए ओसामाबिन जैसे दिखने वाले एक मुस्लिम व्यक्ति के साथ राजनीतिक रैली के लिए जाते थे, तो रामविलास पासवान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया गया था। उनके बेटे चिराग पासवान के वर्तमान राजनीतिक रुख को सत्ता के लिए सौदेबाजी की क्षमता बनाए रखने के लिए अपने पिता की लाइन पर चलते हुए माना जा रहा है।

इस तथ्य के बावजूद कि चिराग पासवान मोदी 3.0 कैबिनेट का हिस्सा हैं और जातिगत जनगणना, क्रीमी लेयर और अनुसूचित जाति के भीतर उप-जातियों के वर्गीकरण जैसे मुद्दों पर जनता के बीच उनका निहित और स्पष्ट रुख एक अलग लाइन पर चलने के उनके छिपे हुए एजेंडे के समान है। बिहार की राजनीति के लिए बौद्धिक  वर्ग को चिराग पासवान से काफी उम्मीदें थीं लेकिन वह खुद को बिहार के उन्हीं सामान्य राजनेताओं में से एक साबित कर रहे हैं। वह यह भूल रहे हैं कि बिहार राजनीति की प्रयोगशाला है और बिहार की आम जनता अपेक्षित राजनीतिक कौशल से सुसज्जित है और 2025 के राज्य चुनाव में लोग स्वेच्छा से साधारण राजनेताओं और सुशासन को खारिज कर देंगे।

चिराग पासवान, तेजस्वी यादव जैसे नेता अपने समुदाय के वंचितों की कीमत पर सत्ता का आनंद ले रहे हैं…. लेकिन कब तक???  मोदी 3.0 सरकार ने सामाजिक न्याय के लिए आम लोगों की आकांक्षाओं को तब निराश किया जब कैबिनेट ने शेड्यूल कास्ट में क्रीमी लेयर को परिभाषित करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सिफारिशों को लागू करने से इनकार कर दिया, जो आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं और वंचितों की कीमत पर अपना मोटापा बढ़ा रहे हैं। 

चिराग पासवान की पार्टी ने 5 लोकसभा सीटें जीतीं क्योंकि एनडीए वोट ने उनके उम्मीदवारों का समर्थन किया अन्यथा उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में अकेले ही अपनी ताकत का मूल्यांकन किया था जब उन्हें शून्य स्कोर मिला था।

अब यह बिहार के बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसे सभी नेताओं को खारिज करने के लिए लोगों के बीच एक सही कहानी फैलाएं जो अपने समुदायों में वंचितों की कीमत पर राजनीतिक मामलों के शीर्ष पर हैं। मोदी 3.0 सरकार के पास बहुमत नहीं है और वह छोटी पार्टियों पर निर्भर है और अब मोदीजी के स्वयंभू हनुमान चिराग पासवान ने अधिक से अधिक सौदेबाजी करने की चालें चलनी शुरू कर दी हैं।

सनातनियों को एकजुट रहने का मन्त्र और विपक्ष की बौखलाहट

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मृत्युंजय दीक्षित 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुखर होकर सनातन धर्म और हिंदुत्व की बात करते हैं और निरंतर  हिन्दू समाज को एकता और राष्ट्र प्रथम का सन्देश देते रहते हैं । बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हो रही वीभत्स हिंसा का सन्दर्भ लेते हुए उन्होंने अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा कि ”हम बटेंगे तो कटेंगे“। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का सीधा सन्देश हिन्दू समाज को जातियों में बाँटने से रोकने और हिन्दुओं के लिए इसके कुप्रभावों के प्रति जागरुक करना था।

