होम डिलीवरी सर्विसेज और ऑनलाइन मार्केट्स: एक नई क्रांति

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दिल्ली। ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं का तेज़ी से बढ़ता चलन आज के डिजिटल युग की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। दर्जनों प्लेटफॉर्म और ऐप-आधारित सेवाओं ने बाज़ार को लोकतांत्रिक बना दिया है, जिससे उत्पादक सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँच पा रहे हैं। यह बदलाव निश्चित रूप से पारंपरिक बाज़ारों की रौनक को कम कर सकता है, लेकिन इसके कई सकारात्मक पहलू भी हैं।

सीनियर सिटीजन पद्मिनी अय्यर कहती हैं, ” साग सब्जी, फल, दूध बगैरा लेने भीड़ भरे बेलनगंज मार्केट में जाती थी, कई बार रिक्शा नहीं मिलता था, पैदल सामान लाते टाइम बंदर हमला कर देते थे, अब इतना आराम हो गया, सेम रेट, पूरा वजन, अच्छी क्वालिटी सिर्फ दस पंद्रह मिनिटों में घर बैठे मिल रहा है, कई बार ब्लिंकिट की सर्विस इतनी फास्ट होती है, कि लगता है बंदा बाहर गेट पर ही बैठा है क्या।”

होम मेकर्स अब घर के सदस्यों पर निर्भर नहीं हैं। चुटकियों में फ्रेश, ब्रांडेड प्रोडक्ट्स होम सप्लाई हो रहे हैं। बिग बास्केट के युवा डिलीवरी पार्टनर रोहित ने बताया कि हर महीने २५ से ३० हजार कमा लेता है। हमारे गुप्ताजी कहते हैं कि एक गया, दूसरा आया हमारे अपार्टमेंट complex में। कभी फ्लिपकार्ट, कभी अमेजन, या फिर ब्लिंकिट या जोमैटो वाला रात बारह बजे तक यही क्रम चलता है। “एक रोज देर शाम दिल्ली से लौटा था, मूड बन रहा था मगर केमिस्ट की दुकान से खरीदना भूल गया, थोड़ा मायूस हुआ पर पत्नी जी ने ब्लिंकिट से मंगाने का सुझाव दिया, काम बन गया,” भटनागर जी ने बताया।

सबसे महत्वपूर्ण लाभों में से एक है ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और समय की बर्बादी में कमी। लोग अब घर बैठे ही अपनी ज़रूरत की चीज़ें मंगवा सकते हैं, जिससे सड़कों पर वाहनों का दबाव कम होता है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र कम पढ़े-लिखे युवाओं और लड़कियों के लिए अतिरिक्त आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है, जो डिलीवरी पार्टनर के रूप में पार्ट-टाइम काम करके अपनी जीविका चला रहे हैं।

नवीनतम रुझानों की बात करें, तो अब डिलीवरी सेवाएं केवल भोजन और किराने के सामान तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दवाइयाँ, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आवश्यक वस्तुएं भी ऑनलाइन उपलब्ध हैं। ड्रोन डिलीवरी और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग जैसी तकनीकें इस क्षेत्र को और अधिक कुशल और पर्यावरण के अनुकूल बना रही हैं। आने वाले समय में, हम इस क्षेत्र में और भी नवाचार और विकास देखने की उम्मीद कर सकते हैं।

भारत में होम डिलीवरी सर्विसेज और ऑनलाइन मार्केट्स ने पिछले एक दशक में उपभोक्ता व्यवहार और अर्थव्यवस्था को नया आकार दिया है। अमेजन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकिट, और इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म्स ने सब्जी, फल, दूध से लेकर सेक्स टॉयज और कंडोम तक, लगभग हर चीज को घर तक पहुंचा दिया है। शराब को छोड़कर, शायद ही कोई उत्पाद बचा हो जो ऑनलाइन उपलब्ध न हो। यह नई व्यवस्था सुविधा और गति का प्रतीक बन चुकी है, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक किराना दुकानों, कॉर्नर शॉप्स, और मंडी सिस्टम पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

