छत्तीसगढ़ की चार प्रमुख रेल परियोजना जल्द होगी शुरू

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रेल मंत्री ने परियोजनाओं पर तेजी से कार्य का दिया आश्वासन

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने केंद्रीय रेल मंत्री से रेल परियोजनाओं पर चर्चा

नई दिल्ली, 17 जुलाई 2024- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने आज नई दिल्ली में रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव से मुलाकात कर राज्य की विभिन्न नई रेल परियोजनाओं पर चर्चा की। रेल भवन में हुई बैठक में मुख्यमंत्री श्री साय ने राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए रेल नेटवर्क के विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया।

इस दौरान उन्होंने राज्य की चार प्रमुख रेल परियोजना धर्मजयगढ़-पत्थलगांव, लोहरदगा नई लाइन परियोजना, अंबिकापुर-बरवाडीह नई लाइन परियोजना, खरसिया-नया रायपुर-परमलकसा नई रेल लाइन परियोजना और रावघाट-जगदलपुर नई रेल लाइन परियोजना के जल्द शुरू करने का आग्रह किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री के साथ उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा भी उपस्थित रहे।

धर्मजयगढ़-पत्थलगांव-लोहरदगा नई लाइन परियोजना (240 किमी):
मुख्यमंत्री श्री साय ने बताया कि यह परियोजना क्षेत्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। यह पत्थलगाँव, कुनकुरी, जशपुर नगर, गुमला आदि महत्वपूर्ण शहरों को जोड़ती है। यह उत्तरी छत्तीसगढ़ क्षेत्र को झारखंड से जोड़ेगी और कोरबा-धर्मजयगढ़ परियोजना के कार्य प्रगति पर है। इस परियोजना के माध्यम से औद्योगिक (कोरबा) क्षेत्र को लोहरदगा से जोड़ने की योजना है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र को पूर्व में कोरबा और रांची के होकर मध्य भारत से जोड़ेगी। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 16,000 करोड़ रुपये है।

अंबिकापुर-बरवाडीह नई लाइन परियोजना (200 किमी):
इस परियोजना की मांग आजादी से पहले 1925 में की गई थी। हालांकि, 1948 में मंजूरी मिलने के बावजूद यह परियोजना अब तक अधूरी रही। मुख्यमंत्री ने बताया कि यह परियोजना अंबिकापुर (उत्तरी छत्तीसगढ़) को बरवाडीह (झारखंड) से जोड़ेगी और परसा, राजपुर, चंदनपुर आदि महत्वपूर्ण शहरों को कनेक्ट करेगी। इस परियोजना के माध्यम से देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्से में कोयला और अन्य खनिजों के परिवहन के लिए वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होगा। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 9000 करोड़ रुपये है।

खरसिया-नया रायपुर-परमलकसा नई रेल लाइन परियोजना (277 किमी):
मुख्यमंत्री ने बताया कि यह परियोजना देश के पश्चिमी क्षेत्र में कोयला क्षेत्र, एसईसीएल और एमसीएल कोयला क्षेत्रों की निकासी के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है। यह बिलासपुर और रायपुर स्टेशनों को बायपास करते हुए बलौदाबाजार के समेत समृद्ध क्षेत्र को कनेक्टिविटी प्रदान करेगी। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 8000 करोड़ रुपये है।

रावघाट-जगदलपुर नई रेल लाइन परियोजना (140 किमी):
रेलवे पहले से ही दल्ली-राजहरा-रावघाट 95 किमी नई रेलवे लाइन का निर्माण कर रही है। मुख्यमंत्री साय ने सुझाव दिया कि इस लाइन को जगदलपुर तक बढ़ाया जाए, ताकि आदिवासी क्षेत्र का आर्थिक और सामाजिक विकास किया जा सके। यह परियोजना छत्तीसगढ़ के खनिज समृद्ध क्षेत्र से इस्पात उद्योगों तक लौह अयस्क की निकासी के कुशल और पर्यावरण अनुकूल साधन प्रदान करेगी। परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 3500 करोड़ रुपये है।

बैठक के दौरान केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इन परियोजनाओं की संभावनाओं और लाभों को स्वीकार किया और इन पर तेजी से काम करने का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि ये परियोजनाएँ राज्य के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं और रेलवे मंत्रालय इन्हें प्राथमिकता देगा।