उत्तर प्रदेश में योगी जी के राज्य का मुखिया बनने के साथ ही सभी थानों में  श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा है जिसने इस पर्व को प्रदेश में एक नया उत्साह दिया है। स्वाभाविक रूप से सेक्यलुर यानि हिन्दू विरोधी शक्तियों को यह उल्लास अच्छा नहीं लगता है। इस बार श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर योगी जी ने आगरा – मथुरा में कई कार्यक्रमों में भाग लिया और जन समुदाय को संबोधित किया। इनमें सबसे अधिक चर्चा उनके आगरा में मारवाड़ शासक  महराजा जसवंत सिंह के सेनापति  दुर्गादास राठौर की प्रतिमा अनावरण समारोह को संबोधित करते हुए वक्तव्य की हो रही है। इस वक्तव्य में मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि राष्ट्र से बढ़कर कुछ नहीं  हो सकता, राष्ट्र तभी सशक्त हो सकता है जब हम एकजुट रहेंगे। उन्होंने कहा कि  बांग्लादेश में देख रहे हो न क्या हो रहा है? ऐसी गलती यहां नहीं होनी चाहिए, समाज जाति भाषा के नाम पर बांटने  वाली ताकतों से सावधान रहना होगा। मुख्यमंत्री ने  श्री कृष्णजन्माष्टमी बधाई देते हुए कहा, पांच हजार वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने धर्म पथ का अनुसरण करने को सत्य व न्याय का सन्देश दिया था। हम सभी लोकमंगल व राष्ट्रमंगल के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से कार्य करें। ताकि हम सभी मिलकर विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान कर सकें।इधर कई अवसरों पर मुख्यमंत्री ने सनातन धर्म पर अपने विचार रख रहे हैं तथा स्पष्ट रूप से कहा है कि सनातन धर्म ही भारत का एकमात्र धर्म है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों से समावजादी मुखिया अखिलेश यादव और मुसलमानों के एकमात्र स्वयंभू नेता बनने के लिए लालायित एआईआईएएम के असदुद्दुदीन ओवैसी बौखला गए हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव ने कहा कि योगी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। कम से कम उन्हें प्रधानमंत्री का रोल नहीं अदा करना चाहिए। यह वही अखिलेश यादव हैं जिन्होंने लोकसभा में चंद सीटें बढ़ते ही लखनऊ में अपने प्रधानमंत्री पद की चाहत वाले पोस्टर लगवा दिये गये थे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदू जनमानस से बिल्कुल सटीक व स्पष्ट बात कह रहे हैं क्योकि बांग्लादेश में हिंदुओं पर जिस तरह से अत्याचार हुए उस पर दुनिया में किसी ने भी कहीं भी कोई भी आवाज नहीं उठायी। बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हिंदुओं पर लगातार आत्याचार होते आ रहे हैं  किंतु किसी भी मानवाधिकारी की कलम नहीं चली और जो अमेरिका भारत में होने वाली छोटी मोटी घटनाओं पर उपदेश देता रहता  उसके मन में कोई संवेदना नहीं जागी। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बांग्लादेश की घटनाओं  पर कड़ी चिंता व्यक्त की तब कहीं जाकर कुछ सुस्ती टूटी है पर वह नाकाफी है तथा बांग्लादेश के दूरदराज के हिस्सों में अभी  भी हिन्दुओं पर उसी प्रकार से अत्याचार किया जा रहा है।

जिस तरह बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ बर्बरता की गई व पवित्र मंदिरों को ध्वस्त किया गया वह बहुत  ही हृदय विदारक था। किंतु इस भयावह मानवीय त्रासदी पर मोमबत्ती हाथ में लेकर एक भी वामपंथी जुलूस नहीं निकला। भारत के तथाकथित वामपंथी व इंडी गठबंधन के सभी नेता व विचारक फिलीस्तीन और  गाजा पर तो आंसू बहाते रहते हैं और सोशल मीडिया पर कैपेंन चलाते रहते हैं किंतु बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर मौन हो जाते हैं।

 इनकी सभी समीक्षाएं व चर्चायें  पूरी तरह से हिंदू विरोध पर ही केन्द्रित रहती हैं क्योकि संगठित हिंदू इनका वोटबैक नहीं है और आजकल ये कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में हिंदू समाज को टुकडों में टुकड़ो में विभाजित करने के लिए हर जगह हिन्दुओं की जाति खोज रहे हैं।
योगीजी के बयानों पर विपक्षी विचारकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में आगामी उपचुनावों को ध्यान में रखते हुए वह इस प्रकार की बयान बाजी कर रहे हैं, यह तर्क पूरी तरह से असत्य है क्योंकि जब से योगी जी ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है उन्होंने अयोध्या, मथुरा और काशी को विकास कार्यों के केंद्र में रखा है और विभिन्न अवसरों पर सनातन धर्म पर विचार व्यक्त किये हैं। तथाकथित वामपंथी विचारक यह अर्नगल बात भी कह रहे हैं कि योगी जी के बयानों के कारण बांग्लादेश के साथ सम्बंध खराब हो सकते है। क्या ऐसे हिन्दू द्रोही वामपंथी समाजवादी  विचारों के कारण हम बांलादेश के हिंदुओं की चिंता करना बंद कर दें?