होम डिलीवरी सर्विसेज का सबसे बड़ा लाभ है सुविधा। उपभोक्ता 24/7, कहीं से भी खरीदारी कर सकते हैं, जो व्यस्त जीवनशैली वालों के लिए वरदान है। विशेष रूप से सीनियर सिटीजन्स को घर बैठे आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी से बहुत राहत मिली है। ई-कॉमर्स की बदौलत उत्पादों की व्यापक रेंज उपलब्ध है, जो पारंपरिक दुकानों में संभव नहीं।

आर्थिक दृष्टिकोण से, इन सेवाओं ने गिग इकॉनमी को बढ़ावा दिया है। भारत में लगभग 10-12 करोड़ गिग वर्कर्स हैं, जो फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स, और लॉजिस्टिक्स से जुड़े हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक गिग वर्कर्स कुल श्रम बल का 4.1% (लगभग 23.5 करोड़) होंगे। ये प्लेटफॉर्म्स डेटा एनालिटिक्स का उपयोग कर उपभोक्ता व्यवहार को समझते हैं, जिससे बेहतर मार्केटिंग और मूल्य निर्धारण संभव होता है। जीएसटी संग्रह भी ऑल-टाइम हाई पर है, क्योंकि ऑनलाइन लेनदेन पारदर्शी हैं, जो सरकार के लिए फायदेमंद है।नुकसान: पारंपरिक बाजारों पर संकट और सामाजिक प्रभाव

हालांकि, यह व्यवस्था पारंपरिक किराना दुकानों और मंडी सिस्टम को ध्वस्त कर रही है। एक सर्वे के अनुसार, 46% शहरी उपभोक्ताओं ने किराना दुकानों से खरीदारी कम कर दी है, जिससे छोटे व्यापारियों को नुकसान और कर्मचारियों की छंटनी हुई है। मंडियों में भी किसानों को कम कीमत मिल रही है, क्योंकि बड़े प्लेटफॉर्म्स सीधे उत्पादकों से सौदा करते हैं। गिग वर्कर्स को भी चुनौतियां हैं—कम वेतन, सामाजिक सुरक्षा की कमी, और अनिश्चित कार्य घंटे।

सामाजिक स्तर पर, नौजवानों में आलस्य की शिकायत बढ़ रही है। त्वरित डिलीवरी की आदत ने लोगों को बाहर जाने और सामुदायिक संपर्क से दूर किया है। इसके अलावा, लुभावनी स्कीम्स जैसे भारी डिस्काउंट और कैशबैक उपभोक्ताओं को अनावश्यक खरीदारी के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे वित्तीय अनुशासन प्रभावित होता है।आर्थिक प्रभाव और रोजगार सृजन

ई-कॉमर्स सेक्टर ने भारत में 2024 में लगभग 15 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित किए। गिग वर्कर्स के अलावा, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, और टेक्नोलॉजी सेक्टर में भी नौकरियां बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, अमेजन और फ्लिपकार्ट ने लाखों MSMEs को अपने प्लेटफॉर्म्स से जोड़ा, जिससे छोटे व्यवसायों को वैश्विक पहुंच मिली। हालांकि, पारंपरिक रिटेल में रोजगार हानि इसकी एक कड़वी सच्चाई है।लॉन्ग रन प्रभाव और भविष्य का परिदृश्य

लंबे समय में, यह व्यवस्था उपभोक्ता-केंद्रित अर्थव्यवस्था को और मजबूत करेगी, लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी। सरकार का रुख सकारात्मक है, क्योंकि जीएसटी और डिजिटल लेनदेन से राजस्व बढ़ रहा है। हालांकि, गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू करना जरूरी है, जैसा कि राजस्थान ने 2023 में शुरू किया।

2025 में पारंपरिक मार्केट्स दिक्कत में हैं, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होंगे। स्थानीय किराना दुकानें ताजा उत्पादों और व्यक्तिगत सेवा के दम पर टिक सकती हैं। भविष्य में, हाइब्रिड मॉडल्स (ऑनलाइन-ऑफलाइन एकीकरण) और स्मार्ट लॉजिस्टिक्स इस सेक्टर को और बदल सकते हैं।

