प्रधानमंत्री का संबोधन भारत के शक्तिबोध को जागृत करने वाला

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संतोष द्विवेदी मनुज

अमूमन किसी भी पटल पर अब लिखने का बहुत मन नहीं करता, उसके बहुत से कारणों में से एक कारण यह भी है कि कौन जवाब-तलब और ऊल-जुलूल की प्रतिक्रियाओं और नैरेटिव-प्रेरित शब्दजाल सुलझाता फिरे।

तथापि कई बार खुद की अभिव्यक्ति मानो देश की अभिव्यक्ति को प्रतिध्वनित करती है तो उसे सायास रोकना कदापि उचित नही कहा जा सकता। इसे व्यक्त करना ही अवश्यम्भावी हो जाता है।

इसी क्रम में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का आज का सम्बोधन राष्ट्र के शक्तिबोध के लिए अवश्यम्भावी था। जिस तरह से डॉनल्ड ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान के मध्य युद्धविराम की घोषणा की थी वो सभी को नागवार गुजरा था। जन-भावना धरी की धरी रह गई थी।

यह जनभावना क्षणिक भी नहीं थी, यह वर्षों-दशकों से सिर्फ कड़ी आलोचना देखने के बाद पहली बार इससे आगे बढ़ी थी।दुश्मन को उसकी भाषा में जवाब दिया जा रहा था। जनता की उम्मीद बढ़ना बेईमानी नहीं थी। लेकिन यह भी समझना होगा कि देश की सुरक्षा के मद्देनज़र हर बात सार्वजनिक नहीं कि जा सकती, ऐसे में किन परिस्थितियों में अचानक युद्धविराम किया गया, नेतृत्व इसे सार्वजनिक भले न करें लेकिन जिस तरह से प्रधानमंत्री जी द्वारा परमाणु-बम के नाम पर ब्लैकमेलिंग को स्पष्ट तौर पर नकार दिया गया और दुनिया को स्पष्ट सन्देश भी दिया गया कि पाकिस्तान से बातचीत के मुद्दे सिर्फ सीमा-पार आतंकवाद और पीओके तक सीमित है। इसमें किसी भी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होगा।

तय मानिए, जिस तरह से भारत ने PoK से आगे पाकिस्तान की मुख्य-भाग में घुसकर बहावलपुर आदि क्षेत्रों पर आतंकी अड्डों पर अटैक किया है वो ऐतिहासिक और साहसिक है। नए भारत की प्रतिध्वनि है। प्रधानमंत्री जी द्वारा यह भी साफ किया गया कि आगे से किसी भी तरह की आतंकी घटना को ‘एक्ट ऑफ वार’ माना जायेगा। अपने आप में स्पष्ट है भविष्य में हमारी कार्ययोजना कैसी रहने वाली है।

एक बात तो तय है सीजफायर को आतंकिस्तान कितना मानेगा, देखने वाली बात होगी। उसकी नसों में धूर्तता है।
यही धूर्तता ही एकदिन उसके समापन की पटकथा लिखेगा। यह कब होगा वो तो नहीं पता लेकिन होकर रहेगा ये तय है।

यह कोई भविष्यवाणी नहीं है बल्कि देर-सबेर घटित होने वाला सत्य है। निश्चित ही इसकी परिणति भारत के हाथों ही होगी।

और हाँ! जैसी की उम्मीद थी, देश के सामर्थ्य को समवेत स्वर में आरोहित कर, राष्ट्र के शक्तिबोध को जाग्रत बनाये रखने के लिए प्रधानमंत्री Narendra Modi जी का सादर अभिनन्दन।

जय हिंद, जय भारत। 🇮🇳

ऑपरेशन सिंदूर और अश्वत्थामा।

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दिनेश कांडपाल

चीन और तुर्की को यकीन नहीं हुआ कि भारत दुश्मन पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने के इतने करीब पहुंचकर उसे बर्बाद करने की क्षमता रखता है। पाकिस्तान में सरगोधा के पास एक जगह है किरना हिल्स। 10 मई की रात यहीं पर एक भारतीय स्ट्राइक ने अगले 12 घंटे के लिए पूरी दुनिया को बेचैन कर दिया था। शाहबाज शरीफ सदमे में था और जनरल असीम मुनीर के हसीन ख्वाब पलट चुके थे।
जिस परमाणु बम का गुब्बारा लेकर पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया का ताकतवर मुल्क कहता आया उस गुब्बारे की हवा एक ब्रह्मोस ने निकाल दी। ईरान के हुक्मरानों को भारत की ताकत का अंदाजा पहले से था सऊदी अरब जानता था कि पाकिस्तान की बेवकूफियां पूरी दुनिया पर भारी पड़ सकती है, डोनाल्ड ट्रंप की सिट्टी पिट्टई गुम हो चुकी थी। इसलिए वो एहतियात बरत रहे थे।
जरा सोचिए पूरा अमेरिकी निजाम भारत को यह समझाने में लग गया की युद्ध विराम जरूरी है।