जिस तरह विपक्ष के बड़े नेता कह रहे हैं कि एक दिन भारत के हालात भी बांग्लादेश की तरह होने वाले हैं वह चिंताजनक है। विपक्ष की यह बयानबाजी वास्तव में  हिंदुओं के लिए चेतावनी है। यही कारण है कि योगी जी को हिन्दू समाज से कहना पड़ रहा रहे है कि “हम बटेंगे तो कटंगे“।

योगी जी के बयान की निंदा करने वाले वाही लोग हैं जो माफिया की मौत पर उनके घर पर शोक संवेदना व्यक्त करने जाते रहे हैं। असदुद्दुदीन जैसे लोग चाहते हैं वो संसद में फिलिस्तीन के समर्थन में नारे लगाएं लेकिन भारत संबंधों की दुहाई के नाम पर बांग्लादेश के हिंदुओं को असहाय छोड़ दे।

सच तो यह है कि उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सनातन हिंदू धर्म के ध्वजवाहक बन कर उभर रहे हैं। भले ही राजनैतिक विश्लेषक मुख्यमंत्री के बयानों को मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की नीति कहें किन्तु वास्तविकता यही है कि योगी आदित्यनाथ सदा से ही सनातन की रक्षा के लिए तत्पर रहे हैं और सनातन की बात करना उनके लिए संकल्प है राजनीति नहीं ।

भारतीय लोक कला की परम्परा एंव उसका समाजिक महत्व” विषय पर हुई संगोष्ठी

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बृजेश

दिनांक 27 अगस्त 2024: संस्कार भारती, दीन दयाल उपाध्याय मार्ग, स्थित दिल्ली के स्थापित्य कला केंद्र “कला संकुल” में प्रत्येक माह के अंतिम रविवार हो होने वाले मासिक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया, अगस्त माह में “भारतीय लोक कला की परम्परा एंव उसका समाजिक महत्व” विषय पर आयोजित संगोष्ठी एवं कथक प्रस्तुति प्रमुख आकर्षण रहे।

संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बतौर वरिष्ठ रंगकर्मी श्रीमान राज उपाध्याय ने उपस्थित दर्शको लोककला के महत्व पर अपने विचार रखते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि “भारत की लोक परम्पराओं में एक सहज अपनापन और सामूहिकता का संस्कार होता है और यही हमें समाजिक सद्भाव एवं पारिवारिक रूप से जोड़े रखता है। उन्होंने लोककलाओं की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए भावी पीढ़ी को लोककलाओं की परम्पराओं को आगे बढ़ाने की दिशा में जागरूक करने हेतु प्रोत्साहन की आवश्यकताओं पर बल दिया। विशेष रूप से शैक्षिक माध्यम द्वारा भारतीय लोककलाओं के संयोजन एवं संवर्धन पर जोर दिया। ”

इसके साथ ही नृत्य विधा से सुश्री तरुषी राजोरा ने कथक नृत्य को कजरी शैली की कुशलता से प्रस्तुत किया एवं द्वितीय प्रस्तुति के रूप में युगल जोड़ी डॉ. अमित कुमार राय के गायन पर श्रीमती अंशनू ने कथक नृत्य में कजरी के भाव से सबका परिचय कराया। दोनों कलाकारों की प्रस्तुति सराहनीय हेतु उन्हें मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया गया।

उल्लेखनीय है भारतीय लोककलाओं पर आधारित विषयों पर प्रत्येक माह के अंतिम रविवार पर होने वाले इस कार्यक्रम में कला साधको के साथ साथ कला प्रेमियों की विशेष उपस्थिति रहती है।

कार्यक्रम में कला संकुल व्यवस्था प्रभारी दिग्विजय पाण्डेय संगोष्ठी संयोजिका श्रुति सिन्हा, कार्यक्रम संचालिका गरिमा रानी सहित आँचल कुमारी, बृजेश, सुश्री नंदिनी, कुमारी, निधि तिवारी,सुश्री , शिवम सहित समस्त कला संकुल परिवार के सदस्यों की प्रयास सराहनीय रहा।