उत्कृष्टता और उत्साह का संगम : विवेकानंद कॉलेज में NCWEB का वार्षिकोत्सव

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दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद कॉलेज नॉन-कॉलेजिएट महिला शिक्षा बोर्ड (NCWEB) के द्वारा वार्षिक उत्सव हर्षोल्लास और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम की गरिमा उस समय और बढ़ गई जब Dean Students Welfare (छात्र कल्याण अधिष्ठाता) प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर छात्राओं का उत्साहवर्धन किया। साथ ही, NCWEB की निदेशक प्रो. गीता भट्ट  ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से मंच को को गौरवान्वित किया।इस.अवसर पर विवेकानंद की प्राचार्या प्रो.पिंकी मौर्या ने माननीय अतिथियों का स्नेहिल स्वागत करते हुए उत्सव को प्रेरक आयाम प्रदान किया।

कार्यक्रम के विशेष क्षण में कॉलेज की वार्षिक पत्रिका ‘प्रबोधिनी’ के नवीन अंक का भी  लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर विवेकानंद NCWEB  की टीचर इंचार्ज डॉ. कामिनी तनेजा ने वर्षभर की उपलब्धियों को समेटते हुए प्रेरणादायक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा  अपनी फैकल्टी सदस्यों की भूरि-भूरि सराहना की।

मुख्य अतिथि प्रो. त्रिपाठी ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा — “यदि राष्ट्र को सशक्त और समृद्ध बनाना है, तो सर्वप्रथम उसकी बेटियों को शिक्षित करना होगा।” स्वामी विवेकानंद के विचारों का स्मरण कर उन्होंने शिक्षा के महत्व को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का समापन रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और छात्राओं के उत्साहपूर्ण सहभागिता के साथ हुआ। आयोजन ने शिक्षा, संस्कार और सृजनशीलता के अनूठे संगम का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत किया।

मोदी युद्ध के ज़रिए अर्थव्यवस्था को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसे बढ़ावा दे रहे हैं

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– कर्नल मूल भार्गव

मोदी द्वारा यह घोषणा किए जाने के बाद कि भारत कश्मीर में हुए क्रूर आतंकवादी हमले का मुंहतोड़ सैन्य जवाब देगा, बड़ी संख्या में आरामकुर्सी विश्लेषकों ने रोना शुरू कर दिया। ये तथाकथित विश्लेषक रो रहे थे कि यह भारत को अंतहीन युद्ध में उलझाने के लिए “चीन-पाकिस्तान का संयुक्त जाल” है। भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, और अमेरिका, चीन, पाकिस्तान वगैरह वगैरह, जो नहीं चाहते कि भारत आगे बढ़े। इसलिए उन्होंने भारत को युद्ध में फंसाने के लिए यह योजना बनाई। आतंकवाद से इस तरह नहीं निपटा जा सकता – वगैरह, वगैरह। *उन्होंने 1000 कारण बताए कि कैसे पाकिस्तान के खिलाफ़ किसी भी सैन्य अभियान से भारतीय अर्थव्यवस्था नष्ट हो जाएगी।*

लेकिन जैसा कि मैंने कहा, वे सिर्फ़ आरामकुर्सी विश्लेषक हैं। जो मोदी की नफ़रत में अंधे हो गए हैं। वे इस तथ्य को छिपाने की कोशिश करते हैं कि भारत पहले से ही चार दशकों से हज़ारों कटों से अंतहीन युद्ध के जाल में फंसा हुआ है। हमें पूरी ताकत से इससे बाहर निकलने की ज़रूरत है।

युद्ध ज़रूरी नहीं कि अर्थव्यवस्थाओं को नष्ट कर दें।  अगर कोई युद्ध उधार के पैसे और दूसरों के कंधों पर लड़ा जाता है, तो यह निश्चित रूप से अर्थव्यवस्थाओं को नष्ट कर देता है।