विश्व हिंदी साहित्य परिषद के कार्यालय में मित्रो बैठकबाजी

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आशीष कंधवे

बैठक की शुरुआत सामान्य अभिवादन और पुराने किस्सों से हुई। जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, विभिन्न विषयों पर चर्चा होने लगी

नई दिल्ली/रविवार/ 14 जुलाई 2024 : लगभग एक से डेढ़ वर्ष के बाद के बाद, विश्व हिंदी साहित्य परिषद के कार्यालय में पुराने मित्रों की एक लंबी बैठकबाजी चली। विश्व हिंदी साहित्य परिषद का कार्यालय अर्थात मेरा निजी कार्यालय साहित्यिक बैठकों के लिए हमेशा चर्चा में रहता है। इसी परंपरा को बचाए रखने के लिए आज परिषद के कार्यालय में अमेरिका से आए सुप्रसिद्ध समाजसेवी हिंदी से भी उद्योगपति इंद्रजीत शर्मा, विख्यात हास्य कवि शंभू शिखर, हंसराज महाविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ विजय मिश्रा, और सुप्रसिद्ध राष्ट्रवादी पत्रकार एवं चिंतक आशीष “अंशु” उपस्थित थे। इस बैठक में मैं आशीष कंधवे, भी शामिल था।

बैठक की शुरुआत सामान्य अभिवादन और पुराने किस्सों से हुई। जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, विभिन्न विषयों पर चर्चा होने लगी। देश की वर्तमान राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक स्थिति पर गंभीर चर्चाएं हुईं। इन चर्चाओं ने बैठक को गहनता और गंभीरता प्रदान की।

डॉ विजय मिश्रा, जो मेरे छोटे भाई जैसे हैं, ने शैक्षणिक स्थितियों पर अपने विचार से अपनी बात शुरू की और बातों के प्रवाह में अनेक विषयों पर टिप्पणी करते हुए समोसे पर आकर रुक गए। इंद्रजीत शर्मा ने अमेरिका में भारतीय साहित्य के प्रचार-प्रसार पर अपने अनुभव साझा साझा करते हुए हाल ही में संपन्न कवि सम्मेलन पर चर्चा की। भाई आशीष अंशु ने राष्ट्रवाद और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी जानकारी और अनुभवों का आदान-प्रदान करते हुए सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति का सटीक विश्लेषण किया। हम कह सकते हैं कि सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोण से वर्तमान स्थिति पर विचार व्यक्त किए।

इस दौरान, छोले-भटूरे, समोसे, लड्डू और चाय की मेजबानी ने चर्चा को और भी रोचक बना दिया। इन स्वादिष्ट व्यंजनों ने माहौल को और भी जीवंत और चटपटा बना दिया।

जैसे-जैसे चर्चा अपने चरम पर पहुंची, गंभीरता का आवरण हटाने का समय आ गया। विख्यात हास्य कवि और मेरे प्रिय भाई शंभू शिखर ने अपनी हास्य कविताओं और चुटकुलों से माहौल को हल्का और हंसी-खुशी से भर दिया। उनकी कविताएं और चुटकुले सभी को हंसी-मजाक और आनंद की ओर ले गए, जिससे सभी तनाव और गंभीरता कुछ देर के लिए छूमंतर हो गए।

बैठक का अंत सभी मित्रों के हृदय में गर्मजोशी और एकता की भावना के साथ हुआ। इस प्रकार की बैठकों से न केवल मित्रता और भाईचारे की भावना प्रबल होती है, बल्कि साहित्य, संस्कृति, और समाज के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श का भी अवसर मिलता है।

कुल मिलाकर, यह बैठक एक सफल और आनंदमयी अनुभव रही। सभी मित्रों के साथ बिताए गए ये पल हमेशा स्मरणीय रहेंगे, और भविष्य में भी इस प्रकार की और भी सार्थक चर्चाओं की आशा है।

यह और बात है कि इस चर्चा पर चर्चा के समापन के 10 मिनट के बाद देश के सुप्रसिद्ध गज़लकार भाई सुशील ठाकुर भी कार्यालय में पहुंचे । हंसी ठाकुर का एक और दूर चला परंतु समय की बाध्यता के कारण उनकी गजलों का आनंद आज हम नहीं ले पाए।