मुगल बादशाह औरंगजेब के इशारे पर भोजन में विष दिया गया था

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मिर्जा राजा जयसिंह की बहादुरी के प्रसंग भारत के हर कौने में है । अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक उन्होंने हर युद्ध जीता । पर ये लड़ाइयाँ उन्होंने अपने लिये नहीं मुगलों के लिये लड़ीं थीं। पर एक दिन ऐसा आया जब
मुगल बादशाह औरंगजेब की योजना से उन्हें जहर देकर मार डाला गया ।

मुगल बादशाह औरंगजेब अपनी क्रूरता के लिये ही नहीं कुटिलता के लिये भी जाना जाता है । वह अपने भाइयों की हत्या करके और पिता को जेल में डालकर गद्दी पर बैठा था । उसने अपनी एक पुत्री को जेल में डाला और एक पुत्र जान बचाकर भागा था । औरंगजेब द्वारा राजपूत राजाओं के साथ की गई कुटिलता की भी कई कहानियाँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। जोधपुर के राजा महाराज जसवंतसिंह की भी हत्या की गई थी । उन्हें युद्ध अभियान के लिये पहले काबुल भेजा गया और उनके शिविर में किसी अज्ञात ने उनकी हत्या कर दी थी । ठीक इसी प्रकार मिर्जा राजा जयसिंह की मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में विष देकर हत्या की गई।

राजा जयसिंह आमेर रियासत के शासक थे । उन्होंने केवल ग्यारह वर्ष की आयु में गद्दी संभाली‌‌ थी । वे 1621 से 1667 तक आमेर के शासक रहे । उनके पूर्वजों ने अपनी रियासत को विध्वंस से बचाने के लिये बादशाह अकबर के समय मुगल सल्तनत से समझौता कर लिया था । इस समझौते के तहत आमेर के राजा को मुगल दरबार में सेनापति पद मिला और आमेर की सेना ने हर सैन्य अभियान में मुगल सल्तनत का साथ दिया । मुगल दरबार में यह सेनापति पद आमेर के हर उत्तराधिकारी को रहा । इसी के अंतर्गत राजा जयसिंह जब मुगल सेनापति बने बने तब जहांगीर की बादशाहत थी । फिर शाहजहाँ की । और अंत में औरंगजेब के शासन काल में भी वे सेनापति रहे । उन्हें 1637 में शाहजहाँ ने “मिर्जा राजा” की उपाधि दी थी । राजा जयसिंह ने मुगलों की ओर से 1623 में अहमदनगर के शासक मालिक अम्बर के विरुद्ध’, 1625 में दलेल खां पठान के विरुद्ध, 1629 में उजबेगों के विरुद्ध, 1636 में बीजापुर और गोलकुंडा के विरुद्ध तथा 1937 में कंधार के सैन्य अभियान में भेजा और राजा जयसिंह सफल रहे । उन्होंने हर अभियान में मुगल सल्तनत की धाक जमाई । उनकी बहादुरी और लगातार सफलता के लिये अजमेर क्षेत्र इनाम में मिला और 1651 में तत्कालीन बादशाह शाहजहाँ ने अपने पौत्र सुलेमान की साँझेदारी में कंधार की सूबेदारी दी ।

इसके बाद 1651 ई. में शाहजहां ने इन्हें सदुल्ला खां के साथ में कंधार के युद्ध में नियुक्त किया ।

बादशाह जहांगीर और शाहजहाँ के कार्यकाल में तो सब ठीक रहा पर राजा जयसिंह औरंगजेब की आँख की किरकिरी पहले दिन से थे । इसका कारण 1658 में हुआ मुगल सल्तनत के उत्तराधिकार का युद्ध था । यह युद्ध शाहजहाँ के बेटों के बीच हुआ था । बादशाह शाहजहाँ के कहने पर राजा जयसिंह ने दारा शिकोह के समर्थन में युद्ध किया था । पहला युद्ध दारा शिकोह और शुजा के बीच बनारस के पास बहादुरपुर में हुआ हुआ था । इसमें जयसिंह की विजय हुई । इस विजय से प्रसन्न होकर बादशाह शाहजहाँ ने इनका मनसब छै हजार का कर दिया था ।