लेकिन पूरी लगन, तैयारी और अपनी ताकत से लड़ा गया युद्ध अर्थव्यवस्था को उछाल सकता है। उस युद्ध को आपकी स्वदेशी तकनीकों, विनिर्माण और उत्पादन के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। दुनिया की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएँ प्रमुख युद्धों की पृष्ठभूमि में विकसित हुई हैं, जिनका उपयोग राष्ट्रवादियों ने आविष्कारों, स्थानीय उत्पादन और रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए किया था। अब, जरा सोचिए कि मौजूदा भारत-पाक संघर्ष में क्या हो रहा है। भारत ने पिछले एक दशक में अपने स्वदेशी हथियार निर्माण और युद्ध मशीनरी क्षमता को बढ़ाया है। टैंक, बंदूक, मिसाइल से लेकर ड्रोन, सैटेलाइट, एयरक्राफ्ट, गोला-बारूद तक, भारत पिछले दस से पंद्रह वर्षों से लगातार इनके विकास पर काम कर रहा है। भारतीय उद्योग और वैज्ञानिक समुदाय के पास हमेशा से ये क्षमताएँ थीं, *लेकिन पिछली सरकारों की सैन्य क्षमताएँ विकसित करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी*। मोदी ने मेक इन इंडिया के साथ उस रवैये को बदल दिया। भारत ने कई आयातित हथियारों को भी ठेठ “जुगाड़” प्रणाली में प्रभावी ढंग से खरीदा और संशोधित किया है।  एक प्रभावी युद्ध के लिए, हमें निश्चित रूप से अभी भी पूरी तरह से आयातित हथियारों की आवश्यकता है और उनका उपयोग कर रहे हैं, लेकिन उनमें से एक बड़ा हिस्सा स्वदेशी निर्मित हथियारों का है।

अब, चूंकि पाकिस्तान ने भारत पर सैन्य प्रतिक्रिया थोपी है, इसलिए मोदी इस संघर्ष से उत्पन्न होने वाले प्रभावों से पूरी तरह अवगत हैं। तो क्यों न इसका सर्वोत्तम उपयोग किया जाए? हमने पिछले दो दिनों में मिसाइलों और ड्रोन का उपयोग करके सटीक हमलों का एक अद्भुत प्रदर्शन किया है।  सैन्य विश्लेषकों और लॉबी का पूरा ब्रह्मांड भारत द्वारा प्राप्त किए गए हमलों की सटीकता और सीमा से चकित है।

जबकि भारत अभी भी निर्णायक जीत के लिए गंभीर आयातित हथियारों का उपयोग कर रहा है, यह इस विश्व मंच पर स्वदेशी रूप से निर्मित हथियारों और गोला-बारूद का उचित मात्रा में प्रदर्शन करने में सक्षम होगा। *यह लड़ाई स्पष्ट रूप से अप्रमाणित चीनी हथियारों बनाम भारतीय हथियारों, अमेरिका, रूसी और फ्रांसीसी हथियारों के संयोजन की लड़ाई है। यदि चीनी हथियार प्रणालियों को पराजित और नष्ट कर दिया जाता है जैसा कि आज हुआ, तो यह अन्य देशों को ऐसे हथियारों का निर्यात करने की चीनी योजना को एक घातक झटका देगा। दूसरी ओर, भारतीय निर्मित हथियार, उपकरण, ड्रोन, मिसाइल और अन्य हथियार विश्व मंच पर आएँगे और नाटकीय रूप से उनकी मांग को बढ़ा सकते हैं।  *इससे अगले कुछ सालों में भारतीय रक्षा उद्योग और इसकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।

इसलिए उन विलाप करने वाले विश्लेषकों को सफल युद्ध के अर्थशास्त्र को समझने की जरूरत है। वे भूल गए कि मोदी संकट को अवसर में बदलने में सबसे बड़े उस्ताद हैं।* उन्होंने और भारत ने अतीत में दर्जनों बार ऐसा किया है। इसलिए निश्चिंत रहें, परमाणु युद्ध कोई आसान संभावना नहीं है क्योंकि पूरी दुनिया यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार है कि ऐसा कभी न हो। लेकिन एक सीमित लेकिन पारंपरिक युद्ध यह स्थापित कर सकता है कि *भारत वैश्विक दक्षिण में एक शक्तिशाली हथियार विशेषज्ञ है। हम सभी मानते हैं कि युद्ध हमेशा एक महंगा और खतरनाक विकल्प होता है, लेकिन अगर यह आप पर थोपा जाता है और अपरिहार्य हो जाता है, जैसा कि इस मामले में हुआ, तो अपनी पूरी ताकत से लड़ें और बाद में इसका सबसे अच्छा उपयोग करें।

मुझे यकीन है कि आम भारतीय इस तर्क को समझेंगे और सरकार के साथ खड़े होंगे।
जय हिंद। वंदे मातरम।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव के साथ खड़े होने का समय