देखिए अपना कब ऐसे बैठक का अवसर मिलता है तब तक के लिए सभी मित्रों का आभार नमस्कार।

क्या बिहार के ‘यादव’ तेजस्वी को ‘यादव’ मानने को तैयार नहीं

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जिस तरह बिहार का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के सारे समीकरण असफल हो रहे हैं और पार्टी का हिन्दू विरोधी एजेन्डा एक्सपोज हुआ है। उसके बाद से तेजप्रताप यादव को लेकर पार्टी को एक बार गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि तेजस्वी को दबी जुबान में यादव समाज के अंदर ही, समाज से बाहर जाकर शादी करने के लिए ‘हाफ यादव’ कहा जाने लगा है।

लालू यादव जब मुख्यमंत्री हुआ करते थे, राष्ट्रीय जनता दल में तेजप्रताप यादव के मामाओं का जलवा चलता था। अब हो सकता है कि बड़े भाई तेजप्रताप यादव की जगह तेजस्वी बड़े नेता बन गए हों लेकिन अभी भी वे पूरे बिहार के यादवों के नेता नहीं बन पाएं हैं।

यह तेज प्रताप यादव के सगे मामा साधु यादव का बयान है कि ”तेजस्वी यादव ने पूरे बिहार का नहीं पूरे यादव कुल को ही कलंकित कर दिया है। तेजस्वी यादव को हक नहीं है कि वह बिहार के 13 करोड़ जनता का नेता बने।
यह सब सगे मामा क्यों कह रहे थे, इसलिए क्योंकि उन्हें यह बात पसंद नहीं आई कि उनका भांजा तेजस्वी ईसाई परिवार में शादी करे।

ईसाई परिवार में शादी करने के बाद तेजस्वी यादव बिहार के यादवों से दूर हुए हैं। उनकी पार्टी में ऐसे नेताओं को प्रोत्साहन मिलना शुरू हुआ है जो हिन्दू धर्म के अपमान की बात करें। रामचरितमानस को लेकर पार्टी के परिष्ठ नेताओं ने अनर्गल बयान दिए हैं।

इस संयोग पर भी बिहार में चर्चा हो रही है कि ईसाई पत्नी आने के बाद राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा परिवार के साथ तेजस्वी की नजदीकी बढ़ी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के साथ उनकी नजदीकी भी खबरों में रही। उन्होंने तमिलनाडु से रिश्ता खराब करने के षडयंत्र का हवाला देकर यू ट्यूबर मनीष कश्यप की गिरफ्तारी तक करा दी। जबकि तेजस्वी खुद गुजरात के लिए अनाप शनाप बोलते रहते हैं। उन्होंने पेरियार इरोड वेंकटप्पा रामासामी (Periyar Erode Venkatappa Ramasamy) के संबंध में जब टवीट किया तो साफ हो गया कि उन्हें नियंत्रण कहीं और से किया जा रहा है। लालू प्रसाद यादव की राजनीति में कम से कम हिन्दू समाज के लिए घृणा नहीं थी। राहुल और तेजस्वी दोनों की राजनीति में यह साफ दिखता है।

राहुल गांधी के दादा पारसी थे और मां क्रिश्चियन हैं। राहुल गांधी खुद के ब्राम्हण होने का दावा करते हैं। ब्राम्हण उनके पिताजी के नाना थे। जिनका सरनेम नेहरू हुआ करता था। महात्मा गांधी की जाति के संबंध में बताया जाता है कि वे वैश्य जाति से आते थेे। गांधीजी के अपने चार बेटे थे, हीरालाल गांधी, मणिलाल गांधी, रामदास गांधी, देवदास गांधी। इनमें से कोई दत्तात्रेय गोत्र का ब्राम्हण नहीं है।

राहुल गांधी, एमके स्टालिन और तेजस्वी यादव के बीच बेहतर हुए रिश्ते के पिछे इनका चर्च कनेक्शन बताया जाता है।

आरोप यह भी है कि तेजस्वी जब बिहार में जदयू के साथ सत्ता में आए, प्रदेश के अंदर कन्वर्जन गैंग सक्रिय हो गया था।

बिहार तेजस्वी यादव पर यादव समाज का संदेह बढ़ रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में तेजप्रताप यादव बिहार में राजद की गद्दी संभाल लें तो बड़े आश्चर्य की बात नहीं मानी जानी चाहिए। वैसे भी उन्होंने अपने व्यवहार से बिहारियों का दिल जीत कर रखा है।

उत्तर प्रदेश की सरकार थोड़ा ध्यान दे!