बादशाहत के लिये दूसरा युद्ध मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर 15 अप्रैल 1658 को हुआ। यह युद्ध दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच हुआ । इस युद्ध में भी राजा जयसिंह ने दारा शिकोह के पक्ष में युद्ध किया । लेकिन इस युद्ध में औरंगजेब का पलड़ा भारी रहा । मुगल सेना पीछे हटी और आगरा की सुरक्षा के लिये तगड़ी घेराबंदी की गई। बादशाह ने इस सुरक्षा कवच का नेतृत्व करने के लिये भी राजा जयसिंह को ही चुना । औरंगजेब ने एक रणनीति से काम किया । उसने सीधे आगरा पर धावा बोलने की बजाय अपनी एक सैन्य टुकड़ी को राजस्थान के उन हिस्सों में उत्पात मचाने भेज दिया जो राजा जयसिंह के अधिकार में थे । राजा जयसिंह के सामने एक विषम परिस्थिति बनी । आमेर के राजाओं ने अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिये ही तो मुगलों से समझौता किया था लेकिन अब संकट में आ गया था । औरंगजेब ऐसा करके राजा जयसिंह को समझौते के लिये तैयार करना चाहता था । राजा जयसिंह ने भी भविष्य की परिस्थिति का अनुमान लगाया और बातचीत के लिये तैयार हो गये । 25 जून 1658 को मथुरा में दोनों की भेंट हुई और राजा जयसिंह ने औरंगजेब को अपना समर्थन देने का वचन दे दिया । मार्च 1659 में देवराई के पास हुये निर्णायक युद्ध में राजा जयसिंह ने औरंगजेब की ओर दारा शिकोह के विरूद्ध अहरावल दस्ते का नेतृत्व किया ।

औरंगजेब ने सत्ता संभालने के बाद राजा जयसिंह को मनसब तो यथावत रखा पर पूर्ण विश्वास न कर सका । वह राजा जयसिंह को ऐसे युद्ध अभियानों पर भेजता जो कठिन होते । पर राजा सभी अभियानों में सफल रहे । औरंगजेब ने उन्हे दक्षिण में छत्रपति शिवाजी महाराज के विरुद्ध भी भेजा । औरंगजेब की ओर से शिवाजी महाराज के साथ पुरन्दर की संधि राजा जयसिंह ने ही की थी । और राजा पर विश्वास करके ही शिवाजी महाराज औरंगजेब से चर्चा के लिये आगरा आये थे । जहाँ बंदी बना लिये गये । शिवाजी महाराज को इस प्रकार बंदी बना लेने से राजा जयसिंह भी आश्चर्यचकित हुये और सावधान भी । औरंगजेब शिवाजी महाराज को विष देकर मारना चाहता था । लेकिन शिवाजी महाराज समय रहते सुरक्षित निकल गये । यह घटना अगस्त 1666 की है । शिवाजी महाराज के इस प्रकार सुरक्षित निकल जाने पर औरंगजेब को राजा जयसिंह पर संदेह हुआ । बादशाह को लगा कि इसमें राजा जयसिंह का हाथ हो सकता है । चूँकि शिवाजी महाराज की निगरानी में राजा जयसिंह का भी एक सैन्य दस्ता लगा था । इसलिए बादशाह को राजा जयसिंह पर गहरा संदेह होना स्वाभाविक भी था । पर बादशाह ने सीधे और तुरन्त कार्रवाई करने की बजाय मामले टालने का निर्णय लिया ।

अंततः जून 1667 में राजा जयसिंह को दक्षिण के अभियान पर भेजा गया । बरसात के चलते राजा बुरहानपुर में रुके थे । मुगल सेना की प्रत्येक सैन्य टुकड़ी में भोजन बनाने वाली खानसामा टीम सीधे बादशाह के आधीन सामंतों के नियंत्रण में होती थी । इस अभियान में भी यही व्यवस्था थी । 28 अगस्त 1667 को भोजन में विष देकर राजा जयसिंह की हत्या कर दी गई । बुरहानपुर में राजा जय सिंह की 38 खम्बों की छतरी बनी है जो राजा जयसिंह के पुत्र राम सिंह ने अपने पिता की स्मृति में बनबाई थी ।

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