मूर्ख मुनीर न्यूक्लियर कमांड की बैठक बुला चुका था। सी आई ए हर मिनट की खबर ट्रंप तक पहुंचा रहा था। ट्रंप ने पहले जेडी वांस को काम पर लगाया, लगा कि मामला पूरी तरह से नहीं सम्हलेगा तो विदेश सचिव मार्को रूबियो भी मैदान में कूद पड़े। कुछ घंटे के लिए पूरे अमेरिका का एक ही एजेंडा बन गया किसी तरह मोदी को मनाओ।

जिस वक्त सोशल मीडिया पर खबर और अफवाह की धूल भरी आंधी में यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि क्या सही है क्या गलत उसे समय अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और पाकिस्तान का चाचा चीन अपने-अपने मिलिट्री कमांड सेंटर में पहुंच चुके थे।

किसी को कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था। अगले पल की कल्पना बहुत डराने वाली थी। करारी हार और घनघोर बेज्जती की आशंका से घबराया जनरल असीम मुनीर अपने पागलपन में न्यूक्लियर कमांड में कोई सनकी फरमान जारी कर सकता था। भारत की तैयारी ऐसी थी कि अगर किराना हिल्स के पास एक और मूवमेंट हुई तो उसके सारे औजार पुर्जा पुर्जा हो सकते थे।

ब्रह्मास्त्र साधा जा चुका था। जाहिर है अगर इसका इस्तेमाल हो जाता तो उसकी तपिश पूरी दुनिया को झेलनी पड़ती। पाकिस्तान को परमाणु टेक्नोलॉजी देने की बदनामी का दाग लिए कई अश्वत्थामा सदियों तक इस पृथ्वी पर विचरते रहते।
भारत सांस्कृतिक समृद्धि और शक्ति का देश। यहां पर मनुष्य का मोल है। ज़िम्मेदार शासक गंभीर होता है। शक्ति के साथ कल्याण का भाव जय और विजय की उद्दिग्नता से कहीं दूर होती है। यही वजह है की युद्ध के ज्वार में बह रही धारा के वेग की परवाह न करते हुए एक ऐसा फैसला लिया गया जिसमें आलोचनाओं का जोखिम तय था, और वो होने भी लगी।

जिस संस्कृति में रणछोड़ को भी कल्याण का मार्ग माना गया हो वहां युद्धविराम एक छोटा निर्णय था। इसलिए ये जोखिम लिया गया।

भारत को लक्ष्य की प्राप्त हो चुका थी। दुश्मन पाकिस्तान दहला पड़ा था और उसके आका चीन और तुर्की भारतीय टेलीविजन पर अपनी मिसाइल और ड्रोंस के मलबे देख कर व्यथित थे। ट्रंप, वांस और रूबियो सिचुएशन रूम से हिल नहीं पाए।

अब इधर का हाल देखिए। बाड़मेर में चीनी मिसाइल को हमारे लड़के टेंपो में भर कर ले गए। पंजाब के लड़के इस बात पर लड़ लिए कि खेत में गिरा टर्की के ड्रोन का मलबा कौन घर ले जाए। कुछ स्क्रैप डीलर इस बात पर नाच लिए कि भारतीय पोस्ट पर LoC के उस पार दागर गए गोला बारूद के खोखे का कई टन पीतल मिल जाएगा।

कुल मिलाकर संदेश साफ़ है। ये नया भारत है। घुसे या ना घुसे लेकिन मारेगा ज़रूर।

(फेसबुक वॉल से)

प्रवासी भारतीयों का चित्रण और वैश्विक संदर्भ में बॉलीवुड

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दिल्ली। भारतीय सिनेमा, विशेषतः बॉलीवुड, न केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान का संवाहक रहा है, बल्कि उसने वैश्विक परिदृश्य में भारतवंशियों की भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थितियों का भी प्रभावशाली चित्रण किया है। आज, बॉलीवुड और भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक समन्वय स्थापित हो चुका है। सौ से अधिक देशों में फैला तीन करोड़ से भी अधिक की जनसंख्या वाला भारतीय डायस्पोरा बॉलीवुड के लिए एक महत्वपूर्ण दर्शक वर्ग बन चुका है।