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उत्तर प्रदेश चुनाव को यदि केस स्टडी माने तो उसका अलग अलग विश्लेषण हुआ है। लेकिन एक पक्ष अभी भी अनकहा है। उस पर कुछ लिखा नहीं गया और कहा नहीं गया

आज दिल्ली में एक महत्वपूर्ण चर्चा का हिस्सा था। उसमें जिन मुद्दों पर चिंता व्यक्त की गई। उनमें कोई मुद्ददा ऐसा नहीं था, जो पहले से हम सबकी चिंताओं में शामिल ना हो। हां! उन विषयों पर पहले से अधिक स्पष्ट राय बनी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक मित्र पिछले तीन—चार सालों से बार—बार फोन करके खतरे का एहसास करा रहे थे। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ बड़ा षडयंत्र हो रहा है। ऐसा कहा करते थे, आप लोग कुछ कर क्यों नहीं रहे? उन्हें हर बार समझाना पड़ता था कि भाई आपने हमारी क्षमता से अधिक की अपेक्षा हमसे कर रखी है?

वे बताते थे कि किस तरह पूरब के जिलों में अम्बेडकरवादियों, तबलिगियों और वामपंथियों का गांव और कस्बों में जाना आना बढ़ गया है। उनका व्यवसाय ऐसा था कि एक जिले से दूसरे जिले की लगातार उन्हें यात्रा करनी पड़ती थी। उन्हें तब आश्चर्य हुआ जब उनके अपने गांव के पड़ोस में एक दिन प्रकाश अम्बेडकर भाषण देते हुए उन्हें दिखाई दिए।

उत्तर प्रदेश चुनाव को यदि केस स्टडी माने तो उसका अलग अलग विश्लेषण हुआ है। लेकिन एक पक्ष अभी भी अनकहा है। उस पर कुछ लिखा नहीं गया और कहा नहीं गया। उत्तर प्रदेश में बीते कुछ सालों में philanthropy का पैसा इतना क्यों आने लगा? यह किनके पास गया? उप्र सरकार ने इन बातों का ध्यान रखा क्या?

उप्र सरकार कई सरकारी नीतियों को बनाने के लिए वामपंथी संस्थाओं की मदद ले रही है। सरकार के साथ काम करने के नाम पर पूरे उत्तर प्रदेश में अपना नेटवर्क उन्होंने आसानी से खड़ा कर लिया है। उन्होंने सरकार के काम के नाम पर अपना पैसा खर्च किया और सरकार का काम कम और उसके लिए गढ्ढा खोदने का काम अधिक किया।

सरकार के साथ काम करने वाली संस्थाएं वे हैं जो सामने से काम कर रहीं हैं। जिनके संबंध में अब भी देरी नहीं हुई। उनकी पहचान करके उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है।

जानकारी यह भी मिली कि कई एनजीओ कंपनी बनकर विदेशों से वर्क आर्डर के नाम पर पैसे ले रहीं थीं। पैसा कंपनी के अकाउंट में आ गया। उन्होंने इसे मनमर्जी तरीके से खर्च किया।

आरएसएस और बीजेपी विरोधी संस्थाएं उत्तर प्रदेश में सरकार के साथ मिलकर काम कर रहीं हैं। उनके कार्यकर्ता पूरे प्रदेश मेें फैले हुए हैं। कहने के लिए तो वे सामाजिक कार्य में लगे हैं लेकिन सामाजिक काम उनका पार्ट टाइम था। पूरा दिन उनका उप्र प्रदेश सरकार की विदाई के प्रयास में निकलता है। लोकसभा में कामयाब होने के बाद उनके हौसले बुलंद हैं। उन संस्थाओं की अब पहचान की जानी चाहिए और उनकी भूमिका पर एक बार केन्द्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों को विचार करना चाहिए।

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