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दिल्ली। Operation sindoor से एक दिन पहले मल्लिकार्जुन खड़गे ने PM पर हमला करते हुए ये कहा था कि मोदी को तीन दिन पहले ही पता था कि कश्मीर में आतंकी हमला होने वाला है, इसलिए मोदी ने अपना कश्मीर दौरा रद्द कर दिया। तो जब पहले पता था तो 26 लोगों की जान क्यों नहीं बचाई गई।

उस दिन रात को अशोक श्रीवास्तव ने अपने शो में सवाल उठाया कि भारत तैयार, पर घर में छुपे कितने गद्दार ?

और स्क्रीन पर खड़गे, इमरान मसूद ( जिसने उसी दिन बालाकोट हमले को लेकर कहा था कि दुनिया भारत पर हंस रही थी) और मदनी ( जिसने  सिंधु का पानी रोकने के भारत के फैसले पर सवाल उठाया था) की फोटो लगी थी।


इस प्रोग्राम के बाद देर रात भारत ने स्ट्राइक कर दी। और सुबह आल पार्टी मीट में कांग्रेस ने कहा कि हम सरकार के साथ खड़े हैं। गौरतलब है कि यह पूरी कहानी एक रात की है। अशोक श्रीवास्तव ने जो शो किया, वह पिछली रात का सच था। रात डेढ़ बजे पाकिस्तान की हुई ठुकाई के बाद, कांग्रेस का स्टैंड सामने आया। फिर खड़गे जी का भी स्टैंड बदला हो लेकिन पाकिस्तान की ठुकाई की पिछली रात का सच तो वही था, जो अशोक श्रीवास्तव ने अपने शो में कहा और दूरदर्शन ने दिखाया।

सच का सामना करना सबके वश की बात नहीं है। कांग्रेस बौखला गई। एक दिन बाद कांग्रेस के नेताओं ने अशोक श्रीवास्तव के प्रोग्राम का एक दिन पहले का स्क्रीन शॉट उठाकर अपना एजेंडा चलाना शुरू कर दिया। उनके ट्रॉल एक्टिवेट हो गए। कांग्रेस कहने लगी कि हम सरकार के साथ खड़े हैं लेकिन सरकारी चैनल का एंकर कांग्रेस के ‘दलित’ अध्यक्ष को गद्दार कह रहा है।

अशोक श्रीवास्तव ने खड़गे जी पर जो टिप्पणी की उनके दलित होने की वजह से नहीं बल्कि कांग्रेस के अध्यक्ष होकर गैर जिम्मेदाराना बयान की वजह से दी। ऐसा बयान दत्तात्रेय गोत्र के ब्राह्मण राहुल गांधी ने भी दिया होता तो उनकी तस्वीर भी शो में शामिल होती। वैसे भी शो में एंकर उन सभी लोगों पर हमलावर थे जो देश के खिलाफ टिप्पणी कर रहे थे। जाने अनजाने में अपने बयानों से पाकिस्तान की मदद ही कर रहे थे।

उल्लेखनीय है कि पूरे प्रोग्राम में किसी व्यक्ति को देश का गद्दार नहीं कहा गया था और सच तो यह है कि ऑपरेशन सिंदूर और ऑल पार्टी मीट के बाद भी कांग्रेस के नेता ऑपरेशन सिंदूर पर सवाल उठाते रहे, अलका लांबा पीएम का मजाक उड़ाते उन पर ट्वीट कर रही थीं, पीएम को “विषगुरु” वाले ट्वीट रीट्वीट कर रही थीं। उत्तर प्रदेश के एक बड़े कांग्रेसी नेता पर बयान के लिए ही एफआईआर हुई है।

अब कांग्रेस और पूरे इकोसिस्टम ने अशोक श्रीवास्तव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सूचना और प्रसारण मंत्री को टैग करके उन्हें नौकरी से निकालने की मांग की जा रही है। उनके खिलाफ प्रसार भारती अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी जा रही है।

ऐसे समय में उन्हें अकेला छोड़ना सही नहीं है। कम से कम इसको लेकर जहां तक जिसकी आवाज आवाज पहुंचती हो, आवाज उठाना चाहिए।

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