‘बॉलीवुड’ के वैश्विक रूप में पुनर्निर्माण के साथ हिंदी सिनेमा की विषयवस्तु, पात्र-निर्माण और प्रस्तुति में वैश्विकता का समावेश हुआ है। प्रवासी भारतीयों के जीवन, उनकी सांस्कृतिक जटिलताओं, पहचान-संकटों और भारतीय मूल्यों के साथ उनके जुड़ाव को फिल्मी कथानकों में रेखांकित किया जाने लगा है। इस प्रकार बॉलीवुड ने भारत और विदेश दोनों जगहों पर अपने दर्शकों के लिए एक अधिक समावेशी और वैश्विक छवि प्रस्तुत की है। जहाँ एक ओर यह सिनेमा भारतीय प्रवासी समुदाय को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का कार्य करता है, वहीं दूसरी ओर यह उन्हें उनकी भारतीय पहचान को एक वैश्विक मंच पर पुनर्स्थापित करने का अवसर भी प्रदान करता है। जिस कार्य को कभी रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ निभाते थे, वही कार्य अब डिजिटल मीडिया और सामाजिक मंचों पर सिनेमा के माध्यम से सम्पन्न हो रहा है।

इस कड़ी में वी. शांताराम की डॉ. कोटनीस की अमर कहानी (1946) एक प्रारंभिक प्रयास रही, जिसमें एक विदेशी भूमि पर कार्यरत भारतीय डॉक्टर की कथा को प्रस्तुत किया गया। इसके बाद संगम (1964), लव इन टोक्यो (1966), एन ईवनिंग इन पेरिस (1967), पूरब और पश्चिम (1970) जैसी फिल्मों ने विदेश में भारतीय जीवन की झलक दिखाई। वास्तविक प्रवासी जीवन की संवेदनशीलता 1990 के दशक के बाद और अधिक मुखर रूप में सामने आई। दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995), परदेस (1997), कभी ख़ुशी कभी ग़म (2001), कल हो ना हो (2003), सलाम नमस्ते (2005), नमस्ते लंदन (2006), और तारा रम पम (2007) जैसी फिल्मों ने प्रवासी भारतीयों की द्वंद्वात्मक पहचान, पारिवारिक मूल्यों और पश्चिमी समाज के साथ उनकी सामंजस्य की कोशिशों को केंद्र में रखा। बॉलीवुड के अतिरिक्त कई प्रवासी भारतीय फिल्मकारों—बाला राजशेखरानी, डॉ. निखिल कौशिक, कल्पना सिंह, करनशेर सिंह, अंगदपाल, आनंद सिंह, सुरेश सेठ, बिपिन पटेल और तरलोक मलिक—ने भी प्रवासी जीवन पर केंद्रित उल्लेखनीय फिल्में बनाई हैं। प्रवासी भारतीयों के जीवन को चित्रित करने वाली फिल्मों में सबसे प्रमुख नाम मनोज कुमार द्वारा निर्मित “पूरब और पश्चिम” (1970) का आता है। यह फिल्म भारतीय और पश्चिमी जीवनशैली के बीच के अंतरों को दर्शाते हुए भारतीय परंपराओं, मूल्यों और जीवन-दृष्टि को श्रेष्ठ ठहराने का प्रयास करती है। फिल्म का केंद्रीय संदेश यह है कि कोई युवा चाहे विदेश में आधुनिक शिक्षा प्राप्त करे, किंतु उसका अंतिम उद्देश्य स्वदेश लौटकर अपने देश की सेवा करना होना चाहिए। 1995 में आई आदित्य चोपड़ा की फिल्म “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” (डीडीएलजे) प्रवासी भारतीयों पर केंद्रित एक युगांतकारी कृति सिद्ध हुई। जहाँ साठ से नब्बे के दशक तक प्रवासी भारतीयों पर इक्का-दुक्का फिल्में बनीं, वहीं डीडीएलजे ने इस विषय को मुख्यधारा में लाकर एक नई परंपरा का सूत्रपात किया। 1990 के दशक की फिल्मों में आधुनिकता और परंपरा के संघर्ष के स्थान पर दोनों के सह-अस्तित्व और समन्वय को महत्व दिया गया। प्रवासी भारतीय को ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया गया जो आधुनिकता और परंपरा, दोनों दुनियाओं के बीच संतुलन बनाते हुए जीवन जीता है।

इन फिल्मों में भारत की सांस्कृतिक अवधारणाएँ और परंपराएँ एक ऐसे परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत की गईं जो न केवल प्रवासी दर्शकों को अपनी जड़ों से जोड़े रखती हैं, बल्कि उन्हें गर्व के साथ वैश्विक पहचान की ओर भी अग्रसर करती हैं।

भारतीय सिनेमा, विशेषतः बॉलीवुड, समय के साथ केवल मनोरंजन का माध्यम न रहकर, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, पहचान, और सामाजिक परिवेश का वैश्विक प्रवक्ता बन चुका है। प्रवासी भारतीयों के जीवन, संघर्ष, द्वंद्व, और सांस्कृतिक अनुकूलन की गाथाओं को केंद्र में रखकर बनी फिल्मों ने न केवल दर्शकों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया है, बल्कि एक वैश्विक भारतीय चेतना का भी निर्माण किया है। बॉलीवुड ने प्रवासी भारतीयों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का कार्य किया है। सिनेमा के माध्यम से भारतीय मूल्य, परंपराएँ, भाषिक भावनाएँ और पारिवारिक ताने-बाने, वैश्विक मंच पर प्रस्तुत होकर, भारतीय पहचान को सुदृढ़ करते हैं। यह वही भूमिका है जो पूर्व समय में रामायण जैसे ग्रंथ निभाते थे—आज वही स्थान डिजिटल युग में सिनेमा ने ले लिया है। वहीं दूसरी ओर, प्रवासी भारतीयों को भी बॉलीवुड के माध्यम से न केवल सांस्कृतिक जुड़ाव प्राप्त होता है, बल्कि वे अपनी पहचान को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पुनः परिभाषित करने में भी समर्थ होते हैं। इस प्रकार बॉलीवुड केवल एक सिनेमाई विधा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक सेतु बनकर उभरा है, जो ‘देसी’ और ‘परदेसी’ के बीच भावनात्मक पुल का कार्य करता है।

आज भारत के पास पीएम नरेंद्र मोदी का नेतृत्व है

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पंकज कुमार झा

हजार बात की एक बात। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी पर आंख मूँद कर भरोसा कायम रखने के हजार कारण है। हर बार मां भारती के ये सपूत हमारे भरोसे पर खरे उतरे भी हैं।

एक आम नागरिक के पास जितनी सूचनायें होती हैं, उससे सौ गुना अधिक जानकारी सरकार के पास होती ही है। हमें अपनी अधकचरी जानकारी के आधार पर कुछ भी प्रतिक्रिया देने या मन बना लेने का स्वभाव छोड़ना होगा।

अनेक बार ऐसा हुआ है जब सहज बुद्धि के आधार पर हम जैसे लोग भी कुछ मानस बना लेते हैं, बाद में पता चलता है कि अपन गलत थे, सरकार सही थी।

आज भारत के पास जैसा नेतृत्व है, वैसा किसी भी कालखंड में नहीं रहा है। भारत की श्रेष्ठतम सरकार है यह और श्रेष्ठतम प्रधानमंत्री हैं मोदीजी। नीयत, नीति ऐसा लगभग किसी का नहीं रहा है। आज सरकार में विश्व का सबसे अनुभवी, सबसे श्रेष्ठ, सबसे अधिक सरोकारी और निष्ठावान लोग कैबिनेट से लेकर अफसरशाही तक में है, जिसकी विश्व में एक साख है।

भारत अत्यधिक विविधता पूर्ण और क्लिष्ट देश है। इसे समझना और सबको साथ लेकर चलना, चारों तरफ दुश्मनों से घिरे रहने के बावजूद सर उठा कर चलना, समृद्धि और शांति का टापू बने रहना ऐसी उपलब्धि है, जिसका वर्णन इतिहास करेगा। हमने महामारी जैसी स्थिति भी देखा है, जिसमें जिस सूझ-बूझ के साथ निपट कर जन-धन को सुरक्षित रखा गया, उसकी कल्पना भी नहीं थी हम जैसे लोगों को।

आजतक नरेंद्र मोदीजी अजेय रहे हैं। वे शत्रुहंता योग के साथ पैदा हुए हैं। अंदर-बाहर कोई भी नहीं टिक पाया उनके आगे। ईश्वर ने कुछ अलग करने और रचने ही भेजा है उन्हें। किंतु ईश्वर को भी सहयोग और समर्थन की आवश्यकता होती है। उन्हें भी अपनों का साथ और विश्वास चाहिये होता है। आप कुछ भी न करें, बस भरोसा बनाये रखें, तो भी काफी होगा। सत्य हमारे साथ है तो हम जीतेंगे ही। भारत अब पीछे मुड़ कर देखने वाला नहीं है। जीत जायेंगे हम तुम अगर साथ हो।

सत्यमेव जयते। जय श्रीराम।

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